1.
आत्म-अनुसन्धान
(self enquiry)
["मैं कौन हूँ ? Who am I ?"]
ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु।
सह वीर्यं करवावहै।
तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै॥
ॐ शांति, शांति, शांतिः
विवेक-चूड़ामणि ग्रन्थ के सार पर चर्चा या अध्यन के लिए हमारे पास दो विकल्प हैं। एक यह है कि हम इस ग्रन्थ का अध्यन अपनी विद्वत्ता या संस्कृत भाषा में पाण्डित्य का प्रदर्शन का दृष्टिकोण रखते हुए करें। और दूसरा विकल्प है, संस्कृत पांडित्य और विद्वत्ता के बारे में न सोचकर, नित्य-अनित्य विवेक के द्वारा 'अद्वैत-अमृत' प्राप्त करने की जो तकनीक इस पुस्तिका में बताई गई है, उस तकनीक को सीखने पर अपना अपना पूरा ध्यान केन्द्रित करें।
ये दो तरीके हैं जिनसे हम किसी शास्त्र का अध्यन कर सकते हैं। सिर्फ संस्कृत भाषा में विद्वत्ता या पाण्डित्य का दिखावा करने के लिए इस ग्रंथ का अध्यन करेंगे , तो उससे हमारे जीवन में कोई परिवर्तन नहीं आएगा। अतएव हमें इस विवेक-चूड़ामणि ग्रंथ के सार काअध्यन इस प्रकार करना चाहिए जिससे 'अद्वैत अमृत' के पान कर लेने का प्रभाव वक्ता और श्रोता दोनों के, आपके और मेरे दोनों के जीवन तथा आचरण में स्पष्ट रूप से परिलक्षित होने लगे। We should approach the subject in such a way, that is how it is going to matter in your life ,and in my life ? इस शास्त्र के अध्यन से मेरे जीवन में क्या बदलाव आयेगा? अगर यह अध्ययन मेरे जीवन को प्रभावित नहीं करे, इस अध्यन में निहित ज्ञान यदि मेरे विचारों को प्रभावित नहीं करे, अगर यह मेरे व्यवहार और चरित्र को प्रभावित नहीं करे, तो इस पुस्तिका का अध्ययन करना व्यर्थ है। और इस तरह के अध्यन की भी कोई सार्थकता नहीं है। इस विवेक-चूड़ामणि शास्त्र के अध्ययन का स्पष्ट प्रभाव मेरे और आपके जीवन तथा व्यवहार में परिलक्षित होना चाहिए। इस शास्त्र के अध्यन से हमारे चरित्र और आचरण में परिवर्तन हो , वही सबसे महत्वपूर्ण बात है ।
अब जब आप इस शास्त्र का अध्ययन करने जा रहे हैं, तो यह समझ लेना चाहिए कि इस अध्ययन का मुख्य उद्देश्य क्या है? वस्तुतः इस शास्त्र के अध्ययन का मूल उद्देश्य आत्म-अनुसन्धान (self enquiry) करना है। 'मैं कौन हूँ ?' 3'H' में मैं क्या हूँ ? हम मनुष्य जीवन की एक ऐसी सच्चाई (गहन पहलू 'dimension' अविनाशी आत्मा) के बारे में जानने जा रहे हैं, जिसके बारे में हममें से अधिकांश लोगों को प्रचलित शिक्षा-व्यवस्था के अनुसार अभी तक परिचय भी नहीं कराया गया है। जैसा कि मैं देखता हूं, हममें से अधिकांश लोग इस अद्वैत वेदान्त -इस श्री रामकृष्ण- नरेन्द्रनाथ गुरु-शिष्य परम्परा प्राप्त होने वाले इस आत्मानुसाधन पद्धति से अनभिज्ञ है। ['प्रत्येक आत्मा अव्यक्त ब्रह्म है।' प्रणवो धनुः शरो ह्यात्मा ब्रह्म तल्लक्ष्यमुच्यते।अप्रमत्तेन वेद्धव्यं शरवत् तन्मयो भवेत्।। (- मुण्डकोपनिषद् २.२.४) प्रणव (ॐ) धनुष है, आत्मा बाण है, ब्रह्म लक्ष्य है। सजग साधक जब चित्त को एकाग्र करता है, तब आत्मा ब्रह्म में एकाकार हो जाती है। स्वरूप का विस्मरण ही बन्धन है और आत्मबोध ही मोक्ष।] In this phenomenal world what is actually existing ? And who I am ? मेरे इस (परिवर्तनशील-अनित्य) नाम-रूप में यहाँ कौन (अपरिवर्तनीय-नित्यवस्तु) विद्यमान है? वास्तव में क्या विद्यमान है? और मैं कौन हूँ? (4:46)
हमारा सारा अध्यन अंततः इसी बिंदु पर आकर रुकेगा कि वास्तव में मैं कौन हूं? अब कृपया मुझे बताइये कि क्या हमारे वास्तविक स्वरूप से परिचय कराने वाले विषय से भी अधिक रोचक और आकर्षक कोई अन्य विषय हो सकता है क्या ?
इस अध्यन के द्वारा हमें अपने वास्तविक स्वरूप से परिचित कराया जाएगा। आप भौतिकी का अध्ययन कर सकते हो, आप जीव विज्ञान का अध्ययन कर सकते हो, आप एआई का अध्ययन कर सकते हो । ये सभी चीजें आपके 'स्व' से (आपके सच्चे स्वरुप से) अलग हैं। हमारी स्कूल और कॉलेज की शिक्षा, हमें हमारे 'स्व' (सत्य स्वरुप) के अलावा हर चीज़ के बारे में बताती है। 'अद्वैत वेदांत' वह अध्यन है जो हमारे अपने सच्चे स्वरूप से जुडी हुई है।तो यहाँ मूलतः प्रश्न यह है कि, जानने की एक मात्र वस्तु यही है कि मूलतः ज्ञान यहाँ एक ही चीज़ के इर्द-गिर्द घूम रहा है, -मैं कौन हूँ? यही सृष्टि का सबसे बड़ा रहस्य है। आप सब कुछ जानते होंगे लेकिन यदि आप स्वयं को नहीं जानते तो आपने कुछ भी नहीं जाना। वस्तुतः आत्मज्ञान के अतिरिक्त शेष सब कुछ अज्ञान की श्रेणी में आता है। यह एक बहुत ही व्यापक अवलोकन और कथन है, 'आत्म' के ज्ञान के अलावा, जब मैं आत्म शब्द का प्रयोग करता हूँ, तो मैं आत्मज्ञान की बात कर रहा हूँ। अपने स्वयं के सच्चे स्व का ज्ञान.तो यह महान ऋषियों द्वारा हमें दी गई महान ज्ञान है। अतएव आत्मज्ञान ही ज्ञान है , बाकि सब अज्ञान है। (7:12)
यह सुनकर के थोड़ा कष्ट होता होगा हमें, हम तो ज्ञान अर्जन करने के लिए स्कूल और कॉलेज में जाते हैं। वहाँ जो भौतिक ज्ञान प्राप्त होता है , उसका भी जीवन में स्थान है। उसका महत्व भी है। लेकिन भौतिक ज्ञान प्राप्त करने से ही मनुष्य के समस्त समस्याओं का समाधान नहीं हो सकता। जिन विषयों का अनुभवजन्य ज्ञान हम अपने पंचेन्द्रियों के माध्यम से प्राप्त करते हैं , केवल उन इन्द्रिय गोचर भौतिक वस्तुओं का ज्ञान प्राप्त कर लेने मात्र से ही मनुष्य या जीव की समस्त समस्याओं का समाधान कभी नहीं हो सकता। Only by acquiring empirical knowledge, or the knowledge of this , what we are seeing through our sense organs .the problems of the human being or the living soul, is never going to be solved . (7:50) और जब आप यह जान जाते हो , कि आप स्वरूपतः क्या हो ? तभी आप समस्त समस्याओं से परे उठ जाते हो। किन्तु यह ज्ञान पुस्तक पढ़कर प्राप्त नहीं किया जा सकता है। हम लोग यहाँ जो अध्यन करने जा रहे हैं - वह किसी किताबी ज्ञान का अध्यन करने नहीं जा रहे हैं। यह बात को समझ लेना बहुत महत्वपूर्ण है। हमारा अध्यन अपने स्वरुप की अनुभूति में समाप्त होनी चाहिए। इस आत्मानुसन्धान को बहुत बुनियादी स्तर से प्रारम्भ करते समय हमलोग, हम विवेक-चूड़ामणि तथा अन्य शास्त्रों की सहायता लेंगे। प्रारम्भ में । किन्तु इस अध्यन की परिसमाप्ति अपने आत्मस्वरूप की अनुभूति में होनी चाहिए। हमारी समस्त समस्याओं का समाधान उसी से प्राप्त होगा। शंकराचार्यजी ने बहुत अच्छे ढंग से हर बिन्दु पर चर्चा की है।
