Saturday, July 7, 2012

' सच्चा व्यक्तित्व:नर रूप में नारायण '

द्वैत ज्ञान बिल्कुल मिथ्या है !
(स्वामी विवेकानन्द )
 " हमें अपने इस सृष्टि की व्याख्या स्मरण रखनी चाहिये। हमारा यह जगत क्या है ? यह हमारे ज्ञान के स्तर पर प्रक्षिप्त अनन्त सत्ता मात्र है। अनन्त का केवल कुछ अंश हमारे ज्ञान के स्तर पर प्रक्षिप्त हुआ है, जिसे हमलोग अपना जगत कहते हैं।  
अनन्त का जो भाग हम अपने इस ज्ञान के भीतर से अनुभव करते हैं, जो मानो देश-काल-निमित्त रूप चक्र के भीतर पड़ा है, वह अनायास हमें बोधगम्य हो जाता है।
किन्तु धर्म का वह अंश जो अनन्त को जानने की चेष्टा करता है, वह हमारे लिए सर्वथा नवीन है; इसीलिए उसके चिन्तन से मस्तिष्क में नयी लीक तैयार होती रहती है, जिससे सारा शरीर-मन ही मानो उलट-पलट जाता है।
इन विघ्न-बाधाओं को यथासम्भव कम करने के लिए ही ऋषि पतंजली ने ' अष्टांग सूत्र ' का आविष्कार किया है, ताकि हम उनमें से ऐसी किसी एक साधन-प्रणाली को चुनकर अपना लें, जो हमारे लिये सर्वथा उपयोगी हो।" [1/141]
" देश का अर्थ है -प्राण को शरीर के किसी अंश-विशेष में आबद्ध रखना। समय का अर्थ है-प्राण को किस स्थान में कितने समय तक रखना होगा, इस बात का ज्ञान; और संख्या का अर्थ है-यह जान लेना कि कितनी बार ऐसा करना होगा। " [विवेकानन्द साहित्य खण्ड1/पृष्ठ संख्या 183]
" यह कहना कि - ' आत्मा नामक शक्ति शरीर के भौतिक परमाणुओं के विभिन्न संघातों से उत्पन्न होता है, उतना ही हास्यास्पद है, जितना कोई बैल के आगे गाड़ी जोतने का प्रयास करे तो होगा। " ये संघात कैसे उत्पन्न हुए ? (किस शक्ति ने ' हिग्स बोसोन ' को उत्पन्न कर दिया ?) यह सिद्ध किया जा सकता है कि ठोसपन, कठोरता आदि जो सब जड़ वस्तु ' क्षिति ' के गुण हैं, वे गति के परिणाम हैं। तरल या वाष्पीय अवस्था (वायुपुन्ज ) में यदि अत्यधिक गति उत्पन्न कर दी जाये जैसे तूफान में, तो वह ठोस सा हो जाता है और अपने आघात से ठोस पदार्थों को तोड़ या काट सकता है।
From Snowflakes to CERN The Hunt for the Higgs Boson by Nicholas Mee (Author, Higgs Force)
[Ice is so familiar to us that we just accept the sudden and dramatic metamorphosis of water as it cools below its freezing point. A liquid that we can dive into is spontaneously transformed into a hard rock-like material that we would crack our skull on. 
 John Locke used the following anecdote to express just how surprising this transformation really is: “A Dutch ambassador, who entertaining the king of Siam with the particularities of Holland, which he was inquisitive after, amongst other things told him that the water in his country would sometimes, in cold weather, be so hard that men walked upon it,and that it would bear an elephant, if he were there. To which the king replied,Hitherto I have believed the strange things you have told me, because I look upon you as a sober fair man, but now I am sure you lie.”
in the 1930s the Russian theoretical physicist Lev Landau recognised that they share common features. He realised that in each case, the transformation of the material is accompanied by a loss of symmetry, and this insight was the first step towards building a mathematical model of phase transitions. Landau’s theory represents one of the most important insights in the whole of 20th-century physics.]
 जिस किसी वस्तु की आकृति है, वह परमाणुओं की एक संहति मात्र है, अतेव उसको चलाने के लिये इससे भिन्न कोई अन्य वस्तु चाहिए। यह ' अन्य कोई वस्तु ' ही संस्कृत भाषा में आत्मा के नाम से संबोधित हुई है।
यह आत्मा ही कारण शरीर में से मानो स्थूल शरीर पर काम कर रही है। जो हमारे मन, बुद्धि, इन्द्रिय और शरीर आदि को चला रही है, इसी शक्ति की अभिव्यक्ति को शारीरिक आकृति वाला एक ऐसा ज्योतिर्मय पदार्थ (कारण शरीर =हिग्स बोसोन?) माना गया है, जो इस शरीर के नष्ट हो जाने पर भी बचा रहता है।
 काल का आरम्भ मन से होता है-देश भी मन के अंतर्गत है। काल के बिना कार्य-कारण वाद नहीं रह सकता। क्रम विकास की भावना के बिना कार्य-कारणवाद नहीं रह सकता। अतेव देश-काल-निमित्त (कार्य-कारणवाद) मन के अंतर्गत हैं, और यह आत्मा मन से अतीत और निराकार होने के कारण, देश-काल-निमित्त के परे है। और जब वह देश-काल-निमित्त के अतीत है, तो अवश्य अनन्त होगी। और अनन्त कभी दो नहीं हो सकता। अतेव यह जो अनेक आत्माओं की धारणा है- तुम्हारी एक आत्मा, मेरी दूसरी आत्मा -यह सत्य नहीं है। अतेव मनुष्य का सच्चा स्वरूप एक ही है, वह अनन्त और सर्वव्यापी है, और यह प्रतिभासिक जीव मनुष्य के इस वास्तविक स्वरुप का एक सीमाबद्ध भाव मात्र है।
