स्वामी विवेकानन्द और आज के हमलोग
बहुत से लोग प्रचारतन्त्र में विश्वास करते हैं, तथा जानते हैं कि प्रचार-माध्यम कितना शक्तिशाली होता है! बात चाहे सच्ची हो या झूठी बार-बार सुनते रहने से उसका प्रभाव मन के उपर पड़ता ही है। बार बार एक ही बात को सुनते रहने से, मनोवैज्ञानिक नियम के अनुसार मन के भीतर उसकी एक छाप अवश्य पड़ जाती है। हमारा मानना है कि कोई भी चीज किसी पर थोप देना अच्छा नहीं होता। हम अक्सर कहा करते हैं कि आज का युग विज्ञान का युग है, तर्कबुद्धिवाद (rationalism) का युग है। इस कथन को आज कोई भी व्यक्ति अस्वीकार नहीं करता। आज के समाज में विज्ञान का कोई स्थान नहीं है- ऐसी बात हम मुँह से निकाल भी नहीं सकते।
कई लोग कहते हैं, प्राचीन समय की सभी बातें अच्छी थीं, फिर कुछ लोग ऐसा भी कहते हैं,कि प्राचीन युग की सारी बातें बुरी थीं। किन्तु, हम इन दोनों मतों में से किसी से भी सहमत नहीं हैं। ये दावे उचित प्रतीत नहीं होते। जो लोग ऐसा मानते है कि प्राचीन युग में सबकुछ बुरा था, या सबकुछ अच्छा था-उनकी यह मान्यता सही प्रतीत नहीं होती। प्राचीन युग में भी बहुत सी ऐसी चीजें थीं जो अच्छी थीं, जिसको आधार बना कर कई नई वस्तुओं का आविष्कार हुआ है, मनुष्य ने बहुत प्रगति की है। इसीलिये प्राचीन युग में जो अच्छा था, उसको ग्रहण करके नये युग के लिये उपयोगी बनाकर हमलोगों को आगे बढ़ना होगा। यही बुद्धिमान मनुष्य की पहचान है। और आमतौर पर मनुष्य इसी प्रकार प्रगति करता है।
किन्तु आगे बढ़ने के क्रम में कुछ भूलें भी हुआ करती हैं, और यह स्वाभाविक भी है। नेताजी कहते थे- 'भूल करना हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है।' लेकिन कुछ लोग ऐसा सोचते हैं कि हमलोग अपने जन्मसिद्ध अधिकार को प्रयोग में लायेंगे, और गलती पर गलती करते ही रहेंगे। कई राजनैतिक दलों को हम ऐसा ही करते हुए देखते हैं। लगातार गलती पर गलती करते जा रहे हैं, और लगातार स्वीकार भी कर रहे हैं कि, हमसे ऐसी गलति हो गयी हैं। जो लोग राजनैतिक इतिहास से परिचित हैं, वे इस बात को अच्छी तरह से जानते हैं। हो सकता है, वे इस स्वीकारोक्ति को वैज्ञानिक पद्धति या अत्यन्त उदारता का परिचायक समझते हों। किन्तु ऐसी सोच को सही नहीं ठहराया जा सकता है।
हमलोगों से गलती हो जाने की सम्भावना है- क्या इसी बात को ढाल बनाकर हमलोग लगातार गलतियाँ करते रहेंगे और लगातार कहते भी रहेंगे- ' हमसे भूल हो गयी !' ? वैज्ञानिक विश्लेषण आधारित युक्ति तो यही कहती है, कि जो व्यक्ति लगातार गलती पर गलती ही करता चला जा रहा हो, वह भविष्य में जो कुछ करेगा या वर्तमान में जो कुछ कर रहा है वह सब गलत ही होगा। इस तर्क को स्वीकार करने से बहुत अधिक गलती करने की संभावना नहीं होगी। यदि हम चाहें तो इस बात को जाँच कर भी देख सकते हैं। जिस राष्ट्र की संस्कृति या विचारधारा के लोग दो- एक गलती को छोड़ प्रायः सही कार्य किये हों -वही राष्ट्र या उसकी विचारधारा अधिक विश्वास करने योग्य है।
हमारी जो सनातन विचारधारा (गीता , उपनिषद आदि) है, उनका अध्यन करने से हम देखते हैं कि उसके ध्वजा वाहकों ने प्रायः सब कुछ ठीक ही किया हैं, बीच बीच में उनसे एकाध गलती भी हो गयी है। और वह गलती भी किस प्रकार की थी ? उनके सिद्धान्तों में तो किसी प्रकार का गलती नहीं थी, हाँ समय के प्रवाह में उन सिद्धान्तों को कार्य में रूपान्तरित करने में, या उन्हें व्यावहारिक बनाने में एक-आध त्रुटि हो जरूर गयी है। अपने देश की प्राचीन हिन्दू वैदिक सनातन विचारधारा (महावाक्यों-"एकं सत् विप्रा बहुधा वदन्ति" आदि सिद्धान्तों) का विश्लेषण करने पर हम पाते हैं कि वे बिलकुल आधुनिक हैं।
जबकि कुछ विचारधारायें (मतवाद) तो ऐसी प्रतीत होती हैं मानों वे गलतियों का ही 'summation' संकलन या परिणाम हों। इसीलिए उस प्रकार की संकीर्ण विचारधारा की कोई विश्वसनीयता या -'guarantee' नहीं है। फिर भी उस विचारधारा के मानने वाले लोग यह दावा करते हैं कि वे लोग ही, मनुष्य को सही पथ दिखला रहे हैं, अर्थात वे ही मानव-जाती के सच्चे मार्गदर्शक नेता ,पैगम्बर या देवदूत हैं। कोई भी चिंतनशील व्यक्ति इस झूठे दावे को निगल नहीं सकता। तथापि, किसी बात को यदि लगातार, बार -बार कहते रहा जाय तो चाहे वह सच हो या झूठ, परन्तु उसकी एक छाप मन के उपर तो पड़ ही जाती है। एक दूसरा कमजोर तर्क, यह भी दिया जाता है कि ' मनुष्य गलतियाँ करते-करते ही ठीक करने लगता है'। यह तर्क बहुत मनोरम, स्वादिष्ट प्रतीत होने पर भी किसी काम का नहीं है।
जो व्यक्ति थोड़ा भी विचारशील होगा, वह कभी यह स्वीकार नहीं कर सकता कि बार-बार गलत करते करते , जो वास्तव में हमारा जो 'सत्य-स्वरूप' वह अचानक प्रकट हो जायेगा। हाँ, यह बात सुनने में जरूर अच्छी लगती है। हमलोग स्वयं को 'वैज्ञानिक दृष्टिकोण ' या (scientific approach) सम्पन्न मनुष्य होने का दावा करते हैं। एक तरफ तो हमलोग स्वयं को 'प्रत्यक्षवादी' मनुष्य (Rationalist -'बुद्धिवादी' अर्थात 'बुद्धि' को देह मन से श्रेष्ठ समझने वाले 'विवेकी-मनुष्य' हैं) होने का दावा करते हैं , वहीं दूसरी ओर किसी वस्तु के अचानक आविर्भूत हो जाने पर विश्वास भी कर लेते हैं। (जैसे मैजिक में हवा से लड्डू आता है - वैसे ही) कहते हैं-जो नहीं था, वह हठात आविर्भूत हो गया। इस प्रकार हवा में से किसी वस्तु का प्रकट हो जाना न तो वैज्ञानिक दृष्टिकोण से और ना तो वेदान्तिक दृष्टिकोण से, दोनों में किसी भी दृष्टिकोण से संभव नहीं है।
