Tuesday, August 6, 2013

जड़ की रे ? सब चैतन्य ! [सरिसा कैम्प २८/१२/२००५]

" काली-महाराज के लिए वेदान्त एक अन्वेषण था.  उनके प्राणों की भूख थी. उनका मन उस व्याकुलता के आवेग से आर्तनाद से भरा हुआ था. वे श्रीरामकृष्ण के दिव्यसनिध्य में उपविष्ट थे. उनकी ज्ञानान्वेषी वेदान्तिक तर्कशील मानसिकता अंतर की व्याकुलता को अवदमित कर रही थी. उनके प्राणों में यह प्रश्न बार बार उठ रहा था- ' क्या सचमुच, किसी को अभिन्न-दृष्टि प्राप्त हो जाती है ? क्या, किसी को सचमुच सर्वभूतों में आत्मदर्शन होता है ? क्या कोई समर्थ गुरु हैं, जो मुझे ' ज्ञानांजन ' प्रदान करके मेरी आत्मदृष्टि को भी उन्मोचित करा सकते हैं ? यदि कोई समर्थ गुरु हैं, तो वे अद्वैत-ज्ञानी साधक मिलेंगे कहाँ ?
वे इस प्रकार सोच ही रहे थे कि, सिद्धान्त को व्यवहार में रूपांतरित होते देखने का उचित समय उपस्थित हो गया. शायद अन्तर्यामी अद्वैतवादी श्रीरामकृष्ण ने अपनी अद्वैतानुभूती के द्वारा काली-महाराज की आन्तरिक वासना (तीव्र इच्छा) को अपने ह्रदय में अनुभव कर लिया था. इसीलिए उन्होंने काशीपुर-उद्यानबाड़ी में स्वयं इसके दृष्टान्त-स्वरुप बन कर, काली-महाराज को आवेगपूर्ण शब्दों में आदेश दिया-
 " बाहर जा कर देखो, जो आदमी मठ की हरी-हरी घासों पर टहल रहा है, उसको घास पर चलने से मना कर दो. मुझे बहुत कष्ट हो रहा है. ऐसा महसूस हो रहा है, मानो वह मेरी छाती के उपर ही चल रहा हो. " 
काली-महाराज अवाक् रह गए. मन में उठा प्रश्न मन में ही रह गया. सोचने लगे- ' इन्होंने मेरे मन की बात को जान कैसे लिया ? स्तम्भित काली-वेदान्ती ठाकुर के निर्देशानुसार शीघ्रता से बाहर निकल कर देखे- अरे बिलकुल सच ! बाहर एक व्यक्ति मठ की हरी हरी दूबों के उपर टहल रहा था. जल्दी से वहाँ पहुँच कर उसको घास के उपर उस प्रकार चहल-कदमी करने से मना किया.आदेश को सुन कर, उस व्यक्ति ने घास के उपर चलना जैसे ही बन्द किया, उन्होंने देखा कि, ठाकुर श्रीरामकृष्ण थोड़ा स्वस्थ अनुभव करने लगे हैं. अब आश्चर्य-चकित होकर, काली-महाराज अवाक् हो गए और अपलक-दृष्टि से श्रीरामकृष्ण को देखते रह गए; मानो अद्वैत-विज्ञान किसे कहते है, उसके प्रत्यक्ष-प्रमाण स्वरुप जीवन्त वेदान्त-मूर्ति को देख कर मिला रहे हों. 
अद्वैतानुभूती को, आज उन्होंने अपनी आँखों के सम्मुख प्रमाणित होते देख लिया था. विचार कर रहे हैं- इसको ही आत्मज्ञान कहते हैं, इसको ही आत्मदृष्टि कहते है. तृणादि जड़-चेतन, जीव-जगत, सबकुछ के भीतर अपने को देखना ही तो ' अभेदज्ञान ' है. यही तो अद्वैत-वेदान्त का चरम तत्व है- जिसको निज-अनुभव से जानने के लिए साधक को साधनारुपी सोपानों से होकर गुजरना होता है."
