Monday, October 22, 2012

$$$स्वामी विवेकानन्द और हमारी सम्भावना [31] " जीवात्मा और धर्म " (धर्म और समाज),

 ' प्रत्येक मनुष्य के भीतर अवतार होने की सम्भावना है !'
जब हम किसी नये विषय को,किसी पूर्व-परिचित विषय के साथ मिला कर समझने की चेष्टा करते हैं, तब उसे समझने में आसानी होती है। हमलोग पहले अपनी इन्द्रियों के माध्यम से ही  किसी बाह्य वस्तु को समझने की चेष्टा करते हैं। भौतिक जगत के जिन पाँच विषयों, ' रूप-रस-शब्द-गंध-स्पर्श' आदि का ज्ञान हम अपनी पाँच ज्ञानिन्द्रियों-आँख, जिह्वा, कान, नाक और त्वचा के माध्यम से अनुभूति के द्वारा करते हैं- उसे इन्द्रियज-ज्ञान कहा जाता है। 
किन्तु जो वस्तु बाह्य जगत में दृष्टिगोचर नहीं होती, उसको समझने में हमलोगों को थोड़ी कठिनाई होती है। तब हमलोग बाह्यजगत की वस्तु के जैसा किसी विचार को लेकर उसको समझने की चेष्टा करते हैं। मूर्ति का विचार यहीं से उत्पन्न हुआ है। क्योंकि हमलोग किसी निर्गुण-निराकार वस्तु की कल्पना नहीं कर सकते हैं, इसीलिये इन समस्त गुणों से युक्त किसी वस्तु की कल्पना करके, देश-काल-पात्र आदि विभिन्न गुणों का आरोपण करने के बाद  हमलोग उसे समझने की चेष्टा करते हैं। यदि ऐसा नहीं करें तो किसी गुणातीतभाव की धारणा कर पाना हमलोगों के लिये लगभग असम्भव हो जाता है। चाणक्य-नीति में बहुत सुन्दर ढंग से कहा गया है -
अग्निर्देवो द्विजातीनां मुनीनां हृदिदैवतम् ।
  प्रतिमा स्वल्पबुद्धीनां सर्वत्र समदर्शिनः ॥
जो लोग वैदिक ब्राह्मण हैं, उनके आराध्य-देव अग्नि हैं । पूजा होने के बाद अंत में जो होम किया जाता है, वह प्राचीन काल के अग्नि पूजा का ही साक्ष्य है। होमाग्नि को प्रज्ज्वलित करके, जिस देवता का आह्वान करना चाहते हों, उसके नाम का मन्त्र पढ़ कर आहूति दिया जाता हैइसके विपरीत, जो लोग मुनि अर्थात मननशील-विज्ञ व्यक्ति हैं, उनके देवता बाहर में नहीं हैं; उनके देवता उनके हृदय में ही विद्यमान हैं जो लोग अल्प-बुद्धि वाले मनुष्य हैं, वे देवता के प्रतिक की कल्पना करके प्रतिमाओं की पूजा करते हैं। क्योंकि, जो देवता कल्पनातीत हैं, जो वाक्य और मन के भी अगोचर हैं, जिनके अंग, आकर, सीमा या गुण को चिन्हित नहीं किया जा सकता, उनको समझनेमें सुविधा के लिये किसी न किसी रूप की कल्पना कर ली जाती है। किन्तु जो समदर्शी मनुष्य (विवेकज -ज्ञान सम्पन्न) हैं, वे सम्पूर्ण जगत को एक समान भाव से देखते हैं, उनके देवता केवल उनके हृदय में ही नहीं रहते, वे चराचर विश्व में जितने भी जीव-जन्तु, जड़, वृक्ष, लता, नदी, पर्वत, समुद्र आदि हैं, अपने ईष्टदेव को ही वे सर्वत्र कण-कण में विद्यमान देखते हैं।
हमलोग सामान्य-बुद्धि के मनुष्य हैं, इसीलिये किसी वस्तु-प्रतीक (Object-symbol) के बिना हमारा काम नहीं चल सकता है। इसीलिये कहा गया है- ' उपासकानां कार्यार्थं ब्रह्मणो रुपकल्पना।' भगवान् अपनी इच्छा के अनुसार रूप धारण करते हैं। क्योंकि वे पूर्ण स्वतन्त्र हैं। जिन्हें मायाधीश, मायापति आदि नामों से जाना जाता है।
