Monday, May 28, 2012

" नया युग-नया धर्म, नया भगवान-नया वेद ! "[45,46]परिप्रश्नेन

45. प्रश्न : श्रीरामकृष्णजी तो स्वामी विवेकानन्द के गुरु थे, फिर भी यहाँ विवेकानन्द के उपर ही अधिक जोर क्यों दिया जाता है ? 
उत्तर :   सुनो एक सच्ची घटना कहता हूँ। कोई युवक रामकृष्ण मिशन में भर्ती होने के लिए गया था। उससे प्रश्न किया गया-' क्या तुम इस विषय में कुछ जानते भी हो ? क्या पढ़े हो ? उत्तर में युवक ने कहा, रामकृष्ण-वचनामृत पढ़ लिया हूँ। तब उससे कहा गया, ' नहीं, केवल वचनामृत पढ़ लेने से कोई संत नहीं बन सकता है। तुम स्वामीजी की पुस्तकों को पढो।'  
वह युवक सोचने लगा- 'मैंने वचनामृत पढ़ लिया है, ये कहते हैं, ' वचनामृत पढने से भी संत नहीं बना जा सकता है,स्वामीजी की पुस्तकों को पढना होगा ? ' यह सुनकर उस लड़के के मन में जब बहुत संदेह हुआ, तो प्रश्न करने से वह समझ पाया कि ' वचनामृत ' पढने से तो सीधा ईश्वर की प्राप्ति हो जाती है,संत बनने की आवश्यकता ही नहीं होती।
स्वामीजी की पुस्तकों को पढने से सन्यास शब्द का सच्चा अर्थ समझ में आता है। दूसरों के कल्याण के लिए अपने जीवन को न्योछावर करने की विधि सीखी जाती है। और मुक्ति ? ' कथामृत ' पढने से, ठाकुर के उपदेश का अनुशरण करने से, मुक्ति हो जाती है। और कोई साधना करने की आवश्यकता  नहीं होती।  
किन्तु इससे बढकर प्रभु-कृपा और कुछ भी नहीं कि मेरा जीवन जगत के  मनुष्यों के कल्याण के लिए समर्पित हो जाय। यही है स्वामीजी के संदेशों का सार।
हमलोग इतना अधिक  'स्वामीजी -स्वामीजी ' इसी लिए करते  रहते हैं, कि यदि उनके एक-दो संदेशों को भी हम अपने जीवन में उतार सकें,तो हमलोग  हँसते हँसते अपनेजीवन को आसानी से
 दूसरों के कल्याण के लिए न्योछावर कर  देंगे। स्वामीजी ने बड़े स्पष्ट शब्दों में कहा है- जो अपनी 
मुक्ति की चेष्टा करेगा, वह नरक में जायेगा। दूसरों की मुक्ति की चेष्टा करके नरक में जाना अपनी मुक्ति प्राप्त करने से अधिक श्रेयस्कर है। 
तुम लोग ऐसी बातों को सुन पा रहे हो, जिन लोगों ने स्वामीजी को पढ़ा है वे भी जानते हैं, किन्तु जगत के सामान्य मनुष्यों ने यह सब सुना ही नहीं है, धर्म के इतिहास को उन्होंने सुना ही नहीं है। क्योंकि  स्वामीजी का धर्म प्रचलित या पुराने ढंग का हिन्दू-धर्म नहीं है। प्रचलित धर्मों में बहुत हुआ तो इहलोक
 का भोग या संसार की वस्तुओं को पाने की बातें होती हैं। या परलोक (स्वर्ग-नरक) के भोग की बातें हैं।
 किन्तु यह नया (सनातन) धर्म सचमुच हमारी अन्तस्थ सत्ता (पक्का मैं) को खींच कर  बहार निकाल लाता है। यह धर्म (चरित्र )पशु को मनुष्य में तथा मनुष्य को देवता में परिणत 
कर देता है। अच्छा तुम यह बताओ कि तुम देवता किसे समझते हो ? 
 