इस मतवाद को सांख्य-वेदान्त की भाषा में 'असत्-कार्यवाद ' कहा जाता है। अर्थात जो कार्य (जैसे सृष्टि) उसके कारण (निर्गुण-निराकार ब्रह्म) में ; कार्य-कारण में किसी भी प्रकार से निहित नहीं था - वह (कार्य जीव-जगत -ईश्वर) अचानक आविर्भूत हो गया । इसके सम्बन्ध में स्वामीजी एक बहुत सुन्दर बात कहते हैं- ' हमलोग कभी असत्य से सत्य पर नहीं पहुँचते हैं, भ्रम से सत्य पर नहीं पहुँचते हैं। हमलोग सत्य से ही सत्य पर पहुँचते हैं, निम्नतर सत्य से उच्चतर सत्य पर पहुँचते हैं, और कहते हैं -यही है 'सत्य' है। (जो त्रिकाल -अबाधित हो, कभी नहीं बदलता वही सत्य है!) हाँ , यह बात सही है कि सत्यत्व बुद्धि, (अर्थात स्थूल से होते हुए सूक्ष्म को देखने वाली बुद्धि का) क्रम-विकास होता है। किन्तु मिथ्या कभी सत्य में परिणत नहीं हो सकता। फिर भी हममें से कई लोग ऐसे हैं, जो कहते रहते हैं कि जो वस्तु पहले वहाँ नहीं थी -वह प्रकट हो गयी या आविर्भूत हो गयी। आमतौर पर इसीको आविर्भाव (emergence) कह दिया जाता है, किन्तु ऐसा होना असत्य या अवैज्ञानिक है। क्योंकि दूसरे रूप में हम यह मान रहे हैं कि शून्य से किसी वस्तु की उत्पत्ति होती है। 'अभाव से भाव' (अस्तित्व- existence) कभी उत्पन्न नहीं हो सकता। यह असंभव है। गीता में भी यह बात कही गयी है- " नासतो विद्यते भावः।" (2/16)-शून्य से कोई वस्तु कभी उत्पन्न नहीं हो सकती है। हाँ, यह हो सकता है कि पहले से कोई वस्तु थी, वह अन्य किसी वस्तु में रूपांतरित हो गयी हो। किन्तु, जो अस्तित्व में नहीं था, वह अचानक आविर्भूत हो गया , ऐसा हो नहीं सकता, असम्भव है।
हमारे देश के दर्शन में 'सतकार्यवाद' और 'असतकार्यवाद' दो प्रकार सिद्धान्तों की बात कही गयी है। सतकार्यवाद कहता है, जो पहले से था उसका रूपान्तरण हो सकता है। एक सदवस्तु जैसा कुछ है (आत्मा, ईश्वर या ब्रह्म है!), उसका कार्य (M/F स्थूल शरीर Hand) और (सूक्ष्म शरीर Head) तथा कारण है (कारण शरीर- आत्मा , ईश्वर , ब्रह्म या भगवान-या Heart अस्तित्व है) जो क्रमविकसित होते हुए एक अन्य वस्तु (जीव और जगत) के रूप में उसकी अभिव्यक्ति हो सकती है। असतकार्य-वाद कहता है असत - माने जो था ही नहीं (non-existent, जिसका कभी अस्तित्व ही नहीं था, अस्तित्व हीन, आकाशकुसुम , खरहे का सींग), वह सत हो गया , प्रकट हो गया ! किसी भी दृष्टि से ऐसा होना कदापि सम्भव नहीं है। असतकार्यवाद सही नहीं है। जो कभी था ही नहीं , उसके भीतर से कुछ बाहर निकल आना, बिल्कुल बेतुका (absurd-अनर्गल,हास्यास्पद) बात है।
हाँ जो (ब्रह्म या शक्ति ?) पहले से था, वही नए नाम-रूप में (जीव, जगत और ईश्वर रूप में) प्रकट (प्रतिभासित) हुआ, ऐसा होना संभव है। फिर भी हमलोग अक्सर तर्कहीन (illogical) सिद्धान्तों का प्रचार करते रहते हैं। जैसे जल नहीं था, लेकिन हाईड्रोजन और ऑक्सीजन था, उनको विशेष परिमाण एवं विशेष अवस्था में एक रासायनिक प्रक्रिया के माध्यम से जल (H2O) के रूप में रूपान्तरित कर लिया गया । लेकिन हममें से कई लोग इसकी व्याख्या इस प्रकार करते हैं कि '
जल था नहीं, किन्तु जल प्रकट हो गया । ' जैसे जल का होना भी एक प्रकार का आविर्भाव (emergence) ही है। हम सभी लोग
इस प्रकार की व्याख्या से कमोवेश परिचित है। किन्तु वैसा होना (कारण के बिना कार्य का होना) सम्भव नहीं है। किन्तु 'जल' के निर्माण में , उसका उपादान (हाइड्रोजन और ऑक्सीजन) पहले से था और केवल उतना ही नहीं- जल का निर्माण करने के लिए उन उपादानों को एक विशेष परिमाण, अवस्था, दबाव, और ताप पर मिलाने की आवश्यकता होती है, तभी जल की प्राप्ति होती है।
हमारे अपने विषय में भी ठीक यही बात लागू होती है। हमारी दृष्टि में सत्य (आत्मा, ईश्वर या ब्रह्म) जैसी किसी वस्तु का अस्तित्व था ही नहीं। हमलोग उत्तरोत्तर भूलें करते जा रहे थे। और इसी प्रकार बार -बार भूल करते -करते भूल से ही हमलोगों की धारणा में या बुद्धि में सत्य अचानक प्रकट हो जायगा ! यह बिलकुल अवास्तविक (unrealistic) कल्पना है। किन्तु आज के हमलोग (तथा कथित वैज्ञानिक दृष्टि सम्पन्न मनुष्य) जिस अवस्था में हैं, वहाँ का हाल तो यही है।हमलोग कई प्रकार की विवेकहीन कल्पना (absurd imagination), या अवैज्ञानिक बातों -जैसे 'भूत -खेली' (Spooky game-ভুতুড়ে খেলা) आदि की वैज्ञानिक व्याख्या करते हुए उसे सही बतलाने की चेष्टा करते हैं। और तर्क के आधार पर प्रकृति -विरुद्ध (Supernatural) घटनाओं की संभाव्यता का प्रचार करते-फिरते हैं। तो दूसरीओर हम यह भी कहते हैं कि हमलोग जादूगरी (Magic) में विश्वास नहीं करते। लेकिन वास्तव में हमलोग केवल राजनैतिक या सामाजिक ही नहीं बल्कि धार्मिक जादूगरी 'Religious magic' भी दिखलाने की भी चेष्टा कर रहे हैं। हमलोगों के कुछ अपने दार्शनिक तत्व हैं, उसी के सहारे हमलोग जादुई छड़ी को घुमाते हुए कहते हैं- 'आबरा का डाबरा-छूह !' और ये देखो !!- ये आ गया!!
और आज के समाज की समस्या यह है कि 'हम तथाकथित शिक्षित' लोगों का एक बड़ा समूह- धार्मिक, सामाजिक, आर्थिक क्षेत्र में सर्वत्र ही किसी जादूगरी को - देखने की प्रत्याशा में ही बैठे हुए हैं। इसीलिये आज के 'हमलोग', तथाकथित आधुनिक मनुष्य' क्या हैं ? आधुनिकता के नाम पर फैशनेबल पोशाक, कीमती फ़्लैट, घर-मकान, AC ड्राइंग रूम, लम्बा-चौड़ा रंगीन TV , शरीर को प्रदान करने वाले विभिन्न प्रकार के वैज्ञानिक उपकरणों से अपने को घेर कर, खुद तो हमलोग 'मूढ़मतियों का दल' होकर बैठे ही हैं; लेकिन अपनी सामूहिक मूर्खता के द्वारा सम्पूर्ण मानव- समाज को और भी गहरे अंधकार में धकेलते जा रहे हैं - यही तो हैं आज के हम तथा-कथित 'मॉडर्न' लोग!
