⚜️ परिच्छेद- ५⚜️
* सिमुलिया ब्राह्मसमाज में श्रीरामकृष्ण*
(१)
[(1 जनवरी, 1882 ई.) श्री रामकृष्ण वचनामृत : परिच्छेद -5]
🔱⚜️ इँदेश के गौरी पण्डित, राम, केशव, नरेन्द्र आदि के संग में⚜️ 🔱
आज श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ सिमुलिया ब्राह्मसमाज के वार्षिक महोत्सव में पधारे हैं । ज्ञान चौधरी के मकान में महोत्सव हो रहा है । १ जनवरी १८८२ ई., रविवार, शाम के पाँच बजे का समय । राम, मनोमोहन, बलराम, राजमोहन, ज्ञान चौधरी, केदार, कालिदास सरकार, कालिदास मुखोपाध्याय, नरेन्द्र, राखाल आदि अनेक भक्त उपस्थित हैं । नरेन्द्र ने, केवल थोड़े ही दिन हुए, राम आदि के साथ जाकर दक्षिणेश्वर में श्रीरामकृष्ण का दर्शन किया है । आज भी इस उत्सव में वे सम्मिलित हुए हैं । वे बीच-बीच में सिमुलिया ब्राह्मसमाज में आते थे और वहाँ पर भजन-गाना और उपासना करते थे ।
[Sri Ramakrishna arrived with his devotees at the house of Jnan Choudhury, in Calcutta, to join the annual festival of the Simla Brahmo Samaj. Keshab, Ram, Manomohan, Balaram, Kedar, Narendra, Rakhal, and other devotees were present. Narendra had met the Master only a few days before at the temple garden at Dakshineswar. He used to participate now and then in the worship of the Simla Brahmo Samaj and sing for the congregation.
আজ শ্রীরামকৃষ্ণ সিমুলিয়া ব্রাহ্মসমাজের সাংবাৎসরিক মহোৎসবে ভক্তসঙ্গে আসিয়াছেন। জ্ঞান চৌধুরীর বাড়িতে মহোৎসব হইতেছে। ১লা জানুয়ারি, ১৮৮২ খ্রীষ্টাব্দ, রবিবার, বেলা ৫টা হইবে। (১৮ই পৌষ, ১২৮৮) শ্রীযুক্ত কেশব সেন, রাম, মনোমোহন, বলরাম, ব্রাহ্মভক্ত রাজমোহন, জ্ঞান চৌধুরী, কেদার, ব্রাহ্মভক্ত কান্তিবাবু, কালিদাস সরকার, কালিদাস মুখোপাধ্যায়, নরেন্দ্র, রাখাল প্রভৃতি অনেক ভক্ত উপস্থিত। নরেন্দ্র, রাম প্রভৃতির সঙ্গে গিয়া কেবল কয়দিন মাত্র হইল ঠাকুরকে দক্ষিণেশ্বরে দর্শন করিয়াছেন। আজও এই উৎসবে যোগদান করিয়াছেন। তিনি সিমুলিয়া ব্রাহ্মসমাজে মধ্যে মধ্যে আসিতেন ও সেখানে গান ও উপাসনা করিতেন।
ब्राह्मसमाज की पद्धति के अनुसार उपासना होगी । पहले कुछ पाठ हुआ । नरेन्द्र गा सकते हैं । उनसे गाने के लिए अनुरोध करने पर उन्होंने भी गाना गाया । सन्ध्या हुई । इँदेश के गौरी पण्डित गेरुआ वस्त्र पहने ब्रह्मचारी के भेष में आकर उपस्थित हुए ।
गौरी - कहाँ हैं श्रीरामकृष्णदेव ?
ব্রাহ্মসমাজের পদ্ধতি অনুসারে উপাসনা হইবে। প্রথমে কিছু পাঠ হইল। নরেন্দ্র গাইতে পারেন, তাঁহাকে গান গাইতে অনুরোধ করাতে তিনিও গান গাহিলেন।সন্ধ্যা হইল। ইঁদেশের গৌরী পণ্ডিত গেরুয়াপরা ব্রহ্মচারীবেশে আসিয়া উপস্থিত।
গৌরী — কোথা গো পরমহংস বাবু?
The worship was arranged according to the usual custom of the Samaj. First the scripture was read; then Narendra sang. It was dusk. The devotees made merry.
[ गौरी पंडित (गौरी कांत भट्टाचार्य :Gauri Kant Bhattacharya) — बांकुड़ा जिले के इँदेश ग्राम के निवासी थे। एक गुणी तांत्रिक साधक थे, उनके पास कुछ सिद्धियाँ थीं। ठाकुर देव से उनकी पहली मुलाकात 1865 ई. में दक्षिणेश्वर में हुई थी। शास्त्रीय प्रमाणों के आधार पर श्री श्री ठाकुर की आध्यात्मिक अवस्था (spiritual status) निर्धारित करने के लिए मथुरबाबू ने दक्षिणेश्वर में एक पण्डित सभा बुलाई थी। उस पण्डित सभा में गौरी पण्डित ने समय 1870 ई. में श्री श्री ठाकुर देव को समस्त अवतारों का मूल (Origin of Incarnations आद्या- शक्ति, या आदिशक्ति) घोषित कर दिया था। श्री श्री ठाकुर का सानिध्य प्राप्त होने के बाद दिन-प्रतिदिन उनका मन जो पहले विद्व्ता या पाण्डित्य के प्रदर्शन (scholarship) करके लोक-सम्मान पाने के लिए सीद्धियों में आसक्त रहता था, उन सभी चीजों से विरक्त होकर भगवान के चरण कमलों की ओर मुड़ गया। गौरी पण्डित दिन-प्रतिदिन ठाकुर देव की आध्यात्मिक उपलब्धि पर मोहित होते होते, उनके परम् भक्त में रूपांतरित हो गए। ठाकुर की दिव्य संगति से प्रभावित होकर क्रमशः सीद्धियों से उन्हें तीव्र वैराग्य हो गया। एक दिन, आँखों में आँसू भरकर, उन्होंने श्री श्री ठाकुर से विदाई लेने की आज्ञा माँगी, और हमेशा के लिए उन्होंने अपने घर का त्याग कर दिया। उस दिन के बाद बहुत खोजबीन करने पर भी, गौरी पंडित को कभी कोई देख नहीं पाया।
গৌরী পণ্ডিত (গৌরীকান্ত ভট্টাচার্য) — বাঁকুড়া জেলার ইন্দাস গ্রামের বাসিন্দা। বীরাচারী তান্ত্রিক সাধক, তাঁহার কিছু সিদ্ধাই ছিল। ১৮৬৫ খ্রীষ্টাব্দে দক্ষিণেশ্বরে ঠাকুরের সঙ্গে তাঁহার প্রথম সাক্ষাৎ হয়। শাস্ত্রীয় প্রমাণের ভিত্তিতে শ্রীশ্রীঠাকুরের আধ্যাত্মিক অবস্থা নির্ধারণের উদ্দেশ্যে মথুরবাবু দক্ষিণেশ্বরে একটি সভা আহ্বান করেন। এই সময়ে গৌরী পণ্ডিত ঠাকুরকে অবতারগণের উৎসস্থল বলিয়া ঘোষণা করেন (১৮৭০)। শ্রীশ্রীঠাকুরের সান্নিধ্যে দিন দিন তাঁহার মন পাণ্ডিত্য, লোকমান্য, সিদ্ধাই প্রভৃতি সকল বস্তুর প্রতি বীতরাগ হইয়া ঈশ্বরের শ্রীপাদপদ্ম অভিমুখী হইতে থাকে। গৌরী দিন দিন ঠাকুরের ভাবে মোহিত হইয়া তাঁহার সম্পূর্ণ অনুরাগী হইয়াছিলেন। ধীরে ধীরে ঠাকুরের দিব্যসঙ্গলাভে তাঁহার তীব্র বৈরাগ্য হয়। একদা তিনি সজল নয়নে শ্রীশ্রীঠাকুরের নিকট বিদায় গ্রহন করিয়া চিরতরে গৃহত্যাগ করেন। বহু অনুসন্ধানেও ইহার পর গৌরী পণ্ডিতের সাক্ষাৎ পাওয়া যায় নাই।]
[(1 जनवरी, 1882 ई.) श्री रामकृष्ण वचनामृत : परिच्छेद -5]
⚜️🔱मन को अपने वश में रखना हो तो साधु-संग आवश्यक है !⚜️ 🔱
[लोहा को लाल रखने के लिए समय-समय पर इसे लुहार की भट्टी में गर्म करना पड़ता है !]
