Saturday, May 26, 2012

वर्णाश्रम धर्म का औचित्य [27] परिप्रश्नेन

२७.प्रश्न : क्या वर्णाश्रम धर्म की कोई उपयोगिता अब भी बची हुई है ?
उत्तर : भूतकाल में ये व्यवस्थाएँ जिन अर्थों में प्रासंगिक मानी जातीं थीं निश्चित रूप से आज वैसी नहीं हैं। किन्तु जो आदर्श इन व्यवस्थाओं के माध्यम से कार्य कर रहे थे, उनकी आवश्यकता हमारे लिए आज भी है। यह ठीक है कि आज के विद्यार्थी (शिष्य) अपने गुरु के साथ रहने (गुरु-गृह वास) के लिए अरण्यों में नहीं जा सकते। किन्तु ब्रह्मचर्य आश्रम के आदर्शों का अनुसरण करने का प्रयास उन्हें अवश्य करना चाहिए।

ब्रह्मचर्य का अर्थ है- ' जीवन में संयम रखना ' अर्थात मन, वचन और कर्म से पवित्र रहना तथा अपनी शारीरिकऔर मानसिक उर्जा को उचित प्रयोग के लिए सुरक्षित रखना। उर्जा के उचित प्रयोग का अर्थ है इसे कल्याणकारीउद्देश्य के लिए व्यवहार करना। वैसा न करने से यह उर्जा यंत्रवत, अपने आप ही ग़लत दिशा में चली जायेगी।वर्तमान युग में भी ब्रह्मचर्य के आदर्श की यही प्रासंगिकता है। बुद्धिमानी इसी बात में है कि किसी भावादर्श के उपरी रंग-रूप (गौण बातों ) पर अपना ध्यान केन्द्रित करने के बजाय उसकी मूलभावना या सारभाग पर ही करना चाहिए।

विद्यार्थी जीवन कि परिसमाप्ति हो जाने के बाद यह बिल्कुल स्वाभाविक है कि बहुतेरे (अधिकांश ) छात्र गृहस्थ आश्रम या पारिवारिक जीवन में जाना पसन्द करेंगे। किन्तु नागरिकों का गृहस्थ जीवन भी (Righteousness and Discipline ) ' धार्मिकता 'और ' अनुशासन ' की नींव पर ही प्रतिष्ठित रहनी चाहिए, तभी वे अपने जीवन कोबहुत से लोगों के कल्याण में समर्पित रख पाएंगे। पर्याप्त समय तक 'गृहस्थ जीवन' व्यतीत कर लेने के बाद शायद, पारिवारिक जीवन के प्रति आसक्ति भी कम हो जायेगी। वानप्रस्थ आश्रम के पीछे का भाव या अभिप्राय यही है।

इसके और भी बहुत आगे के जीवन-मुकाम पर पहुँच कर शायद, कुछ लोगों को ऐसा महसूस होने लगे कि, मैंने कौटुम्बिक दायित्वों का भरपूर निर्वहन कर लिया है। तब पारिवारिक जीवन से एक प्रकार कि निर्लिप्तता का भावमन में उत्पन्न हो जाता है। सवार्थपर इच्छाएँ कम से कम हो जातीं हैं। जीवन के इस मुकाम पर पहुँचने के बाद, शायद कोई व्यक्ति अपने मुहल्ले के तरुणों को श्री रामकृष्ण और स्वामी विवेकानन्द के जीवन और शिक्षाओं केबारे में बताना शुरू करेंगे, तथा दूसरों के कल्याण ले लिए ऐसे ही अन्य परोपकारी कार्यों में स्वयं को व्यस्त रखनेकि चेष्टा करेंगे। इस प्रकार घर-गृहस्ती में रहते हुए भी,किसी व्यक्ति के ऐसे ही आचरण में संन्यास आश्रम कीझलक देखी जा सकती है।

वर्ण व्यवस्था कैसे प्रासंगिक है ?
वर्ण व्यवथा की वास्तविक अवधारणा (Actual concept) है: यदि मेरा बौद्धिक स्तर उतना विकसित नहीं है या मेरी बुद्धि उतनी सक्रिय नहीं है, यदि मैं अपनी रोजी-रोटी केवल शारीरिक श्रम करके ही कमा सकता हूँ, पर मेरी आकांक्षाएँ दिनों-दिन बढ़ती ही जातीं हों- तो मैं एक शूद्र का जीवन जी रहा हूँ। किन्तु क्या हमलोग अपना पूरा जीवन इसी प्रकार व्यतीत होने देंगे? निश्चित रूप से नहीं। मेरे भीतर भी तो शक्ति, ज्ञान और आनन्द का असीम सागर हिलोरें मार रहा है। प्रत्येक मनुष्य को मैं अपने ही जैसा देख सकता हूँ और सबों के कल्याण के कार्य कर सकता हूँ। तो फ़िर मैं केवल शारीरिक श्रम करने के बजाय उससे आगे बढ़ कर अन्य कोई कार्य क्यों नहीं कर सकता ?

