Wednesday, August 1, 2012

स्वामी विवेकानन्द और हमारी सम्भावना [10] "आशा और निराशा "(समस्या और समाधान),

 "अज्ञ-जनों के हृदय का अंधकार को दूर करने के लिये आगे बढ़ो !"
जिस दिन, कई शताब्दियों तक गुलामी की बेड़ियों में जकड़े रहने के बाद, पराधीन भारत में स्वाधीनता का अरुणोदय हुआ था- उस दिन, समस्याओं के अम्बार को सिर पर उठाये अनेकों प्रकार के दुःख से घिरे होने पर भी,  मन में आशा की किरण फूट पड़ी थी, लगा था -जीवित रहने के लिये 'भोजन-वस्त्र-आवास-स्वास्थ्य-शिक्षा' जैसी जो न्यूनतम आवश्यक वस्तुएँ हैं, कम से कम अब -मेरे देशवासीयों को उतना प्राप्त करने का अवसर तो अवश्य मिल जायेगा। ऐसा प्रतीत हुआ था मानो विश्व-जगत के राष्ट्रों के बीच भारतवर्ष अपना खोया हुआ गौरव पुनः प्राप्त कर लेगा। किन्तु मन में घर जमाये बैठी अनेकों आशाओं-आकाकंक्षाओं की भाँति यह आशा भी अभी तक (आजादी के ६५ वर्ष बीत जाने के बाद भी) एक कल्पना (फैन्टसी) ही बनी हुई है।
कुछ ही दिनों पूर्व जब पूरे जोर-शोर से भारतीय गणतन्त्र की बीसवीं वर्षगाँठ (यह प्रबन्ध १९७० में महामण्डल की द्विभाषी संवाद पत्रिका Vivek-Jivan में प्रकाशित हुआ था) का उत्सव मनाया जा रहा था, और लगभग उसी समय स्वामी विवेकानन्द का जन्मोत्सव भी मनाया गया था- तब मन में स्वाभाविक तौर से यह प्रश्न उठा था- अब भी देश का ऐसा हाल क्यों है ? देश पर शासन करने का अधिकार अपने हाथों में आने के बाद भी, हमलोग अभी तक भारत की आम जनता के चेहरों पर मुस्कान क्यों  नहीं ला सके हैं ? आज भी देश के तरुणों- युवाओं की आँखों में आशा की चमक के बदले हताशा की कालिमा क्यों दिखाई दे रही है ? हमलोग आज भी एक संप्रभुता सम्पन्न राष्ट्र के रूप में गौरव-पूर्ण आसन पर क्यों प्रतिष्ठित नहीं हो सके हैं ?
इन सभी प्रश्नों का ठीक ठीक उत्तर जान लेना बहुत आवश्यक है। क्योंकि रोग की ठीक ठीक पहचान (diagnosis) नहीं होने से,चिकित्सा होना भी संभव नहीं होता। आज के राष्ट्रीय जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में जो कुछ भी अधोपतन दिखाई दे रहा है, उसका कारण यह है कि हमलोगों के राष्ट्रीय-चरित्र में ईमानदारी आम तौर पर विलुप्त हो चुकी है, और भ्रष्टाचार का कैंसर व्यापक स्तर तक फ़ैल चुका है। हमलोगों के हृदय से वह देश-प्रेम कहीं खो गया है, जो राष्ट्रीय-स्वार्थ को व्यक्ति-स्वार्थ के उपर स्थान देना सिखाता है। हमलोगों के भीतर देश के लिये वैसी उत्कट देश-भक्ति  नहीं है, अपने देशवासियों से वैसा प्रचण्ड प्रेम नहीं है, जो समाज के शोषित, वंचित, अवहेलित, जन-साधारण- ' नीच जाति, मूर्ख, दरिद्र, अज्ञ, मोची, मेहतर ' - सबों को अपना भाई, अपने रक्त के रूप में देखना सिखाता है। फलस्वरूप जो होना चाहिये था, वही हो रहा है। 
