Sunday, August 5, 2012

स्वामी विवेकानन्द और हमारी सम्भावना [12] " हम क्या कर सकते हैं ?"(समस्या और समाधान),

'हमारी समाज-सेवा कहीं निकम्मों की कर्म-लिप्तता तो नहीं ? ' 
देश के लिये हम क्या कर सकते हैं ?  स्वयं आगे बढ़ कर कुछ करना तो दूर की बात है,- इस प्रश्न को पर्याप्त गंभीरता के साथ उठाने वाले लोगों की संख्या भी बहुत कम है। भारत इस बात लगभग भूल ही चुका है कि विश्व-मानवता के प्रति हमारा भी कोई दायित्व हो सकता है। इसको ही महा-तमोगुण से आच्छादित होना कहते हैं। 
किन्तु ऐसा सोचना भी ठीक नहीं है, कि हम भारत वासी कुछ भी नहीं करते हों। हमारे करने के लिये भी यहाँ ढेरों काम पड़े रहते हैं। पर-निन्दा करना, दूसरों का शोषण कर या वंचित करके अपना स्वार्थ सीद्ध करना, भ्रष्टाचार के सहारे भाग्य परिवर्तन करने का प्रयास करना। तथा सभी कठिनाईयों के लिये दूसरों को दोषी ठहराने की चेष्टा करना-आदि कार्यों में तो हमलोग दिन-रात लगे ही रहते हैं।
किन्तु क्या सचमुच हमारे करने के लिए, क्या ऐसा कोई कार्य नहीं है, जिसे हमलोग अपने परिवार का भरण-पोषण करने की जिम्मवारी उठाने के साथ साथ, खाली बचे समय में नियमित रूप से और निष्ठापूर्वक करते रहें? कुछ ऐसे कार्य अवश्य हैं, जिसके करने से भले ही उस कार्य के द्वारा तत्काल मेरा कोई निजी स्वार्थ न भी सिद्ध होता हो, किन्तु उसी के कारण भविष्य में मेरा अपना और जिनको देखने वाला कोई नहीं है, उन सबका भी निश्चित रूप से कल्याण होता है।
आम तौर से हमलोग इतने स्वार्थी बन चुके हैं, कि पहले तो चाहे थोड़ी कम मात्रा में ही सही, किन्तु बाद में जब तक भरपूर तरीके से हमें समस्त भोग-सुख प्राप्त नहीं हो जाते, तब तक हमलोगों को संतुष्टि का अनुभव नहीं होता है। किन्तु हम इस बात पर थोड़ा भी विचार नहीं करते, कि इसी देश में मेरे ही जैसे अनेकों मनुष्य ऐसे हैं, जिन्हें दो वक्त का भोजन भी नहीं मिल पाता, सिर छुपाने के लिये जगह नहीं है, शिक्षा नहीं मिलती, चिकित्सा नहीं मिल पाती, जिनका समाज में कोई मान या परिचय नहीं है। जो मेरे जैसे ऐशो-आराम से एक भी दिन अपना गुजारा नहीं कर पाते हैं !
और इन्हीं गरीबों की झोपड़-पट्टी की दूसरी तरफ,किसी व्यक्ति का आसमान में छेद करता हुआ  केवल निजी मकान ही नहीं खड़ा है, बल्कि पोर्टिको में कारों की कतारें खड़ी हैं, आये दिन ही चकाचौंध पूर्ण पार्टियों में खाने-पीने, भोग-ऐश्वर्य का रेला चलता रहता है। और उनका यह सारा ऐशो-आराम सड़क की दूसरी ओर रहने वाले मनुष्यों को उनके अधिकार से वंचित करने का ही परिणाम हैं। क्या इस अवस्था में परिवर्तन लाने के लिये हम कुछ नहीं कर सकते ?
इधर मेरा अपना जीवन भी जिस रूप में चल रहा है, क्या उसको बहुत सुंदर-जीवन कहा जा सकता है ? तेल लाता हूँ तो नमक घट जाता है, नमक लाता हूँ, तो चावल खत्म हो जाता है। लिहाजा मौका मिलते ही मुझे घूस लेना पड़ता है। ऐसी बात नहीं कि केवल मैं ही लेता हूँ, मैं तो देखता हूँ कि प्रत्येक दफ्तर में उपरी इनकम करने की व्यवस्था बनी हुई है। तथा (इश्वर की कृपा से ?) जिन लोगों को पर्याप्त उपरी कमाई हो जाती है, उनकी शानो-शौकत कितनी बढ़ जाती है, परिवार-समाज में उनका रुतबा कितना बढ़ जाता है, उनकी कितनी चलती हो जाती है !