कुछ स्थानों पर महामण्डल का ' जिलास्तरीय युवा प्रशिक्षण शिविर ' आयोजित करने के लिए वहां के स्थानीयलड़के दिहाड़ी पर कूली- मजदूरी का काम करके भी शिविर के लिए धन का प्रबन्ध करते हैं। इस कार्य का बाहरीस्वरूप भी शारीरिक श्रम करने के कारन शूद्र के जैसा प्रतीत होता है, किन्तु वे इसी कार्य को ब्राह्मण की बुद्धि सेसंपन्न करते हैं। आज हमारे देश को ऐसे ही कर्मियों की आवश्यकता है। प्रत्येक व्यक्ति, चाहे वह किसी भी तरह के कर्तव्य का निर्वहन क्यों न कर रहा हो उसे उस कर्तव्य को ब्राह्मण की बुद्धि और दृष्टिकोण रखते हुए ही संपन्न करने की चेष्टा करनी चाहए।

 इस प्रकार कार्य करने से उसमे एक नया आयाम जुट जाएगा, तथा इस दृष्टिकोण से किया गया कोई भी कार्य सबों के लिए कल्याणकारी होगा। मानव मात्र में अन्तर्निहित सत्यकी अनुभूति से ब्राह्मणों को जो शक्ति प्राप्त होती है उसे 'ब्रह्म-तेज' कहा जाता है।

क्षत्रियोचित पराक्रम और व्यावहारिक कार्यक्षमता को क्षात्र -वीर्य कहा जा सकता है। वेदों में कहा गया है कि यदिकिसी व्यक्ति में क्षात्र-वीर्य और ब्रह्म-तेज दोनों एक साथ समन्वित हो जाय तो वहाँ देवगण प्रसन्नता पूर्वकनिवास करते हैं और उसके ऊपर अपने आशीष कि वर्षा करते हैं। इसका तात्पर्य यह हुआ कि ऐसे लोगों का जीवन, परिवार और समाज परोपकारिता, प्रसन्नता और समृद्धि का निकेतन (निवास-स्थान) बन जाता है।
हमारा पेशा चाहे दिहाड़ी पर कूली-मजदूरी करने का हो या किसानी का हो अथवा अन्य कोई पेशा क्यों न हो, किन्तुहम भी इसी प्रकार के बौद्धिक स्तर को क्यूँ नहीं प्राप्त कर सकते जिसमे व्यावहारिक कार्यक्षमता के साथ साथ ज्ञान, प्रज्ञा और अनुभूति भी समन्वित हो? ऐसा कोई कारण नहीं जो मनुष्य मात्र को ऐसी बुद्धि अर्जित करने से रोकसके। यदि हमलोग इसी सांचे में स्वयं को ढाल सकें तो यह देश भी उन्नत हो जाएगा। और यदि इसी दृष्टिकोण से देखा जाय तो वर्ण और आश्रम का आदर्श आज भी प्रासंगिक है।

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वर्णाश्रम धर्म पर महात्मा गाँधी के विचार  

हरिजनबन्धु, ३०-४-१९३३ 

मैं ऐसा मानता हूं कि हर एक आदमी दुनिया में कुछ स्‍वाभाविक प्रवृत्तियां लेकर जन्‍म लेता है । इसी तरह हर एक आदमी की कुछ निश्चित सीमायें होती हैं, जिन्‍हें जीतना उसके लिए शक्‍य नहीं होता । इन सीमाओं के ही अध्‍ययन और अवलोकन से वर्ण का नियम निष्‍पन्‍न हुआ है । वह अमुक प्रवृत्तियां वाले अमुक लोगों के लिए अलग-अलग कार्यक्षेत्रों की स्‍थापना करता है । ऐसा करके उसने समाज में से अनुचित प्रतिस्‍पर्धा को टाला है । वर्ण का नियम आदमियों की अपनी स्‍वाभाविक सीमायें तो मानता है, लेकिन वह उनमें ऊंचे और नीचे का भेद नहीं मानता ।