इस बात पर थोड़ी गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है। हम में से जो लोग ऊँची-ऊँची डिग्रियाँ प्राप्त करके ज्ञानी होने दम्भ भरते हैं, वे सभी इसी प्रकार के मूर्ख हैं, बिल्कुल अज्ञानी हैं। स्वामी विवेकानन्द ने एक बार भाषण देते समय सामने बैठे श्रोताओं की ओर इशारा करते हुए कहा था- 'मूँछ वाले बालकों का समूह। ' अर्थात मूँछें तो निकल आयी हैं , किन्तु बुद्धि (मति या दृष्टिकोण) में जरा भी विकास नहीं हुआ है। [क्योंकि अभी तक हमारी मूढ़मति व सम्मोहित बुद्धि अपने से निम्न देह-इन्द्रियों से (Apparent I-M/F, व्यावहारिक से) चिपकी हुई है, लेकिन शरीर-इन्द्रिय और मन से श्रेष्ठ आत्मा (Real I) के साथ नहीं जुडी है।] हमलोग अपनी झूठी शान दिखाने के लिए कई प्रकार के भड़कीले रहनसहन की वस्तुओं को लेकर बैठे हैं। और हममें से जो थोड़े 'अधिक बुद्धिमान' ( ढोंगी -धूर्त लोग) हैं, वे हमलोगों को मूर्ख बनाकर अपना स्वार्थ सिद्ध करते हैं।
हमलोग आर्थिक शोषण की बात करते हैं। किन्तु अन्य एक दूसरी चौकड़ी भी है, जो अपनी बुद्धि से हमारा शोषण कर रही है। पर या तो हम उनकी चालाकी देख नहीं पाते या उस विषय पर बात करना नहीं चाहते हैं; या देखने के बाद भी हममें इतना साहस नहीं है कि हम उसके सामने कुछ कह सकें। क्योंकि हो सकता है, मुख खोलने से कहीं अपनी खोपड़ीया ही न टूट जाये। किन्तु ऐसी खोपड़ी रहे या टूट जाय, क्या फर्क पड़ता है ? क्योंकि स्वर्ग भी अगर मूर्खों का निवास स्थान हो , तो उसमें वास करने से भी कोई लाभ होने वाला नहीं है। इस प्रकार आज के हम मॉडर्न लोग 'मूर्खों से परिपूर्ण जगत' में वास कर रहे हैं।
हमलोग [नवनीदा जैसे स्वामी विवेकानन्द द्वारा प्रेरित ज्ञानी भक्त] अपने युवा भाइयों को साहस के साथ कहना चाहते हैं कि भाइयों! तुम थोड़े साहसी बनो। तुमलोग अज्ञानी मत बने रहो, मूर्खों के सामान जीवन मत बिताओ। तुम लोगों के पास थोड़ी अपनी बुद्धि है, नई सोच है, तुम लोग अपनी बुद्धि से थोड़ा विचार करके देखो, तुमलोग कहाँ आ पहुँचे हो? किस अवस्था में आ पहुँचे हो, और किस दिशा में जा रहे हो-- थोड़ा विचार करके देखने की चेष्टा करो। बुद्धि पाने के लिये अपने दिमाग को किसी अन्य के पास (TMC या किसी अन्य राजनितिक दल के पास) गिरवी मत रखो। हमलोग बहुत दीर्घ काल तक सब कुछ विदेशों से ही माँगते रहे हैं। यहाँ तक कि बुद्धि भी विदेशों से आयात कर रहे हैं ! उधर उन यूरोपीय देशों के क्या हाल हैं? उनके अपने देश (अमेरिका, यूरोप) में क्या हो रहा है ? उनकी बुद्धि भ्रष्ट हो गयी है। उनकी बुद्धि में भी दरार पड़ गयी है। वे अच्छी तरह से समझ रहे हैं कि उनकी बुद्धि भी सुव्यवस्थित या मौलिक नहीं है। लेकिन, इस समय हमलोग उनसे ही बुद्धि आयात कर रहे हैं एवं भ्रष्टाचार का निर्यात [स्विसबैंक में] कर रहे हैं।
किन्तु प्राचीन काल में हमारे देश की विदेश नीति (foreign policy) क्या थी ? स्वामीजीने भारत को किस प्रकार की विदेश -नीति अपनाने का सुझाव दिया था? वे चाहते थे कि भारतवर्ष विदेशों में अपने बहुमूल्य सम्पत्ति 'आध्यात्मिकता' का निर्यात करेगा, वेदों के महावाक्यों का प्रचार करेगा, जिससे वहाँ भी मनुष्यत्व का विकास हो। इस प्रकार भारतवर्ष अपनी आध्यात्मिकता के बल पर ही वह विश्व विजय करेगा, ताकि सर्वत्र मनुष्यत्व का विकास हो सके। लेकिन, उसके बदले हमलोग क्या कर रहे हैं? समस्त मानव प्रेम, स्वदेश प्रेम को तिलांजली देकर नकली धर्म का निर्यात करने के लिये झुण्ड का झुण्ड बनाकर विदेश जाने में होड़ में लगे हैं। हमलोग अज्ञानी, अहंकारी, बेवकूफ के जैसा सोचते हैं, हम सब कुछ ठीक ही कर रहे हैं। दूसरी तरफ हमलोग स्वयं आत्मनिर्भर नहीं होकर , अपनी हर जरूरत के लिये- दूसरों पर निर्भर हैं।
अभी हाल में ही तीन अनुसंधानात्मक रिपोर्ट (Research report-शोधपत्र) प्रकाशित हुए हैं। एक खोजी रिपोर्ट में राष्ट्रसंघ का आर्थिक विश्लेषण दिया गया है, दूसरे में यह बताया गया है कि भविष्य में विश्व किस दिशा में जाने वाला है, तथा तीसरे में विश्व की जनसंख्या के विषय में कहा गया है। प्रत्येक रिपोर्ट में दिखाया गया है कि हमलोगों का भविष्य अंधकारमय है। इन रिपोर्टों में कहा गया है कि भारत जैसे विकासशील देशों का भविष्य बहुत बदतर होने वाला है। तो फिर हमलोग किस दिशा में जा रहे हैं ? जनसंख्या-रिपोर्ट में दिखलाया गया है कि 2000 ई० आते- आते विश्व की जनसंख्या छःसौ करोड़ (6 अरब) हो जाएगी। (2025 में विश्व की आबादी 8 अरब है) और आधी आबादी केवल साठ शहरों में वास करेगी। इस समय विश्व में लगभग छब्बीस बड़े महानगर हैं। इनमें 50 करोड़ लोग वास करते हैं। अभी से मात्र उन्नीस-बीस वर्ष के बाद -[2020 तक ?] इस प्रकार के मात्र साठ महानगरों में तीन सौ करोड़/ (यानि तीन अरब) से भी अधिक लोग वास करने लगेंगे। फिर इस समस्या का समाधान क्या है ? राष्ट्र-संघ द्वारा प्रकाशित अनुसन्धानात्मक रिपोर्ट कहता है कि इस समस्या के समाधान का केवल एक मात्र उपाय है -" मनुष्यों के भीतर 'मनुष्यत्व-बोध' (अर्थात नित्य-अनित्य विवेक) का विकास करना।" ये किसकी उक्ति है ? ये शब्द भी स्वामी विवेकानन्द के ही हैं।
आज सांसारिक या भौतिक उन्नति के लिये जिस प्रकार टेक्निकल इंजीनियरिंग सीखना नितान्त आवश्यक है, उसी प्रकार विवेकशील-मनुष्यों का निर्माण करने के लिये भी Man-making Engineering सीखना भी नितान्त आवश्यक है। इस इंजीनियरिंग का कार्यक्षेत्र बाह्य-प्रकृति को वशीभूत करना होकर मनुष्य के अन्तः-प्रकृति को वशीभूत करना है। आज हर स्तर पर वैश्विक एकता के उपर (वसुधैव कुटुंबकम पर) चर्चा होती है। किन्तु जिस समय Globalization या वैश्विक एकता का विचार किसी के मन नहीं था, उसी समय आधुनिक युग के सर्वश्रेष्ठ अद्वैताचार्य
