Saturday, July 21, 2012

स्वामी विवेकानन्द और हमारी सम्भावना - [4 A] ' स्वामीजी का धर्म '(व्यक्ति और मन),

  अतिशय भावुकता रूपी अफीम की मिलावट से परिशोधित धर्म !  
भाव (आदर्श और उद्देश्य के प्रति संवेदनशीलता) रखना अच्छा है, किन्तु अति-भावुकता अच्छी नहीं है। फिर भी हमलोगों में से कई व्यक्ति अतिशय भावावेग में बह ही जाते हैं। इसीलिये हमलोग किसी उच्च भाव या आदर्श के उपर गहराई से सोच-विचार करने के बाद ग्रहण नहीं करते, भावुकता में बहकर ग्रहण कर लेते हैं।
यह बात सत्य है, कि स्वामी विवेकानन्द ने धर्म का प्रचार किया था। यह बात भी सत्य है कि धर्म के साथ अफीम (অহিফেন) की तरह संयुक्त अतिशय-भावुकता के वशीभूत होकर, कई बार हमारी बुद्धि मोहग्रस्त हो जाती है, और हम अपने कर्तव्य पथ से भटक जाते हैं। किन्तु यह बात भी सच है कि धर्म के साथ संयुक्त अतिशय भावुकता सत्य नहीं है, किन्तु धर्म सत्य है, सनातन और शाश्वत है। स्वामी विवेकानन्द ने धर्म के इसी सत्य को, अतिशय भावुकता रूपी अफीम के मिलावट से  परिशोधित करके, समस्त मानव-जाति के लिये ग्राह्य एक विशुद्ध धर्म- 'मनुष्य बनो और बनाओ ' के रूप में प्रस्तुत किया है।
सच्चे से सच्चा धर्म भी, चाहे जिस कारण से हो समय के प्रवाह में दूषित हो ही जाता है। चाहे वह कट्टर राष्ट्रिय-विचारधारा के कारण हो, या किसी सामाजिक सोच के कारण, या धार्मिक नासमझी से या चाहे जिस किसी अन्य कारण से भी होता हो; किन्तु किसी भी धर्म का शुद्ध स्वरुप , उतनी ही मात्रा में सदैव उसके अनुयायिओं के आचरण में (अतिशय भावुकता रूपी अफीम से मुक्त ) व्यक्त होता नहीं दिखाई पड़ता है।
केवल धर्म के क्षेत्र में ही ऐसा हुआ हो, ऐसा दावा हम नहीं कर सकते। अन्यान्य क्षेत्र में भी हमलोगों ने ऐसी घटनाओं को देखा है, और आज भी देख रहे हैं। किन्तु जिस समय धर्म के क्षेत्र में ऐसी अवस्था होती है, उस समय धर्म को फिर से नये रूप में सज्जित करके समस्त मनुष्यों के लिये ग्राह्य बनाकर, मानव-जाति के समक्ष प्रस्तुत करना पड़ता है, और उसका प्रचार करना पड़ता है।
स्वामीजी के इस 'बनो और बनाओ ' रूपी नव-वेदान्त प्रचार आन्दोलन में केवल एक ही विशिष्टता है, और वह वैशिष्ट भारतीय विचार-धारा के अनुरूप ही है। अन्यान्य क्षेत्रों के विचारकों ने जहाँ एक एक विषय को लेकर ही चिन्तन किया है, और अपने चिन्तन का फल समाज को प्रदान किया है। अन्य विचारकों में से किसी ने केवल राष्ट्र के उपर चिन्तन किया है, किसी ने समाज के उपर, किसी ने जाती-प्रथा के उपर, किसी ने विभिन्न धर्मो के उपर, किसी ने शिक्षा के उपर, किसी ने कृषि के उपर, किसी ने कला के उपर, किसी ने साहित्य के उपर, किसी ने संगीत के उपर - और प्रकार के अलग अलग कई विषयों पर अपने चिन्तन के फल को उन्होंने समाज को