[श्री रामकृष्ण देव की प्रसिद्ध उक्ति है " ईश्वर ही वस्तु है , और सब अवस्तु है!" अतएव.... ]
"वस्तु ही प्राप्त करने योग्य हैं !
(বস্তুই লভ্য)
[Materialism is a philosophy of unintelligent]
इन दिनों विभिन्न स्थानों पर विभिन्न प्रकार की बातें सुनने को मिलती हैं। कहीं पर लोग पूछते हैं, आज स्वामी विवेकानन्द की क्या आवश्यकता है ? कोई पूछता है, आज दुनिया में अवतार कौन है,कहाँ है ? आज का धर्म क्या है? कोई-कोई व्यक्ति तो श्रीरामकृष्ण के ही शब्दों को उद्धृत करते हुये पूछते हैं- ' क्या मुगल साम्राज्य के जमाने का सिक्का इस शासन-काल में चल सकता है ? हमारे जीवन में क्या धर्म की कोई आवश्यकता भी बची है? जब हमलोग धर्म के बिना अपनी
समस्त समस्याओं का निदान केवल भौतिक विज्ञान (physical science) की सहायता से ही कर सकते हैं; तो एक मनगढ़न्त वस्तु के ऊपर फिर से चर्चा करने की क्या जरूरत है?
आदिम युग में जब मनुष्य अल्पबुद्धि (imbecile) था, तब वह प्रकृति के आँधी-तूफान और गुस्से को देखकर सर्वदा भयभीत हो जाया करता था। और तब इसी भय के कारण धर्म की उत्पत्ति हुई थी। युग बदला, और विज्ञान की प्रगति के साथ साथ, हमलोग अपना उद्धार स्वयं करना सीख चुके हैं। पहले तो हमलोग बाघ और घड़ियाल को भी देखकर डर जाते थे, उनको मार डालने की कोशिश करते थे। इस समय सरकारी धन से बाघ-घड़ियाल के संवर्धन की परियोजना चला रहे हैं। हमलोग चाहते हैं कि बाघ और घड़ियाल की संख्या में वृद्धि हो। कोई कोई चाहते हैं कि साँप की संख्या में वृद्धि हो। पहले ये हिंसक पशु हमलोगों के शत्रु थे, किन्तु अभी विज्ञान ने इतनी प्रगति कर ली है कि अब हम इनकी संख्या में वृद्धि होते देखना चाहते हैं।
इन्हीं प्रकार के बेतुके प्रश्नों से हमलोगों का चित्त इतना अधिक विचलित हो गया है कि, हमलोग,इसी बहस में सारा समय गँवा देते हैं -कि आज के भारत को श्रीरामकृष्ण, माँ सारदा, स्वामी विवेकानन्द की आवश्यकता है भी या नहीं ? और इसी कारण, हम उनसे प्रेम नहीं कर पाते हैं, उनके निकट नहीं जा पाते हैं, अपने जीवन का विकास नहीं कर पाते हैं, और उनकी शिक्षाओं को अपने जीवन और आचरण में उतार कर, अपने जीवन को भी सुन्दर और पवित्र रूप से गढ़ नहीं पाते हैं। और अपना कल्याण करके अर्थात अपने चरित्र का निर्माण कर , भारत माता की सेवा में या मानव कल्याण में स्वयं को पूरी तरह से न्योछावर नहीं कर पाते हैं। इस महान बलिदान के लिये अपने जीवन को गठित नहीं कर पाते हैं। और यही सबसे बड़े दुःख की बात है।
हमलोग विज्ञान का अध्यन करते हैं, भौतिकवाद (Materialism) के उपर चर्चा करते हैं, चिन्तन करते हैं। किन्तु पाश्चात्य जगत के एक नॉबेल पुरष्कार प्राप्त वैज्ञानिक रॉबर्ट एंड्रयूज मिल्लिकन (R. A. Millikan) कहते हैं -"Materialism is a philosophy of the unintelligent. " अर्थात भौतिकवाद अनात्मवाद अथवा चार्वाक मत) एक ऐसा दर्शन है,जो केवल अल्पबुद्धि लोगों के लिए ही उपयुक्त हो सकता है। अर्थात बहुत शिष्ट भाषा का प्रयोग करते हुए वे कह रहे हैं, कि 'Materialism' देह-सर्वस्ववाद, जड़वाद या अनात्मवाद'- केवल अज्ञानी (मूर्ख) लोगों का ही दर्शन हो सकता है। इस विषय पर गहन चिंतन करने से यही समझ में आता है कि जो व्यक्ति अज्ञानता वश प्रत्येक "Tangible" वस्तु को जो स्पर्श करने से कड़ा -मुलायम जान पड़े, आम भाषा में जिसको स्पर्श योग्य मूर्त पदार्थ या ठोस वस्तु (Solid objects-) कहा जाता है को केवल जड़ वस्तु ही समझता रह जाता है; इसी जड़ वस्तु पर विचार करते करते उसके दिमाग में भी 'जड़ता' (गोबर) भर जाती है, और वह वह स्वयं भी जड़ पदार्थ में परिणत जाता है।