स्वामी विवेकानन्द ने कहा था- ' आनेवाले समय में कोई भी देश अकेला नहीं चल सकता।' प्राचीन युग से ही समाज में कोई मनुष्य अकेला नहीं रह सका है।
वेद में कहा गया है-जो अकेला भोजन करता है,वह केवल पाप का भक्षण करता है।' "केवलाघो भवति केवलादी" (-ऋग्वेद,१०/११७/६) कैसा अद्भुत चिंतन है ! गीता में भी भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है- "मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव।" (गीता ७/ ७) जिस प्रकार मोती धागे में गुँथे रहते हैं, उसी प्रकार बहार से न दिखाई पड़ने पर भी सम्पूर्ण सृष्टि के भीतर वे (आत्मा, ईश्वर, या भगवान) ही धागे की भाँति अनुस्यूत हैं।' (कहावत है न -कण -कण में भगवान हैं , कंकड़ -कंकड़ में शंकर है !) जिस प्रकार ताँत से बूने कपड़ों में ' ताना और भरनी' (Warp and woof #) रहता है। [#बंगला में 'टाना और पोड़न' (টানা ও পোড়েন) जो धागा कपड़े लम्बाई में लगता है उसे ताना कहते हैं, और कपड़े की चौड़ाई में जो धागा प्रयोग होता है, उसको भरनी कहते हैं, कहते हैं। ] क्रमिक रूप से करघा पर ताना और भरनी कसने से एक कपड़ा (नामरूप धारी शरीर) बुन कर तैयार हो जाता है, जिसके द्वारा हम किसी निरावरण (exposed) वस्तु पर आवरण (cover) डाल सकते हैं। (दर्पण को कपड़े से ढँक सकते हैं) उसी प्रकार सम्पूर्ण परिवर्तनशील सृष्टि में धागे के समान एक अपरिवर्तनशील 'वस्तु' अनुस्यूत है। [ठाकुर कहते थे -'ईश्वर ही वस्तु हैं , और सब अवस्तु है।] उस परम सत्य वस्तु 'consciousness' या चैतन्य को आप आत्मा , ईश्वर , भगवान ,अल्ला , ब्रह्म या सच्चिदानन्द चाहे जिस नाम से पुकारिये , उसको इन्द्रियों के द्वारा नहीं जाना जा सकता , वह इन्द्रियातीत है। इसलिए उसको 'इन्द्रियज-ज्ञान' के माध्यम से नहीं जाना जा सकता; उसको केवल अनुभूति के माध्यम से (विवेकज-ज्ञान के माध्यम से) ही जाना जा सकता है।
[हमें यह विश्वास ही नहीं है कि- "आत्मा (ईश्वर, ब्रह्म ही) जगत (स्थूल शरीर M/F ) बन गया है।" 'एक' (आत्मा , ईश्वर या ब्रह्म) ही 'अनेक' (नाम-रूप, जीव और जगत बन गया है ! इसीलिए] हमलोगों की दृष्टि में दूसरों के प्रति तुच्छता या घृणा का भाव रहता है। हम हर किसी के भीतर यही देखना चाहते हैं कि उसमें कितनी कुटिलता, पाखण्ड, शत्रुता भरी हुई है। हम क्या हर मनुष्य को प्रेम की दृष्टि से देखते हैं? हम लोग क्या यह देख पाते हैं किस व्यक्ति में कौन सी अच्छाई छिपी हुई है ? किस व्यक्ति में कितनी और कौन सी सुंदर औरअच्छी सम्भावना छुपी हुई है? तथा उस सम्भावना को कैसे अभिव्यक्त किया जा सकता है , कैसे उस सम्भावना को और भी अधिक विकसित किया जा सकता है ? और यही हमलोगों की मूल समस्या है। आज हमारे दुर्गति (misery) तथा दुःख (sorrow) का यही कारण है, समस्या इसी बात में निहित है कि दृष्टि को कैसे बदला जाए ? और इस समस्या को दूर करना होगा। [जगत को नहीं बदलना है , अपनी मूढ़बुद्धि या भ्रमित बुद्धि या मति को नश्वर देह से न जोड़कर , अविनाशी आत्मा से जोड़ कर शुद्ध बुद्धि में बदलना होता है और यही इस समस्या को दूर करने का उपाय है।]
यदि हमलोग हमारे भीतर जो सम्भावना है , हमारे भीतर जो 'Inherent Divinity' है, जो ब्रह्मत्व अन्तर्निहित है, उसको अभिव्यक्त करके ,अच्छा मनुष्य (विवेकी-ब्रह्मविद) बन जाने की जो सम्भावना है, हमारे भीतर हर किसी के प्रति जो सद्भाव निहित है, उसको यदि हम समझ ही न सकें, और यदि हमलोग मनुष्य में अन्तर्निहित दिव्यता या चारित्रिक गुणों को विकसित करने की प्रौद्योगिकी (technology) को अपने जीवन में लागु ही न करें, तो हमलोगों की समस्या का हल होने की कोई सम्भावना नहीं है। आजके हमलोग 'जो' हैं , उनकी मूल समस्या या व्याधि यही है। और समाज में जो कुछ हिंसा , भ्रष्टाचार आदि दिख रहा है - वह सब मूल व्याधि से सम्बन्धित बाहरी लक्षण मात्र हैं। और समाज में जो भी भ्रष्टाचार,अत्याचार, अराज-कता, दुःख, निर्धनता आदि दिख रहा है वह सब तो इस बीमारी का लक्षण मात्र । वास्तव में हमारी मूल समस्या यही है कि हमारी बुद्धि (देह से जुड़ जाने के कारण मति, या दृष्टि) भ्रमित हो गयी है ,
हमारे अक्ल पर ही पर्दा पड़ गया है, बुद्धि में बहुत गरीबी छाई हुई है। हमारे भीतर जो सत्ता है -(उसको आत्मा , ईश्वर या ब्रह्म जो कुछ भी कहें), उस परम सत्य को हम अपने अनुभव के द्वारा जानना ही नहीं चाहते हैं, उसके बारे में हमलोग श्रवण (गुरु-शिष्य परम्परा में उसका नाम सुनना) भी पसन्द नहीं करते हैं। यदि कोई शुभचिंतक व्यक्ति उसके बारे में सुनाना भी चाहता है, तो हम उस पर कान नहीं देते। एक कान से सुनकर दूसरे कान से बाहर निकाल देते हैं। जो सुनाना चाहता है, उसका उपहास करते हैं, उसकी हँसी उड़ाते हैं। यही तो हैं-आज के हमलोग ! क्या हमलोगों के बुद्धि की दौड़ बस यहीं तक है ? या हमने कभी कुछ सस्ते उपन्यास पढ़ लिए थे, और अब सोचते हैं, मानो उन उपन्यासों में ही समस्त ज्ञान भरा हुआ था। या बहुत हुआ तो बस -ट्रेन से यात्रा करते हुए सांध्य-कालीन समाचार पत्र के दो पन्नों को पढ़ते हैं, और सोचते हैं, हमने सब कुछ जान लिया है।
ये सब बातें हमलोग किसी वस्तु का प्रचार करने के लिए नहीं कर रहे हैं, उतने अहमक भी हम नहीं हैं। क्योंकि हम जानते हैं कि जो सत भाव (अविनाशी सत्य) हैं, वे स्वतः प्रचारित होंगे। जहाँ कहीं सम्भावना है, जहाँ कहीं अदम्य प्राण-ऊर्जा है , उसको कोई दबा कर नहीं रख सकता!