आज सुबह के क्लास में मुख्य दरवाजे पर श्रीरामकृष्ण की यही उक्ति " जड़ की रे ? सब चैतन्य ! तोमादेर चैतन्य होक ! " कोटेसन के रूप में टंगा हुआ था. ऐसा प्रतीत हुआ मानो ठाकुर यह दिखा रहे हों कि एक महामण्डल नेता (मानव-जाति के सच्चे मार्गदर्शक) को क्या जानना है ? ठाकुर के इस कृपा-कटाक्ष के बाद दूसरी ओर श्रीश्री माँ सारदा देवी ' व्यवहारिक वेदान्त ' को जीवन में धारण करने का उपदेश दे रही थीं-
 " जगत के आपनार कोरे निते शिखो, केऊ पर नेई मा जगत तोमार ! " - अर्थात " यहाँ कोई पराया नहीं है माँ, सम्पूर्ण विश्व तुम्हारा अपना है ! जब सभागृह में प्रवेश किया तो नवनीदा व्यासपीठ से आज मजाज लखनवी [Asrar ul Haq Majaz  (1911 – 5 December 1955)] की यह नज्म सुना रहे थे -
कुछ नहीं- तो कम से कम ख्वाबे सहर देखा तो है,
जिस तरफ देखा न था, अब तक उधर देखा तो है।
[ पूरी नज्म यूँ है -

ख्वाबे सहर

मेहर (कृपा)  सदियों से चमकता ही रहा अफलाक पर,
रात ही तारी रही इंसान की अदराक पर।
अक्ल के मैदान में जुल्मत का डेरा ही रहा,
दिल में तारिकी दिमागों में अंधेरा ही रहा।
आसमानों से फरिश्ते भी उतरते ही रहे,
नेक बंदे भी खुदा का काम करते ही रहे।
इब्ने मरियम भी उठे मूसाए उमराँ भी उठे,
राम व गौतम भी उठे, फिरऔन व हामॉ भी उठे।
मस्जिदों में मौलवी खुतवे सुनाते ही रहे,
मन्दिरों में बरहमन श्लोक गाते ही रहे।
एक न एक दर पर जबींए शौक घिसटती ही रही,
आदमियत जुल्म की चक्की में पिसती ही रही।
रहबरी जारी रही, पैगम्बरी जारी रही,
दीन के परदे में, जंगे जरगरी जारी रही।
अहले बातिन इल्म के सीनों को गरमाते ही रहे,
जहल के तारीक साये हाथ फैलाते ही रहे।
जहने इंसानी ने अब, औहाम के जुल्मान में,
जिंदगी की सख्त तूफानी अंधेरी रात में।
कुछ नहीं तो कम से कम ' ख्वाबे सहर ' - देखा तो है !
जिस तरफ देखा न था अब तक, उधर देखा तो है।]
…. नवनीदा कहते जा रहे थे- कम से कम ' ख्वाबे- सहर '- या नये प्रभात का स्वप्न तो देख लिया ! इतना तो हमसे हुआ…ये जो इतना गहरा अँधेरा छाया हुआ है, इस गहरे अँधेरे में भी उजाला होने का स्वप्न तो देखा है. स्वामी विवेकानन्द ही प्रभात के सूर्य हैं ! उनको जो एकबार भी देख लेता है, उसके जीवन में छाया अँधेरा दूर हो जाता है. जिसका विवेक जाग्रत हो जाता है, उसे सबकुछ मिल जाता है. योगा -योगा करते रहने से क्या होता है ?
उनका नाम विवेकानन्द कैसे हो गया थ, यह ठीक से ज्ञात नहीं है. अपने गुरुभाइयों का संन्यास नाम उन्होंने ही रखा था. और अमेरिका जाने से पहले उन्होंने अपना नाम भी स्वयं ही रख लिया था और इसी नाम से जहाज का टिकट खरीदा था. विवेक जाग्रत हो जाने से सबकुछ  जाता है. पतंजली योग सूत्र इतना प्राचीन और महत्वपूर्ण ग्रन्थ है कि उसके उपर भाष्य स्वयं व्यासदेव को लिखना पड़ा था. 
