Saturday, January 19, 2013

स्वामी विवेकानन्द और हमारी सम्भावना [64- 24 A] स्वामीजी का धर्म (वीर अपने 'अहं' को मारता है।)(धर्म और समाज),

" कायर दूसरों को मारता है, वीर अपने (अहं) को मारता है"
(धर्म को अफीम के मिलावट से परिशोधित करने का उपाय है चरित्रनिर्माण)
कल्पनाशील होना अच्छा है, किन्तु भावुकता अच्छी नहीं है। फिरभी अक्सर हमलोग भावुक हो ही जाते हैं। किसी विचारधारा को ग्रहण करने पूर्व हमलोग उसके उपर ठीक से सोच-विचार नहीं करते हैं। स्वामी विवेकानन्द ने धर्म का प्रचार किया था, यह बात बिल्कुल सच है। यह बात भी सच है कि कई बार अफीम के जैसे ही धर्म-सुगंध की भावुकता भी हमारी बुद्धि को मदहोश कर देती है, और हमलोग अपने कर्तव्य से दूर हो जाते हैं। फिर यह भी सत्य है कि अफीम सत्य नहीं है, धर्म ही सत्य है। धर्म के सत्य को अफीम के इसी मिलावट से परिशोधित करके,स्वामी विवेकानन्द ने मानव-समाज के बीच विशुद्ध धर्म वितरित किया था।
समय के प्रवाह में -सामाजिक सोच हो, राष्ट्रिय-विचारधारा हो या धार्मिक-सोच हो; या चाहे जो कुछ हो, चाहे जिस कारण से होता हो, धीरे धीरे दूषित हो ही जाते हैं। लोक-व्यवहार में उसका पहले वाला शुद्ध रूप दिखाई नहीं पड़ता है। केवल धर्म के क्षेत्र में ऐसी बात होती हो, वैसा नहीं है। लोक-जीवन के दूसरे क्षेत्रों में भी हमलोग ऐसी घटनाओं को देख सकते हैं, आज भी देख रहे हैं। जब ऐसी अवस्था होती है, तब उसको नये रूप में सजाना कर के पुनः प्रचारित करना पड़ता है।
इस नव-प्रचार में स्वामीजी का एक वैशिष्ट्य है, और यह वैशिष्ट्य भी भारतीय चिन्तन-पद्धति के अनुरूप ही है। हमारे प्राचीन चिंतकों ने विभिन्न क्षेत्रों के अलग अलग विषयों के उपर चिन्तन किया था, पर अपने चिन्तन का फल समाज को दिया था। किन्तु स्वामीजी ने एक सामग्रिक दृष्टिकोण लेकर चिन्तन किया था। उनके ध्यान-चिन्तन में सम्पूर्ण मनुष्य, अर्थात मनुष्य की समग्र सत्ता-उसका अस्तित्व, तथा उसका सम्पूर्ण समाज ही एक विषय के रूप में दिखाई देता है। कोई राष्ट्र के उपर चिन्तन करते हैं, कोई समाज को लेकर विचार करते हैं, कोई जाति के उपर, कोई अलग अलग धर्म के उपर चिन्तन करते हैं, कोई शिक्षा के उपर, कोई संस्कृति के उपर चिन्तन करते हैं, कोई उद्द्योग पर, कोई कला के उपर, कोई साहित्य के उपर, कोई संगीत के उपर - पृथक पृथक कई विषयों के उपर चिन्तन किये हैं।
किन्तु स्वामीजी ने अपने ध्यान का विषय उस मनुष्य को बनाया, जिसको लेकर इतने सारे चिन्तन किये जाते है। इस ध्यान से उन्हें एक ऐसे सूत्र का अविष्कार किया जो इन समस्त चिन्तन के भीतर से होकर गुजर सकता है, उसका नाम दिया ' धर्म ' तथा उसे मनुष्य के गले में पहना दिया। उन्होंने कहा कि यह सूत्र (स्वामीजी का धर्म ) ही मनुष्य के समस्त पहलुओं (3H) में सुसामंजस्य बनाये रख सकता है। विभिन्न नामों वाले जितने भी धर्म हैं, वे समय के प्रवाह में केवल दिखावटी भावुकता या अफीम के जैसा नशा उत्पन्न करते हैं, इसीलिये स्वामीजी का धर्म इन सबसे पूरा अलग किस्म का है। धर्म का नाम सुनने से भी जिन लोगों के मन में एक प्रकार का उन्माद छा जाता है, वे चाहें तो इसके लिए किसी नये शब्द का अविष्कार कर सकते हैं, उससे धर्म की वास्तविकता में कोई अन्तर नहीं पड़ेगा।  जो लोग एक बंधे-बंधाये प्रक्रिया का पालन करते हैं, केवल वे ही धार्मिक हैं, और बाकी सभी लोग अधार्मिक हैं, इस प्रकार की सोंच को सही नहीं कहा जा सकता है। जो लोग जीवन के समस्त पहलुओं को उसके उचित केन्द्र में धारण किये रह सकते हैं, वे ही धार्मिक हैं।