एक शब्द में यदि अनात्मवादियों की व्याख्या करनी हो, तो कहना पड़ेगा कि जड़-वस्तुओं का चिंतन करते करते उनका दिमाग इतना 'impervious' अप्रवेशनीय या 'अविवेकी' हो जाता है, वहाँ कोई भी प्रवेश-द्वार खुला नहीं रहने के कारण उसमें कोई नया या सूक्ष्म (पवित्र) विचार प्रवेश नहीं कर पाता है। जब किसी व्यक्ति के मन में विवेक पूर्ण विचारों को प्रवेश करने का रास्ता ही नहीं रह जाता, तब मनुष्य में विकास होना सम्भव नहीं हो पाता । अब इन प्रश्नों में उलझना छोड़ कर कुछ और आगे बढ़ने बात सोचनी होगी।
(लेकिन नील-षष्ठी के दिन केवल श्रीरामकृष्ण, श्री श्री माँ सारदा देवी, और स्वामी जी के पुश्तैनी घर में शिवजी का ध्यान करने (गुरुदेव) की कृपा से ही मनुष्य में विवेक का पुनः विकास होने का अवसर मिलना सम्भव हो जाता है।) तब यह बात समझ में आने लगती है कि केवल श्रीरामकृष्ण, माँ सारदा या स्वामी विवेकानन्द आज भी प्रासंगिक हैं या नहीं ? यदि हैं तो, उनको रहने दिया जा सकता है कि नहीं ?
... इस बहस में न उलझते हुए, हमलोगों के मन में उनको अपने ह्रदय में धारण करने का विचार उठाना चाहिये। वर्तमान समय में जहाँ हम अपनी आँखों के सामने असामनता, दारिद्र्य, दुःख, दुर्दशा आदि देखते हैं तो हमलोग इसके समाधान के उपायों पर चर्चा करते हैं। और अक्सर हमलोग इन समस्याओं का हल ढूँढने के लिये राजनीति का सहारा लेना चाहते हैं। किन्तु राजनीति के माध्यम से इन समस्याओं का सच्चा समाधान हम कभी नहीं ढूँढ़ सकते। क्योंकि राजनीति में सबसे बड़ी त्रुटि यह है कि वहाँ -वास्तव में मनुष्य क्या है ? उस मनुष्य का अन्वेषण करने की कोई व्यवस्था नहीं है। मनुष्य को अधिक सुख कैसे मिलेगा -इसके अन्वेषण की चेष्टा होती है, उसमें धन-सम्पति के खोज की व्यवस्था है, शक्ति और समाज को समृद्ध करने का अन्वेषण होता रहता है, किन्तु जिस मनुष्य के सुख, धन, ऐश्वर्य प्राप्ति के लिये वे सभी वस्तुएँ हैं, उसी मनुष्य का विश्लेष्ण (मनुष्य वास्तव में क्या है?), इसका खोज करने की ('प्रत्येक आत्मा सचमुच अव्यक्त ब्रह्म है' को समझने की शिक्षा प्राप्त करने की) वर्तमान में कोई व्यवस्था नहीं है।
राजनीतिक विचारधारा में मनुष्य के बारे में जो थोड़ा -बहुत विश्लेष्ण हुआ भी है वह केवल उन्हीं तथाकथित समाज-सेवकों के चिन्तन पर आधारित है,जो भौतिकवाद की सहायता से मनुष्य के देह को सुख कैसे पहुंचेगा, केवल इसी विषय पर अपनी बुद्धि लगाते हैं। हमारे देश का "योजना आयोग " जड़वादी दृष्टिकोण रखने वाले, Materialism के दर्शन में विश्वास रखने वाले लोगों के मनुष्य सम्बन्धी विश्लेष्ण को आधार बना कर मनुष्य के कल्याण की योजनायें बनाता है। ये मूर्ख भौतिकतावादी लोग मनुष्य को केवल एक क्षूद्र जीव समझते (और मात्र 26/= रुपये कमाकर एक दिन का भोजन मिल सकेगा, ऐसी BPL -योजना बनाते) हैं। (भारत के विश्वविद्यालयों में दर्शनशास्त्र पढ़ाने वाले अधिकांश प्राध्यापक भौतीकतावादी या चार्वाक मत के अनुयायी हैं) वे छात्रों को केवल यही बताते हैं कि मनुष्य एक सामाजिक जीव है, जिसके कुछ इन्द्रियाँ हैं, अर्थात मनुष्य केवल body-mind complex, शरीर-मन का एक संयोजन (combination) मात्र है।
