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मंगलवार, 18 मार्च 2025

⚜️ 🔱⚜️ 🔱*परिच्छेद -5 : 'सिमुलिया ब्राह्मसमाज में श्रीरामकृष्ण' [(1 जनवरी, 1882 ई.) श्री रामकृष्ण वचनामृत : परिच्छेद -5] 🔱⚜️ इँदेश के गौरी पण्डित, राम, केशव, नरेन्द्र आदि के संग में⚜️ 🔱मन को अपने वश में रखना हो तो साधु-संग आवश्यक है !⚜️ 🔱What is ignorance? बेहोशी, अज्ञान किसे कहते हैं ? অচেতনতা কাকে বলে? ⚜️⚜️ 🔱"'मैं' को पूरी तरह से मिटाया नहीं जा सकता।'পাকা আমি'⚜️ 🔱 ⚜️⚜️ उनके दर्शन के बाद वे जिस 'मैं' को रख देते हैं, उसे कहते हैं 'पक्का मैं' (परिपक्व, पूर्ण या सिद्ध मैं-'পাকা আমি' -the 'ripe I')⚜️⚜️ ‘‘ मैं कर्ता नहीं हूँ ! मैं प्रभु का दास, उनका भक्त, उनकी सन्तान हूँ !’’⚜️⚜️🔱⚜️🔱भगवान जिसे बड़ा बनाते हैं, जंगल में रहने पर भी उसे सभी लोग जान सकते हैं⚜️

 ⚜️ परिच्छेद- ५⚜️  

* सिमुलिया ब्राह्मसमाज में श्रीरामकृष्ण*

(१)

[(1 जनवरी, 1882 ई.) श्री रामकृष्ण वचनामृत : परिच्छेद -5] 

🔱⚜️ इँदेश के गौरी पण्डित, राम, केशव, नरेन्द्र आदि के संग में⚜️ 🔱

आज श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ सिमुलिया ब्राह्मसमाज के वार्षिक महोत्सव में पधारे हैं । ज्ञान चौधरी के मकान में महोत्सव हो रहा है । १ जनवरी १८८२ ई., रविवार, शाम के पाँच बजे का समय । राम, मनोमोहन, बलराम, राजमोहन, ज्ञान चौधरी, केदार, कालिदास सरकार, कालिदास मुखोपाध्याय, नरेन्द्र, राखाल आदि अनेक भक्त उपस्थित हैं । नरेन्द्र ने, केवल थोड़े ही दिन हुए, राम आदि के साथ जाकर दक्षिणेश्वर में श्रीरामकृष्ण का दर्शन किया है । आज भी इस उत्सव में वे सम्मिलित हुए हैं । वे बीच-बीच में सिमुलिया ब्राह्मसमाज में आते थे और वहाँ पर भजन-गाना और उपासना करते थे ।

[Sri Ramakrishna arrived with his devotees at the house of Jnan Choudhury, in Calcutta, to join the annual festival of the Simla Brahmo Samaj. Keshab, Ram, Manomohan, Balaram, Kedar, Narendra, Rakhal, and other devotees were present. Narendra had met the Master only a few days before at the temple garden at Dakshineswar. He used to participate now and then in the worship of the Simla Brahmo Samaj and sing for the congregation.

আজ শ্রীরামকৃষ্ণ সিমুলিয়া ব্রাহ্মসমাজের সাংবাৎসরিক মহোৎসবে ভক্তসঙ্গে আসিয়াছেন। জ্ঞান চৌধুরীর বাড়িতে মহোৎসব হইতেছে। ১লা জানুয়ারি, ১৮৮২ খ্রীষ্টাব্দ, রবিবার, বেলা ৫টা হইবে। (১৮ই পৌষ, ১২৮৮) শ্রীযুক্ত কেশব সেন, রাম, মনোমোহন, বলরাম, ব্রাহ্মভক্ত রাজমোহন, জ্ঞান চৌধুরী, কেদার, ব্রাহ্মভক্ত কান্তিবাবু, কালিদাস সরকার, কালিদাস মুখোপাধ্যায়, নরেন্দ্র, রাখাল প্রভৃতি অনেক ভক্ত উপস্থিত। নরেন্দ্র, রাম প্রভৃতির সঙ্গে গিয়া কেবল কয়দিন মাত্র হইল ঠাকুরকে দক্ষিণেশ্বরে দর্শন করিয়াছেন। আজও এই উৎসবে যোগদান করিয়াছেন। তিনি সিমুলিয়া ব্রাহ্মসমাজে মধ্যে মধ্যে আসিতেন ও সেখানে গান ও উপাসনা করিতেন

ब्राह्मसमाज की पद्धति के अनुसार उपासना होगी । पहले कुछ पाठ हुआ । नरेन्द्र गा सकते हैं । उनसे गाने के लिए अनुरोध करने पर उन्होंने भी गाना गाया । सन्ध्या हुई । इँदेश के गौरी पण्डित गेरुआ वस्त्र पहने ब्रह्मचारी के भेष में आकर उपस्थित हुए । 

गौरी - कहाँ हैं श्रीरामकृष्णदेव ?

ব্রাহ্মসমাজের পদ্ধতি অনুসারে উপাসনা হইবে। প্রথমে কিছু পাঠ হইল। নরেন্দ্র গাইতে পারেন, তাঁহাকে গান গাইতে অনুরোধ করাতে তিনিও গান গাহিলেন।সন্ধ্যা হইল। ইঁদেশের গৌরী পণ্ডিত গেরুয়াপরা ব্রহ্মচারীবেশে আসিয়া উপস্থিত। 

গৌরী — কোথা গো পরমহংস বাবু?

The worship was arranged according to the usual custom of the Samaj. First the scripture was read; then Narendra sang. It was dusk. The devotees made merry. 

गौरी पंडित (गौरी कांत भट्टाचार्य :Gauri Kant Bhattacharya) — बांकुड़ा जिले के इँदेश ग्राम के निवासी थे। एक गुणी तांत्रिक साधक थे, उनके पास कुछ सिद्धियाँ थीं। ठाकुर देव से उनकी पहली मुलाकात 1865 ई. में दक्षिणेश्वर में हुई थी। शास्त्रीय प्रमाणों के आधार पर श्री श्री ठाकुर की आध्यात्मिक अवस्था (spiritual status) निर्धारित करने के लिए मथुरबाबू ने दक्षिणेश्वर में एक पण्डित सभा बुलाई थी। उस पण्डित सभा में गौरी पण्डित ने समय 1870 ई. में श्री श्री ठाकुर देव को समस्त अवतारों का मूल (Origin of Incarnations आद्या- शक्ति, या आदिशक्ति) घोषित कर दिया था। श्री श्री ठाकुर का सानिध्य प्राप्त होने के बाद दिन-प्रतिदिन उनका मन जो पहले विद्व्ता या पाण्डित्य के प्रदर्शन (scholarship) करके लोक-सम्मान पाने के लिए सीद्धियों में आसक्त रहता था, उन सभी चीजों से विरक्त होकर भगवान के चरण कमलों की ओर मुड़ गया। गौरी पण्डित दिन-प्रतिदिन ठाकुर देव की आध्यात्मिक उपलब्धि पर मोहित होते होते, उनके परम् भक्त में रूपांतरित हो गए।  ठाकुर की दिव्य संगति से प्रभावित होकर क्रमशः सीद्धियों से उन्हें तीव्र वैराग्य हो गया। एक दिन, आँखों में आँसू भरकर, उन्होंने श्री श्री ठाकुर से विदाई लेने की आज्ञा माँगी, और हमेशा के लिए उन्होंने अपने घर का त्याग कर दिया। उस दिन के बाद बहुत खोजबीन करने पर भी, गौरी पंडित को कभी कोई देख नहीं पाया। 

গৌরী পণ্ডিত (গৌরীকান্ত ভট্টাচার্য) — বাঁকুড়া জেলার ইন্দাস গ্রামের বাসিন্দা। বীরাচারী তান্ত্রিক সাধক, তাঁহার কিছু সিদ্ধাই ছিল। ১৮৬৫ খ্রীষ্টাব্দে দক্ষিণেশ্বরে ঠাকুরের সঙ্গে তাঁহার প্রথম সাক্ষাৎ হয়। শাস্ত্রীয় প্রমাণের ভিত্তিতে শ্রীশ্রীঠাকুরের আধ্যাত্মিক অবস্থা নির্ধারণের উদ্দেশ্যে মথুরবাবু দক্ষিণেশ্বরে একটি সভা আহ্বান করেন। এই সময়ে গৌরী পণ্ডিত ঠাকুরকে অবতারগণের উৎসস্থল বলিয়া ঘোষণা করেন (১৮৭০)। শ্রীশ্রীঠাকুরের সান্নিধ্যে দিন দিন তাঁহার মন পাণ্ডিত্য, লোকমান্য, সিদ্ধাই প্রভৃতি সকল বস্তুর প্রতি বীতরাগ হইয়া ঈশ্বরের শ্রীপাদপদ্ম অভিমুখী হইতে থাকে। গৌরী দিন দিন ঠাকুরের ভাবে মোহিত হইয়া তাঁহার সম্পূর্ণ অনুরাগী হইয়াছিলেন। ধীরে ধীরে ঠাকুরের দিব্যসঙ্গলাভে তাঁহার তীব্র বৈরাগ্য হয়। একদা তিনি সজল নয়নে শ্রীশ্রীঠাকুরের নিকট বিদায় গ্রহন করিয়া চিরতরে গৃহত্যাগ করেন। বহু অনুসন্ধানেও ইহার পর গৌরী পণ্ডিতের সাক্ষাৎ পাওয়া যায় নাই।]

[(1 जनवरी, 1882 ई.) श्री रामकृष्ण वचनामृत : परिच्छेद -5] 

⚜️🔱मन को अपने वश में रखना हो तो साधु-संग आवश्यक है !⚜️ 🔱

[लोहा को लाल रखने के लिए समय-समय पर इसे लुहार की भट्टी में गर्म करना पड़ता है !]

थोड़ी देर बाद श्री केशव सेन ब्राह्म भक्तों के साथ आ पहुँचे और उन्होंने भूमिष्ठ होकर श्रीरामकृष्ण को प्रणाम किया । सभी लोग बरामदे में बैठे हैं; आपस में आनन्द कर रहे हैं । चारों ओर गृहस्थ भक्तों को बैठे देखकर श्रीरामकृष्ण हँसते हुए कह रहे हैं - “गृहस्थी में धर्म होगा क्यों नहीं ? पर बात क्या है जानते हो ? मन अपने पास नहीं है । अपने पास मन हो तब तो ईश्वर को देगा ! मन को तो बन्धक रख दिया है, कामिनी-कांचन' के पास गिरवी (mortgaged) रख दिया है। इसीलिए तो सदा साधु-संग आवश्यक है।

কিয়ৎক্ষণ পরে কেশব ব্রাহ্মভক্তগণ সঙ্গে আসিয়া পৌঁছিলেন ও ভূমিষ্ঠ হইয়া শ্রীরামকৃষ্ণকে প্রণাম করিলেন। সকলেই দালানের উপর উপবিষ্ট; পরস্পর আনন্দ করিতেছেন। চর্তুদিকে সংসারী ভক্তগণকে উপবিষ্ট দেখিয়া ঠাকুর হাসিতে হাসিতে বলিতেছেন। শ্রীরামকৃষ্ণ (সহাস্যে) — তা সংসারে হবে না কেন? তবে কি জান, মন নিজের কাছে নাই। নিজের কাছে মন থাকলে তবে তো ভগবানকে দেবে। মন বন্ধক দিয়েছ; কামিনী-কাঞ্চনে বন্ধক! তাই সর্বদা সাধুসঙ্গ দরকার।

The Master looked at the householder devotees seated around him and said with a smile: "Why shouldn't it be possible for a householder to give his mind to God? But the truth is that he no longer has his mind with him. If he had it, then he could certainly offer it to God. But, alas, the mind has been mortgaged — mortgaged to 'woman and gold'. So it is necessary for him constantly to live in the company of holy men

मन अपने पास आने पर तब साधन-भजन होगा । सदा ही गुरु का संग, गुरु की सेवा, साधु-संग आवश्यक है । या तो एकान्त में दिन-रात उनका चिन्तन किया जाय और नहीं तो साधु-संग । मन अकेला रहने से धीरे धीरे सूख जाता है । जैसे एक बर्तन में यदि अलग जल रखो तो धीरे धीरे सूख जायगा, परन्तु गंगा के भीतर यदि उस बर्तन को डुबोकर रखो तो नहीं सूखेगा

When he gets back his own mind, then he can devote it to spiritual practice; but first it is necessary to live constantly with the guru, wait on him, and enjoy the company of spiritual people. Either he should think of God in solitude day and night, or he should live with holy men. The mind left to itself gradually dries up. Take a jar of water, for instance. If the jar is set aside, the water dries up little by little. But that will not happen if the jar is kept immersed in the Ganges.

“মন নিজের কাছে এলে তবে সাধন-ভজন হবে। সর্বদাই গুরুর সঙ্গ, গুরুসেবা, সাধুসঙ্গ প্রয়োজন। হয় নির্জনে রাতদিন তাঁর চিন্তা, নয় সাধুসঙ্গ। মন একলা থাকলে ক্রমে শুষ্ক হয়ে যায়।“এক ভাঁড় জল যদি আলাদা রেখে দাও, ক্রমে শুকিয়ে যাবে! কিন্তু গঙ্গাজলের ভিতর যদি ওই ভাঁড় ডুবিয়ে রাখো, তাহলে শুকবে না!

"लुहार की दुकान में लोहा आग में रखने से अच्छा लाल हो जाता है । अलग रख दो तो फिर काले का काला । इसलिए लोहे को बीच-बीच में आग में डालना चाहिए ।

"The iron becomes red in the furnace of a smithy. Take it out and it becomes black as before. Therefore the iron must be heated in the furnace every now and then.

“কামারশালার লোহা আগুনে বেশ লাল হয়ে গেল। আবার আলাদা করে রাখো, যেমন কালো লোহা, তেমনি কালো। তাই লোহাকে মধ্যে মধ্যে হাপরে দিতে হয়।

[(1 जनवरी, 1882 ई.) श्री रामकृष्ण वचनामृत : परिच्छेद -5] 

⚜️🔱What is ignorance? बेहोशी, अज्ञान, अचेतनता किसे कहते हैं ?⚜️🔱

[অচেতনতা কাকে বলে?]  

“ 'मैं करनेवाला हूँ, मैं कर रहा हूँ तभी गृहस्थी चल रही है, मेरा घर, मेरा कुटुम्ब’ - यह सब अज्ञान है । पर ‘मैं प्रभु का दास, उनका भक्त, उनकी सन्तान हूँ’ - यह बहुत अच्छा है ।

Do you know what ignorance means? It is the feeling: This is my house; these are my relatives; I am the doer; and the household affairs go on smoothly because I manage them.' But to feel, 'I am the servant of God, His devotee, His son' — that is a good attitude.