थोड़ी देर बाद श्री केशव सेन ब्राह्म भक्तों के साथ आ पहुँचे और उन्होंने भूमिष्ठ होकर श्रीरामकृष्ण को प्रणाम किया । सभी लोग बरामदे में बैठे हैं; आपस में आनन्द कर रहे हैं । चारों ओर गृहस्थ भक्तों को बैठे देखकर श्रीरामकृष्ण हँसते हुए कह रहे हैं - “गृहस्थी में धर्म होगा क्यों नहीं ? पर बात क्या है जानते हो ? मन अपने पास नहीं है । अपने पास मन हो तब तो ईश्वर को देगा ! मन को तो बन्धक रख दिया है, कामिनी-कांचन' के पास गिरवी (mortgaged) रख दिया है। इसीलिए तो सदा साधु-संग आवश्यक है।
কিয়ৎক্ষণ পরে কেশব ব্রাহ্মভক্তগণ সঙ্গে আসিয়া পৌঁছিলেন ও ভূমিষ্ঠ হইয়া শ্রীরামকৃষ্ণকে প্রণাম করিলেন। সকলেই দালানের উপর উপবিষ্ট; পরস্পর আনন্দ করিতেছেন। চর্তুদিকে সংসারী ভক্তগণকে উপবিষ্ট দেখিয়া ঠাকুর হাসিতে হাসিতে বলিতেছেন। শ্রীরামকৃষ্ণ (সহাস্যে) — তা সংসারে হবে না কেন? তবে কি জান, মন নিজের কাছে নাই। নিজের কাছে মন থাকলে তবে তো ভগবানকে দেবে। মন বন্ধক দিয়েছ; কামিনী-কাঞ্চনে বন্ধক! তাই সর্বদা সাধুসঙ্গ দরকার।
The Master looked at the householder devotees seated around him and said with a smile: "Why shouldn't it be possible for a householder to give his mind to God? But the truth is that he no longer has his mind with him. If he had it, then he could certainly offer it to God. But, alas, the mind has been mortgaged — mortgaged to 'woman and gold'. So it is necessary for him constantly to live in the company of holy men.
“मन अपने पास आने पर तब साधन-भजन होगा । सदा ही गुरु का संग, गुरु की सेवा, साधु-संग आवश्यक है । या तो एकान्त में दिन-रात उनका चिन्तन किया जाय और नहीं तो साधु-संग । मन अकेला रहने से धीरे धीरे सूख जाता है । जैसे एक बर्तन में यदि अलग जल रखो तो धीरे धीरे सूख जायगा, परन्तु गंगा के भीतर यदि उस बर्तन को डुबोकर रखो तो नहीं सूखेगा ।
When he gets back his own mind, then he can devote it to spiritual practice; but first it is necessary to live constantly with the guru, wait on him, and enjoy the company of spiritual people. Either he should think of God in solitude day and night, or he should live with holy men. The mind left to itself gradually dries up. Take a jar of water, for instance. If the jar is set aside, the water dries up little by little. But that will not happen if the jar is kept immersed in the Ganges.
“মন নিজের কাছে এলে তবে সাধন-ভজন হবে। সর্বদাই গুরুর সঙ্গ, গুরুসেবা, সাধুসঙ্গ প্রয়োজন। হয় নির্জনে রাতদিন তাঁর চিন্তা, নয় সাধুসঙ্গ। মন একলা থাকলে ক্রমে শুষ্ক হয়ে যায়।“এক ভাঁড় জল যদি আলাদা রেখে দাও, ক্রমে শুকিয়ে যাবে! কিন্তু গঙ্গাজলের ভিতর যদি ওই ভাঁড় ডুবিয়ে রাখো, তাহলে শুকবে না!
"लुहार की दुकान में लोहा आग में रखने से अच्छा लाल हो जाता है । अलग रख दो तो फिर काले का काला । इसलिए लोहे को बीच-बीच में आग में डालना चाहिए ।
"The iron becomes red in the furnace of a smithy. Take it out and it becomes black as before. Therefore the iron must be heated in the furnace every now and then.
“কামারশালার লোহা আগুনে বেশ লাল হয়ে গেল। আবার আলাদা করে রাখো, যেমন কালো লোহা, তেমনি কালো। তাই লোহাকে মধ্যে মধ্যে হাপরে দিতে হয়।
[(1 जनवरी, 1882 ई.) श्री रामकृष्ण वचनामृत : परिच्छेद -5]
⚜️🔱What is ignorance? बेहोशी, अज्ञान, अचेतनता किसे कहते हैं ?⚜️🔱
[অচেতনতা কাকে বলে?]
“ 'मैं करनेवाला हूँ, मैं कर रहा हूँ तभी गृहस्थी चल रही है, मेरा घर, मेरा कुटुम्ब’ - यह सब अज्ञान है । पर ‘मैं प्रभु का दास, उनका भक्त, उनकी सन्तान हूँ’ - यह बहुत अच्छा है ।
Do you know what ignorance means? It is the feeling: This is my house; these are my relatives; I am the doer; and the household affairs go on smoothly because I manage them.' But to feel, 'I am the servant of God, His devotee, His son' — that is a good attitude.
“আমি কর্তা, আমি করছি তবে সংসার চলছে; আমার গৃহ পরিজন — এ সকল অজ্ঞান! আমি তাঁর দাস, তাঁর ভক্ত, তাঁর সন্তান — এ খুব ভাল।
["क्या तुम जानते हो कि - अज्ञान (ignorance अचेतनता) का क्या अर्थ है? "क्या तुम जानते हो कि ठाकुर देव यह आशीर्वाद क्यों देते थे कि "तुम्हें चैतन्य हो "? यानि तुम जाग जाओ , होश में आ जाओ ? उपनिषद की वाणी में स्वामीजी क्यों कहते थे - उठो, जागो ! और लक्ष्य प्राप्त किये बिना विश्राम मत लो ? यह जो 'coma' में रहना, अचेतन अवस्था में रहना ,मोह ग्रस्त रहना , जाग कर भी सोये रहने की अवस्था आदि एक प्रकार की मनोभावना (attitude या नजरिया) का उपमा (simile) है, जिसमें बेहोसी के हालत में व्यक्ति कहता है - मैं अपने परिवार का मुखिया हूँ -मैं कर्ता हूँ ! मैं बिजनेस खड़ा करने वाला हूँ, मैं अच्छे से बिजनेस कर रहा हूँ, तभी मेरी गृहस्थी चल रही है, यह मेरा घर है, ये मेरे कुटुम्ब परिवार हैं ! यह सब अज्ञान है। पर यह धारणा बना लेन कि 'मैं प्रभु का दास, उनका भक्त, उनकी सन्तान हूँ ' ऐसा मनोभाव रहना बहुत अच्छा-है!]
“ 'मैं' - पन एकदम नहीं जाता । अभी विचार करके उसे भले ही उड़ा दो, पर दूसरे क्षण वह कहीं से फिर आ जाता है । जैसे कटा हुआ बकरा - सिर कटने पर भी म्याँ म्याँ - करके मिमियाता हाथ-पैर हिलाता रहता है ।
"The 'I' cannot be effaced altogether. You may explain it away through reasoning, but the next moment it reappears, nobody knows from where. It is like a goat that still bleats faintly and jerks its legs even after its head has been cut off.
“একেবারে আমি যায় না। এই বিচার করে উড়িয়ে দিচ্ছ, আবার কাটা ছাগল যেমন একটু ভ্যা ভ্যা করে হাত পা নাড়ে, সেই রকম কোথা থেকে আমি এসে পড়ে।
⚜️⚜️ उनके दर्शन के बाद वे जिस 'मैं' को रख देते हैं, उसे कहते हैं 'पक्का मैं'⚜️⚜️
“তাঁকে দর্শন করবার পর, 'তিনি' যে 'আমি' রেখে দেন, তাকে বলে পাকা আমি।"
The 'I' that God retains in His devotee after he has seen Him
is called the 'Ripe I'.
"उनके दर्शन के बाद वे जिस 'मैं' को रख देते हैं, उसे कहते हैं 'पक्का मैं'। - जिस प्रकार तलवार पारसमणि को छूकर सोना बन गयी है । उसके द्वारा अब और हिंसा का काम नहीं होता।"
“তাঁকে দর্শন করবার পর, তিনি যে আমি রেখে দেন, তাকে বলে পাকা আমি।- “যেমন তরবার পরশমণি ছুঁয়েছে, সোনা হয়ে গিয়েছে। তার দ্বারা আর হিংসার কাজ হয় না!”