'मैं' की खोज के तीन चरण या आत्मानुसन्धान के तीन चरण : यदि आप यह जानना चाहते हों कि आपका वास्तविक स्वरुप क्या है, तो उसकी एक सनातन पद्धति है। जिसकी सहायता से हम जान सकते हैं कि - मैं कौन हूँ? आत्मानुसंधान के वे तीन चरण है - श्रवण, मनन , निदिध्यासन। इन तीनों चरणों का विधिवत अनुपालन करने से हम निश्चित रूप से यह अनुभव का सकते हैं कि हमारा सच्चा स्वरुप क्या है ? हमारे ऋषियों द्वारा आविष्कृत आत्मनुसन्धान की ये पद्धति सम्पूर्ण मानवता के लिए उपलब्ध है। यह पद्धति हमारे उपनिषदों में बताई गयी है। समस्त आध्यात्मिक ज्ञान के स्रोत उपनिषद ही हैं। हमारे उपनिषद उन ऋषियों की अनुभूतियों के कोष हैं, जिन्होंने परम् सत्य का साक्षात्कार किया है। ऋषि लोग जानते हैं कि परम् सत्य तक पहुँचा कैसे जाता है। प्रत्येक सत्यान्वेषी ने इस पद्धति का परीक्षण करके देखा है, उन्हें अपने सत्य स्वरुप की अनुभूति हुई है। यह हमारे 'मैं' की खोज है। हम सभी इस 'मैं' का अनुभव करते हैं। हमारे व्यक्तित्व और पहचान का आधार यह 'मैं' ही है। हम जो कुछ भी करते या सोचते हैं सभी इस 'मैं' में ही आधारित होते हैं। हम अक्सर कहते मैं ये करूँगा , मैं वहाँ जाऊंगा। मैं अद्वैत आश्रम मायावती के आध्यात्मिक प्रवास में भाग लेने जाऊँगा। आप लोग यहाँ पहुँचे कैसे हैं ?
यह 'मैं' क्या है ? हर कार्य का आरम्भ 'मैं' से ही होता है। हमलोग इस 'मैं' को लेकर भ्रांत हैं। यह एक बड़ी समस्या है। यह 'मैं' है क्या ? इसको जानने की चेष्टा हम कभी नहीं करते। क्या यह 'मैं' मेरा वास्तविक मैं है या प्रातिभासिक मैं है ? अभी हमलोग 'मैं' मतलब सिर्फ यह 'स्थूल शरीर' ही समझते हैं। यह समझ हमने सोंच- विचार कर भी विकसित नहीं किया है। ऐसा जन्मजात हमारी मान्यता है। कि ऐनक में जो स्थूल शरीर दीखता है - मैं वही हूँ। और जब स्थूल शरीर की बात होगी, तो कोई पुरुष शरीर है , कोई स्त्री शरीर है। फिर उस M/F शरीर का जाल शुरू हो जाता है। हमारे अस्तित्व का जड़ इस 'मैं' को जानने पर निर्भर है। हम हम इसी 'मैं' गहन खोज करने जा रहे हैं कि यह 'मैं ' क्या है ? क्या मैं केवल इस शरीर में ही सीमित हूँ ? या इससे भिन्न भी मेरा कोई दूसरा आयाम (पहलू) भी है; जिसको मैं इस समय नहीं समझ पा रहा हूँ ? यही प्रश्न है। (14:42)
हमलोग 'मैं' की खोज करने वाले सत्यार्थी 'Seekers of Truth' हैं : हमें एक बात स्मरण रखनी होगी हम सभी जो यहाँ शिविर/P.C. में भाग ले रहे हैं, सभी हम सभी लोग यथार्थ 'मैं' की खोज करने वाले सत्यार्थी हैं ! जब आप यथार्थ 'मैं' की खोज शुरू करते हो, तो मन की अवस्था किसी सत्य-शोधक वैज्ञानिक के जैसी होनी चाहिए। जैसे कोई वैज्ञानिक यह जानना चाहता है कि किसी घटना का कारण क्या है ? (सेव नीचे क्यों गिरा , ऊपर क्यों नहीं गया ? इसका सत्य क्या है?) हम लोग भी उसी तरह के 'वैज्ञानिक मन' -The 'scientific mind' के साथ इस 'मैं' की खोज करेंगे। इस प्रकार वैज्ञानिक मन लेकर ही 'मैं' की खोज में आगे बढ़ना बहुत महत्वपूर्ण है। हम लोग सब यहाँ पर सत्यान्वेषी हैं ! (15:28) सत्य का अन्वेषण करने के लिए हम लोग यहाँ पर एकत्रित हुए हैं। यदि हमे यह जानना है कि वास्तव में 'मैं' कौन हूँ ? तो इस 'मैं' की खोज के तीन चरण हैं -श्रवण , मनन और निदिध्यासन। इस प्रक्रिया का अनुशीलन करने से हमें अपने सत्य-स्वरुप की नई जानकारी मिलेगी। प्रत्येक मनुष्य के जीवन में एक आश्चर्यजनक विकास घटित होने की प्रतीक्षा में है। यह केवल समय सापेक्ष है। प्रत्येक मनुष्य के भीतर किसी न किसी दिन ये विकास अवश्य घटित होकर ही रहेगा। जो व्यक्ति इस 'मैं' की खोज शुरू करेगा , उसके जीवन में , मेरे जीवन में या आपके जीवन में वह आश्चर्यजनक विकास घटित होने की प्रतीक्षा में है। और जिस दिन यह घटित होगा वह मनुष्य जीवन की सर्वश्रेष्ठ उपलब्धि होगी।
सुनना और श्रवणं : तो इस मैं कौन हूँ ? के खोज की शुरुआत हम श्रवण -मनन से करने जा रहे हैं। उसकी विस्तारित परिभाषा हमलोग आगे देखेंगे। अभी श्रवण का साधारण अर्थ है -सुनना। लेकिन श्रवणं - का अर्थ है केवल शास्त्र और गुरु के मुख से निकले शब्दों को सुनना। शास्त्र-वाक्य और गुरु-वाक्य का श्रवण करना। तथा ऐसा श्रवण सत्य-शोधक वैज्ञानिक मन को लेकर ही करना होगा। इसको हमलोग आगे समझेंगे। जब आप शास्त्र के शब्दों या महावाक्यों (चार महावाक्य) का श्रवण करेंगे तो आपको उसका अर्थ समझने के लिए उस पर गहराई से चिंतन-मनन करना पड़ेगा। जब आप शास्त्र और गुरु के मुख से सुने महावाक्यों पर गहराई से मंथन करना शुरू कर देते हैं , तो आपके व्यक्तित्व में एक आश्चर्यजनक परिवर्तन दिखाई पड़ता है। आगे हमलोग इस पर विस्तार से चर्चा करेंगे। इसलिए श्रवण करने के बाद मनन की एक प्रक्रिया चलनी चाहिए।
मननम : इस लिए इस पाठचक्र में हमलोग जो कुछ अध्यन कर रहे हैं , आप इन चीजों को बहुत 'attentively' ध्यान से सुन रहे हैं। आप इसके मूल विचारों को समझने का प्रयास कर रहे हैं। और आपके मन में एक नए प्रकार का 'मानस व्यापार' शुरू हो जाता है। जब आप ध्यान से शास्त्र और गुरु के महावाक्यों का श्रवण करने के बाद मनन करते हैं , तो उस मानस -व्यापार की एक स्पष्ट दिशा होती है। वर्तमान में हमारे मानस -व्यापार (Mental activity) कोई स्पष्ट निश्चित दिशा है क्या ? हमारे दैनंदिन जीवन में जैसा हो रहा है , हम उसी की चर्चा कर रहे हैं। आप यदि मनुष्यों के मन तथा उसकी मानसिक -व्यापार पर गौर करें , तो आप पायेंगे कि मनुष्य के मन में चलने वाले विचारों की कोई स्पष्ट दिशा नहीं होती है। [बब्लू का छः महीने बाद मन बदला और जमीन लिख दिया।] उसके मन का चिंतन एक साथ कई दिशाओं में चल रहा होता है। सुबह कुछ , शाम को कुछ अलग दिशा में सोचता रहता है। बिना किसी निश्चित लक्ष्य के हमारा मन विभिन्न दिशाओं में भटकता रहता है। तो 'मननम' मानस -व्यापार की वह अनूठी प्रक्रिया है, जो शास्त्र और गुरु मुख से श्रवणं करने के बाद 'generate' उत्पन्न होती है। जिसमें आपके चिंतन की दिशा केवल एक लक्ष्य पर टिकी होती है। और मानसिक व्यापार की वह दिशा किस लक्ष्य की ओर होती है ? वह केवल एक लक्ष्य - मैं कौन हूँ ? को जानने की दिशा में होती है। यहाँ मननम में मन की एकाग्रता पूर्णतया केवल एक लक्ष्य - मैं कौन हूँ ? को जानने पर केंद्रित रहती है। जब मन की एकाग्रता केवल अपने सत्यस्वरूप को जानने पर, केंद्रित रहने लगती है तब उसको 'मननं ' कहते हैं। (19:42) इसलिए अपने दैनंदिन जीवन में भी स्वाध्याय के बाद मनन करने में थोड़ा समय देना चाहिए। [हर क्लास के बाद आपको -1 घंटा मनन के लिए दिया जायेगा।]