“আমি কর্তা, আমি করছি তবে সংসার চলছে; আমার গৃহ পরিজন — এ সকল অজ্ঞান! আমি তাঁর দাস, তাঁর ভক্ত, তাঁর সন্তান — এ খুব ভাল।

["क्या तुम जानते हो कि - अज्ञान (ignorance अचेतनता) का क्या अर्थ है? "क्या तुम जानते हो कि ठाकुर देव यह आशीर्वाद क्यों देते थे कि "तुम्हें चैतन्य हो "? यानि तुम जाग जाओ , होश में आ जाओ ? उपनिषद की वाणी में स्वामीजी क्यों कहते थे - उठो, जागो ! और लक्ष्य प्राप्त किये बिना विश्राम मत लो ? यह जो 'coma' में रहनाअचेतन अवस्था में रहना ,मोह ग्रस्त रहना , जाग कर भी सोये रहने की अवस्था आदि एक प्रकार की मनोभावना (attitude या नजरिया) का उपमा (simile) है, जिसमें बेहोसी के हालत में व्यक्ति कहता है मैं अपने परिवार का मुखिया हूँ -मैं कर्ता हूँ ! मैं बिजनेस खड़ा करने वाला हूँ, मैं अच्छे से बिजनेस कर रहा हूँ, तभी मेरी गृहस्थी चल रही है, यह मेरा घर है, ये मेरे कुटुम्ब परिवार हैं ! यह सब अज्ञान है। पर यह धारणा बना लेन कि 'मैं प्रभु का दास, उनका भक्त, उनकी सन्तान हूँ ' ऐसा मनोभाव रहना बहुत अच्छा-है!]                  

“ 'मैं' - पन एकदम नहीं जाता । अभी विचार करके उसे भले ही उड़ा दो, पर दूसरे क्षण वह कहीं से फिर आ जाता है । जैसे कटा हुआ बकरा - सिर कटने पर भी म्याँ म्याँ - करके मिमियाता हाथ-पैर हिलाता रहता है ।

"The 'I' cannot be effaced altogether. You may explain it away through reasoning, but the next moment it reappears, nobody knows from where. It is like a goat that still bleats faintly and jerks its legs even after its head has been cut off.

“একেবারে আমি যায় না। এই বিচার করে উড়িয়ে দিচ্ছ, আবার কাটা ছাগল যেমন একটু ভ্যা ভ্যা করে হাত পা নাড়ে, সেই রকম কোথা থেকে আমি এসে পড়ে

⚜️⚜️ उनके दर्शन के बाद वे जिस 'मैं' को रख देते हैं, उसे कहते हैं 'पक्का मैं'⚜️⚜️

“তাঁকে দর্শন করবার পর, 'তিনি' যে 'আমি' রেখে দেন, তাকে বলে পাকা আমি।"

The 'I' that God retains in His devotee after he has seen Him

 is called the 'Ripe I'. 

"उनके दर्शन के बाद वे जिस 'मैं' को रख देते हैं, उसे कहते हैं 'पक्का मैं'। - जिस प्रकार तलवार पारसमणि को छूकर सोना बन गयी है । उसके द्वारा अब और हिंसा का काम नहीं होता।"

“তাঁকে দর্শন করবার পর, তিনি যে আমি রেখে দেন, তাকে বলে পাকা আমি।- “যেমন তরবার পরশমণি ছুঁয়েছে, সোনা হয়ে গিয়েছে। তার দ্বারা আর হিংসার কাজ হয় না!

"But the 'I' that God retains in His devotee after he has seen Him is called the 'ripe I'. It is like a sword turned into gold by touching the philosopher's stone; you cannot hurt anybody with it."

[कच्चा 'मैं' या यह अहंकार क्या है ? भूतकाल की स्मृतियों और भविष्य की आशाओं की गठरी। What is this ego? A bundle of memories of the past and hopes of the future."भगवान (सच्चिदानन्द -ठाकुर देव, जगतजननी माँ सारदा, स्वामीजी) उनके दर्शन के बाद (समाधि के बाद-व्युत्थान में) भक्त में जिस 'मैं' को रख देते हैं, उसे कहते हैं 'पक्का मैं'। यह जो 'पक्का मैं' है  उस तलवार के समान है, जो पारसमणि (philosopher's stone-पारस पत्थर) को छूकर सोना बन गयी है। उसके द्वारा अब और हिंसा का काम नहीं होता। [हनुमान जी की तरह "देहबुद्ध्या दासोऽहं" में स्थित 'में' ही -'परिपक्व में' है, उसके द्वारा अब और क्रोधपूर्वक हिंसा का काम नहीं होता। लंकादहन ? लीला पुष्टि के लिए था -हनुमान जी को क्रोध नहीं हुआ था।]  

श्रीरामकृष्ण उपासना-मन्दिर में बैठकर यही सब बातें कह रहे हैं, केशव आदि भक्तगण निस्तब्ध होकर सुन रहे हैं । रात के ८ बजे का समय है । तीन बार घण्टी (Warning bell) बजी , जिससे उपासना प्रारम्भ हो ।

শ্রীরামকৃষ্ণ ঠাকুরদালানের উপর বসিয়া সকল কথা কহিতেছেন। কেশব প্রভৃতি ভক্তগণ নিস্তব্ধ হইয়া শুনিতেছেন। রাত ৮টা হইয়াছে তিনবার ঘন্টা (Warning bell) বাজিল, যাহাতে উপাসনা আরম্ভ হয়।

Thus the Master talked, seated in the worship hall, and Keshab and the other devotees listened with rapt attention. It was about eight o'clock in the evening. The bell rang three times for the worship.

श्रीरामकृष्ण - (केशव आदि के प्रति) - यह क्या ? तुम लोगों की उपासना नहीं हो रही है ।

MASTER (to Keshab and the others): "What's this? I see you haven't yet begun your regular worship."

শ্রীরামকৃষ্ণ (কেশব প্রভৃতির প্রতি) — এ কি! তোমাদের উপাসনা হচ্ছে না!

केशव - और उपासना की क्या आवश्यकता ? यही तो सब हो रहा है ।

কেশব — আর উপাসনা কি হবে? এই তো সব হচ্ছে।

KESHAB: "What further worship do we need? We are having all this."

श्रीरामकृष्ण - नहीं जी, जैसी पद्धति है, उसी प्रकार हो ।

শ্রীরামকৃষ্ণ — না গো, যেমন পদ্ধতি সেইরকম হক।

MASTER: "Oh no, my dear sir! Let the worship be performed according to your custom."

केशव - क्यों, यही तो अच्छा हो रहा है ।

কেশব — কেন এই তো বেশ হচ্ছে।

KESHAB: "Why? We are getting on very well."

श्रीरामकृष्ण के अनेक बार कहने पर केशव ने उठकर उपासना प्रारम्भ की ।

শ্রীরামকৃষ্ণ অনেক বলাতে কেশব উঠিয়া উপাসনা আরম্ভ করিলেন।

उपासना के बीच में श्रीरामकृष्ण एकाएक खड़े होकर समाधिमग्न हो गये । ब्राह्म भक्तगण गाना गा रहे हैं  -

मन एकबार हरि बोल, हरि बोल , हरि बोल ! 

हरि हरि  हरि बोले भवसिन्धु पारे चोल।।  

जले हरि स्थले हरि, अनले अनिले हरि।  

चन्द्रे हरि, सूर्ये हरि , हरिमय एई भूमण्डल।। 

উপাসনা মধ্যে ঠাকুর হঠাৎ দণ্ডায়মান — সমাধিস্থ হইয়াছেন। ব্রাহ্মভক্তগণ গান গাহিতেছেন:

মন একবার হরি বল হরি বল হরি বল।

হরি হরি হরি বলে ভবসিন্ধু পারে চল ॥

জলে হরি স্থলে হরি, অনলে অনিলে হরি।

চন্দ্রে হরি, সূর্যে হরি, হরিময় এই ভূমণ্ডল ॥

At the Master's repeated request Keshab began the worship. In the midst of it Sri Ramakrishna suddenly stood up and went into samadhi. The Brahmo devotees sang: " Chant, O mind, the name of Hari, Sing aloud the name of Hari, Praise Lord Hari's name! And praising Hari's name, O mind, Cross the ocean of this world. . . 

श्रीरामकृष्ण अभी भी भावमग्न होकर खड़े हैं । केशव ने बड़ी सावधानी से उनका हाथ पकड़कर उन्हें मन्दिर में से आँगन पर उतारा ।

শ্রীরামকৃষ্ণ এখনও ভাবস্থ হইয়া দণ্ডায়ামন। কেশব অতি সন্তর্পণে তাঁহার হাত ধরিয়া দালান হইতে প্রাঙ্গণে নামিলেন।

The Master still stood there absorbed in ecstasy. Keshab led him down very carefully from the. temple to the courtyard. The music went on. The Master danced to the music, the devotees dancing around him.

गाना चल रहा है । अब श्रीरामकृष्ण गाने के साथ नृत्य कर रहे हैं । चारों ओर भक्तगण भी नाच रहे हैं ।

গান চলিতেছে। এইবার ঠাকুর গানের সঙ্গে নৃত্য করিতেছেন। চতুর্দিকে ভক্তগণও নাচিতেছেন।

ज्ञानबाबू के दुमँजले के कमरे में श्रीरामकृष्ण तथा केशव आदि के जलपान की व्यवस्था हो रही है। वे जलपान करके फिर नीचे उतरकर बैठे । श्रीरामकृष्ण बातें करते करते फिर गाना गा रहे हैं । साथ में केशव भी गा रहे हैं ।

१ 

मोजलो आमार मन भ्र्मरा श्यामापदे नील कमले। 

जतो विषय मधु तुच्छ होलो कामादि कुसुम सकले।। 

२ 

श्यामापद आकाशते मन घुड़ि खान उड़ितेछिलो।   

कलुषेर कूबातास खेये गोप्ता खेये पड़े गेलो।।   

गाना (भावार्थ) –

"मेरा मनरूपी भ्रमर श्यामा के चरणरूपी नील कमलों में मग्न हो गया । कामादि कुसुमों का विषयरूपी मधु उसके सामने फीका पड़ गया । .....”

“श्यामा के चरणरूपी आकाश में मेरा मनरूपी पतंग उड़ रहा था । पाप की जोरदार हवा से धक्का खाकर उल्टा होकर गिर गया ।...”

জ্ঞানবাবুর দ্বিতলের ঘরে শ্রীরামকৃষ্ণ, কেশব প্রভৃতিকে জল খাওয়াবার আয়োজন হইতেছে।তঁহারা জলযোগ করিয়া আবার নিচে নামিয়া বসিলেন। ঠাকুর কথা কহিতে কহিতে আবার গান গাহিতেছেন। কেশবও সেই সঙ্গে যোগ দিয়াছেন —

মজলো আমার মন ভ্রমরা শ্যামাপদ নীল কমলে।

যত বিষয় মধু তুচ্ছ হল কামাদি কুসুম সকলে ॥

গান  —   শ্যামাপদ আকাশেতে মন ঘুড়ি খান উড়িতেছিল।

কলুষের কুবাতাস খেয়ে গোপ্তা খেয়ে পড়ে গেল ॥

After the refreshments Sri Ramakrishna again talked with Keshab. Soon he began to sing. Keshab sang with the Master:

The black bee of my mind is drawn in sheer delight To the blue lotus flower of Mother Syama's feet, The blue flower of the feet of Kali, Siva's Consort; Tasteless, to the bee, are the blossoms of desire. My Mother's feet are black, and black, too, is the bee; Black is made one- with black! This much of the mystery My mortal eyes behold, then hastily retreat. But Kamalakanta's hopes are answered in the end; He swims in the Sea of Bliss, unmoved by joy or pain.

Again they sang: High in the heaven of the Mother's feet, my mind was soaring like a kite, When came a blast of sin's rough wind that drove it swiftly toward the earth.   . . .

[(1 जनवरी, 1882 ई.) श्री रामकृष्ण वचनामृत : परिच्छेद -5] 

⚜️भगवान जिसे बड़ा बनाते हैं, जंगल में रहने पर भी उसे सभी लोग जान सकते हैं⚜️ 

श्रीरामकृष्ण और केशव दोनों ही मतवाले बन गये । फिर सब लोग मिलकर गाना और नृत्य करने लगे । आधी रात तक यह कार्यक्रम चलता रहा ।

Both Keshab and the Master were in a state of divine fervour. The other devotees joined them and sang and danced till midnight.

ঠাকুর কেশব দুজনেই মাতিয়া গেলেন। আবার সকলে মিলিয়া গান ও নৃত্য, রাত্রি দ্বিপ্রহর পর্যন্ত।

थोड़ी देर विश्राम करके श्रीरामकृष्णदेव केशव से कह रहे हैं, "अपने लड़के के विवाह की सौगात क्यों भेजी थी ? वापस मँगवा लेना । उन चीजों को लेकर मैं क्या करूँगा ?"

The Master rested a few minutes and then said to Keshab: "Why did you send me presents when your son was married? What shall I do with them? Take them back."

একটু বিশ্রাম করিয়া ঠাকুর কেশবকে বলিতেছেন — তোমার ছেলের বিবাহের বিদায় পাঠিয়েছিলে কেন? ফেরত এনো — আমি ও-সব নিয়ে কি করব?

केशव मुस्करा रहे हैं । श्रीरामकृष्ण फिर कह रहे हैं - "मेरा नाम समाचार-पत्रों में क्यों निकालते हो ? पुस्तकों या संवादपत्रों में लिखकर किसी को बड़ा नहीं बनाया जा सकता । भगवान जिसे बड़ा बनाते हैं, जंगल में रहने पर भी उसे सभी लोग जान सकते हैं

Keshab smiled a little, and the Master continued: "Why do you write about me in your paper? You cannot make a man great by writing about him in books and magazines. If God makes a man great, then everybody knows about him even though he lives in a forest. 

কেশব ঈষৎ হাসিতেছেন। ঠাকুর আবার বলিতেছেন — আমার নাম কাগজে প্রকাশ কর কেন? বই লিখে, খবরের কাগজে লিখে, কারুকে বড়ো করা যায় না। ভগবান যাকে বড় করেন, বনে থাকলেও তাকে সকলে জানতে পারে। 

घने जंगल में फूल खिला है, भौंरा इसका पता लगा ही लेता है, पर दूसरी मक्खियाँ पता नहीं पातीं। मनुष्य क्या कर सकता है ? उसके मुँह की और न ताको । मनुष्य तो एक कीड़ा है । जिस मुँह से आज अच्छा कह रहा है, उसी मुँह से कल बुरा कहेगा । मैं प्रसिद्धि नहीं चाहता । मैं तो चाहता हूँ कि दीन से दीन, हीन से हीन बनकर रहूँ ।"

গভীরবনে ফুল ফুটেছে, মৌমাছি কিন্তু সন্ধান করে যায়। অন্য মাছি সন্ধান পায় না। মানুষ কি করবে? মানুষের মুখ চেয়ো না — লোক! পোক! যে মুখে ভাল বলছে, সেই মুখে আবার মন্দ বলবে। আমি মান্যগণ্য হতে চাই না। যেন দীনের দীন, হীনের হীন হয়ে থাকি।

When flowers bloom in the deep woods, the bees find them, but the flies do not. What can man do? Don't look up to him. Man is but a worm. The tongue that praises you today will abuse you tomorrow. I don't want name and fame. May I always remain the humblest of the humble and the lowliest of the lowly!"

