Friday, May 25, 2012

' अन्तः प्रकृति ' एवं ' वाह्य-प्रकृति ' [17] परिप्रश्नेन

१७.प्रश्न : ' अन्तः प्रकृति ' एवं ' वाह्य-प्रकृति '  क्या है ? इस प्रकृति के साथ किस प्रकार प्रति क्षण संग्राम करना पड़ेगा ?
उत्तर : जो कुछ भी हमलोग बाहर में देख पा रहे हैं- यह पृथ्वी, पेड़-पौधे बनस्पति, नदी,समुद्र, जिव-जन्तु इत्यादि सभी वस्तुएं बहार की प्रकृति या  ' वाह्य-प्रकृति 'हैं. 
हमलोगों का स्वभाव, भीतर का स्वभाव, हमलोगों का मन एवं चित्त में संचित संस्कारों की समष्टि को 
अन्तः प्रकृति कहते हैं। स्वामीजी ने बहुत सुंदर ढंग से धर्म को परिभाषित करते हुए कहा है - धर्म का अर्थ है इस बहार की प्रकृति एवं भीतर की प्रकृति को पूरी तरह से अपने वश में (काबू ) में ले आना. जिस किसी व्यक्ति ने वाह्य-प्रकृति एवं ' भीतर की प्रकृति ' (मन ) को सही रूप से अपने वश में कर लिया है, उसीने सच्चा धर्म पाया है, तथा वही जीवन मुक्त है।

इस धर्म को - नेति नेति विचार द्वारा, कर्म द्वारा, भक्ति के द्वारा-अर्थात आत्मसमर्पण के द्वारा, मन के संयम के द्वारा प्राप्त किया जाता है. इसमें से कोई भी एक, दो या उससे भी अधिक उपायों के द्वारा बाहर की प्रकृति एवं भीतर की प्रकृति को अपने वश में लाने के लिये संग्राम करने की आवश्यकता होती है, और यह संग्राम निरन्तर चलते रहना पड़ता है. एक मुहूर्त के लिये भी इससे विपरीत परामर्श मन को नहीं देना होगा, क्योंकि इस संग्राम के बंद होते ही, प्रकृति से पराजित हो जाने की संभावना बनी रहती है.
 
इसीलिए मनुष्य जीवन का उद्देश्य है, निरन्तर इसी संग्राम में लगे रहकर प्रकृति को (जड़ को) अपने वश में ले आना, उसे अपना आज्ञाकारी बना लेना, प्रकृति के वशीभूत न होना, प्रकृति (मन) की गुलामी को अस्वीकार कर देना. इसलिए स्वामीजी कहते हैं, ' मनुष्य को तभी तक मनुष्य कहा जा सकता है, जब तक वह प्रकृति से उपर उठने के लिये संग्राम करता रहता है. ' (२/१९७) जिस किसी भी दुर्बलता के क्षणों में वह इस युद्ध को बन्द कर देता है, उसी क्षण वह मनुष्य कहलाने योग्य नहीं रह जाता. प्रकृति के वशीभूत होते ही, (चेतन आत्मा होकर भी जड़ मन की गुलामी करते ही )मनुष्य अपनी महिमा खो देता है, तथा पशुओं के जैसा आहार-निद्रा-भोग-सुख का दास (राम-सुख दास बनने के बदले ' सब-सुख दास ' रूपी एक रबोट) बन जाता है.