मौन का अभ्यास (Practicing of Silence-योगस्य प्रथमद्वारं) : आप सभी युवा हो और अपनी इच्छा से यहाँ आये हो। इसलिए यहाँ के अनुशासन का पालन प्रसन्नता पूर्वक करेंगे। अनुशासन आप पर थोपा नहीं जा रहा है। मौन का पालन आप स्वतः करेंगे, अनावश्यक बातचीत में अपनी ऊर्जा का क्षय नहीं करेंगे। आत्मानुसन्धान में , सत्यार्थी के लिए इस मौन-पालन का स्थान बहुत महत्वपूर्ण है। मौन पालन का अर्थ है -अनावश्यक बातचीत से विरत हो जाना। कभी कभी कुछ बातचीत करना जरुरी हो जाता है , पर केवल तभी बोलें जब वह सचमुच जरुरी हो। इसलिए बेहतर होगा की एक घंटा मौन रहें यथा सम्भव कम से कम बोलने की चेष्टा करें। विवेक-चूड़ामणि ग्रंथ के एक श्लोक में भगवान शंकराचार्य जी स्वयं कहते हैं -
योगस्य प्रथमद्वारं वाङ्निरोधोऽपरिग्रहः ।
निराशा च निरीहा च नित्यमेकान्तशीलता ॥ ३६८ ॥
वाणी पर संयम , द्रव्य का संग्रह न करना , लौकिक पदार्थों की आशा छोड़ना , कामनाओं का त्याग करना और नित्य एकान्त में रहना - ये सब योग का पहला द्वार है।
368. The first steps to Yoga are control of speech, non-receiving of gifts, entertaining of no expectations, freedom from activity, and always living in a retired place. Notes: Gifts—i. e. superfluous gifts. (अनावश्यक उपहार नहीं लेना।)*
यदि आप इस मौन का पालन निष्ठापूर्वक करोगे , तो देखोगे आपके जीवन में इसका परिणाम बहुत सुंदर होगा। जीवन में गुणात्मक परिवर्तन होगा। हमलोग यहाँ जो कुछ अध्यन कर रहे हैं , वह पाण्डित्य ये विद्व्ता के लिए नहीं है। academic accomplishments' शैक्षणिक उपलब्धियाँ , उच्च डिग्री प्राप्त करना हमे कहीं नहीं पहुँचा सकता। आश्रम या महामण्डल का प्रशिक्षण academics शैक्षणिक नहीं है, यह 5 Practices अभ्यास (साधन चतुष्टय का अभ्यास) करने के लिए है। ये साधन चतुष्टय जीवन में परिवर्तन लाने वाले सूत्र हैं। यह सूत्र एक ऐसा बीज है जिसको जीवन में बुआई कर देने से - जीवन बदल जायेगा। जो कोई भी इनका अभ्यास करेगा , प्रत्येक मनुष्य के जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन घटित होगा। इसलिए हम इस ग्रंथ का अध्यन जीवन में उनका अभ्यास करने के लिए करेंगे , पाण्डित्य के लिए नहीं करेंगे। इस लिए मौनं का अभ्यास आध्यात्मिक जीवन के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। ज्यादा बोलते रहने से आपकी समस्त ऊर्जा असंयमित वाणी में खर्च हो जाती है। वाणी का अर्थ क्या है ? हमारे मन में जो विचार चलते हैं, उन्हीं को हम अपनी वाणी के द्वारा प्रकट करते हैं। आपकी भावनाएं वाणी में अभिव्यक्त होती हैं। वाणी पर संयम करने, या शांत रहने से मन को भी वश में किया जा सकता है। यदि अनाप-शनाप बोलते रहे , तो मन को वश में कैसे करोगे ? अपने मन को बहिर्मुखी विषयों में जाने से खींचकर -अन्तर्मुखी करके प्रत्याहार और धारणा का अभ्यास कैसे करोगे ? यदि वाणी और मन पर संयम नहीं होगा , तो उसको अपने सत्य स्वरूप पर एकाग्र करके , मैं कौन हूँ ? यह जानोगे कैसे ? आत्मानुसन्धान कैसे करोगे ? इसलिए महान ऋषि शंकराचार्यजी कहते हैं - योग का प्रथम द्वार है मौनं ! योग का क्या अर्थ है ? योंग का अर्थ है - अपने सच्चे स्वरुप के साथ जुड़ जाना ! हमारा यथार्थ स्वरुप क्या है ? वही आत्मानुसंधान है। मैं कौन हूँ ? यह जानने का उपाय ही योग है। अपने स्वरुप में प्रतिष्ठित हो जाना ही योग है। और योग का उल्टा क्या है ? भोग ! जब हमारी सारी ऊर्जा 5 इन्द्रियों के द्वारा बहिर्मुखी हो जाती है , वो हमें कहीं नहीं पहुँचातीं और हम बिना तली वाले गड्ढे में गिरते चले जाते हैं। यदि इन इन्द्रियों की दिशा को अन्तर्मुखी नहीं बनाया जाये तो हम कभी अपने सच्चे स्वरुप को- मैं कौन हूँ ? को जान नहीं पाएंगे। तो शंकराचार्यजी कहते हैं -मैं कौन हूँ ? यह जानकर अपने सत्य स्वरुप में प्रतिष्ठित हो जाने पहला द्वार है -मौनं ! इसलिए मौनं के अभ्यास को बहुत गंभीरता से ग्रहण करना चाहिए। शिविर प्रवास में यह मौन का अभ्यास आपके दैनंदिन जीवन का अभिन्न अंग होना चाहिए। मैं सभी प्रशिक्षणार्थियों से कहता हूँ , यहाँ जब तक हो मौन का अभ्यास करने का अवसर है; यहाँ मौन रहने से कोई व्यक्ति मना नहीं करेगा।पर यहाँ से वापस घर लौटने पर यदि मौन रहोगे , तो आप जानते हो परिवार वालों की क्या और कैसी प्रतिक्रिया होगी ! घर में रहकर भी मौन का अभ्यास करने में सफल हो पाना बहुत बड़ी चुनौती है। यहाँ रहते समय आप 100 % मौन का पालन कर सकते हो। यहाँ इस मौन का प्रयोग करके देखो। (25:35)
और फिर इस अद्वैत आश्रम, मायावती की शांति का अनुभव करो ; यहाँ की शान्ति तो इतनी जोरदार है कि, यह अनुभव करने लायक बात है। The silence of Mayawati is so loud that, it is something to be experienced. जैसे जैसे आपका मन इस मौन में डूबता है, उसका अनुभव करो। मैं कौन हूँ ? यह विषय सैद्धान्तिक रूप से नहीं प्रयोग करके अनुभव करो, कि भीतर में क्या चल रहा है ? जैसे जैसे तुम्हारा मन मौन के जल में डूबता जाता है , उसको डूबने दो , और डूबने दो। जितनी मौन की गहराई में डूबोगे उतना ही अपने सत्य स्वरुप के निकट पहुँचते जाओगे। अगले 10 दिनों तक यह प्रयोग करके देखो। इसलिए श्रवणं , मननं और निदिध्यासनं के लिए वाणी का संयम का अभ्यास सबसे महत्वपूर्ण है। मौन का अभ्यास कोई दबाव से नहीं करना है , स्वेच्छा से करना है। आशा है एक ईमानदार सत्यार्थी की तरह आप स्वयं मौनं का अभ्यास करोगे। ऐसा करने से आपको ही बहुत लाभ होने वाला है। यदि यहाँ भी बातचीत में समय बिता दिया तो कोई लाभ नहीं होगा। इस शास्त्र में इन सभी विषय पर चर्चा की गयी है। 5 -6 दिन के बाद से ही आप अनुभव करोगे हम कहाँ पहुँच गए हैं ? जैसे कोई माँ अपने बच्चे की ऊँगली पकड़ कर उसे चलना सिखाती है , उसी प्रकार ये महान ऋषि भगवान शंकराचार्यजी हमारा हाथ पकड़ कर उस परम सत्य के सम्मुख खड़ा करा देते हैं, जो हमारा वास्तविक स्वरूप है। आप स्वयं इसका अनुभव करोगे -यदि अभ्यास करोगे। इसलिए मौन का अभ्यास और व्यर्थ के विचार मन को मन में नहीं उठने देना -ये दो अभ्यास अनिवार्य है। आशा करते हैं कि अगले 10 दिनों तक कोई भी सदस्य अपने मोबाईल को अपने रूम से बाहर नहीं निकालोगे।