मेरा यथार्थ स्वरूप - आत्मा, कार्य-कारण कार्य-कारण या देश-काल से अतीत होने के कारण अवश्य मुक्तस्वभाव है। यह प्रतिभासिक जीव यह (बिकेसिंह नामक) प्रतिबिम्ब देश-काल-निमित्त के द्वारा सीमाबद्ध होने के कारण प्रतीत होता है,मानो वह बद्ध हो गया है, पर वास्तव में वह भी बद्ध नहीं है। " [2/8-11]

" वास्तव में ' मैं ' अथवा 'तुम ' कुछ नहीं है-सब एक ही है। चाहे कहो-' सभी मैं हूँ ', या कहो ' सभी तुम हो '।यह द्वैत ज्ञान बिल्कुल मिथ्या है, और सारा जगत इसी द्वैत ज्ञान का परिणाम है। जब विवेक के उदय होने पर मनुष्य देखता है, कि दो वस्तुएँ नहीं हैं, एक ही वस्तु है, तब उसे यह बोध होता है कि वह स्वयं यह अनन्त ब्रह्माण्ड स्वरुप है। इस माया, या अज्ञान या नाम-रूप, या यूरोपीय भाषा में इस देश-काल-निमित्त के कारण यह एक अनन्त सत्ता इस वैचित्र्यमय जगत के रूप में दिख पड़ती है।" [2/30-31]
" वाह्य जगत के बारे में कितना भी ज्ञान क्यों न हो जाये, पर उससे सृष्टि रहस्य का भेद नहीं खुल सकता। क्योंकि मन देश-काल और निमित्त की चहारदीवारी के बाहर नहीं जा सकता। जिस प्रकार कोई व्यक्ति अपनी सत्ता को नहीं लाँघ सकता, उसी प्रकार देश और काल के नियम ने जो सीमा खड़ी कर दी है, उसका अतिक्रमण करने की क्षमता किसी में नहीं है। ..क्योंकि इसकी चेष्टा करते ही, हमें अज्ञान या नाम-रूप या देश-काल-निमित्त की सत्ता स्वीकार करनी होगी।[2/45]
" बुढ़ापा आता है, सुनहले स्वप्न हवा में उड़ जाते हैं; और मनुष्य निराशावादी हो जाता है। प्रकृति के थपेड़े खाकर हम भी इसी तरह दिशाहीन व्यक्ति की भाँति जीवन भर एक छोर से दूसरे छोर तक दौड़ते रहते है। इस सम्बन्ध में मुझे बुद्ध की जीवनी ' ललितविस्तर ' का एक प्रसिद्द गीत याद आता है। वर्णन इस प्रकार है--बुद्ध ने मनुष्य-जाति का परित्राता होकर जन्म लिया, किन्तु जब राजप्रसाद की विलासिता में वे अपने को भूल गये, तब उनको जगाने के लिये देवदूतों ने एक गीत गया, जिसका मर्मार्थ इस प्रकार है-' हम एक प्रवाह में बहते चले जा रहे हैं, हम निरंतर परिवर्तित हो रहे हैं, कहीं निवृत्ति नहीं है, कहीं विराम नहीं है।' [2/45-47]
" जो ब्रह्म अनन्त है, जो असीम है, वह सीमित कैसे हुआ ? A ही C से होकर गुजरने के कारण B के रूप में प्रतीत हो रही है।
[A]The Absolute या [क] ब्रह्म  
। 
 [C] या                 [ग]
Time                      देश 
Space                      काल 
            Causation                निमित्त         
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[B] The Universe    [ख] जगत 
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उपरोक्त चित्र में [क] ब्रह्म है और [ख] है जगत। ब्रह्म ही जगत हो गया है। यह ब्रह्म [क] देश--काल -निमित्त [ग] में से होकर आने से जगत [ख] बन गया है। हमलोग इस देश-काल -निमित्त रूपी काँच में से ब्रह्म को देख रहे हैं, और इस प्रकार नीचे की ओर से देखने पर ब्रह्म हमें जगत के रूप में दीखता है। जहाँ ब्रह्म है,वहाँ देश--काल-निमित्त नहीं है। काल वहाँ रह नहीं सकता, क्योंकि वहाँ न मन है, न विचार। अतः [C] या [ग] के उपर किसी प्रकार की इच्छा नहीं रह सकती।
  1. { प्रातिभासिक (सर्प) - जो हमारे साधारण भ्रम की स्थिति में आभासित होता है और रस्सी के ज्ञान के बाधित होता है।
  2. व्यावहारिक (जगत) - जो मिथ्या तो है परन्तु, जब तक ब्रह्म का ज्ञान नहीं हो जाता, तब तक सत्य प्रतीत होता है, और ज्ञान हो जाने पर बाधित हो जाता है।
  3. ब्रह्म - जिसे पारमार्थिक कहा जाता है। इसका कभी भी ज्ञान नहीं होता है। यह नित्य है। ब्रह्मज्ञान होने से जगत का बोध हो जाता है और मुक्ति प्राप्त हो जाती है। 
जीव वास्तव में ब्रह्म ही है, दूसरा कुछ नहीं, शरीर धारण के कारण वह भिन्न प्रतीत होता है। शरीर तीन प्रकार का होता है- स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर। अनादि प्रवाह के अधीन होकर कर्मफल को भोगने के लिए शरीर धारण करना पड़ता है। कर्म अविद्या के कारण होते हैं। अत: शरीर धारण अविद्या के ही कारण है। इसे ही बंधन कहते हैं। अविद्या के कारण कर्तृत्वाभिमान और भोक्तृत्वाभिमान पैदा होता है, जो आत्मा में स्वभावत: नहीं होता। जब कर्तृत्वाभिमान और भोक्तृत्वाभिमान से युक्त होता है, तब आत्मा जीव कहलाता है। मुक्त होने पर जीव ब्रह्म से एककारता प्राप्त करता है या उसका अनुभव करता है। 
जाग्रत अवस्था में स्थूल शरीर, स्वप्न में सूक्ष्म शरीर और सुषुप्ति में कारण शरीर रहता है। सुषुप्ति में चेतना भी रहती है, परन्तु विषयों का ज्ञान न होने के कारण जान पड़ता है कि सुषुप्ति में चेतना नहीं रहती। यदि सुषुप्ति में चेतना न होती तो जागने पर कैसे हम कहते कि सुखपूर्वक सोया? वहाँ चेतना साक्षीरूप या शुद्ध चैतन्य रूप है। परन्तु सुषुप्ति में अज्ञान रहता है। इसी से शुद्ध चेतना के रहते हुए भी सुषुप्ति मुक्ति से भिन्न है- मुक्ति की अवस्था में अज्ञान का नाश हो जाता है। शुद्ध चैतन्य रूप होने के कारण ही कहा गया है कि आत्मा एक है और ब्रह्मस्वरूप है। चेतना का विभाजन नहीं हो सकता है।}
निमित्त क्या है ?
