Thursday, July 19, 2012

स्वामी विवेकानन्द और हमारी सम्भावना [2] ' अनुसरण ही सच्चा स्मरण है ' (व्यक्ति और मन),

अशिक्षित लोगों को प्रकाश दो, किन्तु शिक्षित लोगों को और अधिक प्रकाश दो ! 
स्वामी विवेकानन्द ( नरेन्द्रनाथ दत्त ) का जन्म एक सौ पचास वर्ष पूर्व १२ जनवरी, १८६३ ई० को हुआ था। और किसी आँधी की सदृश्य सपूर्ण विश्व को ही मानो झकझोर देने के बाद उन्होंने मात्र ३९ वर्ष की आयु में ही  ४ जुलाई १९०२ को अपने शरीर का त्याग कर दिया था। जिस समय वे जीवित थे, पहले हमने उनके विचारों का विरोध किया था, उनकी निन्दा की थी, उनके उपर झूठे आरोप लगाये थे, और उन आरोपों को बढ़ा-चढ़ा कर प्रचार करने की चेष्टा भी की थी। फिर उनको प्यार भी किया था, प्रशस्ति-पत्र दिए थे, उनके स्वागत में तोरण-द्वार सजाये थे, उनके रथ को घोड़ों से खिंचवाने के बजाय मनुष्यों से खिंचवाया था, धन्यवाद कहा था, उनके प्रति श्रद्धा दिखलाये थे, उनकी पूजा की थी।
उनके चले जाने के १११ वर्ष बाद (२०१३ ई ० में), आज भी उनके आविर्भूत होने को स्मरण करके विभिन्न प्रकार से हमलोग उनके प्रति अपनी श्रद्धा को अभिव्यक्त कर रहे हैं। किन्तु हमलोगों के सामाजिक जीवन में आज एक ऐसा संधि-क्षण उपस्थित हुआ है, जहाँ कुछ व्यक्ति खड़े होकर यह सोचने को विवश हो जाते हैं कि हमलोग जो कुछ अभी कर रहे हैं, (स्वामीजी की जन्मजयंती मनाना,उनके चित्र की पूजा आदि करना आदि ) वह ठीक भी है या नहीं? देश की अवस्था को देखने से तो यही प्रतीत होता है कि हम बिल्कुल उचित तरीके से उनका स्मरण नहीं कर पा रहे हैं। यदि वैसा करते, तो हम सोचते कि अपने नेता के संदेशों को देख-सुनकर और समझ-बुझकर आगे बढ़ना श्रेयस्कर होता है; हमारे नेता स्वामी विवेकानन्द ने देश को महान बनाने के लिये इतने अच्छे-अच्छे परामर्श दिए हैं, जरा उन पर भी विचार करके देख लिया जाय, और उनके परामर्श के अनुसार भविष्य की योजनायें (राष्ट्रीय शिक्षा नीति,अर्थ नीति इत्यादि) बनाई जायें, किन्तु वैसा हम लोग नहीं कर रहे हैं।
हमें इस बात पर गहराई से विचार करना चाहिये कि १११ वर्ष पहले के दिनों में विवेकानन्द के प्रति हमलोगों ने जो विरोधिता एवं उत्साही-आवेग दोनों ही भाव प्रदर्शित किये थे, वे बहुत हद तक हमारे मन की संकीर्णता एवं जड़ता तथा अतिशय भावुकता और परिणाम थे। ठीक उसी प्रकार आज, विवेकानन्द के राष्ट्र-निर्माण सूत्र - " Be and Make " के महत्व को समझ कर हृदय में धारण किये बिना; केवल 'विवेकानन्द रथ ' के पीछे-पीछे चलने वाला अभी का यह आवेग और उत्साह भी, कहीं कुछ उसी प्रकार की अतिशय भावुकता के परिणाम तो नहीं हैं ?
