Wednesday, October 10, 2012

स्वामी विवेकानन्द और हमारी सम्भावना [25] ' समाज में धर्म का स्थान ' (धर्म और समाज),

 ' धर्म समाज-मस्तिष्क के परितृप्ति-केन्द्र की रक्षा करता है'
मनुष्य यदि सामुदायिक रूप से जीवन व्यतीत नहीं कर रहा होता, और सामुदायिक कल्याण के लिये प्रयत्नशील भी नहीं होता, तो कह सकते थे कि धर्म का सम्बन्ध नितान्त व्यक्तिगत जीवन से है, समाज में उसकी कोई आवश्यकता नहीं ! किन्तु यह धर्म ही है, जो मनुष्य को नैतिक बनता है। तथा समाज या मनुष्य का सामुदायिक जीवन उसी नैतिकता के उपर प्रतिष्ठित है। और नैतिक जीवन की परिपूर्णता का ही दूसरा नाम आध्यात्मिकता है। इसीलिये सामाजिक व्यक्ति धार्मिक हुए बिना रह ही नहीं सकता है। आध्यात्मिकता से व्यक्तिगत और सामाजिक दोनों कल्याण साधित होते हैं। अतः धर्म निरपेक्षता या सामाजिक न्याय (Social justice) की गलत व्याख्या करके, धर्म के प्रति उदासीन हो जाने की शिक्षा देने से समाज का ही बहुत बड़ा अकल्याण होता है।
हमें ऐसा नहीं मान लेना चाहिये कि धर्म आम जनता के लिये अफीम जैसा है, बल्कि यह समझना चाहिए कि  धर्म तो समाज के रगों में बहते हुए क्त जैसा हैउस रक्त के दूषित हो जाने से समग्र समाज-देह ही नष्ट हो जाता है। तथा वह रक्त यदि स्वस्थ और सबल रहे तो समाज हर प्रकार से स्वस्थ, प्राणवन्त और सुन्दर बना रहता है। हमारे समाज के रोम रोम में आज जो गंदगी व्याप्त है, उसका कारण विशुद्ध धर्म प्रवाह की कमी ही है।
जीवन में चाहे विज्ञान का उपयोग कितना भी क्यों न बढ़ जाये, किन्तु केवल सुखकर या भोग की वस्तुओं को एकत्र कर लेने से ही मनुष्य के जीवन में सुख-शांति नहीं आ सकती है। हमारे शरीर के मस्तिष्क में स्थित परितृप्ति-केन्द्र (gratification center- state of being satisfied) ही जब नष्ट हो जाता है, तो फिर उस जीव (हिप्नोटाइज्ड जीव) को कोई भी वस्तु कितनी ही मात्रा में क्यों न प्राप्त हो जाय, वह कभी संतृप्त (satiate) ही नहीं होता है।
[विवेक-प्रयोग, संयम या 'आवेग नियंत्रण' (Impulse control);विलम्बित-परितोष Delayed gratification is the ability to resist the temptation for an immediate reward and wait for a later reward. refers to the ability to put off something mildly fun or pleasurable now, in order to gain something that is more fun, pleasurable, or rewarding later. For example, you could watch TV the night before an exam, or you could practice delayed gratification and study for the exam. The latter would increase your chances of getting an A in the course at the end of a semester, which is much more satisfying long-term than a night of watching TV. Delayed gratification,  A person’s ability to delay gratification relates to other similar skills such as patience, impulse control, self-control and willpower, all of which are involved in self-regulation.] 
 हमलोगों के समाज-शरीर के मस्तिष्क का यह परितुष्टि-केन्द्र भी आज लगभग नष्ट ही हो चूका है। इसीलिये वह केवल भोजन विलासी ही नहीं है अमित-आहारी बन चूका है। किन्तु असीमित आहार स्वास्थ्य के लिये हानिकारक होता है। तथा समाज-शरीर में असीमित-आहार करने की बुराई प्रविष्ट  हो जाने के कारण ही, आधुनिक मानव-समाज दूष्ट बन गया है।
धर्म मनुष्य में जितने सद्गुणों को प्रदान करता है, उसमें सयंम एक अत्यन्त मूल्यवान गुण हैयह संयम ही है जो मस्तिष्क के परितृप्ति-केन्द्र को जीवित रखता है। इसलिये धर्म यह शिक्षा देता है कि जो व्यक्ति अकेले ही आहार करता है, वह 'पापभुक' है, अर्थात वह पाप का ही भक्षण करता है। धर्म यह भी कहता है कि-'-'प्रजायेकम् अमृतम् नावृनीत'--अर्थात साधारण जन का कल्याण करने के लिये कोई कोई व्यक्ति तो अमरत्व को भी त्याग देते हैं। 