हमने प्रश्न किया सेव टूट कर निचे क्यों गिरा ? यह प्रश्न केवल तभी किया जा सकता है, जब यह मान लिया जाय कि बिना कारण के कुछ भी घटित नहीं होता।...जब हम प्रश्न करते हैं, कि यह घटना क्यों हुई, तब हम यह मान लेते हैं कि सभी वस्तुओं का सभी घटनाओं का एक ' क्यों ' रहता ही है। इस पूर्ववर्तिता और परवर्तिता के अनुक्रम को ही निमित्त अथवा ' कार्य-कारणवाद ' कहते हैं। This is called the law of causation .इस प्रश्न में यह विश्वास भी निहित है कि जगत का कोई भी पदार्थ स्वतंत्र नहीं है, प्रत्येक पदार्थ पर उससे उसके बाहर स्थित अन्य कोई भी पदार्थ कार्य कर सकता है।Interdependence is law of the whole universe. अन्योन्याश्रयता या परस्पर सापेक्षता समस्त विश्व का नियम है। 
किन्तु जब हम पूछते हैं, " ब्रह्म पर किसने कार्य किया ?" तो हम कितनी बड़ी भूल करते हैं। यह प्रश्न करने का अर्थ है कि ब्रह्म भी अन्य किसी के अधीन है-वह निरपेक्ष ब्रह्मसत्ता भी अन्य किसी के द्वारा बद्ध है। ब्रह्म अथवा ' निरपेक्ष सत्ता ' या The Absolute शब्द [ॐ ]में देश-काल-निमित्त है ही नहीं, क्योकि वह एकमेवाद्वितीय है। अपनी सत्ता का जो स्वयं ही आधार है, उसका कोई कारण हो ही नहीं सकता। वह स्वयंभू है ! " [2/85-87]     
" यहाँ कहा जा रहा है, वह अनन्त ब्रह्म [A] देश-काल-निमित्त की समष्टि अर्थात माया [C] के आवरण में से नाना रूपों में प्रकाशित हो रहा है। किन्तु माया (नाम-रूप) की स्वतंत्र सत्ता नहीं है। किन्तु यह बिल्कुल असत (अस्तित्व शून्य) भी नहीं है। दूसरे, कुछ समय बाद ये बिल्कुल अन्तर्धान भी हो जाते हैं। इसलिये [B] या जगत सत्य नहीं है, असत भी नहीं है-मिथ्या है। [2/90-91]
" नियम के सर्वव्यापी होने का क्या अर्थ है ? हमारा जगत अनन्त सत्ता का वह अंश है जो
 ' स्पेस-टाइम-काजैलिटी ' द्वारा सीमाबद्ध है। इससे यह निश्चित है कि नियम केवल इस सीमाबद्ध जगत में ही संभव है, इसके परे कोई नियम संभव नहीं। "[3/69]
" इस मनः कल्पित जगत में चिरकाल तक रहने की आशा करना और स्वर्ग जाने की अभिलाषा करना कैसी नासमझी है ! स्वर्ग हमारे इस परिचित जगत की पुनरावृत्ति ही तो है। हमारा इतना पतन हो चूका है कि हम अपनी वर्तमान अवस्था से अधिक उच्च और कुछ कल्पना ही नहीं कर सकते; हमलोग अपने अनन्त स्वरुप को भूल चुके है, और हमारी सारी भावनायें क्षुद्र सुख, दुःख और ईर्ष्या द्वेष आदि ही में निबद्ध हैं। क्योंकि हमलोग इस सान्त जगत को ही अनन्त मान लेते हैं; और केवल इतना ही नहीं, इस मुर्खता को किसी भी प्रकार छोड़ना नहीं चाहते हैं।हम इस जीवन की प्यास (अभिनिवेश) या तृष्णा से, जिसे बौद्ध तन्हा या तिस्सा कहते हैं, इतने आसक्त हैं कि उसीमें चिपके रहना चाहते हैं। जब तक हम जीवन के प्रति इस तृष्णा को नहीं छोड़ते, इन क्षण भंगुर सान्त विषयों के प्रति अपनी प्रबल आसक्ति का त्याग नहीं करते, तब तक इस जगत के अतीत उस असीम मुक्ति की एक झलक भी पाने की आशा करना व्यर्थ है। उस पूर्ण साम्यावस्था का लाभ, ईसाई जिसे ' बुद्धि से अतीत शान्ति ' कहते हैं, इस छोटे से जगत से अपनी आसक्ति हटा लेने पर ही हो सकती है। " [3/70-71]
क्योंकि  " जिस रूप में हम इस जगत को जानते या सोचते हैं, उसकी सत्ता ही नहीं है; अपरिवर्तनीय परिवर्तित नहीं हुआ है। यह सारा विश्व आभास मात्र है, सत्य नहीं है। ईश्वर में किंचित भी परिवर्तन नहीं हुआ है। तथा वह लेशमात्र विश्व नहीं बना है। देश-काल -निमित्त के माध्यम से देखने के लिए विवश होने के कारण हम ईश्वर को विश्ववत देखते हैं।..यदि मैं परिवर्तित होता हूँ, तो वाह्य जगत परिवर्तित हो जाता है।" [9//96]
