Thursday, December 6, 2012

$@$ स्वामी विवेकानन्द और हमारी सम्भावना [49] 'कमी को दूर करने का उपाय' ( को अर्थवान् को दरिद्रा?) (7 व्यवहारिक जीवन में आध्यात्मिकता),

 कमी (inadequacy) दूर कैसे होगी ? 
(नये संस्करण में नहीं है? )
विवेकानन्द कहते हैं, " मैं कोई तत्वज्ञानी व्यक्ति नहीं हूँ, कोई दार्शनिक नहीं हूँ, यहाँ तक कि मैं संन्यासी भी नहीं हूँ। मैं एक गरीब आदमी हूँ, और गरीबों से प्यार करता हूँ। " उनके इसी प्रकार के कई संदेशों के द्वारा मानो उनके हृदय को भी पढ़ा जा सकता है। यहाँ गरीब कहकर, वे हमें क्या समझाना चाह रहे हैं?
गरीबी, आभाव या रिक्तता (emptiness) क्या है ? केवल धन, भोजन-वस्त्र, या आवास की कमी को ही आभाव - समझ लेना ठीक नहीं होगा। और एक आभाव होता है- कोई अ-भाव, उसको भी समझना होगा। चाणक्य नीति में कहा गया है- 
 स: हि भवति दरिद्रो,
यस्य तृष्णा विशाला ।
मनसि च परितुष्टे ,
को अर्थवान् को दरिद्रा ।।
- ऐसी अवस्था जिन मनुष्यों की हो, जिसकी तृष्णा (राजा ययाति जैसी) बहुत अधिक हो, वे भी तो दरिद्र ही होते हैं ! इस प्रकार के दरिद्र लोगों के अभाव को मिटाने का क्या उपाय है ? कोई व्यक्ति मृग-छाला पहन करके स्न्तुष्ट हो जाता है, किसी को रेशमी कपड़े से संतुष्टि होती है। वास्तविक दरिद्र वह होता है जिसकी आकांक्षा अर्थात कामना-वासना बहुत अधिक होती है। वासनात्मक इच्छा प्रबल होने से, उसकी अप्राप्ति-जनित दुःख और अभाव-बोध उस व्यक्ति को व्यथित करता रहता है। किसी को मृग-छाला में और किसी को रेशमी कपड़े में जो सन्तोष प्राप्त होता है, दोनों अवस्थाओं में मिलने वाला सन्तोष किन्तु एक समान ही होता है। जो व्यक्ति कुछ और मिल जाने की चाह में व्यथित न होकर, जितना मिल गया हो, उतने में ही सन्तुष्ट रहता है, वही वास्तव में धनी है।
किन्तु इसके विपरीत सबकुछ होने के बाद भी जो सदैव रिक्तता के बोध से पीड़ित रहने वाले जितने क्षद्म -दरिद्र मनुष्य हैं, स्वामी विवेकानन्द वैसे अभावग्रस्त लोगों के प्रति भी हृदय से सहानुभूति और प्रेम करते थे।क्यों ? इसका कारण यह है कि उस प्रकार के मिथ्या-आभाव से जितने मनुष्य ग्रस्त होते हैं, वे जीवन भर दौड़-धूप करते रहने के बाद भी,इस महा 'मूल्यवान मनुष्य-जीवन' का जो वास्तविक सम्पद है, उस चरम लक्ष्य या सम्पदा को खोजने की फुर्सत उन्हें आजीवन नहीं मिल पाती है। और टमटम में जूते हुए घोड़े जैसा जीवनभर झूठी मृगतृष्णा के पीछे दौड़ते दौड़ते थक-हार कर, अन्ततोगत्वा लम्बी लम्बी साँसे भरना ही उनके जीवन का एकमात्र सहारा बन जाता है।
