Tuesday, November 27, 2012

$@$स्वामी विवेकानन्द और हमारी सम्भावना [42] ' शक्ति सामर्थ्य ' (विलपॉवर)(जीवन-गठन की निर्माण-सामग्री),

' इच्छा-शक्ति को मोड़ने और ब्रेक कसने की तकनीक'
मनुष्य के पास मन नामक एक वस्तु है। हमारे पास संकल्प जैसी एक वस्तु है। यह संकल्प भी मन की ही एक क्रिया है। हमलोग किसी भी वस्तु को पाने की इच्छा कर सकते हैं, फिर दृढ़ संकल्प के द्वारा इच्छा को ईच्छाशक्ति में परिणत भी कर सकते । स्वामी विवेकानन्द इसका एक छोटा सा उदहारण देते हुए कहते हैं, " मानलो एक इंजन आ रहा है, और एक छोटा सा कीड़ा लाइन पर खड़ा है। इंजन में इतनी शक्ति है,किन्तु वह जड़ है, यदि ड्राइवर ब्रेक नहीं लगाये तो वह चलता जायेगा। किन्तु जो एक छोटा सा कीड़ा है, उसमें अपने प्राणों की रक्षा करने की प्रवृत्ति है। इसीलिये वह इतने बड़े इंजन के आने पर वह केवल लाइन से उतर कर, स्वतः नीचे सरक जायेगा। "
युवाओं का कार्य केवल इसी इच्छाशक्ति को बढ़ा लेना है। हमलोग इच्छाशक्ति के प्रवाह के वेग को स्वतः घटा-बढ़ा सकते हैं, उसके प्रवाह की दिशा को परिवर्तित कर सकते हैं, या मोड़ दे सकते है। मलोग यदि खड़े हैं, तो चल सकते हैं; यदि चल रहे हों, तो जब चाहें तभी खड़े भी हो सकते हैं। अर्थात हमलोग अपने 'विल-पॉवर' (willpower- इच्छाशक्ति, संकल्प शक्ति,आत्मसंयम) को कार्य में लगा सकते हैं।
स्वामीजी का एक अन्य सन्देश है- उन्होंने कहा है, हमें अपने विवेक को जाग्रत करना होगा, तथा विवेक के साथ अपनी शक्ति का प्रयोग करना सीखना होगा। इच्छशक्ति को यदि विवेक के साथ प्रयोग करें, तो यह समझ पाएंगे कि उसके प्रवाह की गति को किस दिशा में मोड़ना अच्छा होगा? इच्छशक्ति के प्रवाह और विकास की दिशा-परिवर्तन करने, और वेग को घटाने या बढ़ाने की आवश्यकता है या नहीं.…? यह विचार यदि युवाओं के मन में उठने लगे, तभी हमलोग अपनी जीवनी-शक्ति (प्राण) के प्रयोग के विषय में विचार कर सकेंगे। युवाओं के लिये यह आवश्यक है कि वे अपने शक्ति के मूल स्रोत को अच्छी तरह से जान लें,कि हमारे पास कितनी शक्ति है? जिस प्रकार बाह्य जगत में, हमारी मिट्टी के नीचे पेट्रोलियम, कोयला, गैस आदि प्राकृतिक सन्साधन होते हैं, उसी प्रकार हममे से प्रत्येक के अन्तर जगत में भी अनन्त शक्ति है। इस मिट्टी की काया में
 ('प्रत्यक् आत्मन्' या भीतर की ओर गयी हुई ) अनन्त शक्ति है। हममें से प्रत्येक व्यक्ति इसके अधिकारी हैं। हमे केवल यह जानना होगा कि हमारे भीतर में ही कहाँ क्या क्या छुपा हुआ है ? प्रत्येक युवकों के लिये यह आवश्यक है कि वह अपनी अन्तर्निहित शक्ति की ओर देखना सीखे। हममें से कोई भी व्यक्ति कमजोर, नीच, निर्बल या मामूली जीव नहीं हैं, हममें से प्रत्येक के भीतर अनन्त शक्ति विद्यमान है। हमलोगों को केवल यही सीखना है कि हम इस शक्ति को जाग्रत कैसे कर सकते हैं ?