" जब तुम अपने सच्चे स्वरुप को भूल गये और प्रकृति या देश-काल तथा निमित्त के बंधन में पड़ गये। जब से तुमने विचार करना आरम्भ किया, तभी से काल का उद्भव हुआ। जब तुमको शरीर मिला, तब देश (आकाश) का प्रादुर्भाव हुआ, जब तुम सीमाबद्ध हुए, तब निमित्त आरम्भ हुआ। हमारी ससीमता (' मैं '-बोध को सच समझना) और अपने को स्त्री या पुरुष शरीर मान कर शादी विवाह करना या सन्यासी बनना - सब खेल है। केवल विनोदार्थ। कोई वस्तु तुमको बाँधती नहीं, कोई तुमको बाध्य नहीं करता। तुम कभी बन्धे ही नहीं थे, हमलोग स्वयं अपने ही द्वारा रचित नाटक में अपना अपना अभिनय कर रहे हैं। " [9/140]
" कुछ लोग अपने व्यक्तित्व के लोप के भय से त्रस्त रहते हैं। यदि शूकर को अपना शूकरत्व खोकर ब्रह्मत्व प्राप्त हो जाय, तो क्या यह श्रेयस्कर नहीं ? हाँ, है। परन्तु बेचारा शूकर उस अवस्था में यह सोच नहीं पाता।
कौन सा व्यक्तित्व मेरा अपना है ? 
जब मैं शिशु था और पैर के अंगूठे को निगल जाने की चेष्टा करता था ? क्या अपने उस व्यक्तित्व को खोकर मुझे शोक करना चाहिये ? पचास वर्ष बाद मैं अपनी इस वर्तमान अवस्था पर दृष्टि पात कर इस पर ठीक उसी प्रकार हँसुगा, जिस प्रकार आज शैशव अवस्था पर हँसता हूँ। इनमें से किस व्यक्तित्व को मैं रखूँगा ?
हमें इस व्यक्तित्व का अर्थ समझना होगा। 
 हमलोग एक ओर जहाँ अपने व्यक्तित्व की रक्षा करने का प्रयत्न करते हैं, वहीँ दूसरी ओर अपने व्यक्तित्व को उत्सर्ग करने की उत्कट इच्छा भी रखते हैं। माँ निकृष्ट भोजन भी कर लेगी, लेकिन बच्चों को अच्छा से अच्छा भोजन देगी। इस प्रकार जिन्हें हम प्यार करते हैं, उनके लिए मर मिटने को तैयार रहते हैं। ..मानव का व्यक्तित्व क्या है ? टाम ब्राउन नहीं, वरन नर रूप में नारायण ।
वही सच्चा व्यक्तित्व है। मनुष्य जितना उसके समीप पहुँचता है, उतना ही वह अपने मिथ्या व्यक्तित्व को त्याग देता है। जितना ही वह अपने लिये संग्रह और लाभ के लिए प्रयत्न करता है, उतना ही उसका अहं से कड़ा व्यक्तित्व होता है। जितनी ही कम वह अपनी चिंता करता है, उतना ही अधिक वह जीवन--काल में अपने व्यक्तित्व का उत्सर्ग कर देता है। ....उतना ही अधिक वह व्यक्तित्व-धारी हो जाता है ! यह एक ऐसा रहस्य है, जिसे दुनिया नहीं समझती। 
व्यक्तित्व का अर्थ है--ध्येय तक पहुंचना। इस समय तुम पुरुष या स्त्री हो।क्या तुम रुक सकते हो ? तुम सदैव परिवर्तित(M/F/M/F/.........M) होते रहोगे। जब तक तुम पवित्र तथा पूर्ण (शुद्ध चेतना) नहीं हो जाओगे, तब तक तुम रुक नहीं सकते।जिस मनुष्य का सुख (उसके) बाहर है, वह बाह्य वस्तु के चले जाने के बाद दुखी होता है। यदि मेरे सारे सुख मेरी आत्मा में हैं, तो वे सुख मुझे निरंतर मिलते रहेंगे, क्योंकि आत्मा से वियोग कभी हो नहीं सकता। ....माता, पिता, बच्चे, पत्नी, शरीर, धन, --आत्मा के अतिरिक्त हर वस्तु मुझे बिछुड़ सकती है। पर आत्मा नित्य आनन्द स्वरुप है ! आत्मा में ही सारी इच्छायें विद्यमान हैं। यह वह व्यक्तित्व है, जो कभी परिवर्तित नहीं होता और पूर्ण है।" [9/140-142]
 " अनन्त तो अविभाज्य है, उसका अंश कैसे हो सकता है ? पूर्ण वस्तु कदापि विभक्त नहीं हो सकती। प्रत्येक आत्मा यथार्थ में ब्रह्म का अंश नहीं है, वास्तव में वह अनन्त ब्रह्मस्वरुप है। तब इतनी आत्मायें किस प्रकार आयीं ? लाख लाख जलकणों पर सूर्य का प्रतिबिम्ब पड़ कर लाख लाख सूर्य के समान दिखायी पड़ रहा है।" [8/68]
" विज्ञातारमरे केन विजानीयात '- बृहदार0 - ज्ञाता को किस प्रकार जाना जायेगा ? ज्ञाता अपने को कभी नहीं जान सकता। मैं सबकुछ देखता हूँ, किन्तु अपने को नहीं देख पाता। वह आत्मा जो ज्ञाता है, और सबका प्रभु है, समस्त सृष्टि का कारण है, किन्तु अपने प्रतिबिम्ब के अतिरिक्त अपने को देख अथवा जान सकना उसके लिए असम्भव है। तुम दर्पण के अतिरिक्त अपना मुँह देख नहीं पाते। इसी प्रकार आत्मा भी प्रतिबिम्बित हुए बिना अपना स्वरुप नहीं देख पाती।
