Wednesday, August 14, 2013

राष्ट्रीय एकता और स्वामी विवेकानन्द {National unity and Swami Vivekananda} sarisa camp 29.12.2005

ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी में  " Nation" (राष्ट्र) की परिभाषा इस प्रकार दी गयी है " A large body of people united by common descent, history, culture, or language, inhabiting a particular state or territory." 
- अर्थात किसी निश्चित और विशिष्ट भूखण्ड में रहनेवाले लोगों के सामान्य इतिहास, वंश-परम्परा, एक से रीती रिवाज, एक सी विचार धारा, संस्कृति, या भाषा, के आधार पर संगठित मनुष्यों के एक व्यापक क्षेत्र को राष्ट्र कहते है।" उसी ऑक्सफोर्ड डिक्सनरी में  ' National ' (राष्ट्रीय ) शब्द को परिभाषित करते हुए कहा गया है- " relating to or characteristic of a nation; common to a whole nation:this policy may have been in the national interest." - अर्थात किसी राष्ट्र या कौम से सम्बद्ध कोई विशेषता जो किसी एक पूरे देश या जाति के हित में सामान्य रूप अपनाई जाती हो। उदहारण के लिये - राष्ट्रिय विदेश नीति, राष्ट्रिय वेश-भूषा (नेशनल ड्रेस), राष्ट्रिय सम्पत्ति, राष्ट्रिय ध्वज, राष्ट्रिय चरित्र आदि; इस दृष्टि से National का पर्यायवाची शब्द है- कौमी, जातीय, राष्ट्रीय, सर्व साधारण का या  सारे देश का।  राष्ट्र को परिभाषित करते हुए रविन्द्रनाथ ठाकुर ने कहा था - " वैसे लोगों के समूह को राष्ट्र कहते हैं, जो विभिन्न प्रकार के रंग-रूप, भाषा, और वेश-भूषा में रहते हुए भी आपसी समानता और भाईचारा के बुनियाद पर एक एक साथ सुख-शांति पूर्वक निवास करते हैं. " 
१५ अगस्त १९४७ को जो भारतवर्ष को तीन टुकड़ों में बाँट कर जो राष्ट्र गठित हुआ था, उसके पहले क्या भारत का अस्तित्व नहीं था ? नहीं, ऐसा नहीं था -एक लंबी अवधि तक भारत एक राष्ट्र न होकर बहुत से राज्यों के रूप में था। वैदिक कालीन भारतवर्ष की सभ्यता, संस्कृति, सामाजिक व्यवस्था बहुत उन्नत अवस्था में थी. यहाँ गणतन्त्र भी प्रतिष्ठित था. कृषि, विज्ञान, गणित, चिकित्सा, शिल्प हर क्षेत्र में भारतवर्ष एक उन्नत राष्ट्र था. भौतिक से रूप से उन्नत होने के साथ साथ भारतीय लोगों की आध्यात्मिक जिज्ञाषा भी जाग्रत हुई. 
क्या इस परिवर्तनशील जगत के पीछे क्या कोई अपरिवर्तनशील सत्ता भी है ? जीवन का उद्देश्य क्या है ? जिस प्रकार आज के पाश्चात्य वैज्ञानिक वाह्य जगत में ब्रह्माण्ड की रचना के रहस्यों को खोजने में लगे हुए हैं, उसी प्रकार भारत ने भी इन प्रश्नों के उत्तर वाह्य जगत में ही खोजने की चेष्टा की थी. किन्तु कुछ धीर मनुष्यों (ऋषियों) ने नेत्रों को अंतर्मुखी बना कर अपने ही अन्तर्जगत में स्थित शाश्वत चैतन्य सत्ता का आविष्कार किया और सिद्धान्त दिया कि 'यथा पिण्डे तथा ब्रह्माण्डे” अर्थात जिन पंचमहाभूतों से पूर्ण ब्रह्मांड संरचित है उन्हीं तत्वों से हमारा शरीर निर्मित है, तथा जो सत्ता हमारे शरीर को चला रही है, वही चैतन्य सत्ता वाह्य जगत के पीछे रहकर उसे भी चला रही है ! सबसे पहले यह सत्य भारत में ही आविष्कृत हुआ था कि एक ही ब्रह्म इस विश्व-ब्रह्माण्ड के पीछे अवस्थित हैं. इसलिये अनासक्ति के साथ इसका उपभोग करो, किसी दूसरे के धन की आकांक्षा मत करो. तुम केवल मरण धर्म शरीर ही नहीं हो. तुम तो अमृत के पुत्र हो, तुम मृत्यु को भी जीत सकते हो. 