 यह जानकर बड़ा आश्चर्य होता है कि हमारा मन - ' मनो मर्कटो मदीरो उन्मत्तः वृश्चिको दंशितः पश्चात् भूत आरुढ़ो ' जैसा चंचल है. ऐसे मन को अपने वश में ले आना ही पुरुषार्थ है. जिनका मन उनके वश में आ गया, वे जगत के स्वामी हो जाते हैं, वे विश्व को  सकते हैं. मन का प्रभु होने वाले को ही मनुष्य कहते हैं. अभी हमलोग मन के दास हैं, जो स्वयं को जीत सकते हैं, वे सबों को जीत सकते हैं. इसीलिये कहा गया है - ' आत्मानं प्रथमं द्वेष रूपेण योजयेत ' - अर्थात मन को ही सबसे बड़ा शत्रु समझते हुये उसे जीत लेना चाहिये, तब जगत जय हो जायेगा। 
मन को जय करने का एक ही नुस्खा गीता में है, भागवत में है और योगसूत्र में है. और वह है - 
"अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः "
इसके आलावा अन्य कोई उपाय नहीं है. सभी शास्त्रों में मन को जीतने की यही औषधि बताई गयी है- अभ्यास और वैराग्य ! इस उपाय द्वै की साधना करते रहने से मन अवश्य वशीभूत हो जाता है. परन्तु मन के वशीभूत होने के स्वाद को पुरे जीवन में दो या तीन बार बस २ या ३ सेकण्ड के लिये ही अनुभव किया जा सकता है. भगवत में कहा गया है - 
यत्र यत्र मनो देहि धार्येत सकलं धिया।  स्नेहात द्वेषात भयात वापि याति तत तत स्वरुपताम।। 
do you fear God ? भगवान क्या डरने की चीज हैं ? उनसे तो प्यार करना चाहिये -वे तो स्वयं प्रेम-स्वरूप हैं ! फिर भी कोई व्यक्ति यदि डर कर भी उनका चिन्तन करे, या उनसे शत्रुता के कारण  भी उनका चिन्तन करे या उनसे प्रेम होने के कारण निरन्तर उनका स्मरण करता रहता हो, चाहे जैसे भी उनकी छवि पर मन को एकाग्र रखने का अभ्यास करता हो, तो उनकी सत्ता हममें आ ही जाती है. इसका अभ्यास जितना ही कम उम्र से आरम्भ करेंगे, उतना ही कल्याणकारी होगा। ध्यान करना क्या है, वो तो हमें मालूम नहीं, किन्तु १४-१५ वर्ष की उम्र से एकाग्रता का अभ्यास करते रहें तो मन इतना एकाग्र हो जायेगा कि दुनिया में सबकुछ प्राप्त कर लेना आसान हो जायेगा। हमलोग जो कुछ भी आविष्कार करते हैं, निर्माण करते हैं, या कविता लिखते हैं, वो सब मन के द्वारा ही होता है. स्वामी विवेकानन्द के जीवन में उनके मन का प्रभु होने को दो उदाहरण यहाँ उद्धृत किये जा सकते हैं. 
वे लाइब्रेरी से सुबह में एन्साइक्लोपेडिया ब्रिटेनिका का एक वॉल्यूम लाते हैं और दूसरे दिन वापस करके दूसरा खण्ड ले आते हैं. लाइब्रेरियन को आश्चर्य हुआ आप कल सुबह में दो खण्ड ले गये थे, और शाम को दोनों वापस कर दिये थे, क्या आपने इसको पढ़ लिया था? स्वामीजी बोले हैं, मैं तो पढ़कर ही वापस किया हूँ, कुछ पूछना चाहते हों, तो पूछ कर देख लीजिये और पूछने पर ठीक ठीक उत्तर देते हैं. और एक बार इंग्लैण्ड में नदी में बहते अण्डे के छिलकों पर एयर गन से निशाना लगते हुए बच्चों के एयर गन से एक बार में ही सभी अण्डों पर सही सही निशाना लगाकर दिखाते हैं, बच्चे आश्चर्य से पूछते हैं कि क्या आप रोज बन्दुक से निशाना लगाने का अभ्यास करते हैं ? स्वामीजी ने कहा मैंने तो आज ही पहली बार बन्दुक से निशाना लगाया है. स्वामी रंगनाथानन्द जी में भी ऐसी ही एकाग्रता देखनो को मिली है. एक बार हम दोनों ट्रेन से साथ में आ रहे थे. उन्होंने अपने बैग से एक मोटी पुस्तक निकाली और १५-२० मिनट में १०-१२ पन्ने पढकर रख दिए. मैंने पूछा अभी अभी जो पोर्शन अपने पढ़ा है, क्या आपको याद भी हो गया ? वे बोले -हाँ, यदि और एक बार देख लूँगा तो उसका शब्द-शब्द याद हो जायेगा। पूछने पर रंगनाथानन्दजी बोले- हम word to word नहीं पढ़ते हैं, पन्ने के बायीं तरफ उपर में लिखे एक लाइन को पढ़ता हूँ, और पन्ने के नीचे लिखे अंतिम लाइन को पढ़ लेने से पूरा पन्ना याद हो जाता है.
 इसी को ' connection of mind ' मनः संयोग या मन का सम्बन्ध कहते हैं. मानो xerox मशीन से चित्त के उपर एक ऑफिस कॉपी छप जाती है. छात्र लोग यदि इस मनः संयोग को सीख लें तो पढाई कितना अच्छा होगा ? मन को एकाग्र रखने का उपाय है, अभ्यास Regular-Practice करने के साथ साथ मन में थोडा वैराग्य का भाव भी रखना होगा। वैराग्य के बिना कुछ नहीं होगा, किन्तु संतत्व केवल परिधान परिवर्तन नही है बल्कि मन का एक ऐसा रूपांतरण है, जहाँ कोई भी पराया शेष नही रहता है ! कबीर ने कहा है-
"मन न रंगाये रंगाये जोगी कपड़ा ! 
दढ़िया बढ़ाये जोगी बन गईले बकरा !
आसान मारि मंदिर में बईठे, 
ब्रह्म छाड़ी पूजन लागे पथरा..! 