 ठाकुर का जीवन,माँ के जीवन को देखो,क्या इनके जीवन से बढ़कर अन्य किसी भी देवता का जीवन हो
 सकता है ? जो अपनी अंतिम निःश्वास तक मनुष्य के कल्याण के लिए लिए हैं। माँ सारदा देवी ठाकुर के सम्बन्ध में कहती थीं- ' वे (ठाकुर) मनुष्यों के कल्याण के लिए अंतिम समय तक मुख से रक्त निकलने पर भी उपदेश दिया करते थे। सचमुच, देवता और किसको कहा जा सकता है ? 
इसका नाम है-धर्म। पशुभाव सम्पूर्ण रूप से चला जायेगा। सभी प्रकार की संकीर्णता सम्पूर्ण रूप से 
दूर हो जाएगी। इसीलिए स्वामीजी कहते हैं-  " नया युग-नया धर्म- नया भगवान-नया वेद ! "   सब कुछ पूरी तरह से नया बना लेने की आवश्यकता है।वर्तमान समाज और देश में परिवर्तन  लाने के लिए, आज  इसी स्वामीजी के जीवन और सन्देश की आवश्यकता है। ऐसा धर्म और कहीं सुने हो ? 
आज भी जो यह नहीं समझेंगे कि " जगत कल्याण "  के लिए, भगवान श्रीरामकृष्ण का ही कार्य स्वामीजी के माध्यम से हो रहा है, जो लोग यह नहीं समझेंगे (कि आज भी स्वामीजी ही ठाकुर के कार्य को करने के लिए हजारो हजार मनुष्यों को प्रेरित करने में लगे हुए हैं;) वे अभागे  मनुष्य हैं।
किन्तु उनकी निंदा न करें,उनको अपशब्द न कहें, उनके लिए संवेदना के दो बूंद आंसू बहाना चाहिए,
उनके लिए प्रार्थना करें क्योंकि ये हतभाग्य हैं, ये नहीं जानते कि जगत का कल्याण कैसे होता है ? किस अनमोल वस्तु को पा कर के भी उससे अनजाने हैं। और जिन लोगों ने उनकी पुकार को सुना है, उस अद्भुत आह्वान को सुना और समझा है, वे अब और चुप  होकर मत बैठे रहो। कम से कम तुम लोग तो काम में लग जाओ। स्वामीजी का काम है- अपने पशुभाव को बिलकुल त्याग कर, अपने जीवन  को गढ़ने में लगजाना. तुम्हारा हृदय पूरी तरह से निर्भीक होना चाहिए,किन्तु उसमें सहानुभूति भी भरी होनी चाहिए। ' वज्र के समान कठोर और फूल जैसा कोमल ' हृदय 'होना चाहिए। यही है आदर्श।यदि तुमलोग ऐसे चरित्र, ऐसे मन के अधिकारी बन सको, तो तुमलोग ही जगत की समस्त समस्याओं का समाधान कर सकोगे, एक नए भारतवर्ष का निर्माण कर सकोगे।
इसीलिए स्वामीजी के जो भी उपदेश तुम सुनते हो, वह सब ठाकुर के ही उपदेश हैं। स्वामीजी ने ऐसा
 कोई शब्द नहीं कहा है, जो उन्हों ने स्वयम ठाकुर से न सिखा हो। 
स्वामीजी के बातों को सुन कर आत्मविकास के कार्य ( मनुष्य बनो 
और बनाओ ) में लगे रहते हुए ही, ठाकुर के उपदेशों को समझने की 
चेष्टा करनी होगी। 
46. प्रश्न : मुझे ऐसा लगता है, कि शरीर  से  कुछ दुर्बल होने से भी मैं अपनी मन की शक्ति से ही अपने लक्ष्य की दिशा में आगे बढ़
 सकता हूँ। यह क्या ठीक है? 
उत्तर : हाँ,यह बिलकुल सही है। यदि मन में साहस रखो, बल रखो,
उत्साह रखो, उद्द्य्म रखो, पर तुम्हारा शरीर यदि तुम्हारा शरीर दुर्बल
 भी रह गया हो, तो भी उससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा। क्योंकि मन का 
बल ही सबसे बड़ा बल है। मन ही देह में भी बल भर देता है। इसीलिए 
यदि तुम्हारे मन में सबलता हो, साहस हो, तो फिर शारीरिक दुर्बलता 
तुम्हारे मनुष्य बनने के पथ में बाधा नहीं होगी।

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