Saturday, January 19, 2013

$$@$$ स्वामी विवेकानन्द और हमारी सम्भावना [63] 'ठाकुर-माँ-स्वामीजी के शरणागत बने रहना !'(कबूतर-छुरी और सुनसान),

काला कबूतर -छुरी और सुनसान !
 (उत्कृष्ट विवेक-प्रयोग का नेट-प्रैक्टिस सर्वत्र भगवत् दृष्टि )
शिवजी पर चढ़ाया जाने वाला बेलपत्र तीन पत्तियों से बना होता है। तीनों पत्ते यदि आपस में जुड़े हुए न रहें, तो उसे बेलपत्र नहीं कहते हैं। ठाकुर- माँ-स्वामीजी भी ठीक उसी प्रकार एक डंठल से जुड़े तीन पत्तियों जैसे हैं। तीनों में कोई अंतर नहीं है, तीनो एक ही वस्तु है। एक ही वस्तु के तीन रूप हैं। जब हमलोग ठाकुर-माँ-स्वामीजी के जीवन की घटनाओं, या विभिन्न विषयों पर दिए गये उनके उपदेशों को अलग अलग रूप से सुनते हैं, तो ऐसा प्रतीत होता है कि, ठाकुर ने इस विषय पर ऐसा कहा है, माँ ने कुछ और कहा है, स्वामीजी ने वैसा कहा है। किन्तु यह एक भ्रान्त धारणा है।
जब हम उनके जीवन और संदेशों के भीतर प्रवेश करते हैं, उनके मर्म को समझने का प्रयत्न हैं, तो पाते हैं कि तीनों ने एक ही बात कही है, किसी की बात में कोई अंतर नहीं है। किन्तु इस बात को समझ पाना उतना आसन नहीं है। फिर भी इस बात को स्मरण में रखना अच्छा है कि तीनों में कोई अंतर नहीं है। श्रीरामकृष्ण के शरीर में रहते समय ही उनकी पूजा प्रारंभ हो गयी थी। माँ सारदा देवी ने ठाकुर का शरीर रहते समय ही ठाकुर की पूजा
सर्वप्रथम की थी। उसके बाद ठाकुर के निकट माँ को रख कर पूजा करना आरम्भ हुआ। उसके बाद जब स्वामीजी भी चले गये तब उनके पास स्वामीजी के चित्र को बैठा कर पूजा शुरू हुई। यह देखकर किसी व्यक्ति को अच्छा नहीं लगा, वह व्यक्ति माँ के पास आकर बोला, ' माँ अमुक व्यक्ति  -ठाकुर और आपके चित्र के पास स्वामीजी की छवि को बैठा कर पूजा कर रहा है।' माँ ने कहा, ' अरे, उनलोगों ने तो विवेकानन्द को श्रीरामकृष्ण के बगल में बैठाया है, मैं होती तो उनको सिर पर बैठाती। ' तीनो में कोई अंतर नहीं है।
जो लोग इस युग में पृथ्वी पर मनुष्य बन कर जन्मे हैं, उनका भाग्य असाधारण है। क्योंकि इस युग में ठाकुर-माँ-स्वामीजी का जीवन और सन्देश निःशब्द, अदृष्ट रूप से विश्व के आकाश में कृपा-वायु बनकर बह रही है। किन्तु उन्हें ग्रहण करने के लिये अपनी पात्रता बढ़ाने की जरूरत है। कई लोग ऐसे होते हैं, जो मानो सुनकर भी नहीं सुनते। फिर अब भी बहुत से ऐसे लोग हैं, जिन्हें उनके संदेशों को सुनने का अवसर नहीं मिला है। पर यदि किसी में उनके संदेशों को सुनने की उत्कंठा हो, तो वह उनके संदेशों को अवश्य सुन सकता है, किन्तु उन संदेशों को सुनकर अपने जीवन में उतारना ज्यादा महत्वपूर्ण बात है।
विगत कुछ वर्षों में विश्व के विभिन्न देशों की अवस्था कितनी उलट दिखाई दे रही है। स्वामीजी कहा करते थे कि जगत में इतिहास की गति सर्वदा तरंगाकार हुआ करती है। कभी उत्थान तो कभी पतन होता रहता है। एक बार किसी देश के मनुष्यों की सभ्यता बढ़ते हुए उत्तुंग शिखर पर पहुँच जाती है, फिर उसका पतन शुरू हो जाता है। इतिहास की गति इसी प्रकार चलती रहती है। इस समय इतिहास की ऐसी ही एक अधोगति का समय चल रहा था। किन्तु इस समय जो कुछ घटित हो रहा है,वह सोचा भी नहीं जा सकता। कोई भी व्यक्ति किसी रूप में शान्ति से नहीं जी पा रहा है। आज सभी मनुष्य हर समय किसी न मिसी प्रकार के आतंक के बीच जी रहे हैं। चाहे वे घर में हों, रास्ते में हों, गाड़ी में हो किसी की सुरक्षा निश्चित नहीं है। तथा मनुष्य का मन इतना नीचे गिर चुका है कि व्यक्ति और समाज के जीवन से विवेक और नैतिकता बिलकुल समाप्त हो गयी है। 

