Saturday, October 13, 2012

स्वामी विवेकानन्द और हमारी सम्भावना [27] हमारे जीवन में धर्म-लाभ ! ( धर्म-लाभ का सरलतम उपाय )(धर्म और समाज),

" मनुष्य-जीवन में धर्म-प्राप्ति की पहचान है,बिना शर्त प्रेम !"  
यदि हमलोग भारतवर्ष को पतन के गर्त में और अधिक गिरने से बचाना चाहते हों, तो अब हमें श्रीरामकृष्ण के शिक्षाओं को ग्रहण करना ही पड़ेगा। उनकी शिक्षाओं का जितना अधिक प्रचार-प्रसार किया जायेगा, जितनी अधिक से अधिक संख्या में उनके विचारों को लोग अपने जीवन में उतार पायेंगे, उसी परिमाण में हमलोगों की अधोपतित अवस्था से मुक्ति प्राप्त हो सकेगी। 
स्वामी विवेकानन्द ने कहा था, 'यदि श्रीरामकृष्ण का नाम भी डूब जाये, तो उसमें हानी नहीं, किन्तु मनुष्य उनका आदर्श, नीति तथा चरित्र को ग्रहण कर ले-इसीमें सभी का कल्याण है। श्रीरामकृष्ण के उपदेशों में जो सत्य सन्निहित है, उसकी अनुभूति जिस किसी व्यक्ति को हो जाएगी, वह मनुष्य जहाँ कहीं भी जायेगा, वहीँ आध्यात्मिकता का संचार होने लगेगा। तथा उसके आचार-व्यवहार से अनुप्रेरित होकर दूसरे लोग भी सत्य के साथ जुड़ने के मार्ग पर चलना प्रारंभ कर देंगे। 
इसीलिये (दादा-ठाकुर ब्रह्म हैं या नहीं ? इससंशय से मुक्त स्वामीजी ने डंके की चोट पर घोषणा की थी - " जो कोई भी मनुष्य श्रीरामकृष्ण की शिक्षाओं को घर-घर तक पहुंचा देने की चेष्टा करेगा, उसको अन्य कोई साधना करने की आवश्यकता नहीं होगी, वह स्वतः ब्रह्मपद प्राप्त कर लेगा।" इस कथन का प्रमाण हमलोग अनेकों ऐसे व्यक्तियों के रूपान्तरित जीवन में देख सकते हैं; जिन्होंने प्रथागत अचार-अनुष्ठान, या सांस्कारिक कर्मकाण्ड आदि किये बिना, केवल श्रीरामकृष्ण के जीवन और उपदेश में सन्निहित त्याग और सेवा के मूर्तमान आदर्श को अपने पूर्ण सक्रीय जीवन में प्रयोग करने की अति-आधुनिक और विज्ञान-सम्मत पद्धति का अनुसरण करते हुए- ही धर्मलाभ (ईश्वर लाभ) सम्भव कर लिया है।
मनुष्य-जीवन का जो लक्ष्य है, जो परमवस्तु प्राप्तव्य है, उसको प्राप्त करने के लिये किसी विशेष साधना या विशिष्ट मार्ग या उपाय को अपनाने की आवश्यकता नहीं है। मनुष्यों की अवास्तविक या मिथ्या विभिन्नता (apparent-diversity) के बीच रहते हुए ही, यदि केवल मूल-पथ (Parent line या श्रीरामकृष्ण, माँ सारदा देवी के ) 'त्याग और सेवा' -  के आदर्श में श्रद्धाशील होकर चलना सीख लिया जाय, तो सभी प्रकार के मनुष्यों के लिए अपने अपने वैशिष्ट (गृही-संन्यासी) को रखते हुए भी,आत्म-विकास करना अर्थात अपनी अन्तर्निहित पूर्णता को अभिव्यक्त करना सम्भव हो जाता है। श्रीरामकृष्ण के जीवन में सच्ची आध्यात्मिकता का ऐसा आदर्श कदम-कदम पर मूर्तमान हुआ था, उस शिक्षा को चाण्डाल से लेकर धनी-दरिद्र सभी प्रकार के लोग को ग्रहण कर अपने जीवन को सार्थक कर सकते हैं।
