Tuesday, January 22, 2013

$@$ स्वामी विवेकानन्द और हमारी सम्भावना [65-29 A] " धर्म सनातन "(धर्म और समाज),

सनातन धर्म के नाम से भी कुछ है- ऐसा हमने सुना है। तो क्या ' सनातन ' नाम का कोई धर्म भी है ? नहीं वैसी कोई बात नहीं है। ' धर्म ' तो सनातन ही होता है, अर्थात शाश्वत होता है। 'धर्म' हमेशा के लिये (forever) सदैव रहने वाली चीज है। जब जगत की सृष्टि हुई, उसी के साथ साथ धर्म की भी सृष्टि हुई है। जबतक यह जगत रहेगा, तबतक धर्म भी रहेगा। सृष्टि हमेशा के लिये है, इसीलिये धर्म भी हमेशा के लिये है, अर्थात धर्म सनातन है, अनदि-अनन्त है ! गीता 13/31 मे में भी कहा गया है- " अनादित्वात् " [ब्रह्मसूत्र ?
अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्यय: ।
शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते ।।31।।
कौन्तेय = हे अर्जुन ; अनादित्वात् = अनादि होने से (और) ; निर्गुणत्वात् = गुणातीत होने से ; अयम् = यह ; अव्यय: = अविनाशी ; परमात्मा = परमात्मा ; शरीरस्थ: = शरीर में स्थित हुआ ; अपि = भी (वास्तव में) ; न = न ; करोति = करता है (और) ; न = न ; लिप्यते = लिपायमान होता है ; 
हे अर्जुन[1] ! अनादि होने से और निर्गुण होने से यह अविनाशी परमात्मा शरीर में स्थित होने पर भी वास्तव में न तो कुछ करता है और न लिप्त ही होता है ] 
विश्वधर्म-महासभा में, 'हिन्दुधर्म ' के उपर भाषण देते हुए स्वामी विवेकानन्द ने भी कहा था, " ऐसा समय कभी नहीं था, जब सृष्टि नहीं थी। " आचार्य शंकर ने अपने गीता-भाष्य में एक स्थान पर पुरानों से कुछ श्लोक को उद्दृत करते हुए कहा है-
'आजीव्यः सर्वभूतानां ब्रह्मवृक्षः सनातनः।'
- यहाँ उन्होने भी जगत को जीवों के वास करने लायक एक सनातन वृक्ष कह कर उल्लेखित किया है। समस्त सृष्ट वस्तुओं एवं जीव का एक धर्म रहता है। जो कुछ भी सृष्ट होता है, एक धर्म को लेकर ही होता है।[ जन्म लेने वाले का मरना अटल नियम है या धर्म है ?]  धर्म बाहर से आने वाली वस्तु नहीं है, यह आंतरिक वस्तु है। [सनातन धर्म शब्द का शब्दार्थ है  non dis-continuous, बनी रहने वाली गुण-धर्मिता।] इसीलिये धर्म की व्याख्या करते समय अक्सर आग और पानी का उदाहरण देकर समझाया जाता है कि जैसे आग ( का धर्म है जला देना )और पानी का एक धर्म होता (नीचे की और बहना ) है, उसी प्रकार मनुष्य का भी एक धर्म होता है। किन्तु इस प्रकार की व्याख्या (मनुष्य के साथ आग और पानी की तुलना करना)  बहुत ठीक नहीं है।
क्योंकि किसी वस्तु, जीव और मनुष्य के धर्म में एक विशेष अन्तर होता है। मनुष्य से हेय किसी वस्तु या अन्य प्राणी (जीव) के धर्म का विकास या विस्तारण (amplification) नहीं होता, किन्तु मनुष्य का धर्म विकसित होता है, उन्नत (बेहतर) होता है। क्योंकि इसका विकास मनुष्य के ' धर्मबोध ' के उपर निर्भर करता है, तथा उसकी धर्म-सम्बन्धी अभिज्ञता या धारणा (religious perception) में विस्तारण होना संभव है। किन्तु जो व्यक्ति अपने धर्मबोध को जाग्रत करके विकसित करने प्रयास नहीं करता, तो उसका धर्म - लकड़ी,ईंटों और पत्थरों के धर्म के जैसा ही होगा। वह आग बनकर दूसरे मनुष्यों को दुःख में जला सकता है, चोर का धर्म तो चोरी करना है, इसीलिये वह चोरी करने को भी धर्म कह सकता है, पानी का धर्म नीचे की ओर बहना है, इसीलिये वह ' उत्तरायण ' या उर्धमुखी विकास करने बात कभी नहीं सोचेगा।