जंगल जाय जोगी धुनिया रमवलै,
कमवा जराय जोगी होगइलै हिजड़ा !
गृहस्थ लोगों को बाहरी कपड़े को रंगने की जरुरत नहीं है, अपने मन को,अपने विचारों को ही त्याग के रंग में,पवित्रता के रंग में, रंग लेना चाहिये। प्रत्येक पति को अपनी स्त्री को छोड़ कर अन्य सभी स्त्रियों को अपनी सगी माता, बहन अथवा पुत्री के रूप में देखना चाहिये। विशेष रूप से जो व्यक्ति मानव-जाति का मार्ग-दर्शक नेता बनना चाहता हो, उसके लिये यह आवश्यक है कि वह प्रत्येक स्त्री को मातृवत देखे और उसके साथ तद्रूप व्यवहार करे. क्योंकि मातृपद ही संसार में सबसे श्रेष्ठ पद है, और यही एक अवस्था है जिससे निःस्वार्थपरता की महत्तम शिक्षा प्राप्त की जा सकती है. स्वामीजी कहते हैं- " वास्तव में वह पुरुष धन्य है जो स्त्री को ईश्वर के मातृभाव की प्रतिमूर्ति समझता है, और वह स्त्री भी धन्य है, जो पुरुष के पितृभाव की प्रतिमूर्ति मानती है. तथा वे बच्चे भी धन्य हैं, जो अपने माता-पिता को भगवान का ही रूप मानते हैं. " (३/४२)  
अपने मन में किसी भी सांसारिक विषयों को भोगने की कामना नहीं रखनी चाहिये। स्वामीजी निवृत्ति मार्ग के ऋषि थे, उत्तर आकाश में ध्रुव तारे के चारों ओर जो सप्त-ऋषि परिक्रमा किया करते हैं, वे प्रवृत्ति मार्ग के ऋषि हैं. नरेन्द्र को देखते ही ठाकुर पहचान लेते हैं, तथा भीतरी बरामदे में ले जाकर देवता की तरह सम्मान देते हुए हाथ जोड़ कर कहते हैं - " प्रभु मैं जानता हूँ, आप वही पुरातन ' नारायण ऋषि ' हैं, जीवों का दुःख दूर करने के लिये जगत में आये हैं." निवृत्ति मार्ग का वर्णन पुराणों में किया गया है, किन्तु ठाकुर यहाँ जो नरेन्द्र को नारायण कहते हैं, वह वैकुण्ठ के नारायण नहीं हैं, वे तो निवृत्ति मार्ग के सप्त-ऋषियों में से एक हैं. जिन्हें ठाकुर स्वयं अखण्ड के राज्य से लेकर धरती पर आये थे. ये वही नारायण ऋषि हैं, जो बदरी पहाड़ पर बैठकर १००० वर्ष तक ॐ गायत्री मन्त्र का जाप किये थे, जिसके फलस्वरूप उनको सर्वोच्च स्थित ब्रह्लोक प्राप्त हुआ था. उस समय ध्यान ही उनका भोजन था.
जो व्यक्ति वैराग्य के साथ एकाग्रता का अभ्यास करते हैं, उनमें से कई लोगों को बहुत अधिक मात्रा में भोजन करने की आवश्यकता नहीं रहती। वैराग्य का अर्थ किसी भी वस्तु की बहुत ज्यादा कामना नहीं रखना, लालच नहीं रखना, जीने के लिये जितना आवश्यक है उतना ही ग्रहण करना -परिमित मात्रा में ही सभी वस्तुओं का उपभोग करना। जो लोग मानव-जीवन प्राप्त करके भी उसको सार्थक करने का प्रयत्न नहीं करते और केवल भोगों में ही रचे-पचे रहते हैं, वे भी क्या मनुष्य हैं? त्य ही कहा है....

"एषां न विद्या न तपो न दानं ज्ञानं न शीलं न गुणों न धर्मः?
ते मर्त्यलोके भुविभारभुता....मनुष्यरुपेण मृगाश्चरन्ति!!"
रूप-आकृति या शरीर का ढाँचा तो मनुष्य की तरह है, किन्तु आचरण 'मृगा ' की तरह का यदि हो, तो उसे मनुष्य कैसे कहा जा सकता है ? मृगा का अर्थ केवल हीरण नहीं होता है, उसका अर्थ है -पशु. हमलोगों ने कल जलुद्दीन रूमी का नज्म में सुना था -
" बेजान चीज़ों से मर गया, पौधा बन गया;
 फिर पौधों से मर गया, हैवान बन गया.
  हैवानों से मर गया और 'आदमी ' हो गया. 
 डरूँ क्यों, कि कब मर कर कम हो गया?"