जहाँ विश्व का परिवेश और परिस्थिति इस प्रकार की हो, और उस युग में जन्म ग्रहण करने के बाद भी जिस व्यक्ति को ठाकुर-माँ-स्वामीजी के संदेशों को सुनने का सौभाग्य प्राप्त हो जाता है, उनसे अधिक भाग्यवान और सौभाग्यवती दूसरा कोई नहीं है। क्योंकि उनके संदेशों को वे युवक-युवतियां अपने जीवन में उतरने का प्रयत्न करें, तो उनमें से प्रत्येक का जीवन अत्यन्त उत्कृष्ट,महान और सुन्दर (manifested) बन जायेगा। और व्यक्ति जीवन के उत्कृष्ट और महान बनने से ही समाज और देश भी महान बन जाता है। आज इसी चीज की आवश्यकता सर्वाधिक है। किन्तु व्यक्ति चरित्र को सुंदर रूप में गढ़ने की तरफ किसी की नजर नहीं है।
एक वर्ग ऐसा है,जो धर्म को नहीं मानता। फिर एक समूह वैसे लोगों का है, जो धर्म को मानते हैं, किन्तु उनके लिये उनका धर्म ही सबकुछ है, जो केवल अपने ही धर्म को दुनिया का एकमात्र धर्म बनाने पर आमदा रहते है। अन्य लोगों का धर्म खराब है, इसीलिये अन्य धर्मों को नष्ट करने की चेष्टा करते है, यहाँ तक कि अन्य धर्म के अनुयायियों की हत्या करके भी उस धर्म को नष्ट करने की चेष्टा करते हैं। किन्तु ठाकुर-माँ-स्वामीजी की बातों को यदि सभी लोग ग्रहण करते, या अब भी ग्रहण कर लें तो ये सब बन्द हो जाते। किसी भी बाहरी प्रयास की जरूरत नहीं पडती। यदि सभी लोग देश के सभी मनुष्यों को अपना समझकर, सबों के कल्याण के लिये, सभी लोग अपने स्वार्थ को थोडा त्याग करें, और दूसरों के स्वार्थ को, दूसरों के मंगल को अपने से बड़ा समझकर देखे तो समाज बहुत उत्कृष्ट बन सकता है।
हमलोगों के देश में भी धर्म के नाम पर बहुत कुछ चल रहा है। सभी धर्मों के अनुयायी कर रहे हैं। विश्व का प्राचीनतम धर्म भारत का सनातन धर्म है, किन्तु उस धर्म के अनुयायी भी दूसरों का अनुकरण करके, बहुत जोर-शोर से यह प्रचार करने में लगे हैं कि -
उनके धर्म को बहुत बड़ा बनाकर सम्पूर्ण भारत में पुनः सुप्रतिष्ठित करना होगा! इस प्रकार के प्रचार- मार्ग को ईश्वर-प्राप्ति का मार्ग बिल्कुल नहीं कहा जा सकता, क्योंकि डराने-धमकाने से विभिन्न धर्मों के बीच आपसी भाईचारा और और सौहार्द स्थापित नहीं हो सकता। यह प्रेम का मार्ग नहीं है, जो प्रेम-सम्बन्ध को नष्ट करता हो, उस प्रकार के मार्ग पर सनातन धर्म के अनुयायियों को भी चलता देखने से बहुत से लोगों के मन में थोडा थोडा आतंक या डर भी पैदा होने लगा है। आज भी यह जारी है। इस समय मनुष्य के रूप में बाघ-भालू खुले घूम रहे हैं, कब किसकी गर्दन मरोड़ देंगे, कहा नहीं जा सकता है। 
सर्वत्र, सम्पूर्ण विश्व में, भारतवर्ष के हरेक प्रान्तों में नारी जाती की अवमानना और भ्रष्टाचार देखा जा सकता है। इस परिस्थिति में भारत के युवाओं को क्या करना चाहिये ?  क्या हमलोगों को परम्परागत रूप से चले आ रहे प्रचलित कर्मकांडों को धर्म समझकर लकीर के फकीर बने रहना चहिये? या इसके आलावा भी कोई धर्म है ? धर्म क्या है ? मनुष्य-जीवन को सुन्दर रूप से गढ़ना ही धर्म है, जीवन को उत्कृष्ट बनाना, पशु मानव से देवमानव में- विकसित होना, अपने हृदय को प्रेम से परिपूर्ण कर लेना ही धर्म है। इसी को सच्चा धर्म कहते हैं। किन्तु इस सच्चे धर्म को जीवन में उतारने की बात कौन सोचता है ? हमलोगों में से कोई मन्दिर में, तो कोई मस्जिद में या गिर्जा में जाते हैं, या किसी अन्य स्थानों में जो अनुष्ठान आदि मनाये जाते हैं, उसमें ही ध्यान देते हैं। वहाँ शनिवार-मंगलवार-शुक्रवार-रविवार या हफ्ते में किसी एक दिन चले जाते हैं, या लगातार भी आते जाते रहते हैं।
मन्दिर जायेंगे तो वहां, ' भोजन-भजन और प्रवचन ' चलेगा। मन्दिर में यदि " च्वय-चुष्य" या "चाटने-पीने " लायक प्रसाद भी मिल जाय तो क्या कहना? प्रसाद रूपी भोजन हो जाने के बाद थोड़ा भजन-कीर्तन होगा।  वह भजन चाहे सुर में हो या बेसुरा हो, चाहे जिस किसी के नाम का का हो कोई फर्क नहीं पड़ता। भजन के बाद किसी शास्त्र के उपर थोड़ा प्रवचन भी चला। जिसने शास्त्र पढ़ा, वो बोला और अपने घर चला गया, उसके बाद जिसका जीवन जैसे चल रहा था, वैसे ही चलने लगा। स्वामीजी अपने भाषणों में अक्सर कहते थे, " तुमलोग अभी सुन रहे हो, सुनने के बाद घर लौट जाओगे। जो भोजन किया वह भी हजम हो जायेगा, और जो सुना वह भी हजम हो जायेगा। भोजन यही सही रूप में पच जाता है, तो उसका सार प्राप्त होता है, शरीर को पौष्टिकता मिलती है। किन्तु वैसे हजम करने से कोई लाभ नहीं होगा। जो कुछ सुना वह हजम कर गया, तब क्या लाभ हुआ ? पचाने के बाद उससे पौष्टिकता ग्रहण करनी चाहिये।"
किन्तु पौष्टिकता ग्रहण करने का धैर्य हमारे भीतर नहीं होता, तथा उसके लिये जो प्रयत्न, चेष्टा, श्रम या जो तपस्या करनी चाहिए, मन को इन्द्रिय विषयों के प्रलोभन में जाने से रोकना ही तपस्या है। उस तपस्या के लिये हम तैयार नहीं होते,क्योंकि तपस्या के लिये जितनी तीव्र इच्छाशक्ति होनी चाहिये, वह इच्छाशक्ति अभीतक विकसित नहीं हुई है। इसीलिये अनगिनत बार सत्संग-प्रवचन सुनने के बाद भी जीवन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता, और हमारी अंतर्निहित दिव्यता प्रकाशित नहीं हो पाती। हमारी अवस्था तो ऐसी है कि इस कान से सुना और उस कान से निकाल दिया। अभी अच्छा प्रवचन सुना, सुनने के समय लगा, वाह क्या बात है ! इसके अलावा यह भी होता है कि जब प्रवचन चल रहा होता है, उसी बीच हमलोग दुनियादारी की बातें, द्वेष-हिंसा के विचार भी सोचते रहते हैं। और जब वहां से बाहर निकल आये तो कहना ही क्या ? जैसा था, (अपने को भेंड -M /F समझता था ) वैसा ही रह गया, तो क्या लाभ ? थोड़े समय के लिये सुना। जितने दिनों तक कैंप में रहे, तबतक कोई बुरा कार्य नहीं किया, किन्तु उतने से क्या होगा ? उससे क्या जीवन में परिवर्तन आएगा ?
जीवन में परिवर्तन लाने के लिये आदर्श को ग्रहण करना पड़ेगा। और अपने दैनन्दिन जीवन में दिव्यता  को प्रकाशित करने के लिये, उसे सुन्दर बनाने के लिये, पूर्ण करने करने की जितनी संभावना है, उसको विकसित करने लिये निरन्तर परिश्रम करना होगा। किन्तु हमारे भीतर आदर्श के प्रति वैसी निष्ठा नहीं है। कई लोग तो दीक्षा लेने के बाद भी जप-ध्यान नहीं करते हैं। कुछ लोग सुबह-शाम का रूटीन निभा देते हैं। बहुत से लोग तो गुरु का नाम और मंत्र को भी भूल जाते हैं। मैंने स्वयं दीक्षित भक्तों में अनगिनत ऐसे लोगों को देखा है, यह देखकर बहुत दुःख होता है कि कितने लोग तो अपने गुरु का नाम भी याद नहीं रख पाते हैं। बहुत से लोग ऐसे भी हैं, जो मन्त्र भूल जाते हैं। क्या मन्त्र प्राप्त हुआ थे, उसे भी भूल जाते हैं। फिर बहुत से लोग तीव्र अधीर चित्त से जप करते हैं। हमलोग अपने बचपन से सुनते आये हैं, " व्यग्रचित्तेन यद् जप्तं तज्ज्पं निष्फ़लं  भवेत। " ऊँगली का पोर और नखाग्र की सहायता से जप करना ही पर्याप्त नहीं है, व्यग्र या तीव्र अधीर चित्त से जप करने का कोई फल नहीं मिलता। धर्म का अर्थ हमलोग इतना ही  जानते हैं ? इन सब यांत्रिक क्रियाओं में धर्म नहीं है। स्वामी विवेकानन्द 9 जुलाई 1897 ई0 को अलमोड़ा से लिखित अपनी कविता-
जाग्रत देवता  में कहते हैं-
ओ विमूढ़ !
जाग्रत देवता की उपेक्षा मत करो,
उसके अनन्त प्रतिबिम्बों से ही यह विश्व परिपूर्ण है।
काल्पनिक छायाओं के पीछे मत भागो,
जो तुम्हें विग्रहों में डालती हैं;
उस परम प्रभु की उपासना करो,
जिसे सामने देख रहे हो;