 एक ओर तो वह ऐसी व्‍यवस्‍था करता है कि हर एक को उसके परिश्रम का फल अवश्‍य मिल जाये, और दूसरी ओर वह उसे अपने पड़ोसियों पर भार रूप बनने से रोकता है । यह ऊंचा नियम आज नीचे गिर गया है और निंदा का पात्र बन गया है । लेकिन मेरा विश्‍वास है कि आदर्श समाज-व्‍यवस्‍था का विकास तभी किया जा सकेगा, जब इस नियम के रहस्‍यों को पूरी तरह समझा जायेगा और उन्‍हें कार्यान्वित किया जायेगा ।

वर्णाश्रम धर्म बताता है कि दुनिया में मनुष्‍य का सच्‍चा लक्ष्‍य क्‍या है । उसका जन्‍म इसलिए नहीं हुआ है कि रोज-रोज ज्‍यादा पैसा इकट्ठा करने के रास्‍ते खोजे और जीविका के नये-नये साधनों की खोज करें । उसका जन्‍म तो इसलिए हुआ है कि वह अपनी शक्ति का प्रत्‍येक अणु अपने निर्माता को जानने में लगाये । इसलिए वर्णाश्रम-धर्म कहता है । कि अपने शरीर के निर्वाह के लिए मनुष्‍य अपने पूर्वजों का ही धन्‍धा करे । बस, वर्णाश्रम धर्म का आशय इतना ही है ।
वर्ण-व्‍यवस्‍था में समाज की चौमुखी रचना ही मुझे तो असली, कुदरती और जरूरी चीज दीखती है । बेशुमार जातियों और उपजातियों से कभी-कभी कुछ आसानी हुई होगी, लेकिन इसमें शक नहीं कि ज्‍यादातर तो जातियों से अड़चन ही पैदा होती है । ऐसी उपजातियों जितनी एक हो जायें उतना ही उसमें समाज का भला है ।
 आज तो ब्राम्‍ह्णों, क्षत्रियों, वैश्‍यों और शूद्रों के केवल नाम ही रह गये हैं ।
 वर्ण का मैं जो अर्थ करता हूं उसकी दृष्टि से देखें, तो वर्णो का पूरा संकर हो गया है और ऐसी हालत में मैं तो यह चाहता हूं कि सब हिन्‍दु अपने को स्‍वेच्‍छापूर्वक शूद्र कहने लगें । ब्राम्‍ह्ण-धर्म की सच्‍चाई को उजागर करने और सच्‍चे वर्ण-धर्म को पुन: जीवित करने का यही एक रास्‍ता है ।
जातपांत
जातपांत के बारे में मैनें बहुत बार कहा है कि आज के अर्थ में मैं जात-पांत को नहीं मानता । यह समाज का ‘फालतू अंग’ है और तरक्‍की के रास्‍ते में रूकावट जैसा है । इसी तरह आदमी आदमी के बीच ऊंच-नीच का भेद भी मैं नहीं मानता । हम सब पूरी तरह बरार हैं । लेकिन बराबरी आत्‍मा की है, शरीर की नहीं । इसलिए यह मानसिक अवस्‍था की बात है । बराबरों की विचार करने की और इसे जोर देकर जाहिर करने की जरूरत पड़ती है, क्‍योंकि दुनिया में ऊंच-नीच के भारी भेद दिखाई देते हैं । इस बाहर से दीखने वाले ऊंच-नीचपन में से हमें बराबरी पैदा करनी है । कोई भी मनुष्‍य यदि अपने को दूसरे से ऊंचा मानता है, तो वह ईश्‍वर और मनुष्‍य दोनों के सामने पाप करता है । इस तरह जातपांत जिस हद तक दरजे का फर्क जाहिर करती है उस हद तक वह बुरी चीज है ।
लेकिन वर्ण को मैं अवश्‍य मानता हूं । वर्ण की रचना पीढ़ी-दर-पीढ़ी के धंधों की बुनियाद पर हुई है । मनुष्‍य के चार धंधे सार्वत्रिक हैं-विद्यादान करना, दिन-दुःखियों की रक्षा करना, खेती तथा व्‍यापार और शरीर की मेहनत से सेवा इन्‍हीं को चलाने के लिए चार वर्ण बनाये गये हैं। 
ये धंधे सारी मानव-जाति के लिए समान हैं, पर हिन्‍दु धर्म ने उन्‍हें जीवन-धर्म करार देकर उनका उपयोग समाज के संबंधों और आचार-व्‍यवहार का नियमन में लाने के लिए किया है । गरूत्‍वाकर्षण के कानून को हम जानें या न जानें, उसका असर तो हम सभी पर होता है । लेकिन वैज्ञानिकों ने उसके भीतर से ऐसी बातें निकाली हैं, जो दुनिया को चौंकाने वाली हैं ।