स्वामीजी ने शिक्षा के विषय में एक अद्भुत सन्देश दिया है ! शिक्षा के द्वारा हम अपनी इच्छाशक्ति को संग्रहित कर सकते हैं, उसकी रोक-थाम कर सकते हैं, उसे उपयोगी और कार्यकारी बना सकते हैं- स्वामीजी शिक्षा को तीन प्रकार की अद्भुतपदवी से विभूषित करते हैं ! यह जो अदभुत इच्छाशक्ति हमारे भीतर है, उसके सम्बन्ध में जानना होगा। दूसरे प्राणियों में यह शक्ति मनुष्यों के तुलना में कम है।  तथा इसी इच्छाशक्ति की सहायता से हम अपनी अपनी अन्तर्निहित शक्ति को बाहर निकाल सकते हैं। एक स्थान पर स्वामीजी कहते हैं, " विश्व का इतिहास कुछ थोड़े से आत्मविश्वासी मनुष्यों का इतिहास है। यदि तुम कभी किसी कार्य में असफल हो जाओ, तो -यह समझ लेना कि यह अन्य किसी कारण के चलते नहीं हुई है-एकमात्र तुमने अपने भीतर की अनन्त शक्ति को प्रकट करने के लिये जितनी मात्रा में प्रयत्न करना चाहिए था, उतनी मात्रा में प्रयत्न नहीं कर सके हो, इसीलिये तुमको यह असफलता मिली है।"
आधुनिक मनोविज्ञान भी यही कहता है, कि प्रयत्न में कमी के आलावा विफलता का कोई दूसरा कारण नहीं है। आज पाश्चात्य देशों में मनोविज्ञान को एक स्वतंत्र विज्ञान के रूप में मान्यता मिल चुकी है। वे लोग अभी मन के उपर अनुसन्धान करने में लगे हुए हैं। वे भी ठीक यही बात कह रहे हैं कि मनुष्य के भीतर अनन्त शक्ति है। 
एक मनोवैज्ञानिक कहते हैं, " हमलोगों के अवचेतन मन के भीतरी दरवाजे के चौखट से ठीक पीछे ही अनन्त शक्ति का भण्डार है। " और स्वामीजी कहते हैं, इस अनन्त शक्ति को अभिव्यक्त किया जा सकता है। किन्तु, कैसे ? हमलोग अपने अन्तर्निहित इस अनन्त शक्ति को अध्यवसाय, इच्छाशक्ति, पवित्रता, और आत्मविश्वास के द्वारा अभिव्यक्त कर सकते हैं। युवा शक्ति ही देश की विभिन्न समस्याओं का समाधान कर सकती है। कैसे, किस उपाय से ? वे लोग आत्मविश्वासी बनेंगे और विभिन्न पद्धति से उन उपायों का प्रयोग करके पहले अपने जीवन को परिवर्तित करेंगे। अपने शक्ति को अभिव्यक्त करेंगे। तथा उसी शक्ति की सहायता से वे समस्त समस्याओं का समाधान करेंगे। मनुष्य यदि मनःशक्ति-सम्पन्न हो जाये, तो वह किसी भी समस्या की जड़ को देख सकता है, तथा पारदर्शी सोच (स्पष्ट-चिन्तन) और अभिव्यक्ति की सहायता से समाज की समस्त दोषों को दूर कर सकता है। इसीलिये स्वामीजी ने 'पूर्ण रूप से मनुष्य '- गढ़ने के सन्देश को कई प्रकार से दिया है। 
स्वामीजी के सिद्धान्तों का व्यवहार में अपनाया जाय, तो यह देखा जा सकता है कि जिस प्रकार वैज्ञानिक सत्यों का कभी भी प्रयोग करें तो उसका फल हर समय एक ही प्राप्त होता है, उसी प्रकार उनके सिद्धान्तों को जीवन में प्रयोग करने से वे ठीक उसी प्रकार फलदायी होते हैं। स्वामीजी कहते हैं, एक 'पूर्ण-मनुष्य'  सा 'मनुष्य' - गढने के लिये, उसके तीन पहलुओं (पक्ष) - देह, मन, हृदय 'Body, mind, heart' को ठीक रूप में गढ़ना होगा। यदि तुम्हारा देह-मन स्वस्थ और सबल है, और हृदय उदार हो तभी तुम 'पूर्ण-मनुष्य ' जैसे मनुष्य  हो। यदि समाज में इसी प्रकार के मनुष्यों की संख्या अधिक हो जाय तो समाज की समस्त समस्याओं का समाधान होना संभव है। अपने तीनो पहलु को ठीक रूप में कैसे गढ़ूंगा ? देह को स्वस्थ रखने के लिये जितना पौष्टिक आहार लेना सम्भव हो, उतना पौष्टिक आहार लेने की चेष्टा करेंगे। उसके साथ साथ शारीरिक व्यायाम के द्वारा शरीर को बलवान बनाने की चेष्टा करूँगा। उसी प्रका मन को भी स्वस्थ और बलवान बनाने के लिये मन को भी पौष्टिक आहार और व्यायाम की आवश्यकता होती है। मन को खेलाना (प्रत्याहार-धारणा), काम में लगाना मन का व्यायाम है। हमलोगों का मन स्वतः (बहिर्मुखी होकर) अन्न-वस्त्र, स्वार्थपरता इत्यादि की ओर चला जाता है; किन्तु इसको वहाँ से खींच कर दूसरी ओर भी खेलाया जा सकता है(अन्तर्मुखी करके-हृदय में विद्यमान श्रीरामकृष्ण पर एकाग्र किया जा सकता है।) जब अपने अंतर में (हृदय में उस एक को देखने का अभ्यास किया जाता है -जिससे सब निकला है, तब हृदय विशाल हो जाता है, और ) जगत को नाना रूप में नहीं 'एक' रूप में देखा जा सकता है। दूसरों के दुःख में दुःखी हुआ जा सकता है।
