Tuesday, July 24, 2012

स्वामी विवेकानन्द और हमारी सम्भावना [5] 'स्वामीजी के प्रति-सच्ची श्रद्धांजलि ' (व्यक्ति और मन),

'क्या विवेकानन्द के उपदेश केवल दूसरों को सुनाने के लिये हैं,स्वयं करने के लिये नहीं?'  
 प्रत्येक वर्ष के प्रथम मास (month) - जनवरी को स्वामी विवेकानन्द के आविर्भाव का महीना के रूप में जाना जाता है। इस महीने में हमलोग स्वामीजी की पूजा-अर्चना करते हैं, सभा-सम्मेलन का आयोजन करके स्वामीजी के प्रति अपने श्रद्धा-सुमन अर्पित करते हैं। एकबार फिर हम सभी लोग सर्वत्यागी परिव्राजक स्वामी विवेकानन्द के उपदेशों का स्मरण करते हैं। विश्व-महासभा में भारत के महान विचारों की वज्र-गर्जना के रोमान्च का अनुभव करते हैं। एक बार पुनः स्वीकार करते हैं कि स्वामीजी सचमुच भारत-प्रेमी थे, वे सचमुच उन लोगों- जो शताब्दियों से दबे-कुचले और पद-दलित होते आ रहे हैं, से गहरी सहानुभूति रखते थे। वैसे तो स्वामी जी मनुष्य मात्र से प्रेम करते थे, किन्तु यदि हम बंगला भाषी भी हों तो, तो इस बात पर थोड़ा गर्व भी महसूस करते हैं, कि स्वामीजी भी हमारे बंगाल  के ही थे।
यदि व्यक्तिगत रूप से पूछा जाय तो भारत-भूमि पर जन्मा कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं मिलेगा जो स्वामीजी के प्रति श्रद्धा के दो शब्द नहीं कहता हो। किन्तु समय के पहिये की घड़घड़ाहट में हमलोगों के इस क्षणिक स्मरण-मनन से उत्पन्न उत्साह का ज्वार, शीघ्र ही विस्मृति के समुद्र में विलीन हो जाता है। हम यदि अपने व्यक्तिगत जीवन पर दृष्टि डालें, अपने पारिवारिक-जीवन के क्रियाकालापों पर दृष्टिपात करें,अपने समष्टि जीवन अर्थात सामाजिक जीवन या राष्ट्रिय-जीवन की ओर देखें, या उनकी ओर देखें जो लोग हमारे जीवन को परिचालित कर रहे हैं, जो हमारे लिये नीतियाँ और परियोजनायें बनाते हैं, तो हम पाते हैं कि इस महीने में आयोजित होने वाले सभा-सम्मेलनों में हमलोग जो कुछ भी कहते हैं, या सामयिक लेखों में हम अपने जिन विचारों का उल्लेख करते हैं, उन विचारों के साथ अपने यथार्थ जीवन में कोई सामंजस्य नहीं दिखता है। 
ऐसा प्रतीत होता है मानो (स्वामीजी के उपदेश ) ' केवल बोलने के लिये हैं, करने के लिये नहीं। ' और बोलने के लिये तो केवल कुछ पुस्तकों के कुछ पन्नों को एक बार फेंट लेना ही यथेष्ट होता है। किन्तु करने में बहुत तकलीफ होती है। स्वामीजी ने हमलोगों के इस बड़े राष्ट्रिय दोष को बहुत पहले ही देखकर हमलोगों को सतर्क कर दिया था। फिर भी इस दोष को हटाने के लिये हमलोग अपने कदम आगे क्यों नहीं बढ़ा पाते हैं?