किन्तु मनुष्य का धर्म है- जीवन को विकसित करना, उपर उठाना, ह्रदय को विस्तृत करना, पराये को भी अपना बना लेना, दूसरों के काम आना ( सेवा करना), अपने मन में महाराज रन्तिदेव के जैसी परदुःखकातरता लाना। ताकि हमलोग भी प्राणिमात्र के हृदय में प्रवेश कर उनके दुखों को स्वयं सहन कर सकें जिससे की सभी प्राणी अपने सभी प्रकार के दुखों से बच सकें |मनुष्य का धर्म है- धीरे धीरे इन्द्रियगोचर जितनी भी वस्तुयें (नाम-रूप) हैं, उन सबके आवरण में जो सत्य (अस्ति-भाती-प्रिय) छुपा है उसको जानने के लिये व्याकुल हो जाना। 
[चन्द्रवंशी राजा संकृतिके दो पुत्र थे - गुरु और रन्तिदेव । इनमें रन्तिदेव बड़े ही न्यानशील, धर्मात्मा और दयालु थे । दूसरोंकी दरिद्रता देखना उनसे सहा ही नहीं जाता था । अपनी सारी सम्पत्ति उन्होंने दीन दुखियोंको बाँट दी थी और स्वयं बड़ी कठिनतासे निर्वाह करते थे । ऐसी दशामें भी उन्हें जो कुछ मिल जाता था, उसे दूसरोंको दे देते थे और स्वयं भूखे ही रह जाते थे ।
एक बार रन्तिदेव तथा उनके पूरे परिवारको अड़तालीस दिनोंतक भोजनकी तो कौन कहे, पीनेको जल भी नहीं मिला । देशमें घोर अकाल पड़ जानेसे जल मिलना भी दुर्लभ हो गया था । भूख - प्याससे राजा तथा उनका परिवार - सब - के - सब मरणासन्न हो गये । उनचासवें दिन कहींसे उनको घी, खीर, हलवा और जल मिला । अड़तालीस दिनोंके निर्जल व्रती थे वे । उनका शरीर काँप रहा था । कण्ठ सूख गया था । शरीरमें उठनेकी शक्ति नहीं थी । भूखा मनुष्य ही रोटीका मूल्य जानता है । 
रन्तिदेव ऐसी दशामें भोजन करने जा ही रहे थे कि एक ब्राह्मण अतिथि आ गये । करोड़ों रुपयों में से दस - पाँच लाख का दान कर देना सरल है । अपना पूरा धन दान करने वाले उदार भी मिल सकते हैं; किंतु जब अन्नके बिना प्राण निकल रहे हों, तब अपना पेट काट कर दान करने वाले महापुरुष विरले ही होते हैं । रन्तिदेवने बड़ी श्रद्धा से उन विप्र को उसी अन्न में से भोजन कराया ।
विप्रके भोजन कर लेनेपर बचे हुए अन्नको राजाने अपने परिवारके लोगोंमें बाँट दिया । वे सब भोजन करने जा ही रहे थे कि एक शूद्र अतिथि आ गया । उस दरिद्र शूद्रको भी राजाने आदरपूर्वक भोजन करा दिया । अब एक चाण्डाल मेरे ये कुत्ते भूखे हैं और मैं भी बहुत भूखा हूँ ।'
रन्तिदेवने उन सबका भी सत्कार किया । सभी प्राणियोंमें श्रीहरि को देखनेवाले उन महापुरुषने बचा हुआ सारा अन्न कुत्तों और चाण्डालके लिये दे दिया । अब केवल इतना जल बचा था, जो एक मनुष्यकी प्यास बुझा सके । राजा उससे अपना सूखा कण्ठ गीला करना चाहते थे कि एक और चाण्डाल आकर दीन स्वरसे कहने लगा - ' महाराज ! मैं बहुत थका हूँ । मुझ अपवित्र नीच को पीनेके लिये थोड़ा पानी दीजिये ।'  
उसकी दयनीय अवस्था पर रन्तिदेव का मन एकाग्र होगया, वे मनन करने लगे। ...इस मनुष्यके प्राण जलके बिना निकल रहे हैं ।और इसे जल दे देने से मेरे प्राण भी निकल जायेंगे। यह प्राण - रक्षाके लिये मुझसे जल माँग रहा है ।और  इसे यह जल देनेसे मेरी भूख - प्यास, थकावट, चक्कर, दीनता, क्लान्ति, शोकविषाद और मोहादि सब सदा के लिये मिट जायँगे ।' जैसे जागनेपर स्वप्न लीन हो जाता है, वैसे ही भगवान् वासुदेवमें चित्तको तन्मय कर देनेसे राजा रन्तिदेवके सामनेसे त्रिगुणमयी माया विलीन हो गयी। और 'एक्तामता की अनुभूति ' हो गयी ! परम दयालु (आत्मज्ञानी) राजा रन्तिदेव  ने स्वयं प्यासके मारे मरणासन्न रहनेपर भी वह जल आदर एवं प्रसन्नताके साथ चाण्डालको पिला दिया ।