कोई व्यक्ति अपने केंद्र के साथ तभी जुड़ा हुआ माना जाता है,जब वह अन्य सभी मनुष्यों के साथ एकात्मता का अनुभव करता है। मनुष्य के हृदय का ऐसा विस्तार, विश्व-मानवता के साथ एकात्मता का अनुभव कराने वाले उसी सूत्र को ' धर्म ' कहते हैं। स्वामीजी ने मनुष्य की जो परिभाषा दी है, उसके भीतर सूत्र के रूप में यही सन्देश अन्तर्निहित है। वे कहते हैं, " मनुष्य एक ऐसा वृत्त है जिसकी परिधि कहीं नहीं है, अर्थात असीम है, किन्तु उसका केन्द्र एक स्थान में है। ' जो मनुष्य स्वामीजी के धर्म में विश्वास रखता है, उसके जीवन की परिधि विश्वव्यापी हो जाती है। इसीमे मनुष्यत्व के विकास की कुंजी है। तथा मनुष्य का इस प्रकार सर्वव्यापी बन जाना ही स्वामीजी के धर्म का मूल है। विकास के इस पथ पर अग्रसर होकर मनुष्य अपने कच्चे " मैं "-मिथ्या अहं को खोना सीखता है। अपने हृदय की संकीर्णता, स्वार्थपरता को त्याग करके मनुष्य अपने हृदय को विशाल बनाने की दिशा में अग्रसर लेता रहता है। इस प्रकार विकसित होना ही स्वामीजी के अनुसार ईश्वर के मार्ग पर अग्रसर होना है। क्योंकि स्वामीजी के अनुसार - " निःस्वार्थपरता ही ईश्वर है।" यदि निःस्वार्थपर बनने को ही धर्म कहा जाय तो इसमें किसी को क्या आपत्ति हो सकती है ? धर्म की इसी बात को, दूसरी भाषा में अन्य किस जन-नेता ने नहीं कहा है ? जो ऐसा नहीं कहते हैं, मनुष्य वैसे व्यक्ति को कभी नायक के आसन पर नहीं बैठाता है।
स्वामीजी कहते थे, " फिलोसफी, जप, तप, पूजा का कमरा, केला, मूली -आदि, व्यक्तिगत धर्म है।" किन्तु जिस धर्म को हर व्यक्ति समझ लेता है, वह है-परोपकार। अपने हृदय की विशालीकृत परिधि के भीतर समस्त जीवों की एकात्मता की अनुभूति करना ही धर्म है। उस अनुभूति के अन्तर्गत मनुष्य जो कुछ भी करता है, उसके सारे कर्म परोपकार बन जाते हैं, इसीलिये धर्म हो जाते हैं। यह धर्म कायरों का नहीं है, वीरों का है। क्योंकि कायर दूसरों को मारता है, वीर अपने (अहं) को मारता है। हमलोग साँप को मारते हैं, बिच्छू को मारते हैं, जो मुझे नुकसान पहुंचा सकता है, मेरे सुख-स्वप्नों के जीवन को जो कोई भी समाप्त कर सकता हो, ऐसी आशंका जिससे भी होती है, उसी को मारते हैं, क्योंकि वास्तव में मैं कायर हूँ। जो वीर होता है, वह अपने हृदय को विशाल बनाने के उद्देश्य से अपने तुच्छ स्वार्थ के दायरे में घिरे अपने 'मैं'-पन या मिथ्या अहं को मारता है। इसीलिये धर्म कायरों के लिये नहीं, वीरों के लिये है। स्वामीजी के अनुसार मनुष्य की अंतर्निहित शक्ति की अभिव्यक्ति (expression या प्रकाशन ) को ही धर्म कहते हैं। उस अन्तर्निहित शक्ति की अभिव्यक्ति के द्वारा बुराई मिटती है, अच्छे कार्यों का प्रारंभ होता है, भूखे को अन्नदान, अज्ञानियों को ज्ञानदान, अत्याचार का प्रतिरोध, और शूध बुद्धि का उद्घाटन हो जाता है।
धर्म का मुख्य कार्य मनुष्य को शान्ति प्रदान करना है। स्वामीजी का कहना था कि "जो धर्म मनुष्य को इहलोक में सुखी नहीं बना सकता, वह धर्म परलोक में सुखी करेगा ऐसा आश्वासन भ्रामक है।" इस लोक में सुखी होने के लिये मनुष्य यदि केवल अपना ही व्यक्तिगत ख़ुशी और सुविधा का ध्यान रखेगा, तो वास्तव में वह सुख नहीं पा सकेगा। उसकी असीम परिधि उसे सच्चे धर्म का अनुभव करने के लिए सक्रीय लोक-कल्याण के कार्यों में नियोजित करेगी। यह अनुभूति ही उसको अपने और दूसरों के दुःख दूर करने का साहस और शक्ति देती है। यही पर नैतिकता जन्म होता है। धर्म हमें सबों के साथ जोड़ता है, और नैतिकता उस ' जुड़े हुए मनुष्य ' या योगी के कर्मों की नीति को निर्धारित करती है।

No comments: