Tuesday, October 9, 2012

स्वामी विवेकानन्द और हमारी सम्भावना [24]' समाज, धर्म और विज्ञान ' (धर्म और समाज),

विज्ञान के 'अन्डिनाइअबल कल्मनेशन' (अखण्डनीय परिणति) को धर्म कहते हैं 
मैं जब कभी चिन्तन-मनन के लिये बैठता हूँ, तो विश्वब्रह्माण्ड के केन्द्र में स्वयं को बैठा लेता हूँ। विचारों में ऐसा डूब जाता हूँ कि सुदूर  निहारिकाओं  से लेकर सामने की ताजी हरी घास, या  भूत-भविष्य- वर्तमान का एक भी निशान शेष नहीं बचता। विचार करते करते ऐसा प्रतीत होता है मानो सृष्टि-रचना  के प्रथम दिन से लेकर आज तक का सम्पूर्ण इतिहास मेरी आँखों के सामने साकार रूप लेना चाह रहा हो। उसके बाद ? इतने से भी तृप्ति नहीं होती; फिर  मैं शाश्वत पथ के किनारे पर स्थित  समस्त दर्शनीय वस्तुओं को देख लेना चाहता हूँ।
किन्तु इन सबके बीच, जिसे मैं एक क्षण के लिये  भी नहीं भूलता- वह मेरी अपनी सत्ता है, जो इन सबसे निकट है, सर्वोच्च सत्य है, और मेरी सबसे प्रिय वस्तु वह है, मेरा -'मैं' (नामरूप वाला अहं)! वैसे तो हमलोगों का  यह  'मैं'  - इस संसार के करोड़ो करोड़ मनुष्यों के बीच, बिल्कुल नगण्य सा ही  है। किन्तु मनुष्य बड़े गर्व से कहता है- मेरा ' मैं!' मनुष्य इसी ' मैं ' को लेकर कई प्रकार की कल्पनाओं में खोया रहता है। हमलोगों के  चिन्तन का प्रमुख विषय मनुष्य ही होता है। 
पता नहीं कब और किस प्रकार- समय (काल) के दुर्गम स्रोत के धक्के से यह विराट विश्वब्रह्माण्ड  शून्य में से फेन के सदृश प्रकट हो गया ? फिर एक दिन असंख्य ब्रह्माण्डों  के किसी एक कोने में कण के सदृश्य प्रतीत होने वाली इस पृथ्वी की छाती पर, पता नहीं कब  हरी हरी घास उग आती हैं। और  एक दिन पृथ्वी के रंगमंच पर मनुष्य भी अवतीर्ण हो जाता है। फिर मनुष्य जब अपनी अद्भुत चिन्तन-शक्ति या स्पष्ट-विचारण  क्षमता से परिचित होता है; तो वह जगत की प्रत्येक वस्तुओं का मूल्यांकन करने के साथ ही साथ अपने जीवन का भी अर्थ खोजने में लग जाता है। 
प्रत्येक वस्तु का मूल्यांकन करने की अद्भुत क्षमता के बल पर, एक दिन अपने चिन्तन-वृक्ष की डाली पर उग आया एक सुन्दर सा फूल दिखाई देने लगता है। इस फूल को ही 'दर्शन' (philosophy ) कहा जाता है। इस फूल को मन के द्वारा देखा जा सकता है, स्पर्श किया जा सकता है और बुद्धि के द्वारा समझा जा सकता है। किन्तु उसे अपनी सत्ता के साथ मिश्रित नहीं किया जा सकता। किन्तु बाद में  इस फूल से जो फल मिलता है, उसको आत्मसात किया जा सकता है, और  उसी  (दर्शन रूपी फूल के ) फल को 'धर्म' के नाम से पुकारा जाता है। यदि यह बात ( कि दर्शन रूपी फूल  का फल- ' Being and Becoming ' ही धर्म है !) समझ में आ जाय, तो बहुत आसानी से यह स्वीकार किया जा सकता है कि धर्म केवल सनातन ही हो सकता है !