 किन्तु मनुष्य बन जाने के बाद इच्छा होती है कि देवता बन जाएँ। फिर इसी प्रकार अभ्यास और वैराग्य के साथ एकाग्रता का अभ्यास करते हुए उससे भी उन्नत अवस्था ' ब्रह्म ' होने तक यात्रा जारी रहनी चाहिये, इसीलिये रूमी आगे कहते हैं - 
और फ़रिश्तों में से भी चाहिये निकल जाना; 
क्युंके सिवा 'उस' के हर शै को है फ़ना हो जाना।


एक बार फिर फ़रिश्तों से क़ुरबां हो जाऊँगा।
फिर जो सोच में नहीं आता, मैं ' वो ' हो जाऊँगा !!
नरेन्द्र को धरती पर आने का निमन्त्रण देने के लिये, ठाकुर स्वयं अखण्ड के राज्य में जब गये थे, उस घटना का वर्णन करते हुए कहते हैं - " एक दिन देखता हूँ कि - ' मन ' समाधि के मार्ग से ज्योतिर्मय पथ से भी उपर उठता ही जा रहा है ! चन्द्र, सूर्य, नक्षत्र-युक्त स्थूल जगत का सहज में ही अतिक्रमण कर वह पहले सूक्ष्म भाव-जगत में प्रविष्ट हुआ. उस राज्य के ऊँचे ऊँचे स्तरों में वह जितना ही उपर उठने लगा, उतना ही अनेक देवी-देवताओं की मूर्तियाँ पथ के दोनों ओर दिखाई पड़ने लगी. क्रमशः वह उस राज्य की अन्तिम सीमा पर आ पहुँचा। 
वहाँ देखा कि एक ज्योतिर्मय पर्दे के द्वारा खण्ड और अखण्ड राज्यों का विभाग किया गया है. उस पर्दे को लाँघ कर वह क्रमशः अखण्ड राज्य में प्रविष्ट हुआ. वहाँ देखा, मूर्तरूप-धारी कुछ भी नहीं है, यहाँ तक कि दिव्य-देहधारी देवी-देवता भी वहाँ प्रवेश करने का साहस न कर सकने के कारण बहुत दूर नीचे अपना अधिकार फैलाकर अवस्थित है. किन्तु दूसरे ही क्षण दिखाई पड़ा कि दिव्य-ज्योतिर्तनु सात प्राचीन ऋषि वहाँ समाधिस्थ होकर बैठे हैं. समझ लिया कि ज्ञान और पूण्य में तथा त्याग और प्रेम में ये लोग मनुष्य का तो कहना ही क्या- देवी-देवता तक के परे पहुँचे हुए हैं ! विस्मित होकर इनकी महिमा के विषय में सोचने लगा. इसी समय सामने देखता हूँ, अखण्ड, भेद-रहित, समरस ज्योतिर्मण्डल का एक अंश घनीभूत होकर एक दिव्य शिशु के रूप में परिणत हो गया. फिर वह दिव्य-शिशु उन सप्त-ऋषियों में एक के पास जाकर अपने कोमल हाथों से आलिंगन करके अपनी अमृतमयी वाणी से उन्हें समाधि से जगाने की चेष्टा करने लगा. शिशु के कोमल प्रेम-स्पर्श से ऋषि समाधि से जाग्रत हुए और अधखुले नेत्रों से उस अपूर्व बालक को देखने लगे. 
उनके मुख-मण्डल के प्रसन्नोज्ज्वल भाव देखकर ज्ञात हुआ कि मानो वह बालक उनका बहुत दिनों का परिचित ह्रदय-धन है. वह अद्भुत देव-शिशु अति आनन्दित हो उनसे कहने लगा- ' मैं जा रहा हूँ, तुम्हें भी आना होगा !' उसके अनुरोध पर ऋषि के कुछ न कहने पर भी उनके प्रेमपूर्ण नेत्रों से अन्तर की सम्मति प्रकट हो रही थी. इसके अनन्तर वह ऋषि, बालक को प्रेम-पूर्ण दृष्टि से देखते हुए पुनः समाधिस्थ हो गये. उस समय आश्चर्य से चकित होकर मैंने देखा कि उन्हीं के शरीर-मन का एक अंश उज्ज्वल ज्योति के रूप में परिणत होकर विलोम-मार्ग से धराधाम पर अवतीर्ण हो रहा है. नरेन्द्र को देखते ही मैं जान गया था, कि यही वह ऋषि है ! " उस दर्शन में जो दिव्य-शिशु ऋषि को आने का निमंत्रण दे रहा था वह स्वयं श्रीरामकृष्ण देव थे " (श्रीरामकृष्ण लीलाप्रसंग पेज ८०-८१ )