श्रीरामकृष्ण के जीवन से यह प्रमाणित होता है कि जो व्यक्ति सनातन शाश्वत सत्य का साक्षात्कार करने के लिये, अपरिवर्तनशील सत्य को जानने के लियेसभी प्रकार के संकीर्ण धार्मिक-भावना को से तिलांजली देकर, सभी सुखों को (या इन्द्रिय-सुखों के प्रति आसक्ति को सम्पूर्णतः) त्याग सकता है। जो पूर्णत्व को अभिव्यक्त करने की साधना में स्वयं को भी न्योछावर कर देना चाहता है, वही मनुष्य भगवान का चिन्हित, भगवान के द्वारा चयनित सच्चा विजयी मनुष्य है। वैसे मनुष्यों की संख्या में वृद्धि के उपर ही भारतवर्ष का उत्थान निर्भर करता है।
कुलीन जन समुदाय द्वारा धर्मध्वजी होने का बिल्ला लगा लेना (केवल जेनेउ-धारी हो जाना ही ) धर्म नहीं है। वंशानुगत तौर से शास्त्रों के भाष्यकार (भागवत-रामायण के तथाकथित पंडित) लोग द्वारा , ब्राह्मण-कुलजात आत्मसंतुष्टि की ढिठाई (ऑडैसिटी-audacity) के साथ दिये गए उपदेशों में धर्म के अवयव (तत्व) व्यक्त नहीं होते। जो लोग, 'कामुकता और कमाई' 'Lust and Lucre' के लालच, यहाँ तक कि नाम-यश की आकांक्षा को भी दूर हटा कर, आत्मविश्वास की सुदृढ़ बुनियाद को धीरे धीरे व्यवहारिक जीवन के विश्वास, आचरण में प्रस्फुटित करने की प्रेरणा अर्जित कर रहे हैं, वे ही लोग श्रीरामकृष्ण के सच्चे अनुयायी हैं। ऐसे व्यक्ति ही मिथ्याचार, कपटता, असाधुता से भारतवर्ष के धर्म की रक्षा करेंगे। तथा धर्म की रक्षा करने का तात्पर्य ही है- 'मनुष्यत्व की अदम्य विजय-यात्रा' के स्वाभाविक लक्ष्य [ब्रह्मविद मनुष्य बनने] की दिशा में अग्रसर हो जाना। 
स्वामीजी कहते हैं, ' अच्छा बनना और अच्छा बनाना - यही धर्म का सम्पूर्ण तत्व है।' इसी धर्म को जीवन में प्रतिष्ठित करने के लिये यज्ञ-हवन,तर्क-न्याय, मनो-निग्रह इत्यादि के अभ्यास या साधना की प्रयोजनीयता उतनी ही है, जितना करने से मेरा और समाज का मंगल हो, पारस्परिक सम्बन्ध दोनों के समान लाभ की दृष्टि से सौहार्दपूर्ण हों। किन्तु जो लोग केवल अपना ही मंगल चाहते हैं (वे बंगाली या ब्राह्मण भी क्यों न हों), उनको अपने मुख श्रीरामकृष्ण का नाम भी लेने का अधिकार नहीं है। क्योंकि उससे एक महान आदर्श (त्याग और सेवा) का कार्यकारी प्रयोग अर्थात व्यावहारिक जीवन में प्रयोग  करने के क्षेत्र में अवांछित अवरोध उत्पन्न हो जायेगा।
श्रीरामकृष्ण अपने धार्मिक-प्रवचन में वैसे उपदेशों का समर्थन नहीं करते थे, जिससे किसी व्यक्ति-विशेष को मोक्ष प्राप्त करने की प्रेरणा मिलती हो। इसलिए जब विवेकानन्द के मन में नर्विकल्प समाधि में डूबे रहने की इच्छा उत्पन्न हुई, तब उनको भी श्रीरामकृष्ण से तिरष्कृत होना पड़ा था। जिस प्राप्ति को अपने सभी भाइयों में नहीं बाँट कर नहीं लिया जाता हो, वैसी प्राप्ति तो मनुष्य जीवन की 'उपलब्धि' कह कर पुकारने योग्य भी नहीं है। क्योंकि वह सर्वोच्च प्राप्ति भी हीन स्वार्थबुद्धि के मैल से कलुषित हो जाती है। जहाँ स्वार्थबुद्धि है, वहाँ संकीर्णता है, और जहाँ संकीर्णता है, वहाँ दुर्बलता है, और जो हमें दुर्बल बनाता हो वह कभी सच्चा धर्म नहीं हो सकता। इसीलिये निर्विकल्प समाधि प्राप्त करना भी धर्म नहीं है, यदि उस चरम-उपलब्धि (ईश्वर-दर्शन) को सबों के मंगल में नियोजित नहीं किया जाय !