राजनीति शास्त्र में मनुष्य को केवल एक ऐसे प्राणी के रूप में देखा जाता है, जिसकी कुछ इन्द्रियाँ होती है। इस प्रकार मनुष्य की महिमा को छोटा कर दिया जाता हैं, उसकी अवमानना की जाती है। सेक्सपियर ने अपने एक नाटक में कहा है -" अक्सर हमलोग आचार-अनुष्ठान को ही इतना महत्वपुर्ण बना देते हैं, कि देवता ही उपेक्षित हो जाते हैं। " हमलोग मनुष्य के लिये ही विचार करते हैं, उनका दुःख-दैन्य किस प्रकार दूर हो सकता है, उसी के उपर सोचने में हमलोग इतने अधिक डूब चुके हैं, कि जिस मनुष्य के कल्याण की चिन्ता कर रहे हैं, उस मनुष्य को - उस मनुष्य की यथार्थ सत्ता को भूल गये हैं।
राजनीति शास्त्र में मनुष्य को केवल एक ऐसे प्राणी के रूप में देखा जाता है, जिसकी कुछ इन्द्रियाँ होती है। इस प्रकार मनुष्य की महिमा को छोटा कर दिया जाता हैं, उसकी अवमानना की जाती है। सेक्सपियर ने अपने एक नाटक में कहा है -" अक्सर हमलोग आचार-अनुष्ठान को ही इतना महत्वपुर्ण बना देते हैं, कि देवता ही उपेक्षित हो जाते हैं। " हमलोग मनुष्य के लिये ही विचार करते हैं, उनका दुःख-दैन्य किस प्रकार दूर हो सकता है, उसी के उपर सोचने में हमलोग इतने अधिक डूब चुके हैं, कि जिस मनुष्य के कल्याण की चिन्ता कर रहे हैं, उस मनुष्य को - उस मनुष्य की यथार्थ सत्ता को भूल गये हैं।
आज जो वैश्विक समस्या का रूप ले चुकी है, विशेष रूप से भारत के लिए जो एक संकट की स्थिति बन चुकी है, जिसे दूर करना सबसे आवश्यक है, वह है यहाँ के मनुष्यों की अपहृत सत्ता को पुनः प्रतिष्ठित करना। ऐसा प्रतीत होता है, मानो किसी अपराध के फलस्वरूप भगवान की मूर्ति में जिस प्राण को प्रतिष्ठित किया गया था, वह प्राण ही विलुप्त हो चूका है, और कहीं संगमरमर की मूर्ति पड़ी है, तो कहीं लकड़ी की बेजान मूर्ति लुढ़क रही है। जो मानव शरीर दिख रहा है, वह तो केवल लकड़ी, मिट्टी या संगमरमर का पत्थल है, उसमें देवता कहाँ हैं ? हमलोगों के भीतर जो ब्रह्म निश्चित रूप से विद्यमान हैं, उनको ही हमलोग अस्वीकार कर रहे हैं। तथा अपने को केवल एक हाड़-माँस का पिंजरा समझते हैं, जिसके भीतर कुछ इन्द्रियाँ अद्भुत करामात कर रही हैं, और हमलोग उसके कारनामों को नजर भर भर कर देख रहे हैं, और उसके उसकावे में बहते जा रहे हैं। इन्द्रिय विषयों में ही सुख ढूँढ़ रहे हैं, यही मनुष्य -समाज का सबसे बड़ा संकट है।
यह संकट बेबुनियाद नहीं है। इसीलिये बार बार यह समझाना पड़ता है, चर्चा करनी पडती है कि स्वामी विवेकानन्द, माँ सारदा और श्रीरामकृष्ण आज भी अत्यन्त आवश्यक हैं।
जगत में इस प्रकार का संकट पहले भी कई बार उपस्थित होता रहा है, और जब जब ऐसा संकट आता है, उसको कहते हैं, धर्म की ग्लानी होना या नीचे गिर जाना, एवं अधर्म का अभ्युत्थान हो जाना, अधर्म का उपर उठ जाना। यह धर्म का नीचे गिरना और अधर्म का अभ्युत्थान होने का अर्थ यह नहीं है कि मन्दिर टूट-फूट गये हैं, और अमीर लोगों से काला धन लेकर कुछ नये मन्दिर बना देने मात्र से ही धर्म का अभ्युत्थान हो जायेगा। ऐसा सोचना बिल्कुल गलत होगा। धर्म अपने स्थान से च्युत कब होता है ? जब हमलोग मनुष्य की अन्तर्निहित सत्ता या उसके ब्रह्मत्व की अवमानना करते हैं, उसको अस्वीकार करते हैं, और वह मानो संकोच, दुःख, लज्जा से अवनत हो जाती है, मनुष्य की दृष्टि अपनी ही अंतर्निहित सत्ता को देख ही नहीं पाती है। और तब हमलोग मात्र एक जीव या केवल एक पशु मात्र ही रह जाते हैं। हमलोगों की बाहरी आकृति या ढाँचा तो मनुष्य का ही है, आवरण मनुष्य का है, किन्तु पशु के जैसा स्वभाव लेकर समाज में विचरण करते हैं।