अन्य सभी प्रतिमाएं तोड़ दो ! 
"  ज़िन्दा-ख़ुदा  " ' जाग्रत देवता '
 वह, जो तुममें है और तुम्हारे बाहर भी है,
जो सब के हाथों से काम करता है,
जो सब के पैरों से चलता है,
जो हरेक शय में पैठा हुआ है,
पहले उसीकी बन्दगी करना शुरू कर दो !
और तब, बेशक! तुम
 अन्य प्रतिमाओं को तोड़ दो ! 
हे विमूढ़ (blasphemer) दल !
ईश-निन्दकों की जमात! 
" बन्दे " के रूप में सामने खड़े-" जिन्दा-ख़ुदा " 
की उपेक्षा करते हो ?
वे तो हर जगह पर मौजूद खुदा की जानदार तस्वीरें है !
अल्लाह की जिन्दा तस्वीरों में (अल्ला) को देखना छोड़ कर,
ख़याली पत्थर के पीछे मत भागो,

व्यर्थ के द्वंद्व-विवादों,
'महज अल्लाह परवरदिगार ' को ही अनेक रूप में देख कर,
 पहचानने में भूल मत करो,
 (पानी, अकुआ या वाटर के नाम पर झगड़ने की बात ) को भूल जाओ,
और इसी
' एकलौता काबिल ए गौर'
 अल्लाह-परवरदिगार की इबादत करो; जिसे सामने देख रहे हो !

और तब, बेशक ! तुम
अन्य प्रतिमाओं को तोड़ दो ! ]

ठाकुर-माँ स्वामीजी की उपदेशों का सारांश इतना ही है। ओ विमूढ़ ! तुम लोग जिसे धर्म समझ रहे हो, वह तो मुर्ख लोगो का धर्म है। जीव-जगत जो कुछ भी देख रहे हो, सब उन्हीं की अभिव्यक्ति है। वे जगत में सर्वत्र व्याप्त हैं, सत्य तो यह है कि वे ही जगत बन गये हैं ! ठाकुर-माँ स्वामीजी की भावधारा का मूल बिन्दु यही है (- शिवज्ञान से जीव सेवा ! इस विश्व, चराचर जगत में, सृष्टि की रचना में जड़ -चेतन का भेद नहीं है, सब एक का ही विविध रूप है ! )
 सम्पूर्ण जगत-सृष्टि एक और अखण्ड है। जगत में जो कुछ है, पर्वत-पहाड़-नदी-वृक्ष जिसको हमलोग प्राणी नहीं मानते हैं, जिसको जड़ समझते हैं, या जीव-जन्तु कहते हैं, वे सभी चैतन्य-मय हैं, सभी ईश्वर हैं। जीव तो ईश्वर है ही, किन्तु समस्त जीवों में श्रेष्ठ है मनुष्य। सभी मनुष्यों में में ईश्वर को नहीं देख पाने से, ईश्वर दर्शन नहीं होता। ठाकुर-माँ-स्वामीजी को वैसा हुआ था। सभी मनुष्यों के भीतर ईश्वर को देख पाने से, कोई पराया नहीं रह जाता। किसी भी मनुष्य से ईर्ष्या, वैर, विरोध, शत्रुता, कपट नहीं किया जा सकता है। किसी को हिंसा नहीं कर सकते हैं। स्वार्थपर नहीं बन सकते हैं। अपने भोग की आकांक्षा को लालच-वश दूसरों को हानी पहुंचाकर भी पूर्ण करूँगा, ऐसा विचार उसके मन में उठ ही नहीं सकता है। और इसीको धर्म-लाभ कहते हैं।स्वामीजी कहते हैं, चरित्र ही धर्म है। बाकि सब सतही दस्तूर हैं। और जो लोग इबादत के रस्मी दस्तूर के मर्म को नहीं जानते, या अनुष्ठानिक पूजा-अर्चना के महत्व को ठीक से नहीं समझ पाते, उनके लिये इबादत या आरधना केवल व्यायाम या घुटनों की कवायद बनकर रह जाती है। किन्तु ये सब धर्म के मुख्य अंग नहीं हैं। चाणक्य नीति में कहा गया है,

अग्निर्देवो द्विजातीनां,
मुनीनां हृदि दैवतम्‌ 
प्रतिमा स्वल्पबुद्धीनां;
सर्वत्र समदर्शिनः ।।