भारत का यही ज्ञान हजारों वर्षों से राष्ट्रीय एकता को अखण्ड बनाये हुए थी. बहु-भाषीय, बहु-जातीय, बहु-धर्मीय व्यवस्था के बावजूद भारत -ऋग्वेद के ऋषियों के द्वारा आविष्कृत सत्य  - ' एकम सत विप्राः बहुधा वदन्ति!' हमारी राष्ट्रिय अखण्डता को अक्षुण बनाये हुए थी.  इसी सिद्धान्त- ' सत्य तो एक ही है ! बुद्धिमान लोग उसका वर्णन अनेक प्रकार से करते हैं' को आधार मान कर भारत के लोग आपस में मिल-जुल कर रहते आ रहे थे. किन्तु बाद में पुरोहितों ने अपने स्वार्थ को पूरा करने के लिये साधारण जनता को आध्यात्मिकता या तात्विक-दर्शन से वंचित करने के लिये केवल कर्म-काण्ड द्वारा पूजा अनुष्ठान को ही धर्म कहकर प्रचारित कर दिया। धर्म के दुर्बल हो जाने से ही राष्ट्रीय एकता खण्डित हो गयी और मुट्ठीभर विदेशी आक्रमण कारियों से पराजित होकर भारत पराधीन हो गया.
ऐसे भी समय आये जब इस उपमहाद्वीप का बहुत बड़ा भाग एक साम्राज्य के अधीन रहा; इस बार अनेक बार विदेशियों ने हमले किये। उनमें से कुछ यहाँ बस गये और भारतीय हो गये; और राजा या सम्राट के रूप में शासन किया। कुछ ने देश को लूटा-खसोटा और धन संपत्ति बटोर कर वापस चले गये। महान उपलब्धियों के भी वक्त आये और देश को जड़ता और दुख के भी अनेक दौरों से गुजरना पड़ा। और जब हम भारत के स्वतंत्रता संग्राम की बात करते हैं तब हमारा तात्पर्य भारतीय इतिहास के उस दौर से होता है जिसमें भारत पर अंग्रेजों का शासन था और यहां के लोग विदेशी आधिपत्य को समाप्त करके स्वाधीन हो जाना चाहते थे। हिन्दू-मुस्लिम सैनिकों ने मिलकर लार्ड क्लाइव से पलासी युद्ध किया था, तब से हम हिन्दू-मुसलमान लोग अपने को भारतीय कौम और अंग्रेजों को विदेशी समझते हैं. स्वामीजी ने कहा था " एकचित्त हो जाना ही समाज गठन का रहस्य है." भारत के भविष्य को उज्ज्वल बनाने के लिये राष्ट्रीय एकता आवश्यक है. स्वतंत्र सामाजिक चेतना ही राष्ट्रीयता में परिणत हो जाती है. राष्ट्र के समस्त नागरिकों की भाषागत, वंशगत, धर्मगत एकात्मकता ही राष्ट्रीय एकता के प्रमुख अवयव हैं.