वैसे तो मनुष्य का लगभग सबकुछ प्रकृति के ही अंतर्गत होता है.मनुष्य के तीन उपादान (मौलिक अवयव या components) हैं- शरीर, मन और आत्मा. शरीर एवं मन ये दोनों प्रकृति के उपादानों से निर्मित हैं. जिनमें केवल उसकी ' आत्मा ',  जो उसकी निर्विवाद सत्ता है, वही प्रकृति की अधीनता को अस्वीकार करके, यथार्थ मनुष्य के जीवन-गठन रूपी संग्राम के भीतर से गुजरकर वाह्यजगत एवं अपने मन की प्रकृति को जीत कर अपनी (खोई हुई ) स्वाधीन सत्ता को प्राप्त कर सकती है. 
 इसीलिए मनुष्य प्रकृति का दास होकर ही जीवनधारण करने के लिये जन्म ग्रहण नहीं करता, प्रकृति को पराजित करके स्व-महिमा को अभिव्यक्त कर देना ही उसके जीवन का उद्देश्य है.इसीलिए निरन्तर संग्राम करते रहना ही जीवन है.
यह संग्राम किस प्रकार करना होगा, इसे जानने के लिये इन चार उपायों के सम्बन्ध में भलीभांति ज्ञान प्राप्त करना होगा, एवं उन उपायों को जीवन में प्रयोग करने रूपी संग्राम में सर्वदा लगे रहना होगा.नेति नेति विचार करना या विवेक- मनुष्य को नित्य-अनित्य,शाश्वत-क्षणभंगुर, शुभ-अशुभ में अन्तर को समझने में सहायक होता है. जो अनित्य, क्षण-स्थायी, अशुभ या हानिकर है, वह कभी भी मनुष्य की नित्य,शाश्वत, पवित्र सत्ता की परिपोषक नहीं हो सकती. इसीलिए इनका वहिष्कार (व्यतिरेक) करके जो शाश्वत, अविकारी, अविनाशी सत्ता हैं, उनकी ओर अग्रसर होते रहने के लिये सदा जाग्रत विवेक के शरण में बने रहना इस मार्ग के अनुयायी के लिये प्रति मुहूर्त संग्राम करते रहने का उपाय है. इस मार्ग को ज्ञानयोग कहते हैं।

साधारण मानव विराट शक्ति की लीला रूपी इस जगत में आकर अपने को शक्तिहीन, असहाय और अकेला समझता है.इसीलिए वह स्वाभाविक रूप से किसी शक्ति के स्रोत की खोज में लग जाता है, किसी विश्वास करने योग्य सहायक स्थान, या आश्रय-स्थल, सहारा की खोज करता रहता है.किन्तु जब उसे इस जगत में वैसा कुछ भी नहीं मिलता, तब वह उनकी शरण में जाता है जो मंगलमय हैं, जो जगत के समस्त शक्तियों के अधीश्वर हैं, जो समस्त सृष्टि स्थिति पालन के विधाता हैं, और उनके चरणों में  अपने को समर्पित करके निश्चिन्त  होना चाहता है।

 उनका सहारा लेकर अपने दैन्य का अतिक्रमण करना चाहता है, बाहरी और भीतरी दोनों प्रकृति के उत्पीड़न से परित्राण पाना चाहता है. उन प्रेममय, परम करुणा-निधान, भगवान (श्रीरामकृष्ण) का थोड़ा सा कणमात्र भी कृपा प्राप्त होने से भी मनुष्य के मन में भगवान के प्रति प्रेम जाग उठता है, उसका हृदय भक्ति से आप्लूत हो उठता है. मनुष्य भक्ति-धन से धनी होकर अपनी समस्त दुर्बलता, हीनता की ग्लानी से मुक्त हो जाता है एवं  अपनी सत्ता के गौरव की उपलब्धी करता है. एवं सर्वत्र उन्हीं का दर्शन करता हुआ, विश्वमय भगवान के सानिध्य और सेवा में जीवन की सार्थकता प्राप्त करने में लग जाता है.

 इस मार्ग को भक्तियोग कहते हैं.इस पथ पर चलते हुए प्रति मुहूर्त संग्राम करते रहना भी बहुत कठिन है. समस्त सृष्टि को मैत्री भाव से, अभिन्न-दृष्टि से देखना बहुत कठिन संग्रामसाध्य होता है. किन्तु यदि वैसा नहीं कर सके तो हम यह कैसे कह सकते हैं कि मैं भक्ति के राजमार्ग पर आरूढ़ हो गया हूँ, या मैं सभी के प्रति भक्तिभाव से युक्त हो गया हूँ ?