पहले अग्नि को ही एकमात्र देवता माना जाता था। जो लोग अपना अधिकांश समय मौन होकर  व्यतीत करते हैं, उनको मननशील या मुनि कहते हैं। उनके लिये भगवान उनके हृदय में रहते हैं, कहीं बहार में नहीं रहते। ठाकुर-माँ-स्वामीजी की भाषा में कहें तो जो कुछ दिख रहा है, सब उन्हीं का भिन्न भिन्न रूप है। जिन लोगों की बुद्धि इतनी तेज नहीं है, जो लोग इन बातों को समझ नहीं पाते हैं, उनके लिये प्रतिमा (या रोल मॉडल या पूर्णमनुष्य के आदर्श) की आवश्यकता होती है। "सर्वत्र समदर्शिनः", और जो समदर्शी हैं, (अर्थात जिन्होंने एकाग्रता का अभ्यास करके अपने सच्चे स्वरूप को जान लिया है, या जिन्हें आत्मसाक्षात्कार हो चूका है) उनके लिये ईश्वर सर्वत्र हैं। ऐसा कोई स्थान (देश-कल-निमित्त) नहीं है,जहाँ ईश्वर नहीं हों। 
उपनिषद युग की एक कहानी है। उस समय गुरुकुल ( जहाँ विद्यार्थी आश्रम में गुरु के साथ रहकर विद्याध्ययन करते थे,) हुआ करते थे। कुछ लडके गुरु के आश्रम में अर्थात उनके घर में वेद आदि सीखने,पढ़ने, ज्ञान प्राप्त करने जाया करते थे। वहाँ पहुंचकर गुरु की सेवा करना उनका कार्य था। गुरु की सेवा-सुश्रुषा करने से यथार्थ ज्ञान होता है। उनको जंगल से लकड़ी लाने के अतिरिक्त अन्य कार्य भी कर करने पड़ते थे। इसी प्रकार से बहुत दिन बीत गये। एक दिन छात्रों ने गुरु से पूछा आप क्या हमलोगों को ज्ञान सिखायेंगे? कब से सिखायेंगे ? गुरु बोले -हाँ सिखाऊंगा। 

तुमलोग एक काम करो, सभी अपने हाथों में एक एक कबूतर ले लो। कबूतर और एक छूरी लेकर इधर उधर चले जाओ। और अपने अपने कबूतर को काट कर लेते आना। किन्तु ध्यान रखना किकोई, कहीं देखता न हो। उस समय के गाँव थे, खाली खाली मैदान, सुनसान-बियाबान जंगल पहाड़ थे। लोग जन बहुत कम थे, कहीं जंगल तो कहीं नदियाँ थीं। गुरु का आदेश सुनकर सभी छात्र कोई किसी तरफ तो कोई किसी तरफ निकल पड़े। कोई इधर, कोई उधर छिप कर छुरी से काटने लगे। दोपहर का समय बीत जाने के बाद सभी एक एक करके गुरु के पास आने लगे।
गुरु सबसे पूछते- काट कर ले आये ? किसी ने देखा तो नहीं ? -नहीं, किसी ने नहीं देखा। कहाँ गये थे ? - घने जंगल में चला गया था, जहाँ कोई प्राणी तो क्या पशु-पक्षी भी नहीं थे। दूसरे छात्र ने कहा -नदी के किनारे, जहाँ एक गाय भी नहीं चर रही थी। एक अन्य छत्र बोला मैं तो समुद्र के किनारे चला गया था। वहाँ दो तीन लोग घूम रहे थे, यह देख कर मैं समुद्र के जल में डूबकी लगा दिया और पानी के भीतर में काटा। इसी प्रकार सभी अपना अपना वृतान्त सुनते रहे। किन्तु दिन ढल गया। शाम होने को था। पर एक छात्र अभी तक वापस नहीं आया था। तब सभी को चिंता होने लगी। गुरुदेव बोले -जाओ जाओ खोजो कहाँ है? वे लोग थोडा इधर उधर देखे पर कहीं मिला नहीं।
इसी बीच वह लड़का रोते रोते कबूतर लिए हुए गुरु के चरणों में गिर कर बोला, गुरुदेव ! मैं आपके आदेश का पालन नहीं कर सका। मुझसे बहुत बड़ी भूल हो गयी है। आप क्या करेंगे, दण्ड देंगे या क्षमा कर देंगे मुझे सब स्वीकार होगा। क्यों क्यों। सभी तो काट कर ले आये हैं। पर वे लोग कैसे यह काम कर सके होंगे मैं नहीं जानता। मैं तो घने जंगल में गया था, नदी के किनारे गया था, समुद्र के किनारे गया था, पानी के नीचे भी डूबकी लगाया। किन्तु सभी जगह देखता हूँ, हजार सिर, हजार आँखें, अनन्त हाथ, अनन्त पैर। कोई सुनसान जगह नहीं मिला। भगवान जगन्नाथ की बड़ी बड़ी की आँखें हर स्थान में ज्वलंत होकर निहार रही थीं। ऐसा कोई स्थान मुझे नहीं मिला जो भगवान के लिये दृष्टिगोचर न हो,या जहाँ भगवान की आँखें नहीं देख रही हों।
गुरुदेव ने कहा, तुमको अब और कुछ पढने की आवश्यकता नहीं है। तुम घर चले जाओ। तुम्हें पूर्ण ज्ञान  हो चूका है। इसी अवस्था को पाने के लिये तो वेद पढ़ा जाता है, वेदाभ्यास (ज्ञान का नेट प्रैक्टिस ) किया जाता है। मनुष्य जीवन में इससे बड़ी अभिज्ञता, प्रत्यक्ष ज्ञान (या Perception) और कुछ नहीं है। ईश्वर दर्शन होने का यही प्रमाण है। सर्वत्र उनका ही दर्शन करना। ( केवल मनुष्य जीवन में ही इसे व्यव्हार अपनाया जा सकता है! )      
हमें यह सीखना होगा कि किसी व्यक्ति को ऐसी दृष्टि कैसे प्राप्त होती है ? ऐसी दृष्टि जिसको मिल जाती है, उसी को यथार्थ मनुष्य बनना कहते हैं। इसी को मनुष्य बन जाने का मार्ग कहते हैं। और इसीलिये स्वामीजी के गद्य-पद्द्य में दिये गये समस्त संदेशों को स्मरण में रखना आवश्यक हो जाता है। चरित्र ही धर्म है। जो पवित्र है, जो केवल प्राण धारण करने तक स्वार्थ को स्वीकार करता है। जिसके हृदय में सबके प्रति संवेदना होती है,जो सबों से सहानुभूति रखता है, जिसके हृदय में सबों के लिये स्थान है, जो सबों के लिये जितना अधिक सोचता है, उतना अपने लिए नहीं सोचता।
पहले ठाकुर के जन्मोत्सव पर प्रत्येक वर्ष सुन्दरवन जाया करता था, एकबार ऐसा ही दृश्य देखने को मिला था। अलग अलग द्वीपों पर उत्सव मनाया जाता था था, कुछ सन्यासी भी हमलोगों के साथ जाते थे। उस समय मोटर-बोट नहीं था, चप्पू वाली नौका चलती थी। रात्रि में किसी द्वीप पर उत्सव समाप्त हो जाने के बाद, दूसरे द्वीप पर जाने में नाविक सारी रात चप्पू चलाते रहते थे। इस नदी, उस नदी को पार करके किसी द्वीप पर पहुँचता था। एकबार किसी द्वीप पर होने वाले एक उत्सव में गया था। वहां जाने पर सुना कि एक अन्य सन्यासी भी उत्सव में भाग लेने आये हैं। वे अगले दिन होने वाले उत्सव में भी हमलोगों के साथ जायेंगे।
दुसरे दिन तटबंध के किनारे किनारे जा रहे थे, कोई सडक या मोटर गाड़ी नहीं थी। वहां बहुत से लोग ऐसे हैं जिन्होंने कभी अपनी आँखों से कोयले का ईंजिन भी नहीं देखा है। वैसे स्थान में सन्यासी मेरे साथ बातचीत करते हुए चल रहे थे। ऊँचे तटबन्ध के दोनों किनारे समतल स्थान के बीच बीच में घर बने हुए थे।
 संयासिजी को जब भी कोई घर दिखाई पड़ता, और सामने घर की स्वामिनी दिखाई देती वे अचानक नीचे उतर कर एक ही बात हर किसी से कहते- " ओमा ! यह घर तुम्हारा नहीं है, ये भगवान का घर है। ओमा! तुम्हारे पती तुम्हारे नहीं हैं, भगवान के हैं। ओमा, तुम्हारे लड़के-बच्चे भी तुम्हारे नहीं हैं, सब भगवान के हैं। इस बात को हमेशा याद रखना और घर के सारे काम करना। "
जैसे ही बीच में कही घर के सामने, घर का कोई व्यक्ति खड़ा दिख जाता, उतर जाते और सब से यही बात कहते। हमलोगों के साथ साथ जो लोग चल रहे थे, उनमे से किसी ने कहा यह साधू बाबा तो एकदम पगला गये लगते हैं। किन्तु यही सीखने वाली बात है। हमें आजीवन नेट-प्रैक्टिस करना है, 'सच्चा विवेक-प्रयोग' है --  कि यहाँ कुछ भी अपना नहीं है, सबकुछ उनका है- भगवान का है ! मेरे भीतर जो भगवान हैं, वे ही सबों के भीतर हैं। इस बात को चेष्टा करते करते (नेट प्रैक्टिस - सद्गुरु और माता-पिता को जूते उतार कर प्रणाम करने से ) सीखनी होगी। मन को हर समय समझाते रहना होगा, यह अभ्यास उतना आसान नहीं है, कठिन है।
यदि हमलोग श्रीरामकृष्ण लीलाप्रसंग, माँ सारदा की जीवनी, विवेकानन्द-चरित आदि ग्रन्थों को ठीक से पढ़ें, सुनें, उनके नाम-रूप-लीला- धाम की विवेचना करें; अकेले में बैठकर विश्वास पूर्वक मनन करें, तो हमलोग उनके सान्निध्य या सामीप्य (vicinity) प्राप्त कर सकते हैं। वे लोग सामने बैठे हैं, उनकी 'साक्षात् उपस्थिति' का अनुभव कर सकते हैं। यही एक मात्र उपाय है;  आध्यात्मिक रूप से विकसित होने का (विवेक-प्रयोग का नेट प्रैक्टिस ही ) यही एकमात्र उपाय है। निरंतर विवेक-प्रयोग करते हुए अपना ऐसा चरित्र निर्माण करना होगा कि हमलोग समदर्शी बन जायें, और सर्वत्र उन्हीं को देख सकें, और उनकी सेवा साक्षात् शिव समझकर करने का सामर्थ्य प्राप्त हो जाये।

