Sunday, January 13, 2013

$$@$$ स्वामी विवेकानन्द और हमारी सम्भावना [61/20 A] स्वामीजी की शिक्षा-नीति ('विद्या गुरुमुखी'- शीक्षावल्ली में बड़ी 'ई ' क्यों ?)(4 शिक्षा : समस्त रोगों का रामबाण ईलाज है),

' जो विद्या (भेड़त्व से )मुक्त कर देती हो -  वह 'विद्या गुरुमुखी' (सिंह से ) ही हो सकती है?
शिक्षा का आभाव ही हमलोगों के समस्त दुखों का कारण है। इसलिये यह कोई सामान्य दुःख नहीं है। हमें पर्याप्त आमदनी करने का अवसर नहीं मिलता है। जितनी आमदनी होती है, उतने में परिवार का ठीक से भरण पोषण नहीं हो पाता है। यदि जीवन धारण करने योग्य भोजन मिल भी जाता है, तो रहने के लिये घर नहीं मिल  पाता । कभी वस्त्र का आभाव हो जाता है, या कभी बीमारी में उपयुक्त चिकित्सा भी नहीं मिल पाती है। सम्पूर्ण देशवासियों के लिये सामान्य-शिक्षा की सुविधा तो दूर की बात है, उसका बहुत छोटा सा भाग भी उसे नहीं पाता। अधिकांश जनसंख्या उस शिक्षा से वंचित है। किन्तु स्वामीजी ने कहा था, सच्ची शिक्षा के द्वारा ये सभी आभाव और दुःख दूर किये जा सकते हैं।
स्वामीजी (स्वामी विवेकानन्द) के हृदय का दुःख और भी गहरा था ठाकुर (श्रीरामकृष्ण) के हृदय में जो करुणा थी, माँ (सारदा देवी) के हृदय में जितनी करुणा थी, वही करुणा स्वामीजी के हृदय में भी संचारित हुई थी।  युवावस्था में ही उनके पिता का देहान्त हो गया था, उसके बाद परिवार की स्थिति इतनी दयनीय हो गयी थी कि माँ-बहन-भाइयों को ठीक से भोजन भी नहीं मिल रहा था। नौकरी के लिये प्रयास करते हैं, किन्तु कहीं नौकरी नहीं मिलती। इन सब दुःखों को भोगने के बाद, आगे के जीवन में जो दुःख मिला वह भी कम नहीं था। ठाकुर का देहान्त हो जाने के बाद का दुःख और परिव्राजक जीवन में जो दुःख-कष्ट भोगना पड़ा वह भी कम नहीं था। वराहनगर में दूसरों के दिये पैसे से भाड़े पर ' भूतों वाला बंगला ' लेकर रहना, जहाँ हर रोज साग-भात खाने को भी नहीं मिल पाता था। किसी दिन नमक-भात मिल गया, किसी दिन भात के साथ साग भी नहीं मिला, किसी दिन नमक भी नहीं मिला, किसी दिन भात भी नहीं मिल पाता था। लंगोटी के उपर पहनने वाला तहमद (धोती) सबों के लिये एक ही होता था, प्रत्येक गुरुभाई के लिये अलग अलग नहीं था। ऐसा भी हुआ था कि सर्वत्यागी ठाकुर की जो सन्तान किसी काम से बाहर जायेंगे, उस तहमद को सिर्फ वे ही बांध कर निकलेंगे। स्वामीजी के साथ कोई मिलने आते हैं, तो कोई गुरु भाई स्वामीजी के शरीर पर कोई चादर डाल देते हैं। जब भोजन का घोर आभाव हो जाता, तब स्वामीजी कहते- " आज भोजन पकाने-खाने का कोई झंझट नहीं है, कुछ मिला नहीं है, आज पूरा अवकाश है, इसीलिये आज बहुत साधन-भजन होगा, खूब जप-ध्यान होगा, खूब शास्त्र-पाठ होगा, खूब भजन होगा। " क्या हमलोग ऐसे कष्ट की कल्पना भी कर सकते हैं ?
माँ के जीवन में कितना कष्ट था ! अभी तो माँ के मन्दिर में उनको रेशम के वस्त्र पहनाये जाते हैं, किन्तु जब वे शरीर में थीं, तब फटे हुए कपड़ों में भी गिट्टठा बांध कर पहन लेती थी। क्योंकि ठाकुर ने कह रखा था, " अपने घर में पड़े रहना, और किसी के सामने हाथ नहीं पसारना। " अर्थात किसी से कुछ मांगना नहीं। " साग बुन देना और खा लेना।" इतने सारे कष्टों को उनलोगों ने किसके लिये भोगा था ?..हम मनुष्यों के लिये ! मनुष्य (अपना स्वरुप नहीं जानने के कारण नाली के कीड़े जैसा किलबिल करके ) कितना दुःख भोग रहे हैं, उस दुःख को कौन दूर करेगा ?
 इसीलिये माँ कहती थी, " क्या ठाकुर क्या यहाँ रसगुल्ला खाने के लिये आये थे ? हमलोग तो सभी मनुष्यों के पाप,ताप, दुःख-कष्ट को उठाने के लिये आये हैं; ठाकुर भी इसी लिये आये हैं, मैं भी इसीलिये आई हूँ।" ठाकुर के पास जाकर स्वामीजी ने उनसे अपने जीवन का, मानव-जीवन का चरम लक्ष्य और उसे प्राप्त करने का उपाय सीख लिया था। फिर कठोर साधना करके उस परम-वस्तु या ' ब्रह्मज्ञान ' को प्राप्त भी कर लिया था। उस अनिवर्चनीय, अनन्य निर्विकल्प समाधि के आनन्द में डूब जाने के बाद, स्वाभाविक रूप से उनके मन से जगत की चिन्ता स्वतः ही  दूर हो गयी थी। 

वे ठाकुर के पास जा कर बोले, ठाकुर कुछ ऐसा कर दीजिए कि मैं निरंतर उसी समाधि के आनन्द में डूबा रह सकूँ। किन्तु इस बात को सुनकर, अपने सबसे प्रिय शिष्य की भर्त्सना करते हुए कहते हैं, " अरे तूँ  .. यह बात कहता है ? छि: ! छिः ! ऐसी बात तूँ ने सोच भी कैसे लिया ? जबकि जगत में इतना दुःख है, इतना कष्ट है ! तुम स्वयम ब्रह्माननद में डूबे रहोगे ? जगत इतने दुःख-कष्ट में जल रहा है, और तू स्वयं ब्रह्मानन्द में डूबे रहना चाहता है रे ! उनको देखेगा नहीं ? तुम उनको देखना, उनको मुक्त करना, उनकी सहायता करना, उनके लिये प्रयत्न करना। स्वामीजी ने कहा, " महाशय, यह सब मुझसे नहीं होगा। "
ठकुर बोले -" मुझसे नहीं होगा माने ? तेरी हड्डी करेगी।" और उसी समय स्वामीजी ने अपने गुरु से सम्पूर्ण मानव-जाति के प्रति उस संवेदना को, उस दुःख को उत्तराधिकार के रूप में  ग्रहण कर लिया था। ऐसा कोई दूसरा उदाहरण मानवता के इतिहास में ढूँढने से भी नहीं मिलता है! 