हमारी परिचर्चा में यह बात निश्चय ही  स्पष्ट हो रहा होगा कि यहाँ किसी धर्म-विशेष की प्रशंसा में कुछ भी नहीं कहा जा रहा है। किन्तु जिस देश के समाज में धर्म का ऐसा सुन्दर रूप दिखाई देता हो, उस समाज से धर्म को जड़-मूल सहित उखाड़ फेकने की बात करने के पहले, क्या हमें यह समझ लेना उचित नहीं होगा कि हमलोगों ने इस समय यथार्थ धर्म की जो उपेक्षा कर दी है, कहीं उसी के फलस्वरूप तो समाज के शीर्ष पदों पर बैठे व्यक्ति भी इतना नीचे नहीं गिर गये हैं ? (पी.एम. -कोयला घोटाला)
धर्म हमारे राष्ट्रिय अधोपतन का कारण नहीं है। धर्म के सार को आचरण में उतारने की कमी ही इसका कारण है। हमलोगों ने पहले यह समझ लिया है कि एक समग्र दृष्टि प्राप्त होने का परिणाम ही धर्म है। इसीलिये ऐसा धर्म किसी ऐरे-गैरे व्यक्ति के चिन्तन का परिणाम नहीं हो सकता। इसलिये धर्म के मूल भाव को समझे बिना जिस किसी शब्द (धर्म के छिलके) के साथ 'इज्म' (हिन्दु-इज्म,क्रिश्चनिज्म) लगा देने से ही वह वस्तु सूपाच्य खाद्य वस्तु नहीं बन जाती। वैसे अधूरे दर्शन से समग्र-दृष्टि प्राप्त नहीं होती, उसमें कहीं न कहीं छिद्र रह ही जाती है। इसीलिये उस धर्म रूपी फल के छिलके को खाने से व्यक्ति-जीवन या सामुदायिक-जीवन को पूर्ण रूप से पौष्टिकता प्राप्त नहीं होती। 
सच्चा-धर्म रूपी फल के रंग-रूप, आकार, कड़ापन, स्वाद या गंध में भी अनेको प्रकार की विविधतायें हो सकती है। किन्तु उस फल का भक्षण जब कोई धर्मपरायण व्यक्ति करता है, तो उसे उसके परिणाम में पौष्टिकता प्राप्त होती है। इसीलिये वर्तमान युग में भी यदि हमलोग स्वस्थ व्यक्तियों के समष्टि रूपी समाज का निर्माण करना चाहते हों, तो धर्म की नितान्त आवश्यकता है। सभी फलों के छिलके की एक प्रदर्शनी लगा देने से किसी भी फल की पौष्टिकता नहीं प्राप्त हो सकती है। बहुत से फूलों को तोड़ कर बनाया गया एक गुलदस्ता देखने में सुन्दर लग सकता है। किन्तु जड़ के साथ जुड़े न रहने के कारण सारे फूल शीघ्र ही सूख जाते हैं। किन्तु किसी पेड़ के जड़ को पानी से सींच कर उसकी डाली पर फूलों को खिला देने की सामान्य तृप्ति भी बहुत बड़ी होती है।
फूल खिल जाने के बाद वह अपने ही लिये फल के रूप में उसके बीज को भी छोड़ जाता है। और उसी फल के बीज से भविष्य में फिर फूल खिलते हैं। फल के गूदे और बीज को संजोय रखने के लिये एक छिलके की आवश्यकता होती है। फल का छिलका भी कोई बिल्कुल व्यर्थ की वस्तु नहीं है, किन्तु केवल छिलके को लेकर ही व्यस्त रहा जाय तो पौष्टिकता प्राप्त होने की सम्भावना नहीं रहती। इस युग में भी समाज के भीतर धर्म है। यदि यह नहीं होता तो समाज का अस्तित्व भी नहीं रह सकता था। किन्तु उसका प्रवाह अभी बहुत मन्द पड़ गया है। सार्वजनिक दुर्गा-पूजा के पंडालों की बढ़ती हुई संख्या को दिखला कर उसके अस्तित्व का प्रमाण सिद्ध करने से काम नहीं चलेगा। [या छठ-पूजा के मेले में घाटों पर बढ़ती हुई भीड़ को देख कर धर्म रूपी फल को खाकर समाज में स्वस्थ हुए मनुष्यों की वास्तविक संख्या का अनुमान भी नहीं लगाया जा सकता।]
मन की उर्वरा भूमि ही धर्म रूपी फल का जन्म लेने का क्षेत्र है, अर्थात धर्मफल मनोभूमि में ही उगता है। किन्तु जब उसमें किसी भाव-विशेष की वर्षा होती है, तो उसके बाद तुरंत उसके उपर कुछ खर-पतवार भी उग आते हैं। दुर्गा-पूजा की प्रयोजनीयता भी इसी जगह है। दस इन्द्रियों (पाँच ज्ञान इन्द्रियाँ पाँच कर्म इन्द्रियाँ) के खर-पतवार को काटने के लिये दस-भूजा वाली देवी की आवश्यकता दसो-प्रहर बनी रहती है। इसीलिये मानव मनो-भूमि पर सार्थक खेती करने से सोने की फसल उगती है। मानव मनोभूमि पर खेती से उत्पन्न धर्म रूपी फल ही समाज-कल्याण तथा मानव-संस्कृति का मार्ग-दर्शक है। इसीलिये वर्तमान समाज को धर्म के (छिलके से नहीं ) सार से प्लावित करना होगा, तभी मनोभूमि पर खेती करके सोने की फसल उगाई जा सकती है। 
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