स्वामी विवेकानन्द यही बात कह रहे हैं -" उत्तिष्ठ जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत ! " उठो, जागो, और जो सत्यद्रष्टा (ऋषि-नेता,आत्मवेत्ता, ब्रह्मविद) श्रेष्ठ महापुरुष (सद्गुरु) हैं उनके सानिध्य में बैठकर- बिना किसी सन्देह के, स्वयं अपनी अनुभूति से यह जान लो कि तुम्हारे भीतर ही सब कुछ (ब्रह्म) बन जाने की सम्भावना अन्तर्निहित है ! [ कहावत है - 'जैसी मति वैसी गति ' सद्गुरु देह नहीं बदलते , दृष्टि या बुद्धि बदल देते हैं। ] कि तुम्हारे भीतर ही जो ब्रह्मत्व अंतर्निहित है , उसे अभिव्यक्त करो। युवा भाइयों, आप थोड़ा शान्त मन से विचार करके देखो , हमलोग वास्तव में सभी प्राणियों के भीतर, क्या एक सच्चे मित्र को खोज रहे हैं ? नहीं, हम तो यही ढूँढ़ते रहते हैं कि हमलोगों का शत्रु कौन -कौन है ? जबकि वेद (यजुर्वेद 36/18) में प्रार्थना की गयी है-" हे ईश्वर, हमें ऐसी शक्ति दो कि हम सभी मनुष्यों को अपने मित्र के रूप में देख सकें।" मित्रस्य चक्षुषा समीक्षामहे।" -लेकिन हमलोग इसके विपरीत, सभी को शत्रु के रूप में देखने की शिक्षा देते हैं।
हम किसी से प्रेम नहीं करते। सभी को पराया समझते हैं। इसीलिये हम हर समय इस बात को लेकर हमेशा शंकित बने रहते हैं, कि अमुक व्यक्ति शत्रु बनकर- कहीं मुझे नुकसान तो नहीं पहुँचा देगा ? द्वैत से ही भय का जन्म होता है। "द्वितीयाद् वै भयं भवति ।" (बृ १.४.२) हम लोग जिनको अपना समझते हैं उनसे कोई भय भी नहीं होता। अतएव दूसरों के भय से सदा भयभीत रहने की अपेक्षा, निर्भय (fearless) हो जाने का सबसे अच्छा उपाय है, सभी को अपना समझ-कर पराये को भी अपना बना लेना। यदि ऐसा नहीं करें , तो अपने को शत्रुओं से बचाने में ही सारी शक्ति नष्ट हो जाती है। अपने को और उन्नत बनाने और अधिक विकसित करने की शक्ति फिर शेष नहीं बचती है। जिसके पास अविचलता , आत्मविश्वास , आत्मनिर्भरता, साहस आदि चारित्रिक गुण नहीं होते, उसमें बाहर से शक्ति प्रविष्ट करने का कोई उपाय नहीं बचता। आज के हमलोग ऐसी- चारित्रिक गुणों को विकसित करने की शिक्षा नहीं पाते हैं।
किन्तु, हमलोग यदि मानव-मन को उत्कृष्ट बनाने वाले विज्ञान (मनःसंयोग) का प्रयोग करें तो हमलोग यह जान सकते है वास्तव हमारी अविनाशी सत्ता (Real I या आत्मा) क्या है ? सम्पूर्ण जगत में एक सत्ता या वस्तु (आत्मा , ईश्वर या ब्रह्म) ओतप्रोत होकर जड़ा हुआ है ! इसीलिये देखने में एक पृथक सत्ता (Apparent I) प्रतीत होने पर भी वास्तव में मैं उस परम सत्ता (Real I) के साथ एक और अभिन्न हूँ ! (माला की धागे जैसा) अदृश्य रहने पर भी सबों के साथ जुड़ा हुआ हूँ, क्योंकि हम सबों के भीतर एक ही सत्ता (आत्मा) विद्यमान है। जब यही विचार क्रमशः दृढ़ होता जायेगा, तो मैं दूसरों को अपने से अलग न समझकर, उनको शत्रु न मानकर अपना मित्र समझूँगा और उनसे प्रेम करूँगा। तब हमारे हृदय में घृणा और भय के बदले, सबों के प्रति प्रेम उत्पन्न हो जायेगा। सर्वप्रथम तो हमें घृणा से मुक्ति के उपाय का आविष्कार करना होगा। हमारे ही भीतर सब कुछ विद्यमान है। (अविद्या से छूटने का उपाय विवेकज ज्ञान भी विद्यमान है।) उसको सही रूप से व्यवहार करना होगा, जानना होगा और अपने जीवन और आचरण से अभिव्यक्त करना होगा। ऐसा करने के लिए जगत को देखने के प्रति हमें अपना दृष्टि (मति या बुद्धि) को बदलना होगा। [दृष्टिं ज्ञानमयीं कृत्वा पश्येद् ब्रह्ममयं जगत्। देहबुद्धया तु दासोऽहं जीवबुद्धया त्वदंशक। आत्मबुद्धया त्वमेवाहमिति मे निश्चिता मतिः ॥ ज्ञानमय दृष्टि से संसार को ब्रह्ममय देखना चाहिए। देहबुद्धि से तो मैं आपका दास हूँ, बताइये आपके लिए क्या कर सकता हूँ ? जीवबुद्धि से आपका अंश ही हूँ और आत्मबुद्धि से में वही हूँ जो आप हैं, यही मेरी निश्चित मति है॥ ]
हमलोग बाह्य जगत के वस्तुओं का विश्लेषण मानव-कल्याण के लिये, उसकी भलाई और सुख-शांति के लिये करते हैं। किन्तु जिसके सुख-शांति के लिये, या जिसकी भलाई के लिये बाह्य जगत की प्राकृतिक शक्तियों का विश्लेषण करते हैं, उस 'मनुष्य' के अन्तःप्रकृति,उसके मनोजगत का विश्लेषण करने की थोड़ी भी चेष्टा नहीं करते। आमतौर पर हम कहते हैं कि मनुष्य एक मननशील जीव है, कुछ लोग कहते हैं, मनुष्य एक राजनैतिक जीव है, फिर कोई कहता है मनुष्य आर्थिक जीव है। तो क्या इसका निष्कर्ष यह हुआ कि विवेकी -मनुष्य भी मात्र एक जीव (M/F स्थूल शरीर) ही है ? यह ठीक है, कि अलग अलग पहलु से देखने पर, मनुष्य राजनैतिक या मननशील या राजनैतिक जीव प्रतीत हो सकता है, किन्तु अपनी समग्रता में मनुष्य केवल इतना मात्र ही नहीं है ! (प्रत्येक आत्मा अव्यक्त ब्रह्म है !)।
महाभारत में भी कहा गया है कि मनुष्य एक आर्थिक जीव है। कुरुक्षेत्र का युद्ध प्रारंभ होने से पूर्व लोगों ने देखा कि अचानक युधिष्ठिर खाली हाथ विरोधी-सेना की ओर बढ़े जा रहे हैं। कई लोगों ने सोचा, कहीं वे आत्मसमर्पण करने तो नहीं जा रहे हैं ? लोगों ने देखा, वे तो पितामह भीष्म, गुरु द्रोण आदि गुरुजनों के निकट पहुँचकर चरण-स्पर्श करके आशीर्वाद देने का आग्रह कर रहे हैं। आशीर्वाद देने के बाद चारों गुरु-जनों ने, एक ही वचन कहे," विश्व में सभी मनुष्य अर्थ के दास हैं, किन्तु अर्थ किसी का दास नहीं है। हमलोगों ने कौरवों का अन्न खाया है, इसीलिये हमें उनके पक्ष से युद्ध करने के लिये आना पड़ा। "
इस बात को हमारे पूर्वज अच्छी तरह से यह जानते थे कि बाह्य जगत का संचालन अर्थ के द्वारा ही होता है। हमारे पूर्वज इस बात को अच्छी तरह से समझते थे कि ' निर्धन व्यक्ति की इच्छा उसके मन में उठकर मन में ही विलीन हो जाया करती हैं।' इसीलिये प्रायः सभी भारतवासी इस बात को अच्छी तरह से जानते थे, कि सामान्यतया मनुष्य एक आर्थिक प्राणी है। किन्तु, हमलोग इतने परमुखापेक्षी हो गए हैं कि, अब हम अपने पूर्वजों के सिद्धान्तों को भी भूलते जा रहे हैं। हममें से कुछ लोगों ने यदि आदिगुरु शंकराचार्यजी का नाम भी सुना है, तो दूसरों की सुनी-सुनाई बातों को ही दुहराते हुए कहते हैं- ' शंकर ने तो जगत को बिलकुल उड़ा दिया था।' यदि उन्होंने जगत को ही उड़ा दिया था, तो अपने ज्ञान का प्रचार कहाँ किया था ?