उस घटना के बाद से मानव-जाति के समस्त दुःखों ने, केवल पारिवारिक वैमनस्य का दुःख, जनसाधारण की गरीबी का दुःख, या केवल  भूख, आभाव, अशिक्षा आदि सामान्य दुःखों ने ही नहीं, बल्कि वह दुःख जिसकी कोई सीमा नहीं है ! जो मनुष्य भवबन्धन (देहाध्यास) में बंधा है,  जो मनुष्य अभी बद्ध हैं और मुक्ति के लिये क्रंदन कर रहे हैं-उन समस्त दुखों ने स्वामीजी के हृदय में अपना घर बना लिया था। 
 स्वामी विवेकानन्द स्वयं एक संन्यासी थे, किन्तु उन्होंने कहा था-"जिस देश में करोड़ो मनुष्य महुआ खाकर दिन गुजारते हैं, और दस-बीस लाख साधू और दस-बारह करोड़ ब्राह्मण उन गरीबों का खून चूसकर पीते हैं, पर उनकी उन्नति के लिये कोई चेष्टा नहीं करते, क्या वह देश है या नरक? भाई यह सब देखकर -खासकर देश के दारिद्र्य और अज्ञता को देखकर-मुझे नींद नहीं आती।" २/३३८
स्वामीजी की शिक्षा नीति - मनुष्य-मात्र को उस भव-बंधन काट देने (या देहाध्यास को नष्ट करने) वाली  विद्या का
पाठ्यक्रम (curriculum)  क्या होगा? जो दूसरों में भी उस विद्या को संचारित करने का अधिकारी बना देने में समर्थ है। स्कूल में क्या पढ़ाना होगा, पाठ्यक्रम (curriculum)  क्या होगा? सामान्य तौर से शिक्षा-मंत्रालय में बैठा कोई बाबू या शिक्षा-विभाग के विचारक लोग जैसी शिक्षा-नीति के बारे में सोचते हैं, वैसी ही शिक्षा-पद्धति देने के लिये स्वामीजी को आने की जरुरत नहीं थी।
हमलोगों को भी ये सब बातें स्वामीजी से ही सीखनी पड़ेंगी, क्योंकि विद्यालय के या महा-विद्यालय के पाठयक्रम या " निःशुल्क शिक्षा-नीति " [मुफ्त की खिचड़ी या वजीफा  'Pittance ' अर्थात छोटा पारितोषिक, भत्ता या चबेना देकर] के उपर सोचने वाले तो बहुत से लोग हैं, स्वामीजी उस प्रकार की शिक्षा देने के लिये नहीं आये थे। फिर भी स्वामीजी ने -धन पैदा करने वाली शिक्षा के उपर भी यथेष्ट परामर्श दिये हैं; वैसी शिक्षा बिल्कुल नहीं दी हो, सो बात भी नहीं है। किन्तु ' स्वामीजी की शिक्षा-नीति का तात्पर्य उस शिक्षा से है, उस विद्या से है - जिस विद्या को प्राप्त करके मनुष्य सभी प्रकार के बन्धनों से मुक्त हो जाता है! " सा विद्या या विमुक्तये !" - वही विद्या सच्ची विद्या है जिससे मुक्ति प्राप्त हो जाती है। उस प्रकार की मुक्ति-प्रदान करने वाली विद्या या शिक्षा-व्यवस्था हमलोगों के देश में बहुत प्राचीन युग से ही चलती आ रही है। 

तैत्तरीय उपनिषद में उस शिक्षा के विषय में विस्तार से कहा गया है। उसके एक अध्याय का नाम ही" शीक्षा-वल्ली " है। वेद के छह अंगों में एक का नाम- 'शिक्षा ' है। यह शिक्षा वर्ण-शिक्षा या स्वर-शिक्षा के नाम से जानी जाती है। यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि "तैत्तरीय उपनिषद " के ' शीक्षावल्ली ' में ' श ' के साथ ई--कार या दीर्घ इ की मात्रा लगी हुई है। हालाँकि वहाँ पर उपरी तौर से वहाँ देखने पर यह प्रतीत होता है कि इसमें स्वर या वर्ण के उच्चारण करने की ही शिक्षा दी जा रही है,(जैसे एक स्वर वाली ध्वनि को वर्ण कहते हैं, चाहे वह स्वर ह्रस्व हो या दीर्घ। वर्ण को ही अक्षर कहते हैं इत्यादि बातें कही गयी हैं। वर्णः स्वरः मात्रा बलम् " -या शुद्ध मंत्रोच्चार करना सिखाया जा रहा है।) किन्तु सोचने वाली बात यह है-" कि वेद में क्या ' ई '(बड़ी ई ) का प्रयोग यूँ ही (भूल-वश ) कर दिया गया है ?" यदि नहीं, तो ऐसा प्रतीत होता है कि शिक्षा का कोई गहरा अर्थ भी जरुर है, और उसी शिक्षा की ओर  इंगित करने के लिये 'श ' में ई-कार लगा कर 'शीक्षावल्ली ' का नाम दिया गया है। या वास्तव में कहीं वहां किसी अन्य प्रकार शिक्षा की ओर तो इशारा नहीं किया गया है? कहीं ईकार का प्रयोग यह दर्शाने के लिये तो नहीं कि जो विद्या मुक्त कर देती है वह 'विद्या गुरुमुखी' ही हो सकती है?
स्वामीजी की शिक्षा-नीति, शिक्षा के उस तत्व को लेकर है, जिस विद्या के द्वारा हम 'यथार्थ मनुष्य'  बन सकते हैं। वेदों, उपनिषदों में ई -कार लगा कर शीक्षा कहने का अर्थ शायद उसी महान-शिक्षा (जो हमें देहाध्यास के आत्मसम्मोहन से मुक्त होना सिखाती है।) की बात कही गयी है। संस्कृत भाषा में ' शी ' को एक अलग शब्द माना गया है, और इसका एक विशेष अर्थ भी है। " शी " का अर्थ होता है- 'प्रशान्ति (tranquility)' और ईक्षा का अर्थ होता है, देखना, प्राप्त करना, और (अपने अनुभव से ) जान लेना। इस प्रकार शी + ईक्षा = शीक्षा का अर्थ हुआ - To behold that Tranquility -उस आनन्दमय तत्व (परम प्रशान्ति) को देख लेना या 'आत्म-साक्षात्कार' करना। उस अनन्त शान्ति के आनन्द को देखने, प्राप्त करने या जानने में समर्थ बना देने वाली विद्या को ही "शीक्षा " कहते हैं।
स्वामी विवेकानन्द की शिक्षा-नीति  हमलोगों को उसी विद्या- 'जो हमें मुक्त करे सके ' तक ले जाती है। जिस सत्य को देखकर, प्राप्त कर और जान कर हमलोग भी मन की गुलामी से मुक्त हो सकते हैं। किन्तु वे अपनी शिक्षा-नीति का प्रारंभ इस बात से करते हैं, कि पहले मनुष्यों को स्वर-व्यंजन का ठीक से उच्चारण करना सिखाओ, उनको पढना-लिखना सिखाओ। 'शिक्षा' (शीक्षा?) यदि छात्रों के पास,शिक्षकों के पास, विद्या के पास नहीं आ सकती हो- तो शिक्षक (शीक्षक) को ही छात्रों के पास जाना पड़ेगा। तुम्हारे देश के जितने गरीब (केवल धन के गरीब ही नहीं विचारों से भी गरीब लोग ) आदि हैं, उन तक सच्ची शिक्षा को पहुंचा दो। आजकल  हमलोग ' Adult Education Programme ' या ' सर्व-शिक्षा अभियान ' आदि के लिये कितना पैसा खर्च कर रहे हैं?