अखण्ड के राज्य से वह ऋषि नरेन्द्र बनकर नरेन्द्र बनकर क्यों आये थे ? सिर्फ मानव-कल्याण के लिये।.. इस धरती में बहुत कष्ट है,बहुत दुःख है; किन्तु उस दुःख-कष्ट को हमलोगों ने स्वयं बुलाने की चेष्टा की है, वह हमारे ही कर्मों का फल है, किन्तु बाद में रोना पड़ता है. पर अब बुढ़ापे में रोने से क्या होगा ? क्यों हमने युवाकाल में ही जीवन-गठन करने का प्रयत्न नहीं किया ? जब समय रहते , जब जवानी का तेज मुझमें विद्यमान था, उस समय 3H के निर्माण का कोई प्रयत्न नहीं किया, तो बुढ़ापे में पश्चाताप करने से भी कोई उपाय नहीं सूझेगा। इसी प्रकार सही समय पर उचित जीवन-लक्ष्य का निर्धारण नहीं कर पाने से लाखों युवाओं का जीवन नष्ट हो जाता है. हमारे राजनीतिज्ञ लोग तथाकथित धर्म-रक्षक या छद्म-धर्मनिरपेक्षता का चोंगा ओढ़कर हमारे युवाओं को fodder या चारे की तरह, अपनी रोटी सेंकने के लिये हिन्दू-मुसलमानों में दंगा करवाने या भारतवासियों में घृणा फ़ैलाने के लिये उनका उपयोग करते हैं. स्कूल-कॉलेज में शिक्षा ग्रहण करने के साथ साथ जीवन-गठन या चरित्र-निर्माण का प्रशिक्षण देने की कोई शिक्षा-नीति पूरे भारतवर्ष में कहीं नहीं है. 
अभी (२००५ में) पश्चिम बंगाल के साम्यवादी मुख्यमन्त्री जिस रस्ते से जा रहे थे, उसमें लैण्डमाईन का कॉइल बिछा हुआ दिखाई पड़ा, तब  D.G.P डर कर मिलिट्री से माईन डिफ्यूज करने वाला एक्सपर्ट बुलवाये और रास्ता साफ किया। किन्तु साम्यवादी पार्टी के हेडक्वार्टर से आदेश आया कि आगे से C.M को जिस रस्ते से भी पैदल जाना होगा, तो उनके आगे आगे ४०० पार्टी कैडर के कामरेडों को भेज कर रास्ते की निराप्त्ता टेस्ट करवाना अनिवार्य होगा। उनको मरने दो ! क्या पार्टी कैडर और मुख्यमंत्री के प्राण में साम्यवाद नहीं है ? मनुष्य का जीवन कितना सस्ता हो गया है ? ये राजनीतिज्ञ लोग अपने जीवन की रक्षा करने के लिये कितने भी लोगों को मरवाने से नहीं हिचकते हैं, क्या उनके ह्रदय थोड़ा भी feeling for others, थोड़ी भी समानुभूति या हमदर्दी Empathy नहीं है? जबकि हमारे शास्त्रों में कहा गया है कि- ' मनुष्य से श्रेष्ठ और कुछ भी नहीं है !' मनुष्य विधाता की सर्वश्रेष्ठ रचना है। महर्षि वेद व्यास ने इसके संबंध में कहा है, 
''गुह्य ब्रह्म तदिदिं ब्रवीमि, नहि मानुषात् श्रेष्ठतरं हिं किंचित।'' 
अर्थात् मैं बड़े भेद की बात तुम्हें बताता हॅू, मनुष्य से बढ़कर संसार में कुछ नहीं है।मनुष्य अभी क्या है, आगे उसमें क्या बन जाने की सम्भावना है ? इसका वर्णन भगवत-महापुराण के साथ साथ इस्लाम और ईसाई पुराणों में भी पाया जाता है. अल्ला,जिसको यहाँ ब्रह्माजी कहते हैं, ने जब समूची दुनिया को बना लिया,तो भी वे बहुत satisfied नहीं हुए. किन्तु जब मनुष्य को बना लिया तो अपनी इस रचना को देखकर वे बहुत खुश हो गए. उन्होंने सभी फरिस्तों या देवदूतों को बुलाकर कहा कि तुमलोग इसको सिर झुकाकर प्रणाम करो, यह हमारी श्रेष्ठतम रचना है. सभी फरिस्तों ने सिर को झुकाया, लेकिन एक इब्लीस ने सिर नहीं झुकाया तो उसीको अल्ला कहा-तुम दूर हो जाओ शैतान ! भारतीय परम्परा के अनुसार सृष्टि में जीवन का विकास क्रमिक रूप से हुआ है। इसकी अभिव्यक्ति अनेक ग्रंथों में हुई है। श्रीमद्भागवत पुराण में क्रमविकास का सिद्धान्त, ' Evolution Theory ' वर्णन आता है-

सृष्ट्वा पुराणि विविधानि अजया आत्मशक्त्या 
 वृक्षान्‌ सरीसृपपशून्‌ खगदंशमत्स्यान्‌।तैः तैः अतुष्टहृदयः पुरुषं विधाय