इसलिए यह समग्र ब्रह्माण्ड ही आत्मा का स्वयं को जानने और देखने का यत्नस्वरूप है। जीविसार (Protoplasm ) में उसका प्रथम प्रतिबिम्ब प्रकाशित होता है, उसके पश्चात् उदभिद, पशु आदि उत्तरोत्तर उत्कृष्ट प्रतिबिम्बक प्राप्त होते होते अन्त में सर्वोत्कृष्ट प्रतिबिम्ब प्रदान करने वाला माध्यम -मनुष्य प्राप्त होता है।" [8/68-69]
" मैं ही अपनी स्तुति कर रहा हूँ, मैं ही अपनी निंदा कर रहा हूँ। मैं अपने ही कारण कष्ट पा रहा हूँ और अपनी ही इच्छा से सुखी हूँ। मैं स्वाधीन हूँ। ज्ञानी महा साहसी और निर्भीक होता है। समग्र ब्रह्माण्ड नष्ट क्यों न हो जाय, वह हँसकर कहता है, उसका कभी अस्तित्व ही नहीं था, वह केवल माया और भ्रम मात्र है।
 इसी प्रकार वह
' क्व गतं केन वा नीतं कुत्र लीनमिदं जगत। '
अपनी आँखों के सामने जगत ब्रह्माण्ड को वास्तव में अन्तर्हित होते देखता है, और आश्चर्यचकित होकर प्रश्न करता है- ' यह जगत ('मैं''-बोध ) कहाँ था ? और कहाँ विलीन हो गया ?
 (विवेकचूड़ा मणि /485 ) [8/73]
" जल और तरंग में कोई भेद नहीं है। कार्य कारण का ही दूसरा एक रूप मात्र है। कार्य जब भ्रम है, तब उसका कारण भी अवश्य भ्रम होगा। यह भ्रम किसने उत्पन्न किया ? अवश्य एक भ्रम ने। भ्रम का अनादित्व स्वीकार करने से क्या तुम्हारा अद्वैतवाद खण्डित नहीं होता ? ...भ्रम को कभी सत्ता नहीं कहा जा सकता। तुम जीवन में हजारो  स्वप्न देखते हो; किन्तु वे सब तुम्हारे जीवन के अंशरूप नहीं है। स्वप्न आता है और चला जाता है। उसका कोई अस्तित्व नहीं है। भ्रम को सत्ता कहना केवल एक वितंडा है। अतेव जगत में नित्यमुक्त और नित्यानन्द स्वरुप एकमात्र सत्ता है, और वही तुम हो। अद्वैतवादियों का यही चरम निर्णय है। " [875]
" माया के भीतर जहाँ तक यह देश--काल -निमित्त का यह नियम विद्यमान है, वहाँ तक स्वाधीनता अथवा मुक्ति नहीं है और उपासना की विविध पद्धतियाँ इस माया के अंतर्गत हैं। ईश्वर से लेकर क्षुद्रतम जीव तक, घास की पत्ती से लेकर ब्रह्मा तक, उसी एक माया का राजत्व है।
 जिस व्यक्ति को ईश्वर-धारणा भ्रमात्मक लगती है,उसको अपनी देह और मन की धारणा भी भ्रमात्मक लगना उचित है। जब ईश्वर उड़ जाता है, तब देह और मन भी उड़ जाता है और जब दोनों का ही लोप होता है, तब वही जो यथार्थ सत्ता है, वह चिरकाल के लिए रह जाती है। ' वहाँ आँखें नहीं जा सकतीं, वाणी नहीं जा सकती, मन भी नहीं। हम उसे देख नहीं पाते और जान भी नहीं पाते।' " [8/76]
 " सभी प्रकार का भौतिक जीवन, चाहे वह व्यक्त ' शरीर ' हो अथवा अव्यक्त ' मन '-  नियम से आबद्ध है।कुछ पूर्व घटित कार्यों के अनुसार ही कुछ परवर्ती कार्य होते हैं। प्रत्येक पूर्ववर्ती का अपना अनुवर्ती होता है। एक प्रकार की मानसिक अवस्था दूसरी पुर्वावस्था के परिणाम स्वरूप उसके बाद ही आती है, यदि नियम की यह क्रिया मन में होती है, तो मन भी कारणता के नियम में आबद्ध है, और इसलिये इच्छा स्वतंत्र नहीं है।
 हम काल में सोचते हैं, हमारे विचार काल में आबद्ध हैं; जो कुछ है, उन सबका अस्तित्व देश और काल में है। जहाँ का सबकुछ कारणता के नियम से आबद्ध है।
 इस तरह जिन्हें हम जड़ पदार्थ और मन कहते हैं, वे दोनों एक ही वस्तु हैं। अन्तर केवल स्पन्दन की मात्र में है। अत्यल्प गति से स्पन्दनशील मन को जड़ पदार्थ कहा जाता है, जब स्पंदन की मात्र का क्रम अधिक होता है तो उसे मन के रूप में जाना जाता है।
मन भी जो उच्च स्पंदनशील जड़ वस्तु है, उसी नियम में आबद्ध है। मन जड़ पदार्थ बन जाता है, और फिर क्रमानुसार जड़ पदार्थ मन बन जाता है। [E= Mc2]यह केवल स्पंदन की बात है।
इस्पात का एक छड़ लो और उस पर ( LHC- लार्ज हेड्रोन कोलाइडर में डाल कर ) इतनी पर्याप्त शक्ति से आघात करो, जिससे उसमें कम्पन आरम्भ हो जाय। तब क्या घटित होगा ? 