किन्तु कितने वर्षों पूर्व ही स्वामीजी ने कहा था, " नये नये स्कूल खोलते जाने से क्या होगा? वे लोग तो हमारे स्कूलों तक पहुँच नहीं सकेंगे, तुमलोगों को ही उन स्थानों में जाना होगा जहाँ वे कार्यरत रहते हों। उनके खेतों-खलिहानों में जाओ, कल-कारखानों में जाओ, गाँव-गाँव में जाओ, उनके घर-आंगन में जाओ। क्योंकि दिन के समय उनको पढने का समय नहीं मिलेगा। क्योंकि उनके लड़के-लडकियों को घर के हजार काम करने पड़ते हैं, घर गृहस्ती के, खेती आदि के कितने ही कार्य उनको करने पड़ते हैं। वे लोग दिन में गौओं को चराने जायेंगे, खेत में निकौनी-दौनी, पटवन-कटनी आदि कामों में व्यस्त रहेंगे, ऐसी परिस्थिति में उन्हीं के टोले-मुहल्ले या (हरिजन- बस्ती) में पहुंचकर, संध्या के समय सबों को एक स्थान पर एकत्र करो- उनको शुरू से ही गढ़ने की चेष्टा करो। अक्षर की पहचान कराने से भी शुरू करोगे तो उनमें से कई लोग नहीं बता सकेंगे। इसीलिये उनको कहानियाँ सुनाओ, इतिहास, भूगोल, विज्ञान, आदि विषयों का ज्ञान दो। इसके साथ ही साथ उन लोगों के भीतर (सच्चा) धर्मभाव भी प्रविष्ट करा दो।
 वे कहते हैं- " वे गरीब लोग जानवरों का सा जो जीवन बिता रहे हैं, उसका कारण अज्ञान है। कन्याकुमारी में माता के मन्दिर में बैठकर, भारत के अन्तिम चट्टान पर बैठकर, मैंने एक योजना सोच निकाली। सोचो, गाँव गाँव में कितने ही संन्यासी घूमते फिरते हैं, वे क्या काम करते हैं ? यदि कोई निःस्वार्थी परोपकारी संन्यासी गाँव गाँव में विद्यादान करता फ़िरे और भाँति भाँति के उपायों से मानचित्र, कैमरा, भू-गोलक (Globe) आदि के सहारे चाण्डाल तक सबकी उन्नति के लिये घूमता फ़िरे तो क्या या इससे समय पर मंगल होगा या नहीं ? 'यदि पहाड़ मुहम्मद के पास न आये,तो मुहम्मद ही पहाड़ के पास जायेगा।' 

गरीब लोग इतने बेहाल हैं कि वे स्कूलों और पाठशालाओं में नहीं आ सकते। एक राष्ट्र की हैसियत से हमने अपनी राष्ट्रिय-विशेषता को खो दिया है और यही सारे अनर्थ का कारण है। हमारा कार्य, भारतवर्ष को उसकी खोयी हुई राष्ट्रीय विशेषता को वापस लौटा देना है, और अनुन्नत लोगों को उठाना है। " इसके लिये स्वामी विवेकानन्द ( हितोपदेश से एक कथा ' मित्रलाभ ' को उद्धृत करते हुए) कहते हैं  'सन्निमित्ते वरं त्यागो विनाशे नियते सति।' - अरे जब मृत्यु निश्चित ही है,तो क्या किसी सत्कार्य के लिये  मर जाना श्रेयस्कर नहीं है ?
 स्वामी विवेकानन्द कहते हैं-" फिर इसी प्रकार की शिक्षा देते देते सबों को उसी परम-शिक्षा (शीक्षा) की ओर अग्रसर करा दो।" शिक्षा की कैसी अद्भुत प्रणाली बता रहे हैं -स्वामी विवेकानन्द ! सम्पूर्ण जगत को परिवर्तित कर देने का बीज,स्वामीजी की शिक्षा-नीति में सन्निहित है। वे कहते हैं, कि शिक्षा एक ऐसा मन्त्र है, जिसके बल से ऐसी कोई समस्या नहीं जिसका समाधान नहीं हो सकता हो। वैसी शिक्षा क्या पुस्तकों से प्राप्त हो सकती है ? यह शिक्षा पुस्तकीय ज्ञान तो निश्चय ही नहीं है,डिग्री पाने वाली शिक्षा से इसका कोई सम्बन्ध नहीं है, इसलिये ऐसी शिक्षा स्कूल-कॉलेज खोल कर नहीं दी जासकती। स्वामीजी कहते हैं, कुछ तथ्यों को रट कर सिर में घुसा लेना ही शिक्षा नहीं है। यदि वैसी बात होती तब तो लाईब्रेरी आदि ही महान विद्वान् हो जाते, सद्ग्रंथों को ही ऋषि कहना चाहिये था। क्योंकि वेदों में तो ज्ञान की सारी बातें दी गयी हैं।किन्तु क्या किसी व्यक्ति के दिमाग में जानने योग्य सभी बातें ठूँस दी जाएँ, तो क्या उसे शिक्षित कहा जा सकता है ? सिर में भरे हुए जितने भी तथ्य हैं, तत्व की बातें हैं, वे सब हजम नहीं होती और वहाँ गड्ड-मड्ड करने लगती हैं, सिर में ही युद्ध शूरु हो हो जाता है। तो क्या ऐसी शिक्षा को शिक्षा कह सकते हैं ?
कदापि नहीं। स्वामीजी व्यंगात्मक भाषा में कहते हैं, " शिक्षा का मतलब यह नहीं है कि तुम्हारे दिमाग में ऐसी बहुत सी बातें इस तरह ठूँस दी जाएँ कि मन में अन्तर्द्वन्द्व चलने लगे, और तुम्हारा दिमाग उन्हें जीवन भर पचा न सके। जिस शिक्षा से हम अपना जीवन निर्माण कर सकें, मनुष्य बन सकें, चरित्र गठन कर सकें और उसमे निहित भावों को आत्मसात कर सकें, वही वास्तव में शिक्षा कहलाने योग्य है। यदि तुम पाँच ही भावों (श्रद्धा -निर्भीकता- निःस्वार्थपरता-त्याग -सेवा) को पचाकर तदनुसार जीवन और चरित्र गठित कर सके हो, तो तुम्हारी शिक्षा उस आदमी कि अपेक्षा बहुत अधिक है, जिसने एक पूरे पुस्तकालय को कंठस्त कर रखा है...यदि बहुत तरह की तथ्यों का संचय करना ही शिक्षा है, तब तो ये पुस्तकालय संसार में सर्वश्रेष्ठ मुनी हैं और विश्वकोष ही ऋषि हैं !"(भारत का भविष्य नामक भाषण ५:१९५)
वास्तव में मनुष्य जीवन के कुछ पवित्र भावों के कुछ महान भावों को, सुन्दर भावों को चरित्रगत कर लेना शिक्षा है, ठीक वैसे ही जैसे खाना पच कर रक्त मज्जा से एकीकृत हो जाता है, उसी प्रकार से चरित्रगत कर लेना या आत्मसात assimilate कर लेना ही शिक्षा हैं। 

अपने आदर्श के सुन्दर और महान भावों को चरित्रगत कर लेने का अर्थ क्या हुआ ? हमलोगों ने जिस युवा-आदर्श को अपने जीवन का ध्रुवतारा माना है, उस अनुपम आदर्श- जीवन का इस प्रकार से अनुकरण करना होगा, कि उनके पवित्र विचार मेरे मेरे चिन्तन,वचन और आचरण में मेरा चरित्र बनकर मेरे कार्यों के द्वारा अभिव्यक्त होने लगेंगे। इस परम शिक्षा (शीक्षा) को किस रीति से ग्रहण किया जाता है ? ठाकुर ने उस पद्धति को अपने जीवन में दिखाया था। माँ ने कैसी शिक्षा पद्धति सिखाई थी, स्वामीजी की शिक्षा-पद्धति क्या थी ? उनकी शिक्षा-नीति इस प्रकार तथाकथित B.A., M.A., Ph.D. प्राप्त करके नाम के आगे डाक्टर लगाने वाली शिक्षा-पद्धति नहीं थी। इसप्रकार की डिग्री लेने वाली शिक्षा का क्या परिणाम होता है, उसे हम अभी स्पष्ट रूप से समझ सकते हैं।
 ( लन्दन स्कूल ऑफ़ इकोनोमिक्स से डाक्टरेट की डिग्री प्राप्त नेता आदि मिलकर देश का धन या तो स्वयं चोरी कर लेते हैं। या कोई दूसरा चोरी करे तो आँखे मूंद लेते हैं। महाराष्ट्र का उप-मुख्यमंत्री कहता है- ' यदि पीने का पानी नहीं है तो क्या मैं .....पिला दूँ ? ) अति शिक्षित होने के बाद भी उन व्यक्तियों का जैसा आचरण हमलोग देख रहे हैं, उनके बारे में बोलते हुए स्वामी विवेकानन्द ने एक अनोखी बात कही थी- " So long as millions die in hunger and ignorance, I hold every man a traitor who having been educated at their expense pays not the least heed to them."
