Monday, May 28, 2012

' पुनर्जन्म पर विश्वास रखने से मृत्यु का भय नहीं होता '[47,48]परिप्रश्नेन

47. प्रश्न : कुछ वस्तुएं उपरी तौर से, प्रतीयमानतः आनन्दप्रद  प्रतीत होती हैं, किन्तु वैसी चीजों को भोग करने से बाद में दुःख क्यों होता है ? 
उत्तर : कुछ ही क्यों, अधिकांश सांसारिक वस्तुएं पहले आनंदप्रद ही प्रतीत होती हैं, किन्तु बाद में पता चलता है, कि वे तो दुःखदायी थीं। इसीलिए 
संसार की अधिकांश वस्तुओं को त्याग देने योग्य वस्तु कहा जाता है। जो 
वस्तुएं पहले पहल उतनी आनन्दप्रद प्रतीत नहीं होती, बाद में उन्हीं में से अनेक वस्तुएं सच्चा सुख देती हैं। किन्तु हमारा मन आमतौर पर उन्हीं 
सांसारिक वस्तुओं की ओर अधिक आकर्षित होता है, जो उपरी तौर से सुख-भोग प्रदान करने वाले साधन दिखाई पड़ते हैं। हमारा मन इन्द्रिय सुखभोग के वस्तुओं की ओर  आकर्षित होते होते हमें भोग-परायण बना देता है, इसीलिए हमलोगों को जीवन में दुःख ही अधिक भोगना पड़ता है। 
तुमने पूछा है, वैसी चीजों (जो देखने में आपातमधुर प्रतीत होती हैं ) से 
दुःख होता ही क्यों है? इस क्यों का उत्तर है- ' माया नटी ' ही यह कर रही है ! माया ने जगत में भ्रम की उपत्ति कर रखी है, मोह- निद्रा में 
हमलोगों को अचेत बना दिया है, इसीलिए हमलोग आपातमधुर वस्तुओं 
की ओर बरबस आकृष्ट हो जाते हैं, और अंत में दुःख पाते हैं।
[ श्रीरामकृष्ण देव कहते हैं- "Remember that dayA, compassion, and mAyA, attachment,are two different things. Attachment means the feeling of 'my-ness' towards one's relatives.  

Compassion is the love one feels for all beings of the world.It is an attitude of equality. MAyA also comes from God.
 Through mAyA, God makes one serve one's relatives.But one thing should be remembered: 