उन्होंने अपने गीताभाष्य के शुरू में कहा था- वेदों में दो प्रकार के धर्मों का उल्लेख है-- एक है प्रवृत्ति का धर्म और दूसरा है निवृत्ति का धर्म। एक है भोग का मार्ग, तो दूसरा त्याग का मार्ग है। दोनों मार्गों के समन्वय से ही यह विश्व और समाज संतुलित रहता है। इन दोनों मार्गों के कारण ही मनुष्यों का समाज अपना संतुलन (Equilibrium) बनाये रखता है। जैसे एक हवाई जहाज अपने दोनों पंखों पर भार संतुलन बना कर उड़ान भरता रहता है। उसी प्रकार धर्म के भी दो पक्ष हैं- 'भोग और त्याग।' इन दोनों की सहायता से मानव-समाज साम्यावस्था या संतुलन में रहता है। एक को भी छोड़ देने से दूसरा पक्ष, या समाज नहीं चल सकता। त्याग-विहीन समाज केवल भोग के बल पर नहीं चल सकता है, उसी प्रकार पूर्णतः भोग-विहीन समाज भी संभव नहीं है। आवश्यकता दोनों में सामंजस्य रखने की है। इसीलिए हमारे शास्त्रों में- 'धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष - चार प्रकार के पुरुषार्थ की बात की गयी है। केवल एक ही पुरुषार्थ (मोक्ष) को लेकर चलने से सामाजिक व्यवस्था नहीं चल सकता। जो समाज केवल एक ही पुरुषार्थ (मोक्ष) लेकर रहता हो, उसे 'जघन्य' भी कहा गया है। किन्तु, ऐसा कहने से भी, चौथे पुरुषार्थ 'मोक्ष' के समकक्ष कोई भी नहीं है।
इस बात में तो कुछ सन्देह नहीं कि मनुष्य एक मननशील, प्राणी है। स्वामीजी कहते हैं, मनुष्य एक मननशील प्राणी है, तभी तो उसे 'मुनि' भी कहा जाता है, मननशील अर्थात नित्य-अनित्य विवेकशील होने से ही तो उसको मनुष्य कहा जाता है। इस विशेषता के अतिरिक्त अन्य सभी दृष्टिकोण से मनुष्य और पशु में कोई अन्तर नहीं है। केवल एक जगह आकर अन्तर हो जाता है, तथा वह जगह पशु के लिये बिल्कुल अलंघनीय (Inextricable) है। भूख, निद्रा, भय और वंशविस्तार की प्रवृत्ति पशुओं और मनुष्यों में एक सामान है, कोई अन्तर नहीं है। एक मात्र 'धर्म' (नित्य-अनित्य विवेक) ही ऐसी विशेष योग्यता है जो मनुष्य और पशु में अलंघनीय अन्तर उत्पन्न कर देता है।
किन्तु यहाँ धर्म का अर्थ (Religion) नहीं है, यह एक संस्कृत शब्द है, जिसका अर्थ ललाट पर तिलक लगाना, फूल, बिल्वपत्र चढ़ाना,या रामनामी चादर ओढ़ना नहीं है। धर्म का अर्थ है, नित्य-अनित्य विवेक-विचार, मनीषा या मननशीलता। यह विवेक ही मनुष्य को 'सत-असत' का निर्णय करने में सक्षम बनाता है, इसी से तो मनुष्य अच्छा-बुरा का अन्तर कर सकता है। किन्तु साधारण अर्थों में जिसे अच्छा और बुरा (आंवला-इमली का अंतर) समझा जाता है, सदसत-विवेक का अर्थ वहीँ तक सीमित नहीं है। 'सत ' का अर्थ है अविनाशी, चिरस्थायी। और 'असत' का अर्थ है क्षणभंगुर या नश्वर (मिथ्या-वस्तु)। कौन सी वस्तु सत (अविनाशी) है, और कौन सी वस्तु असत (नश्वर) है- जो प्राणी चिन्तन करके इस बात का निर्णय कर सकता है, उसी को मननशील प्राणी कहा जाता है। वैदिक निरुक्तकार यास्क मुनि मनुष्य को परिभाषित करते हुए कहते हैं- " जो व्यक्ति कुछ भी सोचने-बोलने-करने के पहले 'विवेक-प्रयोग' करता है, उसको ही मनुष्य कहा जाता है।"
मनुष्य निश्चित रूप से एक राजनैतिक प्राणी भी है। क्योंकि राजनीती का अर्थ है- 'देश-सेवा'। राष्ट्र-निर्माण एवं देशवासियों का कल्याण करने के लिए, सभी दलों को एकजूट होकर देश के लिए कल्याणकारी नीतियों को बनाना होगा, तथा उन्हें प्रयोग में भी लाना होगा। राष्ट्र के लिए उचित नीति का निर्धारण करना भी एक आवश्यक कार्य है - इस दृष्टि से देखने पर मनुष्य एक राजनैतिक प्राणी भी है। लेकिन मनुष्य केवल मननशील, राजनैतिक या आर्थिक प्राणी मात्र ही नहीं है। मनुष्य के बारे में इस प्रकार से सोचना, मनुष्य की अवधारणा को छोटा बना देता है। ऐसा सोचने से मनुष्य में जो असाधारण महानुभावता (magnanimity), ऐश्वर्य और अतुलनीय महिमा है, वह अनदेखा ही रह जायेगा। यदि इस अतुलनीय महिमा की दृष्टि से मनुष्य को नहीं देखा जाय, तो उसका वास्तविक परिचय प्राप्त न हो सकेगा।
ईसाई, हिन्दू और इस्लामी पुराणों में भी यह कथा आती है कि ईश्वर ने जब इस अभूतपूर्व विश्व-ब्रह्माण्ड की रचना की, मनुष्य का भी निर्माण कर लिया तो उन्होंने सभी देवदूतों को (फरिश्तों को) बुलवा भेजा। तथा मनुष्य के सम्मान में शीश झुकाने को कहा। [क्योंकि मनुष्य अपने बनाने वाले-'ब्रह्म'को भी जान सकने में समर्थ था -यह देखकर मुदमाप देवा !] एक एक करके सभी फ़रिश्तों ने वैसा किया, किन्तु एक ने वैसा नहीं किया। जिस फ़रिश्ते ने मनुष्य के सम्मान में अपना सिर नहीं झुकाया, उसे खुदा ने कहा दूर हटो शैतान ! और वही फ़रिश्ता शैतान इब्लीस बन गया। कितनी अद्भुत कथा है यह ! इसीलिये जो व्यक्ति मनुष्य के सामने अपना सिर नहीं झुकाता, उसको इस जगत रूपी रंगमंच से हट जाना होगा। स्वामी विवेकानन्द कहते हैं, " जो व्यक्ति मनुष्य के महिमा के सम्मान में सिर नहीं झुकाता, वह शैतान है। मैंने इतनी तपस्या करके यही सार समझा है कि यदि ईश्वर सचमुच कहीं रहते हैं, तो वे मनुष्य के भीतर ही रहते हैं। स्वामीजी आगे कहते हैं, " तुमलोग भगवान को ढूंढ़ने कहाँ जाते हो ? उनकी सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्ति मनुष्य के भीतर ही है। तुमलोग नदी के तट पर खड़े होकर भी, जल पाने के लिये कुआँ क्यों खोद रहे हो? सब हाथों से वे ही कार्य कर रहे हैं, सभी पैरों से वे ही चल रहे हैं। खेतों-खलिहानों, कल-कारखानों, सभी स्थानों में वे ही कार्य कर रहे हैं। फिर तुमलोग भगवान की खोज कहाँ कर रहे हो ? "
अगर हम जीना चाहते हों, तो हमें अपने भीतर इसी बुद्धि (मति /दृष्टि) को (जगत को ब्रह्ममय देखने की दृष्टि को) जाग्रत करना होगा। इसके लिए प्रत्येक व्यक्ति को यज्ञोपवीत पहन कर ब्राह्मण बन जाने की आवश्यकता नहीं है। अपने देश के अतीत को समझे बिना केवल उसके आचार-अनुष्ठानों का यंत्रवत पालन करते जाने से काम नहीं चलेगा। वेद-उपनिषद आदि गड़ेरियों के गीत हैं, तथा देवी-देवता कठपुतली मात्र हैं, इनकी कोई आवश्यकता नहीं है, इन सब को फेंक दो, क्योंकि हमारे सारे पूर्वज मूर्ख थे। अपनी महान प्राचीन संस्कृति के बारे में ऐसी ही धारणा रखते हुए हमलोग विदेशों से 'अर्थ दो, खाद्य दो, बुद्धि दो' की रट लगा कर भीख मांगते रहते हैं- यही तो हैं, आज के हमलोग! ऐसा होने पर भी हमारे जीवित रहने का एकमात्र पथ है, अपने अतीत को (गुरु-शिष्य परम्परा को) जानना और उसी बुनियाद पर अपना जीवन-गठन करना। हमारा जो आधुनिक और भौतिकवादी-समाज (Materialistic society) है, उस समाज के ऊपर 'मनुष्य' की महिमा को प्रतिष्ठित करना होगा; तथा धर्म के माध्यम से जगत के हर चीज का भोग करना होगा या आनन्द लेना होगा। अर्थात दुनिया की हर चीज को 'धर्म' (तेन त्यक्तेन भुंजीथा) की पद्धति से (त्यागपूर्वक) भोग करना होगा। [ इससे ज्यादा क्रांतिकारी वचन दुनिया के किसी शास्त्र में नहीं है।क्योंकि जब तक तुमने भोगा ही नहीं, तुम त्यागोगे कैसे; त्याग की समझ कहाँ से आयेगी?] क्योंकि भोग तो रहेगा ही किन्तु साथ-साथ त्याग भी रहेगा। इसीलिये एक जगह स्वामीजी ने कहा था, " भोग पूरा किये बिना त्याग नहीं आ सकता है ।"
जिसको भरपेट खाना भी नहीं मिलता हो, उससे यदि कहें, तुमलोग सब कुछ फेंक दो-तो यह ठीक नहीं होगा। स्वामीजी कहते हैं, वे लोग अन्न माँग रहे हैं, और तुम उनको पत्थर दे रहे हो ! पहले उनके रोटी का प्रबन्ध करो, उसके बाद उनको धर्म की कथा सुनाओ। यदि हमलोग जीवित बचे रहना चाहते हों, उन्नति करना चाहते हों, तो दलगत विचारधारा की परवाह किये बिना,स्वामीजी द्वारा प्रदर्शित पथ पर चलना होगा। उनका आदर्श केवल किसी दल या मत-विशेष के लिए नहीं है। स्वामीजीने कहा था,"ठाकुर समस्त प्रकार के साम्प्रदायिक विचारों और समस्त प्रकार के विभाजनकारी बेड़ियों को तोड़ देने के लिये ही अवतीर्ण हुए थे।" वे आगे कहते हैं, "तुमलोगों ने जिस दिन 'म्लेच्छ ' शब्द का अविष्कार किया, उसी दिन से तुम लोगों का अधः पतन शुरू हो गया है। तुमलोगों अपने चारों ओर बाड़ खड़े कर रहे हो। ठाकुर जाती-धर्म के नाम पर खड़ी की गयी -वर्गीकरण के इन छोटे छोटे घेरे को ध्वस्त करने के लिये ही आये थे।" एक प्रसिद्द कहावत है- "मूर्ख ठोकर खाने के बाद सीखता है, बुद्धिमान देख कर सीखता है।" पर हमलोग-न ठोकर खा कर न देखकर किसी प्रकार से नहीं सीख रहे हैं। इस प्रकार यह बात आसानी से समझी जा सकती है कि हमलोग कितने बुद्धिमान हैं !