अंग्रेजों ने कभी भी युद्ध करके भारत में किसी राज्य को नहीं जीता था वो हमेशा छल और साजिस से ये काम करते थे। अंग्रेजों को भारत में व्यापार करने का अधिकार जहाँगीर ने 1618 में दिया था और 1618 से लेकर 1750 तक भारत के अधिकांश रजवाड़ों को अंग्रेजों ने छल से कब्जे में ले लिया था। बंगाल उनसे उस समय तक अछूता था। और उस समय बंगाल का नवाब था सिराजुदौला (१७३७-१७५७ ) । बहुत ही अच्छा शासक था, बहुत संस्कारवान था । उसने अंग्रेजों को व्यापार की इज़ाज़त कभी नहीं दी । अंग्रेजों ने कई बार बंगाल पर हमला किया लेकिन हमेशा हारे। 
भारत में ब्रितानी राज का प्रारंभ सन् 1757 से माना जा सकता है जब ब्रितानी ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला को पलासी- युद्ध में पराजित कर दिया था। अंग्रेजों के पास प्लासी के युद्ध के समय मात्र 300 सिपाही थे और सिराजुदौला के पास 18 हजार सिपाही । अंग्रेजी सेना का सेनापति था रोबर्ट क्लाइव और सिराजुदौला का सेनापति था मीरजाफर । रोबर्ट क्लाइव ये जानता था की आमने सामने का युद्ध हुआ तो एक घंटा भी नहीं लगेगा और हम युद्ध हार जायेंगे। रोबर्ट क्लाइव ने तब अपने दो जासूस लगाये और उनसे कहा की जा के पता लगाओ की सिराजुदौला के फ़ौज में कोई ऐसा आदमी है जिसे हम रिश्वत दे लालच दे और रिश्वत के लालच में अपने देश से गद्दारी कर सके । उसके जासूसों ने ये पता लगा के बताया की हाँ उसकी सेना का सेनापति ही ऐसा आदमी है जो रिश्वत के नाम पर बंगाल को बेच सकता है और अगर आप उसे कुर्सी का लालच दे तो वो बंगाल के सात पुश्तों को भी बेच सकता है। और वो आदमी था मीरजाफर, वह प्लासी के युद्ध में रोबर्ट क्लाइव के साथ मिल गया क्योकि रोबर्ट क्लाइव ने मीर जाफ़र को बंगाल का नवाब बनाने का लालच दे दिया था। आगे चलकर मीर जाफ़र का नाम भारतीय उपमहाद्वीप में 'देशद्रोही' व 'ग़द्दार' का पर्रयायवाची बन गया।  इस प्रकार जितने भूभाग पर ब्रिटिस राज स्थापित था उतने ही भूभाग को हमलोग भारत कहते हैं,
 किन्तु ब्रिटिश शासन काल में पाश्चात्य सभ्यता और संस्कृति के चका-चौन्ध या आडम्बरी जीवन को देखकर भारत चकित हो गया, और भारत का पढ़ा-लिखा अभिजात्य वर्ग अंग्रेजी सभ्यता का अन्धानुकरण करने लगा. और अंग्रेजों के कथनानुसार वेदों-उपनिषदों के ज्ञान को गड़ेड़ीयों का गीत समझकर अंग्रेजी शिक्षापद्धति में पले-बढ़े आधुनिक भारत ने अपनी आत्मश्रद्धा को ही खो दिया। सनातन धर्म को भूलकर ये लोग शराब, क्लब, नाच को ही सभ्यता समझ बैठे। भोगवादी सभ्यता को अपना लेने से आजाद भारत में प्रतियोगिता और प्रतिस्पर्धा का बोलबाला हो गया.
आजाद भारत के नेताओं ने स्वामीजी के परामर्श -'पहले मनुष्य बनो और बनाओ ' पर कभी ध्यान नही दिया जिसके फलस्वरूप स्वामीजी का नया भारत गढ़ने का स्वप्न पूरा नहीं हुआ. भारत चावल-गेहूँ के उत्पादन में विश्व का दूसरा बड़ा राष्ट्र है. दुग्ध-उत्पादन में भारत विश्व में प्रथम स्थान रखता है. अन्तरिक्ष में उपग्रह को भेजने वाले क्रायोजेनिक इंजन का स्वदेश में निर्माण कर लिया गया है. फिर भी क्या कारण है कि आज भी भारत की ६० % आबादी गरीबी रेखा के नीचे अपना जीवन बिताने को मजबूर है ? शिक्षा का दर पुरुषों में ६० % और स्त्रियों में २७ % ही क्यों है ? एक ओर धनियों के लिये जहाँ बड़े बड़े महल हैं वहीं दरिद्रों की टूटी फूटी झोपड़ियाँ भी हैं. शिशु को पौष्टिक आहार नहीं मिलता है, एक ओर पाँचतारा सुविधा से युक्त हॉस्पिटल हैं, वहीँ बीमार होने पर  गरीबों को उचित उपचार की सुविधा भी नहीं है. 