"But the 'I' that God retains in His devotee after he has seen Him is called the 'ripe I'. It is like a sword turned into gold by touching the philosopher's stone; you cannot hurt anybody with it."
[कच्चा 'मैं' या यह अहंकार क्या है ? भूतकाल की स्मृतियों और भविष्य की आशाओं की गठरी। What is this ego? A bundle of memories of the past and hopes of the future."भगवान (सच्चिदानन्द -ठाकुर देव, जगतजननी माँ सारदा, स्वामीजी) उनके दर्शन के बाद (समाधि के बाद-व्युत्थान में) भक्त में जिस 'मैं' को रख देते हैं, उसे कहते हैं 'पक्का मैं'। यह जो 'पक्का मैं' है उस तलवार के समान है, जो पारसमणि (philosopher's stone-पारस पत्थर) को छूकर सोना बन गयी है। उसके द्वारा अब और हिंसा का काम नहीं होता। [हनुमान जी की तरह "देहबुद्ध्या दासोऽहं" में स्थित 'में' ही -'परिपक्व में' है, उसके द्वारा अब और क्रोधपूर्वक हिंसा का काम नहीं होता। लंकादहन ? लीला पुष्टि के लिए था -हनुमान जी को क्रोध नहीं हुआ था।]
श्रीरामकृष्ण उपासना-मन्दिर में बैठकर यही सब बातें कह रहे हैं, केशव आदि भक्तगण निस्तब्ध होकर सुन रहे हैं । रात के ८ बजे का समय है । तीन बार घण्टी (Warning bell) बजी , जिससे उपासना प्रारम्भ हो ।
শ্রীরামকৃষ্ণ ঠাকুরদালানের উপর বসিয়া সকল কথা কহিতেছেন। কেশব প্রভৃতি ভক্তগণ নিস্তব্ধ হইয়া শুনিতেছেন। রাত ৮টা হইয়াছে। তিনবার ঘন্টা (Warning bell) বাজিল, যাহাতে উপাসনা আরম্ভ হয়।
Thus the Master talked, seated in the worship hall, and Keshab and the other devotees listened with rapt attention. It was about eight o'clock in the evening. The bell rang three times for the worship.
श्रीरामकृष्ण - (केशव आदि के प्रति) - यह क्या ? तुम लोगों की उपासना नहीं हो रही है ।
MASTER (to Keshab and the others): "What's this? I see you haven't yet begun your regular worship."
শ্রীরামকৃষ্ণ (কেশব প্রভৃতির প্রতি) — এ কি! তোমাদের উপাসনা হচ্ছে না!
केशव - और उपासना की क्या आवश्यकता ? यही तो सब हो रहा है ।
কেশব — আর উপাসনা কি হবে? এই তো সব হচ্ছে।
KESHAB: "What further worship do we need? We are having all this."
श्रीरामकृष्ण - नहीं जी, जैसी पद्धति है, उसी प्रकार हो ।
শ্রীরামকৃষ্ণ — না গো, যেমন পদ্ধতি সেইরকম হক।
MASTER: "Oh no, my dear sir! Let the worship be performed according to your custom."
केशव - क्यों, यही तो अच्छा हो रहा है ।
কেশব — কেন এই তো বেশ হচ্ছে।
KESHAB: "Why? We are getting on very well."
श्रीरामकृष्ण के अनेक बार कहने पर केशव ने उठकर उपासना प्रारम्भ की ।
শ্রীরামকৃষ্ণ অনেক বলাতে কেশব উঠিয়া উপাসনা আরম্ভ করিলেন।
उपासना के बीच में श्रीरामकृष्ण एकाएक खड़े होकर समाधिमग्न हो गये । ब्राह्म भक्तगण गाना गा रहे हैं -
मन एकबार हरि बोल, हरि बोल , हरि बोल !
हरि हरि हरि बोले भवसिन्धु पारे चोल।।
जले हरि स्थले हरि, अनले अनिले हरि।
चन्द्रे हरि, सूर्ये हरि , हरिमय एई भूमण्डल।।
উপাসনা মধ্যে ঠাকুর হঠাৎ দণ্ডায়মান — সমাধিস্থ হইয়াছেন। ব্রাহ্মভক্তগণ গান গাহিতেছেন:
মন একবার হরি বল হরি বল হরি বল।
হরি হরি হরি বলে ভবসিন্ধু পারে চল ॥
জলে হরি স্থলে হরি, অনলে অনিলে হরি।
চন্দ্রে হরি, সূর্যে হরি, হরিময় এই ভূমণ্ডল ॥
At the Master's repeated request Keshab began the worship. In the midst of it Sri Ramakrishna suddenly stood up and went into samadhi. The Brahmo devotees sang: " Chant, O mind, the name of Hari, Sing aloud the name of Hari, Praise Lord Hari's name! And praising Hari's name, O mind, Cross the ocean of this world. . .
श्रीरामकृष्ण अभी भी भावमग्न होकर खड़े हैं । केशव ने बड़ी सावधानी से उनका हाथ पकड़कर उन्हें मन्दिर में से आँगन पर उतारा ।
শ্রীরামকৃষ্ণ এখনও ভাবস্থ হইয়া দণ্ডায়ামন। কেশব অতি সন্তর্পণে তাঁহার হাত ধরিয়া দালান হইতে প্রাঙ্গণে নামিলেন।
The Master still stood there absorbed in ecstasy. Keshab led him down very carefully from the. temple to the courtyard. The music went on. The Master danced to the music, the devotees dancing around him.
गाना चल रहा है । अब श्रीरामकृष्ण गाने के साथ नृत्य कर रहे हैं । चारों ओर भक्तगण भी नाच रहे हैं ।
গান চলিতেছে। এইবার ঠাকুর গানের সঙ্গে নৃত্য করিতেছেন। চতুর্দিকে ভক্তগণও নাচিতেছেন।
ज्ञानबाबू के दुमँजले के कमरे में श्रीरामकृष्ण तथा केशव आदि के जलपान की व्यवस्था हो रही है। वे जलपान करके फिर नीचे उतरकर बैठे । श्रीरामकृष्ण बातें करते करते फिर गाना गा रहे हैं । साथ में केशव भी गा रहे हैं ।
१
मोजलो आमार मन भ्र्मरा श्यामापदे नील कमले।
जतो विषय मधु तुच्छ होलो कामादि कुसुम सकले।।
२
श्यामापद आकाशते मन घुड़ि खान उड़ितेछिलो।
कलुषेर कूबातास खेये गोप्ता खेये पड़े गेलो।।
गाना (भावार्थ) –
"मेरा मनरूपी भ्रमर श्यामा के चरणरूपी नील कमलों में मग्न हो गया । कामादि कुसुमों का विषयरूपी मधु उसके सामने फीका पड़ गया । .....”
“श्यामा के चरणरूपी आकाश में मेरा मनरूपी पतंग उड़ रहा था । पाप की जोरदार हवा से धक्का खाकर उल्टा होकर गिर गया ।...”
জ্ঞানবাবুর দ্বিতলের ঘরে শ্রীরামকৃষ্ণ, কেশব প্রভৃতিকে জল খাওয়াবার আয়োজন হইতেছে।তঁহারা জলযোগ করিয়া আবার নিচে নামিয়া বসিলেন। ঠাকুর কথা কহিতে কহিতে আবার গান গাহিতেছেন। কেশবও সেই সঙ্গে যোগ দিয়াছেন —
মজলো আমার মন ভ্রমরা শ্যামাপদ নীল কমলে।
যত বিষয় মধু তুচ্ছ হল কামাদি কুসুম সকলে ॥
গান — শ্যামাপদ আকাশেতে মন ঘুড়ি খান উড়িতেছিল।
কলুষের কুবাতাস খেয়ে গোপ্তা খেয়ে পড়ে গেল ॥
After the refreshments Sri Ramakrishna again talked with Keshab. Soon he began to sing. Keshab sang with the Master:
The black bee of my mind is drawn in sheer delight To the blue lotus flower of Mother Syama's feet, The blue flower of the feet of Kali, Siva's Consort; Tasteless, to the bee, are the blossoms of desire. My Mother's feet are black, and black, too, is the bee; Black is made one- with black! This much of the mystery My mortal eyes behold, then hastily retreat. But Kamalakanta's hopes are answered in the end; He swims in the Sea of Bliss, unmoved by joy or pain.