इस महंगाई के जमाने में भी बेटी की शादी में कितना खर्च कर देते हैं ! खाने-पीने से लेकर, मौज-मस्ती,  धूम-धड़ाके तक, हर चीज का इंतजाम रहता है। डीजल-पेट्रोल का दाम बढने के बावजूद भी पूरा बस और जीप में भरकर ' बहु-भात ' (या रिसेप्सन पार्टी ) में जाते हैं। फिर हर साल क्रिसमस या नियू-इअर्स डे पर भी बस भाड़ा करके टूरिस्ट-प्लेस में घूमने जाते हैं, वहाँ खाने-पीने, पिकनिक मनाने के बाद लौटते समय रास्ते में पड़ने वाले किसी प्रसिद्द मन्दिर में थोड़ा चढ़ाव भी चढ़ा आते हैं, ताकि मेरा उपरी इनकम कहीं बन्द न हो जाये, या निगरानी विभाग कहीं मुझे पकड़ न ले ! सर्वोच्च पद से लेकर फोर्थ ग्रेड तक - कोई भी क्षेत्र तो बचा हुआ नहीं है। इसीलिये स्कूल की जिम्मेदारी को हल्का करने के लिये, डोनेसन देकर लड़के को अच्छे स्कूल में दाखिला दिलवा दिया हूँ, मोटा ट्यूशन फी देकर एक उपयुक्त शिक्षक भी नियुक्त कर दिया हूँ।
इतना ही नहीं,अपने मुन्ने से मुझे इतना प्रेम है कि, उसको स्कूल-कॉलेज में अच्छे नम्बरों से पास कराने से लेकर डाक्टरेट तक की डिग्री प्राप्त कर सके- उसका भी सब रास्ता देख-समझ लिया हूँ। इसके बाद लड़का भी यदि होनहार निकल गया, तो वह खुद ही अपना एक गैंग बना लेगा। और मुन्ना बड़ा होते होते चाकू पर धार देना भी सीख जायेगा, परीक्षा में नकल करना सीख लेगा, और यदि इन्भेजिलेटर मन-मुताबिक मिल गया, तो अहिंसक पद्धति से- ' जीयो और जीने दो ' के सिद्धान्त के सहारे, सभी दरवाजों से होता हुआ बाहर आ ही जायेगा। फिर एक दिन सुन्दर कनभोकेशन-भाषण सुन कर, बिना झन्झट किये, डिग्री लेकर घर चला आएगा। 
उसके बाद, नैतिकता की  परवाह किये बिना, कहाँ कितना देने से, या किस (नेता-अफसर के) यहाँ कैसा बेगार खटने से नौकरी मिल जाएगी ?  यह सब भी सीख लेगा। उसके बाद इसी व्यवस्था में और पक्का होने से, उसकी तरक्की भी होगी और उपरी इनकम में बढ़ोत्तरी भी होगी। किन्तु समाज में जो लोग निचले स्तर पर हैं, वे क्या वहीँ गिरे रहेंगे ?- उनके बारे कुछ सोचने को कहा जाये, तो उनका उत्तर होगा- वे लोग भी मेरे जैसा करें, तब वे भी आराम से रहने सकेंगे ! किन्तु वैसा क्या हो सकता है ? गैर-सरकारी संगठनों (NGO) में भी भ्रष्टाचार कम नहीं है! वहाँ पर भी ओभर-हेड खर्च या 'लीगल-एक्सपेंस' खाते में दिखाये जाने वाले खर्च बढ़ते ही जा रहे हैं। उद्योगपतियों के साथ धोखाधड़ी करके, श्रमिकों को वंचित कर के, मिलावटी और निम्न स्तर के उत्पादों का निर्माण करके भी लाभ दिखाने के लिये, खाते में वह सब करना पड़ता है। उनलोगों को और भी कई तरह के कार्यों में गलत खर्च करने पड़ते हैं, इसीलिये खाते में थोड़ा  उल्टा-फेरी करने को वे लोग न्यायोचित ठहराते हैं।
