Sunday, June 24, 2012

सत्यकाम जाबाल / [22] कहानियों में वेदान्त

मार्गदर्शक नेताओं (शिक्षकों ) का निर्माण कैसे करें ?
[ छान्दोग्य उपनिषद (सामवेद) ] 
" जो बोले सो अभय, सियापति रामचन्द्र की जय ! "
गीता में ऐसा वर्णन मिलता है कि अर्जुन ने श्रीकृष्ण को कहा था-" मित्र, तुम मुझे मन को नियंत्रण में रखने का परामर्श दे रहे हो; किन्तु मन को वश में करना तो बहुत कठिन है। जिस प्रकार हवा को वश में करना असम्भव है, मन को वश में लाना भी लगभग उतना ही कठिन प्रतीत होता है। "
उसके उत्तर में श्रीकृष्ण ने कहा था, " यह बात ठीक है। किन्तु अभ्यास के द्वारा मनुष्य धीरे धीरे सबकुछ कर सकता है। वैराग्य  ( अर्थात लालच को कम करते जाने ) और अभ्यास की सहायता से मन को वश में लाया जा सकता है।"
जीवन-गठन करने का भी एकमात्र पथ यही है। कुछ सोचने, बोलने या करने के पहले, जरा रुक कर क्या अच्छा है, क्या बुरा है, इस बात पर विचार करके अच्छी तरह से समझ लेना पड़ता है। उसके बाद जो सत्य लगता हो, उसको अभ्यास के द्वारा अपने जीवन में प्रतिबिम्बित करने का प्रयास करना पड़ता है। इस प्रकार मनुष्य धीरे धीरे आगे बढ़ता जाता है।
प्राचीन काल में भारतवर्ष में बचपन से ही इसप्रकार से जीवन-गठन करने वाली शिक्षा-व्यवस्था प्रचलित थी। घर-परिवार में रहने के लिए अर्थोपार्जन करना जरुरी है; इसके लिये वाणिज्यिक विद्या सीखने की विशेष आवश्यकता होती है। फिर समाजोपयोगी, ईमानदार, यथार्थ मनुष्य बनने बनने के लिए - स्वार्थपरता, दूसरों की धन-सम्पदा को देखकर जलना, आलस्य, दुर्बलता आदि दोषों को दूर हटाकर, मन में लोकमंगल की इच्छा, संयम, त्याग इत्यादि सद्गुणों को धारण करना पड़ता है।तथा एक साहसी, परिश्रमी, एकाग्रचित्त, कर्मठ व्यक्ति बनना पड़ता है। त्याग और संयम के अभ्यास से चरित्र में ये समस्त गुण आसानी से चले आते हैं। ब्रह्मचर्य-पालन करने से ( अर्थात यथासंभव मन-वचन-कर्म से पवित्र रहने का अभ्यास करते रहने से ) मनुष्य के भीतर असीम शक्ति जाग उठती है, वह सूक्ष्म से सूक्ष्मतर विषयों को समझने की योग्यता अर्जित कर लेता है। उस शक्ति के जाग जाने पर मनुष्य सबकुछ कर सकता है।छात्रों को ' ब्रहचर्य-पालन (मन-वचन-कर्म से पवित्र रहने) के लिये उत्प्रेरित करने वाली शिक्षा ' प्रदान करने वाले (मार्गदर्शक नेताओं )शिक्षकों का निर्माण कैसे होता है ? 