अन्य एक मार्ग को राजयोग कहा जाता है.इसमें मन को नियंत्रण में लाकर, उसे संयत करके, एकाग्र करके, उसको शांत और स्थिर करके, निष्कम्प दीपक की लौ जैसे स्थिर मन में सत्य को प्राप्त करने की चेष्टा करना राजयोग का मार्ग है.  शांत और स्थिर चित्त में ही सत्य प्रतिबिम्बित होता है. हमलोगों का मन स्वभावतः अत्यंत चंचल है, विक्षिप्त (बिखरा हुआ) है. इसीलिए मन की तुलना किसी सरोवर से की जाती है. किसी बड़े सरोवर में हल्की सी हवा प्रवाहित होने पर भी वह तरंगायित हो उठता है, उसमें लहरें उठने लगती हैं, जिसके परिणामस्वरूप उसके उपर प्रतिबिम्ब पड़ने से, वह प्रतिबिम्ब जिसका पड़ रहा होता है, उसे ठीक से समझ नहीं पाते. किन्तु जल यदि बिल्कुल स्थिर हो तो प्रतिबिम्ब स्पष्ट दिखाई देता है.  उसी प्रकार मन के अशांत,
उत्तेजित या चंचल बने रहने से सत्य का जो प्रतिबिम्ब उस पर पड़ता है, वह विकृत हो जाता है, सत्य के सही रूप को हमलोग नहीं देख पाते हैं. इसीलिए मन को शान्त, समाहित, स्थिर बनाकर उसको तरंगायित होने से रोककर, स्तब्ध बनाकर सत्य को देखने का जो ' राज मार्ग ' है-उसे राजयोग कहते हैं.

और एक उपाय है-कर्मयोग या कर्म का मार्ग.आमतौर से हमलोग जोकुछ भी कर्म करते हैं, उसे स्वार्थ-बोध से प्रेरित होकर करते हैं. वैसे कर्मों से सत्य की प्राप्ति नहीं होती, मन को पवित्र एवं सुन्दर नहीं बनाया जा सकता है. केवल पवित्र मन ही सत्य का साक्षात्कार कर सकता है. इसीलिए अन्य तीन योगमार्गों के समान ही सत्य का साक्षात्कार करने के लिये हमलोगों को ' परार्थ-कर्म ' या दूसरों के मंगल के लिये, दूसरों के स्वार्थ को पूरा करने के कार्य में स्वयं को व्यस्त रखना होगा. इसी प्रकार कार्य करते रहने से मन शुद्ध हो जाता है, पवित्र हो जाता है, एवं शुद्ध या पवित्र मन से ही सत्य को जाना जा सकता है.

इस प्रकार हमलोगों की अन्तःप्रकृति है, हमारा मन. हमलोगों की कामना-वासना, हम अपने पाँच इन्द्रियों के माध्यम से जो कुछ भी अनुभव करते हैं, इन्द्रियाँ हमारे मन को कैसे प्रभावित करके बहिर्मुखी किये रखना चाहितीं हैं, यह सब अन्ततोगत्वा में मन के माध्यम से ही दिखाई देता है. अच्छा गंध, अच्छा दृश्य,  अच्छा स्वाद इन सबका अनुभव मन में ही होता है. और यही मन हमारी अंतःप्रकृति की मूल वस्तु है. यह प्रकृति यदि हमारे वश में आ जाय, तो फिर वाह्य-जगत के भोगों द्वारा मेरा मन आकृष्ट नहीं हो पायेगा. वे पाचों विषय-रूप,रस,शब्द,गंध,स्पर्श आदि हमारे मनको खीँच कर बहिर्मुखी नहीं कर पाएंगे. ऐसा कब संभव हो सकेगा ?

ऐसा तभी संभव है जब हमें अपने मन को थोड़ा संयम में रखना आ जायेगा, जब हम मन को यह आदेश दे सकेंगे कि कुछ भी ग्रहण करने के पहले विवेक-विचार करके देखो कि वह हमारे लिये मंगलकारी या हितकारी है या नहीं ? इसी प्रकार अंतःप्रकृति को वश में लाया जा सकता है. वाह्य प्रकृति को हमलोग विज्ञान के द्वारा जीतने कि चेष्टा करते हैं. वाह्य प्रकृति को विज्ञान की सहायता से हमलोगों ने काफी हद तक अपने वश में कर भी लिया है. 