वे मनुष्य शरीर प्राप्त करके जिस दैवी-सम्पद का अधिकारी बन सकते थे, उसके अभाव में केवल दूसरों को वंचित करके, पाशविक शक्ति के द्वारा आसुरी-सम्पद को अर्जित करने में ही अपने जीवन को नष्ट कर लेते हैं। स्वामीजी ने अपने जीवन के द्वारा मनुष्य के सच्चे स्वरूप को प्रस्फुटित करने की जिस साधन-पद्धति का दिग्दर्शन  किया है, सही रूप से उसी का अनुसरण करने पर हमलोगों के समस्त आभाव दूर हो सकते हैं। स्वामीजी के आन्तरिक प्रेम और स्वीकारोक्ति का तात्पर्य इसी बात में है।
वास्तव में हमलोग जितने भी प्रकार के अभाव या कमियाँ देख रहे हैं, उन सब में केवल आसुरी-सम्पद को संग्रहित करने की प्रवणता ही प्रकट होती है। अनैतिक तरीके से, दूसरों को कष्ट देकर, वंचित करके मनुष्य धन कमा रहा है, और किसी भी कीमत पर केवल अपनी कमाई ही बढ़ाना चाहता है। कहता है, ' आज तो मैं लखपति हूँ, इतना ही धन मेरे पास है; और अधिक धन मेरे पास हो जायेगा, और कल मैं करोड़ पति बन जाऊँगा !'  जितना धन अभी उसके पास है, उतने से उसको कभी सन्तोष नहीं होता है। 
किन्तु येन-केन-प्रकारेण वह अधिकाधिक भौतिक वस्तुओं के संग्रह और अर्जन में जो वह लगा हुआ है, यह (मूर्खता) उसके मूल स्वभाव (ज्ञानस्वरूप) के विपरीत है। मनुष्य के मूल स्वाभाव में दैवी सम्पद संजात गुणों को अर्जित करने की प्रवणता हमेशा बनी रहती है। अपने जीवन में समत्व-बोध, दया, क्षमा, परोपकार, अनुकम्पा, प्रेम आदि गुणों को अर्जित करने के लिये ही उसका वास्तविक जीवन-संग्राम चल रहा है।
किन्तु यह दैवी-सम्पदा क्षुद्र स्वार्थ के सीमित घेरे का अतिक्रमण करके, दूसरों के लिये आत्मबलिदान करने की चेष्टा द्वारा ही प्राप्त हो सकती है। मुझे यह समझना होगा कि धन-दौलत तथा अन्य जितने प्रकार के भोग-ऐश्वर्य के संसाधनों को परिश्रम के द्वारा संचय करूँगा, उसका मूल्य वहीँ तक है, जहाँ तक वे मुझे दूसरों के साथ एकात्मबोध की ओर अग्रसर होने में मदत करते हों। और जब सभी मनुष्यों को यही बोध परस्पर को प्रेम करने के लिये अनुप्रेरित करेगी, तब सामान्य जीवन की न्यूनतम माँग को दूसरों के साथ बाँट कर लेने की प्रेरणा और बुद्धि भी मेरे भीतर जाग्रत हो जाएगी। 'आभाव' या कमी के विषय में ऐसी गहरी और व्यापक समझ नहीं रहने के कारण ' मैं और सभी मनुष्य' अपने को अभाव-ग्रस्त मानते रहते हैं, इसीलिये मैं अब इसी बोध के द्वारा दूसरों को अन्य सभी मनुष्यों से प्रेम करने के लिये उद्बुद्ध करूँगा। भौतिक जीवन की न्यूनतम आवश्यकताओं को दूसरों के साथ बाँटकर लेने की प्रेरणा और बुद्धि जाग्रत होगी। गीता में भी इसी भाव के अनुसार आसुरी सम्पद और दैवी सम्पद विभाग के विषय में कहा गया है।
समता सम्बन्धी उपदेश को सुनकर अर्जुन मन की चंचलता के कारण उसमें अपनी अचल स्थिति होना बहुत कठिन समझकर रहे हैं, और पूछते हैं-श्रेष्ठ मनुष्य कौन है, परम योगी किसको कहूँगा ? तब भगवान श्रेष्ठ मनुष्य और परम योगी को परिभाषित करते हुए गीता ६.३२ में कहते हैं-
 आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन ।