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तान्त्रिक साधक गौरी पण्डित [लीलाप्रसंग खंड-2, पेज-275]   

श्रीरामकृष्णदेव के श्रीमुख से हमने सुना है कि - "गौरी पण्डित प्रतिवर्ष श्रीदुर्गापूजन के समय जगदम्बा के पूजन का विधिवत आयोजन करते थे तथा अपनी गृहणी को वस्त्र-आभूषण द्वारा विभूषित करने के पश्चात् सुसज्जित आसन पर बैठाकर जगदम्बा-बुद्धि से तीन दिन तक भक्तिपूर्वक उनका पूजन किया करते थे।

तंत्र की शिक्षा है कि जितनी भी नारियाँ हैं, वे सभी साक्षात् जगदम्बा की मूर्ति हैं, सभी के भीतर जगन्माता की जगत्पालिनी तथा आनन्ददायिनी शक्ति का विशेष प्रकाश है। इसलिए मनुष्य को पवित्रभाव से नारी मात्र का ही पूजन करना चाहिए। नारी-मूर्ति के भीतर जगन्माता स्वयं विद्यमान हैं। इस बात का ध्यान न रखते हुए केवल भोग्यवस्तु समझकर सकाम भाव से स्त्री-शरीर को देखने से जगन्माता की ही अवहेलना होती है, तथा उससे मानव का बहुत अकल्याण होता है। दुर्गासप्तशती में देवता लोग समस्त विद्याओं की और समस्त स्त्रियों के प्रति मातृभाव की प्राप्ति के लिये देवी की स्तुति करते हुए कहते हैं - 

विद्याः समस्तास्तव देवि भेदाः, स्त्रियः समस्ताः सकला जगत्सु।

त्वयैकया पूरितमम्बयैतत् ,का ते स्तुतिः स्तव्यपरा परोक्तिः।।

- हे देवी तुम्हीं ज्ञानरूपिणी हो; संसार में जितनी भी ऊँची -नीची विद्यायें हैं -जिनके द्वारा लोगों में नाना प्रकार के ज्ञान का उदय हो रहा है - वे सब कुछ तुम्हीं हो, 'तत्' रूप में तुम्हीं प्रकाशित हो। तुम्हीं स्वयं जगत की समस्त नारियों के रूप में विद्यमान हो। अकेली तुम्हीं समग्र जगत को पूर्ण करके उसमें सर्वत्र विराजमान हो। तुम अतुलनीय तथा वाक्य/वाणी से अतीत हो- स्तव के द्वारा तुम्हारे अनंत गुणों का उल्लेख करने में कौन कब समर्थ हुआ है , या आगे भी कोई हो सकेगा ?             भारत में सर्वत्र हममें से अनेक व्यक्ति इस स्तव का पाठ करते हैं, किन्तु देवी बुद्धि से नारी-शरीर का अवलोकन कर कितने लोग कहाँ तक उन्हें इस प्रकार का यथार्थ सम्मान प्रदान करते हैं तथा अपने ह्रदय में विशुद्ध आनन्द का अनुभव कर कृतार्थ बनने का प्रयास करते हैं ? जगन्माता के विशेष-प्रकाश की आधारस्वरूपा नारी-मूर्ति को हीनबुद्धि से कलुषित नेत्रों द्वारा देखकर ऐसा कौन है जो कि दिन भर में शत-सहस्र बार उनकी अवहेलना नहीं करता ? हा  भारत, इस प्रकार की पशु-बुद्धि से नारी -शरीर का अपमान करने तथा शिव-बुद्धि से जीव-सेवा को विस्मृत करने के कारण ही तुम्हारी इस समय इस प्रकार की दुर्दशा हुई है जगदम्बा कृपाकर तुम्हारी इस पशुबुद्धि को पुनः कब दूर करेंगी, यह वे ही जानें

श्रीरामकृष्णदेव के सम्बन्ध में गौरी पण्डित की अवधारणा (पेज 278)  : गौरी पण्डित के हृदयगत भावों को जानने के लिए श्रीरामकृष्ण देव ने उनसे पूछा था -" अच्छा , (अपने शरीर को दिखाकर) वैषणवचरण इसे अवतार कहता है, क्या यह सम्भव है ? तुम्हें क्या प्रतीत होता है ? 

यह सुनकर गंभीर हो गौरी पण्डित ने उत्तर दिया -" वैषणवचरण आपको अवतार कहा करता है, यह तो अत्यन्त साधारण बात है। मेरी तो धारणा यह है कि जिनके अंश से युग-युग में अवतार लोग लोक-कल्याण के निमित्त संसार में अवतीर्ण हुआ करते हैं , तथा जिनकी शक्ति से वे उस कार्य को सम्पन्न करते हैं, आप वे ही हैं !" 

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Q > किसके अंश से अवतारवर्ग युग युग में लोक-कल्याण साधन के निमित्त संसार में अवतीर्ण हुआ करते हैं ?

श्री परम पिता परमात्मा का दिव्य पुरुष रूप जिसे श्री नारायण कहते हैं अनेक अवतारों का अक्षय कोष हैं ।  इन्ही से सारे अवतार प्रकट होते हैं।  जैसे अगाध सरोवर से असंख्य जलवहिनी निकलती हैं वैसे ही सत्वनिधि के असंख्य अवतार है। ऋषि, देवता, प्रजापति, मनुपुत्र सभी श्रीहरी के अवतार हैं । जब पृथ्वीवासी दैत्यों के अत्याचार से व्याकुल हो उठते हैं, तब युग युग में अनेक  रूप धारण करके भगवान उनकी रक्षा करते हैं। श्रीमद् भागवत गीता में भगवान श्री कृष्ण ने कहा है:

यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ! 

अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानम सृज्याहम !! 

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् । 

धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥

(जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब ही मैं अपने रूप को रचता हूँ अर्थात साकार रूप से लोगों के सम्मुख प्रकट होता हूँ॥ साधु पुरुषों का उद्धार करने के लिए, पाप कर्म करने वालों का विनाश करने के लिए और धर्म की अच्छी तरह से स्थापना करने के लिए मैं युग-युग में प्रकट हुआ करता हूँ॥ )

गौस्वामी  तुलसीदास जी ने भी श्री रामचरितमानस में कहा है :

जब जब होई धरम कै हानी। बाढ़हिं असुर अधम अभिमानी॥ 

तब तब प्रभु धरि बिबिध सरीरा। हरहिं कृपानिधि सज्जन पीरा।।

जब-जब धर्म का ह्रास होता है और नीच अभिमानी राक्षस बढ़ जाते हैं और वे ऐसा अन्याय करते हैं तब-तब वे कृपानिधान प्रभु भाँति-भाँति के (दिव्य) शरीर धारण कर सज्जनों की पीड़ा हरते हैं।

श्री विष्णु स्वयं परमपिता परमात्मा का सकल रूप हैं। विष्णु दशावतार भी श्री भगवान के २४ अवतारों में ही सम्मिलित किए जाते हैं। 

(श्रीमद्भागवतमहापुराण- प्रथम स्कन्धः ।। अथ तृतीयोऽध्यायः ।। )

भगवान् के अवतारों का वर्णन*

सूत उवाच

जगृहे पौरुषं रूपं भगवान्महदादिभिः।

सम्भूतं षोडशकलमादौ लोकसिसृक्षया।। 1

श्रीसूतजी कहते हैं-----  सृष्टि के आदि में भगवान् ने लोकों के निर्माण की इच्छा की। इच्छा होते ही उन्होंने महत्तत्त्व आदि से निष्पन्न पुरुषरूप ग्रहण किया। उसमें दस इन्द्रियाँ, एक मन और पांच भूत- ये सोलह कलाएँ  थीं ।।1।।

यस्याम्भसि शयानस्य योगनिद्रां वितन्वतः । 

नाभिहृदाम्बुजादासीद्ब्रह्मा विश्वसृजां पतिः ।।२

उन्होंने कारण-जल में शयन करते हुए जब योगनिद्रा का विस्तार किया, तब उनके नाभि-सरोवर में से एक कमल प्रकट हुआ और उस कमल से प्रजापतियों के अधिपति ब्रह्माजी उत्पन्न हुए ।।२।।

यस्यावयवसंस्थानैः कल्पितो लोकविस्तरः । 

तद्वै भगवतो रूपं विशुद्धं सत्त्वमूर्जितम् ।।३

भगवान्‌ के उस विरारूप के अंग-प्रत्यंग में ही समस्त लोकों की कल्पना की गयी है, वह भगवान्‌ का विशुद्ध सत्त्वमय श्रेष्ठ रूप है ।।३।।

पश्यन्त्यदो रूपमदभ्रचक्षुषा सहस्रपादोरुभुजानना‌द्भुतम् । 

सहस्रमूर्धश्रवणाक्षिनासिकं सहस्रमौल्यम्बरकुण्डलोल्लसत् ।।४

योगी लोग दिव्यदृष्टि से भगवान्‌ के उस रूप का दर्शन करते हैं। भगवान्‌ का वह रूप हजारों पैर, जाँचें, भुजाएँ और मुखों के कारण अत्यन्त विलक्षण है; उसमें सहस्रों सिर, हजारों कान, हजारों आँखें और हजारों नासिकाएँ हैं। हजारों मुकुट, वस्त्र और कुण्डल आदि आभूषणों से वह उल्लसित रहता है ।।४।। 

एतन्नानावताराणां निधानं बीजमव्ययम् । 

यस्यांशांशेन सृज्यन्ते देवतिर्यङ्नरादयः ।।५

भगवान्‌ का यही पुरुषरूप जिसे नारायण कहते हैं, अनेक अवतारों का अक्षय कोष है- इसीसे सारे अवतार प्रकट होते हैं। इस रूप के छोटे-से-छोटे अंश से देवता, पशु-पक्षी और मनुष्यादि योनियों की सृष्टि होती है ।।५।।

[साभार : https://sansthanam.blogspot.com/2015/04/bhagwat-puran_96.htm]

'काली' और 'कृष्ण' में अभेद-बुद्धि रखना चाहिए :

['नरलीला में विश्वास रखना चाहिये' (लीलाप्रसंग खंड-2, पेज-281) ]  

श्रीरामकृष्ण कहते थे - " मनुष्य में ठीक -ठीक इष्ट-बुद्धि के उदय होने पर तब कहीं भगवत्प्राप्ति होती है। वैषणवचरण कहा करता था कि जब नरलीला में विश्वास उत्पन्न होता है, तभी ज्ञान की पूर्णता होती है। " 

'काली' और 'कृष्ण' में अभेद-बुद्धि रखने के सम्बन्ध में गौरी पण्डित का अभिमत - 'काली' तथा 'कृष्ण' के सम्बन्ध में कभी किसी भक्त की विशेष भेदबुद्धि को देखकर उससे श्रीरामकृष्णदेव कहा करते थे, " यह तेरी कैसी हीन बुद्धि है ? यह जानना कि तेरे ही इष्टदेव काली, कृष्ण, गौरांग तथा राम आदि सब कुछ बने हैं।  पर इसका तात्पर्य यह नहीं कि मैं तुझे अपने इष्ट को त्यागकर गौरंगप्रभु को भेजने के लिए कह रहा हूँ। किन्तु द्वेषबुद्धि को त्याग देना। तेरे ही इष्टदेव कृष्ण तथा गौरांग के रूप में प्रकट हुए हैं - अपने ह्रदय में इस ज्ञान को बनाये रखना।   

जैसे गृहस्थ की बहु ससुराल में जाकर ससुर , सास , ननद, देवर, जेठ, आदि सभी को यथायोग्य सम्मान देती है, भक्ति तथा सेवा करती है - किन्तु अपने ह्रदय की सारी बातों को खुलकर कहने तथा सोने का सम्बन्ध उसका एकमात्र पति के साथ ही है। वह यह जानती है कि पति के कारण ही सास, ससुर आदि उसके अपने हैं। 

इसी तरह अपने इष्टदेव को पति के भाँति जानना एवं उनके सम्बन्ध से ही उनके दूसरे रूपों के साथ सम्बन्ध है तथा उनके प्रति श्रद्धा-भक्ति करनी है -इस बात का ध्यान रखना। यह समझते हुए उस द्वेष बुद्धि को दूर कर देना। गौरी कहा करता था - " काली तथा गौरांग पर जब एक-बुद्धि होगी तब मैं समझूँगा कि यथार्थ ज्ञान का उदय हुआ है।                

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'जितने मत हैं , उतने ही पथ हैं '  [लीलाप्रसंग खंड-2, पेज-283]

पाश्चात्य स्वार्थपरायण शिक्षा पद्धति का अनुसरण करते हुए हमलोग कर्ताभजा सम्प्रदाय के मत को जघन्य मत अपनी नाक -भौंह सिकोड़ते रहते हैं; लेकिन देवमानव श्रीरामकृष्णदेव उस कर्ताभजा आदि मतों से लेकर शुद्ध अद्वैत -वेदान्त मत पर्यन्त सभी मतों को ईश्वर-प्राप्ति का मार्ग कहकर स्वीकार करते थे। तथा अधिकारी-विशेष के लिए उसके अनुष्ठान का भी वे निर्देश दिया करते थे। हममें से बहुत से व्यक्तियों ने घृणाबुद्धि से प्रेरित होकर उनसे पूछा था - श्रेष्ठ भक्त होकर भी पण्डित वैष्णचरण जी परकीया को ग्रहण करने से विरत नहीं हुए ? यह तो बहुत अनुचित कार्य है! " 

इस पर श्रीरामकृष्णदेव बारम्बार हमसे कहा करते थे , " इसमें उन लोगों का कोई दोष नहीं है ! वे सोलह आने मन से यह विश्वास करते थे कि ईश्वरप्राप्ति का वही मार्ग है। ईश्वरप्राप्ति के लिए जो जिस मार्ग का सरल ह्रदय से विश्वास कर उसका आचरण करता है, उसे अनुचित कहना तथा उसकी निन्दा करना उचित नहीं है। किसी के भाव को नष्ट नहीं करना चाहिए। क्योंकि किसी भी भाव को ठीक- ठीक पकड़ने पर उसी से भावमय भगवान की प्राप्ति होती है, अपने- अपने भावानुसार उन्हें (ईश्वर को) पुकारते रहो। किसी के भाव की निंदा न करो या दूसरे के भाव को निजी कहकर अपनाने का प्रयास न करो। इतना कहकर सदानन्दमय श्रीरामकृष्णदेव गाया करते थे--

आपनाते आपनि थेको, जेओ ना मन कारो घरे। 

जा चाबि ताइ बोसे पाबि, खोजो निज अन्तःपुरे।।

परमधन से परशमणि, जा चाबि ता दिते पारे। 

(ओ मन) कोतो मणि पड़े आछे, से चिन्तामणिर नाचदुआरे।।

तीर्थगमन दुःख भ्रमण, मन उचाटन होयो ना रे। 

(तुमि) आनन्दे त्रिवेणी -स्नाने शीतल हओ ना मूलाधारे।।

कि देखो कमलाकान्त, मिछे बाजि ए संसारे। 

(तुमि) बाजिकरे चिनले नाको, (जे एई ) घटेर भीतर विराज करे।।

अर्थात हे मन , तुम अपने अन्दर ही बैठे रहना, किसी के घर नहीं जाना। तुम्हें जो कुछ चाहिए (परम्-सत्य चाहिए), वह तुमको बैठे हुए ही  मिल जायेगा तुम अपने अन्तःपुर में ही उस वस्तु को ढूँढ़ो। [कश्चिद् धीरः 'आवृत्त चक्षु: अमृतत्व इच्छन्' अमृतत्व पाने की इच्छा से आँखों को मूँदकर आसन पर बैठकर अपने भीतर ही उस 'वस्तु' को ढूँढ़ो। (पक्का 'मैं' -दासोऽहं ??) को ढूँढ़ो।]   

वे (अवतार वरिष्ठ) परमधन रूपी पारसमणि हैं; उनसे तुम जो कुछ माँगोगे, वे उसी वस्तु को देने में समर्थ हैं। उस चिन्तामणि के बाहर के दरवाजे पर कितने ही मणि पड़े हुए हैं। 

[पारस मणि एक चमकीला पत्थर है जिससे लोहे की चीज़ें सोने की बन जाती हैं। चिंतामणि एक रत्न है जिससे इच्छाएं पूरी होती हैं। इसे पश्चिमी दुनिया में 'फ़िलॉस्फ़र्स स्टोन' के नाम से जाना जाता है। ]   

तीर्थगमन दुःखमय भ्रमण मात्र है; रे मन, तुम उत्कण्ठित न हो। (तुम) आनन्दपूर्वक त्रिवेणी-स्नान के द्वारा मूलाधार में ही शीतल क्यों न बनो ? 