इसी प्रकार की घटना का सूत्रपात आधुनिक युग में भी हुआ था, जब पाश्चात्य विज्ञान, पाश्चात्य दर्शन, पाश्चात्य साहित्य आदि (रावण) ने हमलोगों के देश की मनीषा या बुद्धि (रूपी सीता ) का हरण कर लिया था। जिस समय हमारे देशवासी पाश्चात्य विद्या में धीरे धीरे शिक्षित होते जा रहे थे, जब वे पाश्चात्य संस्कृति की बाढ़ में डूबने-उतराने लगे थे, तथा हमारी प्राचीन संस्कृति जिसमें मनुष्य को उसकी यथार्थ सत्ता को जानने की पद्धति बताई गयी थी, उसकी उपेक्षा करने लगे थे और अपनी प्राचीन विचारधारा की हर बात को अन्धविश्वास कहकर उसका मजाक उड़ाने में लगे हुए थे, ठीक उसी समय भगवान श्रीरामकृष्ण आविर्भूत हुए।
बार बार 1853 ई0 की बात याद हो आती है, जब महान विचारक कार्ल मार्क्स किसी व्यक्ति को पत्र में लिखते हैं, " भारतवर्ष की वर्तमान अवस्था को देख कर मुझे बहुत दुःख का अनुभव हो रहा है, भारतवर्ष ने अपने अतीत को तो भुला दिया है, किन्तु उसके बदले किसी नई विचारधारा को अंगीकार भी नहीं किया है। वर्तमान में उसकी निराशाजनक अवस्था को देखते हुए, उसके भविष्य के विषय में कुछ भी सोच नहीं पा रहा हूँ। "
किन्तु ठीक उसी वर्ष, अर्थात 1853 ई0 में ही श्रीरामकृष्ण देव ने कोलकाता में पदार्पण किया था। उन्होंने वहाँ कोई मैजिक नहीं दिखलाया बल्कि, तत्कालीन शिक्षित समुदाय के समक्ष-जो ज्ञान प्राचीन काल में साधारण जनता की आँखों से अदृश्य जंगल की गोपनीयता में आविष्कृत हुआ था, उसी 'निर्विकल्प -समाधि ' को ही अपने नवीनतम विज्ञान के रूप में सीधे तौर पर प्रस्तुत कर दिया था। और जगत के समक्ष पहली बार, आधुनिक समय की शिक्षा के उपर इतराने वाले कोलकाता में, 'Trance-Science' या "भाव समाधी (तन्मयावस्था) " का विज्ञान प्रकट हो गया। एक ऐसे वैज्ञानिक धर्म का जन्म हुआ, जो कहता है- ' विश्वास नहीं, साक्षात्कार कर के देखो। सत्य-ज्ञान (अपने सच्चे स्वरूप ज्ञान ) प्राप्त कर लेना ही धर्म है।"
कठोपनिषद में कहा गया है कि प्रकृति ने जिस प्रकार हमलोगों की रचना की है, उसके अनुसार स्वभावतः हमारी समस्त इन्द्रियाँ बहिर्मुखी (बाहर जाने वाली) हो गयी हैं। इसी बहिर्मुखिनता के कारण हमलोग विभिन्न प्रकार के विषयों के संसर्ग में आते हैं; इस संसर्ग-छूटने से वेदना होती है, वेदना से अनुभूति (दिल को चोट पहुँचता है ), अनुभूति से क्रमशः तृष्णा आती है, और उसके बाद उन्हीं विषयों में हमलोग घोर आसक्त हो जाते हैं। इन्हीं सब कारणों से हमलोगों को विभिन्न प्रकार के दुःख, कमजोरी, बीमारी, मृत्यु आदि घेर लेते हैं। इस जन्म-मृत्यु के चक्र से हमलोग बाहर नहीं निकल पा रहे हैं।
इन्द्रिय जन्य संवेदना के अतिरिक्त और किसी प्रकार के सत्य-ज्ञान को नहीं पा रहे हैं। बहुत तरह का सत्य-ज्ञान (True -Knowledge) हो सकता है, उन सबों में सबसे अपेक्षित (आवश्यक) सत्य-ज्ञान है- मनुष्य के सम्बन्ध में सत्य-ज्ञान। इसी मनुष्य के सम्बन्ध में सत्य-ज्ञान नहीं रहने से हमलोग खोखला (भाव शून्य, मूढ़) बन जाते हैं, हमलोगों को अन्तःसार शून्य (आन्तरिक दिव्य-उर्जा (Pran) से रहित) हो जाना पड़ता है। श्रीरामकृष्ण-सारदा देवी-स्वामी विवेकानन्द ने आधुनिक समाज के सामने मनुष्य की इसी विडम्बना को उद्घाटित किया है।