भक्तोंकी कामना पूर्ण करनेवाले त्रिभुवनके स्वामी ब्रह्मा, विष्णु और महेश ही रन्तिदेवकी परीक्षाके लिये इन रुपोंमें आये थे । राजाका धैर्य देखकर वे प्रकट हो गये । राजाने उनको प्रणाम किया, उनका पूजन किया । बहुत कहनेपर भी रन्तिदेवने कोई वरदान नहीं माँगा । और उन्होंने सृष्टिकर्ता से प्रार्थना की-
न कामयेऽहं गतिमीश्वरात्परामष्टर्द्धियुक्तामपुनर्भवं वा ।
आतिं प्रपद्येऽखिलदेहभाजामन्तःस्थितो येन भवन्त्यदुःखाः ॥  
( श्रीमद्भा० ९।२१।१२ )
  "हे भगवन ! न तो मैं अष्टसीद्धियों से युक्त सर्वोच्च स्थान चाहता हूँ और न मुक्ति। मैं तो यह चाहता हूँ  की प्राणिमात्र के हृदय में प्रविष्ट होकर उनके दुखों को स्वयं सहन कर सकूँ जिससे की सभी प्राणी अपने सभी प्रकार के दुखों से बच सकें | "रन्तिदेवके प्रभावसे उनके परिवारके सब लोग भी नारायणपरायण होकर योगियोंकी परम गतिको प्राप्त हुए । ] ऐसा (रन्तिदेव के जैसा ) धर्म-बोध केवल मनुष्य में ही विकसित हो सकता है, अन्य किसी वस्तु या जीव में नहीं। क्योंकि केवल मनुष्य ही मननशील, विवेक-बोध सम्पन्न प्राणी है, जो 'मुनि'  बन सकता है; 'न्यायमूर्ति' बन सकता है। 
इसीलिये वह केवल इन्द्रिय-विषय भोगों से मिलने वाले शारीरिक सुखो में ही तृप्त नहीं होता, वह (गहन-चिन्तन) एकाग्रता से मिलने वाले, 'मननलब्ध-आनन्द 'की खोज करता है, इस अनुसन्धान में लगे रहना ही धर्मबोध में विकसित होना है। इसमें भी तृप्त न होकर वह सम्पूर्ण विश्व-ब्रह्माण्ड (समस्त विचाराधीन वस्तु या कायनात) की सत्ता को अपनी अनुभूति में पाना चाहता है, क्षुद्र व्यक्ति की आत्मा को विश्वात्मा के साथ एकीकृत कर लेना चाहता है। उसका क्षुद्र ससीम 'मैं ' वृहत 'मैं ' में रूपांतरित हो जाता है। उसकी भेद-बुद्धि सदा के लिये समाप्त हो जाती है, समदृष्टि या साम्य-भाव की प्राप्ति करके वह साढ़े-तीन हाथ की सीमा के बाड़ को तोड़ कर अनन्त के साथ मिल कर एक हो जाता है। इसको ही वास्तविक धर्म कहा जाता है। 
जो व्यक्ति इस धर्म-मार्ग में क्रमशः उपर उठता रहता है, उसका आचरण (व्यवहार या चरित्र ) बिलकुल अन्य प्रकार का हो जाता है। क्योंकि धर्म अनुष्ठानिक वस्तु है, उसको यदि आचरण में नहीं उतारा गया तो, शुष्क ज्ञान का होना भी न होने जैसा है। इसीलिये कहा जाता है " धर्मं चर " - धर्म को आचरण के द्वारा प्रकाशित या अभिव्यक्त करो। धर्म के बारे में कहा गया है कि धर्म  " अनुष्ठीयमानः।" अर्थात व्यवहार की वस्तु है, धर्म अनुष्ठान करने की चीज है।   
 [ गीता-भाष्य मे आचार्य शंकर कहते हैं- स भगवान् सृष्ट्वा इदं जगत् तस्य च स्थितिं चिकीर्षुः मरीच्यादीन् अग्रे सृष्ट्वा प्रजापतीन् प्रवृत्तिलक्षणं धर्मं ग्राहयामास वेदोक्तम् । ततः अन्यान् च सनकसनन्दनादीन् उत्पाद्य निवृत्तिलक्षणं धर्मं ज्ञानवैराग्यलक्षणं ग्राहयामास । 
द्विविधो हि वेदोक्तः धर्मः प्रवृत्तिलक्षणो निवृत्तिलक्षणः च । 
 जगतः स्थितिकारणं प्राणिनां साक्षात् अभ्युदयनिःश्रेयसहेतुः यः स धर्मो ब्राह्मणाद्यैः वर्णिभिः आश्रमिभिः च श्रेयोर्थिभिः अनुष्ठीयमानः । ] 