 ( दिल में रहती है तस्वीरे यार, जब जरा गर्दन झुकाई देखली !) अपने भीतर झाँक-झाँक कर आनन्द पाया जा सकता है। इस शक्ति को जगाकर अपनी इच्छशक्ति को बढ़ाया जा सकता है। ऐसा नहीं करने से विचारण-क्षमता, पारदर्शी सोच कमजोर हो जाती है। इसीलिये विचारण-क्षमता (बहुत्व में एक को देखने की शक्ति) को हमें काम में लाना होगा। यही है मन का व्यायाम। और मन का आहार क्या है ? अच्छे विचार, अच्छी सोच। यह मन को पौष्टिकता प्रदान कर सकता है, पहले चेतन मन पुष्ट होता है, बाद में अवचेतन मन भी पुष्ट हो जाता है। मन के लिये पौष्टिक आहार या अच्छे विचारों को आसानी से पाने का सबसे अच्छा श्रोत है, स्वामी विवेकानन्द की विचारधारा, उनके जीवन और सन्देश का अध्यन, उनकी विवेचना करना, इनका प्रतिदिन अभ्यास करना, और उन सिद्धान्तों को मन की गहरी परतों बसा लेना। यही है मन का आहार।
उसी प्रकार दुखी मनुष्यों के दुःख को देखकर उनके प्रति सहानुभूतिशील बन कर हमलोग अपने हृदय को बहुत बड़ा, व्यापक और विशाल बना सकते हैं। यह है, हृदय का व्यायाम। तथा इसी प्रकार के हृदयवान व्यक्तियों की जीवनी और संदेशों का अध्यन करके, उनके सिद्धान्तों से अनुप्रेरित होकर हृदयवान बना जा सकता है। युवाओं के लिये यही करनीय है।
 उन्हें मन की शक्ति को, अर्थात इच्छाशक्ति के प्रवाह को संयत करने की क्षमता अर्जित करनी होगी। मानलो मैंने साईकिल चलाना सीख तो लिया,पर मेरी साईकिल में ब्रेक नहीं हो, और रोड पर अचानक गड्ढा आ जाने पर, सायकिल की हैंडल को मोड़ना और अचानक ब्रेक कसने का तरीका (पहले पिछला चक्का बाद में अगला कसना है) मुझे नहीं मालूम हो; तो शीघ्र ही दुर्घटना हो सकती है। यदि हमलोग मन को विषयों में जाने से या बहिर्मुखी होने से रोकना नहीं सीखें तो बहुत बड़ा खतरा हो सकता है। हमें यह सीखना होगा कि इच्छशक्ति को कैसे प्रभावकारी बनाया जाता है ? 
स्वामीजी कहते हैं, जो अपनी इच्छाशक्ति को प्रभावकारी बनाना जनता है, उसीको को शिक्षित मनुष्य कहा जा सकता है। युवाओं के लिये इस शिक्षा को प्राप्त करना ही आवश्यक है। स्वार्थपरता और केवल सुख भोग करने की इच्छा को त्याग कर, महान सिद्धांतों को अपने जीवन में ग्रहण करना ही हमलोगों का कर्तव्य है। निर्भयता, निःस्वार्थता, आत्मविश्वास के, त्याग के भाव को अर्जित करना होगा। युवाओं के इस प्रकार निर्मित होने से सभी समस्याओं का समाधान हो जायेगा। भारत में व्यापक रूप से युवाओ को ऐसी शिक्षा देने का प्रयास नहीं हुआ है, इसीलिये समस्याओं का समाधान भी नहीं हो रहा है। रोज नया नया घोटाला सामने आता जा रहा है।
क्योंकि हमलोगों की शिक्षा व्यवस्था में सच्ची शिक्षा नहीं दी जा रही है। किन्तु अब क्या किया जा सकता है ? हमारे रहनुमाओं ने दो लोग को आदेश दे दिया, तुमलोग एक नई शिक्षा व्यवस्था की योजना बनाओ। और इसके उपर आवाज उठाने वाले दो पण्डितों से कह दिया गया कि, शिक्षा के उपर एक कमिशन गठित कर दिया गया है, आपलोग उसके आधार पर अपना रिपोर्ट दीजिये। किन्तु जो रिपोर्ट आया उसको हमने ग्रहण ही नहीं किया। इस प्रकार क्या शिक्षा में परिवर्तन आ सकता है ?