 "सर्वत्र समदर्शिनः"समदर्शी चरित्र वाला मनुष्य बनने के बाद ही,हमलोग अपने देशवासियों या विश्व के अन्य मनुष्यों के   काम में आने लायक " वृक्ष जैसे उपकारी " मनुष्य बन जायेंगे। यदि हमलोग मनुष्य मात्र के लिये उपकारी नहीं बन सके, तो ऐसा दुर्लभ ' मनुष्य-जीवन ', जिसमें सर्वत्र भगवान को देखना और सेवा करना संभव हो जाता है, व्यर्थ चला जायेगा। जीवन सार्थक नहीं होगा, निरर्थक हो जायेगा, मृत से भी अधम जीवन हो जायेगा। यदि हमलोग केवल अपने ही बारे में सोचते रहें, केवल अपने लिये ही सबकुछ करें, भोग की आकांक्षा को क्रमशः यदि बढ़ाते रहने की चेष्टा करें, तो बढ़ती चली जाएगी। भागवत में है, महाभारत में है, पुराणों में बहुत से श्लोक हैं- क अग्नि में घी ढालने से अग्नि बुझती नहीं है, बल्कि और अधिक भड़क उठती है
न जातु कामः कामानुपभोगेन शाम्यति ।
 हविषा कृष्णवर्त्मॆव भूय एवाभिवर्धते ॥
(Swami Vivekananda's Translation: Desire is never satisfied by the enjoyment of desires; it only increases the more, as fire when butter is poured upon it)-अर्थात कामना-वासना की पूर्ति के लिये कोई भी वस्तु - कामना की अग्नि में डाल देने से, कामना की अग्नि बुझती नहीं है,बल्कि दुगनी शक्ति के साथ पुनः प्रज्ज्वलित हो जाती है। इसीलिये बाहर से भोग्य वस्तुओं को डाल कर कामना-वासना को, या भोग की इच्छा को समाप्त नहीं किया जा सकता है। कामना-वासना को त्याग करने के लिये, एकाग्रता का अभ्यास करना सीखना होगा। 
इच्छाशक्ति  के प्रवाह को दृढ़-संकल्प के द्वारा विवेक-प्रयोग करके मन को समझाना पड़ेगा कि , अब इतना कामना वासना के पीछे नहीं दौडूंगा। शास्त्रों में बहुत सुन्दर कहा गया है, कि परलोक या स्वर्ग में जितने सुख हैं, तथा पृथ्वी पर जितने सुख हैं, वे सब सुख मिलाकर भी त्याग के सुख के सामने षोड्स कला के एक कला ( या 16 आना का 1 आना ) भी नहीं है। त्याग से मिलने वाला सुख (देहाध्यास के त्याग से मिलने वाला सुख ?) सबसे अधिक होता है। इसीलिये स्वामीजी उपनिषदों को बार बार उद्दृत करते हुए कहते थे- त्याग, त्याग, त्याग " त्यागेन एके अमृतत्व मानशु: " - ठाकुर कहते थे बता सकते हो, गीता के उपदेशों एक शब्द में कैसे ब्यक्त किया जा सकता है ? वह है त्याग ! गीता, गीता, गीता - को बार बार बोलने से क्या सुनाई देगा ? तागी, तागी, तागी। कुछ लोगों ने सोचा कि ठाकुर अधिक पढ़ना-लिखना नहीं सीखे थे, शायद इसीलिये 'त्यागी' को 'तागी' कह रहे हैं। किन्तु संस्कृत के एक विद्वान् भी वहां उपस्थित थे, उनहोंने बताया कि संस्कृत व्याकरण के अनुसार 'त्यागी ' और ' तागी ' अर्थ एक होता है।
ठाकुर के चले जाने के बाद, मार्गदर्शन प्राप्त करने के लिये उनकी सभी संतानें माँ के पास जाने लगे थे। इसके पहले तो माँ को कोई समझ भी नहीं पाते थे। बाद में थोड़ा-बहुत समझ सके थे। सचमुच उनका जीवन अद्भुत था, अभूतपूर्व था ! प्राचीन काल में- सीता, सावित्री, दमयन्ती आदि जितनी भी महान नारियां हुई हैं, वे श्री श्रीमाँ की तुलना में कुछ भी नहीं हैं। उनके जैसा असाधारण जीवन किसी भी देश के इतिहास में ढूँढने से भी नहीं मिलता है।
भगवान बुद्ध ने भी अपनी स्त्री का त्याग किया था। भगवान राम ने भी अन्त में सीता को बनवास भेज दिया था, इसके पीछे कारण चाहे जो भी रहा हो। किन्तु ठाकुर ने न तो कभी माँ का त्याग किया, और न उनको कभी वनवास के लिये भेजा। उन्होंने श्रीमाँ को ही जगत-जननी के रूप में स्वीकार किया था। ऐसा दूसरा उदाहरण जगत के इतिहास में कहीं नहीं है। मेरे पहले बोलते हुए माताजी कह रहीं थीं- "वे तो बिलकुल अपनी माँ हैं ! हमलोग जिद करके, (उनसे रूस करके-जाओ मैं नहीं खाऊंगा की जिद ठान कर) जबरदस्ती उनकी गोदी में बैठ जायेंगे !"
तुमलोगों के ऐसे कैम्प में तुमलोगों के साथ बात करते करते ऐसा लगा मानो माँ की एक बहुत विशाल मूर्ति सामने है, और तुमलोग जो जहाँ है, वहीँ माँ की गोदी में चढ़ कर बैठ गयी हो। वे तो हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, भारतीय, विदेशी, पुरुष-स्त्री, बालक-वृद्ध, शिशु -  सबों की माँ हैं। माँ तो पवित्रता-स्वरूपिणी हैं, पवित्रता की साकार मूर्ति हैं; वैसी माँ की गोदी में शरण लेने से, समस्त अपवित्र भाव दूर हो जायेंगे। हमलोगों की स्वार्थपरता दूर हो जाएगी। दूसरों का कल्याण, दूसरों का हित, दूसरों अपना बना लेना- यही हमलोगों के जीवन का व्रत बन जायेगा। और यही बात स्वामीजी ने भी हमलोगों को सिखाया है- " यह जीवन बहुत छोटा है, क्षण-स्थायी है, और इस जीवन के जितने भी ऐश्वर्य, भोग की वस्तुएं हैं, वे सब भी क्षण-स्थायी हैं। इसीलिये केवल वही जीवित हैं, जो दूसरों के लिये जीना सीख जाते  हैं। ' किसी का दर्द मिल सके तो लो उधार- जीना इसीका नाम है।' और जो लोग ऐसा नहीं कर पाते, वे मृत से भी अधम हैं।"
हमलोग कहीं मृत से अधम नहीं बन जाएँ, इस शिविर में हमलोग दूसरों के लिये जीना सीखेंगे। माँ की पुकार को सुनकर, कहाँ कहाँ से सैंकड़ो की संख्या में कमउम्र की और उम्रदराज स्त्रियाँ कितनी दूर दूर से आ रही हैं। यहाँ पर समय की आवश्यकता के अनुरूप सही कार्य हो रहा है। यह कार्य बड़े बड़े उत्सव, बड़े बड़े कीर्तन, बड़े बड़े संगीत, बड़े बड़े प्रवचन, बहुत बड़े पूजा-पंडाल में भोग-प्रसाद खिला देने से भी नहीं हो सकता है। मन में इसकी ललक रहनी चाहिये।
 ठाकुर-माँ-स्वामीजी की छत्र-छाया में शरण लेने का प्रयत्न करना चाहिये। तैतीस करोड़ देवता की बात को याद करके, काली-शिव की पूजा करने और ठाकुर-माँ-स्वामीजी को छोड़ देने की जरूरत नहीं है। वे हमलोगों के जीवन में गुणवत्ता लाने वाले हैं, हमारे जीवन-धन हैं। यह विश्वास रहना चाहिये की वे हमारे सगे माँ-बाप-भैया जैसे हैं। उनको अपना जानकर-उनके जीवन और उपदेशों को सुनना, उस पर मनन-