जिस व्यक्ति को धर्म-लाभ हो जायेगा, उसमें लेश मात्र भी दुर्बलता नहीं रह सकती, उसका स्वार्थबोध सदा के लिये मिट जायेगा, दूसरों के हित के लिये वह अपने जीवन का भी दान कर देगा। आध्यात्मिकता में प्रतिष्ठित मनुष्य का जीवन ही बोलने लगेगा, उसके आचार-व्यवहार से जो भाव झलकेगा उसमें असीम-प्रेम, महान आत्म-त्याग, महासाम्य भाव ही प्रतिबिम्बित होगी। उसके जीवन से अहंकार सम्पूर्ण रूप से समाप्त हो जायेगा। इस प्रकार का व्यक्ति ही समाज में जितने भी अनाचार हो रहे हैं, उसके जड़ पर कुठाराघात करने में समर्थ हो सकता है, क्योंकि जो हीन स्वार्थबुद्धि अराजकता (Lawlessness)का उत्स है, वह उसके
जीवन से वही मिट चूका होता है।
भारतवर्ष के उत्थान के लिये आज जो आवश्यक है, वह है हमलोगों के भीतर में इस धर्म-बोध की जागृति।
यह धर्म व्यवहारिक जीवन और धार्मिक-जीवन को अलग अलग भागों में बाँट कर नहीं देखता। पाण्डित्य के आधार पर, या धन-दौलत के कारण, वह मनुष्य मनुष्य के बीच कोई भेद-भाव नहीं करता। यह धर्म कठोर युक्ति-तर्क के उपर खड़ा होकर ज्ञान-भक्ति-कर्म के समन्वय की साधना मनुष्य को सच्चे चरित्रवान मनुष्य में परिणत कर सकता है। इस धर्म को विश्व-स्तर पर, सभी मनुष्यों के द्वार-द्वार तक पहुंचा देना होगा। जो लोग (नेता) धर्म को पहुँचायेंगे, उनको पहले अपने जीवन को तिल तिल कर के गठित करने की साधना करनी होंगी। 
हमलोग यदि सच्चे दिल से, श्रीरामकृष्ण के जीवन में जो कुछ घटित हुआ है, उसको कार्य-कारण-गत रूप में स्वीकार करें, और हमारी विचार धारा को यदि स्वार्थबुद्धि आच्छन्न नहीं करे, तो स्वामी विवेकानन्द की घोषणा की सच्चाई हम लोगों के अपने जीवन का भी एक परीक्षित सत्य बन सकती है। धर्मपथ में श्रद्धाशील मनुष्यों का आह्वान करते हुए स्वामी विवेकानन्द कहते हैं, कि जो लोग वास्तव में श्रीरामकृष्ण के अनुयायी हैं, उनके लिये केवल ' बहुजन हिताय बहुजन सुखाय ' अपने जीवन को धीरे धीरे क्षय कर देने की शिक्षा अर्जित करने अतिरिक्त और कोई धर्म हो ही नहीं सकता। जो मनुष्य विधवा के दुःख तथा अनाथों के क्रन्दन को दूर करने के लिये कृतसंकल्प हो, उसी को अपने जीवन में उस धर्म की अनुभूति होती है। इसी धर्म में, जीवन का परम् और चरम लक्ष्य 'त्याग और सेवा' के मानदण्ड तक पहुँचने के संकल्प में इहलौकिक और पारलौकिक- सब एकाकार हो जाते हैं।
 हमलोगों को यह समझने की चेष्टा करनी चाहिए, कि मनुष्य के जीवन में धर्म-लाभ केवल एक रूप में होता है, वह है सबों के प्रति ' बिना शर्त प्यार (Unconditional Love)' की प्राप्ति - इस प्यार का अर्थ है पारस्परिक कल्याण-बोध की स्वीकृति और उसी बोध को स्वार्थबुद्धि के उपर स्थापित करने में पूरे मन से प्रयासरत रहना। 
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