प्रार्थना : " So we pray to the supreme divinity to shower his grace - 'Anugraha' on every member of this retreat so that 'he', 'she' can uplift 'himself', 'herself' and rediscover 'oneself' in a new light .Om Tatsat !"
इसके लिए ईश्वर (supreme divinity: परम दिव्यता ) से हम प्रार्थना करते हैं कि वे आध्यात्मिक प्रवास में उपस्थित सभी सदस्यों पर अपनी कृपा और अनुग्रह की वर्षा करें ! ताकि सभी युवक -युवती ,स्त्री या पुरुष सभी (सत्यार्थीयों) अपने को देह-मन से ऊपर उठाकर नए प्रकाश में 'स्वयं' को (अपने सच्चे स्वरुप को) पुनः अविष्कृत कर सकें। ॐ तत्सत ! (29 :03)
>>अद्वैत आश्रम, मायावती~एक परिचय :
स्वामी विवेकानन्द ने इस अद्वैत आश्रम की शुरुआत 1899 में की थी। स्वामी विवेकानन्द की जीवनी आप सबों ने पढ़ ली होगी ? बहुत अच्छा, सब ने पढ़ ली है ! भगवान शंकराचार्यजी ने जिस कार्य को 1200 वर्ष पहले किया था, ठीक वही कार्य स्वामी विवेकानन्द ने इस समय, आधुनिक युग में किया है। आप ऐसा कह सकते हो कि स्वामी विवेकानन्द वर्तमान युग के शंकराचार्य हैं। Both these great masters, their mission was to give this 'Nectar of Advaita' to the entire humanity . इन दोनों महान गुरुओं के जीवन का ध्येय (mission) था इस अद्वैत अमृत को सम्पूर्ण मानवजाति में वितरित कर देना। "Because this Advaita is the only thing which can save humanity." क्योंकि इस अद्वैत वेदान्त (दृष्टि) का प्रचार-प्रसार करना ही एक मात्र उपाय है, जो सम्पूर्ण मानवता की रक्षा कर सकता है। It may sound a bit fanatic and dogmatic when I make this statement. But this is not an exaggeration ! यह बात सुनने में आपको थोड़ा धर्मान्धता (fanatic) कट्टरता (dogmatic) जैसा प्रतीत हो सकता है, लेकिन इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं है। लेकिन यह कोई अतिशयोक्ति नहीं है, अद्वैत दृष्टि के आलावा, अन्य कोई भी प्रणाली सम्पूर्ण मानवता की रक्षा नहीं कर सकती। Especially the way people practice the different religion in the world they cannot do. Why?-विशेषकर दुनिया में लोग जिस तरह से विभिन्न धर्मों का पालन करते हैं, वे ऐसा नहीं कर सकते। यही अद्वैत ही एक मात्र प्रणाली है जो सम्पूर्ण मानवता की रक्षा कर सकती है। क्यों? क्योंकि अद्वैत वेदान्त कोई मतवाद नहीं है, यह विशुद्ध विज्ञान है। All the religions of the world , as they are practiced today, mostly they are all belief systems. दुनिया के सभी नाम वाले धर्म (छाप या ट्रेडमार्क वाले धर्म), जैसा कि आज प्रचलित हैं, अधिकांशतः वे विश्वास प्रणालियाँ 'Belief system' हैं। You are asked to believe something , some God who is existing up in the sky, beyond the clouds, beyond the heaven, and he is ruling the world from there . आपसे किसी वस्तु या ईश्वर पर विश्वास करने के लिए कहा जाता है, जो बादलों के पार, स्वर्ग से भी परे आकाश में विद्यमान है, और वह वहीं से दुनिया पर शासन कर रहा है। इसी तरह के विचार समाज में देखे जा सकते हैं। मरने के बाद हमलोग वहां पेश किये जायेंगे। Then the God sitting there, a bearded man who will be casting you either into the hell or to the heaven . उनका विश्वास है कि वहां बैठा भगवान, एक दाढ़ी वाला आदमी है, जो आपको नरक में या स्वर्ग में डाल देगा। स्वामी विवेकानन्द कहते है कि ऐसे विचार किंडरगार्टन के बच्चों के लिए अच्छे हैं। -'These are good for kindergarten children!' ये सब विचार बड़े असाधारण विचार हैं 'fantastic ideas' हैं, किन्तु ये सब विचार स्कूल के बच्चों के लिए हैं, परिपक्व (Mature) और वयस्क लोगों के लिए नहीं। कोई भी परिपक्व व्यक्ति (Mature human being) किसी भी बात पर ऐसे ही- झट से विश्वास नहीं कर लेता है। If what you are believing in, if it is not verifiable then it is a big question ! यदि आप किसी ऐसे सिद्धांत में विश्वास कर लेते हो , जो सत्यापन योग्य 'verifiable' ही नहीं हो, तो उस पर विश्वास कैसे करें ? यह एक बहुत बड़ा प्रश्न वाचक चिन्ह है ! Can we verify the God sitting up in the sky beyond the heavens and all these things ? It is not verifiable . क्या हम इस बात को सत्यापित करके देख सकते हैं कि, ऊपर बादलों और स्वर्ग से भी परे कोई एक ईश्वर है, जो आसमान में बैठा है ? नहीं, यह केवल एक विश्वास है, जिसे सत्यापित नहीं किया जा सकता है। वहीं अद्वैत वेदान्त एक ऐसे परम् सत्य की बात करता है केवल एक कल्पना नहीं है , वेदांत के चारो महावाक्य [अद्वैत (Be and Make)] किसी भी मनुष्य के द्वारा सत्यापित करके परखे जा सकते हैं। (31:33)
तो अब आप समझ सकते हैं कि हमलोग किस प्रकार के आध्यात्मिक विज्ञान का अध्यन करने जा रहे हैं ? इस महान गुरु के द्वारा जो भी विचार या जो कोई उपदेश जो आगे चलकर हमारे समक्ष रखे जायेंगे , उनकी शिक्षा के प्रत्येक कथन को हमलोग स्वयं सत्यापित करके देख सकते हैं। उनकी शिक्षाओं को आप सत्यापित (verify) करके देख सकते हो, मैं सत्यापित करके देख सकता हूँ। कोई भी व्यक्ति, चाहे वह किसी भी धर्म का अनुयाई हो , या किसी भी देश का वासी हो सत्यापित करके देख सकता है। एक हिन्दू वेदान्त के महावाक्यों को सत्यापित कर सकता है , कोई मुसलमान उसको सत्यापित कर सकता है , कोई ईसाई इसे सत्यापित कर के देख सकता है। कोई अमेरिकन इसे सत्यापित कर सकता है , कोई चाइनीज इसको जाँच करके (verify) करके देख सकता है। कोई भी मनुष्य इसको सत्यापित करके देख सकता है। क्योंकि यह 'स्व' को जानने का, 'Pure science of the self है, आत्मा को जानने का ,'मैं' कौन हूँ ? यह जानने का यह एक विशुद्ध विज्ञान है।