mAyA keeps us in ignorance and entangles us in the world, whereas dayA makes our hearts pure and gradually unties our bonds." ]
  इसीलिए हमें पहले अपने चरित्र में धैर्य के गुण को अपना कर, अपने मन को विवेकी बनाने का अभ्यास करना होगा। जो धीर (बुद्धिमान या सोच-विचार कर कार्य करने वाले ) विवेकवान हैं- वे पहले अपने
विवेक प्रयोग करके अपने औचित्य-बोध से देख लेते हैं, कि किस वस्तु से परिणाम में क्या मिलने वाला 
है?अंत में आनंद मिलेगा या दुःख मिलेगा ? इसी ' विवेक-प्रयोग ' की शक्ति को प्राप्त कर लेना मनुष्य जीवन का सबसे बड़ा  कर्तव्य है।
 यह प्राप्त कर लेने से उपरी तौर से मधुर लगने वाली वस्तुओं को दूर से ही पहचान कर, यदि उनको ग्रहण करने का प्रयास ही नहीं किया जाय, दूर से ही विष के समान जान कर उन्हें देखते ही त्याग दिया जाय तो बाद में दुःख पाने की सम्भावना नहीं रहेगी। 
विवेक-प्रयोग से ही ' माया-नटी ' भागती है।
48. प्रश्न: पुनर्जन्म में विश्वास करने के बाद भी, हममें से अधिकांश लोगों को  मृत्यु से भय क्यों  होता है ?         उत्तर : पुनर्जन्म में विश्वास करने - का तात्पर्य क्या है ? इस बात पर भरोसा नहीं है, इसीलिए कहते हैं, 
हम विश्वास करते हैं। बुढ़ापा आएगा, रोग आयेगा, उसके बाद मृत्यु आएगी। उससे भी छुटकारा नहीं होगा, 
फिर से जन्म लेना होगा। इसी पुनर्जन्म के भय को हर समय सिर पर लेकर घूमते रहते हैं। पुनर्जन्म में 
विश्वास करते हों, वैसी बात नहीं है।
मैं जन्म लूँगा, या मर जाऊंगा उसमे क्या रखा है ? मैं यह शरीर नहीं आत्मा हूँ - ऐसा विश्वास बहुत कम 
लोगों में रहता है। यह विश्वास जिसमें है,उसको मृत्यु का भय नहीं होता है। गीता में जिस प्रकार 
श्रीकृष्ण अर्जुन को समझाते हैं- कि तुम्हारे और मेरे इसके पहले भी कई जन्म हो चुके हैं, तुम्हें वह सब याद नहीं है, किन्तु मुझे वे सब जन्म याद हैं। फिर तुम भय क्यों करते हो ? यदि मरना निश्चित ही है, तो वीर की तरह मरो। और यदि जीवित रहना है, तो सम्मान से जीओ !
 यदि हमलोग सचमुच पुनर्जन्म में विश्वासी हों,तो हमलोग बिलकुल भिन्न श्रेणी के मनुष्य होंगे।हमलोग पुनर्जन्म मानते हों या नहीं, किन्तु 
यह तो सभी लोग जानते हैं कि जन्म लेने से एक दिन मरना भी होगा- यह जानते हैं, इसीलिए तो भय होता है। पुनर्जन्म की बात को छोड़ दें, और एक बार जन्म  लूँगा,  यह तो बाद की बात है।किन्तु अभी हमलोग हर
 समय इसी बात से चिंताग्रस्त हैं कि, जब जन्म लिया हूँ तो क्या सचमुच मुझे भी एक दिन यह सब धन-दौलत, स्त्री-पुत्र आदि छोड़ कर यहाँ से चला जाना पड़ेगा ?

 हाँ, यह और बात है, कि बीच बीच में इस बात को हमलोग भूल जाते हैं। मृत्यु को भूल जाने के कारण ही हमलोग यह सोचते रहते हैं कि चाहे जैसे भी हो, गलत-सही जिस उपाय से भी हो, रुपया-पैसा का ढेर खड़ा कर लिया जाये। जब धन-दौलत बहुत होगा, तभी तो छप्पन-भोग खाने को मिलेगा, खूब खाऊंगा, खूब भोग करूँगा जीवन के मजे लूट पाउँगा,यह होने से सबकुछ मिल जायेगा। ऐसा कब सोचता हूँ ?  जब यह भूल जाता हूँ  कि 
जन्म लेने से ही मरना पड़ता है।
इसी जीवन में अभयता प्राप्त की जा सकती है।  हमलोग आनन्द के साथ घोषणा कर सकते हैं, कि एक दिन यदि मर भी जाऊँगा - तो उसमें भय की
 क्या बात है !  यह कैसे हो सकता है ?जब हमलोग यह जान जायेंगे कि आखिर इस जगत में जीवन धारण करने का लक्ष्य क्या है ? समस्त जीवन-क्रम का तात्पर्य क्या है, इसका  वास्तविक उद्देश्य क्या है-
इसे समझ लेने से यह संभव हो सकता है। " मैं यह जानता हूँ कि
मैं शरीर-मन का जड़ पिंड नहीं, अजर-अमर-अविनाशी आत्मा हूँ ! " यह विचार मन में दृढ़ता से बैठ जाये, तो मौत के भय को भी जीता जा सकता है।
 डार्विन के  क्रम-विकासवाद  को  यदि  भारतीय  आधयात्म के दृष्टि  से समझने  की चेष्टा करें  तो  उसमें  वर्णित जीवन-क्रम के उद्देश्य  की  व्याख्या  क्या होगी ? 
 