Again they sang: High in the heaven of the Mother's feet, my mind was soaring like a kite, When came a blast of sin's rough wind that drove it swiftly toward the earth. . . .
[(1 जनवरी, 1882 ई.) श्री रामकृष्ण वचनामृत : परिच्छेद -5]
⚜️भगवान जिसे बड़ा बनाते हैं, जंगल में रहने पर भी उसे सभी लोग जान सकते हैं⚜️
श्रीरामकृष्ण और केशव दोनों ही मतवाले बन गये । फिर सब लोग मिलकर गाना और नृत्य करने लगे । आधी रात तक यह कार्यक्रम चलता रहा ।
Both Keshab and the Master were in a state of divine fervour. The other devotees joined them and sang and danced till midnight.
ঠাকুর কেশব দুজনেই মাতিয়া গেলেন। আবার সকলে মিলিয়া গান ও নৃত্য, রাত্রি দ্বিপ্রহর পর্যন্ত।
थोड़ी देर विश्राम करके श्रीरामकृष्णदेव केशव से कह रहे हैं, "अपने लड़के के विवाह की सौगात क्यों भेजी थी ? वापस मँगवा लेना । उन चीजों को लेकर मैं क्या करूँगा ?"
The Master rested a few minutes and then said to Keshab: "Why did you send me presents when your son was married? What shall I do with them? Take them back."
একটু বিশ্রাম করিয়া ঠাকুর কেশবকে বলিতেছেন — তোমার ছেলের বিবাহের বিদায় পাঠিয়েছিলে কেন? ফেরত এনো — আমি ও-সব নিয়ে কি করব?
केशव मुस्करा रहे हैं । श्रीरामकृष्ण फिर कह रहे हैं - "मेरा नाम समाचार-पत्रों में क्यों निकालते हो ? पुस्तकों या संवादपत्रों में लिखकर किसी को बड़ा नहीं बनाया जा सकता । भगवान जिसे बड़ा बनाते हैं, जंगल में रहने पर भी उसे सभी लोग जान सकते हैं ।
Keshab smiled a little, and the Master continued: "Why do you write about me in your paper? You cannot make a man great by writing about him in books and magazines. If God makes a man great, then everybody knows about him even though he lives in a forest.
কেশব ঈষৎ হাসিতেছেন। ঠাকুর আবার বলিতেছেন — আমার নাম কাগজে প্রকাশ কর কেন? বই লিখে, খবরের কাগজে লিখে, কারুকে বড়ো করা যায় না। ভগবান যাকে বড় করেন, বনে থাকলেও তাকে সকলে জানতে পারে।
घने जंगल में फूल खिला है, भौंरा इसका पता लगा ही लेता है, पर दूसरी मक्खियाँ पता नहीं पातीं। मनुष्य क्या कर सकता है ? उसके मुँह की और न ताको । मनुष्य तो एक कीड़ा है । जिस मुँह से आज अच्छा कह रहा है, उसी मुँह से कल बुरा कहेगा । मैं प्रसिद्धि नहीं चाहता । मैं तो चाहता हूँ कि दीन से दीन, हीन से हीन बनकर रहूँ ।"
গভীরবনে ফুল ফুটেছে, মৌমাছি কিন্তু সন্ধান করে যায়। অন্য মাছি সন্ধান পায় না। মানুষ কি করবে? মানুষের মুখ চেয়ো না — লোক! পোক! যে মুখে ভাল বলছে, সেই মুখে আবার মন্দ বলবে। আমি মান্যগণ্য হতে চাই না। যেন দীনের দীন, হীনের হীন হয়ে থাকি।
When flowers bloom in the deep woods, the bees find them, but the flies do not. What can man do? Don't look up to him. Man is but a worm. The tongue that praises you today will abuse you tomorrow. I don't want name and fame. May I always remain the humblest of the humble and the lowliest of the lowly!"
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तान्त्रिक साधक गौरी पण्डित [लीलाप्रसंग खंड-2, पेज-275]
श्रीरामकृष्णदेव के श्रीमुख से हमने सुना है कि - "गौरी पण्डित प्रतिवर्ष श्रीदुर्गापूजन के समय जगदम्बा के पूजन का विधिवत आयोजन करते थे तथा अपनी गृहणी को वस्त्र-आभूषण द्वारा विभूषित करने के पश्चात् सुसज्जित आसन पर बैठाकर जगदम्बा-बुद्धि से तीन दिन तक भक्तिपूर्वक उनका पूजन किया करते थे। "
तंत्र की शिक्षा है कि जितनी भी नारियाँ हैं, वे सभी साक्षात् जगदम्बा की मूर्ति हैं, सभी के भीतर जगन्माता की जगत्पालिनी तथा आनन्ददायिनी शक्ति का विशेष प्रकाश है। इसलिए मनुष्य को पवित्रभाव से नारी मात्र का ही पूजन करना चाहिए। नारी-मूर्ति के भीतर जगन्माता स्वयं विद्यमान हैं। इस बात का ध्यान न रखते हुए केवल भोग्यवस्तु समझकर सकाम भाव से स्त्री-शरीर को देखने से जगन्माता की ही अवहेलना होती है, तथा उससे मानव का बहुत अकल्याण होता है। दुर्गासप्तशती में देवता लोग समस्त विद्याओं की और समस्त स्त्रियों के प्रति मातृभाव की प्राप्ति के लिये देवी की स्तुति करते हुए कहते हैं -
विद्याः समस्तास्तव देवि भेदाः, स्त्रियः समस्ताः सकला जगत्सु।
त्वयैकया पूरितमम्बयैतत् ,का ते स्तुतिः स्तव्यपरा परोक्तिः।।
- हे देवी तुम्हीं ज्ञानरूपिणी हो; संसार में जितनी भी ऊँची -नीची विद्यायें हैं -जिनके द्वारा लोगों में नाना प्रकार के ज्ञान का उदय हो रहा है - वे सब कुछ तुम्हीं हो, 'तत्' रूप में तुम्हीं प्रकाशित हो। तुम्हीं स्वयं जगत की समस्त नारियों के रूप में विद्यमान हो। अकेली तुम्हीं समग्र जगत को पूर्ण करके उसमें सर्वत्र विराजमान हो। तुम अतुलनीय तथा वाक्य/वाणी से अतीत हो- स्तव के द्वारा तुम्हारे अनंत गुणों का उल्लेख करने में कौन कब समर्थ हुआ है , या आगे भी कोई हो सकेगा ? भारत में सर्वत्र हममें से अनेक व्यक्ति इस स्तव का पाठ करते हैं, किन्तु देवी बुद्धि से नारी-शरीर का अवलोकन कर कितने लोग कहाँ तक उन्हें इस प्रकार का यथार्थ सम्मान प्रदान करते हैं तथा अपने ह्रदय में विशुद्ध आनन्द का अनुभव कर कृतार्थ बनने का प्रयास करते हैं ? जगन्माता के विशेष-प्रकाश की आधारस्वरूपा नारी-मूर्ति को हीनबुद्धि से कलुषित नेत्रों द्वारा देखकर ऐसा कौन है जो कि दिन भर में शत-सहस्र बार उनकी अवहेलना नहीं करता ? हा भारत, इस प्रकार की पशु-बुद्धि से नारी -शरीर का अपमान करने तथा शिव-बुद्धि से जीव-सेवा को विस्मृत करने के कारण ही तुम्हारी इस समय इस प्रकार की दुर्दशा हुई है। जगदम्बा कृपाकर तुम्हारी इस पशुबुद्धि को पुनः कब दूर करेंगी, यह वे ही जानें।
श्रीरामकृष्णदेव के सम्बन्ध में गौरी पण्डित की अवधारणा (पेज 278) : गौरी पण्डित के हृदयगत भावों को जानने के लिए श्रीरामकृष्ण देव ने उनसे पूछा था -" अच्छा , (अपने शरीर को दिखाकर) वैषणवचरण इसे अवतार कहता है, क्या यह सम्भव है ? तुम्हें क्या प्रतीत होता है ?
यह सुनकर गंभीर हो गौरी पण्डित ने उत्तर दिया -" वैषणवचरण आपको अवतार कहा करता है, यह तो अत्यन्त साधारण बात है। मेरी तो धारणा यह है कि जिनके अंश से युग-युग में अवतार लोग लोक-कल्याण के निमित्त संसार में अवतीर्ण हुआ करते हैं , तथा जिनकी शक्ति से वे उस कार्य को सम्पन्न करते हैं, आप वे ही हैं !"