प्रश्न उठता है कि वह कौन (चित्रकार) है जो इन रूपों की कल्पना करता है? क्या  मनुष्य अपनी कल्पना से इन अवतारों के रूपों की कल्पना कर लेता है ? या कहीं ऐसा तो नहीं है कि स्वयं ब्रह्म (अनंत-असीम) ही उपासक की धारणा में अपने को प्रकट करने के लिये ससीम (सगुण-साकार) रूप धारण कर लेते  हैं ? तंत्र-शास्त्रों में कहा गया है- " मनुष्य भी कल्पना नहीं करता और ब्रह्म भी कल्पना नहीं करते।" बल्कि 'शक्ति' ही कल्पना करती हैं। वे जिस प्रकार अविद्या-माया का रूप धारण करके जीव के बंधन का कारण होती हैं, उसी प्रकार मुक्ति प्रदान करने के लिये विद्या-माया बनकर विभिन्न रूपों (माँ सारदा,सीता राधा के रूप को) को धारण करतीं हैं। कहा गया है- ' साधकानां हितार्थाय अरुपा रूप धारिणी।' - अर्थात साधकों के मंगल के लिये रुपातीता ने रूप धारण कर लिया, निराकार साकार हो गयीं हैं।
स्वामीजी ने भी ईश्वर, जीव और जगत के स्वरुप को समझाने के लिये  एक वस्तु-प्रतीक (object module) की सहायता ली थी। उन्होंने एक कमाल के कवि जैसी कल्पना की सहायता से अपनी अनुभूति को व्यक्त किया है। वे कहते हैं, प्रत्येक आत्मा मानो अलग अलग तारे के जैसा है। जैसे तारा (सूर्य-चन्द्रमा आदि) बहुत बड़े आकार का होता है, किन्तु हमलोग उसको बहुत छोटे आकर में देखते हैं। उसी प्रकार ब्रह्म (बृहद ) भी छोटे से जीव के आकार की सीमा के भीतर अपने को (ससीम रूप में) प्रकट करते हैं, इसीलिये हमलोग आत्मा को भी छोटा समझ लेते हैं। किन्तु कोई जीवात्मा छोटा भी नहीं है,और  एक-दूसरे से भिन्न भी नहीं है। सभी जीवात्माएं एक वृहत एकता के सूत्र में बंधीं हैं, किन्तु यह बात आसानी से समझ में नहीं आती। 
इस नीले आकाश को देखें - उसके ओर-छोर का कुछ पता नहीं चलता, हमलोग कल्पना के द्वारा यह नहीं समझ पाते कि इसका प्रारंभ कहाँ से हुआ होगा या अन्त कहाँ है ? सितारों को असमान में टिमटिमाते देख कर हमें लगता है ये सभी असमान में ही टंगे हुए हैं। इसी प्रकार अनंत नीले आकाश के साथ आत्मा की तुलना की जा सकती है। समस्त प्राणियों के शरीर उसी आत्मा की घनीभूत अभिव्यक्तियाँ हैं। किन्तु केवल जीव और जगत के रूप में अपने को अभिव्यक्त कर देने के बाद आत्मा समाप्त नहीं हो जाता है। इन सब में परिव्याप्त होने के बाद भी आत्मा की अभिव्यक्ति अनन्त शून्य तक सुविस्तृत है। पुरुषसूक्त- (ऋ. १०. ९०. ३ ) में कहा गया है, [यही मन्त्र छान्दोग्य उपनिषद् (३. १२. ६ ) में भी है। ] -
पादोऽस्य विश्वाभूतानि
     त्रिपादस्यामृतं दिवि ।।३।।
 ब्रह्म का विशिष्ट-वैभव बतलाते हुए कह रहे हैं-  ब्रह्म या परमात्मा के केवल एक चौथाई अंश में ही यह सम्पूर्ण चराचर विश्व स्थित है। उसका अधिकांश भाग इस दृष्टिगोचर जगत के परे अनन्त लोक तक परिव्याप्त है। हमलोगों के इन्द्रियग्राह्य जगत को (अपने मन को ) परिपूर्ण करते हुए उसका भी अतिक्रमण करके उसके बाहर ही इस सत्ता का अधिकांश भाग (३/४वाँ) अवस्थित है।