स्वामीजी ने हमलोगों को जो भी उपदेश दिया है, सिद्धांत या 'महावाक्य' दिया है, उसे उनहोंने अपने मन से गढ़ कर नहीं दिया है। प्राचीनकाल में जो चीजें हमारे पास थीं उन्हें भली-भांति समझकर एवं अपनी अनुभूति से जान कर, उसे नये रूप में हमारे समक्ष प्रस्तुत किया हैं। उन्होंने अति दरिद्र लोगों के बीच रहकर उनके दुःख के कारण को समझा है, उसके समाधान का मार्ग ढूँढ निकाला है तभी उन विचारों को हमारे समक्ष रखा है। उन्होंने जीवन्त मनुष्यों (इतिहास में जो दूसरों के लिये जीते हैं, केवल वे ही जीवित हैं) के इतिहास को जान लिया था। तथा उनके जीवन के साथ, अपने जीवन को जोड़ लिया था, इसी कारण उनके उपदेश कभी विफल नहीं हुए।रोमा रोलाँ कहते हैं, उनकी वाणी सुनकर विद्युत् प्रवाह का झटका सा अनुभव होता है। हालाँकि श्रीरामकृष्ण के चरणों में बैठकर उनहोंने ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर लिया था, किन्तु उसी में लीन नहीं सके थे। उनकी ब्रह्म में लीन रहने की इच्छा को, ठाकुर ने ठुकरा दिया था। उनकी उस भूल को समझा दिया था। तभी तो, सबों के दुःख को दूर हटाने के लिये वे अपना जीवन न्योछावर कर देने में समर्थ हो सके थे। इसीलिये, हमलोगों को भी स्वामी विवेकानन्द को ही अपना सद्गुरु , नेता या ज्ञान-बुद्धि दाता स्वीकार करना पड़ेगा ! ऐसा न करने से हमलोगों का भविष्य सचमुच अंधकारपूर्ण हो जायेगा। केवल बाहर में बारूद-विस्फोट करने से कुछ हासिल न होगा, हमें स्वयं को ही 'बारूद' (मूर्तमान निःस्वार्थता) के रूप में गढ़ना होगा। निःस्वार्थपरता को अभिव्यक्त कर 'मनुष्य' बनकर भारत माता की पूजा-वेदी पर स्वयं की बली देने के लिये तैयार रहना होगा। स्वामीजी ने कहा था, " अपने भीतर निःस्वार्थपरता, त्याग, सेवा, प्रेम का बारूद भर कर युवा समुदाय के उपर फट पड़ना होगा।" केवल भाषण देने से काम नहीं चलेगा। इसी बात को स्मरण रखने के लिये कहते हैं- ' हे भारत ! मत भूलना, कि तुम माता के लिये बली प्रदत्त हो। '
स्वामीजी नारा लगाने के लिये नहीं आये थे। भारत एवं विश्व में किस प्रकार का विप्लव या आमूल परिवर्तन कैसे करना है -- स्वामीजी उसी विप्लव-मार्ग का दिग्दर्शन कराने आये थे। उसका पथ उन्होंने बतला दिया है। प्रत्येक युवा का हृदय 'प्रेम रूपी बारूद' का कारखाना (मानव-बम) बन जायेगा। सम्पूर्ण मानवजाति के प्रति अकृत्रिम प्रेम ही असली बारूद है, इसी प्रेम के बारूद से अपने हृदय को भर लेना होगा। कोई यदि इतना साहसी और क्रन्तिकारी हो, तो वे स्वामी विवेकानन्द के पास चले आओ। यदि क्रांति ही करना चाहते हो, तो स्वामीजी के मार्ग पर चलो। यदि तुम उतने (स्वामी विवेकानन्द जितने) साहसी हो, तो तुम्हें मरना होगा ! (इस प्रेमवारी का छिड़काव करते हुए अपने प्राणों को न्योछावर करना होगा।) किन्तु, लोगों की दृष्टि में शहीद कहलाने या वाह-वाही पाने के लिये नहीं। क्या तुम सबों की दृष्टि से ओझल रहकर त्याग, प्रेम, पवित्रता, सत्यनिष्ठा, संयम और निर्भीकता के बारूद से अपने हृदय को धीरे धीरे भर सकते हो ? ऐसा करने के बाद जब तुम समाज के सामने खड़े हो जाओगे, उस समय समाज तुम्हारे सामने श्रद्धा के साथ सिर झुकाएगा। और तब समाज से समस्त अनैतिकता और कायरता, तुम्हें देखकर किसी चोर की भाँति भागने लगेंगे। यही करना होगा, अभी हमें इसी प्रकार का चरित्र-गठन करने की आवश्यकता है। सच्ची समाज-सेवा का यही एकमात्र पथ है।
अपने देश-वासियों के लिये यदि तुम्हारे हृदय में प्रेम है तो मनुष्य की महिमा के सामने अपना शीश झुकाओ। मनुष्य को चलता-फिरता देवालय समझकर उन्हें प्रणाम करो। स्वामीजी कहते हैं, " सब प्रकार के शरीरों में मानव-देह ही श्रेष्ठतम है ; मनुष्य ही श्रेष्ठतम जीव है। मनुष्य सब प्रकार के निकृष्ट प्राणियों से -यहाँ तक की देवादि से भी श्रेष्ठ है। मनुष्य से श्रेष्ठतर जीव और कोई नहीं। "' मैंने जीवन भर ईश्वर का अन्वेषण किया है, किन्तु उनको केवल मनुष्य के भीतर ही पाया है।' आगे कहते हैं, ' मनुष्य के जैसा मनुष्य बनकर सबों का दुःख दूर करो। चरित्रवान बनो। जो गुणपशु को मनुष्य में और मनुष्य को देवत्व में उन्नत कर सकता हो, उसको ही धर्म कहते हैं।
(धर्म का अर्थ Religion नहीं है) क्या धर्म केवल मन्दिर, मस्जिद या गीरजाघर में है? जो वस्तु (महामण्डल निर्देशित ५-अभ्यास) मनुष्य को वास्तविक मनुष्य में परिणत करके उसे देवतुल्य बना देती है, उसको ही धर्म कहते हैं। दुनिया के सभी धर्म मनुष्य को पशु-स्तर से देवता में विकसित होने का मार्ग बतलाते हैं।
विद्यार्थियों को यह समझना होगा कि केवल परीक्षा में उत्तीर्ण हो जाने से ही मनुष्य जीवन का लक्ष्य नहीं प्राप्त हो जाता है। उच्च डिग्री हांसिल करके भी अधिकांश लोग केवल अपने लिये ही जीवित रहते हैं, दूसरों के लिये जीवित रहने से मनुष्य जीवन सार्थक होता है, यह बात समझ में नहीं आती। जो लोग दूसरों के लिये जीना चाहते हों उन्हें स्वस्थ-सबल शरीर चाहिये, सद्बुद्धि-सम्पन्न मन चाहिये, परहित करने में समर्थ प्रेमपूर्ण हृदय चाहिए। किसी भी कार्य को दो प्रकार की बुद्धि से किया जा सकता है -स्वार्थ बुद्धि और परार्थ-बुद्धि। स्वार्थबुद्धि से करने पर कोई भी कार्य बुरा -और परार्थबुद्धि से करने पर कोई भी कार्य अच्छा होता है। अतः कर्म के पीछे जो मनोभाव रहता है उसको बदलने की जरूरत है। इसको ही कर्म-योग कहा जाता है। कर्म में कौशल बरतना ही योग है। जो कुछ भी कर रहा हूँ उसी कार्य को करूँगा, किन्तु दृष्टिकोण बदल जायेगा। ये सब बातें यदि तुम्हें ठीक लगें, युक्ति-सम्मत लगें तो विवेकानन्द के पास आओ। उनके उपदेशों के अनुसार कार्य करो, उनको थोड़ी श्रद्धा दो, उनसे प्यार करो-इतना से ही काम हो जायेगा।