उन्होंने मानव-जाति को यही उपदेश दिया कि तुमलोग अपने सभी क्षेत्रों में विकास करने के लिये, पहले आत्मविश्वासी बनो। तुम लोग अपनी अन्तर्निहित दिव्यता के प्रति अपनी खोयी हुई श्रद्धा को वापस ले आओ। स्वामी विवेकानन्द ने भारत के सर्वांगीन विकास के लिये, अपने देशवासियों के अपहृत आत्मश्रद्धा को वापस लौटा देने का आह्वान किया है। उनको शिक्षित करो।
इन्द्रिय जन्य संवेदना के अतिरिक्त और किसी प्रकार के सत्य-ज्ञान को नहीं पा रहे हैं। बहुत तरह का सत्य-ज्ञान (True -Knowledge) हो सकता है, उन सबों में सबसे अपेक्षित (आवश्यक) सत्य-ज्ञान है- मनुष्य के सम्बन्ध में सत्य-ज्ञान। इसी मनुष्य के सम्बन्ध में सत्य-ज्ञान नहीं रहने से हमलोग खोखला (भाव शून्य, मूढ़) बन जाते हैं, हमलोगों को अन्तःसार शून्य (आन्तरिक दिव्य-उर्जा (Pran) से रहित) हो जाना पड़ता है। श्रीरामकृष्ण-सारदा देवी-स्वामी विवेकानन्द ने आधुनिक समाज के सामने मनुष्य की इसी विडम्बना को उद्घाटित किया है।
उन्होंने मानव-जाति को यही उपदेश दिया कि तुमलोग अपने सभी क्षेत्रों में विकास करने के लिये, पहले आत्मविश्वासी बनो। तुम लोग अपनी अन्तर्निहित दिव्यता के प्रति अपनी खोयी हुई श्रद्धा को वापस ले आओ। स्वामी विवेकानन्द ने भारत के सर्वांगीन विकास के लिये, अपने देशवासियों के अपहृत आत्मश्रद्धा को वापस लौटा देने का आह्वान किया है। उनको शिक्षित करो।
यदि ब्राह्मण के लड़के के लिये एक शिक्षक की आवश्यकता हो, तो चांडाल के लडकों को शिक्षित करने के लिये दस शिक्षकों (आत्मश्रद्धा वापस लौटाने में समर्थ क्रांति-दूतों ) का निर्माण करो। आजकल जिनको अनुसूचित जाति और जनजाति कहा जाता है, उनके लिये अधिक शिक्षा की आवश्यकता है। सच्ची शिक्षा के माध्यम से ही उनकी गरीबी दूर की जा सकती है। इसी शिक्षा को प्राप्त करके अंतर में सोये हुए ब्रह्म जाग उठते हैं। जब कोई मनुष्य सच्चा आत्मविश्वासी बन जाता है, तब उसको समस्त वस्तुएँ प्राप्त हो जाती हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने भी गीता (6/5) में कहा है-
उद्धरेदात्मनाऽत्मानं नात्मानमवसादयेत् ।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥
मनुष्य को अपने द्वारा अपना उद्धार करना चाहिये और अपना अध पतन नहीं करना चाहिये क्योंकि आत्मा ही आत्मा का मित्र है और आत्मा (मनुष्य स्वयं) ही आत्मा का (अपना) शत्रु है।।
गीता (2/31 -38) में ही एक जगह श्रीकृष्ण अर्जुन को कहते हैं, " तुम युद्ध करो। तुम यदि युद्ध करके अपने कर्तव्य का पालन करो, यदि गृहस्थ होकर पारिवारिक कर्तव्यों का पालन करो, सामाजिक होकर समाज के कर्तव्यों का पालन करो, तभी तुम्हारे स्वधर्म का पालन करना होगा। अपने कर्तव्य का पालन करते हुए मृत्यु भी हो तो वही श्रेयस्कर है। "
गीता (2/31 -38) में ही एक जगह श्रीकृष्ण अर्जुन को कहते हैं, " तुम युद्ध करो। तुम यदि युद्ध करके अपने कर्तव्य का पालन करो, यदि गृहस्थ होकर पारिवारिक कर्तव्यों का पालन करो, सामाजिक होकर समाज के कर्तव्यों का पालन करो, तभी तुम्हारे स्वधर्म का पालन करना होगा। अपने कर्तव्य का पालन करते हुए मृत्यु भी हो तो वही श्रेयस्कर है। "