 [ अस्य = इन सर्वनियन्ता भगवान् का , विश्वाभूतानि = अनन्तानन्त जीव तथा अनन्त लोक, पादः = सम्पूर्ण ऐश्वर्य का चतुर्थ भाग है । और, अस्य = इन भगवान श्रीरामकृष्ण का ,त्रिपादः = तीनो पाद अर्थात् तीनो भाग हैं- अहंकार आदि से युक्त 'बद्ध जीव और मुमुक्षु' , दूसरा पाद नित्यमुक्त = जो कभी संसार में फँसे ही नहीं-नारद आदि, और तीसरे हैं मुक्त जीव = जो भवबन्धन से छूटकर भगवदद्धाम पहुंच गये हैं । अमृतं =अविनाशी हैं। -ये तीनो पाद कहां हैं? इसका उत्तर देते हैं --दिवि। (चिन्मय भगवद्धाम में हैं) दिव् शब्द का अर्थ है परमाकाश,स्वर्ग, भगवद्धाम!  
“इस पुरुष की इतनी महिमा है कि यह सारा ब्रह्माण्ड (मन जहाँ तक जा सकता है) परमेश्वर के एक अंश में है अर्थात् वह ईश्वर इस समस्त ब्रह्माण्ड में समाया हुआ अनन्त है, यह समस्त जगत् परमात्मा के एक भाग में है अन्य तीन भाग तो परमात्मा के अपने स्वरूप में प्रकाशित हैं अर्थात् परमात्मा अनन्त है और सर्वत्र विद्यमान है उसको किसी एक स्थान पर नहीं कह सकते।”]
 गीता में भी कहा गया है- 
 अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन।
       विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत्।।१०.४२ ।।
-जगत का किन किन स्थानों में उनका विशेष प्रकाश है, उसका वर्णन करने के बाद भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन कहते हैं; अथवा हे अर्जुन बहुत जानने से तुम्हारा क्या प्रयोजन है मैं इस सम्पूर्ण जगत् को अपने एक अंश मात्र से धारण करके स्थित हूँ।
वे सभी स्थानों में व्याप्त हैं, किन्तु जीवात्मा में में उनका विशेष प्रकाश है। स्वामीजी कहते हैं, मैं जीवन भर ईश्वर को ढूँढ़ता रहा, किन्तु अन्त में मैंने मनुष्य के भीतर ही ईश्वर को देखा है। अन्यान्य जड़ वस्तुओं की तुलना में जीव शरीर में ही ब्रह्मचैतन्य सर्वाधिक अभिव्यक्त हुए हैं। जो लोग समदर्शी होते हैं, वे सर्वत्र उनका अनुभव करते हैं। किन्तु हमलोग तो सर्वदर्शी नहीं हैं, इसीलिये जीवों के भीतर, विशेष तौर से मनुष्य के भीतर ही उनको स्पष्ट रूप से देख पाते हैं। असीमित आकाश में परिव्याप्त ब्रह्मवस्तु हमलोगों की धारणा से परे हैं। किन्तु जिस आकर में घनीभूत होकर ब्रह्म ने स्थूल रूप धारण किया है, वहाँ हमलोग उनके अस्तित्व का अनुभव कर सकते है।
एक स्थान पर स्वामीजी कहते हैं, " प्रत्येक मनुष्य के भीतर यदि अवतार होने की सम्भावना नहीं हो, तो फिर कहना होगा कि अवतार किसी दिन हुए ही नहीं थे। " इसका अर्थ यह हुआ कि प्रत्येक मनुष्य के भीतर अवतार होने की सम्भावना अवश्य विद्यमान है। किसी अवतार पुरुष के जीवन और सन्देश की विवेचना तथा उनके जीवन का अध्यन और अनुशीलन (श्रवण-मनन-निदिध्यासन) करने से प्रत्येक व्यक्ति अपने संकीर्ण जीवन-चक्र (जन्म-मृत्यु ) का अतिक्रमण करके, देशकालातीत ब्रह्म की अनुभूति (विवेकज ज्ञान प्राप्त) कर सकता है। और (मुण्ड उ ३ । २ । ९ ) में कहा गया है -ब्रह्मविद् ब्रह्मैव भवति !