यही, कि मनुष्य क्रमशः उन्नत हो रहा है, उसका विकास क्रमशः होना ही संभव है, (क्योंकि सामान्य मनुष्य  भूलें करके ही सीखता है।) और इस प्रकार वह क्रमशः महान बनता जा रहा है, वह क्रमशः उत्कृष्टतर बनता जा रहा है। एवं यह क्रमविकास, या क्रमोन्नति एक ही जन्म में संभव नहीं होती  है। किन्तु इसमें डरने का कोई कारण नहीं है।{ महामंडल पुस्तिका " विवेकानन्द-दर्शनम " में कहा गया है - 


" After all, this world is a series of  pictures. this colourful conglomeration expresses one idea only. Man is marching  towards perfection ! 
That is 'the great interest running through.We are all watching the making of men, and that alone. "

-अर्थात यह जगत सतत परिवर्तनशील चित्रों की एक श्रृंखला मात्र है। इसकी सतरंगी छटा केवल एक ही उद्देश्य को अभिव्यक्त कर रही है-' भ्रम और भूलों को त्यागता हुआ  ' मनुष्य ' क्रमशः' पूर्णता ' की ओर अग्रसर हो रहा है !' इस ' जगत और जीवन ' के चित्रों में यही महान-भाव 
छिपा हुआ है, हमलोग इसके माध्यम से केवल मनुष्य निर्माण होता हुआ 
देख रहे हैं। "

गीता (2/16) : स्वयं को मात्र एक ' शरीर-मन बद्ध जीव ' - मान कर, हमलोग जिसे जाग्रत अवस्था समझते हैं, वह ' तुरीय ज्ञान ' की अपेक्षा 
एक विराट स्वप्न ही तो है ! जब हम ' सच्चिदानन्द ' से साक्षात्कार की 
अवस्था में ' ऐक्य ' की अनुभूति करते हैं, तब यह ठोस दिखने वाला संसार ' सूर्य-चन्द्र-पृथ्वी ' सब कुछ असत ही प्रमाणित होता है। 
इसीलिए तो स्वामीजी कहते हैं- " हे सखे ! तुम रो क्यों रहे हो ? सब शक्ति तुम्हीं में है। हे भगवन ! अपना ऐश्वर्यमय स्वरुप विकसित करो। ये तीनो लोक तुम्हारे पैरों के नीचे हैं। जड़ की कोई शक्ति नहीं प्रभाव तो आत्मा का ही होता है।"" हे नर-नारियों ! उठो ! आत्मा के साथ स्वयं की 
अभिन्नता को जानकर ' सत्य ' में अविचल रहने का साहस करो ! संसार 
को कई सौ साहसी नर-नारियों की आवश्यकता है। "}  
  हमलोगों का पुनर्जन्म होता है, फिर एक जन्म ग्रहण करूँगा। इस जन्म 
में जहाँ तक उन्नत हुआ हूँ, वहां से और भी उत्कृष्ट जीवन गठित कर सकूँगा। इसके बाद वाले जन्म में इससे और अधिक उन्नति कर 
सकूँगा।
 
क्रमशः उन्नति करते करते पूर्णता प्राप्त कर लूँगा। यदि पुनर्जन्मवाद पर पक्का विश्वास हो, तो मृत्यु का भय नहीं रहता है। बल्कि हमारा 
हृदयअनिवार्य रूप से पूर्णता प्राप्त करने के उमंग से सदैव आल्हादित 
रहता है ! विवेक-प्रयोग से ही ' माया-नटी ' भागती है, और मनुष्य क्रमशः पूर्णता की ओर अग्रसर होता है। 

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