यदि हमलोग अन्तर्यामी प्रभु श्रीरामकृष्ण को बहुत प्रेम और श्रद्धा के साथ बहुत निकट से देखने की चेष्टा करें तो देखते हैं कि माँ को प्राप्त करने के लिये उनके जीवन में कितनी वेदना थी। कह रहे हैं, " माँ, तूने रामप्रसाद को दर्शन दिया है, मुझे नहीं दोगी ? " प्रतिदिन सूर्यास्त हो जाने के बाद कह रहे हैं, " और एक दिन बीत गया, आज भी तूने दर्शन नहीं दिया ? " माँ को पाने की क्या असाधारण व्याकुलता है, कितनी वेदना है ! और अंत में जब वे हाथ में कटार लेकर अपना जीवन ही समाप्त कर देने पर उतारू हो जाते हैं, ठीक उसी समय आद्याशक्ति उनको दर्शन देती हैं। किन्तु उसके बाद भी वे दर्द भरे गले से युवाओं को पुकार रहे हैं, " अरे, तुमलोग कहाँ हो ? माँ ने तो कहा था, तुम लोग आओगे। "
यहाँ ध्यान देने की बात यह है कि वे युवाओं को पुकार रहे हैं ! वृद्ध लोगों के लिये जितना देने को था, उससे अधिक ही वे दे चुके थे। किन्तु वही श्रीरामकृष्ण- माँ सारदा को कहते हैं, " तुम रहो, बहुत से काम करने हैं ! " अपने परिवार की तंगी (अभावग्रस्तता) को दूर करने की प्रार्थना करने गये तो माँ से माँग बैठते हैं- " माँ मुझे भक्ति दो, विवेक दो, वैराज्ञ दो, ज्ञान दो !" यहाँ थोड़ा विचार करके देखने की आवश्यकता है कि स्वामी विवेकानन्द ने अपनी गरीबी दूर करने के बदले यह " यही सब वस्तुएं क्यों माँगे होंगे ?
उसका कारण हम रामकृष्ण मठ और मिशन के आदर्श वाक्य ' आत्मनो मोक्षार्थं जगतहिताय च ' अर्थात - " आत्मा की मुक्ति और जगत का कल्याण " करने के लिये। उसके बाद माँ सारदा देवी ठाकुर के भक्त युवाओं का पालन-पोषण करने में अपना पूरा ध्यान केन्द्रित कर देती हैं।उनकी प्रार्थना और आशीर्वाद से ही श्रीरामकृष्ण के लीलापार्षद युवाओं के लिये - ' रामकृष्ण मठ और मिशन ' नामक एक संगठन खड़ा हो जाता है। इस संगठन के माध्यम से ही श्रीरामकृष्ण-जीवन-गोमुखी वितरण धारा से आज भारत भूमि को सिंचित और पल्लवित करते हुए, सम्पूर्ण विश्व क्रमशः उस धारा में स्नान करके पुलकित हो उठी है। इस मठ-मिशन के आविर्भूत होने के कारण ही हमलोग आज उनके जीवन और उपदेश पर चर्चा तथा समाज में उनके प्रयोग के प्रश्न को लेकर परस्पर विचार-विनमय कर पा रहे हैं।
कुछ लोग पूछते हैं, रामकृष्ण मिशन ने आखिर किया ही क्या है ? हमलोगों का मानना है कि, 'रामकृष्ण मठ और मिशन' जैसे सम्पूर्ण मानवता को समर्पित महान संगठन द्वारा की गयी सेवा-कार्यों को सूचीबद्ध किया ही नहीं जा सकता ! इस तरह की सूची तो कई छोटे-बड़े कई संगठन देते ही रहते हैं । किन्तु इस संगठन द्वारा की गयी सेवा-कार्यों की सूची तो बहुत लम्बी हो जाएगी। इसी विषय पर स्वामी अखण्डानन्द के साथ खेत्री के महाराज के वार्तालाप का स्मरण कीजिये। एक धनाड्य महाराज के साथ इस तरह के बर्ताव की सूची और कहीं नहीं मिलेगी। [ राजस्थान में प्राचीन समय मे ऐसा रिवाज था कि निम्न जाती की लड़कियों को राजा अपनी दासी बनाकर रखते थे...इन्हे 'गोली' और लड़कों को 'गोला ' कहा जाता था...गोलियों के रहन सहन का पूरा खर्च राजा ही उठाते थे लेकिन उनकी संतान,जो की राजा की ही संतान हुआ करती थी,को राजा का नाम या रुतबा नहीं मिलता था...उन्हे अपने 'तथा कथित पिता' के साथ ही रहना पड़ता था]