चिन्तन करना, आत्मसात करना और अपने जीवन तथा आचरण में उतार लेना होगा। उनकी शिक्षाओं को चरित्रगत करना होगा। हमलोगों के आचार-व्यवहार में, बोलने और चिन्तन करने में उन्हीं के भाव अभिव्यक्त या प्रकाशित होने चाहिए। ऐसा करने का नाम ही है चरित्र गठन।
यह कार्य महामंडल के माध्यम से विगत 35 वर्षों से लड़कों के लिये चलता आ रहा है, उसी प्रकार लड़कियों के लिये नारी संगठन भी प्रारंभ हुआ है। पश्चिम बंगाल के बाहर बिहार, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, एवं ओडिशा में भी कार्य चल रहा है। कुछ समय पहले रायपुर गया था, वहां 35-40 लड़कियां विभिन्न स्थानों से आई थीं। अंबिकापुर  बहुत दूर-दराज का दुर्गम रास्ता पार कर के आई थी, विलासपुर, भिलाई आदि जगहों से आई थीं। 2-3 घंटे चर्चा हुई। वे लोग कैम्प में शामिल होने की बहुत इच्छुक थीं। यही है एकमात्र कार्य। सबसे बड़ा कार्य। वर्तमान युग में जैसी आबोहवा हो गयी है, विभिन्न संवाद माध्यमों के द्वारा आजकल जो परोसा जा रहा है, उसको मुंह से कहा भी नहीं जा सकता,सारी मर्यादाएं टूट रही हैं। इन सबसे समाज को बचना होगा।
भारतवर्ष तो में अभी सुर भी कुछ बदला बदला नजर आ रहा है। विद्यासागर, रविन्द्रनाथ, बंकिमचन्द्र, सुभाषचन्द्र आदि का नाम देश में कम सुनाई देता है। इस बार लक्ष्मीपूजा में टी . वी . के संवाददाताओं को अधिक काम नहीं मिला तो वे राजनितिक नेताओं के घर घर में पहुंच गये। उनसे पूछ रहे थे, क्या आप लक्ष्मी पूजा मना रहे हैं ? क्या आप इस सब पर विश्वास करते हैं? हाँ, मैं तो इन सब पर विश्वास नहीं करता, किन्तु घर में हो रहा है, सभी खुशियाँ मना रहे हैं। तो मैं उनकी खुशियों में बाधक क्यों बनुगा? क्या अपने प्रसाद खाया था ? हाँ, घर में ही प्रसाद बन रहा है, बिना खाए कैसे रहता ? किन्तु ऐसी धार्मिकता से कोई लाभ नहीं होता। ऐसा नहीं है कि प्रसाद खा लेने से धार्मिक हो जाऊंगा, या नहीं खाने से ही प्रगतिशील विचारों वाला बन जाऊंगा। यह सब समझने की बातें हैं, अन्दर से समझना होता है।
धर्म क्या है ? अंतर्निहित वस्तु ( पूर्णता, दिव्यता या ब्रह्मत्व) के विकास और प्रकाश को धर्म कहते हैं। इस जीवन को महान जीवन में रूपांतरित कर लेना धर्म है। हमलोगों को उसी धर्म का पालन करना चाहिये। इसका वास्तविक नाम आध्यात्मिकता है। अर्थात हमलोग केवल हड्डी और मांस के बने पिजड़ा या कोई बंदीगृह नहीं हैं। इस पिंजड़े के भीतर एक वस्तु (पंछी) है, जो अनन्त शक्तिशाली है। जो ज्ञानमय है, आनन्दमय है, प्रेममय है। उसको जाग्रत करना होता है। जो उसका सन्देश सुनकर, उसे जगाने की चेष्टा करता है; उसका जीवन आनन्द से परिपूर्ण हो जाता है।
ठाकुर-माँ-स्वामीजी के जीवन को उपर से देखने पर ऐसा प्रतीत होता है, मानो उन लोगों को कितना दुःख भोगना पड़ा है! किन्तु उनलोगों का जो भी दुःख कष्ट था, वह दूसरों के लिये था, वे लोग कभी अपने दुःख के कारण नहीं रोये थे, वे लोग दूसरों के दुःख को दूर करने के लिए रोते थे। दूसरों के दुःख को देखकर उन्हें अपने छाती में असह्य कष्ट का अनुभव होता था। हमलोगों को भी अपना हृदय टटोल कर देखना होगा कि दूसरों के दुःख को देखने से हमारे दिल को दुःख पहुँचता है, या नहीं? यदि नहीं होता, तो हमलोगों के वैभव, पहनावे-ओढ़ावे से आरम्भ करके, हमलोगों का खान-पान, चलना-फिरना, तथा घर में जितने भी प्रकार के आधुनिक उपकरण या वैसे सब वस्तुओं का अम्बर भी हो तो, सब व्यर्थ है, क्योंकि ये सब यहीं पड़े रह जायेंगे। मनुस्मृति में कहा गया है-