प्रदान किया है। जबकि युग-नायक विवेकानन्द का वैशिष्ट यह है कि उन्होंने मनुष्य के सामग्रिक पहलू (3H) को लेकर चिन्तन किया है। उपरोक्त समस्त क्षेत्र जिस मनुष्य के साथ जुड़े हुए हैं, स्वामीजी ने उसी मनुष्य के उपर चिन्तन किया है। तथा उन्होंने ऐसे एक धागे ( मनुष्यत्व) का अविष्कार कर लिया जो इन सब विचारों के भीतर से होकर गुजर सकता है, और उस धागे को मनुष्य के गले में पहना दिया, जिसका नाम दिया धर्म, और कहा कि यही वह धागा है, जो मनुष्य को सभी ओर से संयम में रखेगा। उनके विचारों में समग्र मानव, अर्थात मनुष्य की सम्पूर्ण सत्ता एवं उसका समग्र समाज को ही एक विषय के रूप में देखा जा सकता है।
इसीलिये भिन्न भिन्न नाम वाले जो धर्म हैं, जो समय के प्रवाह में केवल भावुकता प्रदान करते हैं, या अफीम की तरह नशा उत्पन्न कर देते हैं। किन्तु स्वामीजी का धर्म, इस तरह के विभिन्न नाम वाले धर्मों से सम्पूर्णतया अलग किस्म का है। धर्म का नाम सुनने से ही जिनके मन में एक प्रकार का रुग्णता उत्पन्न हो जाती हो, वे यदि चाहें तो इसके लिये और एक नये शब्द (शिक्षा) का अविष्कार कर सकते हैं, वैसा करने से उसमें वास्तव में कोई अन्तर नहीं पड़ेगा।
ऐसा कहना, कि जो लोग किसी खास निर्दिष्ट नुस्खा (Prescription) के अनुसार जीवन -यापन करते हों, वे ही धार्मिक हैं, और बाकी सभी लोग अधार्मिक हैं, इस बात में कोई दम नहीं है। जो अपने जीवन को सभी ओर से धर्म के वास्तविक केन्द्र में संयमित रख सकते हैं, वे ही यथार्थ धार्मिक व्यक्ति हैं। मनुष्य जब अपने केन्द्र से जुड़ जाता है, तभी वह दूसरे मनुष्यों के साथ अपने को जुड़ा हुआ महसूस करता है। ऐसा योग तभी साधित होता है,जब मनुष्य धर्म के उस वैश्विक- धागे को धारण कर लेता है। 
स्वामीजी जब ' मनुष्य ' को परिभाषित करते हैं तो उसमें सूत्र के रूप में यही बात सन्निहित रहती है। स्वामीजी के अनुसार मनुष्य एक ऐसा वृत्त है, जिसकी परिधि असीम है, जबकि उसका केंद्र एक स्थान में है। इस धागे का  निहितार्थ अत्यन्त विस्तृत है। जो मनुष्य स्वामीजी के धर्म में विश्वासी होता है, उसके जीवन की परिधि विश्वव्यापी हो जाती है। 
यही विकास की कुँजी है। और मनुष्य का ऐसा समग्र विकास ही धर्म की मूल बात है। इस उन्नति के पथ पर अग्रसर रहते हुए मनुष्य अपनी क्षूद्र सत्ता, ' मैं'-बोध को खोना सीख लेता है। मनुष्य अपनी संकीर्णता, स्वार्थपरता को त्याग करता हुआ अपनी महिमा को प्राप्त करने की तरफ आगे बढ़ता जाता है। यह आगे बढ़ना ही स्वामीजी के विचारों में ईश्वर के मार्ग पर आगे बढ़ना है।
क्योंकि स्वामीजी के अनुसार - ' निःस्वार्थपरता ही ईश्वर है ! ' यदि इसी उक्ति को धर्म कहा जाय, तो इसमें किसी को क्या आपत्ति हो सकती है ? क्या किसी लोक-नायक ने धर्म की ऐसी परिभाषा अन्य किसी भाषा में पहले कभी कहा है ? जिन्होंने नहीं कहा मनुष्य उनको कभी जन-नेता के आसन पर प्रतिष्ठित भी नहीं करता है।
