श्री रामकृष्ण के उपदेश "अमृतवाणी " के आधार पर
(स्वामी राम'तत्वानन्द रचित- श्री रामकृष्ण दोहावली )
(11)
" संसरासक्त लोगों का जीवन "
* संसारी जीव (सम्मोहित-Hypnotized मनुष्य) के लक्षण *
110 दुर्जन चलनी समान है , रखे असार तज सार।
190 धरहि सज्जन सार सदा , सूप सम तजे असार।।
जिस प्रकार चलनी सारयुक्त वस्तुओं को छानकर बाहर निकाल देती है ; और असार वस्तुओं को अपने में रख लेती है, उसी प्रकार दुर्जन व्यक्ति (Hypnotized-व्यक्ति) अच्छी बातों को तो छोड़ देते हैं पर बुरी बातों को अपने में रख लेते हैं। सूप का स्वभाव ठीक इसके विपरीत होता है। सज्जनों का स्वभाव (De -Hypnotized, विसम्मोहित व्यक्ति का स्वभाव) सूप ही की तरह सारग्राही होता है।
इसी आधार पर मनुष्य दो प्रकार के होते हैं - 'मानुष' और 'मन-होश'। जो मनुष्य भगवान के लिए व्याकुल होते हैं वे 'मन-होश ' हैं ; और जो 'कामिनी -कांचन ' के पीछे पागल बने रहते हैं वे साधारण 'मानुष' हैं।
111 जिनका नहि कछु भार है , जिनको नहि कछु बन्ध।
191 म्याऊँ पोष प्रपंच करे , माया प्रबल प्रबन्ध।।
संसार में कुछ लोग ऐसे होते हैं , जिनके जीवन में किसी प्रकार का बन्धन नहीं होता , किन्तु ऐसा होते हुए भी वे स्वयं ही किसी न किसी वस्तु से नाता जोड़कर स्वयं को आसक्ति के बन्धन में बाँध लेते हैं। वे मुक्त होना नहीं चाहते। अगर किसी व्यक्ति के स्वयं का कोई परिवार नहीं है , और न उस पर सगे-सम्बन्धियों की देखरेख का भार ही है , तो वह कोई कुत्ता , बिल्ली , बन्दर या तोता पाल लेता है , और किसी तरह अपनी संसार तृष्णा को तृप्त करना चाहता है। मनुष्य पर माया का ऐसा ही जबरदस्त प्रभाव है।
112 जस बालक को भोग सुख, समझा सके न कोय।
193 तस विषयी को ब्रह्म सुख , बिरथा श्रम बस होय।।
जिस प्रकार छोटे बालक या बालिका को सम्भोगसुख क्या है , यह नहीं समझाया जा सकता, उसी प्रकार विषयासक्त संसारी जीव को ब्रह्मानन्द नहीं समझाया जा सकता।
113 संसारी जग में रहे , झेले दुःख अपार।
194 तदपि नहि जप तप भजन , अति प्रबल संस्कार।।
संसारी जीव संसार में सदा असह्य दुःख-क्लेश भोगता है किन्तु किन्तु फिर भी वह कामिनी-कांचन का चस्का छोड़कर भगवान में मन नहीं लगा पाता।
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