Friday, October 12, 2012

$$$स्वामी विवेकानन्द और हमारी सम्भावना [26] 'प्रेम करना ही धर्म है' (जापानी विश्वास-गुड़ियों को प्यार )(धर्म और समाज),

'बिराट को प्रेम करने से ही मनुष्य स्वयं को पहचान सकता है!'  
जीव-मात्र से प्रेम करने की नीति ही सनातन आचारनीति (ethics) है। इसी नीति को क्रियान्वित करने से, जो सत्य इस जगत-प्रपंच में अन्तर्लीन है, वह प्रकट हो जाता हैएक बनस्पति-वैज्ञानिक ने एक ही प्रजाति के दो पौधों को लेकर इस नीति का परिक्षण किया था। उन्होंने दो गमलों में एक समान मिट्टी भर कर समान ऊंचाई तक उगे हुए दो पौधों रोप दिया, दोनों को एक समान प्रकाश, एक जैसा खाद, एक समान पटवन आदि आवश्यक उपादानों का प्रयोग करने के बाद उन गमलों को छत के दो कोने पर रख दिया।और प्रतिदिन एक पौधे के पास जाकर कहने लगे-' मैं तुमसे घृणा करता हूँ, तूँ मरता क्यों नहीं ? और दूसरे पौधे के पास जाकर कहते थे- " मैं तुमको प्यार करता हूँ।" कुछ दिनों तक ऐसा ही करते रहने के बाद एक पौधा सूख कर मर गया,और दूसरा पौधा सुन्दर रूप से बड़ा हो गया।
जापान की लड़कियों को यह विश्वास है कि गुड़ियों को प्यार करने से एक दिन उनके भीतर प्राणों का संचार हो जाता है। ऐसा भी सुना जाता है कि जापान में उन्नत फसल पैदा करने के लिये खेतों को प्यार के गीत सुना कर उत्कृष्ट खेती करने की प्रथा भी पहले प्रचलित थी। (क्या भारत आज भी धान-रोपनी के समय स्त्रियाँ इसीलिये गाती हैं ?) 
इन बातों का उल्लेख करते हुए स्वामी विवेकानन्द यही कहना चाहते थे कि मनुष्य मात्र में अन्तर्निहित दिव्यता के उपर अटल विश्वास रखना होगा, उसको जानना होगा, प्रेम की शक्ति को समझना होगा, तथा भावी युग में उपस्थित होने वाली जीवन की जटिल समस्याओं का समाधान करने के लिये इसी शक्ति का प्रयोग करना होगा। बुद्धिको विवेक-पूर्ण निर्णय लेने में सक्षम बनाने का अभ्यास करने के साथ ही साथ, अन्य आदतों के समान हृद्यवत्ता का विस्तार एवं सच्चा प्रेम करने की नीति को , जीवन-गठन का एक महत्वपूर्ण अभ्यास (आदत) बना लेना होगा।
स्वामीजी कम उम्र से ही बच्चों को समाज के अन्य सभी मनुष्यों से भावनात्मक आवेग के साथ प्रेम-पूर्ण व्यव्हार करने की शिक्षा देना चाहते थे, ताकि वे स्वतंत्र होकर (स्वतः प्रेरित होकर) देश-सेवा के आदर्श को आत्मविकास के अपरिहार्य अंग के रूप में स्वीकार करना सीखें। स्वामीजी का अपना जीवन इसी प्रचेष्टा का एक उत्कृष्ट उदहारण है। विद्वता अर्जित करने, नाम-यश, या धनदौलत के बल पर सृष्टि नहीं चलती है, इनके ही बल पर जीवन का अबाधित विकास संभव नहीं होता, बल्कि दूसरों को प्रेम करने की क्षमता में वृद्धि से ही यथार्थ मनुष्य बनना संभव होता है। (मोह्हब्ब्त जिन्दगी है !)