 वे कहते हैं, " जब तक करोड़ों मनुष्य भूखे और अशिक्षित रहेंगे, तब तक मैं प्रत्येक उस आदमी को विश्वासघातक समझूंगा, जो उनके खर्च पर शिक्षित हुआ है, किन्तु अब उनपर तनिक भी ध्यान नहीं देता। वे लोग जिन्होंने गरीबों को कुचलकर धन पैदा किया है और अब ठाट-बाट से अकड़ कर चलते हैं, यदि उन बीस करोड़ देशवासियों के लिये, जो इस समय भूखे और असभ्य बने हुए हैं, कुछ नहीं करते, तो वे घृणा के पात्र है। "
बहुत वर्ष पहले आकलन करने पर देखा गया था कि सरकार को एक डाक्टर या इंजीनियर बनाने में 1.50 लाख रुपये खर्च करने पड़ते थे। सरकारी खर्च पर शिक्षा प्राप्त करने का अर्थ क्या हुआ ? भारत की सामान्य जनता दिन-रात खून पसीना बहाकर जो श्रम करती है, उसीसे भारत प्राप्त करों के द्वारा सरकारी खजाने में धन जमा होता रहता है। उसी राष्ट्रीय आय को सरकार शिक्षा के उपर खर्च करके किसी व्यक्ति को डाक्टर या इंजिनियर बनने का अवसर देती है। आज के समय में उस खर्च का आकलन किया जाय तो शायद 1.50 लाख से कई गुना अधिक खर्च करना पड़ता होगा। कोई व्यक्ति केवल अपने अभिभावक के द्वारा दिये फ़ीस से ही डाक्टर या इंजीनियर नहीं बनता, उसको शिक्षित करने में इस देश की आमजनता की गाढ़ी कमाई के पैसे खर्च होते हैं। किन्तु डाक्टर, इंजीनियर बन जाने के बाद थोड़े ही दिनों में वे लोग किस प्रकार धन-दौलत का इतना बड़ा अम्बार खड़ा कर लेते हैं ? देखते ही देखते कुछ ही वर्षों के भीतर बड़े बड़े आलीशान बंगले, पेट्रोल-पम्प और गाड़ियाँ कहाँ से आ जाती हैं? यही हाल अन्य प्रोफेशन या पेशे से जुड़े दुसरे (नेता,अफसर,वकील-व्यापारी आदि ) लोगों का भी है। [CBI की छापेमारी में कुछ भ्रष्ट नेताओं,अफसरों, व्यापारियों के यहाँ उनके लौकर में करोड़ों रूपये नगद और गहने, कई बड़े शहरों में जमीन-जायदाद " आय से अधिक सम्पत्ति " आदि के कागजत जप्त करने पड़ते हैं।] स्वामीजी कहते थे, " I hold every man a traitor who having been educated at their expense..." जो मनुष्य जनसधारण के मिहनत की कमाई पर शिक्षा प्राप्त करके उनके हित की कोई चिंता नहीं करता, उनकी सेवा नहीं करता, जिनके लिये उसके हृदय में थोड़ी भी पीड़ा नहीं होती उनको मैं देशद्रोही कहता हूँ, शयातन कहता हूँ। " मैं उसी को महात्मा कहता हूँ, जिसका हृदय गरीबों के लिये रोता है, अन्यथा वह तो एक दुष्ट व्यक्ति है, दुरात्मा है। " (स्वामीजी कहते " शिक्षा की वर्तमान व्यवस्था ' बाबू ' पैदा करने की मशीन के सिवाय कुछ नहीं है। अगर इतना ही होता, तब भी ठीक था, पर नहीं- इस शिक्षा से लोग कितने श्रद्धा और विश्वास से रहित होते जा रहे हैं। वे कहते हैं, वेद तो गरेड़ीयों के गीत मात्र है, गीता और रामायण झूठी कहानिया हैं ? ")
अभी हमलोगों के देश में ऐसी ही (देशद्रोही,विश्वासघाती या शैतान बनने की ) शिक्षा ही तो दी जा रही है। स्वामीजी की शिक्षा ऐसी नहीं है। वे कहते हैं, शिक्षा से मनुष्य सही ढंग से सोच-विचार करने की शक्ति प्राप्त करता है। शिक्षा किसी व्यक्ति को अपने इच्छाशक्ति के प्रवाह पर अर्थात मन के आवेग के उपर नियंत्रण रखने की शक्ति प्रदान करता है। जो विद्या से उसे अपनी इच्छाओं या संकल्प को कार्यरूप देने में समर्थ बना सकती है, उसी को शिक्षा कहते हैं। ऐसी शिक्षा हमें कहाँ प्राप्त होती है ? हमें ऐसी शिक्षा नहीं दी जा रही है। स्वामीजी कहते हैं,
शिक्षा मनुष्य को स्वावलंबी बना देती है, उसे अपने पैरों पर खड़े होना सिखाती है। सच्ची शिक्षा प्राप्त कर लेने के बाद मनुष्य का हृदय अदम्य साहस से भर उठता है। वह मनुष्य चरित्रवान बन जाता है। जो शिक्षा मनुष्य को चरित्र-बल नहीं दे सकती, उसके मन में सिंह जैसा साहस नहीं भर सकती, वह भी क्या शिक्षा है?  शिक्षा मनुष्य को परार्थता सिखलाती है। दूसरों के लिये सोचना सिखाती है। यदि कोई शिक्षित होकर भी दूसरों के हित का ध्यान नहीं रखता हो, तो क्या उसे शिक्षित मनुष्य कहना उचित होगा ? पर हमलोगों के देश में क्या हो रहा है ? जो जितना अधिक शिक्षित होता है, वह उतना ही अधिक स्वार्थी बन जाता है। तथाकथित शिक्षा का परिणाम आमतौर से यही दिखाई देता है।
निश्चित रूप से इसमें कुछ अपवाद भी अवश्य होते हैं। किन्तु साधारण तौर पर उन्हीं को बहुत शिक्षित माना जाता है, जो बड़े चालाक और धूर्त होते हैं; जो यह जानते हैं कि दूसरों को धोखा देकर, ठग कर, दूसरों का हक मार कर किस प्रकार अपना भोग-सुख सम्पत्ति बढ़ाया जाता है ? जो शिक्षा अभी चल रही है, उस तरह की कोई शिक्षा-नीति स्वामीजी की नहीं थी। स्वामीजी कहते थे, जो व्यक्ति सच्ची शिक्षा को जितना अधिक आत्मसात करता जायेगा, वह उसी परिमाण में स्वार्थ शून्य मनुष्य भी बनता जायेगा। वह उसी परिमाण में निर्भीक, सबों का हितैषी और सेवापरायण बन जायेगा।