साधक कवि कमलाकान्त जी (कमलाकांत भट्टाचार्य) अपने आप से से यह कह रहे हैं कि तुम इस संसार रूपी मिथ्या बाजीगरी को देख रहे हो, (तुमने) बाजीगर को नहीं पहचाना , (जो इस) घट  के भीतर विराजमान हैं। 

[আপনাতে আপনি থেকো মন যেও নাকো কারু ঘরে।

যা চাবি তাই বসে পাবি, খোঁজ নিজ অন্তঃপুরে ৷৷ 

পরমধন এই পরশমণি, যা চাবি তাই দিতে পারে ৷

কত মণি পড়ে আছে আমার চিন্তামণির নাচ দুয়ারে ৷৷   

তীর্থগমন দুঃখভ্রমণ, মন! উচাটন হয়ো নারে।

তুমি আনন্দত্রিবেণীর স্নানে, শীতল হও না মূলাধারে॥

কি দেখ কমলাকান্ত, মিছে বাজি এ সংসারে।

ওরে! বাজিকরে চিনলে না সে, তোমার ঘটে বিরাজ করে॥ 

 (-কমলাকান্ত ভট্টাচার্য (সাধক)১০ - রাগিণী সিন্ধুকাফি। তাল ঢিমা তেতালা।) 

 'मनुष्य' बनने की साधना में  पहले अहंकार रहित कर्म (निःस्वार्थ कर्म) साधन है और तत्पश्चात् उच्च अवस्था में आत्मस्वरूप का ध्यान। इस ध्यानाभ्यास की आवश्यकता तब तक होती है जब तक साधक निश्चयात्मक रूप से यह अनुभव न कर ले कि 'शुद्ध आत्मा' (सच्चिदानन्द) ही पारमार्थिक सत्य वस्तु है न कि 'अहंकार'।  तत्पश्चात् वह कर्म करे अथवा न करे उसे इस ज्ञान की विस्मृति नहीं होती। 

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पराञ्चि खानि व्यतृणत् स्वयंभूस्तमात्पराङ्पश्यति नान्तरात्मन्।

कश्चिद् धीरः प्रत्यक् आत्मानम् ऐक्षत्  आवृत्त चक्षु: अमृतत्व इच्छन्।।

 (कठोपनिषद -2/1/1 )

स्वयम्भू अर्थात् परमात्मा ने देह में स्थित इन्द्रयों का मुख  कर बाहर की ओर गमन करने के लिए छेदन किया है, इस लिए इन्द्रियाँ बाहर की ओर गमन करते हुए बाह्य विषयों को ही देख पाती है,अन्तर्हृदय के आत्मा को नही देख पातीं। कोई एकाध धीर पुरुष, (सत्यार्थी !)  आत्मदर्शन (आत्मसाक्षात्कार या इन्द्रियातीत सत्य का दर्शन,विवेकदर्शन ) की इच्छा को रखते हुए जब प्रत्याहार द्वारा चक्षु नामक इन इन्द्रियों को बाहर के गमनता को रोक कर भीतर की ओर वापस कर प्रत्यक् आत्मा को जो अमरपद (अमृतत्व) का देने वाला है उसको देखने में तत्पर हो जाना ही योग है

योगदर्शन के 1/2 सूत्र में कहते हैं~"योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः"

योग क्या है? योग चित्त की समस्त वृत्तियों का  पूर्णतयः रुक जाना,अवरूद्ध हो जाना योग है। वे वृत्तियाँ जो संस्कार रूप से चित्त में है और जो मन की कल्पना से चित्त पर पड़ रही हैं, तथा जो इन्द्रियों द्वारा चित्त पर आकर दृष्यित हो रही हैं, इनका रूक जाना योग है। बहु के योग का निरोध बाहर और आत्मप्रकाश के योग का निरोध भीतर अन्तर में करने का नाम योग है। 

[अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः।।1.12।। व्यास भाष्य ।।1.12।। चित्तनदी नामोभयतोवाहिनी वहति कल्याणाय वहति पापाय च। या तु कैवल्यप्राग्भारा विवेकविषयनिम्ना सा कल्याणवहा। संसारप्राग्भाराऽविवेकविषयनिम्ना पापवहा। तत्र वैराग्येण विषयस्रोतः खिली क्रियते। विवेकदर्शनाभ्यासेन विवेकस्रोत उद्घाट्यत इत्युभयाधीनश्चित्तवृत्तिनिरोधः। ] 

              व्यासदेव [5000 वर्ष पहले ही मानो व्यासदेव जानते थे कि एक दिन स्वामी विवेकानन्द का एक मार्गदर्शक नेता आएगा !] कहते हैं - मनुष्य के चित्त-नदी का प्रवाह 'उभयतो वाहिनी' है, दोनों दिशाओं में (योग तथा भोग दोनों दिशाओं में) होता रहता है। इसके प्रवाह को फलदायी - योगमुखी बनाने के लिए Two things are necessary दो चीजें जरुरी हैं -अभ्यास और वैराग्य! वहाँ पहले लिखा है अभ्यास किन्तु मन को पकड़ने का अभ्यास करने के लिए पहले मन में पहले वैराग्य/ (ऐषणाओं में आसक्ति का त्याग) जरुरी है ! लालच के भाव को थोड़ा कम करते हुए 'विवेक-दर्शन' के अभ्यास द्वारा एक दिशा में (आत्मोन्मुखी या उर्ध्वमुखी) जाने से मन शान्त होता है, शक्तिशाली होता, असाध्य को भी साधने की शक्ति अर्जित करता है और मनुष्य के जीवन को कल्याण के मार्ग पर आरूढ़ करा देता है। जबकि दूसरी दिशा में (संसारोन्मुखी या निम्नोमुखी ) जाने से और अधिक चंचल हो जाता है, दुर्बल हो जाता है और निस्तेज होकर मनुष्य जीवन को नष्ट कर पशु तुल्य बना देता है। जैसे कि खाद्य-पदार्थ भी दो प्रकार के होते हैं- एक प्रकार का आहार लेने से शरीर हृष्ट-पुष्ट होता है और शक्तिशाली बन जाता है। जबकि दुसरे प्रकार का आहार स्वादिष्ट होने पर शरीर को दुर्बल और रोगी बनाता है। 

                     प्रयत्न के द्वारा (विवेक-दर्शन के अभ्यास के द्वारा) हम अपने मन के प्रवाह को कल्याण की दिशा में मोड़ सकते हैं। उसे शाश्वतसुख और नश्वरसुख, या श्रेय-प्रेय में अंतर समझाकर अच्छे रास्ते पर (ऊर्ध्वमुखी रखने) लाने से जीवन सुन्दर हो जाता है। लेकिन मन को मनमानी करने के लिये छोड़ देने से जीवन व्यर्थ हो जाता है। इसलिये 'वासना और धन ' (Lust and Lucre) के लालच या प्रलोभन से सम्मोहित न होकर 'मनः संयोग' का नियमित अभ्यास (विवेक-दर्शन का अभ्यास) करने से मन वश में हो जाता है। कहा भी गया है - 'करत- करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान। रसरी आवत जात से सिल पर परत निसान॥' मनुष्य की सारी क्षमताएँ उसके अभ्यास का ही फल है। 'विवेक-दर्शन' के अभ्यास द्वारा

शान्त और नियंत्रित मन के माध्यम से जीवन को सुन्दर ढंग से गठित करने से ही बहुमूल्य मनुष्य-जन्म  को सार्थक बनाया जा सकता है।

अब हम गीता पर आते हैं। श्लोक6/3,4

आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते ।

योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते।। 

(गीता - 6/3)

योगारूढ़ अर्थात् आत्म साक्षात्कार करने वाले योगी को  योग प्राप्त करने के लिए कर्म कारण कहा जाता है। जब योगी योगारूढ़ हो जाय तो कर्म का शमन अर्थात कारण रूप कर्त्तव्य कहा गया है।  जब तक आत्मसाक्षात्काररूप मोक्ष की प्राप्ति न हो जाय तब तक कर्म करना (योग के निमित्त उद्यम करते रहना) ही कर्त्तव्य है।

[योग में आरूढ़ होने की इच्छा वाले मुनि के लिए कर्म करना ही हेतु (साधन-उपाय) कहा है और योगारूढ़ हो जाने पर उसी पुरुष के लिए शम को (शांति, संकल्प-संन्यास) साधन कहा गया है।।

अमृतत्व प्राप्त करने , आत्मसाक्षात्कार करने या परम् सत्य को जानने के इच्छुक व्यक्ति के लिए या ध्यानयोग पर आरूढ़ होने के इच्छुक व्यक्ति के लिए प्रथम साधन कहा गया है कर्म। जगत् में कर्तापन के अभिमान या कर्तृत्व के अभिमान और फलासक्ति का त्याग करके (देह बुद्ध्या दासोऽहं भाव सेकर्म करने से पूर्व संचित वासनाओं का क्षय होता है और नई वासनाएं उत्पन्न नहीं होतीं

यहाँ योगारूढ़ होने के विषय को स्पष्ट करने के लिए अश्वारोहण (घोड़े की सवारी) के अत्यन्त उपयुक्त रूपक का प्रयोग किया गया है। जब मनुष्य किसी स्वच्छंद अश्व पर पहली बार सवार होने का प्रयत्न करता है तब पहले तो वह अश्व ही उस पर सवार हो जाता है।  यदि कोई व्यक्ति युद्ध के अश्व को अपने पूर्णवश में करना चाहे तो कुछ काल तक उसे उस अश्व पर सवार होने का प्रयास करना पड़ता है। एक पैर को पायदान पर रखकर जीन पर झूलते हुए दूसरे पैर को पृथ्वी से उठाकर (उछलकर) अश्व की पीठ पर बैठने और उसे अपने वश में करने के लिए प्रयत्न करना पड़ता है। एक बार उस पर सवार हो जाने के बाद उसे अपने वश में रखना सरल कार्य  है।  परन्तु तब तक अश्वारोही को उस अवस्था में से गुजरना पड़ता है जब तक वह पूर्णरूप से न अश्व पर बैठा होता है और न पृथ्वी पर खड़ा होता है। 

     प्रारम्भ में हम केवल कर्म करने वाले होते हैं अहंकार और स्वार्थ से प्रेरित हुए हम परिश्रम करते हैं- नए,नए बिजनेस में पसीना बहाते हैं रोते हैं हँसते हैं। जब व्यक्ति इस प्रकार के कर्मों से थक जाता है तब वह 'मनोरूप अश्व' पर आरूढ़ होना चाहता है। ऐसे ही व्यक्ति को कहते हैं 'आरुरुक्ष' (आरूढ़ होने की इच्छा वाला)। वह पुरुष कर्म तो पूर्व के समान ही करता है परन्तु अहंकार और स्वार्थ को त्यागकर। यज्ञ भावना से किये गये कर्म (कैम्प) वासनाओं को नष्ट करके अन्तकरण को शुद्ध एवं सुसंगठित कर देते हैं। 

    ऐसे शुद्धान्तकरण वाले साधक को शनैशनै कर्म से निवृत्त होकर ध्यान का अभ्यास अधिक करना चाहिए। जब वह मन पर विजय प्राप्त करके उसकी प्रवृत्तियों  को अपने वश में कर लेता है तब वह 'योगारूढ़' कहा जाता है। मन का समत्व प्राप्त योगारूढ़ व्यक्ति के लिए ज्ञानरूप शम अर्थात् शांति वह साधन है जिसके द्वारा वह अपने यथार्थ या पूर्णस्वरूप में स्थित हो सकता है

     इस प्रकार एक ही व्यक्ति के लिए उसके विकास की अवस्थाओं को देखते हुए कर्म और ध्यान की दो साधनाएँ बतायी गयी हैं जो परस्पर विरोधी नहीं है । एक अवस्था में निष्काम कर्मों का आचरण उपयुक्त है तथापि कुछ काल के पश्चात् वह भी कभीकभी मनुष्य की शांति को भंग करके उसे मानो पृथ्वी पर पटक देता है। दुग्ध चूर्ण को पानी में घोलकर बनाया हुआ पतला दूध एक छोटे से शिशु के लिए तो पुष्टिवर्धक होता है परन्तु दूध की वह बोतल बड़े बालक के लिए पर्याप्त नहीं होती जो दिन भर खेलता है और काम करता है। उसे मक्खन और रोटी की आवश्यकता होती है। किन्तु यही रोटी शिशु के लिए प्राणघातक हो सकती है। 

      इसी प्रकार साधना की प्रारम्भिक अवस्था में निष्काम कर्म समीचीन है परन्तु आध्यात्मिकता में और अधिक विकसित हुए साधक को आवश्यक है आत्मचिन्तनरूप निदिध्यासन। पहले अहंकार रहित कर्म साधन है और तत्पश्चात् आत्मस्वरूप का ध्यान। इस ध्यानाभ्यास की आवश्यकता तब तक होती है जब तक साधक निश्चयात्मक रूप से यह अनुभव न कर ले कि 'शुद्ध आत्मा' ही पारमार्थिक सत्य वस्तु है न कि 'अहंकार'। तत्पश्चात् वह कर्म करे अथवा न करे उसे इस ज्ञान की विस्मृति नहीं होती। [शुद्ध आत्मा या सच्चिदानन्द ही 'पक्का मैं', পাকা আমি' -the 'ripe I' है जिसने 'उनका दर्शन' किया था न कि अहँकार या कच्चा मैं ने !)] 