 यदि ऐसा किसी अँधेरे कमरे में किया जाय ( जैसे जेनेवा स्थित सर्न प्रयोगशाला में पृथ्वी के निचे 27 की0मी लम्बी सुरंग में पाइप डाल कर किया गया है ) तो जिस पहली चीज का तुमको अनुभव होगा, वह होगी ध्वनी, भन-भन्नाहट की ध्वनी। शक्ति की मात्र को और बढ़ा दो, (126 गीगा इलेक्ट्रॉन वोल्ट) तो इस्पात का छड़ प्रकाशमान हो उठेगा तथा उसे और भी अधिक बढ़ाओ, तो इस्पात बिलकुल लुप्त हो जायेगा -(पहले हिग्स बोसोन बन जायेगा) फिर वह मन बन जायेगा।
एक अन्य दृष्टान्त लो- यदि मैं 10 दिनों तक निराहार रहूँ, तो मेरे विचार करने की शक्ति क्षीण होती चली जायेगी, ..और शायद अपना नाम भी न जान .सकूँगा। तब मैं थोड़ी रोटी खा लूँ, तो कुछ ही क्षणों में सोचने लगूंगा। मेरी मन की शक्ति लौट आएगी। रोटी मन बन गयी। इसी प्रकार मन अपने स्पंदन की मात्रा कम कर देता है और शरीर में अपने को अभिव्यक्त करता है, तो जड़ पदार्थ बन जाता है। 
तुम किसी ऐसे अंडे की कल्पना नहीं कर सकते जिसे किसी मुर्गी ने न दिया हो, और न किसी मुर्गी की कल्पना कर सकते हो, जो अंडे से न पैदा हुई हो। ..मनुष्य में स्वतंत्र कर्ता मन नहीं है, क्योंकि वह तो नियम में आबद्ध है। वहाँ स्वतंत्रता नहीं है।
 मनुष्य मन नहीं है, वह आत्मा है। आत्मा नित्य मुक्त है, किन्तु मन अपनी ही क्षणिक तरंगों से तद्रूपता स्थापित कर आत्मा को अपने से ओझल कर देता है। और देश-काल तथा निमित्त की भूलभुलैया - माया में खो जाता है। " [9/162-164]
" वेदान्त का मत कभी भी यह मत नहीं रहा कि इन्द्रियग्राह्य तथा अतीन्द्रिय - ये दो जगत हैं। उसका कहना है कि जगत केवल एक है। इन्द्रियों के द्वारा देखे जाने से वही प्रपंचमय और अनित्य भासता है। किन्तु वास्तव में वह सर्वदा अपरिवर्तनशील और नित्य ही है। "
...जैसे मान लो, किसी को रस्सी से सर्प का भ्रम हो गया। जब तक उसे सर्प का बोध है, तब तक उसे रस्सी दिखेगी ही नहीं- वह तो उसे सर्प ही समझता रहेगा। फिर यदि कोई उसको टॉर्च जला कर दिखा दे कि वह सर्प नहीं रस्सी है, तो फिर वह रस्सी में सर्प कभी नहीं देख सकेगा। -उसे केवल रस्सी ही दिखेगी। वह या तो रस्सी है, या सर्प ही; किन्तु दोनों का बोध एक साथ कभी नहीं होगा। "
[9/170]
" बौद्ध लोग इन्द्रियग्राह्य प्रपंचमय जगत के अतिरिक्त और कुछ नहीं मानते। इस प्रपंचमय जगत में ही कामना है। कामना ही इन सबकी सृष्टि कर रही है। किन्तु ' इच्छा ' एक परिणाम है, एक यौगीक पदार्थ है-'मौलिक ' नहीं। अतः यह सिद्धान्त कि जगत की उत्पत्ति इच्छा से हुई है, असम्भव है। क्या तुमने किसी बही उत्तेजना के बिना कभी इच्छा का अनुभव किया है ? ...स्नायविक उत्तेजना के बिना -कभी इच्छा या कामना का उदय नहीं होता। 
' इच्छा ' मस्तिष्क की एक प्रकार की प्रक्रिया है, जिसे सांख्य के दार्शनिक ' बुद्धि ' कहते हैं। इस प्रतिक्रिया के पहले किसी क्रिया का होना जरुरी है। यदि बही जगत न हो, तो इच्छा भी नहीं हो सकती। इच्छा को कौन उत्पन्न करता है ? इच्छा तो जगत की सह्वर्तिनी है। जिस शक्ति ने जगत की सृष्टि की, उसी ने इच्छा का भी सर्जन किया है।इच्छा स्वयं प्रपंचमय है-- सापेक्ष है, वह निरपेक्ष नहीं हो सकती। कोई ऐसी वस्तु है जो इच्छा नहीं है, परन्तु उसके रूप में अभिव्यक्त हो रही है। इच्छा देश, काल और निमित्त के अंतर्गत है। तब वह निरपेक्ष कैसे हो सकती है ? यदि कोई इच्छा प्रकट करे तो उसकी यह क्रिया समय के अंदर ही संभव है--समय के बाहर नहीं।
यदि हम अपने समस्त विचारों का उपशमन कर सकें--अपनी समस्त चित्तवृत्ति शान्त कर सकें, तो हम जान जायेंगे कि हम विचार से परे हैं। हम ' नेति-नेति ' के द्वारा इस अनुभव पर पहुँचते हैं। 