सच्ची शिक्षा उसकी बुद्धि को अत्यन्त मर्मज्ञ (penetrating) या तीक्ष्ण बना देती है। वैसी बुद्धि जिसमें परम सत्य को जान लेने की क्षमता आ जाएगी। सच्ची शिक्षा बुद्धि को धीरे धीरे इतनी कुशाग्र (sharp as a needle) बना देती है, कि वह अपनी बुद्धि को लगाकर जो भी कार्य करेगा, वह उस कार्य को अत्यन्त सुन्दर ढंग से सम्पादित करने में सक्षम हो जायेगा। इसको कहते हैं, शिक्षा। हमलोग ऐसी शिक्षा कहाँ पा रहे हैं ? स्वामीजी उसी शिक्षा को भारत भर में प्रचलित करा देना चाहते थे। वे यह भी कहते थे कि " देखो भाई, केवल शिक्षा देने से ही नहीं होगा; शिक्षा के साथ ही साथ संस्कृति भी देनी होगी। "
क्योंकि संस्कृति नहीं देने से मनुष्य वैदेशिक संघात से अपने समाज को बचा नहीं पायेगा। जब सिनेमा आदि (आइटम सोंग ) के माध्यम से पाश्चात्य भोगवादी संस्कृति धीरे धीरे जब सम्पूर्ण समाज को आक्रान्त  (possessed) कर लेती है, सभ्यता-संस्कृति नष्ट करने की चेष्टा होने लगती है, उस समय उस समाज की जो प्राचीन सांस्कृतिक विचार धारा प्रवाहित होती आ रही है, वह संस्कृति ही उसकी रक्षा करने में सहायता कर सकती है। हमें अपनी राष्ट्रिय संस्कृति को एक बार फिर से जाग्रत करना होगा, उससे प्रेरणा ग्रहण करनी होगी। क्योंकि हमलोग अपनी देव-संस्कृति को लगभग भूल ही चुके हैं। यह संस्कृति केवल सच्ची शिक्षा के द्वारा ही प्राप्त हो सकती है। क्योंकि हमारे पुराणों और शास्त्रों में वर्णित भक्तो और महात्माओंके चरित्र पर मनन करनेसे हृदयमे पवित्र भावोंकी स्फूर्ति होती है ।
जब वह ' ज्ञान ' जिसे शिक्षा के द्वारा जो देखा, पाया और जाना -  जब चित्त की गहरी परतों में प्रविष्ट होकर, आत्मसात हो जाती है, तभी वह शिक्षा संस्कृति में रूपान्तरित हो पाती है। तब वह व्यक्ति सुसंस्कृत बनने के लिये स्वयं को सुरुचिपूर्ण (Elegant) बनाने की चेष्टा करता है। जिस प्रकार दुर्गापूजा में दुर्गा की मूर्ति गढ़ने के लिये ,उनके मुखड़े के आकार में देवी के अनुरूप सादृश्य लाने के लिये पहले से बने साँचे में ढालना पड़ता है। उसके बाद धीरे धीरे सूक्ष्म कार्यों के द्वारा उसको सौन्दर्य मण्डित करना होता है। उसी प्रकार यथार्थ शिक्षा भी मनुष्य के जीवन को पहले एक साँचे में डाल कर उसको एक सुन्दर आकार में ढाल देती है। उसके बाद सूक्ष्म कारीगरी करके एक स्वाभाविक संस्कृतिवान मनुष्य में रूपान्तरित कर देती है। इस प्रकार जब कोई व्यक्ति एक सुसंस्कृत या सुरुचिपूर्ण (Elegant) बन जाता है, तब उसका चरित्र-कमल प्रस्फुटित हो उठता है। और उसके जीवन का सौन्दर्य, प्रस्फुटित कमल-पुष्प के सौरभ के समान,चारो ओर रहने वाले मनुष्यों को प्रभावित करता रहता है। तथा उनको भी विकसित मनुष्य बनने के लिये अनुप्रेरित करने लगता है।
आजकल हमलोग निरंतर अपने खराब परिवेश की दुहाई देते रहते हैं, हम कहते हैं आज हमलोगों का परिवेश अत्यन्त खराब हो गया है, ऐसे परिवेश में अच्छा बनना या अच्छा बने रहना संभव नहीं है। व्यवस्था इतनी भ्रष्ट हो चुकी है कि हम ईमानदार या चरित्रवान मनुष्य बन ही नहीं सकते हैं। किन्तु हम यह भूल जाते हैं कि इस परिवेश की रचना भी तो हमलोगों ही कर रहे हैं ! हमारा जीवन, हमारी दिनचर्या, हमारी शिक्षा, हमारी संस्कृति ही हमारे चारो ओर एक प्रकार का वातावरण बना देते हैं। यदि हमलोग अच्छे बनेंगे, तभी हमारा परिवेश भी अच्छा बन सकता है।
 भौतिकवादी सोच ' Materialistic thinking ' या (स्वयं को केवल देह मानने का भ्रम) हमलोगों को ऐतिहासिक सतरंज के खेल का मोहरा बना देती है। किन्तु वास्तविकता तो यह है कि (सोच को बदलने की क्षमता रखने वाला) मनुष्य ही इतिहास की रचना करता है। इतिहास नामक कोई काल्पनिक जीव, दैत्य, दानव या कोई अन्य वस्तु कहीं नहीं रहता है,जो ठोक-पीट कर हमलोगों अच्छे या बुरे रूप में ढाल देता हो। स्वामीजी कहते हैं, " स्वयं मनुष्य ही अपने भाग्य का निर्माता है, संयुक्त रूप से अपने इतिहास और भविष्य का निर्माण करता है। " और यही बात बिल्कुल उचित (reasonable) प्रतीत होती है। 'इतिहास ही मनुष्यों का निर्माण करता है ' - इस धारणा को,वैज्ञानिक बता कर चाहे कोई कितना ही प्रमाणित करने की चेष्टा क्यों न करे, यह बिलकुल ही असंगत (illogical) बात है। और जो विचार धारा तर्क की कसौटी पर खरा नहीं उतरती उसी को अवैज्ञानिक सोच (Unscientific thinking ) कहते हैं।
 वास्तविकता तो यह है, कि हमारा जीवन भी शक्ति का एक खेल मात्र है, किन्तु इसके बारे में हमारी कोई धारणा नहीं है। शक्ति के इस खेल का हमेशा एक नियम होता है, हमेशा एक छन्द रहता है, एक आदेश, एक अनुक्रम (Order) जिसका का पालन सूर्य-चन्द्र सबों को करना पड़ता है। ["छंदः पादौ तु वेदस्य"-वेद का ही एक अंग है छन्द; जब रचना में मात्रा, वर्ण, यति, गति आदि का ध्यान रखा जाये तो रचना छंदबद्ध कहलायेगी जिसे पद्य कहते हैं।]
उसी प्रकार जीवन का भी एक विज्ञान है। उस विज्ञान को जान लेने के बाद जीवन को रूपान्तरित किया जा सकता है। अपनी पसन्द (choice) या चुनाव के अनुसार अपने भविष्य का निर्माण किया जा सकता है, अपनी सोच के अनुसार इतिहास की रचना की जा सकती है। हमलोग इस विज्ञान को सीखने के विषय में उदासीन हैं, या जानना नहीं चाहते इसीलिये जीवन में दुःख आने पर टूट जाते या हताश हो जाते हैं, और अपनी असफलता के लिये दूसरों को उत्त्दायी ठहराने लगते हैं। जिसको उत्तरदायी ठहराते हैं, उसके उपर हमारा आक्रोश फट पड़ता है। उनसे घृणा करने लगते हैं, उनसे दुश्मनी ठान लेते हैं, प्रतिशोध लेने की आग में जलत रहते हैं। यह सबकुछ किन्तु यथार्थ शिक्षा की कमी के कारण ही होता है।