योगारूढ़ अर्थात प्रतिष्ठीत योग वाला वह कब होता है,इस पर आगे का श्लोक है~

कब यह साधक योगरूढ़ बन जाता है उत्तर है- 

यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते।

सर्वसङ्कल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते।।6.4।।

इन्द्रियों के समस्त अर्थरूप भोग और प्राकृत विषय तथा उनसे सम्बन्ध रखने वाले कर्मो में भी जब तक 'अनुषज्जते' अर्थात अनुषक्त यानि आसक्ति रहित नही हो जाता वह सर्वसंकल्प-त्यागी नही है। जब समस्त उपरोक्त इन्द्रियों के भोग और प्राकृत विषय तथा उनसे सम्बन्ध रखने वाले कर्मों का त्यागी हो जाता है तब वह सर्वसङ्कल्प त्यागी योगारूढ़ कहा जाता है।

।।6.4।। जब (साधक) न इन्द्रियों के विषयों में और न कर्मों में आसक्त होता है तब सर्व संकल्पों के त्यागी या संन्यासी को योगारूढ़ कहा जाता है।।

स्वयं की साधनावस्था का अनुभव होने से एक साधक को 'आरुरुक्ष ' की स्थिति समझना कठिन नहीं है। साधक के लिए निष्काम कर्म साधन है। कर्मों का संन्यास तभी करना चाहिए जब मन के ऊपर पूर्ण संयम प्राप्त हो गया हो। इसके पूर्व ही कर्मों का त्यागना उतना ही हानिकारक होगा जितना कि योगारूढ़त्व की अवस्था को प्राप्त होने पर कर्मों से मन को क्षुब्ध करना। उस अवस्था में तो साधन है शम

     स्वाभाविक ही योगारूढ़ के लक्षणों को जानने की उत्सुकता सभी साधकों के मन में उत्पन्न होती है। इस श्लोक में श्रीकृष्ण मन रूपी अश्व पर आरूढ़ हुए पुरुष के बाह्य एवं आन्तरिक लक्षणों को दर्शाते हैं। उस पुरुष का एक लक्षण यह है कि वह मन से न इन्द्रियों के विषयों में आसक्त होता है और न जगत् में किये जाने वाले कर्मों में

    इस कथन का शाब्दिक अर्थ लेकर परमसत्य का विचित्र हास्यजनक चित्र खींचने का प्रयत्न नहीं करना चाहिए। इसका अभिप्राय केवल इतना ही है कि ध्यानाभ्यास के समय साधक का मन विषयों तथा कर्मों से पूर्णतया निवृत्त होता है जिससे वह एकाग्रचित्त से ध्यान करने में समर्थ होता है। मन के सहयोग के बिना इन्द्रियों की स्वयं ही विषयों की ओर प्रवृत्ति नहीं हो सकती। यदि मन को आनन्दस्वरूप आत्मतत्त्व के ध्यान में लगाया जाय तो उस निर्विषय आनन्द का अनुभव कर लेने के उपरान्त वह स्वयं ही विषयों के क्षणिक सुखों की खोज में नहीं भटकेगा। किसी धनवान् व्यक्ति का हष्टपुष्ट पालतू कुत्ता स्थान-स्थान पर रखे कूड़ेदानों में अन्न के कणों को नहीं खोजता। इन्द्रियों के भोग तथा कर्म से परावृत्त हुआ मन आत्मचिन्तन में स्थिर हो जाता है।  यहाँ न अनुषज्जते शब्द पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। सज्जते को अनु यह उपसर्ग लगाकर भगवान यहाँ दर्शाते हैं कि उस पुरुष को विषयों से रंचमात्र भी आसक्ति नहीं होती

      उपर्युक्त स्थिति को प्राप्त होने पर भी संभव है कि साधक अपने मन में ही उठने वाले संकल्पों-विकल्पों से क्षुब्ध हो जाय। भगवान् कहते हैं कि योगारूढ़ पुरुष न केवल बाह्य विक्षेपों से मुक्त है बल्कि इस संकल्प शक्ति के विक्षेपों से भी। स्पष्ट है कि ऐसे योगारूढ़ के लिए ध्यान की गति तीव्र करने के लिए शम की आवश्यकता होती है।

गीता 2/48 में जो समत्वयोग कहा है यह श्लोक में ही स्पष्ट है।

योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय।

सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते।।2.48।।

।।2.48।। हे धनंजय आसक्ति को त्याग कर तथा सिद्धि और असिद्धि में समभाव होकर योग में स्थित हुये तुम कर्म करो। यह समभाव ही योग कहलाता है।।

इस श्लोक में प्रथम बार योग शब्द का प्रयोग किया गया है और यहीं पर उसकी परिभाषा भी दी है कि समत्व योग कहलाता है। इस योग में दृढ़ स्थित होने पर ही निष्काम कर्म किये जा सकते हैं।

कर्मों को कुशलतापूर्वक करने के लिए जिस संग को त्यागने के लिए यहाँ कहा गया है उसपर हम विचार करेंगे।  विपरीत धारणायें झूठी आशायें दिवा स्वप्न कर्म फल की चिन्तायें और भविष्य में संभाव्य अनर्थों का भय इन सबका त्याग करना चाहिये। उपर्युक्त सभी कष्टप्रद धारणायें एवं गुत्थियां भ्रांति जनित अहंकार की ही हैं। यह अहंकार क्या है भूतकाल की स्मृतियों और भविष्य की आशाओं की गठरी। अत अहंकारमय जीवन का अर्थ है मृत क्षणों की श्मशानभूमि अथवा काल के गर्भ में रहना जहाँ अनुत्पन्न भविष्य स्थित है

 इनमें व्यस्त रहते हुये वर्तमान समय को हम खो देते हैं जो हमें कर्म करने और लक्ष्य पाने के लिये उपलब्ध होता है। वर्तमान में प्राप्त सुअवसररूपी धन का यह मूर्खतापूर्ण अपव्यय है जिसका संकेत व्यासजी इन शब्दों में करते है संग त्याग कर समत्व योग में स्थित हुये तुम कर्म करो

वर्तमान ज्ञान कीअग्नि में भूतभविष्य चिन्ता भय आशा इन सबको जलाकर कर्म करना स्फूर्ति और प्रेरणा का लक्षण है। इस प्रकार अहंकार के विस्मरण और कर्म करने में ही पूर्ण आनन्द है। ऐसे कर्म का फल सदैव महान् होता है। कलाकृति के निर्माण के क्षणों में अपने आप को कृति के आनन्द में निमग्न होकर कार्यरत कलाकार इस तथ्य का प्रमाण है। जीवन में किसी कार्य को पूरी लगन और उत्साह से जब हम कर रहे होते हैं उस समय यदि वहाँ कोई व्यक्ति आकर खड़ा हो जाये तब भी हमें उसका भान नहीं रहता। आनन्द की उस अनुभूति से नीचे अहंकार के स्तर पर उतर कर आगन्तुक को उत्तर देने में भी हमें कुछ समय लग जाता है। 

अहंकार को भूलकर जो कार्य किये जाते हैं उनमें कर्ता को यश अथवा अपयश की कोई चिन्ता नहीं रहती क्योंकि फल की चिन्ता का अर्थ है भविष्य की चिन्ता और भविष्य में रहने का अर्थ है वर्तमान को खोना। स्फूर्त जीवन का आनन्द वर्तमान के प्रत्येक क्षण में निहित होता है। कहा जाता है कि प्रत्येक क्षण का आनन्द स्वयं में परिपूर्ण है। 

इस श्लोकार्थ पर विचार करने से ज्ञात होगा कि अहंकार की पूर्ण निवृत्ति के बिना इस मार्ग में सफलता नहीं मिल सकती और इसकी निवृत्ति का उपाय है मन का समत्व भाव। कर्मयोगी के लिये केवल इतना पर्याप्त नहीं कि सम भाव में रहकर वह कर्म करे परन्तु इस नित्य परिवर्तनशील जगत् में रहते हुये इस समभाव को दृढ़ करने का सतत प्रयत्न करे।

कर्मयुद्ध चाहे जगत का हो या रणक्षेत्र का इसके जय और पराजय,सिद्धि और असिद्ध में सम हो जाना चित्त का इस भार से मुक्त हो कर कर्म करना चित्त का समाधान रूप समत्वयोग है। 

हरि ॐ !

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मंगलवार, 25 फ़रवरी 2025

$$$⚜️ 🔱*परिच्छेद -४ , [ (10 दिसम्बर, 1881) श्री रामकृष्ण वचनामृत : परिच्छेद -४] ⚜️एक गृहस्थ के लिए परमपद (=परमहंस पद) प्राप्त करने का क्या मार्ग है? ⚜️ "सरल विश्वास से क्या नहीं हो सकता ? सीप स्वाति नक्षत्र का जल लेने के लिए तैयार रहती है ।$$$ गृहस्थ के लिए क्या उपाय है ? गुरु-वाक्य में विश्वास । Satchidananda Himself who appears as the guru.“गुरु को मनुष्य नहीं मानना चाहिए । सच्चिदानन्द ही गुरु के रूप में आते हैं ।হাঁসে যেমন দুধ নিয়ে জল ত্যাগ করে। হাঁস পারে কিন্তু শালিক পারে না।” हंस दूध लेकर जल (देह-मन इन्द्रियों की गुलामी) को छोड़ देता है, पर केवल हंस ही ऐसा कर सकता है, बतख नहीं

  *परिच्छेद- ४*

⚜️राजेन्द्र के घर पर ब्राह्म भक्त-सम्मेलन में श्रीरामकृष्ण⚜️

(१)

राम, मनोमोहन आदि के संग में*

राजेन्द्र मित्र का घर ठनठनिया में बेचु चटर्जी की गली में है । मनोमोहन के घर पर 'उत्सव' के दिन श्री केशव ने राजेन्द्र बाबू से कहा था, 'आपके घर पर इसी प्रकार एक दिन [धार्मिक उत्स्व या भक्त-सम्मेलन] हो तो अच्छा है ।' राजेन्द्र आनन्दित होकर उसी की तैयारी कर रहे हैं ।

At Keshab's request Rajendra Mitra arranged a religious festival at his home in Calcutta and invited Sri Ramakrishna and the devotees, including the members of the Brahmo Samaj.

রাজেন্দ্র মিত্রের বাটী ঠনঠনে বেচু চাটুজ্যের গলি। মনোমোহনের বাটীতে উৎসবের দিন শ্রীযুক্ত কেশব রাজেন্দ্রবাবুকে বলিয়াছিলেন, আপনার বাড়িতে এইরূপ একদিন উৎসব হয়, বেশ হয়। রাজেন্দ্র আনন্দিত হইয়া তাহার উদ্যোগ করিতেছেন।

आज शनिवार है, 10 दिसम्बर 1881 ई.। आज उत्सव होना निश्चित हुआ है । अनेक भक्त पधारेंगे - केशव आदि ब्राह्म भक्तगण भी आयेंगे । इसी समय उमानाथ ने राजेन्द्र को ब्राह्मभक्त भाई अघोरनाथ की मृत्यु का समाचार सुनाया । अघोरनाथ ने लखनऊ शहर में रात्रि के दो बजे शरीर-त्याग किया है, उसी रात को तार द्वारा यह समाचार आया है । (8 दिसम्बर, 1881 ई.) । उमानाथ दूसरे ही दिन यह समाचार ले आये हैं । केशव आदि ब्राह्मभक्तों ने अशौच ग्रहण किया है। यह सोचकर कि शनिवार को वे कैसे आयेंगे, राजेन्द्र चिन्तित हो रहे हैं

Two days before, Aghorenath, a prominent member of the Brahmo Samaj, had suddenly passed away in Lucknow. Keshab and the other Brahmo devotees were in mourning, and Rajendra thought they could not possibly join in the festival at his house. This worried him.

আজ শনিবার, ১০ই ডিসেম্বর, ১৮৮১ খ্রীষ্টাব্দ, ২৬শে অগ্রহায়ণ, ১২৮৮। আজ উৎসব হইবে স্থির হইয়াছে। খুব আনন্দ — অনেক ভক্ত আসিবেন — কেশব প্রভৃতি ব্রাহ্মভক্তগণও আসিবেন। মন সময় ব্রাহ্মভক্ত ভাই অঘোরনাথের মৃত্যুসংবাদ উমানাথ রাজেন্দ্রকে জানাইলে। অঘোরনাথ লক্ষ্ণৌ নগরে রাত দুটার সময় শরীরত্যাগ করিয়াছেন, সেই রাত্রেই তারযোগে এই সংবাদ আসিয়াছে। ৮ই ডিসেম্বর, ২৪শে অগ্রহায়ণ। উমানাথ পর দিনেই ওই সংবাদ লইয়া আসিয়াছেন। কেশবাদি ব্রাহ্মভক্তগণ অশৌচ গ্রহণ করিয়াছেন — শনিবারে তাঁহারা কেমন করিয়া আসিবেন, রাজেন্দ্র চিন্তিত হইলেন

राम राजेन्द्र से कह रहे हैं, "आप क्यों सोच रहे हैं ? केशव बाबू नहीं आयेंगे तो न आये । श्रीरामकृष्ण तो आयेंगे । आप तो जानते ही है कि वे सदा समाधिमग्न रहा करते हैं । उनकी कृपा से दूसरे को भी ईश्वर का दर्शन हो सकता है । उनकी उपस्थिति से यह उत्सव सफल हो जायगा।"

But Ram, the Master's devotee, said to him: "Why are you so sad? If Keshab can't come, let him stay away. Our Master will be here. He is always in communion with God. He enables one to see God. And his presence will make the festival a success."

রাম রাজেন্দ্রকে বলিতেছেন — আপনি কেন ভাবছেন? কেশববাবু নাই বা এলেন। ঠাকুর আসিতেছেন — আপনি কি জানেন না তিনি সর্বদা সমাধিস্থ, ঈশ্বরকে প্রত্যক্ষ করিতেছেন, — যাঁর আনন্দে জগৎ আনন্দ আস্বাদন করছে

राम, राजेन्द्र, राजमोहन व मनोमोहन केशव से मिलने गये । केशव ने कहा "कहाँ, मैंने ऐसा तो नहीं कहा कि मै नहीं आऊँगा । श्रीरामकृष्णदेव आयेंगे और मैं न आऊँगा ? - अवश्य आऊँगा; अशौच हुआ है तो अलग स्थान पर बैठकर खा लूँगा ।"

Rajendra, accompanied by Ram and a few others, paid Keshab a visit to express their condolence for the death of Aghorenath. Keshab said to Rajendra: "Why, I haven't said I shall not join in the festival at your house. Sri Ramakrishna will be there; so how can I stay away? I am in mourning, it is true, but I shall come."

রাম, রাজেন্দ্র, রাজমোহন, মনোমোহন কেশবের সঙ্গে দেখা করিলেন। কেশব বলিলেন, “কই, আমি এমন কথা বলি নাই যে আমি যাব না পরমহংস মহাশয় আসবেন আর আমি যাব না? অবশ্য যাব; অশৌচ হয়েছে, তা আলাদা জায়গায় বসে খাব।”

केशव राजेन्द्र आदि भक्तों के साथ वार्तालाप कर रहे हैं । कमरे में श्रीरामकृष्ण का समाधि-चित्र टँगा हुआ है

On the wall in Keshab's room hung a picture of Sri Ramakrishna absorbed in samadhi.

কেশব রাজেন্দ্র প্রভৃতি ভক্তদের সহিত কথা কহিতেছেন। ঘরে শ্রীরামকৃষ্ণের সমাধিচিত্র টাঙ্গান ছিল

राजेन्द्र - (केशव के प्रति) - श्रीरामकृष्णदेव को अनेक लोग चैतन्य का अवतार कहते हैं ।

RAJENDRA (to Keshab): "Many people say that he (pointing to the picture) is an incarnation of Chaitanya."

রাজেন্দ্র (কেশবের প্রতি) — পরমহংস মহাশয়কে অনেকে বলে চৈতন্যের অবতার।

केशव - (समाधि-चित्र को देखकर) - इस प्रकार की समाधि प्रायः नहीं देखी जाती । ईसा मसीह, मुहम्मद, चैतन्य इनको हुआ करती थी ।

KESHAB (looking at the picture): "One doesn't see such samadhi. Only men like Christ, Mohammed, and Chaitanya experienced it."