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Q > किसके अंश से अवतारवर्ग युग युग में लोक-कल्याण साधन के निमित्त संसार में अवतीर्ण हुआ करते हैं ?
श्री परम पिता परमात्मा का दिव्य पुरुष रूप जिसे श्री नारायण कहते हैं अनेक अवतारों का अक्षय कोष हैं । इन्ही से सारे अवतार प्रकट होते हैं। जैसे अगाध सरोवर से असंख्य जलवहिनी निकलती हैं वैसे ही सत्वनिधि के असंख्य अवतार है। ऋषि, देवता, प्रजापति, मनुपुत्र सभी श्रीहरी के अवतार हैं । जब पृथ्वीवासी दैत्यों के अत्याचार से व्याकुल हो उठते हैं, तब युग युग में अनेक रूप धारण करके भगवान उनकी रक्षा करते हैं। श्रीमद् भागवत गीता में भगवान श्री कृष्ण ने कहा है:
यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत !
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानम सृज्याहम !!
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥
(जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब ही मैं अपने रूप को रचता हूँ अर्थात साकार रूप से लोगों के सम्मुख प्रकट होता हूँ॥ साधु पुरुषों का उद्धार करने के लिए, पाप कर्म करने वालों का विनाश करने के लिए और धर्म की अच्छी तरह से स्थापना करने के लिए मैं युग-युग में प्रकट हुआ करता हूँ॥ )
गौस्वामी तुलसीदास जी ने भी श्री रामचरितमानस में कहा है :
जब जब होई धरम कै हानी। बाढ़हिं असुर अधम अभिमानी॥
तब तब प्रभु धरि बिबिध सरीरा। हरहिं कृपानिधि सज्जन पीरा।।
जब-जब धर्म का ह्रास होता है और नीच अभिमानी राक्षस बढ़ जाते हैं और वे ऐसा अन्याय करते हैं तब-तब वे कृपानिधान प्रभु भाँति-भाँति के (दिव्य) शरीर धारण कर सज्जनों की पीड़ा हरते हैं।
श्री विष्णु स्वयं परमपिता परमात्मा का सकल रूप हैं। विष्णु दशावतार भी श्री भगवान के २४ अवतारों में ही सम्मिलित किए जाते हैं।
(श्रीमद्भागवतमहापुराण- प्रथम स्कन्धः ।। अथ तृतीयोऽध्यायः ।। )
भगवान् के अवतारों का वर्णन*
सूत उवाच
जगृहे पौरुषं रूपं भगवान्महदादिभिः।
सम्भूतं षोडशकलमादौ लोकसिसृक्षया।। 1
श्रीसूतजी कहते हैं----- सृष्टि के आदि में भगवान् ने लोकों के निर्माण की इच्छा की। इच्छा होते ही उन्होंने महत्तत्त्व आदि से निष्पन्न पुरुषरूप ग्रहण किया। उसमें दस इन्द्रियाँ, एक मन और पांच भूत- ये सोलह कलाएँ थीं ।।1।।
यस्याम्भसि शयानस्य योगनिद्रां वितन्वतः ।
नाभिहृदाम्बुजादासीद्ब्रह्मा विश्वसृजां पतिः ।।२
उन्होंने कारण-जल में शयन करते हुए जब योगनिद्रा का विस्तार किया, तब उनके नाभि-सरोवर में से एक कमल प्रकट हुआ और उस कमल से प्रजापतियों के अधिपति ब्रह्माजी उत्पन्न हुए ।।२।।
यस्यावयवसंस्थानैः कल्पितो लोकविस्तरः ।
तद्वै भगवतो रूपं विशुद्धं सत्त्वमूर्जितम् ।।३
भगवान् के उस विरारूप के अंग-प्रत्यंग में ही समस्त लोकों की कल्पना की गयी है, वह भगवान् का विशुद्ध सत्त्वमय श्रेष्ठ रूप है ।।३।।
पश्यन्त्यदो रूपमदभ्रचक्षुषा सहस्रपादोरुभुजाननाद्भुतम् ।
सहस्रमूर्धश्रवणाक्षिनासिकं सहस्रमौल्यम्बरकुण्डलोल्लसत् ।।४
योगी लोग दिव्यदृष्टि से भगवान् के उस रूप का दर्शन करते हैं। भगवान् का वह रूप हजारों पैर, जाँचें, भुजाएँ और मुखों के कारण अत्यन्त विलक्षण है; उसमें सहस्रों सिर, हजारों कान, हजारों आँखें और हजारों नासिकाएँ हैं। हजारों मुकुट, वस्त्र और कुण्डल आदि आभूषणों से वह उल्लसित रहता है ।।४।।
एतन्नानावताराणां निधानं बीजमव्ययम् ।
यस्यांशांशेन सृज्यन्ते देवतिर्यङ्नरादयः ।।५
भगवान् का यही पुरुषरूप जिसे नारायण कहते हैं, अनेक अवतारों का अक्षय कोष है- इसीसे सारे अवतार प्रकट होते हैं। इस रूप के छोटे-से-छोटे अंश से देवता, पशु-पक्षी और मनुष्यादि योनियों की सृष्टि होती है ।।५।।
[साभार : https://sansthanam.blogspot.com/2015/04/bhagwat-puran_96.htm]
'काली' और 'कृष्ण' में अभेद-बुद्धि रखना चाहिए :
['नरलीला में विश्वास रखना चाहिये' (लीलाप्रसंग खंड-2, पेज-281) ]
श्रीरामकृष्ण कहते थे - " मनुष्य में ठीक -ठीक इष्ट-बुद्धि के उदय होने पर तब कहीं भगवत्प्राप्ति होती है। वैषणवचरण कहा करता था कि जब नरलीला में विश्वास उत्पन्न होता है, तभी ज्ञान की पूर्णता होती है। "
'काली' और 'कृष्ण' में अभेद-बुद्धि रखने के सम्बन्ध में गौरी पण्डित का अभिमत - 'काली' तथा 'कृष्ण' के सम्बन्ध में कभी किसी भक्त की विशेष भेदबुद्धि को देखकर उससे श्रीरामकृष्णदेव कहा करते थे, " यह तेरी कैसी हीन बुद्धि है ? यह जानना कि तेरे ही इष्टदेव काली, कृष्ण, गौरांग तथा राम आदि सब कुछ बने हैं। पर इसका तात्पर्य यह नहीं कि मैं तुझे अपने इष्ट को त्यागकर गौरंगप्रभु को भेजने के लिए कह रहा हूँ। किन्तु द्वेषबुद्धि को त्याग देना। तेरे ही इष्टदेव कृष्ण तथा गौरांग के रूप में प्रकट हुए हैं - अपने ह्रदय में इस ज्ञान को बनाये रखना।
जैसे गृहस्थ की बहु ससुराल में जाकर ससुर , सास , ननद, देवर, जेठ, आदि सभी को यथायोग्य सम्मान देती है, भक्ति तथा सेवा करती है - किन्तु अपने ह्रदय की सारी बातों को खुलकर कहने तथा सोने का सम्बन्ध उसका एकमात्र पति के साथ ही है। वह यह जानती है कि पति के कारण ही सास, ससुर आदि उसके अपने हैं।
इसी तरह अपने इष्टदेव को पति के भाँति जानना एवं उनके सम्बन्ध से ही उनके दूसरे रूपों के साथ सम्बन्ध है तथा उनके प्रति श्रद्धा-भक्ति करनी है -इस बात का ध्यान रखना। यह समझते हुए उस द्वेष बुद्धि को दूर कर देना। गौरी कहा करता था - " काली तथा गौरांग पर जब एक-बुद्धि होगी तब मैं समझूँगा कि यथार्थ ज्ञान का उदय हुआ है। "
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'जितने मत हैं , उतने ही पथ हैं ' [लीलाप्रसंग खंड-2, पेज-283]
पाश्चात्य स्वार्थपरायण शिक्षा पद्धति का अनुसरण करते हुए हमलोग कर्ताभजा सम्प्रदाय के मत को जघन्य मत अपनी नाक -भौंह सिकोड़ते रहते हैं; लेकिन देवमानव श्रीरामकृष्णदेव उस कर्ताभजा आदि मतों से लेकर शुद्ध अद्वैत -वेदान्त मत पर्यन्त सभी मतों को ईश्वर-प्राप्ति का मार्ग कहकर स्वीकार करते थे। तथा अधिकारी-विशेष के लिए उसके अनुष्ठान का भी वे निर्देश दिया करते थे। हममें से बहुत से व्यक्तियों ने घृणाबुद्धि से प्रेरित होकर उनसे पूछा था - श्रेष्ठ भक्त होकर भी पण्डित वैष्णचरण जी परकीया को ग्रहण करने से विरत नहीं हुए ? यह तो बहुत अनुचित कार्य है! "