सामान्यतः हमलोगों के क्रिया-कालापों  के पीछे कोई सूचिन्तित आदर्श और उद्देश्य नहीं होता। किसी आदर्श या उद्देश्य को ग्रहण करते समय हमलोग गहराई से सोच-विचार करने के बाद निर्णय नहीं लेते - कि हम जिसे ग्रहण कर रहे हैं, या अस्वीकार कर रहे हैं उस आदर्श का अपना आन्तरिक मूल्य कितना है ? हम लोग तो केवल अपने तात्क्षणिक-भावना या अपनी पसन्द या नापसन्द को ही अधिक महत्व देते हैं, और कोरी भावुकता में बहकर किसी भी आदर्श  को जाने-समझे बिना ही ग्रहण कर लेते हैं। फिर अज्ञानता वश दल बनाकर किसी (अयोग्य आदर्श बापूजी-चाचाजी) व्यक्ति विशेष की पूजा करने लगते हैं और किसी योग्य आदर्श का अनादर भी करने लगते हैं। किन्तु क्षणिक भावुकता में आकर अपना आदर्श चुनने की अपेक्षा, थोडा रुक कर सोच-विचार करके सही निर्णय कर के ही अपने आदर्श का चयन करना ज्यादा अच्छा होता है।
 व्यक्ति के रूप में पहले अपने मन में सोच-विचार करके निर्णय लूँगा कि मेरे लिये किस आदर्श को ग्रहण करना अच्छा होगा ? उसके बाद ही उसको ग्रहण करूँगा या अस्वीकार कर दूंगा। इस प्रकार से सोच-विचार कर अस्वीकार करने से कोई हानी नहीं होगी। और एकबार किसी व्यक्ति या उद्देश्य को आदर्श मान कर ग्रहण कर लिया तो आस्था के साथ उस उद्देश्य को कार्यरूप देने की चेष्टा में लग जाना होगा। क्योंकि यदि उद्देश्य को साकार करने का प्रयास ही न किया जाय तो वैसे उद्देश्य का कोई अर्थ ही नहीं है।
स्वामी विवेकानन्द या अन्य किसी के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने का तबतक कोई विशेष मूल्य नहीं होता, जब तक हमलोग उनके उद्देश्य और आदर्श को निष्ठा के साथ ग्रहण न करें, और उन भावों को अपने जीवन में एवं समाज में रूपायित करने की चेष्टा न करें।
इनदिनों जिस प्रकार हमलोग समारोह के माध्यम से कई लोगों के प्रति अश्रद्धा प्रकट करते हैं, उसी प्रकार से कई लोगों के प्रति  बिना सोचे समझे ही श्रद्धा-सुमन भी चढ़ा आते हैं। इस प्रकार लगातार एक के बाद एक विभिन्न शत-वार्षिक समारोहों को आयोजित होता देखने से आश्चर्य भी होता है, कि इस भारतवर्ष में पहले इतने सारे एक के बाद एक स्मरण करने योग्य व्यक्ति क्या सचमुच भारत में आये भी थे !
हमलोग हर वर्ष जितने लोगों का स्मरण करते हैं, उनके विचारों को अपने जीवन में कितना रूपायित करने की चेष्टा करते हैं, उसी से प्रमाणित होता है कि हम कितनी आन्तरिकता के साथ उनका स्मरण करते हैं, और उस आन्तरिकता का मूल्य भी उसी पर निर्भर करता है। 
 किन्तु उसी प्रकार हमलोग किसी स्वामी विवेकानन्द 'जी ' का भी यदि सचमुच स्मरण करना चाहते हों तो, हमें कम से कम उनके राष्ट्र-निर्माण सूत्र ' Be and Make ' को समझकर उसका अनुसरण करने की चेष्टा भी करनी होगी। यदि उनका अनुसरण करने का कोई प्रयास नहीं किये तो उनका, यह १५० वाँ  स्मरण-समारोह भी निरर्थक हो जायेगा। इसीलिये प्रश्न उठता है कि उनको अनुसरण कैसे किया जाय ? कहाँ और किस क्षेत्र में उनका अनुसरण किया जाय ? इसीलिये आज हमारे लिये यह निर्णय करना आवश्यक हो जाता है कि उनकी शिक्षाओं का मूल उद्देश्य क्या था ?