इन्हीं  विरोधाभासों के कारण भारत की राष्ट्रीय एकता में बाधा पहुँचती है. भारत को छोटे छोटे टुकड़ों में बाँटने की साजिशें चलती रहती है. हमलोग मानवाधिकार को लेकर तो बहुत व्यस्त रहते हैं, किन्तु मनष्यों का कुछ कर्तव्य भी होता है, जिसका पालन करने से ही उसके अधिकार सुरक्षित रह सकते हैं. उन कर्तव्यों को सूचीबद्ध करने की ओर किसी का ध्यान क्यों नहीं जाता ? कुछ स्वार्थी लोग अधिक भोग के लालच में सत्ता की कुर्सी पाने के लिये जिन राज्यों को बाँट कर उनकी संख्या में वृद्धि तो कर रहे हैं, किन्तु झारखण्ड आदि राज्यों में केवल कुर्सी-कुर्सी का खेल चल रहा है, आम जनता की  स्थिति बद से बदतर होती जा रही है. जबकि स्वामीजी ने बहुत पहले ही कहा था -  
" याद रखो की राष्ट्र झोपड़ी में बसा है; परन्तु हाय! उन लोगों लिये कभी किसी ने कुछ किया नहीं। हमारे आधुनिक सुधारक विधवाओं के पुनर्विवाह कराने में बड़े व्यस्त हैं. निश्चय ही मुझे प्रत्येक सुधार से सहानभूति है; परन्तु राष्ट्र की भावी उन्नति उसकी विधवाओं को मिले पतियों की संख्या पर नहीं, बल्कि ' आम जनता की हालत ' पर निर्भर है. क्या तुम जनता की उन्नति कर सकते हो ? उनकी स्वाभाविक आध्यात्मिक वृत्ति (पूजा और नमाज की पद्धति) को बनाये रखते हुए, क्या तुम उनके खोये हुए व्यक्तित्व (individuality या आत्मश्रद्धा) उन्हें वापस दे सकते हो ? क्या समता, स्वतंत्रता; कार्य-कौशल तथा पौरुष में तुम पाश्चात्यों के भी गुरु बन सकते हो ? क्या तुम उसी के साथ साथ स्वाभाविक आध्यात्मिक अन्तःप्रेरणा तथा आध्यात्म-साधनाओं में कट्टर सनातनी हिन्दू भी हो सकते हो ? यह काम हमें करना है, और हम इसे करेंगे ही !
 (" Yes, We Can ! We Will Do !) तुम सबने इसीके लिये जन्म लिया है."
 उन्होंने कहा था -" जनसाधारण की उपेक्षा ही राष्ट्रीय-महापाप है ! उन्हें कौन प्रकाश देगा, कौन उन्हें शिक्षित बनाने के लिये द्वारा द्वार तक घूमेगा? उसी को मैं महात्मा कहता हूँ, जिसका हृदय गरीबों के लिये रोता है, अन्यथा वह तो दुरात्मा है. जब तक करोड़ो देश-वासी भूखे और अशिक्षित रहेंगे, तब तक मैं प्रत्येक उस आदमी को विश्वासघातक समझूँगा, जो उनके खर्च पर शिक्षित हुआ, परन्तु सत्ता की कुर्सी या सरकारी नौकरी मिल जाने के बाद उन पर तनिक भी ध्यान नहीं देता। 
केवल स्वामीजी द्वारा निर्देशित 'चरित्र-निर्माण और मनुष्य-निर्माणकारी शिक्षा ' के बल पर ही भारत एक उन्नत राष्ट्र बन सकता है, तथा राष्ट्रिय एकता भी अखण्ड रह सकती है. स्वामीजी ने कहा था धर्म के दो पहलु हैं, एक उसका आनुष्ठानिक पक्ष है- जैसे पूजा और नमाज; दूसरा उसका अध्यात्मिक पक्ष है-'एक नूर से सब जग उपजा' इस सत्य को समझकर पृथ्वी के सभी संप्रदाय के लोगों से प्रेम और क्षमा का व्यवहार रखना। स्वामीजी का मानना था कि विश्व के सभी धर्म एक ही बात कहते हैं- " To do good and to be good ! this is whole of Religion. " धर्म वह वस्तु है, जो पशु-मानव  को मनुष्य में तथा मनुष्य को देवता में उन्नत करा देता है " धार्मिक मनुष्य का अर्थ है चरित्रवान, पवित्र जीवन और प्रेमपूर्ण ह्रदय वाला मनुष्य। विभिन्न जाति-संप्रदाय के मनुष्यों की पूजा या नमाज की पद्धतियों, बाहरी वेश-भूषा, आचार-अनुष्ठान में अंतर रहना बहुत स्वाभाविक है. यदि बगीचे में एक ही रंग के फूल खिले हों, तो शोभा नहीं होती, रंग-बिरंगे फूलों से ही बगीचे की शोभा बढती है. ' तुम्ही तुम हो- तो क्या तुम हो? हमही हम हैं -तो क्या हम हैं ?