यदि शिक्षक का अपना व्यक्तिगत जीवन उपयुक्त आदर्श के साँचे में नहीं ढला हो, तो छात्रों को केवल प्रवचन सुना कर, उन्हें अपना चरित्र-गठन करने के लिए अनुप्रेरित नहीं कर सकता। इसीलिये प्राचीन भारत में शिक्षा प्रदान करने का दायित्व - केवल त्यागी, वेदान्त ज्ञान के अधिकारी ऋषियों के उपर ही सौंपा जाता था।
इन गुरुगृह रूपी ब्रह्मचर्य-आश्रमों में सादगी भरा जीवन, सत्य, संयम, ध्यान के अभ्यास द्वारा उत्पन्न प्रशान्ति के माध्यम से प्राणप्रद, शक्ति-प्रद, आनन्द-प्रद जो कुछ भी प्राप्त हो सकता है, वह सबकुछ
 छात्र-जीवन में ही दिए जाने का पूरा प्रबन्ध रहता था। जहाँ परा और अपरा दोनों प्रकार की विद्याओं में अनुभवी देवोपम गृहस्थ ऋषियों ( परमपूज्य नवनीदा, रनेनदा, वीरेनदा आदि ) के सानिध्य में वास करके, युवा गुरु-गृह में रह कर शिक्षा प्राप्त करते थे, और शिक्षा-समाप्ति के उपरान्त ' वाणिज्यिक संसारी विद्या ' और 
' अध्यात्म-विद्या ' ; इन दोनों विद्याओं में प्रवीण बनकर, अपने अपने घरों को लौट जाते थे।
 अपने ऋषि तुल्य गृहस्थ आचार्यों के आदर्श जीवन से अनुप्रेरित एवं उनके उपदेशों को सुनकर वे अपना और समाज दोनों का यथार्थ कल्याण करने वाले यंत्र-स्वरुप बन जाते थे। इस प्रकार के एक शान्त ( एक ही आदर्श और उद्देश्य को प्राप्त करने के लिये 1600 लड़के और 200 आचार्य से बने निर्जन परिवेश का निर्माण करके) परिवेश में,एवं इस प्रकार के जीवन का सानिध्य प्राप्त करने के फलस्वरूप-' मनुष्य बनने और बनाने ' की शिक्षा प्राप्त करके वे युवा भी अपने अन्तर्निहित आध्यात्मिक आनन्द को आविष्कृत कर लेते थे, और अभ्यास की सहायता से उस आनन्द का थोड़ा स्वाद भी प्राप्त कर लेते थे।
इस ' मनुष्य ' बन जाने वाली शिक्षा को प्राप्त कर लेने के कारण, अपने परवर्ती जीवन में सभी प्रकार के प्रलोभन एवं विपरीत परिवेश के भीतर रहने पर भी अपने आदर्श को पकड़े रहकर, वे प्रसन्न चित्त से अपनी जीवन यात्रा को सफलता पूर्वक सम्पन्न कर लेते थे।
इसीलिये प्राचीन भारत में ऋषियों के तपोवन ही ब्रह्मविद्या-प्राप्ति एवं समाज के सभी क्षेत्रों में जागरूकता फ़ैलाने के प्रधान केन्द्र माने जाते थे। ऋषियों के इन आश्रमों को जनता के आवास क्षेत्र से दूर-अरण्य भूमि में ज्ञान-केन्द्र के रूप में स्थापित किया जाता था; इसीलिये वेदों के ज्ञान-काण्ड को उपनिषद के जैसा कहीं कहीं आरण्यक भी कहा जाता है। गुरुगृह से ' ज्ञान-प्राप्त ' कर लेने के बाद, दो-एक छात्र सन्यासी हो जाते थे, किन्तु अधिकांश छात्र समाज में वापस लौट जाते थे; और अपने परिवार तथा समाज में ऊँचे विचारों का प्रचार-प्रसार करते थे। 
( वर्तमान समय में भी ऋषि तूल्य गृहस्थ आचार्यों  के द्वारा अखिल भारत विवेकानन्द युवा महामण्डल के वार्षिक युवा प्रशिक्षण शिविर में ' Leadership Training ' के माध्यम से इस तरह के ऋषि तूल्य गृहस्थ मार्गदर्शक नेताओं ( उप-शिक्षकों) का निर्माण किया जा रहा है।)
इसी प्रकार का एक आश्रम गौतम ऋषि का भी था। उनके पास विद्या-अध्यन करने (या ज्ञान-प्राप्त करने) के लिये दूर-दूर से विद्यार्थी गण आया करते थे।बालक सत्यकाम ने भी ब्रह्मचर्य-आश्रम की महिमा सुन रखी थी। अब उसकी उम्र गुरुगृह में जाकर विद्यार्जन करने की हो चुकी थी। उसके घर में उसकी माँ के सिवा और कोई न था। एकदिन उसने अपनी माँ से अपने मन की बात बताई, कि वह गौतम ऋषि के आश्रम में रहना चाहता है।