किसी स्थान में एक भागवती-पण्डित रहा करते थे। वे भागवत पाठ करके उस पर प्रवचन देते थे। वे शास्त्रों की बड़े सुन्दर ढंग से व्याख्या करते थे, इसीलिये शाम के समय उनके प्रवचन में गाँव के बहुत से लोग एकत्रित हो जाते थे। दूसरे लोगो से अपने पती के प्रवचनों की प्रसीधि सुन कर, एक दिन उनकी पत्नी के मन में भी सुनने की इच्छा हुई। वह अपने घर के कार्यों को समाप्त करने के बाद थोड़ी देर से प्रवचन स्थल पर पहुंची, और थोड़ी देर सुनने के बाद सोंची सचमुच कितना सुन्दर उपदेश देते हैं ! जब घर लौट कर आई, तो एक भूखे व्यक्ति की कराऊँ प्रार्थना सुनकर, प्रवचन कहे गये अपने पति के उपदेशों को याद करके अपने रात के भोजन को उसे दे दिया। वह बहुत खुश होकर वहां से चला गया। कुछ ही देर बाद एक जर्जर वृद्धा ठंढ में कांपते हुए किसी प्रकार उसके दरवाजे पर आकर भोजन की भिक्षा मांगने लगी, कोई अन्य उपाय न देखकर उसने अपने पति का भोजन उस को दे दिया। तब वृद्धा ठंढ से बचने के लिये एक कम्बल देने की प्रार्थना करने लगी, किसी गरीब की स्त्री के पास जैसे किसी को देने के लिए कुछ नहीं होता, उसने अपने पति के एकमात्र कम्बल को भी उसे दे दिया। वह वृद्धा स्त्री बहुत आशीर्वाद देकर वहाँ से चली गयी। 
उस स्त्री ने सोचा कि जब उसके पती यह सुनेंगे, कि उसने उनके उपदेशों को कितने अच्छे ढंग से काम में उतारा है, तो वे बहुत प्रसन्न होंगे। उसके पति जब घर लौटे तो बहुत भूख लगी थी, उन्हों ने अपनी पत्नी को शीघ्र खाना देने को कहा। तब उनकी पत्नी ने बताया कि उनका भोजन किसी भूखे व्यक्ति को दान कर दिया गया है। तब उन्हों ने बहुत क्रुद्ध होकर पूछ-तुमने अपना खाना क्यों नहीं दिया ? अपना खाना पहले ही दे दी थी यह जान लेने के बाद वे समझ गये कि अब कोई उपाय नहीं है, क्योंकि अब घर में खाना नहीं था। तब एक ढेला गुड़ मुंह में डाल कर एक लोटा पानी पीकर जब सोने गये तो देखते हैं, कम्बल भी नहीं है। कम्बल के बारे में जानकारी देते समय पत्नी ने बताया कि, थोड़ी देर पहले उन्हीं से उसने यह धर्म-ज्ञान प्रप्त किया था, जिसका फल अभी अभी फला है। 
तब उसके पति ने आवाक होकर कहा, " अरी भागवान, वे सब धर्म के उपदेश केवल कहने के लिये ही होते हैं, करने के लिये बिल्कुल नहीं होते। " उसी प्रकार ह्ममें से भी कई व्यक्तियों के लिये धर्म-टर्म केवल कहने की बात है। इसीलिये गोस्वामी तुलसीदासजी ' रामचरित- मानस ' में दुःख प्रकट करते हुए कहते हैं- 
 " बिषइन्ह कहँ पुनि हरि गुन ग्रामा।
 श्रवन सुखद अरु मन अभिरामा।। " 
- विषयी लोग हरि के गुणगान को केवल कर्ण-सुख उत्पन्न करने वाला कीर्तन समझते हैं। जो जिस अवस्था में हैं, और जिस अवस्था में उसे होना चाहिये था, उस अवस्था तक पहुँचने के लिये निष्ठापूर्वक जो प्रयत्न किये जाते हैं, उससे यथार्थ धर्मलाभ में सहायता मिलती है। सही कार्य करने में स्वयं को थोड़ा भूलना पड़ता है, स्वयं को वंचित करके दूसरों के लिये कुछ करना पड़ता है। ऐसा करना से हृदय विस्तृत हो जाता है, और यही धर्म अनुष्ठान का अवश्यम्भावी फल भी है। स्वामी विवेकानन्द ने अपने परिव्राजक जीवन में अपने एक गुरु भाई से भेंट होने पर कहा था, ' तुम्हारा ईश्वर- फिस्वर क्या है, वह तो मैं नहीं समझता, किन्तु इतना समझता हूँ कि मेरा हृदय बहुत विस्तृत हो गया है।' माँ सारदा कहती थीं- " जब जैसा तब तैसा ।" 