और धर्म नामक वस्तु यदि सनातन होती हो, तो समय के प्रवाह में उसका बाहरी आवरण (कलेवर) चाहे जितना भी क्यों न परिवर्तित हो जाये, फिर भी प्रत्येक युग में उसकी संरचना (Structures या मूल विचार) अवश्य एक ही समान बना रहता है। यदि यह सृष्टि  (चराचर -जगत)  अनादि-अनन्त हो,तथा  समस्त  दर्शन-फूलों का फल यदि धर्म ही होता हो,  तो धर्म भी सनातन या अनादि-अनन्त होने को बाध्य है। तथा मनुष्य यदि इस अनादि-अनन्त धर्मफल को चरित्रगत या आत्मसात नहीं कर सके, तो प्राकृतिक-चयन के नियमानुसार (Law of Natural selection) वह 'मनुष्य-शरीर ' धारण करने के  अयोग्य हो जायेगा। और क्रमशः पृथ्वी पर से उसके पैरों के निशान भी मिट जायेंगे। इसीलिये कहा गया है-
' धर्म एव हतो हन्ति, धर्मो रक्षति रक्षितः |' 
तो क्या इसका अर्थ यह हुआ कि धर्म भी कोई ' प्रतिहिंसा-पारायण वस्तु ' है ? बिल्कुल नहीं। किन्तु मैं यदि
अपने 'मानव-धर्म ' की रक्षा न करूँ, तो विश्व-ब्रह्माण्ड का धर्म मुझे नष्ट कर देगा। किन्तु  मैं यदि अपने धर्म की रक्षा करूँ तो विश्व-ब्रह्माण्ड का धर्म भी मेरा संरक्षण करने को बाध्य होगा।
अब  यह प्रश्न उठेगा-कि मेरा धर्म है क्या ? इसके उत्तर में पहले ही कहा गया है, समग्र दर्शन-फूल  के फल को भक्षण करना तथा उसको आत्मसात कर लेना (' Being and Becoming ') ही धर्म है। यह सम्पूर्ण विश्व-ब्रह्माण्ड जिस छन्द (नियम या ताल ) में बंधा है, उस ताल या छन्द को देख लेना दर्शन है, तथा उस छन्द का अनुसरण करना धर्म है। अपने व्यक्तिगत जीवन-छन्द को विश्वब्रह्माण्डीय-छन्द के आनुषांगिक (या तदनुसार consequential) बना लेने में सक्षम हो जाने के बाद ही मनुष्य अपने स्वाभाव को जान सकता है, तथा इस ' स्व-भाव ' में स्थित रहने को ही धर्म कहते हैं।
और ऐसा करने में सक्षम होने पर सम्पूर्ण जगत (सम्पूर्ण-मानवता) के साथ व्यक्ति का योग हो जाता है। इस योग को प्राप्त हो जाना ही धर्म का लक्ष्य है, तथा इस  योग की उपलब्धी हो जाने के बाद- मनुष्य के जानने के लिये कुछ भी शेष नहीं रह जाता, तथा योगी पुरुष अन्य किसी लाभ को उसकी अपेक्षा अधिक नहीं समझते।
" यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः | " गीता 6/22
मनुष्य विचार (मनन) करने और जानने की शक्ति को लेकर ही जन्म ग्रहण करता है। इसीलिये जब वह इस चरम सत्य को (सपूर्ण मानवता के साथ अपने एकत्व को ) अपने  अनुभव से  जान लेता है, तब उसके लिये जानने को और कुछ भी बाकी नहीं रह जाता है। 
विश्व-ब्रह्माण्ड के धर्म और सामग्रिक छन्द-ताल (२४ चारित्रिक गुणों) को निरन्तर 'uninterrupted' बनाये रखना, तथा जहाँ  बेसुरा लगे, (जहाँ कन्फ्यूजन हो अर्थात अपनी आत्मा से सम्बन्ध विच्छिन्न होने के कारण जब  हमलोग स्वयं को ही कर्ता मानने लगें) या जिसके कारण यह छन्द-ताल कट जाता हो, उन (१२) दुर्गुणों  को अपने चरित्र से पूरी निष्ठुरता के साथ निकाल बाहर करना- धर्म के यही दो पक्ष हैं 
और धर्म की सबसे प्राथमिक बात, बिलकुल सहज एवं सरल भाषा में यही है। 