हम लोगों को ऐसा प्रतीत होता है कि, साधारण मनुष्य को यथार्थ मनुष्य के रूप में विकसित कराना, या मनुष्य को (अध्यात्मिक ज्ञान देकर ) सच्चे मनुष्य में रूपान्तरित कर देना ही उनकी शिक्षाओं का मुख्य उद्देश्य था। यदि यही सही बात हो, तो मनुष्य के जीवन के समस्त क्षेत्रों को इस उद्देश्य की प्राप्ति के साधन रूप में रूपांतरित किया जा सकता है, और समाज के सभी स्तर पर यह कार्य होना संभव है। क्योंकि स्वामी विवेकानन्द के मतानुसार यदि आत्मज्ञान हो जाये तो एक विद्यार्थी अच्छा विद्यार्थी बन सकता है, एक जूता सीने वाला अच्छा जूता सी सकता है, एक प्राध्यापक अच्छा प्राध्यापक बन सकता है, एक वकील एक अच्छा वकील बन सकता है। इसी प्रकार सभी क्षेत्र में एक प्रबुद्ध श्रेष्ठ व्यक्ति बनने के लिये आध्यात्मिक ज्ञान आवश्यक है। इस भाव का अनुप्रयोग देश-काल (स्थानिक दूरी एवं सामयिक दूरी ) की सीमारेखा के परे है। क्योंकि मनुष्य की सत्ता (हृदय में विद्यमान वस्तु ) सभी देशों और सभी युग में एक ही रहती है। उस सत्ता की अभिव्यक्ति विभिन्न देशों या विभिन्न युगों में अलग अलग ढंग से हो सकती है। इसीलिये विभिन्न प्रकार की संकीर्णता, या किसी वर्ण-विशिष्ट आदर्शों की सीमाओं के घेरे के भीतर ही इस 
' मनुष्य बनो और बनाओ ' के उद्देश्य को भी सीमित नहीं किया जा सकता है।
 स्वामीजी समस्त देशों के समस्त मनुष्यों को उसकी पूर्णता की दिशा में अग्रसर होने में सहायता करने की इच्छा रखते थे। जिन मनुष्यों में संभावनाओं को अभिव्यक्ति सबसे कम हो सकी है, उनके उपर उनकी दृष्टि विशेष रूप से आकृष्ट हुई थी। जो लोग मूर्ख हैं, दरिद्र हैं, जो समाज में सबसे अधिक उपेक्षित और पददलित हैं, उनके प्रति स्वामी विवेकानन्द की संवेदना (compassion) सबसे अधिक थी।
किन्तु इसीके साथ उनहोंने एक अभूतपूर्व अनुरोध अपने बाद आने वाली संतति से किया था। उन्होंने कहा था, गरीबों को प्रकाश दो; किन्तु धनी लोगों को और अधिक प्रकाश दो, क्योंकि वे लोग उनकी अपेक्षा अधिक गहरे अंधकार में गिरे हुए हैं। अशिक्षित लोगों को प्रकाश दो, किन्तु शिक्षित लोगों को और अधिक प्रकाश दो, क्योंकि वर्तमान समय में शिक्षा (डिग्री ) का घमण्ड बहुत अधिक बढ़ गया है। जो लोग धन के घमण्ड में, विद्या के घमण्ड में चूर हैं, वे भी कम करुणा के पात्र नहीं हैं। क्योंकि वे समाज के उपेक्षित मनुष्यों की सेवा करने का अवसर पा कर भी उसका सदुपयोग नहीं करते। जो लोग गरीबों के शोषण से प्राप्त धन को खर्च करके शिक्षित हुए हैं, किन्तु पढ़-लिख लेने के बाद उनके सम्बन्ध में कुछ नहीं सोचते, उनको ही स्वामीजी ने देशद्रोही के रूप में चिन्हित किया था। उन्होंने कहा था कि जब तक उनके देश का एक कुत्ता भी भूखा है, उसको रोटी देना ही मेरा धर्म है। 
इसीलिये आज हमलोगों के लिये यह सही रूप से जान लेना आवश्यक है, कि वास्तव में उनके आने का उद्देश्य क्या था ? उनको देखने से- वे हमें कैसे लगते हैं ? उसी को लेकर बैठे रहना भावुकता का लक्ष्ण है। वैसा नहीं कर व्यावहारिक बुद्धि के द्वारा हमें यह जाने की चेष्टा करनी चाहिये कि वे वास्तव में जगत को किस रूप में देखते थे, हमलोगों से क्या अपेक्षा रखते थे ?
उनके गेरुआ वस्त्र या भव्य प्रभावशाली मुखमण्डल को देखकर, भावुकता वश अंधाधुंध अभिभूत हुए बिना, हम लोगों को यह उपलब्धी करनी होगी कि यह गेरुआ वस्त्र उनके अनन्त-जीवन के संग्राम का प्रतिक है। उनको स्मरण करना तभी सार्थक होगा जब हमलोग उनके मूल विचार को समझने की चेष्टा करें, तथा उस विचार का अनुसरण भी करें, भले ही वह कितने ही छोटे पैमाने पर क्यों न हो। अभीतक हमलोगों ने समाज की उन्नति तथा मनुष्य की उन्नति की दृष्टि से उनके विचारों को समझने की चेष्टा समग्र रूप से नहीं की है। उनका अनुसरण करना तो बड़े दूर की बात है। इसलिये आज स्वामीजी की १५० वीं जयन्ती के अवसर पर उनको स्मरण करते समय, इन बातों को हमें भूलना नहीं चाहिये। 
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