वेदान्त का अमोघ सत्य-उद्घोष है- 'एकमेवाद्वितियम् ' या ' एकम सत्य विप्राः बहुधा वदन्ति ।' किन्तु स्वामीजी ने उसकी तात्विक-विश्लेष्ण करके उसकी पांडित्यपूर्ण  व्याख्या करने को उतना महत्वपूर्ण नहीं माना है। बल्कि मनुष्य मात्र के प्रति ' परमं एकात्मबोध ' से अनुप्रेरित होकर उसी वेदान्त प्रतिपादित सत्य को मूर्तमान करने की साधना में ही अपने जीवन को न्योछावर कर दिया है।
कोई व्यक्ति,हृदय की भाषा- 'प्रेम' का प्रयोग करके ही जीवन के इस परम या चरम सत्य को दूसरे के भीतर संचारित कर सकता है। इस भाव को संचारित करने में बच्चे-बूढ़े में भेद नहीं रहता है, इस उच्च-भाव को हृदय की भाषा में व्यक्त करने से सभी समझ सकते हैं। स्वामीजी ने कहा है कि (भावी नेताओं को)  वेदान्त को इतने सहज और बोधगम्य भाषा में समझा कर कहना होगा, कि एक छोटा सा बच्चा भी उसको समझ सके, और अपने जीवन में उसका प्रयोग करके लाभान्वित हो सके।
 सांसारिक प्रेम के बारे में आम तौर से जो धारणा है, उसकी चूक- थोड़ा भी विश्लेषण करने से  पकड़ में आ जाती है। प्रेमास्पद के प्रति अपने सच्चे प्रेम को त्याग और सेवा के माध्यम से ही अपने जीवन में प्रस्फुटित करना होता है। (इसीलिये स्वामीजी ने ' त्याग और सेवा ' को भारत के राष्ट्रिय आदर्श के रूप में उल्लखित किया है।) आत्मश्रद्धा-सम्पन्न व्यक्ति को आत्मविश्लेषण करके, पहले यह जान लेना (आविष्कार कर लेना) चाहिये कि मनुष्य जीवन को सार्थक करने के लिए कौन सी वस्तु को पाने की कामना करनी चाहिये?
 जिस वस्तु को सचमुच प्राप्त करने की कामना करनी चाहिये वह है-चरित्र ! क्योंकि यह चरित्र ही है जो मनुष्य को सच्चे प्रेम के सिद्धान्त में अलंकृत का देता है। चरित्र गठित करने से मनुष्य निःस्वार्थ हो जाता है, तथा इस तथ्य को समझना सीखता है कि दूसरे सभी मनुष्यों के कल्याण में ही उसका कल्याण है। संसार के सभी मनुष्यों के लिये कार्य करना तभी संभव है जब वह यह समझ लेता है कि वह दूसरों के लिये जो भी करता है, वह वास्तव में स्वयं के लिये ही करता है। क्योंकि वह स्वयं किसी भी मनुष्य से भिन्न नहीं है। कोई मनुष्य जब संसार के आभाव, संकट, विसंगति, को जड़ से मिटा देने का सतसंकल्प लेकर, अपने जीवन का उद्देश्य निर्धारित कर लेता है; तब वह अपनी इच्छा को साकार करने के लिये, अपने उद्देश्य को कार्यरूप देने के लिये जो उद्द्य्म करता है, और सामने उपस्थित किसी भी कार्य को निष्ठा पूर्वक करने का प्रयास करने लगता है, तो इसी सब के बीच उसको यह अनुभूति हो जाती है, कि वह चूकि अपने-आप से प्रेम करता है, इसीलिये वह दूसरों से भी प्रेम करने को बाध्य है। क्योंकि बिराट (ब्रह्म या ईश्वर ) को प्रेम करने से ही मनुष्य स्वयं को पहचान सकता है, जब उसको यह अनुभूति हो जाती है कि ब्रह्म ही जगत बने हैं तब उसके जीवन में परम-पद की प्राप्ति का पथ प्रशस्त हो जाता है।