जिन्हें आमतौर पर 'गोली' के सेवक की तरह रखा जाता था, वैसे अनाथ बच्चो की शिक्षा के लिए उन्होंने राजस्थान में रहकर उनके लिए स्कूल की स्थापना किया था , यह कार्य लोग अक्सर कोई संस्था नहीं करती थी , किन्तु रामकृष्ण मिशन इसे भी एक बाह्य समाज-सेवा के रूप में करता आया है ।
जयदेव रचित गीत गोविन्द में माँ जगदम्बा के दस अवतारों की महिमा का बखान करते हुए कहा गया है -
" प्रलयपयोधिजले धृतवानसि वेदम् ।
विहितवहित्रचरित्रमखेदम्॥
केशवाधृत मीनशरीर जय जगदीश हरे॥"
[विहित = make do [improvising]; वहित्र = (like a) ship; चरित्रम = legendary; वेदं = Veda s] इस प्रकार हे हरि ! आप ही मानवजाति के मार्गदर्शक नेता हैं, आपकी जय हो ! अर्थात जैसे नौका (जलयान) बिना किसी खेद के सहर्ष सलिल-स्थित किसी वस्तु का उद्धार करती है, वैसे ही आपने बिना किसी परिश्रम के निर्मल चरित्र के समान प्रलय जलधि में मत्स्य रूप में अवतीर्ण होकर चार वेदों को धारणकर उनका उद्धार किया है। हे मत्स्यावतारधारी श्रीभगवान! आपकी जय हो। [साभार krishnakosh.org]
-हे जगदीश्वर! हे हरे! जिस प्रलय काल में सात समुद्रों के जल ने सम्पूर्ण पृथ्वी को बाढ़ में डुबो दिया था, हे केशव ! उस समय आपने मानवजाति के कल्याण के लिए 'मत्स्य अवतार' और कूर्म अवतार जैसे तुच्छ शरीर में अवतार लेकर भी अपने अथक परिश्रम द्वारा चारो वेदों को सुरक्षित बनाये रखा है। क्योंकि ये वेद ही उस नौका (जलयान) के समान हैं जो जीवात्मा को दूसरे तट तक (परमात्मा तक) ले जाने में समर्थ है।
ठीक जयदेव के शब्दों में हमलोग भी कह सकते हैं, जिस समय पाश्चात्य जगत के 'यूट्यूब', 'फेसबुक' आदि द्वारा निकृष्ट विचारों के बाढ़ में हमलोगों का देश लगभग डूबने को था, मानव कल्याण के लिये उस समय मनुष्य की अपहृत सत्ता का पुनरुद्धार करने हेतु, यह संगठन भी (मछली जैसे) नगण्य शरीर को धारण करके इस युग के लिये एक नये वेद को अपने सिर पर उठाये हुए किसी जलपोत के समान एक महादेश से दूसरे महादेशों तक पहुँचा देने के महान कार्य में लगी हुई है। इस संगठन के कारण ही आज हमलोग समाज-कल्याण के लिये नये विचार देख रहे हैं। हमलोग स्वयं इस प्रकार के सेवा कार्य में उतर पा रहे हैं, जहाँ मानव का कल्याण करते समय उसकी सत्ता को तिरस्करणीय नहीं समझा जाता है।
" श्रीरामकृष्ण-विवेकानन्द वेदान्त शिक्षक-प्रशिक्षण परम्परा " में भौतिक जगत या जड़-जगत की सत्यता को कभी अस्वीकार नहीं किया जाता है ! किन्तु अनजाने में कुछ लोग इस भावधारा पर भी इस प्रकार का दोषारोपण किया करते हैं। (Energy =Matter, ब्रह्म और शक्ति, पुरुष और प्रकृति अभेद हैं, निर्गुण में सगुण होने, या जल में बरफ बनने की शक्ति विद्यमान है -नहीं जानने के कारण। )
स्वयं श्रीरामकृष्ण देव ने ही स्वामीजी के घर के लिये थोड़ा मोटा चावल-कपड़ा की व्यवस्था, और देवघर के संथालों के लिये अन्न-वस्त्र और सिर में तेल देने की व्यवस्था की थी। उन्होंने ने ही कहा था- " खाली पेट धर्म नहीं होता।" एक व्यक्ति (हाजरा महाशय ?) अपना घर-द्वार छोड़ कर दक्षिणेश्वर में ही पड़ा रहता था और साधक-पुजारी होने का ढोंग कर रहा था, किन्तु वास्तव में वह आध्यात्मिक व्यक्ति नहीं था। उसकी भर्त्सना करते हुए श्रीरामकृष्ण बोले , " तुम्हारे पत्नी-पुत्र को क्या तुम्हारे पड़ोसी खाना खिलाएंगे ?