और जो लोग व्यापार करते हैं, उनके उपर तो लक्ष्मी यूँ ही प्रसन्न रहती हैं ! उनको उतना झंझट भी नहीं उठाना है, केवल बुद्धिमानी पूर्वक गोदाम के माल को इन-आउट (लाना-निकालना) दिखाते रहें और व्यापारी-संघ में एकता रखते हुए, बही-खाता में कोई गलती किये बिना, समय के अनुसार दाम बढ़ा दें तो रातो-रात माला-माल हुआ जा सकता है। मैं भी उन ब्लैक-मूल्य में बेचने वाले उत्पादों के पीछे भागते-भागते अपने जीवन-मूल्य या जीवन के मान-दण्ड को जितना चाहूँ, नीचे गिरा सकता हूँ; इसके लिये मेरा तर्क केवल इतना होगा, कि आखिर इसी मंहगाई और रिश्वतखोरी के दौर में मुझे भी तो जिन्दा रहना है, अपने परिवार का भरण-पोषण मुझे भी तो करना है! किन्तु यह एक बहुत बुरा दुश्चक्र (vicious circle) है। हम जितने भी तथाकथित बुद्धिमान या चालाक लोग हैं, इस दुष्चक्र से अस्थायी रूप से (Provisionally) तो बच जाते हैं; किन्तु अपने ही वंशजों के लिये एक डरावने भविष्य की रचना कर जाते हैं। और उधर जो लोग समाज के सबसे वंचित लोग हैं, जो अन्तिम पायदान पर खड़े थे, वे क्रमशः शून्य (nothingness) या अनस्तित्व की खाई में गिरते चले जाते हैं।
इसी प्रकार अपना जीवन-यापन करते हुए, हमलोगों में जो सूक्ष्म अनुभूतियों को व्यक्त करने की इच्छा या कलाप्रियता भी होती है, उन्हें व्यक्त करने के लिये हमलोग नाटक खेलते हैं, साहित्यिक चर्चा करते हैं, संगीत-संध्या आयोजित करते हैं,धार्मिक-सम्मेलन (भागवत-कथा आदि) कराते हैं, सार्वजानिक पूजा करते है, बड़ी बड़ी प्रदर्शनीयाँ लगाते हैं, मेला लगाते हैं, सांस्कृतिक-गोष्ठी आयोजित करते हैं, या किसी 'समाज-सेवा क्लब ' के सदस्य बन जाते हैं। किन्तु सच्चाई यही है कि अधिकांश क्लब के समाज-सेवियों के मन में, नाम-यश पाने या अनैतिक तरीके से धन कमाने, या अपना और कोई उल्लू सीधा करने की मनोवृत्ति या लोभ ही हमें सामाजिक-कार्यों में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेने की प्रेरणा देता है। इसके आलावा यदि  किसी किसी धनाड्य या उच्च-पदस्थ व्यक्ति-विशेष में ये सब लोभ-लालच भले नहीं भी हों, किन्तु वहाँ भी निरर्थक कार्यों में आत्म-सन्तोष पाने की तीव्र इच्छा होती है। ये सारे आयोजन (माँबाप की शादी का ५० वां बर्षगाँठ या ७५ वां जन्मदिन आदि) भी एक प्रकार से 'निकम्मों की कर्म-लिप्तता ' के सिवा और कुछ नहीं है। 
इसका परिणाम क्या होता है ? यही भाव (निकम्मी- कर्मलिप्तता) दूसरे लोगों में भी संक्रमित होने लगती हैं। अतः आज भी हमलोग यदि कुछ कर सकते हैं -तो वह यह कि, हम सबसे पहले इस 'निकम्मों की कर्म-लिप्तता ' जैसे कार्यों का निरिक्षण-परिक्षण करके, हमलोग इस बात पर चिंतन-मनन कर सकते हैं, कि वे सभी कार्य मुझे तथा मेरे भविष्य को किस दिशा में लिये जा रहे हैं ? इस प्रकार आत्मनिरीक्षण करने से, यदि यह बात समझ में आ जाय कि यदि ये सब कार्य उपर से आकर्षक लगते हुए भी, शुद्ध भलाई की ओर, अर्थात आम-जनता के यथार्थ कल्याण की दिशा में नहीं किये जा रहे हैं। तब यह निर्णय लेना चाहिए कि इस विषय में क्या करना उचित होगा ? [मन पछितैहें अवसर बीते, जब आप किसी को अच्छे नहीं लगेंगे, तब ईश्वर आपको अच्छा लगेगा! पर तब आप कुछ कर नहीं पाएंगे। जिसके न करने से रोना पड़ता है,उसे पहले करो। वो है परमार्थ,उसे पहले करें।]विचारपूर्वक देखना होगा कि जिन कार्यों का हमारे उपर दायित्व सौंपा गया हो, या चाहे अभी अपने खाली समय में मैं जिन कार्यों को अपना शौक पूरा करने के लिये कर रहा हूँ,उससे दूसरों का यथार्थ कल्याण होगा या नहीं ? 