इसीलिये बचपन से ही अपने देश से प्यार करना सीखना भी आवश्यक है। और उससे प्यार करने (उसकी सेवा करने) की तैयारी के रूप में ही पहले अपनी यथार्थ सत्ता या सच्चे स्वरुप का अनुसन्धान करना आवश्यक है। अपने विवेक,बुद्धि, भावना के द्वारा अपने सच्चे स्वरुप का अनुसन्धान के क्रम में ही व्यक्ति यह समझ सकेगा कि अपनी अन्तर्निहित दिव्यता को विकसित करने तथा अभिव्यक्त करने के स्वार्थ को पूर्ण करने के लिये ही उसे व्यवहारिक जीवन में जगत के सभी मनुष्यों के प्रति सहानुभूति, समानुभूति और कर्तव्यबोध इत्यादि के महत्व को मर्यादा देनी होगी।
सच्चे धर्म का अर्थ है- "BE AND MAKE" -अर्थात  स्वयं अच्छा मनुष्य बनना और दूसरों को अच्छा मनुष्य बनने में सहायता करना।" स्वामीजी के धर्म की इस परिभाषा का सार इसी सर्व-ग्रासी प्रेम को आन्तरिक स्वीकृति देने तथा इसे अपने आचरण द्वारा जीवन में प्रस्फुटित करना है। आज देश में जो भी संकट दिख रहा है, उसको एक वाक्य में कहें तो, इस प्रेम के आभाव से उत्पन्न हुआ संकट ही है। जब व्यावहारिक जीवन में सार्थकता का पैमाना धन-दौलत, भोग-ऐश्वर्य, को ही मान लिया जाता है, तो  हमलोगों के प्रेम की शक्ति अवगुन्ठित हो जाती है।
इन दिनों सामान्य तौर से, शिक्षक, सरकारी-गैरसरकारी पदाधिकारी, क्रमचारी,डाक्टर, इन्जीनियर, समाज-सेवकों का विशाल दल, के अधिकांश व्यक्तियों के भीतर केवल आर्थिक दृष्टि से उन्नत होने या नाम-यश पाने की प्रतियोगिता हो रही है। इसीलिये तो सनातन मूल्यबोध या मान्यतायें आदि इन्द्रियपरायणता के उग्र प्रकोप के सामने छुप कर दब गयी हैं। इस आभाव को बाहर से दूर करने की सैंकड़ो प्रचेष्टाओँ के बीच भ्रमित होकर हमलोग अँधेरे में जीवन-मूल्य को पकड़ने के लिये हाथ-पैर मार रहे हैं। हमलोगों के इस अवश्यम्भावी भविष्य के प्रति स्वामीजी ने बहुत पहले ही सावधान हो जाने का आह्वान किया था। उन्होंने कहा था कि मनुष्य यदि सच्चे धर्म का अनुसरण करके अपने आचरण को शुद्ध नहीं बनाएगा, तो केवल राजनैतिक अनुशासन, या कायदा-कानून के नये नये बिल पास कराने से ही समाज को वह अपने यथार्थ लक्ष्य की ओर कभी अग्रसर नहीं करा पायेगा।
इसीलिये बचपन से ही, निःस्वार्थ, निष्कपट प्रेम करने की क्षमता में वृद्धि करने के अभ्यास को शिक्षा के अनिवार्य अंग के रूप में स्वीकार करना पड़ेगा। इसीके माध्यम से व्यक्ति सच्चे सामाजिक प्राणी के रूप में अपना जीवन गठित कर पायेगा। तथा एक-दूसरे के स्वार्थ की रक्षा के लिए प्रयत्नशील होगा। एक मनुष्य के साथ दूसरे मनुष्यों के बीच, या एक जाती के साथ दूसरी जाती के बीच जितने भी प्रकार के विद्वेष-विवाद, आपसी फूट, विस्वरता के सुर सुनाई पड़ते हैं, वे तभी दूर होंगे जब हमलोग केवल प्रेम के धर्म पर निर्भर रहना सीख सकेंगे। तथा इसी धर्म की रक्षा और परिपोषण के लिये बाकी सबकुछ को तुच्छ समझ सकें। 
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