फिलोसफी, जप, तप, देवता-घर, दीपक-दानी, केले का थम, कुशी-घंटी-शंख इन सब को स्वामीजी ने व्यक्तिगत धर्म कहा है। किन्तु जिस धर्म को सभी लोग समझते हैं, वह है परोपकार। अपने हृदय के विश्वव्यापी परिधि के अन्तर्गत समस्त जीवों के एकत्व की उपलब्धी करना ही धर्म है। यह उपलब्धी हो जाने पर मनुष्य द्वारा किया गया कोई भी कर्म परोपकार होता है, और वही है धर्म। यह धर्म कायरों के लिये नहीं है, यह वीरों का धर्म है क्योंकि कायर (डरपोक) दूसरों को मारता है, और वीर ( अर्थात सच्चा जिहादी ) अपने कच्चे ' मैं '-को (अपने तुच्छ अहं को ) मारता है। 
मैं साँप को मार देता हूँ, बिच्छू को मार देता हूँ, या जिस किसी को भी मैं, मेरे इस सुख-सपने के जीवन को समाप्त कर सकने वाला समझता हूँ, जो मुझे हानी पहुंचा सकता है, उस उस को मैं मार देता हूँ, क्योंकि वास्तव में मैं कायर हूँ। किन्तु जो वीर होता है, वह इस वृहत जगत (भव-सागर ) के पार जाने के लक्ष्य को ध्यान में रखकर, अपने तुच्छ स्वार्थ के छोटे से दायरे में बंधे - ' मैं और मेरा ' को मारता है। इसीलिये धर्म कायरों के लिये नहीं वीरों के लिये है। स्वामीजी ने कहा है, ' मनुष्य में अन्तर्निहित अनन्त शक्ति का स्फुरण (या प्रस्फुटित) होना ही धर्म है।'  उस धर्म की अभिव्यक्ति - बुराई को हटाने में, कल्याण-कार्यों को सम्पादित करने में, भूखों को अन्न-दान करने, अज्ञानियों को ज्ञान देने, अत्याचार का प्रतिरोध करने, शुद्धबुद्धि को उद्घाटित करने के प्रयास से होती है। 
धर्म का मुख्य कार्य ही है, मनुष्य को शक्ति प्रदान करना। स्वामीजी का निर्णय था कि - जो धर्म मनुष्य को इस संसार में सुखी नहीं बना सकता, उस धर्म के द्वारा परलोक या मरने के बाद सुख मिलेगा का आश्वासन देना बिलकुल झूठी बात है। यदि मनुष्य इस संसार में सुख प्राप्त करना चाहता हो, तो केवल अपने सुख-सुविधा की बात सोचने से नहीं प्राप्त होगा। यथार्थ धर्म-बोध मनुष्य को, उसकी असीम परिधि तक सक्रीय जन-कल्याण करने की भूमिका में नियोजित कर देता है। यही बोध उसको अपना और दूसरों का दुःख दूर करने की शक्ति और साहस से भर देता है। यहीं से अंतःकरण में हित-अहित का ज्ञान, अन्तरात्मा की आवाज, या विवेक (Conscience)  का जागरण हो जाता है।   धर्म मनुष्य को सम्पूर्ण जगत के साथ जोड़ देता है, और नीतिबोध (आत्मा की आवाज या Conscience) उस ईश्वर के साथ जुड़े हुए मनुष्य के कर्म की निति को निर्धारित करता है। 
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$$$$ स्वामीजी का धर्म (नये संस्करण में नहीं है )

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