                व्रह्मावलोकधिषणं मुदमाप देव:॥ ११-९-२८ 

भगवान ने अपनी अचिन्त्य आद्या-शक्ति के द्वारा स्थावर-जंगम कई प्रकार की सृष्टि को रचा. इस क्रम में वृक्ष, सरीसृप, पशु, पक्षी,डंक मारने वाले कीड़े, मकोड़े, मत्स्य आदि अनेक रूपों में सृजन हुआ। परन्तु उससे स्रष्टा के मन में संतुष्टि नहीं हुई. अत: अन्त में मनुष्य का निर्माण हुआ जो अपने स्रष्टा को भी देखने में समर्थ था. जिस मूल तत्व को प्रयोगशाला में पंचेन्द्रियों के द्वारा नहीं जाना सकता, जिसको बुद्धि से भी जानना संभव ही नहीं है,मनुष्य उसका भी साक्षात्कार कर सकता है। यही क्षमता प्रत्येक मनुष्य के भीतर अभी सर्वोच्च-संभावना के रूप में छुपी हुई है. ऐसी अद्भुत-शक्ति से सम्पन्न मनुष्य को देखकर सृष्टा को बहुत आनन्द हुआ. 
[समस्त प्राणियों को दो भागों में बांटा गया है, योनिज तथा आयोनिज। दो के संयोग से उत्पन्न या अपने आप ही अमीबा की तरह विकसित होने वाले। बृहत्‌ विष्णु पुराण में संख्या के आधार पर विविध प्रकार के ८४ लाख योनियों का वर्गीकरण किया गया है।]
'जन्माद्यस्य यतः' - जिससे सबकुछ निकला, जिसमें सबकुछ स्थित है और जिसमें सबकुछ लीन हो जाता है; उसी चैतन्य से उत्पन्न इस अति-दुर्लभ मनुष्य-जीवन को सार्थक नहीं बनाकर, अर्थात मूलतत्व का साक्षात्कार किये बिना, क्या पशुओं की तरह केवल, ' आहार-निद्रा-भय-मैथुन ' करके पशुओं की तरह मर जाना मनुष्य को शोभा देता है ? अतः युवा-काल से ही मनुष्य जीवन को गठित करने का प्रयत्न करना चाहिये। जीवन-गठन का तात्पर्य है-चरित्र को बनाना। और चरित्र-निर्माण की सबसे पहली आवश्यकता है, मन को वश में लाना। मन के वशीभूत होने का अर्थ है, विवेक सम्पन्न ' मनुष्य ' बन जाना। अर्थात ज्ञान की ज्योति का जाग्रत हो जाना। 
[' देहाभिमाने गलिते विज्ञाते परमात्मनि ' -की अवस्था (देहाभिमाने गलिते विज्ञाते परमात्मनि ।यत्र यत्र मनो याति तत्र तत्र परामृतम् ॥ ३१ ॥ भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयः । क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टे परावरे ॥ ३२ ॥ ॥ सरस्वतीरहस्योपनिषत् ॥ ) जब देह होते हुए भी मैंने (आत्मा ने) अपने को देह से पृथक् अनुभव किया था, जो अपनी मौत की यात्रा के साक्षी बन जाते हैं उनके लिये यात्रा केवल यात्रा भर रह जाती है, साक्षी उस यात्रा से परे हो जाता है। ]
 अर्थात मिथ्या मैं-पन के धारावाहिकत्व के भ्रम को हटाकर यह अनुभव से जान लेना कि मैं केवल मरण धर्मा शरीर मात्र नहीं हूँ, मेरी सार-वस्तु, सत्ता तो आत्मा या ब्रह्म हैं. ब्रह्म का अर्थ है बृहत व्यापक सबसे बड़ा -सब कुछ इसी के उपर अध्यारोपित है. हमलोगों का यथार्थ स्वरुप भी वही चैतन्य है-जिससे सबकुछ निकला है ! उसका साक्षात्कार करने या अनुभव से जानने के लिये लालच को कम करते हुए एकाग्रता का -या विवेक-प्रयोग का निरन्तर अभ्यास करते रहना होगा। संतोष से बड़ा और कोई सद्गुण नहीं है, माँ सारदा स्वयं ऐसा कहती थीं. पूर्णत्व का अर्थ है, अपना जीवन जगत की सेवा में समर्पित कर देना- यही है वैराग्य का भाव, इसके साथ साथ मन को एकाग्र करने का अभ्यास। अर्थात यह देखते रहना कि मेरा मन अभी कहाँ है ? मन्दिर में, बाजार में, किचेन में जाता है, अभी घर में चला गया ? 