अब हमलोग इस तथ्य को आसानी से स्वीकार कर सकते हैं कि चिर काल से, सृष्टि का प्रारंभ होने के समय से ही, उसके साथ-साथ समानान्तर रूप में धर्म भी चलता आ रहा है, और आगे भी चलता रहेगा। इसीलिये यह प्रश्न कि वर्तमान युग  में भी धर्म की कोई प्रासंगिकता बची है या नहीं;  बिल्कुल बेतुका (या असंगत incoherent) है। किन्तु  सृष्टि-लीला या सृष्टि का चक्र, चूँकि निरन्तर चलता रहता है, इसीलिये इसके साथ  कदम से  कदम मिला कर चलने की चेष्टा में  धर्म को भी विभिन्न प्रकार के रूप धारण करने ही पड़ते हैं। इस अनिवार्यता को नहीं समझ पाने के  कारण यदि धर्म को बिल्कुल ही विसर्जित कर दिया जाय, या  विश्व-ब्रह्माण्ड के हृदय की धड़कन या  छन्द-ताल के साथ मनुष्य के हृदय  की धड़कन (आत्मा) या  छन्द-ताल के  सम्पर्क (फ्यूज वायर) को ही काट दिया जाये तो मनुष्य  अपने  जड़ से ही उखड़ (uprooted) जायेगा। उसके मन में चरम सत्य को जानने की जो स्पृहा (लालसा) रहती है, वह अपूर्ण रह जाएगी, और उसका जीवन  निरर्थक हो जायेगा। 
अतः हमें अपने मनुष्य-जीवन को सार्थक करने के लिये उसी विश्व-छन्द के ताल साथ अपने हृदय की धड़कन को एकाकार कर लेना होता है । इसीलिये विभिन्न युगों में, विभिन्न देशों में, विभिन्न मार्गों से मनुष्य इस योग को प्राप्त करने की चेष्टा करता चला आ रहा है। अपनी इच्छा से इस योग के मार्ग पर चलने को  धर्म कहते हैं, तथा इसके विपरीत आचरण को अधर्म कहते हैं।
किन्तु विश्व के इतिहास में यह देखा जा सकता है कि बार बार धर्म की ग्लानी हुई है, और इस प्रकार का अधर्म  बार बार अपना सर उठाता रहता  है । और इस ग्लानी से मनुष्यों का उद्धार करने के लिये समय समय पर दैवीक मनुष्यों (Super-human) धर्मगुरुओं (या मानव-जाती के मार्ग-दर्शक नेताओं) का अवतरण भी होता रहा  है। तथा उन्होंने  सामान्य मनुष्यों के भी समझ में आ जाने वाली भाषा ढाल कर, युग के वातावरण के अनुसार, या देश-काल-परिस्थिति के अनुसार अपने उपदेशों को प्रदान किया है। नन्दन-तत्व या 'स्वर्ग से पतन' के सिद्धांत ' Eden theory' को समझ पाना हर किसी के लिये संभव नहीं है। 
इसीलिये उन धर्म-गुरुओं ने ज्ञान-कूसूम का चयन न करके, सीधा धर्म रूपी ज्ञान-फल को ही उनकी हथेली पर रख दिया है। 
तथा उस फल का भक्षण करके मनुष्यों ने धर्म की रक्षा करते हुए अपनी रक्षा भी की है। इसी प्रकार बुद्ध, महावीर, मूसा, ईसा, मोहम्मद -आदि अनेक दैविक मनुष्य, पैगम्बर, अवतार या धर्मगुरु  धरती पर आये हैं। देश-काल को परिष्कार (touch up) करने के लिये वैश्विक छन्द-ताल का अनुगामी (follower) बनकर कभी कोई ज्वार आया है, तो कभी कभी भाटा भी आता रहा है। अर्थात कभी कभी जब कालाचार और लोकाचार ही धर्म के प्राण (सार-तत्व) से बड़ा बन गया है, तो  धर्म के  सुर को धीमा हो जाना पड़ा है।
उधर दूसरी ओर ज्ञान के विविध क्षेत्रों में मनुष्य के ज्ञान की परिधी में भी काफी विस्तार हुआ है। वह मैटर या जड़-पदार्थ के भीतर बहुत गहराई तक प्रविष्ट हो चूका है, तथा नये नये विषयों को जान लेने के बाद बहुत घमण्ड  के साथ उसको विज्ञान कहता है। अब वह (जड़ पदार्थों में अन्तर्निहित अनन्त शक्ति) या उर्जा को और अधिक पहचानने लगा है। वह अब समझने लगा है कि यह जगत पदार्थ (Matter) के उपर शक्ति (Energy) का खेल मात्र है। इन दोनों के अतिरिक्त अन्य कोई सत्ता नहीं (E =M)है। इस पदार्थ और शक्ति को वशीभूत कर लेने से अपनी इच्छा के अनुसार सब कुछ किया जा सकता है। उसके बाद अचानक ही पदार्थ धुँधला होने लगता है, और जब उसकी दृष्टि के सामने से पदार्थ (Matter) अदृश्य हो जाता है, और जब केवल शक्ति (Energy= माँ भवतारिणी) मात्र ही बची रह जाती है। तब वह बड़े अभिमान से घोषणा करता है- ' धर्म नहीं विज्ञान ही मनुष्य को सब कुछ दे सकता है।'