 फिर उसके बाद दृढ़ता के साथ उसी उसी अच्छे कार्य को करना चाहिये, जिससे यह विराट विषम चक्र (vicious circle) परिवर्तित हो जाय। यदि ऐसा नहीं किया गया तो सम्पूर्ण समाज विध्वंश के मार्ग पर चल पड़ेगा। हमलोग उसी मार्ग पर बहुत आगे निकल आये हैं। अब भी नहीं रुके, ओर मन को U-turn मोड़ नहीं देते हैं (अर्थात चित्त-नदी के प्रवाह का मोड़ अंतर्मुखी नहीं करते हैं ) तो पूरे देश के लिये बहुत बड़ा संकट प्रतीक्षा कर रहा है। यदि हमलोग इस कार्य को नहीं करते, तो हमलोगों को मनुष्य से पशु-मानव बनने में अधिक देर नहीं लगेगी।
हमलोग निजी रूप से जो कुछ भी करते हैं, (यहां तक कि तथाकथित भागवत-सप्ताह या विभिन्न धार्मिक-सम्मेलन आदि भी ) वह सब व्यक्तिगत स्वार्थ को पूरा करने के लिये ही करते हैं। एवं अधिकांश दल (वे तथाकथित धार्मिक दल भी हो सकते हैं ) जो कुछ भी करते हैं, वह सब दलगत स्वार्थ को पूरा करने के लिये ही करते हैं। क्योंकि अपना दल यदि सत्ता की कुर्सी पर बना रहा तो, दल के लोगों को विशेष-सुविधायें मिलेंगी और गलत-सही सभी रास्तों से बहुत सारा धन जमा करने का मौका भी रहेगा। सम्पूर्ण देश-वासियों के कल्याण की चिन्ता किसे होती है ? 
किन्तु मनुष्यत्व की प्राप्ति (जो धर्म-आचरण का अंतिम फल है), यथार्थ लोक-कल्याण के कार्य में आत्मनियोग करने से ही होती है। और इसीमें यथार्थ लौकिक या सांसारिक सुख पाने की सम्भावना भी निहित होती है। इसीलिये जो व्यक्ति सभी मनुष्यों के सुख या यथार्थ कल्याण में विश्वास करते हों, या ईश्वर में विश्वास करते हों, उन सब को मिल कर ऐसा कुछ करना चाहिये, जिससे उनकी न केवल वर्तमान समस्यायें दूर हो सके, बल्कि भविष्य में आने वाली सभी समस्यायों का समाधान भी प्राप्त हो जाय।
वर्तमान एवं भविष्य में आने वाली समस्त समस्याओं का मूल कारण व्यक्ति-चरित्र का आभाव ही है। व्यक्ति-चरित्र को गठित कर लेने से, समाज का जघन्य-दुश्चक्र भी टूट जायेगा, जीवन में सुख-शांति आएगी, ओर यही चरित्र-निर्माण रूपी यथार्थ धर्मानुष्ठान हमारे जीवन को भी महिमामय बना देगा। जो हमलोगों का मनुष्योचित कर्तव्य है, उसी को धर्म कहा जाता है। धर्म और कुछ नहीं है, यथार्थ लोक-कल्याण (People Welfare) का कार्य करना ही धर्म है। लोक-कल्याण करने का अर्थ लोगों को भिक्षा देना नहीं है, लोगों की आंतरिक शक्ति को जाग्रत कर देना ही यथार्थ समाज-सेवा का कार्य है ! एवं उस शक्ति के जागने से ही भोजन-वस्त्र भी प्राप्त होगा, कला में उन्नति होगी, जीवन में किसी भी प्रकार का आभाव महसूस नहीं होगा। ' प्रत्येक व्यक्ति में अंतर्निहित अनन्त शक्ति ' को जाग्रत करने का कार्य - इतना महत्वपूर्ण है, कि इसके लिये प्रत्येक व्यक्ति को प्रयत्न करना होगा, और उसके लिये हम सभी को एकजुट होकर संघबद्ध प्रयास चलाना पड़ेगा। एकजुट होकर, संगठन बनाकर, अपने इसी संगठन की शक्ति को दृढ बनाने का कार्य कीजिये। 
गाँव-गाँव, शहर-शहर में इस कार्य को फैला दीजिये। यदि धर्म करना चाहते हों तो इसी कार्य से यथार्थ धर्म-लाभ होगा। और यदि आप धर्म को पसंद नहीं करते हों; कर्तव्य-निष्ठ व्यक्ति हों,किन्तु सभी मनुष्यों के प्रति आपके हृदय में प्रेम हो,तो मात्र इसी कर्तव्य का पालन करने से, आपका जीवन सार्थक हो जायेगा। ऐसा कोई कार्य नहीं है, जिसे आप नहीं कर सकते हों !
वर्तमान युग की समस्यायों के विशाल पर्वत को लाँघ पाना, कठिन प्रतीत हो सकता है। किन्तु एकता के सूत्र में बँधे व्यक्तियों के संयुक्त-प्रयास एवं दृढ-संकल्प के सामने ऊँचे से ऊँचे पहाड़ को भी केवल लाँघ जाना ही नहीं, बल्कि उसको चूर-चूर कर देना भी संभव हो जाता है। युवा-शक्ति इसी विश्वास के साथ कमर कस कर खड़े हो जायें , तथा प्रतीयमान असम्भव को संभव कर दिखाने का संकल्प लेकर आगे बढ़ें! विश्वास कीजिये हमलोग सबकुछ कर सकते हैं !
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