यहाँ-वहाँ कई स्थानों में जा रहा है, उसकी इस दौड़ को देखकर थोड़ा हँसना और उसको समझाना-बुझाना-' बाबा उधर कहाँ जाता है ? थोडा इधर आओ ! ह्रदय में एक आसन बिछाकर उस पर जगत-बन्धु स्वामी विवेकानन्द को बैठाकर उनका ही चिन्तन करो. या ठाकुर को बैठा सकते हो. क्योंकि ईश्वर क्या है, यह हमलोग अभी नहीं जानते हैं. वेद कहता है- " न तस्य प्रतिमा अस्ति " (उसकी कोई प्रतिमा नहीं है )| क्योंकि वो सर्वत्र व्यापक है उसको किसी ने भी देखा नहीं है |वो निराकार होते हुए साकार ब्रह्माण्ड का निर्माता है संसार में जितनी भी जीती जागती प्रतिमाये हैं वो सभी उस निराकार परमात्मा का साकार स्वरुप हैं | किन्तु हमारे मन का गठन इस प्रकार हुआ है कि उसे मूर्त से अमूर्त तक पहुँचने में आसानी होती है. अमूर्त या निराकार वस्तु में मन को लगाना संभव नहीं होता। इसलिये स्वामीजी ने योगसूत्र समाधि पाद का उल्लेख करते हुए कहा है - 
ईश्वरप्रणिधानाद्वा ॥ 1/ 23 ॥ 
ईश्वरप्रणिधान से अथवा।
 अपेक्षाकृत अल्पकाल में होनेवाले चित्तवृत्तिनिरोध अथवा समाधि - सिद्धिलाभ के लिये अन्य श्रेष्ठ उपाय ईश्वर - प्रणिधान है। प्रणिधान का तात्पर्य है - अनन्य चित्त होकर पूर्णभक्तिभाव से आत्मसमर्पणपूर्वक उपासना करना। अब हमने यदि ईश्वर को देखा ही नहीं है, तो उसकी भक्ति कैसे करें ? इसलिये इस सूत्र को सरल करते हुए कहते हैं-' महापुरुष प्रणिधानाद्वा '! तुमको जिस किसी तत्वदर्शी महापुरुष में आस्था हो जिनके जीवन को तुमने पढ़ा या नजदीक से देखा हो, जैसे ठाकुर-माँ-स्वामीजी की छवि या मूर्ति पर मन को एकाग्र करने का अभ्यास किया जा सकता है. 
स्वामी विवेकानन्द को तो भारत सरकार ने भी ' युवा आदर्श ' युवाओं के ' नेता ' के रूप में स्वीकार किया है. क्योंकि वे सभी जाति, और सभी धर्म के युवाओं से प्यार करते थे, यहाँ तक जी युवा किसी ईश्वर पर विश्वास नहीं करता हो, उससे भी प्यार करते थे. उनके चित्र के उपर मन को एकाग्र करना एक scientific process है, mechanical method है. विवेकानन्द के उपर मन को एकाग्र करने से कोई हिन्दू नहीं बन जाता है. उन्होंने सभी संप्रदाय के युवाओं को जीवन से सर्वाधिक लाभ उठाने का उपाय बताया है. यहाँ विवेकानन्द के चित्र या मूर्ति की कोई हिन्दू ढंग पूजा करने को भी नहीं कहा जाता है. केवल चंचल मन को वश में लेन के लिये ही, किसी महापुरुष के चित्र पर मन को एकाग्र रखने के लिये कहा गया है. यदि कोई चाहे तो ईसामसीह की मूर्ति या छवि को अपने ह्रदय में धारण कर उनके उपर भी मन को एकाग्र करने का अभ्यास कर सकता है. तब पूरी दुनिया मुट्ठी में आ जायेगी। 
इसके लिये अब रीढ़ की हड्डी सीधी रखते हुए अर्ध-पद्मासन में बैठो और यह देखने की कोशिश करो कि तुम अपने ह्रदय में स्वामीजी की छवि देख पा रहे हो या नहीं ? इसको बिल्कुल एक खेल के जैसा लो, और मन से अनुरोध करते रहो, उसको समझाते रहो कि अभी थोड़ी देर तक केवल उन्हीं का चिन्तन करना है. यदि ऐसा होने लगा तो बहुत कल्याण हो जायेगा। पवित्र और अच्छे विचारों से मन जितना अधिक भरा रहेगा हम उतने ही अच्छे मनुष्य बन जायेंगे। यह अभ्यास बिल्कुल logical है, सरलता से समझ में आ जाता है, गूढ़ तत्व इसमें कुछ नहीं है, मन को वश में रखने का सबसे सरल उपाय है. ॐ 


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