 सुखं वा यदि वा दु:खं स योगी परमो मत: ।।
 हे अर्जुन जो पुरुष अपने समान सर्वत्र सम देखता है चाहे वह सुख हो या दुख वह परम योगी माना गया है।।
अर्थात जो व्यक्ति जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में विवेक-बुद्धि का प्रयोग करके सभी मनुष्यों को अपने साथ तुलना करके सबों को अपने समान देखता है, तथा उस विशेष परिस्थिति में जिस व्यक्ति के साथ अपनी तुलना कर रहा हो, उसके सुख या दुःख दोनों को अपना सुख-दुःख समझ पाने में समर्थ होता है, वह योगी श्रेष्ठ है, यह मेरा मत है।
इससे दुर्लभ ज्ञान और भला क्या हो सकता है ? यथार्थ (सच्चे) मनुष्य के जीवन में योग रहता है। वह सम्पूर्ण विश्व के साथ एकात्मता का अनुभव करता है। उस अवस्था में पहुँचने पर योगी केवल विश्व के मनुष्यों के ही नहीं, सभी प्राणियों के सुख-दुःखों का अनुभव अपने हृदय में करते है, और सब के सुख-दुःखों के साथ अपने को अविच्छिन्न भाव से मिलाये रखते हैं। स्वामी विवेकानन्द ने अपने जीवन में परम् योगी के इस आदर्श को रूपायित कर लिया था। इसीलिये महात्मा वे हैं, जिनका हृदय गरीबों के लिये रक्त के आँसू रोता है। वे महात्मा हैं, जो गरीब और अन्य सभी अभावग्रस्त लोगों के लिये सहानुभूति संपन्न होकर उनकी जो सबसे बड़ी कमी है उसकी अपना ही चरम अभाव समझकर, उनके दुःख को अपना दुःख जैसा अनुभव करते हैं! [महात्मा गाँधी का प्रिय भजन था -वैष्णवजन तो तेने कहिये जो पीर परायी जाने रे ! दूसरों का सबसे बड़ा दुःख है, सिंह होकर भी अपने को भेड़ समझते रहना।] स्वामीजी उसी सबसे बड़े दुःख की बात कहते हैं - अविनाशी आत्मा होकर भी स्वयं विनाशी शरीर और मन समझते रहने के दुःख की बात कहते हैं - जिसका हृदय जितना उच्च या जितना विशाल होगा, उसका दुःख उतना ही अधिक होगा।  " यतो उच्च तोमार हृदय, ततो दुःख जानियो निश्चय " -अर्थात तुम्हारा हृदय जितना विशाल होगा, लोगों के दुःख से तुम्हें उतना ही दुःख भोगना पड़ेगा। अभी हमलोग शायद लाखो-करोड़ो साधारण जनता के दुःख का अनुभव नहीं कर पा रहे हों, किन्तु जिस महात्मा विवेकानन्द ने यह बात कही थी,उनका हृदय सचमुच गरीबों के लिये रुदन करता होगा-इस बात को हमें अवश्य समझना चाहिये।
 उन्होंने व्याकुल कण्ठ से कहा है, " देवताओं तथा ऋषि-मुनियों की संतानें (ईश्वर होकर भी )पशु के समतुल्य बन गये हैं, तथा ये युगों युगों से आधा पेट खा कर जीवित हैं। यह देख कर क्या तुम बेचैन हो जाते हो ? उनकी चिंता में क्या तुम्हारे रातों की नीन्द चली गयी है? उनके दुःख दूर केने की व्यग्रता क्या तुम्हारे नस-नाड़ियों में रक्त बन कर बह रही है? यह क्या तुम्हारे धमनियों में प्रवाहित होकर तुम्हारे हृदय के स्पंदन के साथ एक हो गये हैं ? उनकी अवस्था देख कर क्या तुम्हारी हालत पागलों जैसी हो गयी है ?"