             एक-एव सुहृद्धर्मो निधनेऽप्यनुयात्ति यः |
                  शरीरेण समं नाशं सर्व मन्यत्तु गच्छति ||

- अर्थात् मनुष्य के मरणोपरांत उसके साथ केवल उसका धर्म ही जाता है। इसके अतिरिक्त और जो कुछ भी साजो-सामान हैं, शरीर नष्ट होने साथ ही साथ वे सब नष्ट हो जाते है। एक मात्र धर्म ही सच्चा मित्र है जो मरने के बाद भी जीवात्मा का साथ देता है और सब चीजें तो शरीर के साथ ही यहीं छूट जाती हैं,  नष्ट हो जाती है। 
चाहे जितनी बड़ी बड़ी चीजों को संग्रहित क्यों न क्या जाय, सब कुछ यहीं पड़े रह जाते हैं। किन्तु इस कठोर सत्य को हम समझना नहीं चाहते हैं। किन्तु नहीं, फिर भी हमलोग उसी के पीछे दौड़ते रहते हैं। जो विशाल धन-दौलत, संपन्नता हमलोगों के भीतर पहले ही से मौजूद है, उस गुप्त कोश की तरफ हमारी दृष्टि (आत्मा की दिव्य आँख -मन की दृष्टि ) कभी जाती ही नहीं है। एक बार यदि भीतरी गुप्त-कोश में छुपी दौलत -'कोहेनूर ' पर नजर पड जाये तो, बहार में दिखने वाली जितनी भी सम्पदाएँ हैं, आन्तरिक वस्तु के सामने ये सभी तुच्छ लगने लगेंगी। स्वामीजी ने उपनिषदों के बालक नचिकेता की कहानी सुनाई थी, जो यम के आमने-सामने खड़ा हुआ था, और बातचीत की थी। किन्तु यमराज उसको बालक समझकर भीतर के आत्मतत्व को नहीं देकर विभिन्न प्रकार के प्रलोभन दे रहे थे। उसको भोग की क्स्तुओं का लोभ दिखा रहे थे, नाच-गान दिखाकर बाहरी वस्तुओं में उसके मन को भुलाने की कोशिश कर रहे थे। किन्तु उस बालक ने आत्मतत्व को जान लेने के बाद ही यमराज का पीछा छोड़ा था। वैसी ही चेष्टा हमलोगों के भीतर भी होनी चाहिए।
इसीलिये यह हमारा परम सौभाग्य है कि इस युग में जन्म ग्रहण करके ठाकुर-माँ-स्वामीजी का नाम सुन पा रहे हैं। सन्यासिनी माँ, अभी माँ के जीवन की एक घटना तुम्हें सुना रही थी। इस प्रकार की कितनी ही घटनाएँ हैं। किन्तु सच्चा लाभ तो तब मिलेगा, जब हमलोग उनकी शिक्षाओं को अपने जीवन में उतार सकेंगे। अक्सर कोई चीज जब आसानी से प्राप्त हो जाती है, तो हम उसका मूल्य नहीं समझते है। हमलोग कैसे मनुष्य बन सके हैं, इस बात को हम नहीं जानते, इसीलिए इसका मूल्य भी नहीं समझ पाते हैं। इसीलिये शंकराचार्य ने कहा था, यदि हमलोग इस देव-दुर्लभ मनुष्य जीवन एवं उसके साथ ही साथ पुरुषार्थ, अर्थार्थ स्वयं की कार्यक्षमता, उद्द्य्म, और संकल्प में दृढ़ बने रहने का पौरुष को, इस मनुष्य जीवन में प्राप्त करके भी यदि उन्हें अपने व्यव्हार में लाकर, अपने जीवन को पूर्ण नहीं बना सकें, तो हमलोग  नितान्त ही कृपण और नितान्त मूर्ख हैं।  इससे बढ़कर मुर्खता और कुछ भी नहीं है। हमलोग इन तीन दिनों तक जो कुछ सुनेंगे, सीखेंगे, उसको घर लौट जाने के बाद जीवन में उतरने का अभ्यास करेंगे। जो जीवन और सन्देश अभी पुस्तकों में है, उसको पढना होगा। 