किन्तु आधुनिक युग में विज्ञान  स्वयं ही सब कुछ का धर्म, अर्थात इस ब्रह्माण्ड का धर्म या पदार्थ और शक्ति के धर्म को जानने की दिशा में अग्रसर होता जा रहा है। (हिग्स बॉसोन में मात्रा या भार कहाँ से आया? इसकी खोज कर रहा है !) इन सब को जानकर वह मनुष्य के कष्ट में कमी लाने की चेष्टा कर रहा है। उसके भोग-सुख में वृद्दि कर रहा है। विज्ञान ने इस बात का आविष्कार भी कर लिया है कि लयबद्ध जीवन नहीं रहने या छन्द-ताल से अलग हट जाने के कारण ही मनुष्य को जीवन में इतने कष्ट भोगने पड़ते हैं। इसीलिये अब विज्ञान  भी नैसर्गिक- छन्द की खोज में दौड़ने लगा है।
किन्तु अभी तक उसका कोई समग्र दर्शन नहीं होने के कारण, उसके दौड़ की भीतर जो लयबद्धता रहनी चाहिए थी, मनुष्य के जीवन के साथ जो छन्द-ताल होना चाहिये था, वह सब नहीं दीखता है। इसीलिये विज्ञान के क्षेत्र में एक देश के स्वार्थ के उपर, दूसरे देश का स्वार्थ बढ़ाते रहने से भी किसी (वैज्ञानिक को) को कोई आपत्ति नहीं होती। क्योंकि विज्ञान (वैज्ञानिकों) के पास श्रेय -प्रेय के बीच विवेक-विचार करके (परमाणु बम कौन फोड़े ?) निर्णय लेने का कोई अवसर नहीं है। ऐसी परिस्थिति में उसको अपना स्वार्थ (अपने देश के नेताओं का स्वार्थ) या सुख-भोग ही परमार्थ के रूप में दिखाई पड़ने लगता है।
किन्तु आध्यात्मिक मनुष्य यदि चाहे तो विवेक-प्रयोग करके प्रेय का त्याग कर सकता है, और  श्रेय को प्राप्त करने की दिशा में अपने कदम  बढ़ा सकता है, और स्वार्थ का त्याग करते हुए क्रमशः परार्थ को ही बड़ा बना लेता है। क्योंकि, विज्ञान में भी जानने के प्रति आग्रह होता है, इसीलिये हम विज्ञान को अधिक से अधिक धर्म तक पहुँचने का एक सोपान तो कहा जा सकता है, किन्तु विज्ञान कभी  धर्म का समकक्ष या प्रतिद्वन्द्वी  नहीं बन  सकता है।
 इस बात को समझ लेने से विज्ञान और धर्म के बीच विवाद की कोई आशंका नहीं रहती। क्योंकि अंश कभी समग्र का विरोधी नहीं हो सकता। इसीलिये विज्ञान का परित्याग करके केवल धर्म की बात करने की आवश्यकता नहीं है।और विज्ञान के अखण्डनीय परिणति (Undeniable-culmination) को ही धर्म कहते हैं। सीलिये धर्म का परित्याग करने का भी प्रश्न नहीं उठता है।
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 कनफ्यूज हो जाने का अर्थ है, फ्यूज उड़ जाना - माने आत्मा से कनेक्सन कट जाना, फिर कोई मिस्त्री (नवनी दा ) आकर फ्यूज जोड़ देता है।
जैसे  'हरि मोर पिउ, मैं राम की बहुरिया' या जल में कुम्‍भ, कुम्‍भ में जल है, बाहर भीतर पानी फूटा कुम्‍भ जल जलहीं समाना, यह तथ कथौ गियानी।" क्या आप 'स्वस्थ'  हैं ? या अभी तक आप  'कायस्थ' ही बने हुए हैं ? जब यहाँ कोई भी मनुष्य पूर्ण नहीं है, तो एक को अच्छा दूसरे को बुरा कैसे  कह सकते  हैं ?  'मैं कर्ता हूँ ' - या 'मैंने किया है'- इस बात को बोलना पड़ता है,  किन्तु मन में यह भाव बना रहता है, कि यह सब ड्रामा में डायलोग बोलने के जैसा है। 
हमारा रोल विश्व-रंगमंच पर निर्देशक (माँ भवतारिणी) के निर्देशन में अपनी भूमिका का निर्वहन करने के जैसा ही है। जैसे किसी नाटक में जो पात्र राजा की भूमिका में है, वह कहता है, - ' ये मेरा राज है,और  तुम मेरी रानी हो ! ' किन्तु ३ घन्टे बाद जब नाटक समाप्त हो जाता है, तब वह रानी की भूमिका निभाने वाली उस हिरोइन से यह  नहीं कह सकता, कि तुम मेरे घर चलो क्योंकि तुम मेरी रानी हो।  
आत्मा को तो हमलोग अभी जानते नहीं उसमें वास कैसे करें ? सत्य दो है एक त्रिकाल सत्य है जिसको सत या शाश्वत कहते हैं, और  एक रिलेटिव ट्रुथ है।  जो अमिताभ से नाटा है वो मुकरी से लम्बा हो सकता है, बदलने वाला सत्य या  सांसारिक सत्य कहते हैं। 'मैं (नाम-रूप का अहं) कर्ता  हूँ' या आत्मा कर्ता है?]

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