नहीं आ सकता, इसीलिये हमारा कार्य है, भगवान के ओर, सरकार की ओर, राजनैतिक दलों की ओर नहीं देखकर, अपने भीतर की ओर दृष्टिपात करना। मेरे देह-मन में शक्ति है, उसे मैं बढ़ा सकता हूँ; हृदय अभी संकीर्ण है, उसे उदार और विशाल बना सकता हूँ। दूसरों के दुःख का अनुभव करके मैं अपनी समस्त शक्तियों को देश के कल्याण में नियोजित कर सकता हूँ। इस काम के लिये भगवान या राष्ट्र के आगे प्रार्थना नहीं करके, अपनी अन्तर्निहित शक्ति से विनती करूँगा। हमलोग अपने अन्तर्निहित अनन्त शक्ति का अपमान नहीं करेंगे। हम अपनी अनन्त शक्ति को धूल-कीचड़ में गिराकर गंदगी से मलीन नहीं होने देंगे। हमलोगों की जीवनी शक्ति को आकृष्ट करके, स्वामीजी ने जो शास्वत पथ दिखलाया है, उसी पथ पर चलना होगा। हमें ऐसी चेष्टा करनी होगी कि उस पथ का सन्देश प्रत्येक युवक के कानों में में ही नहीं, उसके हृदय तक भी पहुँच जाये। यह सन्देश उनकी शक्ति उनकी शक्ति को बढ़ा सके, और उसके बाद वे उस अपरिमित शक्ति को देश के कल्याण में खर्च कर सकें।
जिस समय इस प्रकार के युवकों का दल गाँव गाँव में गठित हो जायेगा, तब इस समय जो (विदेशी) यह समझ बैठे हैं, कि यह देश (भारतवर्ष) उनकी मल्कियत है, और वे युवा शक्ति की वास्तविक उर्जा को निचोड़ कर, उनकी शक्ति को विभिन्न दिशा में (आईपीएल -चीयर गर्ल्स ) लगाकर उनकी उस शक्ति को, जीवन को, देश को भी नष्ट करके; उनकी जैसी इच्छा होगी वे उसी ढंग से देश को चलायेंगे-  उस समय वे कायर और डरपोक की तरह एक कोने में दुबक कर बैठ जायेंगे। उनके उपर शासन का डण्डा (लोकपाल) नहीं चलाना होगा, वे तो देश के हर क्षेत्र में देशभक्त और चरित्रवान  युवाओं को प्रतिष्ठित देखकर डर के मारे अपनी दुकान समेट कर भाग जायेंगे। मनुष्य की आत्मा में अनन्त शक्ति है। हममें से प्रत्येक युवा, भारत की युवा शक्ति का केवल एक प्रतिशत भी यदि, इस शक्ति को लेकर अपना जीवन गठित कर लें, तो उनके डर से अन्य समस्त शक्तियाँ दुम दबाकर भाग खड़ी होंगी। 
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[ जगत को हिला-दुला देने वाले तीव्र इच्छा-शक्तिसम्पन्न महापुरुष अपने प्राण के कम्पन को इतनी उच्च अवस्था में ला सकते हैं कि हजारों मनुष्य उनकी ओर खिंच जाते हैं, सभी पैगम्बरों का प्राण पर अद्भुत संयम था। जिसके बल से वे प्रबल इच्छा-शक्ति सम्पन्न हो गये थे। जब कोई मनःसंयोग (ध्यान-जप) कर रहा हो, तो भी समझना चाहिये कि वह प्राण का ही संयम कर रहा है।(1/58-67)