धर्म को अपने जीवन का एक अलग हिस्सा बनाकर रखने से काम नहीं होगा। घर में जैसे एक कमरा रसोई का होता है, एक खाने का कमरा होता है, एक सोने का कमरा होता है, बैठने का कमरा अलग होता है, वैसे ही एक पूजा का कमरा भी होता है। उसी प्रकार धर्म को भी जीवन का एक टुकड़ा (अनुच्छेद) बनाकर रखने से नहीं होगा। धर्म को जीवन में अंतर्भूत (immanent) करना चाहिये। तभी धर्म हमारे समग्र जीवन को भरे रखेगा।
इसीलिये कहा जाता है कि शिक्षा की कुछ आवश्यकता होती है। हाँ शिक्षा की कुछ आवश्यकता है। किन्तु शिक्षा से ही सबकुछ नहीं होता; इस बात को ठाकुर, माँ, स्वामीजी ने अपने जीवन द्वारा प्रमाणित किया है। स्वामीजी ने कुछ शिक्षा पायी थी, इसीलिये कि आगे चलकर पूरे विश्व को सुनाना था। किन्तु ठाकुर-माँ के जीवन में वैसा नहीं हुआ था, जीवन-गठन में स्कूली-शिक्षा की तूच्छता को प्रमाणित करने के लिये ही  बाहर की शिक्षा लेने की आवश्यकता उन्हें नहीं हुई थी। किन्तु हमलोगों के लिये बाहर की शिक्षा रहने से सुविधा होती है। बाहर से झटका देने जैसा। जैसे भीतर को जगाने के लिये बाहर से शिक्षा का झटका देना काम करता है। हमलोग पुस्तकों को पढ़ सकते हैं, सुन सकते हैं, समझ सकते हैं, इसीलिये ताकि हम उनको हृदयंगम कर सकें। नहीं तो जीवन भर केवल पढ़ते-सुनते रहने से भी कुछ नहीं होगा। या केवल लोगों को सुनाने के लिये अच्छा भाषण देने से भी नहीं होगा।

वाग्‍वैखरी शब्दझरी शास्त्रव्याख्यानकौशलम्‌। 
वैदुष्यं विदुषां तद्वद् भुक्तयॆ न तु मुक्‍तये॥

Swami Vivekananda's Translation: Wonderful methods of joining words, rhetorical powers, and explaining texts of the books in various ways — these are only for the enjoyment of the learned, and not religion.
- शास्त्रों के शब्दों को आश्चर्यजनक भावभंगिमा बनाकर व्याख्या करने, या उसके सिद्धान्तों पर भाषण झाड़ देने से बोलने वाले को मौज-मस्ती मिलती है, भोग-विलास होता है, लेकिन मुक्ति नहीं मिलती, धर्म की उपलब्धी नहीं होती है। 

और हमलोग भक्ति भक्ति चिल्लाते हैं। भक्ति इतनी आसान वस्तु नहीं है। किसी तीर्थ में जाने से थोड़ी देर के लिये भक्ति जाग जाती है। किन्तु भक्ति शब्द का वास्तविक अर्थ है, अपने जिस ईष्ट के प्रति हम श्रद्धा रखते हैं, उनके विचारों को अपने जीवन में उपयोग करना। भागवत में कहा गया है, जो व्यक्ति अपने ईष्ट की मूर्ति की पूजा बहुत अच्छे तरीके से करता है, किन्तु उनके भक्तों की या दूसरों की जो उनके भक्त नहीं हों, उनकी पूजा जो नहीं करता, वह अति सामान्य भक्त हैं, अर्थात अति निम्न कोटि के भक्त हैं। आगे कहा गया है, उस भक्त को भी उत्तम भक्त नहीं कह सकते जो, ईश्वर से प्रेम करता है, ईश्वर के भक्तों को अपना प्रिय मानता है, जो मुर्ख हैं उनके उपर कृपा करता है, जो विद्वेषी हों या शत्रुता रखते हों, उनकी उपेक्षा करता है।
फिर उत्तम भक्त कौन है ? जो अपनी आत्मा में सबों की आत्मा को देखता है, तथा सबों की आत्मा में जो अपने आत्मरूपी ईश्वर को देखता है-वही उत्तम भक्त है। भक्ति के मार्ग से धर्म-लाभ करने या चरित्र-निर्माण के द्वारा इसी भक्त की अवस्था को प्राप्त करना पड़ता है। भक्ति उतनी आसान वस्तु नहीं है, बहुत कठिन है। अभी, कल ही एक धार्मिक प्रतिष्ठान से एक बेयरिंग पत्र मिला था। पाँच रूपये की डाक टिकट को दस रुपया देकर छुड़ाना पड़ा। वह पत्र बहुत नामी संस्था के द्वारा भेजा गया एक सायक्लोस्टाइल पत्र था। उसमे केवल इतना लिखा था- " तुम मेरा अनुसरण करो, मैं तुम्हारी रक्षा करूँगा। "इतना लिख कर प्रेषक और प्रेषित केवल पता देकर भेज दिया था। धर्म कभी इतनी आसनी से अर्जित होने वाली वस्तु नहीं है। इसीलिये इस प्रकार के धर्म की पहेली में उलझने की जरुरत नहीं है। हमलोग अक्सर कुछ अलौकिक चीजों को देखने-सुनने की तरफ दौड़ पड़ते हैं। किन्तु ऐसा कुछ नहीं है, जो अलौकिक होता हो।
 स्वामीजी ने कहा है, " मिरेकल्स डू नॉट हैपन !" अर्थात अलौकिक या अतिप्राकृतिक रूप से कुछ भी घटित नहीं होता, जो कुछ भी घटित होता है, वह प्रकृति के भीतर ही घटित होता है। भगवान श्रीकृष्ण ने कहा था- " बादलों से वृष्टि होती है, उसके लिये महेन्द्र को क्या करना है ? " उस समय भी इतनी वैज्ञानिक दृष्टि से प्रकृति के नियमों को देखा जाता था ! किन्तु आजकल हर चीज को देखकर हम भौचक्का हो जाते हैं, या भ्रान्ति में पड़ जाते हैं। यहाँ किसी के पास स्पष्ट धारणा नहीं है।
मनुष्य क्या है ? इसकी स्पष्ट धारणा नहीं है। जीवन क्या है, या इसका लक्ष्य क्या है ? इसकी कोई स्पष्ट धारणा नहीं है। हमें जो मनुष्य जीवन मिला है, इसका सदुपयोग कैसे हो सकता है ? इन सबके बारे में कोई स्पष्ट धारणा नहीं है। विभिन्न प्रकार के परिवेश और परिस्थितियों में रहते हुए जैसे तैसे संचार माध्यमों के द्वारा प्रभावित और दिग्भ्रमित होकर जो लोग  अन्य मार्गों में भटक गये हैं, उनका अनुकरण करते हुए हमलोग अपने मार्ग को छोड़ कर उन्हीं के पीछे दौड़ रहे हैं।
ऐसे दिग्भ्रान्ति के युग में भी हमलोगों के लिये कोई भय नहीं है। मा भयः ! मा भयः ! माँ हैं , ठाकुर-माँ-स्वामीजी हैं। उनको कास कर पकड़ लेना होगा, वैसा करने से हम कभी गिरेंगे नहीं, या ठोकर लगने से भी संभल जायेंगे, या दुबारा कभी गुमराह (पथ-भ्रष्ट) नहीं होंगे, हमारा जीवन नष्ट नहीं होगा, पूर्ण हो उठेगा। आइये ठाकुर-माँ-स्वामीजी के चरणों में एक साथ मिलकर प्रार्थना करें, ताकि हम सफल हो सकें। 

 
                      
            
                     
  
  
         

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