कार्ल मार्क्स ने 1853 ई० में एक पत्र में लिखा था , " भारतवर्ष के बारे में सोचने से बहुत दुःख होता है। क्योंकि, भारत ने अपना अतीत तो खो ही दिया है, किन्तु नया कुछ भी नहीं पाया है। इस शून्यता के भीतर से देखने पर भारतवर्ष का भविष्य अंधकारमय लगता है , कुछ समझ में नहीं आ रहा है।" (किन्तु जगतजननी, माँ जगदम्बा की लीला देखें), ठीक उसी साल 1853 ई.में ही 17 वर्ष के तरुण 'गदाधर' अपने बड़े भाई के साथ पहली बार भारतवर्ष की तात्कालीन राजधानी कोलकाता में पदार्पण करते हैं। और कोलकाता जैसे महानगर में सद्बुद्धि [मूर्तिपूजा -माँ काली की भक्ति] की एक हवा बहने लगती है। उस समय भारत का अतीत लगभग अस्पष्ट जैसा था, तब भी जितना बचा हुआ था, उसी को बचाने के लिये-उसी को ही पुनर्प्रतिष्ठित करने के लिये ठाकुर श्रीरामकृष्ण और विवेकानन्द आये थे। इनके उपर श्रद्धा रखने का अर्थ है भारतवर्ष को पुनरुज्जीवित करना, उससे प्यार करना, और उसी के साथ-साथ सम्पूर्ण विश्व के कल्याण का भी प्रावधान करना। इतना सब समझ लेने के बाद भी क्या हमलोग यह कह सकते हैं कि अभी भारत के लिये स्वामीजी की कोई आवश्यकता नहीं है, हमलोग जिस प्रकार के मनुष्य हैं, वैसे ही बने रहेंगे ? जो ठाकुर, माँ , स्वामीजी, मनुष्यों के दुःख-कष्ट से व्यथित होकर, उसके सच्चे कल्याण का मार्ग दिखा देते हैं , उनके प्रति यदि श्रद्धा नहीं रखेंगे , तो किसके प्रति रखेंगे ?(जो 'पवित्र-त्रयी' मनुष्य की व्यथा से व्यथित होकर उनके वास्तविक कल्याण का मार्ग--मनुर्भव दिखला गए हैं! यदि उन वेदमूर्ति के उपर श्रद्धा नहीं रखेंगे तो किनके उपर रखेंगे ?)
इसीलिये तो सम्पूर्ण विश्व स्वामीजी [और उनके माध्यम से ठाकुर और माँ को पहचानकर] के प्रति श्रद्धा रखता है। 1902 ई० में स्वामीजी के देहान्त के मात्र 12 वर्ष के भीतर 1906 से 1914 ई० के बीच ही स्वामीजी का 'कर्मयोग', 'भक्तियोग', 'राजयोग' तथा 'ज्ञानयोग' का रुसी भाषा में अनुवाद हो गया था। उसी प्रकार हाल के दिनों में चीन में गीता, रामायण का अनुवाद हो रहा है, स्वामीजी के संदेशों पर सेमिनार हो रहे हैं। चीन की सरकार ने वहाँ के शिक्षाविदों को इस बात का उत्तरदायित्व दिया है कि सभी धर्मों का तुलनात्मक अध्यन कर, उनका विश्लेषण कर यह पता लगायें की धर्म में कोई सार है या नहीं ?तथा मनुष्य के कल्याण में धर्म की भी कोई भूमिका हो सकती है या क्या ? चीन के मनीषी लोग अभी दुनिया के सभी धर्मों का तुलनात्मक अध्यन करके उसका सार निकालने के लिये उनका विश्लेषण कर रहे हैं। इसको ही वैज्ञानिक विश्लेषण कहते हैं। जिस प्रकार धर्म के नाम पर दुनिया में बहुत अनर्थ हुआ है, उसी प्रकार विज्ञान के द्वारा भी कई कल्याण के कार्य होने के साथ- साथ मानवता का विनाश भी हुआ है।
इस समय यह देखने की जरूरत है कि धर्म (नित्य-अनित्य विवेक) सामान्य मनुष्यों के किसी काम में आयेगा या नहीं? अब समय आ गया है कि हमलोग भी अपने सनातन धर्म को थोड़ा ध्यान पूर्वक देखने की चेष्टा करें। केवल पाश्चात्य देशों का अनुकरण करते रहने से ही काम नहीं चलेगा। जैसे एक शिक्षित व्यक्ति श्रीरामकृष्ण के निकट आकर लगभग प्रति दिन कहते थे, गीता-टीता आदि में कुछ भी नहीं है। उसके बाद अचानक एक दिन आकर कहने लगे, गीता तो बहुत अच्छी और मनुष्य का उपकार करने वाली पुस्तक है। इतना कहते ही श्रीरामकृष्ण ने कहा, 'ओहो ,लगता है किसी अंग्रेज साहेब ने कहा है ? हमलोग भी ठीक वैसा ही कर रहे हैं। जब विदेशी लोग यह कहेंगे कि " सचमुच वेदों, उपनिषदों में तो बड़ी अच्छी- अच्छी बातें हैं, केवल चार महावाक्यों में ही सम्पूर्ण विश्व को पुनरुज्जीवित करने की शक्ति है।" हमलोग तुरंत कहेंगे, हाँ ; बेशक धर्म तो बड़ी अच्छी चीज है, गीता, वेद, उपनिषद आदि जितने भी ग्रन्थ हैं, सभी अच्छे हैं- उन सब मनुष्य जाति के लिए कल्याण की बातें लिखी हैं। (अब तो अन्तर्राष्ट्रीय योग-दिवस भी मनाया जा रहा है, यूनाइटेड नेशन में दीवाली मनाई जा रही है! \) यही हमलोगों की मानसिक दरिद्रता है, इस मानसिक कंगाली को दूर करना होगा। यदि हमलोग अपनी इस आन्तरिक कंगाली को दूर हटा कर उन महान विचारों-सिद्धान्तों को (चार महावाक्यों को) अपने जीवन में अभिव्यक्त न करें, तो हमलोगों का भविष्य बहुत अंधकारपूर्ण हो जायेगा।
हमारा देश जिसको हमलोग 'माँ ' कहते हैं, भारत माता कहते हैं- जिसने हमलोगों का लालन-पालन किया है, उस माँ के लिये क्या हमारा कोई कर्तव्य नहीं है ? क्या भारतमाता का हमारे ऊपर कोई ऋण नहीं है ? माँ सबसे अधिक कैसे खुश होंगी ? भारत माता सबसे अधिक तब प्रसन्न होंगी, जब हमलोग इस मिट्टी की गोद में स्वस्थ, श्रेष्ठतर मनुष्य जैसे मनुष्य बन जायेगे। और उनकी जो संतानें गरीब और दुखी हैं, उनके आँखों के अश्रु यदि पोंछ सकेंगे । यह कार्य राजनीती करके नहीं किया जा सकता है। यह कार्य केवल यथार्थ मनुष्य बनकर ही किया जा सकता है। ऐसा मनुष्य बनना होगा जिसमें आत्मविश्वास, निर्भयता, त्याग और सेवा का भाव रहेगा, तथा अन्य मनुष्यों के प्रति प्रेम रहेगा- तभी हमलोग मातृ-ऋण, पितृ-ऋण, जिसे कभी चुकाया नहीं जा सकता, उस ऋणशोधन के लिए कुछ उपयुक्त कार्य कर सकेंगे। अब प्रश्न यह है कि हमलोग इस कार्य को करेंगे या नहीं करेंगे ? इसका उत्तर हमें ही देना होगा। हमारी भारत माता बहुत प्रसन्न होंगी, यदि उनकी सुसंतान के रूप में हमलोग स्वयं को गढ़ सकेंगे । स्वामी विवेकानन्द ने युवाओं से यही संकल्प लेने का आह्वान किया था। आज के हमलोग क्या हैं, क्या बन सकते हैं, और हमलोग क्या कर सकते हैं, उसी का सही मार्ग दिखलाने के लिए स्वामी विवेकानन्द ने अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया था।
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