इस पर श्रीरामकृष्णदेव बारम्बार हमसे कहा करते थे , " इसमें उन लोगों का कोई दोष नहीं है ! वे सोलह आने मन से यह विश्वास करते थे कि ईश्वरप्राप्ति का वही मार्ग है। ईश्वरप्राप्ति के लिए जो जिस मार्ग का सरल ह्रदय से विश्वास कर उसका आचरण करता है, उसे अनुचित कहना तथा उसकी निन्दा करना उचित नहीं है। किसी के भाव को नष्ट नहीं करना चाहिए। क्योंकि किसी भी भाव को ठीक- ठीक पकड़ने पर उसी से भावमय भगवान की प्राप्ति होती है, अपने- अपने भावानुसार उन्हें (ईश्वर को) पुकारते रहो। किसी के भाव की निंदा न करो या दूसरे के भाव को निजी कहकर अपनाने का प्रयास न करो। इतना कहकर सदानन्दमय श्रीरामकृष्णदेव गाया करते थे--
आपनाते आपनि थेको, जेओ ना मन कारो घरे।
जा चाबि ताइ बोसे पाबि, खोजो निज अन्तःपुरे।।
परमधन से परशमणि, जा चाबि ता दिते पारे।
(ओ मन) कोतो मणि पड़े आछे, से चिन्तामणिर नाचदुआरे।।
तीर्थगमन दुःख भ्रमण, मन उचाटन होयो ना रे।
(तुमि) आनन्दे त्रिवेणी -स्नाने शीतल हओ ना मूलाधारे।।
कि देखो कमलाकान्त, मिछे बाजि ए संसारे।
(तुमि) बाजिकरे चिनले नाको, (जे एई ) घटेर भीतर विराज करे।।
अर्थात हे मन , तुम अपने अन्दर ही बैठे रहना, किसी के घर नहीं जाना। तुम्हें जो कुछ चाहिए (परम्-सत्य चाहिए), वह तुमको बैठे हुए ही मिल जायेगा तुम अपने अन्तःपुर में ही उस वस्तु को ढूँढ़ो। [कश्चिद् धीरः 'आवृत्त चक्षु: अमृतत्व इच्छन्' अमृतत्व पाने की इच्छा से आँखों को मूँदकर आसन पर बैठकर अपने भीतर ही उस 'वस्तु' को ढूँढ़ो। (पक्का 'मैं' -दासोऽहं ??) को ढूँढ़ो।]
वे (अवतार वरिष्ठ) परमधन रूपी पारसमणि हैं; उनसे तुम जो कुछ माँगोगे, वे उसी वस्तु को देने में समर्थ हैं। उस चिन्तामणि के बाहर के दरवाजे पर कितने ही मणि पड़े हुए हैं।
[पारस मणि एक चमकीला पत्थर है जिससे लोहे की चीज़ें सोने की बन जाती हैं। चिंतामणि एक रत्न है जिससे इच्छाएं पूरी होती हैं। इसे पश्चिमी दुनिया में 'फ़िलॉस्फ़र्स स्टोन' के नाम से जाना जाता है। ]
तीर्थगमन दुःखमय भ्रमण मात्र है; रे मन, तुम उत्कण्ठित न हो। (तुम) आनन्दपूर्वक त्रिवेणी-स्नान के द्वारा मूलाधार में ही शीतल क्यों न बनो ?
साधक कवि कमलाकान्त जी (कमलाकांत भट्टाचार्य) अपने आप से से यह कह रहे हैं कि तुम इस संसार रूपी मिथ्या बाजीगरी को देख रहे हो, (तुमने) बाजीगर को नहीं पहचाना , (जो इस) घट के भीतर विराजमान हैं।
[আপনাতে আপনি থেকো মন যেও নাকো কারু ঘরে।
যা চাবি তাই বসে পাবি, খোঁজ নিজ অন্তঃপুরে ৷৷
পরমধন এই পরশমণি, যা চাবি তাই দিতে পারে ৷
কত মণি পড়ে আছে আমার চিন্তামণির নাচ দুয়ারে ৷৷
তীর্থগমন দুঃখভ্রমণ, মন! উচাটন হয়ো নারে।
তুমি আনন্দত্রিবেণীর স্নানে, শীতল হও না মূলাধারে॥
কি দেখ কমলাকান্ত, মিছে বাজি এ সংসারে।
ওরে! বাজিকরে চিনলে না সে, তোমার ঘটে বিরাজ করে॥
(-কমলাকান্ত ভট্টাচার্য (সাধক)১০ - রাগিণী সিন্ধুকাফি। তাল ঢিমা তেতালা।)
'मनुष्य' बनने की साधना में पहले अहंकार रहित कर्म (निःस्वार्थ कर्म) साधन है और तत्पश्चात् उच्च अवस्था में आत्मस्वरूप का ध्यान। इस ध्यानाभ्यास की आवश्यकता तब तक होती है जब तक साधक निश्चयात्मक रूप से यह अनुभव न कर ले कि 'शुद्ध आत्मा' (सच्चिदानन्द) ही पारमार्थिक सत्य वस्तु है न कि 'अहंकार'। तत्पश्चात् वह कर्म करे अथवा न करे उसे इस ज्ञान की विस्मृति नहीं होती।
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पराञ्चि खानि व्यतृणत् स्वयंभूस्तमात्पराङ्पश्यति नान्तरात्मन्।
कश्चिद् धीरः प्रत्यक् आत्मानम् ऐक्षत् आवृत्त चक्षु: अमृतत्व इच्छन्।।
(कठोपनिषद -2/1/1 )
स्वयम्भू अर्थात् परमात्मा ने देह में स्थित इन्द्रयों का मुख कर बाहर की ओर गमन करने के लिए छेदन किया है, इस लिए इन्द्रियाँ बाहर की ओर गमन करते हुए बाह्य विषयों को ही देख पाती है,अन्तर्हृदय के आत्मा को नही देख पातीं। कोई एकाध धीर पुरुष, (सत्यार्थी !) आत्मदर्शन (आत्मसाक्षात्कार या इन्द्रियातीत सत्य का दर्शन,विवेकदर्शन ) की इच्छा को रखते हुए जब प्रत्याहार द्वारा चक्षु नामक इन इन्द्रियों को बाहर के गमनता को रोक कर भीतर की ओर वापस कर प्रत्यक् आत्मा को जो अमरपद (अमृतत्व) का देने वाला है उसको देखने में तत्पर हो जाना ही योग है।
योगदर्शन के 1/2 सूत्र में कहते हैं~"योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः"
योग क्या है? योग चित्त की समस्त वृत्तियों का पूर्णतयः रुक जाना,अवरूद्ध हो जाना योग है। वे वृत्तियाँ जो संस्कार रूप से चित्त में है और जो मन की कल्पना से चित्त पर पड़ रही हैं, तथा जो इन्द्रियों द्वारा चित्त पर आकर दृष्यित हो रही हैं, इनका रूक जाना योग है। बहु के योग का निरोध बाहर और आत्मप्रकाश के योग का निरोध भीतर अन्तर में करने का नाम योग है।
[अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः।।1.12।। व्यास भाष्य ।।1.12।। चित्तनदी नामोभयतोवाहिनी वहति कल्याणाय वहति पापाय च। या तु कैवल्यप्राग्भारा विवेकविषयनिम्ना सा कल्याणवहा। संसारप्राग्भाराऽविवेकविषयनिम्ना पापवहा। तत्र वैराग्येण विषयस्रोतः खिली क्रियते। विवेकदर्शनाभ्यासेन विवेकस्रोत उद्घाट्यत इत्युभयाधीनश्चित्तवृत्तिनिरोधः। ]