 सच्ची शिक्षा व्यक्ति को इस जगत के सम्बन्ध में सही दृष्टिकोण प्रदान करती है। मनुष्य जीवन कितना दुर्लभ और बहुमूल्य है, उसकी समझ आ जाएगी। जीवन के उद्देश्य के विषय में, मनुष्य को जागृत (awaken) कर देगी। जीवन कैसे सार्थक हो सकता है, यह समझ प्राप्त होगी। मनुष्य यदि इन बातों को समझ ले, तो वह निश्चय ही अपने जीवन को इस प्रकार से विकसित (evolve) करेगा, या गठित करेगा, कि उसका अनुपम असाधारण जीवन दूसरों को भी प्रभावित करेगा। उसके जीवन को देख कर दूसरे लोग अपने जीवन को भी तदनुसार गठित करने के लिये प्रेरित हो जायेंगे। यदि हम अपने जीवन को सही ढंग से नहीं गढ़ सके, या जीवन के आदर्श रूप के सम्बन्ध में धारणा नहीं बना सकें, तो हम अपनी भावी पीढ़ी को भी इस विषय में कोई सहायता भी नहीं कर सकते हैं, या अपना जीवन गठित करने के लिये उन्हें अनुप्रेरित नहीं कर सकते हैं। इसी प्रकार क्रमशः समाज का पतन शुरू हो जाता है।
आज अपने देश में सर्वत्र समाज की जो अवस्था  दिखाई दे रही है, उस ओर नजर उठाकर देखने से इस विषय के उपर और अधिक कहने की जरुरत नहीं रहेगी। इतिहास और परिवेश के उपर दोषारोपण नहीं करके हमें इस बात को समझ लेना चाहिये कि ' जीवन-विज्ञान ' के ज्ञान का आभाव ही इसका कारण है। जितनी जल्दी हम इस बात को समझ लेंगे उससे अपना देश का भला होगा। इसी ' जीवन-विज्ञान ' (या जीवन-गठन की पद्धति ) की शिक्षा को यथार्थ शिक्षा कहते हैं। स्वामीजी सम्पूर्ण मानवता को वही 'जीवन- विज्ञान' सिखाना चाहते थे। इसीलिये स्वामीजी की शिक्षा-नीति में पाठ्यक्रम तय करना या कोर्स का वर्ष कितना हो ? आदि मामूली विषयों की पढाई पर चर्चा करना नहीं है।
स्वामीजी ने कहा है, " प्रयत्न करना ही मनुष्य जीवन का उद्देश्य है। " प्रयत्न का अर्थ है - चेष्टा, कोशिश, अविराम उद्यम (या पुरुषार्थ।) किस वस्तु को प्राप्त करने के लिये अविराम प्रयत्न करते रहने का नाम जीवन है ? जीवन का लक्ष्य क्या है ? मनुष्य बन जाने के लिये अविराम प्रयत्न करते रहना ! ' कोई पराया नहीं है ' इस दृष्टि को प्राप्त करके सभी के जीवन में अपने सच्चे जीवन को प्राप्त करना। सभी के कल्याण में अपने जीवन को पूरी तरह से न्योछावर कर देना। सच्ची शिक्षा मनुष्य को सबों के लिये सहानुभूति पूर्वक चिन्ता करना, दूसरों के सुख दुःख से सरोकार रखना सिखाती है।
तथाकथित रूप से शिक्षित होकर भी जो लोग अशिक्षित ही रह जाते हैं, वे केवल अपने ही बारे में सोचते हैं। स्वार्थपरता ही संकीर्णता है। और स्वामीजी ने कहा था, ' विस्तार ही जीवन है और संकीर्णता मृत्यु है।'
कोई व्यक्ति या कोई राष्ट्र जब पाशविक शक्ति से बलवान हो जाता है, तब वह दूसरों के अधिकार को छीन-झपट कर या हड़प करके अपना विस्तार करना चाहता है। किन्तु जो व्यक्ति या राष्ट्र सच्ची शिक्षा में शिक्षित होता है, उसका हृदय विस्तृत हो जाता है, उसके प्रेम करने की शक्ति विस्तृत हो जाती है। वह प्रेम के द्वारा अपने हृदय को विस्तृत करके सच्चे जीवन का अधिकारी बन जाता है। श्रीमद भागवत में बड़े सुन्दर ढंग से कहा गया है-

ननु स्वार्थपरो लोको न वेद परस्पङ्कटम् ।
यदि वेद न याचेत नेति नाह यदीश्वरः ॥

( श्रीमद्भा० ६ । १० । ६ )
 - जो मनुष्य दूसरों के दुःख-कष्ट को अपना दुःख-कष्ट नहीं समझता, वह अनिवार्यतः स्वार्थी होता है। जो समझ लेता है, वह अपने लिये दूसरों से कुछ भी नहीं चाहता। किन्तु कोई यदि संकट में पड़कर उससे कुछ भी माँगता है तो वह कभी ' ना ' नहीं कहता। भागवत पुराण में तीन कथाओं के माध्यम से इस श्लोक की महिमा के बारे में बताया गया है कि कैसे - जो पुरुष नाशवान् शरीरके द्वारा समर्थ होकर भी प्राणियों पर दया करके धर्म या यश प्राप्त करनेकी इच्छा, चेष्टा, प्रयत्न नहीं करता, वह तो स्थावर वृक्ष - पर्वतादि से भी गया-गुजरा है, उसकी दशा अधिक शोचनीय है; क्योंकि वृक्ष - पर्वतादि भी अपने शरीरके द्वारा प्राणियोंकी सेवा करते हैं
[ कथा इस प्रकार है श्रीप्रह्लादजीके पुत्र दैत्यराज विरोचन परम ब्राह्मणभक्त थे । इन्द्रके साथ ही ब्रह्मलोकमें ब्रह्माजीके पास ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए उन्होंने निवास किया था। ब्रह्माजीके द्वारा उपदेश किया हुआ तत्त्वज्ञान यद्यपि वे यथार्थरुपसे ग्रहण नहीं कर सके, तथापि धर्ममें उनकी श्रद्धा थी और उनकी गुरुभक्तिके कारण महर्षि शुक्राचार्य उनपर बहुत प्रसन्न थे । विरोचनके दैत्याधिपति होनेपर दैत्यों, दानवों तथा असुरोंका बल बहुत बढ़ गया था । इन्द्रको कोई रास्ता ही नहीं दीखता था कि कैसे वे दैत्योंकी बढ़ती हुई शक्तिको दबाकर रक्खें । विरोचनने स्वर्गपर अधिकार करनेकी इच्छा नहीं की थी; किंतु इन्द्रका भय बढ़ता जाता था । इन्द्र देखते थे कि यदि कभी दैत्योंने