" हमें मालूम है कि हमारे स्नायुओं के भीतर दो प्रकार के प्रवाह हैं, उनमें से एक को अन्तरमुखी और दूसरे को बहिर्मुखी, एक को ज्ञानात्मक और दूसरे को कर्मात्मक, एक को केन्द्र-गामी और दूसरे को केन्द्रापसारी कहा जा सकता है। एक मस्तिष्क की ओर सम्वाद ले जाता है, और दुसरा मस्तिष्क से बाहर, समुदय अंगों में। मेरुदण्ड के भीतर बाएं इड़ा और दायें पिंगला नाम के दो स्नायविक शक्ति-प्रवाह और मेरुम्ज्जा के ठीक बीच में जो शून्य नली गयी है वही सुषुम्णा है। यह मेरुमज्जा मस्तिष्क में जाकर एक प्रकार के 'बल्ब' में medulla (मज्जा) नामक एक अंडाकार पदार्थ में अंत हो जाती है, जो मस्तिष्क के साथ संयुक्त नहीं है, वरन मस्तिष्क में जो एक तरल पदार्थ है, उसमें तैरता रहता है। यदि सिर पर कोई आघात लगे तो उस अघात की शक्ति उस तरल पदार्थ में विखर जाती है, और इससे उस बल्ब को कोई चोट नहीं पहुँचती।
विद्युत् क्या है, यह किसी को नहीं मालूम; हमलोग इतना ही जानते हैं कि विद्युत् एक प्रकार की गति है। समस्त परमाणु यदि एक ओर गतिशील हों, तो उसीको वैद्युत  गति कहते हैं। इस कमरे में जो वायु है, उसके सारे परमाणुओं को यदि लगातार एक ओर चलाया जाय, तो यह कमरा एक महान बैटरी के रूप में परिणत हो जायेगा। यदि श्वास-प्रश्वास की गति नियमित की जाय, तो शरीर के सारे परमाणु एक ही दिशा में गतिशील होने का प्रयत्न करेंगे। 
जब विभिन्न  में दिशाओं में दौड़ने वाला मन एकमुखी होकर एक दृढ इच्छा-शक्ति के रूप में परिणत होता है, तब सारे स्नायु-प्रवाह भी एक प्रकार के विद्युत् का आकार धारण कर लेती है। जब शरीर की सारी गतियाँ सम्पूर्ण रूप से एकाभिमुखी होती हैं, तब वह शरीर मानो इच्छा-शक्ति का एक प्रबल विद्युत्-आधार या डायनेमो बन जाता है। (1/73)
' प्राण का अर्थ है शक्ति। तो भी हम  इसे शक्ति नाम नहीं दे सकते, क्योंकि शक्ति तो इस प्राण की अभिव्यक्ति मात्र है। मनुष्य देह में तीन मुख्य प्राण-प्रवाह अर्थात नाड़ियाँ है। यदि मेरुदण्ड मध्यस्थ सुषुम्णा के भीतर से स्नायु प्रवाह चलाया जा सके तो देह का बंधन फिर न रह जायेगा, सारा ज्ञान हमारे अधिकार में आ जायेगा। मूलाधार चक्र में जन्म-जन्मान्तर के संस्कार-समिष्टि मानो संचित सी रहती है। और उस कुण्डलीकृत क्रियाशक्ति को कुण्डलिनी कहते हैं। कुण्डलिनी को जगा देना ही तत्वज्ञान, अतिचेतन अनुभूति या आत्मसाक्षात्कार का एकमात्र उपाय है। चार योगों में से किसी की सहायता से कुण्डलिनी को जाग्रत किया जा सकता है। 1/77
' इस सुषुम्णा को खोलना ही योगी का एकमात्र उद्देश्य है। सबसे नीचे वाला चक्र ही समस्त शक्ति का अधिष्ठान है। उस शक्ति को उस जगह से उठाकर मस्तिष्कस्थ  'बल्ब' तक ले जाना होगा। तब वह कामशक्ति ओज शक्ति में परिणत हो जाती है। ब्रह्मचर्य के बिना राजयोग की साधना बड़े खतरे की है, मस्तिष्क बिगड़ भी सकता है। तन-मन-वचन से सर्वदा सब अवस्थाओं में मैथुन का त्याग ही ब्रहचर्य है। 1/101' अपवित्र-जीवन जीने वाला योगी नहीं बन सकता है। 1/82] 
[साईकिल चलना सीखने जैसा -'इच्छाशक्ति के प्रवाह वेग को घटाने-बढ़ाने और उसकी प्रवाह की दिशा को मोड़ने की तकनीक से हृदयवान बना जा सकता है। युवाओं के लिये यही करनीय है। ']

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