लड़का पढना-लिखना सीखने जाना चाहता है, यह तो बड़े आनन्द की बात है। माँ ने तहे दिल से उसको ऋषि के आश्रम में रहने की अनुमति प्रदान की। किन्तु आश्रम में जाने पर गुरु उससे पूछेंगे, कि तुम्हारा गोत्र क्या है? यह तो उसे ज्ञात नहीं था, इसीलिये उसने माँ से पूछा, " माँ, मेरा जन्म किस गोत्र में हुआ है ? " 
माँ परेशानी में पड़ गयीं, पिता का गोत्र ही पुत्र का गोत्र होता है; किन्तु सत्यकाम के पिता कौन थे, यह उन्हें पता नहीं था। उनका विवाह नहीं हुआ था। उनका बेटा अवैध-पुत्र माना जायगा, समाज उसको स्वीकार नहीं करेगा, और उसको वेद पढ़ने का अधिकार भी नहीं देगा।
अब वे अपने पुत्र से कहें तो क्या ? कितनी शर्म की बात थी ! यह बात जान लेने के बाद उसका पुत्र क्या सोचेगा; या यह बात जान लेने के बाद समाज के लोग क्या क्या नहीं कहेंगे! कुछ देर तक तो वे मूक रह गयीं। उन्होंने
सोचा, क्या झूठ बोल कर इस लज्जा को ढँक देना ठीक होगा ? नहीं, वे ऐसा नहीं कर सकती। लड़के को जो सोचना हो सोचे, ऋषि जो चाहें कहें, लोग के मन में में जो आये कहें, किन्तु मैं तो सच्ची बात ही कहूँगी। हो सकता है कि इस सच्चाई को जान लेने के बाद, ऋषि उनके लड़के को आश्रम में लेना ही नहीं चाहें; तब तो लड़का पढ़-लिख कर मनुष्य भी नहीं बन पायेगा। चाहे जो होना है, हो ! मैं सबकुछ सहन कर लूँगी, किन्तु अपने मुख से एक भी झूठी बात नहीं निकलने दूंगी।
उन्होंने सत्यकाम से कहा, " बेटे, तुम्हारा गोत्र क्या है, यह मैं नहीं जानती। मैं दासी थी, अनेकों स्थानों में दासी की नौकरी मैंने की है, तुमने एक अविवाहिता माँ की कोख से जन्म लिया है। मेरा नाम जबाला है। इसलिये तुम मेरे नाम से ही अपना परिचय देते हुए कहना, तुम सत्यकाम जबाल हो !"
सत्यकाम गौतम ऋषि के आश्रम में पहुंचा। ऋषि को प्रणाम निवेदित करने के बाद, उसने बताया कि वह वहाँ विद्या का अभिलाषी होकर उपस्थित हुआ है। गौतम ऋषि ने उसका परिचय जानना चाहा, उसके गोत्र का नाम पूछा। तब उसकी माँ ने जो जो कहा था, वह पूरी बात गौतम को बताने के बाद सत्यकाम ने कहा, " गोत्र का नाम तो मैं नहीं जानता; मेरी माँ का नाम जबाला है, और मेरा नाम है- सत्यकाम ! "
उस समय आश्रम में अनेकों विद्यार्थी उपस्थित थे। सत्यकाम को निर्लज्ज के समान ऐसी बातें कहते सुने, वे सब आश्चर्यचकित हो गये। उनलोगों ने सोचा कि अब तो गुरूजी इसको निश्चय ही यहाँ से भगा देंगे, ऐसे लड़के को भला आश्रम में कौन रखेगा ? प्रदान करने वाले शिक्षकों का निर्माण 
किन्तु सत्यकाम के उत्तर को सुनने के बाद, ऋषि अपने आसन से उठकर सत्यकाम के पास आये और उसको अपने सीने से लगा लिया। बोले, " बेटे, इतनी निर्भीकता के साथ जो सच्ची बात कह सकता है, सत्य के लिये जिसमें इतना तीव्र आकर्षण हो, वह निश्चय श्रेष्ठ गोत्रीय है, वह ब्राह्मण है। मैं तुमको दीक्षा दूंगा, तुम समिधा की लकड़ी लेकर आओ। " ' जो धीर मनुष्य सत्य-पथ से कभी नहीं हटता, वही ब्रह्म-विद्या प्राप्त करने का अधिकारी होता है। '
गौतम के आश्रम में ज्ञान-प्राप्त करने के बाद सत्यकाम भी ब्रह्मज्ञ ऋषि बन गये थे।

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