यथार्थ सम्पद के अधिकारी मनुष्य प्रेममय, आनन्दमय होते हैं। वे जगत के महा दुःख, महामृत्यु, महाश्मशान के परम-वेदना के भीतर भी जीवन के रहस्य का आविष्कार करके धन्य हो जाते हैं। तथा  नचिकेता के जैसा श्रद्धावान, आत्म-साक्षात्कार की अनुभूति को प्राप्त कर ,वे सामान्य मूर्खतापूर्ण भोग-सुख और क्षणभंगुर संकीर्ण  जीवन-दृष्टि से बहुत उपर उठकर शाश्वत-जीवन के मृत्युंजयी चेतना के अधिकारी  बन कर महा-सम्पदशाली (अरब-खरबपति) बन जाते हैं। इसीलिये उसके व्यक्तिगत जीवन की जो अस्थिरता, जो आकूति होती है, वह है- उनके साथ जो आत्मिक योग में प्रतिष्ठित जितने भी अन्य कार्यकर्ता होते हैं, उनको भी समानरूप से, समचेतना में उन्नत करने की व्याकुलता है। जो मनुष्य  अभी सत्य से कोसों दूर हैं, सच्चा आनन्द कहाँ है- उसे ढूँढ़ नहीं पा रहे हैं, भयंकर रिक्तता या अभावबोध से निरन्तर विफलता के चोर-बालू (quicksand बलुआ दलदल,3W में फंसकर) पथभ्रष्ट हो रहे हैं।  उनके लिये सही दिशा-निर्देश करने का आन्तरिक आवेग के कारण , जितने प्रयत्न और उससे उत्पन सहस्त्रों कष्टों को सहर्ष स्वीकार करना हो, वे समस्त कष्टस्वीकर उनके लिये आनन्द की वस्तु बन जाती है।
विश्व में समस्त मनुष्यों के बीच जो योग है, शायद उसको अभी हम साधारण दृष्टि से समझ नहीं पा रहे हैं, किन्तु उसको पूरी तरह से नकार भी नहीं सकते हैं। क्योंकि हम अपने अन्तरमन में उस अनुभूति का स्पर्श पाते रहते हैं। इस अनुभूति को और अधिक बढ़ा लेने की साधना ही, हमलोगों को जीवन के समस्त आभाव-बोध से उपर उठा सकता है। परस्पर प्रेम करने से यथार्थ मानव-धर्म की उन्नति होती है। इसी धर्म के पालन एवं प्रकाश के भीतर ही सच्चे मनुष्य के रूप में जीना कहते हैं। 
इसी बात को महाभारत में दुसरे रूप में कहा गया है- " धर्म एव हतो हन्ति, धर्मो रक्षति रक्षितः " धर्म एक ऐसी वस्तु है कि इसकी रक्षा करने से, वह भी मेरी रक्षा करता है, और उसका हनन करने से मैं भी विनाश को प्राप्त हो जाता हूँ। " जब यह बोध किसी के जीवन में प्रतिष्ठित हो जाता है, तो उसीको आध्यात्मिकता कहते हैं। मैं सर्वभूतों के साथ एक और अभिन्न हूँ। मैं बचा रह सकता हूँ, जीवित रह सकता हूँ, बड़ा बन सकता हूँ, समस्त अभावों को पूर्णतया समाप्त कर सकता हूँ, यदि मैं सबों के भीतर जीवित रहूँ। यदि ऐसा नहीं हो सका तो, मेरे मनुष्य-देह धारण करने का कोई अर्थ ही नहीं है।
[ दूसरे के पैर में काँटा गड़ गया हो, तो योगी अपने अन्तर में उसका क्लेश अनुभव करते हैं। जीवन के व्यवहारिक क्षेत्रों में ' अहं ब्रह्मास्मि ' -की ऐसी अनुभूति ही योगी को विश्व-प्रेमिक बना देती है। उस अवस्था में योगी त्रिभुवन के लिये मंगलरूप होकर विचरण करते हैं। यह प्रेम दिखावटी विश्व-बन्धुत्व मूलक नहीं है, बल्कि यह विश्व के साथ एकात्मता बोध जनित प्रेम; ' आत्मज्ञान से विश्व-सेवा' या ' शिव-ज्ञान से जिव सेवा।' अर्थात आत्मानन्द का सम्भोग।  सर्वं खल्विदं ब्रह्म -अर्थात ये सभी निश्चय ही ब्रह्म हैं। यह महावाक्य श्रीरामकृष्ण के जीवन में विभिन्न रूपों में प्रकट हुआ था। देवघर में अकाल-पीड़ित सैंकड़ो नर-नारियों के कंकाल समान चेहरे और प्रायः नंगे शरीर को देखकर वे रो पड़े थे। ....लाचार होकर मथुर बाबु ने उन सभी को भरपेट खिलाया, सिर के लिये तेल दिया, एक-एक नया वस्त्र भी दिया। यही विश्व को आत्मवत देखना है। कालीबाड़ी के गंगा-किनारे दो माझी झगड़ा कर रहे थे, दुर्बल माझी की पीठ के चोट चिन्ह श्रीठाकुर की पीठ पर देखकर हृदयराम आश्चर्य चकित हुए। एक दिन पूजा के लिये दूब और बेलपत्र चुनने गये थे। दूब चुनते समय उन्हें अनुभव होने लगा, सर्वत्र चैतन्य हैं, दुर्बाद्ल छिन्न होकर कष्ट का अनुभव कर रहे हैं ....]

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