जब ' नेति--नेति ' कहकर समस्त प्रपंच का त्याग कर दिया जाता है, तब जो कुछ बच रहता है वही ' वह ' है। उसका वर्णन नहीं किया जा सकता, उसे प्रकट नहीं किया जा सकता, क्योंकि प्रकटीकरण पुनः इच्छा हो जाएगी।" [9/172-174] 
" जब प्रलय होता है, तब जगत की क्या अवस्था होती है? वह उस समय भी विद्यमान रहता है। तथापि सूक्ष्मरूप में; अथवा, जैसा सांख्य दर्शन कहता है, कारणावस्था में रहता है। देश-काल-निमित्त से वह मुक्त नहीं होता, किन्तु वे अत्यन्त सूक्ष्म और लघु रूप में रहते हैं। [4/194]
{ नासदीय सूक्त ऋग्वेद के 10 वें मंडल कर 129 वां सूक्त है. इसका सम्बन्ध ब्रह्माण्ड विज्ञान और ब्रह्मांड की उत्पत्ति के साथ है। माना जाता है की यह सूक्त ब्रह्माण्ड के निर्माण के बारे में काफी सटीक तथ्य बताता है. इसी कारण दुनिया में काफी प्रसिद्ध हुआ है.यह सूक्त मुख्य रूप से इस तथ्य पर आधारित है कि ब्रह्मांड की रचना कैसे हुई होगी.
सृष्टि-उत्पत्ति सूक्त
नासदासीन्नो सदासात्तदानीं नासीद्रजो नोव्योमा परोयत् ।
किमावरीवः कुहकस्य शर्मन्नंभः किमासीद् गहनंगभीरम् ॥१॥
अन्वय- तदानीम् असत् न आसीत् सत् नो आसीत्; रजः न आसीत्; व्योम नोयत् परः अवरीवः, कुह कस्य शर्मन् गहनं गभीरम्।असत् अर्थात् अभावात्मक तत्त्व नहीं था. सत्= भाव तत्त्व भी नहीं था, रजः=स्वर्गलोक मृत्युलोक और पाताल लोक नहीं थे, अन्तरिक्ष नहीं था, और उससे परे जो कुछ है वह भी नहीं था, वह आवरण करने वाला तत्त्व कहाँ था और किसके संरक्षण में था। उस समय गहन= कठिनाई से प्रवेश करने योग्य गहरा
 धुँध क्या था ?
अर्थ- उस समय अर्थात् सृष्टि की उत्पत्ति से पहले प्रलय दशा में -' जब सत भी नहीं था,असत भी नहीं था, तम के द्वारा तम घिरा था, तब क्या था ?


न मृत्युरासीदमृतं न तर्हि न रात्र्या अह्न आसीत्प्रकेतः ।
अनीदवातं स्वधया तदेकं तस्मादधान्यन्न पर किं च नास ॥२॥
और इसका उत्तर दिया गयाहै, ' तब वह निस्पन्द अवस्था में था।' अनीत अवातम का अर्थ है, ' बिना स्पन्दन के अस्तित्ववान था।' अर्थात इस प्राण की सत्ता तब भी थी, किन्तु उसमें कोई गति नहीं थी; स्पन्दन का विराम हो चूका था।
तब एक विशाल विराम के उपरान्त जब कल्प का आरम्भ होता है, तब वह आनीदवातं (निस्पन्द परमाणु) स्पन्दन आरम्भ कर देता है। प्राण आकाश को आघात पर आघात प्रदान करता है। परमाणु घनीभूत होते हैं, और उनके संघटन की इस प्रक्रिया में विभिन्न तत्व बन जाते हैं।
प्राण के बार बार आघात के द्वारा आकाश से वायु अथवा स्पन्दन उत्पन्न होता है,यह वायु स्पन्दित होती है। और जब ये स्पन्दन अधिकाधिक तीव्र हो जाते हैं, तो पहले घर्षण एवं बाद में ताप या तेज की उत्पत्ति होती है। तब यह ताप तरल भाव धारण करता है, उसे अप कहते हैं। अंत में यह तरल पदार्थ आकर (क्षिति)प्राप्त करता है। 
पहले हमें आकाश और गति (वायु) प्राप्त हुई, उसके पश्चात् ताप उत्पन्न होता है, फिर वह तरल हो जाता है, तब घनीभूत होकर कठोर स्थूल जड़ पदार्थ -क्षिति का आकार धारण करता है; इसके बाद ठीक विलोम क्रम में यह प्रत्यावर्तन करता है। [ब्रह्माण्ड विज्ञान 4/194]
अन्वय-तर्हि मृत्युः नासीत् न अमृतम्, रात्र्याः अह्नः प्रकेतः नासीत् तत् अनीत अवातम, स्वधया एकम् ह तस्मात् अन्यत् किञ्चन न आस न परः।
'अर्थ उस प्रलय कालिक समय में मृत्यु नहीं थी और अमृत = मृत्यु का अभाव भी नहीं था। रात्री और दिन का ज्ञान भी नहीं था उस समय वह ब्रह्म तत्व ही केवल प्राण युक्त, क्रिया से शून्य और माया के साथ जुड़ा हुआ एक रूप में विद्यमान था, उस माया सहित ब्रह्म से कुछ भी नहीं था और उस से परे भी कुछ नहीं था।
को आद्धा वेद क इह प्र वोचत्कुत आजाता कुत इयं विसृष्टिः।
अर्वाग्देवा अस्य विसर्जनेनाथा को वेद यत आबभूव ॥६॥