কেশব (সমাধিচিত্র দেখিয়া) — এরূপ সমাধি দেখা যায় না। যীশুখ্রীষ্ট, মহম্মদ, চৈতন্য এঁদের হত।

दिन के तीन बजे के समय मनोमोहन के घर पर श्रीरामकृष्ण पधारे । वहाँ पर विश्राम करके थोड़ा जलपान किया । फिर सुरेन्द्र उन्हें गाड़ी पर चढ़ाकर 'बेंगाल फोटोग्राफर' के स्टुडिओ में ले गये । फोटोग्राफर ने कैसे फोटो लिया जाता है दिखा दिया । काँच के पीछे सिलवर नाइट्रेट (Silver Nitrate) लगायी जाती है, उस पर फोटो उतरता है - यह सब बतला दिया । श्रीरामकृष्ण का फोटो लिया जा रहा है, उसी समय वे समाधिमग्न हो गये ।

About three o'clock in the afternoon Sri Ramakrishna arrived at Manomohan's house. He rested there awhile and had some refreshments. Surendra took the Master in a carriage to the studio of the Bengal Photographer. The art of photography was explained to him, and he was shown how glass covered with silver nitrate takes the image. As the Master was being photographed he went into samadhi.

বেলা ৩টার সময় মনোমোহনের বাটীতে শ্রীরামকৃষ্ণ আসিয়াছেন। সেখানে বিশ্রাম করিয়া একটু জলযোগ করিলেন। সুরেন্দ্র বলিতেছেন — আপনি কল দেখবেন বলেছিলেন — চলুন! তাঁহাকে গাড়ি করিয়া সুরেন্দ্র বেঙ্গল ফটোগ্রাফারের ষ্টুডিওতে লইয়া গেলেন। ফটোগ্রাফার দেখাইলেন কিরূপে ছবি তোলা হয়। কাঁচের পিছনে কালী (Silver Nitrate) মাখান হয়; তারপর ছবি উঠে। ঠাকুরের ছবি লওয়া হইতেছে — অমনি তিনি সমাধিস্থ হইলেন

अब श्रीरामकृष्ण राजेन्द्र मित्र के मकान पर आये हैं । राजेन्द्र मित्र (राम और मनमोहन के मौसा)  रिटायर्ड डिप्टी मैजिस्ट्रेट हैं । श्री महेन्द्र गोस्वामी आँगन में भागवत का प्रवचन कर रहे हैं । अनेक भक्तगण उपस्थित हैं - केशव अभी तक नहीं आये । श्रीरामकृष्ण बातचीत कर रहे हैं

A little later Sri Ramakrishna arrived at Rajendra Mitra's house. Keshab had not yet come, and Mahendra Goswami was reading from the Bhagavata. The Master conversed with the devotees.

এইবার ঠাকুর রাজেন্দ্র মিত্রের বাটীতে আসিয়াছেন। রাজেন্দ্র পুরাতন ডেপুটি ম্যাজিস্ট্রেট।শ্রীযুক্ত মহেন্দ্র গোস্বামী বাটীর প্রাঙ্গণে ভাগবত পাঠ করিতেছেন। অনেক ভক্ত উপস্তিত — কেশব এখনও আসিয়া পৌঁছান নাই। শ্রীরামকৃষ্ণ কথা কহিতেছেন।

 [ (10 दिसम्बर, 1881) श्री रामकृष्ण वचनामृत : परिच्छेद -४]

⚜️गृहस्थ के लिए मार्ग क्या है?⚜️ 

[ गृहस्थ के लिए परमपद (=परमहंस पद) प्राप्त करने का क्या मार्ग है?.... 

जो भजे 'हरि' को सदा वही परमपद पायेगा !

(What is the way for a householder to attain 

the supreme position (Paramhansa position)?] 

श्रीरामकृष्ण - (भक्तों के प्रति ) - गृहस्थी में धर्म (=भक्ति) होगा क्यों नहीं ? परन्तु है बड़ा कठिन। आज बागबाजार के पुल पर से होकर आया । कितने जंजीरों  से उसे बाँधा है ! एक जंजीर के टूटने से भी पुल का कुछ न होगा, क्योंकि वह और भी अनेक जंजीरों से बँधा हुआ है । वे सब उसे खींचे रहेंगे । उसी प्रकार गृहस्थों के अनेक बन्धन हैं, ईश्वर की कृपा के बिना उन बन्धनों के कटने का उपाय नहीं है

MASTER: "Why shouldn't one be able to lead a spiritual life in the world? But it is extremely difficult. While coming here I passed over the bridge at Baghbazar. How many chains it is tied with! Nothing will happen if one chain is broken, for there are so many others to keep it in place. Just so, there are many ties on a worldly man. There is no way for him to get rid of them except through the grace of God.

শ্রীরামকৃষ্ণ (ভক্তদের পতি) — সংসারে হবে না কেন? তবে বড় কঠিন। আজ বাগবাজারের পুল হয়ে এলাম। কত বন্ধনেই বেঁধেছে। একটা বন্ধন ছিঁড়লে পুলের কিছু হবে না। আরও অনেক শিকল দিয়ে বাঁধা আছে — তারা টেনে রাখবেতেমনি সংসারীদের অনেক বন্ধন। ভগবানের কৃপা ব্যতিরেকে সে বন্ধন যাবার উপায় নাই

“उनका दर्शन #होने पर फिर कोई भय नहीं है । उनकी माया में विद्या और अविद्या दोनों ही हैं; पर दर्शन के बाद मनुष्य निर्लिप्त हो जाता है परमहंस-स्थिति प्राप्त होने पर यह बात ठीक तरह से समझ में आती है । दूध में जल है, हंस दूध लेकर जल (देह-मन इन्द्रियों की गुलामी) को छोड़ देता है, पर केवल हंस ही ऐसा कर सकता है, बतख नहीं ।”

(#ठाकुर-माँ -स्वामीजी की कृपा से आत्मसाक्षात्कार ? सच्चिदानन्द स्वरुप का दर्शन होने पर.)

"One need not be afraid of the world after one has had the vision of God.  Both vidya and avidya exist in His maya; but one becomes indifferent to them after realizing God. One understands it rightly after attaining the State of a Paramahamsa. Only a swan can discard the water and drink the milk from a mixture of milk and water. A robin cannot do so."

“তাঁকে দর্শন করলে আর ভয় নাই; তাঁর মায়ার ভিতর বিদ্যা-অবিদ্যা দুই আছে; — দর্শনের পর নির্লিপ্ত হতে পারে। পরমহংস অবস্থায় ঠিক বোধ হয়। দুধে জলে আছে, হাঁসে যেমন দুধ নিয়ে জল ত্যাগ করে। হাঁস পারে কিন্তু শালিক পারে না।

 [ (10 दिसम्बर, 1881) श्री रामकृष्ण वचनामृत : परिच्छेद -४]

⚜️गृहस्थ के लिए परमपद=परमहंस पद पाने का उपाय है गुरुवाक्य में विश्वास⚜️

[For a householder, the way to attain the supreme position = Paramhans position is to believe in the words of the Guru⚜️]  

एक भक्त - फिर गृहस्थ के लिए क्या उपाय है ?

A DEVOTEE: "Then what is the way for a householder?"

একজন ভক্ত — তবে সংসারীর উপায় কি

श्रीरामकृष्ण – गुरु-वाक्य में विश्वास । उनकी वाणी का सहारा लेकर, उनका वाक्यरूपी खम्भा पकड़कर घूमो, गृहस्थी का काम करो । 

MASTER: "Faith in the guru's words. You should depend on his instruction. Do your duties in the world, holding fast to his words, like a person whirling round and holding fast to a pillar.

শ্রীরামকৃষ্ণ — গুরুবাক্যে বিশ্বাস। তাঁর বাক্য অবলম্বন; তাঁর বাক্যরূপ খুঁটি ধরে ঘোরো, সংসারের কাজ করো।

[(10 दिसम्बर, 1881) श्री रामकृष्ण वचनामृत : परिच्छेद -४]

 सरल विश्वास से क्या नहीं प्राप्त किया जा सकता !!

(What cannot be achieved by simple 

faith like that of a shell in the Name!!) 

“गुरु को मनुष्य नहीं मानना चाहिए । सच्चिदानन्द ही गुरु (जगतगुरु श्रीरामकृष्णदेव) के रूप में आते हैं । गुरु की कृपा से इष्ट का दर्शन होता है । उस समय गुरु इष्ट में लीन हो जाते हैं ।

"One must not look on one's guru as a mere human being: it is Satchidananda Himself who appears as the guru. When the disciple has the vision of the Ishta, through the guru's grace, he finds the guru merging in Him.

“গুরুকে মানুষবুদ্ধি করতে নাই। সচ্চিদানন্দই গুরুরূপে আসেন। গুরুর কৃপায় ইষ্টকে দর্শন হয়, তখন গুরু ইষ্টতে লীন হয়ে যান।

"सरल विश्वास से क्या नहीं प्राप्त किया जा सकता !! एक समय किसी गुरु के यहाँ अन्नप्राशन हो रहा था । उस अवसर पर शिष्यगण, जिससे जैसा बना, उत्सव का आयोजन कर रहे थे । उनमें एक दीन विधवा भी शिष्या थी । उसके एक गाय थी । वह एक लोटा दूध लेकर आयी । गुरुजी ने सोचा था कि दूध-दही का भार वही लेगी, किन्तु एक लोटा दूध देखकर क्रोधित हो उन्होंने उस लोटे को फेंक दिया और कहा, 'तू जल में डूबकर मर क्यों नहीं गयी ?' स्त्री ने गुरु का यही आदेश समझा और नदी में डूबने के लिए गयी

"What can one not achieve through simple faith! Once there was an annaprasana ceremony2 in a guru's house. His disciples volunteered, according ing to their powers, to supply the different articles of food. He had one disciple, a very poor widow, who owned a cow. She milked it and brought the guru a jar of milk. He had thought she would take charge of all the milk and curd for the festival. Angry at her poor offering, he threw the milk away and said to her, 'Go and drown yourself.' The widow accepted this as his command and went to the river to drown herself

“সরল বিশ্বাসে কি না হয়। গুরুপুত্রের অন্নপ্রাশনে — শিষ্যেরা যে যেমন পারে, উৎসবের আয়োজন করছে। একটি গরীব বিধবা সেও শিষ্যা। তার একটি গরু আছে, সে একঘটি দুধ এনেছে। গুরু মনে করছিলেন যে দুধের ভার ওই মেয়েটি লবে। বিরক্ত হয়ে সে যা এনেছিল ফেলে দিলে আর বললে — তুই জলে ডুবে মরতে পারিস নি? মেয়েটি এই গুরুর আজ্ঞা মনে করে নদীর ধারে ডুবতে গেল। 

उस समय नारायण ने दर्शन दिया और प्रसन्न होकर कहा, 'इस बर्तन में दही है, जितना निकालोगी उतना ही निकलता जायगा । इससे गुरु सन्तुष्ट होंगे ।' वह बर्तन जब गुरु को दिया गया तो वे दंग रह गये और सारी कहानी सुनकर नदी के किनारे पर आकर उस स्त्री से बोले - 'यदि मुझे नारायण का दर्शन न कराओगी तो मैं इसी जल में कूदकर प्राण छोड़ दूँगा ।' नारायण प्रकट हुए, परन्तु गुरु उन्हें न देख सके । तब स्त्री ने कहा, 'प्रभो, गुरुदेव को यदि दर्शन न दोगे और यदि उनकी मृत्यु हो जायगी तो मै भी शरीर छोड़ दूँगी ।' फिर नारायण ने एक बार गुरु को भी दर्शन दिया ।

But God was pleased with her guileless faith and, appearing before her, said: 'Take this pot of curd. You will never be able to empty it. The more curd you pour out, the more will come from the pot. This will satisfy your teacher.' The guru was speechless with amazement when the pot was given to him. After hearing from the widow the story of the pot, he went to the river, saying to her, 'I shall drown myself if you cannot show God to me.' God appeared then and there, but the guru could not see Him. Addressing God, the widow said, 'If my teacher gives up his body because Thou dost not reveal Thyself to him, then I too shall die.' So God appeared to the guru — but only once.

তখন নারায়ণ দর্শন দিলেন; আর প্রসন্ন হয়ে বললেন — এই পাত্রটিতে দধি আছে, যতই ঢালবে ততই বেরুবে, গুরু সন্তুষ্ট হবেন। এবং সেই পাত্রটি দেওয়া হলে গুরু অবাক্‌। আর সমস্ত বিবরণ শুনে নদীর ধারে এসে মেয়েটিকে বললেন — নারায়ণকে যদি আমাকে দর্শন না করাও তবে আমি এই জলেতে প্রাণত্যাগ করব। নারায়ণ দর্শন দিলেন, কিন্তু গুরু দেখতে পেলেন না। মেয়েটি তখন বললে, প্রভু গুরুদেবকে যদি দর্শন না দেন আর তাঁর শরীর যদি যায় তো আমিও শরীরত্যাগ করব; তখন নারায়ণ একবার গুরুকে দেখা দিলেন।

"देखो, गुरु-भक्ति रहने से अपने को भी दर्शन हुआ, फिर गुरुदेव को भी हुआ । "इसलिए कहता हूँ –‘यदि मेरे गुरु शराबखाने में भी जाते हों तो भी मेरे गुरु नित्यानन्द राय हैं ।'

यद्यपि आमार गुरु शुण्डी बाड़ी जाय ,

तथापि आमार गुरु नित्यानन्द राय। 

"Now you see, because of faith in her guru the disciple herself had the vision of God and also showed Him to her teacher. Therefore I say, 'Even though my guru frequents a grog-shop, still to me he is the embodiment of Eternal Bliss.'

“দেখ গুরুভক্তি থাকলে নিজেরও দর্শন হল আবার গুরুদেবেরও হল। “তাই বলি —

                     যদ্যপি আমার গুরু শুঁড়ীবাড়ি যায়,

                      তথাপি আমার গুরু নিত্যানন্দ রায়।

“सभी गुरु बनना चाहते हैं । चेला बनना कदाचित् ही कोई चाहता है । परन्तु देखो, ऊँची जमीन में वर्षा का जल नहीं जमता, वह तो नीची जमीन में - गढ़े में ही जमता है

"All want to be the guru, but very few indeed want to be the disciple. But you know that rain-water doesn't collect on a high mound; it collects in low land, in a hollow.

“সকলেই গুরু হতে চায়, শিষ্য হতে বড় কেহ চায় না। কিন্তু দেখ উঁচু জমিতে বৃষ্টির জল জমে না। নিচু জমিতে — খাল জমিতে জমে।

"गुरु जो नाम दें, विश्वास करके उस नाम को लेकर साधनभजन करना चाहिए । "जिस सीप में मुक्ता तैयार होता है, वह सीप स्वाति नक्षत्र का जल लेने के लिए तैयार रहती है । उसमें वह जल गिर जाने पर फिर एकदम अथाह जल में डूब जाती है, और वहीं चुपचाप पड़ी रहती है । तभी मोती बनता है ।"

"One should have faith in the holy name given by the guru and with it practise spiritual discipline. It is said that the pearl oyster makes itself ready for the rain that falls when the star Svati is in the ascendant. Taking a drop of that rain, it dives into the fathomless depths of the ocean and remains there until the pearl is formed."