प्रकृति के कितने ही पदार्थों -वन संसाधन, खनिज-सम्पदा, जल, वायु, मिट्टी इत्यादि को अपने इच्च्छानुसार उपयोग में ला सकते हैं.ठीक उसी प्रकार अंतःप्रकृति को वशीभूत करने का भी एक विज्ञान है. एक को वाह्य जगत का विज्ञान और दूसरे को आन्तरिक जगत का विज्ञान कहते हैं. इन दोनों विज्ञान का सही ढंग से उपयोग करने से हमलोग यथार्थ धर्म की प्राप्ति कर सकते हैं.स्वामीजी ने कहा है- हम अपने जीवन को तभी सार्थक बना सकेंगें.वैसा नहीं कर पाने से हमलोगों में जो संभावनाएं थीं, मानवजीवन को हम जितना अधिक सदुपयोग कर सकते थे, उतना हम नहीं कर पाएंगे, और  हम लोंगों को जीवन भर प्रकृति का गुलाम बने रहना होगा।
  वाह्य प्रकृति हमलोगों के जीवन को नष्ट कर सकती है- जैसे अचानक तूफान आ जाये, आग लग जाय, तो सब कुछ तबाह हो जाता है। ठीक उसी प्रकार अन्तः प्रकृति भी वाह्य प्रकृति के समान आंधी-तूफान में बहा कर जीवन को नष्ट कर सकती है. किन्तु हमलोग उसके तरफ उतना सतर्क नहीं रहते, उतने जागरूक नहीं हैं, इस विषय में हमलोग उतनी सावधानी नहीं बरतते, हमलोगों में यह जानने का कोई उत्साह नहीं है, आग्रह और उद्द्य्म भी नहीं कि ,अन्तःप्रकृति को आंधी-तूफान के हाथों से कैसे बचाया जाये एवं अपनी सत्ता को पूर्ण रूप से विकसित करके अपने जीवन को सार्थक बना लिया जाय.
 मनुष्य जीवन के सबसे बड़ी दुःख की बात यही है.स्वामीजी ने हमलोगों को सतर्क कर दिया है कि वाह्य प्रकृति को वशीभूत करने के विज्ञान में तुमने बहुत उन्नति कर ली है, तुमने उसको बिल्कुल अपना दास बना लिया है, उसको वश में करके सुख-वैभव, भोग-ऐश्वर्य चल रहा है. किन्तु तुम्हारी भीतरी प्रकृति में कितनी गरीबी है!
 तुमलोग तो उसके (मन के ) बिल्कुल ही गुलाम बन चुके हो. तुम वास्तव में कितने महान हो, कितने शक्तिवान हो, अपनी उस महाशक्ति का तुम्हें कुछ पता ही नहीं है. तुम्हारे भीतर जो अनंत शक्ति है, उसको अभिव्यक्त करने की अनंत संभावनाओं की तुम उपेक्षा कर रहे हो. तथा उस विषय में सावधान नहीं रहने के कारण, उसको(अन्तः प्रकृति को )  अपने वश में लाने की चेष्टा नहीं करने के कारण, केवल वह सम्पदा ही नष्ट नहीं हो रही है, तुमको भी नष्ट कर रही है.

तुम्हारी सत्ता का विकास नहीं हो रहा है, वह अपने को अभिव्यक्त नहीं कर पा रही है. तुम अपने इस महान महिमामय जीवन को प्राप्त करके भी उसे सार्थक रूप में गठित नहीं कर पा रहे हो. तुम्हारे उस सुन्दर जीवन से कितने ही लोगों का कल्याण हो सकता था, वैसा हो नहीं पा रहा है. तुम भी वंचित हो रहे हो, दूसरे मनुष्य भी वंचित हो रहे हैं. तुम्हारे पास जितनी अकूत प्राकृतिक सम्पदा थी, जिसको तुम अपने उपयोग में ला सकते थे, वह सब व्यर्थ में पड़ा रह गया, नष्ट होता जा रहा है।
इस प्रकृति के साथ युद्ध करने के लिये प्रति मुहूर्त सतर्क रहना होगा, संग्राम करते रहना होगा. सर्वदा जाग्रत रहते हुए, सचेतन होकर परिपूर्ण विकास के लिये मन के साथ निरंतर संग्राम करना होगा.

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