उनके इस कथन का अर्थ बहुत लोग समझते हैं, कि जैसे मुहर्रम के जुलुस में घुस जायें तो वहां दूसरों को छाती पीट-पीट कर ' हासेन-होसेन ' बोलते देखें तो हमलोग को भी " जब जैसा तब तैसा " के अनुसार छाती पीटना शुरू कर देना चाहिए। जिसको जब जैसा व्यवहार करना उचित हो, उस समय वैसा व्यवहार करने से, उसको धर्म की शक्ति किस प्रकार प्राप्त होती है, उसको समझाने के लिये श्रीश्री ठाकुर रामकृष्णदेव ने बगूला भष्म कर देने वाले तपस्वी ' कौशिक और धर्म-व्याध '  की कहानी कहते थे। महाभारत में 'पतिव्रता उपाख्यान' में भी है।
कौशिक नामक एक ब्राह्मण थे, उन्हों ने वेद-उपनिषद आदि का अध्यन किया था, धर्म में उनकी मती थी, बड़े कठोर तपस्वी थे। एक दिन एक वृक्ष के नीचे बैठकर वेदमन्त्र आदि का उच्चरण कर रहे थे, इसी समय एक बगुला उनके उपर बिट कर दिया। ब्राह्मण ने क्रोध करके बगुले की ओर देखा और उसके हानी की कामना करने लगे, तो उसके साथ ही साथ वह बगुला जमीन पर गिर कर मर गया। ब्राह्मण को बहुत पशचाताप हुआ।
 फिर वे उठे और भिक्षा मांगने के लिये एक गाँव की ओर निकल पड़े। इसी बीच उस घर के मालिक भूखे थे,खाने के लिये घर पर आ गये। गृहणी को उनकी सेवा-सुश्रुषा करने में कुछ विलम्ब हो गया। ब्राह्मण क्रोधित होकर बोले, मुझे खड़ा रहने के लिये कहकर इतनी देरी से भिक्षा देने का मतलब ? उस पतिव्रता स्त्री ने कहा, ब्राह्मण देवता क्षमा करें, पति तो परमदेवता होते हैं, उनकी सेवा करने में थोडा विलम्ब हो गया। तपस्वी ने क्रुद्ध होकर कहा- गृहस्थ होकर ब्राह्मण की अवज्ञा करती हो ? क्या तुम नहीं जानती या कभी नहीं सुना कि ब्राह्मण अग्नि के समान होते हैं, क्रोधित हो जाने पर सम्पूर्ण विश्व को भी जला सकते हैं ?
 यह सुनकर गृहणी ने कहा, हे ब्राह्मण मैं कोई बगुला नहीं हूँ, आपका क्रोध मुझे क्या नुकसान करेगा ? क्रोध को रोकिये। जो क्रोध और मोह का त्याग कर सकते हैं, उन्हीं को ब्राह्मण कहा जाता है। इसीलिये शाश्वत धर्म को समझना कठिन है, यह सत्य के उपर प्रतिष्ठित है। आपने धर्म के मर्म को ठीक से नहीं समझा है। आप मिथिला नगरी में जाइये वहाँ धर्म-व्याध से पूछने पर वह आपको सच्चा धर्मोपदेश देंगे। वे माता-पिता के सेवापरायण, सत्यवादी और जितेन्द्रीय हैं। अप मेरे पतिसेवा का फल देखिये, आपकी क्रोधाग्नि में बगुला जल गया है, यह मैं ने जान लिया है। मैंने आपको बहुत सी बातें बताई हैं, इसीलिये आपको मुझे क्षमा कर देना चाहिये। ब्राह्मण ने कहा, तुम्हारे तिरष्कार से मेरा कल्याण होगा। तुम्हारा मंगल हो !
कौशिक उस स्त्री की आश्चर्य जनक बातों पर विचार करते हुए स्वयं को अपराधी समझकर अपनी ही निंदा करने लगे और धर्म की सूक्ष्म शक्ति पर विचार करने लगे। उन्होंने सोचा मुझमें श्रद्धा जाग्रत होना चाहिये मैं आज ही मिथिला नगरी के ओर रवाना होऊंगा। मिथिला में खोज करने पर पता चला कि तपस्वी व्याध तो मांस बेचने का काम करते हैं। धर्मव्याध ब्राह्मण को देखकर आगे बढकर उनका अभिवादन किये और बोले आपको ब्राह्मणी ने मिथिला में मेरे पास आने के लिये कहा है, इन सब बातों को मैं जानता हूँ। आप मुझे आदेश दीजिये मैं मई आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ ? कौशिक और भी ज्यादा आश्चर्य हुआ। धर्म व्याध बोले यह स्थान आपके लायक नहीं है, यदि आप चाहें तो मेरे घर पर चल सकते हैं। व्याध के घर पर ब्राह्मण की यथायोग्य अभ्यर्थना करके दोनों में धर्म के उपर चर्चा होने लगी।
धर्म की मुख्य बात आचरण है, इसीलिये कौशिक ने शिष्टाचार के विषय में प्रश्न किया। धर्मव्याध ने बहुत से उपदेश दिए। जो कर्तव्य न्याय-युक्त हो वही धर्म है। धर्मव्याध के बहुत से उपदेशों में एक बहुत महत्वपूर्ण उपदेश है-