आक्रमण किया तो हम धर्मात्मा विरोचनको हरा नहीं सकते । अन्तमें देवगुरु बृहस्पतिकी सलाहसे एक दिन वे वृद्ध ब्राह्मणका रुप धारण करके विरोचनके यहाँ गये । ब्राह्मणोंके परम भक्त और उदार शिरोमणि दैत्यराजने उनका स्वागत किया, उनके चरण धोये और उनका पूजन किया। इन्द्रने विरोचनके दान और उनकी उदारताकी बहुत ही प्रशंसा की । विरोचनने नम्रतापूर्वक वृद्ध ब्राह्मणसे कहा कि ' आपको जो कुछ माँगना हो, उसे आप संकोच छोड़कर माँग लें ।' इन्द्रने बातको अनेक प्रकारसे पक्की कराके तब कहा -- ' दैत्यराज ! मुझे आपकी आयु चाहिये ।' बात यह थी कि यदि विरोचनको किसी प्रकार मार भी दिया जाता तो शुक्राचार्य उन्हें अपनी संजीवनी विद्यासे फिर जीवित कर सकते थे । विरोचनको बड़ी प्रसन्नता हुई । वे कहने लगे -- ' मैं धन्य हूँ । मेरा जन्म लेना सफल हो गया । आज मेरा जीवन एक विप्रने स्वीकार किया, इससे बड़ा सौभाग्य मेरे लिये और क्या हो सकता है ।' अपने हाथमें खडग लेकर स्वयं उन्होंने अपना मस्तक काटकर वृद्ध ब्राह्मण बने हुए इन्द्रको दे दिया । इन्द्र उस मस्तकको लेकर भयके कारण शीघ्रतासे स्वर्ग चले आये और यह अपूर्व दान करके विरोचन तो भगवानके नित्य धाममें ही पहुँच गये । भगवाननें उन्हें अपने निज जनोंमें ले लिया ।] भागवत में एक अन्य कहानी महर्षि दधिची के त्याग की महत्ता की है। जब त्वष्टाके अग्नि - कुण्डसे उत्पन्न होकर वृत्रासुरने इन्द्रके स्वर्गपर अधिकार कर लिया और देवताओंने अपने जिन अस्त्रोंसे उसपर आघात किया, उन अस्त्र - शस्त्रोंको भी वह असुर निगल गया, तब निरस्त्र देवता बहुत डरे । कोई और उपाय न देखकर देवता ब्रह्माजीकी शरणमें गये । ब्रह्माजीने भगवानकी स्तुति की। भगवानने प्रकट होकर दर्शन दिया और बताया - ' महर्षि दधीचिकी हड्डियाँ उग्र तपस्याके प्रभावसे दृढ़ तथा तेजस्विनी हो गयी हैं । उन हड्डियोंसे वज्र बने, तभी इन्द्र उस वज्रसे वृत्रको मार सकते हैं । महर्षि दधीचि मेरे आश्रित हैं, अतः उन्हें बलपूर्वक कोई मार नहीं सकता । तुमलोग उनसे जाकर याचना करो । माँगनेपर वे तुम्हें अपना शरीर दे देगे ।' देवता साभ्रमती तथा चन्द्रभागाके सङ्गमपर दधीचिऋषिके आश्रममें गये ।उन्होंने नाना प्रकारसे स्तुति करके ऋषिको सन्तुष्ट किया और उनसे उनकी हड्डियाँ माँगीं । वहाँ स्त्रान करके दधीचिजी आसन लगाकर बैठ गये । जिस इन्द्रने उनका सिर काटना चाहा था, उन्हीके लिये ऋषिने अपनी हड्डियाँ देनेमें भी सक्कोच नहीं किया ! शरीरसे उन्हें तानिक भी आसक्ति नहीं थी । एक - न - एक दिन तो शरीर छूटेगा ही । यह नश्चर देह किसीके भी उपयोगमें आ जाय, इससे बड़ा और कोई लाभ नहीं उठाया जा सकता । महर्षिने अपना चित्त भगवानमें लगा दिया । मन तथा प्राणोंको हदयमें लीन करके वे शरीरसे ऊपर उठ गये । जङ्गली गायोंने अपनी खुरदरी जीमोंसे महर्षिके शरीरको चाट - चाटकर चमड़ा, मांसादि अलग कर दिया । इन्द्रने ऋषिकी हड्डी ले ली । उसी हड्डीसे विश्वकर्माने वज्र बनाया और उस वज्रसे इन्द्रने वृत्रको मारा । इस प्रकार एक तपस्वीके अनुपम त्यागसे इन्द्रकी, देवलोककी वृत्रसे रक्षा हुई। महामण्डल की ध्वजा में उसी वज्र का निशान बना है ]
[ तीसरी कथा देवराज इन्द्रने प्रतिज्ञा कर ली थी कि ' जो कोई अश्विनीकुमारोंको ब्रह्माविद्याका उपदेश करेगा, उसका मस्तक मैं वज्रसे काट डालूँगा ।' वैद्य होनेके कारण अश्विनीकुमारोंको देवराज हीन मानते थे ।
अश्विनीकुमारोंने महर्षि दधीचिसे ब्रह्मविद्याका उपदेश करनेकी प्रार्थना की । एक जिज्ञासु अधिकारी प्रार्थना करे तो उसे किसी भय या लोभवश उपदेश न देना धर्म नहीं है । महर्षिने उपदेश देना स्वीकार कर लिया । अश्विनीकुमारोने ऋषिका मस्तक काटकर औषधद्वारा सुरक्षित करके अलग रख दिखा और उनके सिरपर घोड़ेका मस्तक लगा दिया । इसी घोड़ेके मस्तकसे उन्होंने ब्रह्माविद्याका उपदेश किया । इन्द्रने वज्रसे जब ऋषिका वह मस्तक काट दिया, तब अश्विनीकुमारोंने उनका पहला सिर उनके धड़से लगाकर उन्हें जीवित कर दिया । इस कारण ब्रह्मपुत्र अथवा ऋषिके पुत्र ये दधीचिजी घोड़ेका सिर लगनेसे अश्वशिरा भी कहे जाते हैं ।
' जो पुरुष नाशवान् शरीरके द्वारा समर्थ होकर भी प्राणियों पर दया करके धर्म या यश प्राप्त करनेकी इच्छा, चेष्टा, प्रयत्न नहीं करता, वह तो स्थावर वृक्ष - पर्वतादि से भी गया-गुजरा है, उसकी दशा अधिक शोचनीय है; क्योंकि वृक्ष - पर्वतादि भी अपने शरीरके द्वारा प्राणियोंकी सेवा करते हैं ।' ] हमलोग स्वामीजी के जीवन में भी मानव कल्याण के लिये इस महान त्याग के आदर्श को देख सकते हैं। सच्ची शिक्षा मनुष्य को स्वार्थ त्याग करने, देश के लिये हंसते हंसते प्राणों को न्योछावर का देने के लिये उत्साहित करती है। परस्पर के लिये सहानुभति रखना और दूसरों के कल्याण के लिये अपना सबकुछ न्योछावर कर देने की त्याग की भावना ही समाज को मनुष्य के समाज के रूप में धारण किये रख सकती है। परस्पर के प्रति सहानुभूति और त्याग की भावना का आभाव हो जाने से, फिर चाहे उस देश में गणतंत्र हो, या समाजवाद और साम्यवाद या कोई भी 'वाद ' हो- वह देश या समाज को स्वस्थ या समृद्ध नहीं बना सकता है। जो राष्ट्र इस शिक्षा को नहीं प्राप्त कर सका हो, तो उसकी अधोगति अनिवार्य है। स्वामीजी की शिक्षा-नीति  व्यक्तिगत, सामाजिक और मानव-कल्याण के सच्चे उपाय का मार्ग दर्शक है। 