“গুরু যে নামটি দেবেন বিশ্বাস করে সে নামটি লয়ে সাধন-ভজন করতে হয়।”“যে শামুকের ভেতর মুক্তা তয়ের হয়, এমনি আছে, সেই শামুক স্বাতী-নক্ষত্রের বৃষ্টির জলের জন্য প্রস্তুত হয়ে থাকে। সেই জল পড়লে একেবারে অতল জলে ডুবে চলে যায়, যতদিন না মুক্তা হয়।”

[ (10 दिसम्बर, 1881) श्री रामकृष्ण वचनामृत : परिच्छेद -४] 

(२)

[राजेन्द्र के घर पर ब्राह्म-भक्त सम्मेलन] 

⚜️संसार (परिवार) में रहते समय बीच -बीच में निर्जनवास करने के लिए 

भक्त-सम्मेलन, साधु-संग या कैम्प में जाते रहना चाहिए⚜️ 

अनेक ब्राह्म भक्त आये हैं । यह देखकर श्रीरामकृष्ण कह रहे हैं - "ब्राह्मसभा है या शोभा ("ब्रह्म-समाज के लोगों का सम्मेलन क्या वास्तविक भक्त सम्मेलन है या मात्र दिखावा?) ब्राह्मसभा में नियमित उपासना होती है, यह बहुत अच्छा है, परन्तु डुबकी लगानी पड़ती है । केवल उपासना या व्याख्यान से कुछ नहीं होने का । ईश्वर से प्रार्थना करनी पड़ती है, जिससे भोग-आसक्ति दूर होकर उनके चरण-कमलों में शुद्धा भक्ति हो

At the sight of the many Brahmo devotees assembled there, the Master said: "Is the meeting of the Brahmos a real devotional gathering or a mere show? It is very good that the Brahmo Samaj holds regular devotions. But one must dive deep; mere ceremonial worship or lectures are of no avail. One should pray to God that one's attachment to worldly enjoyment may disappear; that one may have pure love for His Lotus Feet.

অনেকগুলি ব্রাহ্মভক্ত আসিয়াছেন দেখিয়া ঠাকুর বলিতেছেন —“ব্রাহ্মসভা না শোভা? ব্রাহ্মসমাজে নিয়মিত উপাসনা হয়, সে খুব ভাল; কিন্তু ডুব দিতে হয়। শুধু উপাসনা, লেকচারে হয় না। তাঁকে প্রার্থনা করতে হয়, যাতে ভোগাসক্তি চলে গিয়ে তাঁর পাদপদ্মে শুদ্ধাভক্তি হয়

[ (10 दिसम्बर, 1881) श्री रामकृष्ण वचनामृत : परिच्छेद -४] 

⚜️ 'कामिनी और कांचन' में (ऐषणा) गिद्धदृष्टि रखने से भक्ति का पतन होता है ⚜️   

"हाथी के दिखाने के दाँत और होते हैं तथा खाने के दाँत और । बाहर के दाँत शोभा के लिए है, परन्तु भीतर के दाँतों से वह खाता है । इसी प्रकार भीतर कामिनी-कांचन का भोग करने पर भक्ति की हानि होती है

"The elephant has outer tusks and inner grinders as well. The tusks are mere ornaments; but the elephant chews its food with the grinders. The inner enjoyment of 'woman and gold' injures the growth of one's devotion.

“হাতির বাহিরের দাঁত আছে আবার ভিতরের দাঁতও আছে। বাহিরের দাঁতে শোভা, কিন্তু ভিতরের দাঁতে খায়। তেমনি ভিতরে কামিনী-কাঞ্চন ভোগ করলে ভক্তির হানি হয়।

"बाहर भाषण आदि देने से क्या होगा ? गीध बहुत उँचे पर उड़ता है, परन्तु उसकी दृष्टि रहती है सड़े हुए मुर्दों की ओर । आतशबाजी 'फुँस' करके पहले आकाश में उठ जाती है, परन्तु दूसरे ही क्षण जमीन पर गिर पड़ती है

"What will you achieve through mere public lectures? The vulture undoubtedly soars high, but its eyes are fixed on the charnel-pit. The rocket undoubtedly shoots up into the sky, but the next moment it falls to the ground.

“বাহিরে লেকচার ইত্যাদি দিলে কি হবে? শকুনি উপরে উঠে কিন্তু ভাগাড়ের দিকে নজর। হাওয়াই হুস করে প্রথমে আকাশে উঠে যায় কিন্তু পরক্ষণেই মাটিতে পড়ে যায়।

"भोगासक्ति का त्याग हो जाने पर देह-त्याग होते समय ईश्वर की ही स्मृति आयगी और नहीं तो इस संसार की ही चीजों की (तीनों ऐषणाओं की)  याद आयगी - स्त्री, पुत्र, गृह, धन, मान, इज्जत आदि पक्षी अभ्यास करके राधा-कृष्ण रटता तो है, परन्तु जब बिल्ली पकड़ती है तो 'टें-टें' ही करता है

"He who has renounced his attachment to worldly enjoyments will remember nothing but God in the hour of death. Otherwise he will think only of worldly things: wife, children, house, wealth, name and fame. Through practice a bird can be trained to repeat 'Radha-Krishna'; but when a cat catches it, it only squawks.

“ভোগাসক্তি ত্যাগ হলে শরীর যাবার সময় ঈশ্বরকেই মনে পড়বে তা না হলে এই সংসারের জিনিসই মনে পড়বে — স্ত্রী, পুত্র, গৃহ, ধন, মানসম্ভ্রম ইত্যাদি। পাখি অভ্যাস করে রাধাকৃষ্ণ বোল বলে। কিন্তু বেড়ালে ধরলে ক্যাঁ ক্যাঁ করে।

“इसीलिए सदा अभ्यास करना चाहिए - उनके नाम-गुणों का कीर्तन, उनका ध्यान, चिन्तन और प्रार्थना - जिससे भोगासक्ति छूट जाय और उनके चरणकमलों में मन लगा रहे

"Therefore one should constantly practise the singing of God's name and glories, and meditation and contemplation as well. And further, one should always pray that one's attachment to the world may disappear and one's love for God's Lotus Feet may grow.

“তাই সর্বদা অভ্যাস করা দরকার। তাঁর নামগুণকীর্তন, তাঁর ধ্যান, চিন্তা, আর প্রার্থনা — যেন ভোগাসক্তি যায় আর তোমার পাদপদ্মে মন হয়।

"इस प्रकार के भक्त-गृहस्थ संसार (परिवार) में नौकरानी की तरह रहते हैं । वे सब कामकाज तो करते हैं, परन्तु मन देश में पड़ा रहता है । अर्थात् मन को ईश्वर पर रखकर वे सब काम करते हैं। गृहस्थी करने से ही देह में कीचड़ लगती है । यथार्थ भक्तगृहस्थ 'पाँकाल' मछली की तरह होते हैं, पंक में रहकर भी देह में कीच नहीं लगता

"Householders devoted to God live in the world like a maidservant, who performs her duties for her master but always keeps her mind fixed on her own native village; that is to say, they do their duties in the world keeping their minds on God. Anyone leading a worldly life is sure to come in contact with its dirt; but a householder who is a true devotee of God lives like the mudfish, which, though remaining in the mud, is not stained by it.

“এরূপ সংসারী লোক, সংসারে দাসীর মতো থাকে, সব কর্ম কাজ করে, কিন্তু দেশে মন পড়ে থাকে। অর্থাৎ ঈশ্বরের উপর মন রেখে কর্মগুলি করে। সংসার করতে গেলেই গায়ে পাঁক লাগে। ঠিক ভক্ত সংসারী পাঁকাল মাছের মতো, পাঁকে থেকেও গা পাঁকশূন্য।

(ब्रह्म, ईश्वर, भगवान या माँ जगदम्बा एक और अभिन्न हैं) 

[ (10 दिसम्बर, 1881) श्री रामकृष्ण वचनामृत : परिच्छेद -४] 

⚜️ ब्रह्म और शक्ति अभिन्न हैं -उन्हें माँ कहकर पुकारने से भक्ति शीघ्र होती है।⚜️     

[#ब्रह्म एक चेतन शक्ति है।  ईश्वर भी वही चेतन शक्ति है तथा शरीर में वही चेतन शक्ति आत्मा कहलाती है।  ब्रह्म शुद्ध चेतनतत्व है तथा ईश्वर उस ब्रह्म की मायाशक्ति से आवृत्त है।  इस मायारूपी उपाधि के कारण ही उस ब्रह्म की संज्ञा ईश्वर हो जाती है अन्यथा दोनों में कोई भेद नहीं है।  जिस प्रकार एक व्यक्ति अपने पुत्र के लिए पिता, पत्नी के लिए पति, रेल में यात्रा करने पर यात्री, उपासना करने पर भक्त, मांग कर खाने पर भिखारी आदि कहलाता है, ये उसकी उपाधियां हैं, जिससे उसको विभिन्न नाम दे दिये हैं, किंतु वास्तव में वह व्यक्ति तो एक ही है। इसी प्रकार लेखक, कलाकार, इंजीनियर, डॉक्टर, कलेक्टर आदि उसकी उपाधियां मात्र हैं, जो उसकी पहचान के लिए दिये जाते हैं अन्यथा मूल रूप में है वह एक मनुष्य ही।  इसी प्रकार माया की उपाधि के कारण उसे ईश्वर कहा जाता है।  वह इसी मायाशक्ति से सृष्टि की रचना करता है। वह इस माया का अधिपति व स्वामी है, जो उसी के संकल्प के अनुसार, उसी के नियम व अनुशासन में रह कर कार्य करती है।  इसलिए ईश्वर ही सर्वेसर्वा है।  इसलिए शरीर से आबद्ध होने के कारण ही ब्रह्म की शक्ति को आत्मा कहा जाता है अन्यथा उसमें और ब्रह्म में कोई भेद नहीं। – आदि शंकराचार्य

[ब्रह्म शुद्ध चेतन-तत्व है और ईश्वर उस ब्रह्म की मायाशक्ति से आवृत्त है।  इस मायारूपी उपाधि के कारण ही उस ब्रह्म की संज्ञा ईश्वर हो जाती है। आत्मा की शक्ति को - समस्त स्त्रीजाति को, माँ कहकर पुकारने से भक्ति शीघ्र होती है !....Brahma is pure consciousness and God is covered by the illusionary power of that Brahma. Due to this illusionary title, that Brahma is called God.] 

“ब्रह्म और शक्ति (ईश्वर-माँ जगदम्बा,भगवान) अभिन्न # हैं । उन्हें माँ कहकर पुकारने से शीघ्र ही भक्ति होती है, प्रेम होता है।”

यह कहकर श्रीरामकृष्ण गाने लगे –

श्यामा पद आकाशते मन घुड़िखाना उड़िते छीलो। 

कलूषेर कूबातास  खेये गोप्ता खेय पड़े गेलो। 

मायाकान्नी होलो भारी, आर आमि उठाते नारि।   

दारासूत  कलेर दड़ी , फाँस लेगे से फेंसे गेलो।। 

ज्ञान -मुण्डू गेछे छिंड़े,  उठिये दिलो ओमनी पड़े।  

माथा नेई से आर कि उड़े , सङ्गेर छजन जयी होलो।।

भक्ति डोरे छीलो बाँधा , खेलते एसे लागलो धाँधा। 

नरेशचन्द्रेर हासा -काँदा, ना आसा एक छिलो भालो।।    

गाना - (भावार्थ) –

“श्यामा के चरणरूपी आकाश में मेरा मनरूपी पतंग उड़ रहा था । पाप की जोरदार हवा से धक्का खाकर उल्टा होकर गिर गया .......” । 

(अंग्रेजी से हिन्दी अनुवाद) यह कहते हुए, श्री रामकृष्ण  ने गाया: माता के चरणों के ऊपर, मेरा मन पतंग की तरह उड़ रहा था, तभी पाप की प्रचंड हवा का झोंका आया और उसे तेजी से धरती की ओर ले गया। माया ने एक ओर से दबाव देकर उसकी सम उड़ान में बाधा डाली, और मैं उसे और ऊपर नहीं उठा सका। बच्चों और पत्नी के प्रेम की टेढ़ी डोर में उलझकर, हाय! मेरी पतंग दो टुकड़ों में फट गई। उसने अपनी ज्ञान की शिखा शीघ्र ही खो दी और जैसे ही मैंने उसे छोड़ा, वह नीचे की ओर गिर गई; जब उसका पूरा सिरा ही उखड़ गया, तो वह फिर से उड़ने की आशा कैसे कर सकती थी? यद्यपि वह भक्ति की डोर से बंधी हुई थी, फिर भी यहाँ खेलते हुए उसे दुःख हुआ; उसके षड्रिपुओं ने (छह वासनाओं) ने उसे परास्त कर दिया। अब नरेशचंद्र को मुस्कान और आंसुओं के इस खेल पर पछतावा होता है, और वह सोचता है कि इसे कभी न खेलना ही बेहतर है।]

गाना - 

यशोदा नाचातो गो माँ बोले नीलमणि। 

से भेश लुकाली कोथा करालवदनी?

एकबार नाच गो श्यामा ,- 

हासि बांशी मिशाईये, मुण्डमाला छेड़े, वनमाला पोरे ,

असि छेड़े बाँशी लोये, आड़ -नयने चेय चेय, 

गज मोती नसाय दुलुक ;  

(भावार्थ) –

“ओ माँ ! तुम्हें यशोदा नीलमणि (बालक श्रीकृष्ण का एक नाम) कहकर नचाती थी । ऐ करालवदनि, उस भेष को तूने कहाँ छिपा दिया है ? ....”

श्रीरामकृष्ण उठकर नृत्य कर रहे हैं और गाना गा रहे हैं । भक्तगण भी उठे ।श्रीरामकृष्ण बार बार समाधिमग्न हो रहे हैं । सभी उन्हें एकदृष्टि से देख रहे हैं और चित्रवत् खड़े हैं । डाक्टर दोकौड़ी समाधि कैसी होती है इसकी परीक्षा करने के लिए उनकी आँखों में उँगली डाल रहे हैं  यह देखकर भक्तों को विशेष क्षोभ हुआ ।

“ব্রহ্ম ও শক্তি অভেদ। তাঁকে মা বলে ডাকলে শীঘ্র ভক্তি হয়, ভালবাসা হয়।” এই বলিয়া শ্রীরামকৃষ্ণ গান ধরিলেন:

শ্যামাপদ-আকাশেতে মন ঘুড়িখান উড়তেছিল ৷

কলুষের কুবাতাস পেয়ে গোপ্তা খেয়ে পড়ে গেল ॥

মায়াকান্নি হল ভারী, আর আমি উঠাতে নারি ৷

দারাসুত কলের দড়ি, ফাঁস লেগে সে ফেঁসে গেল ॥

জ্ঞান-মুণ্ড গেছে ছিঁড়ে, উঠিয়ে দিলে অমনি পড়ে ৷

মাথা নেই সে আর কি উড়ে, সঙ্গের ছজন জয়ী হল ॥

ভক্তি ডোরে ছিল বাঁধা, খেলতে এসে লাগল ধাঁধা ৷

নরেশচন্দ্রের হাসা-কাঁদা, না আসা এক ছিল ভাল ॥

গান   —   

যশোদা নাচাতো গো মা ব'লে নীলমণি;

সে বেশ লুকালে কোথা করালবদনী?