व्यासदेव [5000 वर्ष पहले ही मानो व्यासदेव जानते थे कि एक दिन स्वामी विवेकानन्द का एक मार्गदर्शक नेता आएगा !] कहते हैं - मनुष्य के चित्त-नदी का प्रवाह 'उभयतो वाहिनी' है, दोनों दिशाओं में (योग तथा भोग दोनों दिशाओं में) होता रहता है। इसके प्रवाह को फलदायी - योगमुखी बनाने के लिए Two things are necessary दो चीजें जरुरी हैं -अभ्यास और वैराग्य! वहाँ पहले लिखा है अभ्यास किन्तु मन को पकड़ने का अभ्यास करने के लिए पहले मन में पहले वैराग्य/ (ऐषणाओं में आसक्ति का त्याग) जरुरी है ! लालच के भाव को थोड़ा कम करते हुए 'विवेक-दर्शन' के अभ्यास द्वारा एक दिशा में (आत्मोन्मुखी या उर्ध्वमुखी) जाने से मन शान्त होता है, शक्तिशाली होता, असाध्य को भी साधने की शक्ति अर्जित करता है और मनुष्य के जीवन को कल्याण के मार्ग पर आरूढ़ करा देता है। जबकि दूसरी दिशा में (संसारोन्मुखी या निम्नोमुखी ) जाने से और अधिक चंचल हो जाता है, दुर्बल हो जाता है और निस्तेज होकर मनुष्य जीवन को नष्ट कर पशु तुल्य बना देता है। जैसे कि खाद्य-पदार्थ भी दो प्रकार के होते हैं- एक प्रकार का आहार लेने से शरीर हृष्ट-पुष्ट होता है और शक्तिशाली बन जाता है। जबकि दुसरे प्रकार का आहार स्वादिष्ट होने पर शरीर को दुर्बल और रोगी बनाता है।
प्रयत्न के द्वारा (विवेक-दर्शन के अभ्यास के द्वारा) हम अपने मन के प्रवाह को कल्याण की दिशा में मोड़ सकते हैं। उसे शाश्वतसुख और नश्वरसुख, या श्रेय-प्रेय में अंतर समझाकर अच्छे रास्ते पर (ऊर्ध्वमुखी रखने) लाने से जीवन सुन्दर हो जाता है। लेकिन मन को मनमानी करने के लिये छोड़ देने से जीवन व्यर्थ हो जाता है। इसलिये 'वासना और धन ' (Lust and Lucre) के लालच या प्रलोभन से सम्मोहित न होकर 'मनः संयोग' का नियमित अभ्यास (विवेक-दर्शन का अभ्यास) करने से मन वश में हो जाता है। कहा भी गया है - 'करत- करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान। रसरी आवत जात से सिल पर परत निसान॥' मनुष्य की सारी क्षमताएँ उसके अभ्यास का ही फल है। 'विवेक-दर्शन' के अभ्यास द्वारा
शान्त और नियंत्रित मन के माध्यम से जीवन को सुन्दर ढंग से गठित करने से ही बहुमूल्य मनुष्य-जन्म को सार्थक बनाया जा सकता है।
अब हम गीता पर आते हैं। श्लोक6/3,4
आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते ।
योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते।।
(गीता - 6/3)
योगारूढ़ अर्थात् आत्म साक्षात्कार करने वाले योगी को योग प्राप्त करने के लिए कर्म कारण कहा जाता है। जब योगी योगारूढ़ हो जाय तो कर्म का शमन अर्थात कारण रूप कर्त्तव्य कहा गया है। जब तक आत्मसाक्षात्काररूप मोक्ष की प्राप्ति न हो जाय तब तक कर्म करना (योग के निमित्त उद्यम करते रहना) ही कर्त्तव्य है।]
[योग में आरूढ़ होने की इच्छा वाले मुनि के लिए कर्म करना ही हेतु (साधन-उपाय) कहा है और योगारूढ़ हो जाने पर उसी पुरुष के लिए शम को (शांति, संकल्प-संन्यास) साधन कहा गया है।।
अमृतत्व प्राप्त करने , आत्मसाक्षात्कार करने या परम् सत्य को जानने के इच्छुक व्यक्ति के लिए या ध्यानयोग पर आरूढ़ होने के इच्छुक व्यक्ति के लिए प्रथम साधन कहा गया है कर्म। जगत् में कर्तापन के अभिमान या कर्तृत्व के अभिमान और फलासक्ति का त्याग करके (देह बुद्ध्या दासोऽहं भाव से) कर्म करने से पूर्व संचित वासनाओं का क्षय होता है और नई वासनाएं उत्पन्न नहीं होतीं।
यहाँ योगारूढ़ होने के विषय को स्पष्ट करने के लिए अश्वारोहण (घोड़े की सवारी) के अत्यन्त उपयुक्त रूपक का प्रयोग किया गया है। जब मनुष्य किसी स्वच्छंद अश्व पर पहली बार सवार होने का प्रयत्न करता है तब पहले तो वह अश्व ही उस पर सवार हो जाता है। यदि कोई व्यक्ति युद्ध के अश्व को अपने पूर्णवश में करना चाहे तो कुछ काल तक उसे उस अश्व पर सवार होने का प्रयास करना पड़ता है। एक पैर को पायदान पर रखकर जीन पर झूलते हुए दूसरे पैर को पृथ्वी से उठाकर (उछलकर) अश्व की पीठ पर बैठने और उसे अपने वश में करने के लिए प्रयत्न करना पड़ता है। एक बार उस पर सवार हो जाने के बाद उसे अपने वश में रखना सरल कार्य है। परन्तु तब तक अश्वारोही को उस अवस्था में से गुजरना पड़ता है जब तक वह पूर्णरूप से न अश्व पर बैठा होता है और न पृथ्वी पर खड़ा होता है।
प्रारम्भ में हम केवल कर्म करने वाले होते हैं अहंकार और स्वार्थ से प्रेरित हुए हम परिश्रम करते हैं- नए,नए बिजनेस में पसीना बहाते हैं रोते हैं हँसते हैं। जब व्यक्ति इस प्रकार के कर्मों से थक जाता है तब वह 'मनोरूप अश्व' पर आरूढ़ होना चाहता है। ऐसे ही व्यक्ति को कहते हैं 'आरुरुक्ष' (आरूढ़ होने की इच्छा वाला)। वह पुरुष कर्म तो पूर्व के समान ही करता है परन्तु अहंकार और स्वार्थ को त्यागकर। यज्ञ भावना से किये गये कर्म (कैम्प) वासनाओं को नष्ट करके अन्तकरण को शुद्ध एवं सुसंगठित कर देते हैं।
ऐसे शुद्धान्तकरण वाले साधक को शनैशनै कर्म से निवृत्त होकर ध्यान का अभ्यास अधिक करना चाहिए। जब वह मन पर विजय प्राप्त करके उसकी प्रवृत्तियों को अपने वश में कर लेता है तब वह 'योगारूढ़' कहा जाता है। मन का समत्व प्राप्त योगारूढ़ व्यक्ति के लिए ज्ञानरूप शम अर्थात् शांति वह साधन है जिसके द्वारा वह अपने यथार्थ या पूर्णस्वरूप में स्थित हो सकता है।
इस प्रकार एक ही व्यक्ति के लिए उसके विकास की अवस्थाओं को देखते हुए कर्म और ध्यान की दो साधनाएँ बतायी गयी हैं जो परस्पर विरोधी नहीं है । एक अवस्था में निष्काम कर्मों का आचरण उपयुक्त है तथापि कुछ काल के पश्चात् वह भी कभीकभी मनुष्य की शांति को भंग करके उसे मानो पृथ्वी पर पटक देता है। दुग्ध चूर्ण को पानी में घोलकर बनाया हुआ पतला दूध एक छोटे से शिशु के लिए तो पुष्टिवर्धक होता है परन्तु दूध की वह बोतल बड़े बालक के लिए पर्याप्त नहीं होती जो दिन भर खेलता है और काम करता है। उसे मक्खन और रोटी की आवश्यकता होती है। किन्तु यही रोटी शिशु के लिए प्राणघातक हो सकती है।
इसी प्रकार साधना की प्रारम्भिक अवस्था में निष्काम कर्म समीचीन है परन्तु आध्यात्मिकता में और अधिक विकसित हुए साधक को आवश्यक है आत्मचिन्तनरूप निदिध्यासन। पहले अहंकार रहित कर्म साधन है और तत्पश्चात् आत्मस्वरूप का ध्यान। इस ध्यानाभ्यास की आवश्यकता तब तक होती है जब तक साधक निश्चयात्मक रूप से यह अनुभव न कर ले कि 'शुद्ध आत्मा' ही पारमार्थिक सत्य वस्तु है न कि 'अहंकार'। तत्पश्चात् वह कर्म करे अथवा न करे उसे इस ज्ञान की विस्मृति नहीं होती। [शुद्ध आत्मा या सच्चिदानन्द ही 'पक्का मैं', পাকা আমি' -the 'ripe I' है जिसने 'उनका दर्शन' किया था न कि अहँकार या कच्चा मैं ने !)]