तं सदाचारमाश्चर्यं पुराणं शाश्वतं ध्रुवम्।
धर्म्यं धर्मेण पश्यन्तः स्वर्गं यान्ति मनीषिणः ।।
- मनीषी लोग सदाचारी व्यक्तियों के आचरण (चरित्र) रूपी उस असाधारण अनादि अविच्छिन्न नित्यधर्म को धर्मदृष्टि से देखकर स्वर्ग गमन करते हैं। गीता 14/27 में भी धर्म को शाश्वत कहा गया है।
ब्रह्राणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च ।
शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च ।।27।।

अव्ययस्य = अविनाशी ; ब्रह्मण: = परबह्मका ; च = और ; अमृतस्य = अमृत का ; च = तथा ; शाश्वतस्य = नित्य ; धर्मस्य = धर्म का ; च = और ; ऐकान्तकिस्य = अखण्ड एकरस ; सुखस्य = आनन्द का ; अहम् = मैं ; हि = हि ; प्रतिष्ठा = आश्रय हूं
क्योंकि उस अविनाशी पर ब्रह्मा का और अमृत का तथा नित्य धर्म का और अखण्ड एकरस आनन्द का आश्रय मैं हूँ इसलिए इनका मैं परम आश्रय हू। महाभारत के एक और उपाख्यान में देखा जा सकता है कि एक ब्राह्मण ने वैश्य से शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं, जैसे उपरोक्त उपाख्यान में ब्राह्मण कौशिक को  धर्मव्याध नामक शूद्र से शिक्षा ग्रहण करते देखा गया है। वास्तव में जाति व्यवस्था गुण और कर्म के पार्थक्य के उपर आधारित था, और वह आन्तरिक संस्कार में बाधक नहीं था। स्वामीजी ने कहा था कि जाति प्रथा को एक लाख में एक आदमी समझता है।
जाजलि नामक एक ब्राह्मण वन में कुटिया बनाकर रहते थे। वे सागर की तट पर बहुत वर्षों तक कठोर तपस्या किये थे। लकड़ी की तरह बैठे बैठे सिर पर जटा बन गया था। उस जटा को घोसला समझकर एक पक्षी ने घोसला बना लिया, उसमें अंडा दिया, बच्चे हुए, उनके भी पंख निकले और बड़े होकर उड़ने लगे। बहुत दिनों के बाद जब पक्षी लोग नहीं आने लगे थे, तब वे अपनी सिद्धि की असधारण कहानी सबों को सुनाने लगे। इधर सागर के राक्षस लोग उसको कहने लगे कि तुमको इतना अहंकार करना उचित नहीं है, वाराणसी में तुलाधर नामक एक वैश्य रहते हैं, वे एक महान धर्मज्ञ के रूप में विख्यात हैं; फिर भी वे अपने बारे में ऐसा नहीं कहते।
जाजलि जब पुनः अपनी बड़ाई करने लगे तो आकशवाणी हुई, महान ज्ञानी तुलाधर भी अपने मुख से ऐसी बात नहीं कह सकते हैं। तब जाजलि ने भी इतने दिनों की हठ साधना को व्यर्थ का पथश्रम स्वीकार किया और वाराणसी पहुँचकर जाजलि के पास उपस्थित हुए। तुलाधर ने जाजलि की समस्त तपस्या, अहंकार और अपने पास आने का उद्देश्य बता दिया। जाजलि ने आश्चर्यचकित होकर पूछा, बनिये का काम करते हो, ऐसे ज्ञान के अधिकारी कैसे बन गये ? पूरी बात विस्तार से समझाईये तुलाधर ने सबसे पहले कहा-
    वेदाहं जाजले धर्मं सरहस्यं सनातनम।
      सर्वभूतहितं मैत्रं पुराणं यं जना विदुः।।
महाभारतम्-12-शांतिपर्व-268
- हे जाजले ! जिस पुराने धर्म को लोग सर्वभूत के लिये हितकर रूप में जानते हैं, मैं उसी सनातन धर्म और उसके रहस्य को जानता हूँ। जो व्यक्ति सर्वभूतों के सुहृत और समस्त जीवों का हित करने में लगे रहते हैं, वास्तव में उन्हीं को धर्मज्ञ कहा जा सकता है। आगे कहते हैं-
यस्मान्नोद्विजते भूतं जातु किंचित्कथंचन।
अभयं सर्वभूतेभ्यः स प्राप्नोति सदा मुने।।