स्वामीजी ने हमलोगों से अपने देशवासियों को साक्षात् देवता मानकर उनकी पूजा करने का संदेश दिया था। उन्होंने कहा था-"मैंने इतनी तपस्या करके यही सार समझा है कि जीव-जीव में वे अधिष्ठित हैं; इसके अतिरिक्त ईश्वर और कुछ भी नहीं है। तुम किसी की सहायता नहीं कर सकते, तुम्हें केवल सेवा का अधिकार है। प्रभु की सन्तान की --यदि भाग्यवान हो तो --स्वयं प्रभु की सेवा करो। यदि ईश्वर के अनुग्रह से उसकी किसी सन्तान की सेवा कर सको, तो तुम धन्य हो जाओगे। अपने को ही बहुत बड़ा मत समझो। तुम धन्य हो, क्योंकि तुमको सेवा करने का अधिकार मिला है,और दूसरों को नहीं मिला। यह सेवा (उच्च स्तर की समाज सेवा -दूसरों की आध्यात्मिक दृष्टि खोलने की सेवा) तुम्हारे लिये पूजा के तुल्य है।" लेकिन स्वामीजी के इन संदेशों को सुन कर काम में लग जायें, वैसी हृदयवत्ता कहाँ है ? 
आज के पदावनत भारत को पुनर्जाग्रत करने की वचनबद्धता का प्रमाण तभी मिलगा जब प्रत्येक भारतवासी 
स्वामीजी के आदर्श को अपने जीवन में धारण करने के लिये कटिबद्ध दिखाई देने लग जाये। व्यक्ति-जीवन के सबल बन जाने पर ही, स्वस्थ समाज और राष्ट्रीय-चरित्र का निर्माण संभव हो सकता है। स्वामीजी के जीवन्त संदेशों में ही समस्त प्रकार की निराशाओं के बीच, भविष्य के भारत की आशा के स्वप्न को साकार करने का बीज निहित है। 
वे ६ अप्रैल १८९७ में सरला घोषाल को लिखित पत्र में कहते हैं- " हे महाभागे ! मैंने जापान में सुना कि वहाँ के लड़कियों को यह विश्वास है कि यदि उनके गुड़ियों को हृदय से प्यार किया जाय तो वे जीवित हो उठेंगी। जापानी बालिका अपनी गुडिया को कभी नहीं तोडती। मेरा भी विश्वास है कि यदि हतश्री, अभागे, निर्बुद्धि, पददलित, चिर बुभुक्षित, झगड़ालू और ईर्ष्यालु भारतवासियों को भी कोई हृदय से प्यार करने लगे, तो भारत पुनः जाग्रत हो जायेगा। भारत तभी जागेगा जब विशाल हृदयवाले सैकड़ो स्त्री-पुरुष भोग-विलास और सुख की सभी इच्छाओं को विसर्जित कर मन, वचन और शरीर से उन करोड़ों भारतियों के कल्याण के लिये सचेष्ट होंगे जो दरिद्रता तथा मूर्खता के अगाध सागर में निरन्तर नीचे डूबते जा रहे हैं।"
इसीलिये विशाल-हृदय वाले युवाओं का आह्वान करते हुए विवेकानन्द कहते हैं -"मोहग्रस्त लोगों की ओर दृष्टिपात करो। हाय ! हृदय-भेदकारी करुणापूर्ण उनके आर्तनाद को सुनो। हे वीरों, बद्धों को पाशमुक्त करने,दरिद्रों के कष्ट को कम करने तथा 'अज्ञ-जनों के हृदय के अंधकार' को दूर करने के लिये आगे बढ़ो! 'अभिः,अभिः'! 'डरो नहीं','डरो नहीं'- यही वेदान्त-दुन्दुभि का स्पष्ट उद्घोष है। " 

" कोई कृति खो नहीं सकती और न कोई संघर्ष व्यर्थ जायेगा, 

भले ही आशाएँ क्षीण हो जायें, और शक्तियाँ जवाब दे दें।

फिर भी धैर्य धरो कुछ देर हे वीर हृदय, तुम्हारे उत्तराधिकारी अवश्य जन्मेंगे,
   
 और कोई भी सत्कर्म निष्फल न होगा ! " 
 (वि० सा० १० /पृष्ठ १८९ )
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