महर्षि पतंजली कहते हैं, " ईश्वरप्रणिधानम् - पवित्र-जीवन में उपनीत महापुरुषों (श्रीरामकृष्ण) के जीवन और सन्देश का चिन्तन करने वाला मनुष्य, पहले की अपेक्षा अधिक उन्नत-अवश्य हो जाता है।  शंकराचार्य कहते हैं, ' त्रय-दुर्लभं ' -
' मनुष्यत्वं, मुमुक्षुत्वं और महापुरुष संश्रय'- इन तीन चीजों को एक साथ प्राप्त करना दुर्लभ है कितने जन्मों तक साधना करने (विभिन्न योनियों -८४ लाख में भटकने के बाद) के बाद मनुष्य का जन्म प्राप्त होता है। किन्तु मनुष्य जन्म प्राप्त करके भी अधिकांश लोगों को नाम-यश, तथा 'कामुकता और कमाई ' की आसक्ति में बन्ध जाने से मुक्ति की इच्छा नहीं होती। फिर किसी में यदि इन्द्रिय-भोगों में आसक्ति से मुक्त होने की इच्छा हो भी जाय तो किसी महापुरुष (पहुँचे हुए संत) की सहायता प्राप्त करना बहुत दुर्लभ है। यह तीन दुर्लभ संसाधन एक साथ प्राप्त हो जायें, केवल तभी मुक्ति की सम्भावना है, नहीं मिला तो मुक्ति की सम्भावना बहुत कम है।
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[माँ भगवती ने अपना स्वरूप बतलाते हुये स्वयं कहा है- “एकैवाहं जगत्यत्र द्वितीया का – ममापरा”।  ‘मैं ही परब्रह्म, परम-ज्योति, प्रणव-रूपिणी तथा युगल रूप धारिणी हूं। मैं ही सब कुछ हूं। मुझ से अलग किसी का वजूद ही नहीं है। मेरे गुण तर्क से परे हैं। मैं नित्य स्वरूपा एवं कार्य कारण रूपिणी हूं।’ अतः मनुष्यमात्र को यदि अपना आत्मकल्याण करना हो अर्थात् मोक्ष प्राप्त करना हो तो अवश्य ही माँ भगवती की आराधना करें। माँ ममता की मूरत है। इतना तो निश्चित है जो भगवती के शरण में जाता है, उसे माँ अवश्य अपनाती है। यह बात भी स्मरण रहे कि शक्तिमान् की शक्ति अभिन्नरूप से रहती है, सम्पूर्ण पदार्थों में – जैसे –अग्नि में दाहिका शक्ति होती है, विद्वानों के अन्दर विद्याशक्ति, धनवानों में धनशक्ति, ब्रह्मचारियों में ब्रह्मचर्यशक्ति इत्यादि। शक्ति एक होकर भी अनेकरूप में व्यक्त होती है। जीवमात्र में अविद्या शक्ति बनकर रहने वाली माँ जगज्जनी भगवती पराम्बा, विश्वजन-मोहिनी (मनुष्य को हिप्नोटाइज्ड करने वाली शक्ति ?) कहलाती है।]
           



      

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