यह वेदांत एक ऐसे 'Existential reality' ऐसे 'अस्तित्वगत वास्तविकता', ('Inherent Divinity' अंतर्निहित दिव्यता, या ब्रह्मत्व) की बात करता है, जो प्रत्येक प्राणी के ह्रदय में बैठकर -धड़क रहा है -स्फूर्त हो रहा है, throbbed हो रहा है। और यही वह परम् सत्य है जो सचमुच विद्यमान है।
Now we are going to come to some very essential and profound ideas. अब हम कुछ बहुत ही आवश्यक और गहन विचारों पर आएंगे। यह हमें एक ऐसे सत्य से परिचय कराता है , जो सचमुच में विद्यमान है। वह सत्य किसी कल्पना पर आधारित नहीं है , वह अनुभव-गम्य है , उसका अनुभव किया जा सकता , प्रत्येक मनुष्य के द्वारा इसका अनुभव किया जा सकता है। इस सत्य को जाँच-परख कर देखा जा सकता है। That's why Vivekananda had said this Advaita is the only system of the future generations, इसीलिए विवेकानंद ने कहा था कि यह अद्वैत ही भावी पीढ़ियों के लिए सत्य को जानने की एकमात्र प्रणाली होगी। आज हम जब वैज्ञानिक युग में वास कर रहे हैं , तो हमारे धर्म को भी विज्ञान सम्मत होना होगा। और जो धर्म विज्ञान की कसौटी पर परखने योग्य नहीं होगा, आधुनिक मानव उसको स्वीकार नहीं करेगा। स्वामी विवेकानन्द ने भविष्य वाणी करते हुए कहा था - " Advaita is the only system which is going to be future religion of humanity." " अद्वैत (दृष्टि-"Be and Make") ही एकमात्र ऐसी प्रणाली है जो सम्पूर्ण मानवता का भावी धर्म बनने जा रही है। " यह स्वामी विवेकानन्द द्वारा की गयी एक बहुत बड़ी भविष्यवाणी है। (33:07)
इसी भविष्यवाणी को कार्यान्वित करने के लिए, स्वामी विवेकानन्द ने इस अद्वैत आश्रम की शुरुआत 1899 में की थी। आप सभी जानते हैं कि 1893 में वे अमेरिका गए थे। क्या आप बता सकते हो कि अमेरिका जाकर उन्होंने क्या किया था ? (33:17) जी , विश्व धर्म-महासभा में भाग लेकर उन्होंने सनातन हिन्दू धर्म पर व्याख्यान दिए थे। बिल्कुल ठीक ! तो देखिये ये स्वामी विवेकानन्द ही थे जिन्होंने आधुनिक युग में ' Glory of Sanatan dharma and glory of Bharat' सनातन धर्म के गैरव तथा भारत के गौरव को सर्वप्रथम सम्पूर्ण जगत के सामने रखा था। प्यारे भाइयो , आप इन दो बातों को हमेशा याद रखिये। प्रत्येक भारतवासी को अपनी पुण्यभूमि , मातृभूमि के गौरव को सदैव याद रखना चाहिये। 'हमारी मातृभूमि इस पृथ्वीलोक पर सबसे अनुपम (unique-अद्वितीय) देश है ! 'Our This Motherland is the most unique country on the planet ! ' हमें इस पर गर्व होना चाहिए। स्वामी विवेकानन्द एक ऐसे व्यक्ति थे, जिन्हें अपने भारतीय होने पर गर्व था , और अपने सनातन धर्म पर गर्व था। His only one mission was to place this great ideas of Sanatan Dharma before the entire humanity .' उनका एकमात्र मिशन सनातन धर्म के महान सिद्धान्तों को संपूर्ण मानवता के समक्ष रखना था। हम भारतीय लोगों ने अपना आत्मविश्वास खो दिया था , हमने आत्मश्रद्धा या अपने सत्य स्वरुप पर श्रद्धा को खो दिया था। हम लोग वास्तव में कौन हैं, यह भूल जाने के कारण हम लोगो ने अपने आप गर्व करने और स्वयं को सम्मान देने की भावना खो दी थी। ये स्वामी विवेकानन्द ही थे ,जिन्होंने हमारे आत्मविश्वास को वापस लौटा दिया। स्वामीजी ने अमेरिका जाकर भारत को उसकी मोहनिद्रा से जगा दिया। यह एक अलग कहानी है , अभी उसको छोड़ता हूँ। स्वामी जी 1897 में भारत लौटे , लेकिन 1896 में जब वे भारत लौटने की राह में थे , तो यूरोप के भ्रमण पर स्विट्जरलैंड गए थे। स्विट्जरलैंड में आल्प्स पर्वत के बर्फ से ढँकी हुई शृंखला को देखकर स्वामी विवेकानन्द ने खुली आँखों से स्वप्न देखा ,'visualize' किया कि इसी प्रकार बर्फ से ढँके हिमालय की गोद में उनका एक अद्वैत आश्रम होगा। आल्प्स पर्वत श्रेणी को देखकर उन्हें हिमालय पर्वत याद आ गया। और उन्होंने अपने शिष्यों से अपनी इच्छा व्यक्त की -He expressed his wish to his disciples, कि मुझे हिमालय की गोद में एक आश्रम बनाने की इच्छा है। मैं उस कहानी के विस्तार में नहीं जाऊँगा। अन्ततोगत्वा स्वामीजी द्वारा 1896 में देखा गया स्वप्न 1899 में साकार हो गया। 1896 में उन्होंने अपने शिष्यों से अपनी इच्छा व्यक्त की थी, और अगले तीन वर्षों में -1899 में (मार्च 1899 में) हिमालय की गोद में इस आश्रम की शुरुआत हो गयी। यहाँ से बैठकर 380 KM क्षेत्र में फैले बर्फ से ढंके अद्भुत हिमालय श्रृंखला को आप देख सकते हैं। And Swami Vivekananda dedicated this Ashrama completely to the practice and preaching of Advaita Vedanta alone ! और स्वामी विवेकानंद ने इस आश्रम को पूरी तरह से अद्वैत वेदांत के अभ्यास और प्रचार के लिए समर्पित कर दिया! Exclusively this Ashrama is dedicated to the practice and preaching of Advaita and Advaita alone ! यह आश्रम विशेष रूप से अद्वैत और केवल अद्वैत-दृष्टि के अभ्यास और प्रचार के लिए समर्पित है! Here no dualistic method is allowed or permitted , he was very emphatic in his vision, very clear in his vision . यहां किसी द्वैतवादी पद्धति से पूजा अनुष्ठान आदि करने की आज्ञा या या अनुमति नहीं है, स्वामी जी अपनी अद्वैत -दृष्टि के प्रति बहुत दृढ़ थे, उनकी दृष्टि बहुत स्पष्ट थी। इसलिए आपने देखा होगा कि यहाँ इस आश्रम में कोई साकार मूर्ति नहीं है , कोई मंदिर नहीं है। कोई अचार-अनुष्ठान नहीं होते हैं। 'No ceremonies' यहाँ कोई समारोह आदि नहीं होते हैं।यहाँ सिर्फ ॐ हैं ! इस ॐ का अर्थ क्या है ? हमलोग देखेंगे। The entire reality is pact in this one sound ! इस एक मात्र शब्द - ॐ कार में सृष्टि का सम्पूर्ण सत्य समाहित है। सम्पूर्ण वास्तविकता इस एक ध्वनि में समाहित है! This Advaita Ashram was started by Swami Vivekananda , with the intention that this ashram is dedicated to the practice and preaching of Advaita and Advaita alone ! and this has been going on for the last 127 years . इस अद्वैत आश्रम की शुरुआत स्वामी विवेकानंद ने इस उद्देश्य से की थी कि यह आश्रम केवल अद्वैत के अभ्यास और प्रचार के लिए समर्पित हो! और यह पिछले 127 वर्षों से इसी प्रकार चल रहा है। विगत 127 वर्षों से यहाँ केवल ॐ की उपासना हो रही है। कल्पना कीजिये आप जिस अद्वैत आश्रम, मायावती में बैठे हो, यह 127 वर्ष पहले का बना हुआ है। और यह अद्वैत आश्रम अपना कार्य 'silently' मौन रहकर ही करता चला आ रहा है। तो यह हो गयी इस आश्रम का संक्षिप्त विवरण।