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[स्कूली छात्रों में धर्मभाव को प्रविष्ट कराने के लिये बाईबिल, कुरान, या वेद को अनिवार्य बनाने की या सूर्य-नमस्कार को अनिवार्य बनाने की आवश्यकता नहीं है। हितोपदेश और पंचतंत्र की कथायें, उसी प्रकार मुसलमानों के लिये हातिमताई की कहानी भी उपयोगी हो सकती है। हमने अपने स्कूली जीवन में इन्हें अवश्य पढ़ी होंगी। हितोपदेश की कथाएँ अत्यंत सरल व सुग्राह्य हैं। इसकी रचना काल ११ वीं शताब्दी के आस- पास माना जाता है ।उसी प्रकार श्रीमद्भागवत से भी इंद्र-विरोचन,वृत्तासुर -दधिची आदि की कथायें भी  छात्रों को  सुनाने से उनको, महान जीवन मूल्यों या अपने देश की महान संस्कृति से परिचित कराया जा सकता है।  मित्रलाभ नामक कथा ( मुसलमान और ईसाई लोग भी सुन सकते हैं,क्योंकि इसके पात्र हिन्दू देवी-देवता आदि नहीं,बल्कि पशु-पक्षी हैं। ) में  हिरण्यक नामक चूहों के राजा से चित्रग्रीव नामक कबूतरों का राजा कहता है, ' हे मित्र, पहले मेरे उन आश्रितों के बंधन काटो, जो लालच में आकर जाल में फंस गये हैं, मेरा बंधन बाद में काटना।  हे मित्र, मेरे इस मांस, मल, मूत्र तथ हड्डी से बने हुए इस नश्वर शरीर के प्रति मोह को छोड़ कर मेरे यश को बढ़ाओ। चरित्र के गुणों- आत्मश्रद्धा,आत्मविश्वास, दया आदि में और शरीर में बहुत बड़ा अंतर होता है। शरीर तो नश्वर है, क्षणभंगुर है किन्तु चरित्रगत गुण अविनाशी हैं, कल्प के अंत तक रहने वाले हैं। यदि किसी जीव को इस अनित्य शरीर से निर्मल और शाश्वत यश की प्राप्ति हो जाये तो उसे तो क्या नहीं मिला ?' चित्रग्रीव कहता है कि विद्वान् को पराये उपकार के लिए अपना धन और प्राणों का मोह बिल्कुल छोड़ देना चाहिए, क्योंकि जिसका जन्म हुआ उसकी मृत्यु तो अवश्य होगी, इसलिये सत पुरुषों को दूसरों के कल्याण के लिये अपने प्राणों  को न्योछावर कर देना ही श्रेयस्कर है।
उसी प्रकार हातिमताई की कहानी हिन्दू लोग के लिये भी उपयोगी हो सकती है। भारत में लगभग सभी इस कहानी से वाकिफ होंगे, जिसमें शहजादी हुस्नबानो ने यह शर्त रखी कि जो कोई भी मेरे सवालों को पूरा करेगा, उसको मैं कबूल करूंगी। वह सात सवाल थे 1. वह कौन सी चीज है जिसे एक बार देखा है, दूसरी दफा देखने की आरजू है!2. नेकी कर दरिया में डाल, कौन कहता है?3. बदी किसी से न कर - कर बुरा होगा बुरा। 4. सच कहने वाले को खुशी हासिल होती है।5. कोहनिदा की खबर ला दे।6. वह मोती जो मुर्गे के अंडे के बराबर है। 7. हम्माम बाग गर्द की खबर लाकर दे। हातिम ने सातों सवालों के जवाब पूरे कर दिए थे।]
[वह विद्या जो हमें भव -बंधन से मुक्त कर दे, जैसे सत्संग या युवा-प्रशिक्षण शिविर आदि- इस प्रकार की शिक्षा -व्यवस्था प्रजा को स्वयं करनी पड़ती है । क्योंकि यदि सरकारी स्तर  से  युवा-प्रशिक्षण शिविर का आयोजन होने लगे, तो वहाँ भी घोटाला शुरू हो जायेगा। जैसे नेहरु-युवा केन्द्र आदि संस्थाओं में होता है, यहाँ भी बिना कैम्प किये ही करोड़ो-अरबों का खर्च दिखा दिया जायेगा। अथवा प्रौढ़-शिक्षा अभियान  के नाम पर अरबों रुपया खर्च कर देने के बाद भी, जिस प्रकार  आज तक ४० वर्ष से अधिक उम्र के किसी व्यक्ति को अभी तक शिक्षित होते नहीं देखा गया है। या  सर्व-शिक्षा अभियान, अथवा बाल-विकास परियोजना से जुड़े मास्टर लोग दुपहरिया तक  तो खिचड़ी ही बनाते रह जाते हैं, पढ़ाने का तो समय ही नहीं बचता। उसी प्रकार यहाँ भी सरकारी आवंटन से छठा से दसवीं कक्षा तक के हरिजन-आदिवासी बच्चों को वजीफा ( pittance अर्थात छोटा पारितोषिक,भत्ता या चबेना ) देकर, या तीन टाइम मुफ्त भोजन कराने के बाद, उपर से प्रति श्रोता १००/= रुपया देकर  बुलाया जाय , तो उस शिक्षा का फल क्या होगा ? यदि विद्यार्थी को पढ़ते समय तप नहीं करना पड़े तो वह पढ़ नहीं पायेगा। भोजन करा के पढ़ेगा तो बढेगा, पढ़ेगा?
दुर्लभं त्रयमेवैतत् देवानुग्रहहेतुकम् ।मनुष्यत्वं मुमुक्षुत्वं महापुरूषसश्रय:।।
- अर्थात मनुष्य जन्म, मुक्ती की इच्छा तथा महापुरूषोंका सहवास यह तीन चीजें परमेश्वर की कॄपा पर निर्भर रहते है |
सुखार्थी त्यजते विद्यां विद्यार्थी त्यजते सुखम् |सुखार्थिन: कुतो विद्या कुतो विद्यार्थिन: सुखम् ॥
- अर्थात जो व्यक्ती सुख के पिछे भागता है उसे ज्ञान नही मिलेगा |तथा जिसे ज्ञान प्रप्त करना है वह व्यक्ती सुख का त्याग करता है |सुख के पिछे भागनेवाले को विद्या कैसे प्राप्त होगी ? तथा जिसको विद्या प्रप्त करनी है उसे सुख कैसे मिलेगा? वशिष्ठजी  ने समझाया कि ऋषि विश्वामित्र के साथ चारों भाई जायेंगे तो इनका विवाह जल्दी हो जायेगा। इतना सुनना था कि दशरथ मान गए। पग पग पर अगर आप यथार्थ में रहेंगे तो सुखी रहेंगे। ]








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