একবার নাচ গো শ্যামা, -

হাসি বাঁশী মিশাইয়ে, মুণ্ডমালা ছেড়ে, বনমালা প'রে,

অসি ছেড়ে বাঁশী লয়ে, আড়-নয়নে চেয়ে চেয়ে,

গজমতি নাসায় দুলুক;

যশোদার সাজানো বেশে, অলকা-আবৃত মুখে,

অষ্ট নায়িকা, অষ্ট সখী হোক;

যেমন ক'রে রাসমণ্ডলে নেচেছিলি,

হৃদি-বৃন্দাবন-মাঝে, ললিত ত্রিভঙ্গ-ঠামে,

চরণে চরণ দিয়ে, গোপীর মন-ভুলানো বেশে,

তেমনি তেমনি তেমনি করে;

(দেখে নয়ন সফল করি) বড় সাধ আছে মনে;

তোর শিব বলরাম হোক, (হেরি নীলিগিরি আর রজতগিরি)

একবার বাজা গো মা - সেই মোহন বেণু,

যে বেণু-রবে ধেনু ফিরাতিস্, যে বেণু-রবে যমুনায় উজান ধরিত;

বাজুক তোর বেণু বলায়ের শিঙে।

শ্রীদামের সঙ্গে নাচিতে ত্রিভঙ্গে গো মা;

তা থেইয়া তা থেইয়া, তা তা থেই থেই বাজত নূপুর-ধ্বনি।

শুন্তে পেয়ে, আসতো ধেয়ে ব্রজের রমণী॥ (গো মা)

গগনে বেলা বাড়িত, রাণী ব্যাকুল হইত;

বলে ধর ধর ধর, ধর রে গোপাল, ক্ষীর সর ননী।

এলাইয়ে চাঁচর কেশ রাণী বেঁধে দিত বেণী॥

ঠাকুর উঠিয়া নৃত্য করিতেছেন ও গান গাহিতেছেন। ভক্তেরাও উঠিয়াছেন।শ্রীরামকৃষ্ণ মুহুর্মুহু সমাধিস্থ হইতেছেন। সকলেই একদৃষ্টে দেখিতেছেন আর চিত্রপুত্তলিকার ন্যায় দাঁড়াইয়া আছেন।ডাক্তার দুকড়ি সমাধি কিরূপ পরীক্ষা করিবার জন্য চক্ষে আঙুল দিতেছেন। তাহা দেখিয়া ভক্তেরা অতিশয় বিরক্ত হইলেন

"Brahman and Sakti are identical. One acquires love and devotion, quickly by calling on God as Mother."

 [ ब्रह्म शुद्ध चेतनतत्व है और ईश्वर उस ब्रह्म की मायाशक्ति से आवृत्त है।  इस मायारूपी उपाधि के कारण ही उस ब्रह्म की संज्ञा ईश्वर हो जाती है।.... Brahma is pure consciousness and God is covered by the illusionary power of that Brahma. Due to this illusionary title, that Brahma is called God.]  

Saying this, the Master sang: 

High in the heaven of the Mother's feet, my mind was soaring like a kite, When came a blast of sin's rough wind that drove it swiftly toward the earth. Maya disturbed its even flight by bearing down upon one side, And I could make it rise no more. Entangled in the twisting string of love for children and for wife, Alas! my kite was rent in twain. It lost its crest of wisdom soon and downward plunged as I let it go; How could it hope to fly again, when all its top was torn away? Though fastened with devotion's cord, it came to grief in playing here; Its six opponents (The six passions) worsted it. Now Nareschandra rues this game of smiles and tears, and thinks it better Never to have played at all.

He sang again:

O Mother, for Yasoda Thou wouldst dance, when she called Thee her precious "Blue Jewel":3 Where hast Thou hidden that lovely form, O terrible Syama? Dance that way once for me, O Mother! Throw down Thy sword and take the flute; Cast off Thy garland of heads, and wear Thy wild-flower garland. . . .

As Sri Ramakrishna sang, he left his seat and began to dance. The devotees, too, stood up. Every now and then the Master went into samadhi and the devotees gazed at him intently. Dr. Dukari touched the Master's eyeballs with his finger to test the genuineness of his samadhi. This disgusted the devotees.

इस अद्भुत संकीर्तन और नृत्य के बाद सभी ने आसन ग्रहण किया । इसी समय केशव कुछ ब्राह्म भक्तों के साथ आ उपस्थित हुए । श्रीरामकृष्ण को प्रणाम कर उन्होंने आसन ग्रहण किया ।

राजेन्द्र - (केशव के प्रति) - बड़ा सुन्दर नृत्य-गीत हुआ । ऐसा कहकर उन्होंने श्री त्रैलोक्य से फिर गाना गाने के लिए अनुरोध किया । केशव - (राजेन्द्र के प्रति ) - जब श्रीरामकृष्णदेव बैठ गये हैं, तो कीर्तन किसी भी तरह नहीं जमेगा ।

When the music and dancing were over, the devotees took their seats. Just then Keshab arrived with some of his Brahmo disciples. Rajendra told him about their great joy in the Master's kirtan and requested Trailokya to sing again. Keshab replied, "Since Sri Ramakrishna has taken his seat, the kirtan will sound flat."

Trailokya and the Brahmo devotees sang: Chant, O mind, the name of Hari, Sing aloud the name of Hari, Praise Lord Hari's name!And praising Hari's name, O mind, Cross the ocean of this world. Hari dwells in earth, in water, Hari dwells in fire and air; In sun and moon He dwells. Hari's ever living presence Fills the boundless universe.

এ অদ্ভুত সংকীর্তন ও নৃত্যের পর সকলে আসন গ্রহণ করিলেন। এমন সময় কেশব আরও কয়েকটি ব্রাহ্মভক্ত লইয়া আসিয়া উপস্থিত। ঠাকুরকে প্রণাম করিয়া আসন গ্রহণ করিলেন। রাজেন্দ্র (কেশবের প্রতি) — চমৎকার নৃত্যগীত হল। এই কথা বলিয়া শ্রীযুক্ত ত্রৈলোক্যকে আবার গান গাহিতে অনুরোধ করিলেন। কেশব (রাজেন্দ্রের প্রতি) — যখন পরমহংস মশায় বসেছেন, তখন কোনমতে কীর্তন জমবে না।

গান হইতে লাগিল। ত্রৈলোক্য ও ব্রাহ্মভক্তেরা গান গাহিতে লাগিলেন:

মন একবার হরি বল হরি বল হরি বল।

হরি হরি হরি বলে ভবসিন্ধু পারে চল ॥

জলে হরি, স্থলে হরি, চন্দ্রে হরি, সূর্যে হরি,

অনলে অনিলে হরি, হরিময় এ ভূমণ্ডল ॥

गाना होने लगा । त्रैलोक्य तथा ब्राह्म भक्तगण गाना गाने लगे ।

मन एकबार हरि बोल,  हरि बोल, हरि बोल। 

हरि हरि हरि बोले भवसिन्धु पारे चोल।। 

जले हरि, स्थले हरि , चन्द्रे हरि , सूर्ये हरि।  

अनले अनिल हरि, हरिमय ऐ भूमण्डल।।

गाना - (भावार्थ) –

"मन, एक बार हरि बोलो, हरि बोलो, हरि बोलो । हरि-हरि कहकर भवसागर के पार उतर चलो । जल में, थल में, चन्द्र में, सूर्य में, आग में, वायु में, सभी में हरि का वास है । यह भूमण्डल ही हरिमय है ।"

श्रीरामकृष्ण तथा भक्तों के भोजन के लिए व्यवस्था हो रही है । वे अभी भी आँगन में बैठकर केशव के साथ बातचीत कर रहे हैं । राधाबाजार में फोटोग्राफरों के यहाँ गये थे - यही सब बातें ।

While preparations were being made to give the guests something to eat, Sri Ramakrishna talked with Keshab.

শ্রীরামকৃষ্ণ ও ভক্তদের খাওয়ার জন্য দ্বিতলে উদ্যোগ হইতেছে। এখনও তিনি প্রাঙ্গনে বসিয়া কেশবের সহিত কথা বলিতেছেন। রাধাবাজারের ফটোগ্রাফারদের ওখানে গিয়াছিলেন — সেই সব কথা।

श्रीरामकृष्ण - (केशव के प्रति हँसते हुए) - आज मशीन से फोटो खींचना देख आया । वहाँ पर देखा कि सादे काँच पर फोटो नहीं उतरता, काँच के पीछे काली लगा देते हैं, तब फोटो उतरता है। उसी प्रकार कोई ईश्वर की बातें तो सुनता जा रहा है, पर इससे उसका कुछ नहीं होता, फिर उसी समय भूल जाता है । यदि भीतर प्रेम-भक्तिरूपी काली लगी हुई हो तो उन बातों की धारणा होती है । नहीं तो सुनता है और भूल जाता है ।

MASTER (with a smile): "Today I enjoyed very much the machine by which a man's picture is taken. One thing I noticed was that the impression doesn't stay on a bare piece of glass, but it remains when the glass is stained with a black solution. In the same way, mere hearing of spiritual talk doesn't leave any impression. People forget it soon afterwards. But they can retain spiritual instruction if they are stained inside with earnestness and devotion."

শ্রীরামকৃষ্ণ (কেশবের প্রতি সহাস্যে) — আজ বেশ কলে ছবি তোলা দেখে এলুম। একটি দেখলুম যে শুধু কাচের উপর ছবি থাকে না। কাচের পিঠে একটা কালি মাখিয়ে দেয়, তবে ছবি থাকে। তেমনি ঈশ্বরীয় কথা শুধু শুনে যাচ্ছি; তাতে কিছু হয় না, আবার তৎক্ষণাৎ ভুলে খায়; যদি ভিতরে অনুরাগ ভক্তিরূপ কালি মাখান থাকে তবে সে কথাগুলি ধারণা হয়। নচেৎ শুনে আর ভুলে যায়।

अब श्रीरामकृष्ण दुमँजले पर आये । सुन्दर कालीन के आसन पर उन्हें बैठाया गया । मनोमोहन की माँ श्यामासुन्दरी देवी परोस रही हैं । राम आदि खाते समय वहाँ पर हैं । जिस कमरे में श्रीरामकृष्ण भोजन कर रहे हैं, उस कमरे के सामनेवाले बरामदे में केशव आदि भक्तगण खाने बैठे हैं । बेचु चटर्जी स्ट्रीट के 'श्यामसुन्दर' देवमूर्ति के सेवक श्री शैलजाचरण मुखोपाध्याय भी वहाँ पर उपस्थित हैं ।

The Master was conducted to the second floor of the house and was asked to sit on a beautiful carpet. The ladies waited on him while he ate his meal. Keshab and the other devotees were also sumptuously fed.

এইবার ঠাকুর দ্বিতলায় আসিয়াছেন। সুন্দর কার্পেটের আসনে তাঁহাকে বসান হইল। মনোমোহনের মাতাঠাকুরানী শ্যামাসুন্দরী দেবী পরিবেশন করিতেছেন। মনোমোহন বলিয়াছেন — “আমার স্নেহময়ী জননী সাষ্টাঙ্গ প্রণিপাত করিলেন ও ঠাকুরকে খাওয়াইলেন।” রাম প্রভৃতি খাবার সময় উপস্থিত ছিলেন।

যে ঘরে ঠাকুর খাইতেছেন, সেই ঘরের সম্মুখের দালানে কেশব প্রভৃতি ভক্তরা খাইতে বসিয়াছেন। ওই দিবসে বেচু চাটুজ্যের স্ট্রীটের ৺শ্যামসুন্দর বিগ্রহের সেবক শ্রীশৈলজাচরণ চাটুজ্যে উপস্থিত ছিলেন। ইনি কয়েকমাস হইল পরলোকগত হইয়াছেন।

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परम श्रद्धेय स्वामीजी श्रीरामसुखदासजी महाराज का प्रवचन: (दिनांक— 23.5.1994, प्रातः 5.18 बजे। स्थान— गीताभवन, ऋषिकेश)

जीव मात्र की किसी- न- किसी का सहारा, आश्रय लेने की स्वाभाविक ही प्रवृत्ति रहती है; जीवात्मा प्रकृति से संबंध जोड़कर नाशवान् प्राणी- पदार्थों का आश्रय लेता है, जो कि टिकने वाला नहीं है। जीवात्मा यदि भगवान् (अवतार वरिष्ठ) का आश्रय ले ले, तो फिर किसी दूसरे का आश्रय लेना ही नहीं पड़े। आश्रय नित्य का लेना चाहिए, जो कभी छूटे नहीं।  जो दुःख अभी आया नहीं है, भविष्य में आने वाला है, उस वृद्धावस्था और मृत्यु रूपी दुःख से छूटने का उपाय मनुष्यों को करना चाहिए।

गंगा जमुना सरस्वती सात सिंधु भरपूर।

 तुलसी चातक के मते बिन स्वाती सब धूर॥१४॥

एक भरोसो, एक बल, एक आस, विश्वास।

स्वाति-सलिल रघुनाथ-जस, चातक तुलसीदास ॥१५।। 

(एक राम घन स्याम हित चातक तुलसीदास॥)

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श्रीरामकृष्ण उपदेश :

1 . "सामान्य आदमी झोला भरकर धर्म की बातें करता है किन्तु खुद के व्यवहार में एक दाना बराबर नहीं लाता। एक बुद्धिमान व्यक्ति बातें बहुत थोड़ी करता है जबकि उसका पूरा जीवन धर्म के वास्तविक व्यवहार का प्रदर्शन होता है।"

2.  छोटे बच्चे कमरे में गुड़ियों से खेलते रहते हैं, बिना किसी डर या बंधन के। परंतु जैसे ही उनकी मां कमरे में प्रवेश करती है, वे गुड़ियों को फेंककर मां-मां चिल्लाते हुए उसकी ओर भागते हैं। तुम भी सांसारिक जगत में खेल रहे हो, धन, मान, प्रसिद्धि आदि की गुड़ियों से आकर्षित होकर। लेकिन अगर तुम एक बार अपनी जगत माता -(ठाकुरदेव-सच्चिदानंद ) को देख लो, उसके बाद तुमको सांसारिक वस्तु में आनंद नहीं आएगा। तुम सब कुछ एक तरफ फेंककर, उनकी ओर भागोगे। 

3. भगवान तो सबके मन में हैं लेकिन सबका मन भगवान में नहीं लगा है। इसीलिए, हम कष्ट और दुर्गति भोगते हैं। (अहं,कर्ता'-पन या 'मैं'-पन के पीछे की सच्चाई-आत्मा या ईश्वर ही हैं। और ये 'अहं' जायेगा नहीं, तो रहे दास बनकर !) 

4. ईश्वर सब जगह है परन्तु वह मनुष्य में सबसे अधिक प्रकट होता है। इसलिए, मनुष्य की भगवान की तरह सेवा करो, जो भगवान की पूजा करने जितना ही अच्छा है।

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*साभार ~ @Subhash Jain*

जब तक तुम्हारा कर्ता का भाव न छूट जाए, और साक्षी भाव में स्थित न हो जाओ -  तब तक तुम (accident के समय) परमात्मा को स्मरण न कर सकोगे; या परमात्मा का स्मरण कर लो तो कर्ता का भाव छूट जाए। कर्ता के भाव में ही हमारा अहंकार है। कर्ता का भाव ही हमारे अहंकार का शरण स्थल है–यह करूं वह करूं, यह कर लिया वह कर लिया, यह करना है वह करना है। प्रार्थना की नहीं जाती, प्रार्थना होती है–वैसे ही जैसे 'प्रेम' या 'ध्यान -समाधि' होती है। प्रेम कोई करता है, कर सकता है ? कोई तुम्हें आज्ञा दे कि करो प्रेम, जैसे सैनिकों को आज्ञा दी जाती है बाएं घूम दाएं, घूम, ऐसे आज्ञा दे दी जाए करो प्रेम। दाएं-बाएं घूमना हो जाएगा, देह की क्रियाएं हैं; अगर प्रेम ? प्रेम तो कोई क्रिया ही नहीं है, कृत्य ही नहीं है। प्रेम (ध्यान-समाधि) तो भेंट है विराट की ओर से। प्रेम तो अनंत की ओर से भेंट है। उन्हें मिलती है जो अपने हृदय के द्वार को खोलकर प्रतीक्षा करते हैं।