'3H' Development (विशेष नोट्स) :
स्वामी विवेकानन्द ने कहा था - " आत्मा की इस अनन्त शक्ति का प्रयोग जड़ वस्तु (Hand :स्थूल शरीर) पर होने से भौतिक उन्नति होती है , विचार पर होने से (Head :मन पर) होने से बुद्धि का विकास होता है , और 'अपने स्व '(Heart) पर ही होने से मनुष्य का (3H विकसित होकर ) ईश्वर बन जाता है।" पहले हमें ईश्वर बन लेने दो। तत्पश्चात दूसरों को ईश्वर बनाने में सहायता देंगे। 'बनो और बनाओ' यही हमारा मूल-मंत्र रहे। " First, let us be Gods, and then help others to be Gods. "Be and make." Let this be our motto." ऐसा न कहो कि मनुष्य पापी है। उसे यह बताओ कि तू ब्रह्म है। यदि कोई शैतान हो, तो भी हमारा कर्तव्य यही है कि हम ब्रह्म का ही स्मरण करें, शैतान का नहीं। हमें यह समझ लेना चाहिए कि जो कुछ भी नकारात्मक (negative) है, विध्वंशकारक (destructive) है और जो केवल छिद्रान्वेषण (criticism) है, उसका अंत अवश्यम्भावी है; और जो सकारात्मक, सत्यात्मक (affirmative) और रचनात्मक है, वही अमर है और वही सदा रहेगा। हम यही कहें -"We are" and "God is" and "We are God !" " हम हैं" और "ईश्वर हैं" और " हम ईश्वर हैं !" चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥ कहते हुए आगे बढ़ते चलो। आत्मा की शक्ति का विकास करो, और सारे भारत के विस्तृत क्षेत्र में उसे ढाल दो और जिस स्थिति की आवश्यकता है, वह आप ही आप प्राप्त हो जाएगी। (Bring forth the power of the spirit, and pour it over the length and breadth of India; and all that is necessary will come by itself. ) अपनी अन्तर्निहित दिव्यता को प्रकट करो, उसके चारों ओर सब कुछ समन्वित होकर विन्यस्त हो जायेगा। वेदों में बताये हुए इन्द्र और विरोचन के उदाहरण को स्मरण रखो। दोनों को अपने ब्रह्मत्व का बोध कराया गया था, परन्तु असुर विरोचन अपनी देह को ही ब्रह्म मान बैठा। इन्द्र तो देवता थे, वे समझ गए कि वास्तव में आत्मा ही ब्रह्म है। तुम तो इन्द्र की सन्तान हो। तुम देवताओं के वंशज हो। जड़ पदार्थ (शरीर) तुम्हारा ईश्वर कदापि नहीं हो सकता; शरीर तुम्हारा ईश्वर कभी नहीं हो सकता। ऐसा मत कहो कि हम दुर्बल हैं, कमजोर हैं। आत्मा सर्वशक्तिमान है। श्री रामकृष्ण के चरणों के दैवी स्पर्श से जिनका अभ्युदय हुआ है, उन मुट्ठी भर नवयुवकों की ओर देखो। उन्होंने उनके उपदेशों का प्रचार आसाम से सिंध तक और हिमालय से कन्याकुमारी तक कर डाला।" (९/३७९-३८०)
" This infinite power of the spirit, brought to bear upon matter evolves material development, made to act upon thought evolves intellectuality, and made to act upon itself makes of man a God.
First, let us be Gods, and then help others to be Gods. "Be and make." Let this be our motto. Let us know that all that is negative, all that is destructive, all that is mere criticism, is bound to pass away; it is the positive, the affirmative, the constructive that is immortal, that will remain for ever. Let us say, "We are" and "God is" and "We are God", "Shivoham, Shivoham", and march on. Bring forth the power of the spirit, and pour it over the length and breadth of India; and all that is necessary will come by itself. Manifest the divinity within you, and everything will be harmoniously arranged around it.
Remember the illustration of Indra and Virochana in the Vedas; both were taught their divinity. But the Asura, Virochana, took his body for his God. Indra, being a Deva, understood that the Atman was meant. You are the children of India. You are the descendants of the Devas. Matter can never be your God; body can never be your God.
[ठीक उसी प्रकार जैसे श्री नवनीहरण मुखोपाध्याय द्वारा लिखित (विवेक-सम्पन्न मनुष्य के) 'चरित्र के गुण' या मनःसंयोग आदि अन्य किसी भी महामण्डल पुस्तिका का अध्यन करते समय हमें अपना पूरा ध्यान '3H में नित्य-अनित्य विवेक' (अर्थात "व्यावहारिक मैं और पारमार्थिक मैं ", "प्रातिभासिक मैं और वास्तविक मैं ", या " पाका आमि और या काचा आमि" 'Apparent I' and 'Real I', विवेक) के द्वारा 'प्रत्येक आत्मा अव्यक्त ब्रह्म है' की अनुभूति प्राप्त करने की तकनीक सीखने पर अपना केन्द्रित रखना चाहिए। क्योंकि स्वामी विवेकानन्द ने प्रत्येक मनुष्य के 'वास्तविक मैं' या 'Real I' की अनुभूति करके अपने जीवन और आचरण में अभिव्यक्त करने की तकनीक सीखने पर जोर देना चाहते थे।
इसलिए आधुनिक युग सर्वश्रेष्ठ अद्वैताचार्य स्वामी विवेकानन्द ने गीता के 18 अध्यायों में वर्णित भगवान कृष्ण के उपदेशों को चार प्रकार के योग - "कर्म, उपासना, मन:संयम अथवा ज्ञान" में विभक्त करके उसकी संक्षिप्त व्याख्या करने के बाद 'Indian philosophy' को 'summarize' करते हुए या 'हिन्दू वैदिक सनातन धर्म' का सार प्रस्तुत करते हुए कहा था -
तदभावात् संयोगाभावो हानं तद्दृशेः कैवल्यम् ॥२५॥
25. There being absence of that (ignorance) there is absence of junction, which is the thing-to-be avoided; that is the independence of the seer.