 किन्तु क्षद्म-धर्मनिरपेक्षता का सहारा लेकर हिन्दू-मुसलमानों में झगड़ा कराने वाली एक पार्टी जिसकी स्थापना एक विदेशी ने भारत में अंग्रेजी राज्य को स्थायी बनाने के लिए किया था वह एक संप्रदाय-विशेष को अपना वोट-बैंक बनाने के लिये दंगे करवाती रहती है. इसीलिये श्रीरामकृष्ण ने ' सर्वधर्म समन्वय ' को स्थापित करते हुए कहा था -जितने मत उतने पथ ! जिस  किसी भी साधन-पद्धति (पूजा- नमाज ) को अपनाकर मनुष्य निःस्वार्थी बन जाता हो, वही धर्म है! क्योंकि स्वार्थी मनुष्य ही अशिक्षित और गरीब लोगों का शोषण करते हैं. इसीलिये चाहे हम किसी भी संप्रदाय में जन्म ग्रहण किये हों, निःस्वार्थी मनुष्य बनना ही हमारा प्रथम कर्तव्य है. स्वामीजी कहते थे, विभिन्न लेबल या ब्राण्ड से चिपके तथाकथित धार्मिक लोग जी ' त्रिपुण्ड और टोपी ' धारण करने को ही धर्म समझते हैं,और वैज्ञानिक तर्क की कसौटी पर खरे नहीं उतरते वैसे ही क्षद्म-धर्मनिरपेक्षता की बात करने वाले राजनितिक पार्टियाँ सत्ता की कुर्सी पाने के लिये धर्मों के बीच भाईचारे और सौहार्द को नष्ट कर देते हैं. जब मनुष्य " मेरा धर्म बड़ा है, नहीं तेरा धर्म नहीं- मेरा धर्म बड़ा है !"  कहकर आपस में झगड़ा करने लगता है तो वह निःस्वार्थी बनने के बजाये - राक्षस जैसा बन जाता है और शैतान की तरह उन्मादी आचरण करने लगता है, अगर क्षद्म-धर्मनिरपेक्षता की प्रतिमूर्ति दिगविजय सिंह के शब्दों में कहें तो - ' आदरणीय हफ़िज सईदजी ' जैसा बन जाता है जो २६/११ का मास्टर माइण्ड था.
 इसीलिये स्वामीजी ने कहा था, सम्पूर्ण भारत को आध्यात्मिकता या रूहानियत से प्लावित कर दिया जायेगा; जब सभी धर्म के लोग एक दुसरे की अनुष्ठानिक पद्धति पूजा-नमाज पर न झगड़ कर; समस्त धर्मों की सार बात निःस्वार्थपरता और प्रेम को जीवन में धारण कर लेंगे तो यह राष्ट्रिय एकता ही विश्व-शान्ति या वसुधैव कुटुम्बकम का रूप धारण कर लेगी। स्वामीजी ने कहा था- अद्वैत-वेदान्त के सागर में विश्व के समस्त धर्म -'हिन्दू-मुसलमान-पारसी-सिख-ईसाई ' एक हो जाते हैं, वेदान्त की भूमि पर खड़े होकर देखने से वेद-कुरान और बाइबिल में कोई विरोध नजर नहीं आता है. उनहोंने कहा था कि सर्व-धर्म समन्वय की बुनियाद पर जो नया भारत बनेगा-उसका ह्रदय आध्यात्मिकता या रूहानियत जन्य प्रेम से परिपूर्ण होगा, उसका शरीर इस्लामिक भाईचारे द्वारा गठित और मस्तिष्क वेदान्त द्वारा गठित होगा। वेदान्तिक मस्तिष्क और इस्लामिक शरीर के साथ हृदय की रूहानियत या प्रेम को मिला देने से जब विभिन्न मतावलंबियों में अभेद भाव स्थापित हो जायेगा, तो राष्ट्रीय एकता भी स्थापित हो जाएगी। क्योंकि ह्रदय का प्रेम ही एकता का वह सूत्र है, जिसमे राष्ट्रीय एकता की भावना को पिरोया जा सकता है.  
[समीर दासगुप्ता, सचिव; उत्तर बंगाल विवेकानन्द युवा महामण्डल के बंगला भाषण का १० मिनट का हिन्दी सारांश ]





























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