-जिस व्यक्ति से किसी को भय नहीं होता, जो स्वयं किसी व्यक्ति या वस्तु से भयभीत नहीं होता, वे ही यथार्थ धर्म को जानते हैं। महाभारत में अन्यत्र कहा गया है- 

न तत्परस्य संदध्यात्‌ प्रतिकूलं यदात्मनः।
संग्रहेणैष धर्मः स्यात्‌ कामादन्यः प्रवर्तते ॥ 
 -महाभारत उद्योगपर्व ३९/७२ 
- जैसा व्यवहार अपने लिये प्रतिकूल लगता हो वैसा व्यवहार दूसरों के साथ कभी नहीं करना चाहिये, संक्षेप में इसी को धर्म कहते हैं; कामना के कारण ही धर्म का रूप अन्य प्रकार का हो जाता है।
ठीक यही बात बाइबिल के ओल्ड टेस्टामेंट में कहा गया है। इसके पहले उद्धृत श्लोक में जो कहा गया है, पैगम्बर मोहम्मद ने भी लगभग वही कहा है। बाद में कोई भी प्रसिद्द धर्म जो सनातन धर्म-स्रोत सृष्टि के समय से बहता चला आ रहा था, मौलिक रूप से उससे कोई अधिक भिन्न नहीं हैं। 
श्रीरामकृष्ण और स्वामी विवेकानन्द ने इसी सत्य को अपनी अनुभूति से जान कर मानव-समाज को पुनरुज्जीवित करने का प्रयत्न किया था। किन्तु संकीर्णता और दुकानदारी बुद्धि ने धर्म के साँस को ही रुद्ध कर दिया है। समय के प्रवाह में जिसकी उत्पत्ति होती है, उसका नाश भी हो जाता है। किन्तु जो शाश्वत, सनातन है उसका नाश नहीं होता। 
शाश्वत धर्म यही कहता है कि समस्त प्राणियों में एक ही वस्तु है, उसको अपनी अनुभूति से जानकर समस्त जीवों की सेवा करना ही धर्म की अंतिम बात है। गीता में भगवान कहते हैं, जो मनुष्य अनन्य भक्ति के साथ 'मेरी' सेवा करता है, वह गुणातीत होकर परम वस्तु को प्राप्त करता है। आचार्य शंकर ने गीता भाष्य में ' मेरी ' शब्द का अर्थ बताते हैं, समस्त जीवों के हृदय में स्थित नारायण या ईश्वर। भागवत में कथा आती है कि युधिष्ठिर नारद से पूछते हैं कि सनातन धर्म क्या है ? युधिष्ठिर उवाच - भगवत्र्छ्रोतुमिच्छामि नृणां धर्मं सनतनम ।
नत्वा भगवतेऽजाय लोकानां धर्मेहेतवे ।
वक्ष्ये सनातनं धर्में नारायणमुखाच्छुतम ॥५॥
- नारद कहते हैं, मनुष्यों के धर्म सेतुस्वरुप भगवान को प्रणाम करके मैं आज बतलाऊंगा कि सनातन धर्म क्या है, जिसे मैंने स्वयं नारायण के मुख से सुना है। इसके बाद वे भगवान के मुख से सुने सनातन धर्म की परिभाषा मे जो कुछ कहते हैं, उसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते हैं। जब हमलोग अनौपचारिक ढंग से बातचीत करते हैं तो कहते हैं कि श्रीरामकृष्ण तो ईश्वर ईश्वर कहकर पागल हो गये थे, किन्तु उनके शिष्य होने से भी स्वामी विवेकानन्द आधुनिक शिक्षा में शिक्षित थे, देश-विदेश घुमे थे, गरीबों के लिये आँखों से कितना अश्रु बहाते थे, देश के उन्नति की बात कहते समय वे कहते थे कि मैं समाजवाद में विश्वास करता हूँ, या शयद वे साम्यवादी तो नहीं थे ? नारदजी "वक्ष्ये सनातनं धर्में " कहने के बाद कहते है-
अन्नाद्यादेः संविभागो भुतेभ्यश्च यथार्थतः ।
तेष्वात्मदेवताबुद्धिः सुतरां नृषु पाण्डव ॥१०॥
- समाज में अन्नादि जो कुछ भी उत्पन्न होगा, उस सकल घरेलू उत्पाद को समाज के समस्त सामान्य लोगों में जिसकी जितनी आवश्यकता हो, उसी हिसाब से वितरण करना होगा। किन्तु 'सकल घरेलू उत्पाद' का वितरण करने वाले (जो राज्य-कर्मचारी, नेता, या व्यापारी) होंगे उनको वितरण करते समय यह यह मनोभाव रखते हुए वितरण करना होगा कि " तेष्वात्म-देवताबुद्धिः"; -अर्थात वे सभी मनुष्य हमलोगों के आत्मास्वरुप, देवता (शिवजी) हैं, इस ज्ञान से देना होगा। (शिव ज्ञान से जीव सेवा करना ) इसको कहते हैं- सनातन धर्म !! 