25. उस 'अज्ञान ' (अविद्या-ignorance या नित्य-अनित्य विवेक राहित्य) का अभाव होते ही 'पुरुष और प्रकृति' (अविनाशी आत्मा और नश्वर देह) के बीच संगम (junction-गाँठ) का अभाव हो जाता है। यही 'हान' यानि अविद्या का परित्याग है ! और यही द्रष्टा की कैवल्यपद (अद्वैत अवस्था) में अवस्थिति है।
" योगशास्त्र के मतानुसार, आत्मा अविद्या के कारण प्रकृति के साथ संयुक्त हो गयी है। प्रकृति के पंजे से (देह-मन, M/F भाव, आदम और हव्वा मनोभाव से) छुटकारा पाना ही हमारा उद्देश्य है। यही सारे धर्मों का एकमात्र लक्ष्य है। "प्रत्येक आत्मा (जीव) अव्यक्त ब्रह्म है! बाह्य एवं अंतःप्रकृति को वशीभूत करके आत्मा के इस ब्रह्मभाव को व्यक्त करना ही जीवन का चरम लक्ष्य है। कर्म, उपासना, मन:संयम अथवा ज्ञान, इनमें से एक, एक से अधिक या सभी उपायों का सहारा लेकर अपने ब्रह्मभाव को व्यक्त करो और मुक्त हो जाओ। बस, यही धर्म का सर्वस्व है। मत, अनुष्ठान – पद्धति, शास्त्र, मन्दिर अथवा अन्य बाह्य क्रिया – कलाप तो उसके गौण ब्यौरे मात्र है।"
योगी (4 में किसी भी मार्ग के हों) 'मनःसंयोग' के द्वारा मनुष्य जीवन के इस चरम लक्ष्य में पहुँचने का प्रयत्न करते हैं। जब तक हम प्रकृति के हाथ से अपना उद्धार नहीं कर लेते (यानि 3K में मन की आसक्ति को त्याग नहीं देते) तब तक हम गुलाम हैं ;(मन और इन्द्रियों के गुलाम) प्रकृति (मन) जैसा कहती है , हम उसी प्रकार चलने को लाचार होते है। ' मन जीते , जगत जीत' जो अंतःप्रकृति को वशीभूत कर सकता है , सारा जगत उसके वशीभूत हो जाता है। [Indian philosophy" सम्पूर्ण भारतीय दर्शन या हिन्दू वैदिक सनातन धर्म के मतानुसार-] यह यह शरीर मन का एक बाहरी आवरण मात्र है। शरीर और मन दो अलग अलग वस्तुएं नहीं हैं, वे तो सीप और उसके खोल के समान हैं। वे एक ही वस्तु की दो विभिन्न अवस्थायें हैं। [ जैसे पदार्थ की तीन अवस्थायें ठोस-द्रव और गैस।] सीप के भीतर का जन्तु बाहर से नाना प्रकार के उपादान लेकर उस खोल को तैयार करता है। "
विवेकख्यातिरविप्लवा हानोपायः ॥२६॥
26. The means of destruction of ignorance is unbroken practice of discrimination.
निरन्तर नित्य-अनित्य विवेक का अभ्यास करते रहना ही अज्ञान (अविद्या) नाश का अविप्लवा (दोष रहित और निश्चित) उपाय है।
अर्थात 'Apparent I' and 'Real I', या नश्वर देह-मन और अविनाशी आत्मा में निरन्तर विवेक-प्रयोग का अभ्यास करते रहना ही अविद्या को नष्ट करने का उपाय है। (3K में आसक्ति को नष्ट करने का उपाय है। इसलिए 3H विकास के 5 अभ्यास का लक्ष्य भी विवेकी मनुष्य बनना और बनाना ही है। जब निरन्तर नित्य-अनित्य विवेक -प्रयोग के अभ्यास के द्वारा हम विवेकज ज्ञान लाभ करेंगे तब अज्ञान (अविद्या) चला जाएगा और आत्मा अपने 'सत्य- स्वरुप' में अर्थात सर्वज्ञ , सर्वशक्तिमान और सर्वव्यापी रूप (पारमार्थिक मैं, पाका आमि 'Real I', बुद्धत्व, या विवेकानन्द अवस्था) में प्रतिष्ठित हो जायेगा। (पातंजल योगसूत्र : साधनपाद-25, 26 : राज-योग: वि.सा. खंड-१, पृष्ठ:१७३-१७४)
आत्मा अविद्या के कारण (त्रिगुणात्मिका माया नामक परमेश शक्ति =अविद्या , अस्मिता , राग-द्वेष , अभिनिवेश -पंचक्लेश के साथ) संयुक्त हो गयी है। अतएव इस प्रकृति (मोह, आसक्ति, स्वार्थपरता) के पंजे से छुटकारा पाना ही हमारा (नित्य-अनित्य विवेकी मनुष्य के जीवन का) उद्देश्य है। यही सारे धर्मों /या शिक्षा का एकमात्र लक्ष्य है।
जिस प्रकार आदिगुरु शंकराचार्यजी ने भी कहा था -
श्लोकार्धेन प्रवक्ष्यामि यदुक्तं ग्रंथ कोटिभ: ।
ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापर: ।
ब्रह्म ही सत्य है । अर्थात जो अनेक ग्रंथों में लिखा है । उसे मैं आधे श्लोक में यहां कह रहा हूं - ब्रह्म सत्य है । जगत मिथ्या है । तथा जीव ब्रह्म ही है । कोई अन्य नहीं । "
इस इन्द्रियगोचर या दृश्यमान जगत में सत्य क्या है ? मिथ्या क्या है ? तथा जीव (आत्मा) और ब्रह्म (ईश्वर, भगवान) में परस्पर गूढ़ संबंध है । इस सम्पूर्ण सृष्टि में ब्रह्म (आत्मा, ईश्वर या भगवान) अनुस्यूत है। इसलिए हमलोग कहते हैं, 'कण-कण में भगवान। ' या कंकड़-कंकड़ में शंकर' ! क्योंकि हमारे उपनिषदों के ऋषियों ने सृष्टि के अधिष्ठान को ही आत्मा (ईश्वर, ब्रह्म या भगवान) कहा है। इसीलिए सृष्टि का अधिष्ठान ही ब्रह्म नाम से श्रुतियों द्वारा प्रतिपादित है । जो था । जो है । और जो सदैव रहेगा । वही तो - ब्रह्म है । " सत्य नाम " (अपरिवर्तनीय -अविनाशी) से ऋषियों मनीषियों द्वारा वही कहा जाता है । यहां मिथ्या शब्द " असत " से भिन्न है ! मिथ्या शब्द यहां प्रतीति होने वाली वस्तु सत्य सी लगती है । जबकि वह प्रतीति क्षण में नहीं । यही मिथ्यात्व है। इसमें संस्कारों तथा उसके परिणाम स्वरूप स्मृति की महत्वपूर्ण भूमिका होती है । संसार के अस्तित्व को स्वीकार करने पर ही जीव है । संसार की संसार के नाम-रूप में प्रतीति के नष्ट होते ही " जीव " का अस्तित्व समाप्त हो जाता है । यह ऐसे ही है । जैसे जागने पर " स्वप्नकाल के द्रष्टा " और " दृश्य " का को लोप हो जाता है । वस्तुत: अन्तर्निहित दिव्यता के साथ यह 'एकत्व और अद्वैत ' ही परमार्थ है । सत्य का अर्थ है, त्रिकाल -अबाधित ! जिसका तीनों कालों में 'बाध' नहीं होता । अर्थात जो था । जो है । और जो रहेगा । इस दृष्टि से जगत ब्रह्म-सापेक्ष है । ब्रह्म को जगत के होने या न होने से कोई अंतर नहीं पड़ता । जिस प्रकार आभूषण के न रहने पर भी स्वर्ण की सत्ता निरपेक्ष भाव से रहती है । या 'घड़े' के न रहने से भी मिट्टी की सत्ता निरपेक्ष भाव से रहती है। उसी प्रकार सृष्टि से पूर्व भी 'सत्य' (आत्मा, ब्रह्म, ईश्वर या भगवान) था । दूसरे शब्दों में ब्रह्म का अस्तित्व सदैव रहता है । श्रुति का वचन है - सदेव सोम्येदग्रमासीत, अर्थात - हे सौम्य ! सृष्टि से पूर्व सत्य ही था । सृष्टि का उपादान कारण और निमित्त कारण ब्रह्म या ईश्वर ही है। आदिगुरु शंकराचार्यजी द्वारा प्रतिपादित अद्वैत वेदान्त के अनुसार इस संपूर्ण जगत में जो कुछ भी इंद्रियों द्वारा गृहीत है । अर्थात जो कुछ भी दिखाई, सुनाई, सुंघाई या स्पर्श आदि में आता है । वह सब मात्र ब्रह्म ही है । इसके अतिरिक्त कुछ भी नहीं । जिस प्रकार मिट्टी से निर्मित पात्रों का अलग अलग नाम रूप होने के पश्चात भी मूल रूप मिट्टी ही होती है । इसी प्रकार जो भी जड़ अथवा चेतन तत्व विभिन्न नाम-रूप से ज्ञात होते हैं । वे मूल रूप से ब्रह्म (परमेश शक्ति E=Mc2) ही हैं ।