अन्वय-कः अद्धा वेद कः इह प्रवोचत् इयं विसृष्टिः कुतः कुतः आजाता , देवा अस्य विसर्जन अर्वाक् अथ कः वेद यतः आ बभूव ।
अर्थ - कौन इस बात को वास्तविक रूप से जानता है और कौन इस लोक में सृष्टि के उत्पन्न होने के विवरण को बता सकता है कि यह विविध प्रकार की सृष्टि किस उपादान कारण से और किस निमित्त कारण से सब ओर से उत्पन्न हुयी। देवता भी इस विविध प्रकार की सृष्टि उत्पन्न होने से बाद के हैं अतः ये देवगण भी अपने से पहले की बात के विषय में नहीं बता सकते इसलिए कौन मनुष्य जानता है जिस कारण यह सारा संसार उत्पन्न हुआ।


इयं विसृष्टिर्यत आबभूव यदि वा दधे यदि वा न ।
यो अस्याध्यक्षः परमे व्योमन्त्सो अङ्ग वेद यदि वा न वेद ॥७॥
अन्वय- इयं विसृष्टिः यतः आबभूव यदि वा दधे यदि वा न। अस्य यः अध्यक्ष परमे व्यामन् अंग सा वेद यदि न वेद।
अर्थ – यह विविध प्रकार की सृष्टि जिस प्रकार के उपादान और निमित्त कारण से उत्पन्न हुयी इस का मुख्या कारण है ईश्वर के द्वारा इसे धारण करना। इसके अतिरिक्त अन्य कोई धारण नहीं कर सकता। इस सृष्टि का जो स्वामी ईश्वर है, अपने प्रकाश या आनंद स्वरुप में प्रतिष्ठित है। हे प्रिय श्रोताओं ! वह आनंद स्वरुप परमात्मा ही इस विषय को जानता है उस के अतिरिक्त (इस सृष्टि उत्पत्ति तत्व को) कोई नहीं जानता है।}
  " तब, व्यवहारिक धर्म क्या है ?
इस लोक और परलोक की, सब वस्तुओं को एक लक्ष्य -'मुक्ति की प्राप्ति ' के लिए प्रयोग करो। प्रत्येक सुख--भोग, आमोद की एक एक रत्ती का मूल्य अनन्त हृदय और मस्तिष्क के सम्मिलित व्यय द्वारा चुकाया जाता है। इस संसार में शुभ और अशुभ की समष्टि को देखो। क्या वह बदला ? शुभ अशुभ को सन्तुलित करता है। किन्तु अलग खड़ा होनेवाला व्यक्ति इस दिव्य लीला को देखता रहता है।
कुछ रोते हैं और दूसरे हँसते हैं। अपनी बारी आने पर ये रोयेंगे और दूसरे हँसेंगे। हम क्या करसकते हैं? "[3/174]
 " जब भावावस्था को प्राप्त होकर कोई ब्रह्मानन्द में डूब जाता है, या समाधिस्थ हो जाता है, तब उसका द्वैत-भाव नष्ट हो जाता है, तब भक्त और भगवान एक हो जाते हैं। फिर समाधि से उठने के बाद,वह अद्वैतमार्गी भक्त कैसे ध्यान करता है ? - ' परमेश्वर और मैं एक हूँ '- इस अद्वैतभाव का ध्यान करता है। जब तक हम मायापाश से मुक्त नहीं होते, तब तक द्वैत का भाव अवश्य बना रहेगा। देश-काल-निमित्त या नाम-रूप ही माया है। जब कोई इस माया से मुक्त हो जाता है, तो उसे जीव-ब्रह्म की एकता का अनुभव हो जाता है-तब न द्वैत होता है न अद्वैत-उसके लिए सब एक हो जाता है।
ज्ञानी और भक्त में केवल साधना की प्राथमिक अवस्था में ही अंतर होता है--एक परमेश्वर को अपने से बाहर देखता है और दूसरा अपने हृदय में।  
श्रीरामकृष्ण देव कहा करते थे कि भक्ति की एक और अवस्था है, जिसे परा-भक्ति कहते हैं--वह मुक्त होने पर, अद्वैत--भाव की प्राप्ति हो जाने पर परमेश्वर के प्रेम में विभोर हो जाना। ...मुक्ति प्राप्त होने के बाद भक्ति की क्या आवश्यकता है ?  
इसका केवल यही उत्तर है कि जो मुक्त है, जो स्वतंत्र है, वह सब नियमों से परे है। उसके विषय में यह प्रश्न ही नहीं उठता कि उसने ऐसा ही क्यों किया और वैसा क्यों नहीं किया। मुक्त हो जाने पर भी भक्ति के माधुर्य का रसास्वादन करने के लिए कुछ लोग उसको अपनाये रहते हैं। " [8/ 272-73]
" जगत में केवल एक आत्मा है, एक सत्ता है; जब उसका कुछ अंश मानो इस देश-काल-निमित्त के जाल में पड़ता है, तब यह विभिन्न रूप ग्रहण करती है। उस जाल को सिंह विक्रम से काट कर निकल जाओ-और देखो, सभी एक है। समग्र विश्व आत्मा में एक है और यह आत्मा ही ब्रह्म है। " [4/218]

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