 इसी तरह हिन्‍दु धर्म ने वर्ण-धर्म की तलाश करके और उसका प्रयोग करके दुनिया को चौंकाया है । जब (विदेशी आक्रमण और विदेशियों के दमन चक्र में पिसने के कारण ) हिन्‍दु अज्ञान के शिकार हो गये, तब वर्ण के अनुचित उपयोग के कारण अनगिनत जातियां बनीं और रोटी-बेटी व्‍यवहार के अनावश्‍यक और हानिकारक बन्‍धन पैदा हो गये । वर्ण-धर्म का इन पाबन्दियों के साथ कोई नाता नहीं है । अलग-अलग वर्ण के लोग आपस में रोटी-बेटी व्‍यवहार रख सकते हैं । किन्तु चरित्र और तन्‍दुरूस्‍ती के खातिर ये बंधन जरूरी हो सकते है । लेकिन जो ब्राम्‍ह्ण शूद्र की लड़की से या शूद्र ब्राम्‍ह्ण की लड़की से ब्‍याह करता हैं वह वर्ण-धर्म को
नहीं मिटाता ।
अस्‍पृश्‍यता की बुराई से खीझकर जाति-व्‍यवस्‍था का ही नाश करना उतना ही गलत होगा, जितना कि शरीर में कोई कुरूप वृद्धि हो जाय तो शरीर का या फसल में ज्‍यादा घास-पात उगा हुआ दिखे तो फसल का ही नाश कर डालना है।
 इसलिए तो अस्‍पृश्‍यता का नाश तो जरूर करना है । सम्‍पूर्ण जाति-व्‍यवस्‍था को बचाना हो तो समाज में बढ़ी हुई इस हानिकारक बुराई को दूर करना ही होगा । अस्‍पृश्‍यता जाति-व्‍यवस्‍था की उपज नहीं है, बल्कि उस ऊंच-नीच-भेद की भावना का परिणाम है, जो हिन्‍दु धर्म में घुस गयी है और उसे भीतर-ही-भीतर कुतर रही है । इसलिए अस्‍पृश्‍यता के खिलाफ हमारा आक्रमण इस ऊंच-नीच की भावना के खिलाफ ही है । ज्‍यों ही अस्‍पृश्‍यता नष्‍ट होगी जाति-व्‍यवस्‍था स्‍वयं शुद्ध हो जायेगी ।
 यानी मेरे सपने के अनुसार वह चार वर्णो वाली सच्‍ची वर्ण-व्‍यवस्‍था का रूप ले लेगी । ये चारों वर्ण एक-दूसरे के पूरक और सहायक होंगे, उनमें से कोई किसी से छोटा-बड़ा नहीं होगा; प्रत्‍येक वर्ण हिन्‍दु धर्म के शरीर के पोषण के लिए समान रूप से आवश्‍यक होगा।
आर्थिक दृष्टि से जातिप्रथा का किसी समय बहुत मूल्‍य था । उसके फलस्‍वरूप नयी पीढि़यों को उनके परिवारों में चले आये परम्‍परागत कला-कौशल की शिक्षा सहज ही मिल जाती थी और स्‍पर्धा का क्षेत्र सीमित बनता था गरीबी और कंगाली से होने वाली तकलीफ को दूर करने का वह एक उत्‍तम इलाज थी । और पश्चिम में प्रचलित व्‍यापारियों के संधों की संस्‍था के सारे लाभ उसमें भी मिलते थे । यद्यपि यह कहा जा सकता है कि वह साहस और आविष्‍कार की वृत्ति को बढ़ावा नहीं देती थीं, लेकिन हम जानते है कि वह उनके आड़े भी नहीं आती थी ।
इतिहास की दृष्टि से जातिप्रथा को भारतीय समाज की प्रयोग-शाला में किया गया मनुष्‍य का ऐसा प्रयोग कहा जा सकता है, जिसका उद्देश्‍य समाज के विविध वर्गो का पारस्‍परिक अनुकूलन और संयोजन करना था । यदि हम उसे सफल बना सकें तो दुनिया में आजकल लोभ के कारण जो क्रुर प्रतिस्‍पर्धा और सामाजिक विघटन होता दिखाई देता है, उसके उत्‍तम इलाज के रूप में उसे दुनिया को भेंट में दिया जा सकता है ।
अंतर्जातीय विवाह और खान-पान
वर्णाश्रम में अन्‍तर-जा‍‍तिय विवाह या खान-पान का निषेध नहीं है, लेकिन इसमें कोई जो-जबरदस्‍ती भी नहीं हो सकती । व्‍यक्‍ित को इस बात का निश्‍चय करने की पूरी छूट मिलनी चाहिये कि वह कहां शादी करेगा और कहां खायेगा ।
 

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