मनुष्य के कल्याण एवं अन्तर्निहित दिव्यता (Inherent divinity) की अभिव्यक्ति के लिए या भगवत्प्राप्ति के साधन हेतु अनुकूल परस्थितियों की अपेक्षा प्रतिकूल परिस्थितियाँ अधिक उत्तम सिद्ध होती हैं। अनुकूल-परिस्थितियाँ होने पर मनुष्य भौतिकता में फंस जाता है । लेकिन प्रतिकूल परिस्थिति आने पर ऐसी संभावना लगभग नहीं रहती । तथा मन परम पिता परमात्मा के चरणों में लगने की प्रक्रिया प्रारम्भ हो जाती है । प्रतिकूल परिस्थितियां आने पर मानव को प्रभु का अनुग्रह मानना चाहिए । क्योंकि यह कृपा केवल उन्हीं पर बरसती है । जिन पर उनका विशेष स्नेह होता है । प्रतिकूल परिस्थितियों से घिरने पर व्यक्ति को विशेष सावधानी रखनी पड़ती है । क्योंकि ऐसे समय में सबसे पहले धैर्य, फिर मित्रादि सभी साथ छोड़ने लगते हैं । यदि ऐसी स्थिति में मनुष्य विचलित होने लगे । तो उसका मनोबल टूटने लगेगा । परन्तु यदि प्रभु पर विश्वास ( अर्थात आत्मविश्वास) रखते हुए इनका सामना किया जाए । तो मनुष्य का आत्मिक विकास होगा । ब्रह्म के चिंतन में वृद्धि होगी । कठिनाइयों (hardships) से गुजरने वाला व्यक्ति वैसे ही सफल होकर निकलता है । जैसे तपने के पश्चात सोना अधिक चमकदार हो जाता है ।
इसलिए आधुनिक युग के सर्वश्रेष्ठ अद्वैताचार्य स्वामी विवेकानन्द यहाँ जीव की अन्तर्निहित दिव्यता को अभिव्यक्त करने की पद्धति (चार योग) को सीखने की अनिवार्यता पर जोर देते हुए कहते हैं -After writing his commentaries on the four Yogas, Vivekananda summarized Indian philosophy as follows: " According to Yoga philosophy, it is through ignorance (अविद्या) that the soul has been joined with nature. The aim is to get rid of nature's control over us. That is the goal of all Religions/(Education). “Each soul is potentially divine. The goal is to manifest this divinity within, by controlling nature, external and internal. Do this either by work, or worship, or psychic control, or philosophy — by one or more or all of these — and be free. This is the whole of religion. Doctrines, or dogmas, or rituals, or books, or temples, or forms, are but secondary details." .... "When through constant practice we begin to discriminate, ignorance will vanish, and the Purusha will begin to shine in its real nature — omniscient, omnipotent, omnipresent."
सम्पूर्ण भारतीय दर्शन (या सनातन धर्म) में समाहित चार योगों पर अपनी व्याख्या लिखने के बाद, विवेकानंद ने हिन्दू वैदिक सनातन धर्म का सार प्रस्तुत करते हुए कहा - "प्रत्येक आत्मा अव्यक्त ब्रह्म है!" अर्थात प्रत्येक आत्मा (जीव M/F) में दिव्यता छिपी हुई है। (यही श्रद्धा ही आस्तिक्य बुद्धि है!) बाहरी एवं आंतरिक प्रकृति को नियंत्रित करके इस अन्तर्निहित दिव्यता (Inherent Divinity: ब्रह्मभाव को या मिःस्वार्थपरता) को अपने आचरण और व्यवहार में प्रकट करना ही जीवन का चरम लक्ष्य है। कर्म, उपासना, मन:संयम अथवा ज्ञान, इनमें से एक, एक से अधिक या सभी उपायों का सहारा लेकर, अपनी अंतर्निहित दिव्यता (Inherent Divinity: ब्रह्मभाव को या मिःस्वार्थपरता) को व्यक्त करो और मुक्त हो जाओ। बस, यही धर्म का सर्वस्व है। मत, अनुष्ठान – पद्धति, शास्त्र, मन्दिर अथवा अन्य बाह्य क्रिया – कलाप तो उसके गौण ब्यौरे मात्र है।"(वि.सा. खंड-१ : राजयोग : पातंजल योगसूत्र : साधनपाद) इस विवेकानन्द वचनामृत को पान करने की इस चार-योग के तकनीक को इतने ध्यानपूर्वक सीखना चाहिए, जिससे इस अद्वैतामृत (कण-कण में भगवान) का प्रभाव वक्ता और श्रोता दोनों के, आपके और मेरे दोनों के जीवन तथा आचरण में स्पष्ट रूप से परिलक्षित होने लगे। इसीलिए यह विवेकानन्द वचनामृत (अद्वैतामृत) : **"प्रत्येक आत्मा अव्यक्त ब्रह्म है !"* अर्थात प्रत्येक स्त्री -पुरुष (आदम और हव्वा) केवल M/F देहाभिमानी जीव नहीं अव्यक्त ब्रह्म है !" जिस प्रकार "कंकड़-कंकड़ में शंकर" के जैसा वेदों के चार महावाक्य में से एक "अयं आत्मा ब्रह्म !" अर्थात "आत्मा ही ब्रह्म या ईश्वर है !" को "आत्मानुसंधान वाक्य" (Self-enquiry sentence) या "अनुसंधान वाक्य" (Re-search sentence) भी कहा जाता है। ( विवेक-जीवन ब्लॉग July 26, 2019)]
[ "ज्ञानदायिनी माँ सारदा की अद्वैत दृष्टि "कोई पराया नहीं , सभी अपने हैं " के अनुरूप स्वामी विवेकानन्द -कैप्टन सेवियर "Be and Make चरित्र-निर्माण पद्धति का प्रचार -प्रसार सम्पूर्ण विश्व में करना ही एक मात्र उपाय है जो सम्पूर्ण मानवता की रक्षा कर सकता है। नवनीदा कहते थे "Be and Make" ही एक दिन सार्वभौमिक धर्म होगा ! 'चमत्कार जो आपकी आज्ञा का पालन करेगा।' के अनुरूप चरित्र-निर्माण होने के बाद ही आत्मज्ञान में प्रतिष्ठित हुआ जा सकता है।
Maya is not a theory; it is simply a statement of facts about the universe as it exists ! ]
These are the memorable words of Buddha: "Believe not because an old book is produced as an authority. Believe not because your father said [you should] believe the same. Believe not because other people like you believe it. Test everything, try everything, and then believe it, and if you find it for the good of many, give it to all."
(BUDDHISTIC INDIA/-Swami Vivekananda, [CW. III. page: 528]
2.
⚜️️🔱सत्यान्वेषण के तीन चरण -श्रवण, मनन और निदिध्यासन⚜️️🔱
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