स्वामीजी ने कहा था, जब तक मेरे देश का एक कुत्ता भी भूखा है, मेरा समस्त धर्म उसको रोटी खिलाना ही है। जो ईश्वर भूखे को एक मुट्ठी अन्न नहीं दे सकता, जो किसी विधवा के अश्रु नहीं पोछ सकता, वैसे ईश्वर पर मैं विश्वास नहीं करता।  स्वामीजी ने कहा था, " जो सनातन, असीम, सर्वव्यापी एवं सर्वज्ञ हैं, वे कोई व्यक्तिविशेष नहीं - तत्व हैं, किस व्यक्ति के भीतर यह यह अनन्त तत्व जितना अधिक प्रकाशित होता है, वे उतने ही महान होते हैं। बाकी समस्त मनुष्यों को उनकी पूर्ण प्रतिमूर्ति बनना होगा। एकात्मता की अनुभूति करने के अतिरिक्त धर्म और कुछ नहीं है, तथा प्रेम ही इसका साधन है। " उन्होंने यह भी कहा था, " उस धर्म की नीति में किसी के प्रति शत्रुता या या उत्पीडन का स्थान नहीं हो सकता। उसमें प्रत्येक नर-नारी देवस्व्भाव स्वीकृत होंगे। और उसकी समस्त शक्ति मनुष्यजाति को उसके अन्तर्निहित देवस्वभाव की अनुभूति करने में सहायता करने में ही व्यय होगी।"
ऐसे धर्म को ही सनातन कहते हैं। स्वामीजी ने कहा था, " एक आश्चर्यजनक सत्य मैंने अपने गुरुदेव से सीखा, वह यह है कि संसार में जितने धर्म हैं, वे परस्पर विरोधी नहीं हैं, वे केवल एक ही चिरन्तन शास्वत धर्म के भिन्न भिन्न भाव मात्र हैं। यही एक सनातन धर्म चिर काल से समग्र विश्व का आधारस्वरुप रहा है और चिर काल तक रहेगा, और यही धर्म विभिन्न देशों में, विभिन्न भावो में प्रकाशित हो रहा है। "7/261]

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धर्म : भारत में धर्म प्रत्येक मनुष्य का व्यक्तिगत कार्य है। 7/245] ' क्या ईश्वर देखा जा सकता है ? ' तुम अपने इतने दूतों को क्यों भेजती हो ? स्वयं तुम क्यों नहीं आती ? ऐसे विचार हम सभी के मन में उठते हैं, परन्तु कब ? -जब हमें तीव्र मानसिक क्लेश होता है ! पर दूसरे ही क्षण हम उन्हें भूल जाते हैं, क्योंकि हमारे चारो ओर अनेक मोहरूपी जाल हैं। ...हमारा पाशविक अंश हमें नीच दशा में पहुंचा देता है, और खाने, पीने, मरने, जन्म लेने और फिर खाने-पीने में व्यस्त हो जाते हैं। 7/249]" जब तक जगन्माता के लिये सर्वस्व त्याग नहीं किया जाता, तब तक वे दर्शन नहीं देतीं। " 250] 
" धन और काम: ' काम-वासना दूसरा शत्रु है। ' मनुष्य वस्तुतः आत्मस्वरुप है, आत्मा निर्लिंग है, वह न तो स्त्री है, न पुरुष। ..काम तथा कांचन के कारण ही उनको माँ के दर्शन नहीं होते। सारा विश्व माता का ही रूप है और वह प्रत्येक शरीर में वास करती है। (प्रत्येक लड़की कल माँ बनने वाली है। ) प्रत्येक स्त्री माता का रूप है, अतः किसी स्त्री को स्त्री-भाव (भोग्या? के रूप में) से मैं कैसे देख सकता हूँ  ? ..हमें उस अवस्था को पहुँच जाना चाहिये, जबकि प्रत्येक स्त्री में केवल जगन्माता का ही स्वरुप दिखे। " 7/251] भैरवी ब्राह्मणी मानव देह में साक्षात् विद्वत्ता ही थीं। ...साधन सिखलाये।  स्त्री-पुरुष के भेदभाव को समूल नष्ट करने की साधना -को सीखकर, उनके मन का स्वरुप पलट गया, वे स्त्री-पुरुष के भेद की कल्पना बिल्कुल भूल गये, और इस प्रकार जीवन के प्रति उनका दृष्टिकोण बिल्कुल बदल गया। 7/256उनका जीवन कितना धन्य है जिनका कामभाव सम्पूर्ण नष्ट हो गया है। हमारी दृष्टि भी इसी प्रकार की होनी चाहिये स्त्री में जो ईश्वरत्व वास करता है, उसे हम कभी ठग नहीं सकते। इस प्रकार की अच्युत पवित्रता अनिवार्य है।3/4 जीवन में कड़ी त्प्स्ययों द्वारा जो आध्यात्मिक संपदा एकत्र की थी वह अब वितरण करने का समय आ गया था। ..जो कुछ हो रहा है, वह सब T ही करा रहे हैं, मैं स्वयं कुछ नहीं कर रहा हूँ। ]
जब भारत में किसी प्रकार से यह बात दूर तक फ़ैल जाती है कि अमुक मनुष्य को सत्य का प्रत्यक्ष अनुभव हो गया है, ..अब उसके लिये धर्म और आत्मा का अमरत्व और ईश्वर आदि विषय जटिल नहीं रह गये हैं, तो तमाम स्थानों से लोग उसके दर्शन करने आते हैं, और धीरे धीरे उसकी देवता के समान पूजा करने लगते हैं। 7/246] हमें अपनी इन्द्रियों द्वारा यह संसार जितना प्रत्यक्ष प्रतीत होता है, उससे भी कहीं अधिक प्रत्यक्ष हमें सत्य का अनुभव हो सकता है।7/247] जीवन-समस्या का एक ही समाधान है और वह है ईश्वर तथा धर्म।248]  
 



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