उन्होंने और भी कहा था, " बेल के खोपड़े और बीजों को हटा कर बेल का पूरा वजन नहीं पाया जा सकता।" लेकिन सावधानी केवल इतनी रखनी है कि खोपड़े-बीज में ही सम्पूर्ण आसक्ति हो जाने से कहीं गूदा से ही वंचित न हो जाना पड़े ? क्योंकि सम्पूर्ण शक्ति को औपचारिक अनुष्ठान में ही खपा देने पर, मूल देवता तो पहुँच के बाहर ही छूट जाते हैं। केवल नश्वर बाह्य वस्तुओं (नश्वर भौतिक पदार्थों पर या M/F की बाह्य आकृति) में ही नजरों को गड़ाये रखने से भीतर की अविनाशी वस्तु (सत्य या आत्मा) पर नजर तो कभी जा ही नहीं सकती है।
इसीलिये जब हमलोग केवल नारियल खोपड़े जैसा नश्वर भौतिक शरीर के चकाचौंध को ही 'वस्तु , वस्तु ' कहते हुए उसके (नश्वर M/F भौतिक शरीर के) रंग-रूप और और बाह्य आकृति में ही आसक्त हो जाते हैं, और मनुष्य के भीतर के गूदे की उपेक्षा कर देते हैं, तो असली वस्तु (अविनाशी आत्मा, ईश्वर, भगवान, सत्य स्वरूप या अस्तित्व ) को ही खो देते हैं, और इस प्रकार निःस्व (आत्म-रहित) होकर निर्धनता, अज्ञानता और विभिन्न प्रकार की शारीरिक समस्याओं से उत्पीड़ित हो जाते हैं, उस समय इन समस्याओं का सही हल निकलना हो, तो मनुष्य के भीतरी वस्तु (उसकी अन्तर्निहित दिव्यता) का पुनर्बोधन तथा उद्घाटित करने की आवश्यकता महसूस होती है। क्योंकि उसी आन्तरिक सत्ता ( आत्मा या अन्तर्यामी प्रभु) में ही हमलोगों की सारी शक्ति, ज्ञान और पवित्रता अन्तर्निहित रहती है।
आन्तरिक वस्तु के इन्हीं तीन संसाधनों (3H-देह, मन और ह्रदय) को कार्य में नियोजित किया जाये, तो कोई भी मनुष्य स्वयं अपने समस्त दुखों-कष्टों को दूर करने में समर्थ बन सकता है , और अपनी, समस्त समस्यायों का समाधान कर सकता हैं। जगत और मनुष्यत्व का यथार्थ बोध एवं उसके दुःख के बोझ को उठाने के सामर्थ्य प्राप्त करने के लिये श्रीरामकृष्ण-सारदा देवी-स्वामी विवेकानन्द की विचारधारा का श्रवण-चिन्तन और कर्म में रूपायन करना आवश्यक है।
यह विचारधारा मनुष्य को जीवन से उदासीन होने को नहीं कहती है, बल्कि जीवन में जीत हासिल करने की अदम्य उर्जा प्रदान करती है। यह विचारधारा किसी भी भौतिक वस्तु की उपेक्षा करने की बात नहीं कहती; बल्कि यह यथार्थवाद के जंजीर में न बंध कर मनुष्य को उसके यथार्थ स्वरूप की खोज करने, तथा उसी के बल पर मनुष्य के जीवन को पूर्णतर बना लेने के लिये प्रेरित करती है। इसीलिए, हमलोग वस्तु (पदार्थ) को अस्वीकार नहीं करते, बल्कि हमलोगों के लिये तो 'वस्तु' ही लभ्य है !
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