योगारूढ़ अर्थात प्रतिष्ठीत योग वाला वह कब होता है,इस पर आगे का श्लोक है~
कब यह साधक योगरूढ़ बन जाता है उत्तर है-
यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते।
सर्वसङ्कल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते।।6.4।।
इन्द्रियों के समस्त अर्थरूप भोग और प्राकृत विषय तथा उनसे सम्बन्ध रखने वाले कर्मो में भी जब तक 'अनुषज्जते' अर्थात अनुषक्त यानि आसक्ति रहित नही हो जाता वह सर्वसंकल्प-त्यागी नही है। जब समस्त उपरोक्त इन्द्रियों के भोग और प्राकृत विषय तथा उनसे सम्बन्ध रखने वाले कर्मों का त्यागी हो जाता है तब वह सर्वसङ्कल्प त्यागी योगारूढ़ कहा जाता है।
।।6.4।। जब (साधक) न इन्द्रियों के विषयों में और न कर्मों में आसक्त होता है तब सर्व संकल्पों के त्यागी या संन्यासी को योगारूढ़ कहा जाता है।।
स्वयं की साधनावस्था का अनुभव होने से एक साधक को 'आरुरुक्ष ' की स्थिति समझना कठिन नहीं है। साधक के लिए निष्काम कर्म साधन है। कर्मों का संन्यास तभी करना चाहिए जब मन के ऊपर पूर्ण संयम प्राप्त हो गया हो। इसके पूर्व ही कर्मों का त्यागना उतना ही हानिकारक होगा जितना कि योगारूढ़त्व की अवस्था को प्राप्त होने पर कर्मों से मन को क्षुब्ध करना। उस अवस्था में तो साधन है शम।
स्वाभाविक ही योगारूढ़ के लक्षणों को जानने की उत्सुकता सभी साधकों के मन में उत्पन्न होती है। इस श्लोक में श्रीकृष्ण मन रूपी अश्व पर आरूढ़ हुए पुरुष के बाह्य एवं आन्तरिक लक्षणों को दर्शाते हैं। उस पुरुष का एक लक्षण यह है कि वह मन से न इन्द्रियों के विषयों में आसक्त होता है और न जगत् में किये जाने वाले कर्मों में।
इस कथन का शाब्दिक अर्थ लेकर परमसत्य का विचित्र हास्यजनक चित्र खींचने का प्रयत्न नहीं करना चाहिए। इसका अभिप्राय केवल इतना ही है कि ध्यानाभ्यास के समय साधक का मन विषयों तथा कर्मों से पूर्णतया निवृत्त होता है जिससे वह एकाग्रचित्त से ध्यान करने में समर्थ होता है। मन के सहयोग के बिना इन्द्रियों की स्वयं ही विषयों की ओर प्रवृत्ति नहीं हो सकती। यदि मन को आनन्दस्वरूप आत्मतत्त्व के ध्यान में लगाया जाय तो उस निर्विषय आनन्द का अनुभव कर लेने के उपरान्त वह स्वयं ही विषयों के क्षणिक सुखों की खोज में नहीं भटकेगा। किसी धनवान् व्यक्ति का हष्टपुष्ट पालतू कुत्ता स्थान-स्थान पर रखे कूड़ेदानों में अन्न के कणों को नहीं खोजता। इन्द्रियों के भोग तथा कर्म से परावृत्त हुआ मन आत्मचिन्तन में स्थिर हो जाता है। यहाँ न अनुषज्जते शब्द पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। सज्जते को अनु यह उपसर्ग लगाकर भगवान यहाँ दर्शाते हैं कि उस पुरुष को विषयों से रंचमात्र भी आसक्ति नहीं होती।
उपर्युक्त स्थिति को प्राप्त होने पर भी संभव है कि साधक अपने मन में ही उठने वाले संकल्पों-विकल्पों से क्षुब्ध हो जाय। भगवान् कहते हैं कि योगारूढ़ पुरुष न केवल बाह्य विक्षेपों से मुक्त है बल्कि इस संकल्प शक्ति के विक्षेपों से भी। स्पष्ट है कि ऐसे योगारूढ़ के लिए ध्यान की गति तीव्र करने के लिए शम की आवश्यकता होती है।
गीता 2/48 में जो समत्वयोग कहा है यह श्लोक में ही स्पष्ट है।
योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय।
सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते।।2.48।।
।।2.48।। हे धनंजय आसक्ति को त्याग कर तथा सिद्धि और असिद्धि में समभाव होकर योग में स्थित हुये तुम कर्म करो। यह समभाव ही योग कहलाता है।।
इस श्लोक में प्रथम बार योग शब्द का प्रयोग किया गया है और यहीं पर उसकी परिभाषा भी दी है कि समत्व योग कहलाता है। इस योग में दृढ़ स्थित होने पर ही निष्काम कर्म किये जा सकते हैं।
कर्मों को कुशलतापूर्वक करने के लिए जिस संग को त्यागने के लिए यहाँ कहा गया है उसपर हम विचार करेंगे। विपरीत धारणायें झूठी आशायें दिवा स्वप्न कर्म फल की चिन्तायें और भविष्य में संभाव्य अनर्थों का भय इन सबका त्याग करना चाहिये। उपर्युक्त सभी कष्टप्रद धारणायें एवं गुत्थियां भ्रांति जनित अहंकार की ही हैं। यह अहंकार क्या है भूतकाल की स्मृतियों और भविष्य की आशाओं की गठरी। अत अहंकारमय जीवन का अर्थ है मृत क्षणों की श्मशानभूमि अथवा काल के गर्भ में रहना जहाँ अनुत्पन्न भविष्य स्थित है।
इनमें व्यस्त रहते हुये वर्तमान समय को हम खो देते हैं जो हमें कर्म करने और लक्ष्य पाने के लिये उपलब्ध होता है। वर्तमान में प्राप्त सुअवसररूपी धन का यह मूर्खतापूर्ण अपव्यय है जिसका संकेत व्यासजी इन शब्दों में करते है संग त्याग कर समत्व योग में स्थित हुये तुम कर्म करो।
वर्तमान ज्ञान कीअग्नि में भूतभविष्य चिन्ता भय आशा इन सबको जलाकर कर्म करना स्फूर्ति और प्रेरणा का लक्षण है। इस प्रकार अहंकार के विस्मरण और कर्म करने में ही पूर्ण आनन्द है। ऐसे कर्म का फल सदैव महान् होता है। कलाकृति के निर्माण के क्षणों में अपने आप को कृति के आनन्द में निमग्न होकर कार्यरत कलाकार इस तथ्य का प्रमाण है। जीवन में किसी कार्य को पूरी लगन और उत्साह से जब हम कर रहे होते हैं उस समय यदि वहाँ कोई व्यक्ति आकर खड़ा हो जाये तब भी हमें उसका भान नहीं रहता। आनन्द की उस अनुभूति से नीचे अहंकार के स्तर पर उतर कर आगन्तुक को उत्तर देने में भी हमें कुछ समय लग जाता है।
अहंकार को भूलकर जो कार्य किये जाते हैं उनमें कर्ता को यश अथवा अपयश की कोई चिन्ता नहीं रहती क्योंकि फल की चिन्ता का अर्थ है भविष्य की चिन्ता और भविष्य में रहने का अर्थ है वर्तमान को खोना। स्फूर्त जीवन का आनन्द वर्तमान के प्रत्येक क्षण में निहित होता है। कहा जाता है कि प्रत्येक क्षण का आनन्द स्वयं में परिपूर्ण है।
इस श्लोकार्थ पर विचार करने से ज्ञात होगा कि अहंकार की पूर्ण निवृत्ति के बिना इस मार्ग में सफलता नहीं मिल सकती और इसकी निवृत्ति का उपाय है मन का समत्व भाव। कर्मयोगी के लिये केवल इतना पर्याप्त नहीं कि सम भाव में रहकर वह कर्म करे परन्तु इस नित्य परिवर्तनशील जगत् में रहते हुये इस समभाव को दृढ़ करने का सतत प्रयत्न करे।
कर्मयुद्ध चाहे जगत का हो या रणक्षेत्र का इसके जय और पराजय,सिद्धि और असिद्ध में सम हो जाना चित्त का इस भार से मुक्त हो कर कर्म करना चित्त का समाधान रूप समत्वयोग है।
हरि ॐ !
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