इसके पीछे दो कारण हो सकते हैं। पहला, स्वामीजी ने क्या किया था- इस बारे में थोड़ी जानकारी रखने पर भी, हमलोग इस बात पर विशेष ध्यान नहीं देते, कि वे हमसे क्या अपेक्षा रखते थे ? इसका एक कारण यह है कि हमारी शिक्षा पद्धति में बहुत निचली कक्षा के एक-दो परहितव्रती शिक्षकों से स्वामीजी की कुछ कहानियाँ सुन लेने से अधिक कुछ सिखलाने की व्यवस्था है ही नहीं। इसीलिये हमलोग केवल इतना जानते हैं कि स्वामीजी के विषय में बोलते समय उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करना हमारा कर्तव्य है; किन्तु अपने जीवन को समर्पित करके स्वामीजी के प्रति अपनी श्रद्धा को अभिव्यक्त करना हम अपना उत्तरदायित्व नहीं समझते हैं। और दूसरा कारण यह है, कि यदि हममें से कुछ व्यक्ति (चाहे व्यक्तिगत जीवन में हो, या राष्ट्रीय जीवन में) इस बात को थोड़ा-बहुत समझ भी लेते हैं कि स्वामीजी हमसे किस बात की अपेक्षा रखते थे, तो वे भी ' समझ नहीं सके हैं ' का बहाना बनाकर उनके उपदेशों को अपने जीवन में धारण करने से बचना चाहते हैं! क्योंकि हम कहीं यह कह दें कि हमने तो यह समझ लिया की वे हमसे यथार्थ मनुष्य बनने और बनाने की अपेक्षा रखते थे। तो फिर उस उत्तरदायित्व का निर्वहन करने के लिये हमें भी अपने समस्त व्यक्तिगत स्वार्थ और लाभ के स्वप्न को त्याग देना होगा ? स इसी बात को याद करके, हमलोग उनका सच्चा अनुयायी बनने के भय से शिहर उठते हैं, और अपने जीवन को सार्थक करने के कर्तव्य से पलायन कर जाते हैं।
भला ऐसा क्यों होता है ? स्वामीजी ने इसका कारण भी बता दिया था। मनुष्य की ढेरों स्वाभाविक प्रवृत्तियों में से एक है- जड़ता, सदैव स्थिर-अवस्था में अचल होकर ' जड़-पिण्डों ' के समान पड़े रहने की प्रवृत्ति। जो मनुष्य अभी जैसा है,वह वैसा ही बने रहना चाहता है। किन्तु स्वामीजी का अनुयायी बनने के लिये इस भाव का बिल्कुल ही परित्याग कर देना होता है। उनके भाव से अनुप्रेरित होने के लिये - ' मैं पिछले वर्ष जैसा था, इस वर्ष भी वैसा ही रहूँगा ' के भाव को बिलकुल छोड़ देना होता है। क्योंकि उनके अनुयायी के लिये-कल तक वह जितना मनुष्य बन सका था, आज भी उतना ही (लघु) मनुष्य बना रह पाना संभव ही नहीं होता है। इतना ही नहीं, इसके पहले क्षण मैं जो था, इस क्षण भी ठीक वैसा ही बने रहना संभव नहीं रह जाता है। मुझको प्रतिमुहूर्त उन्नततर मनुष्य बनते रहना पड़ता है।
शरीर का बड़ा होना, या बूढ़ा होकर पेंशन पाने लगना - यह कार्य तो प्रकृति द्वारा ही होता रहता है। इसके लिये मुझे स्वयं कोई प्रयत्न नहीं करना पड़ता है। किन्तु जब मैं अपने, शरीर को स्वस्थ और सबल तथा  मन को तेजस्वी बनाना चाहता हूँ या अपने हृदय को विशाल बनाना चाहता हूँ, उसको प्रसारित करना चाहता हूँ, तो इसमें मुझे स्वयं ही चेष्टा करनी पड़ती है; और यही मेरा कार्य है।
प्रति मुहूर्त अपने 'क्षुद्र मैं '- बोध को निष्ठुरता के साथ त्याग करके बड़ा-'मैं' (पाका आमी) बनने की चेष्टा करने को ही-स्वामीजी के भाव को आचरण में उतारना कहते हैं ! जब मनुष्य अपनी सीमाओं (limitations या मन की चहार दिवारी) का अतिक्रमण (transcend) करने में समर्थ हो जाता है; जब हृदय के बन्द कपाट (अहं) को खोल कर प्रेम-मन्दाकिनी प्रवाहित होने लगती है, उस झरने या जलप्रपात के 'खिलखिला कर हँसते और कलकल ध्वनि' में निकलते गीत को सुनकर, अपने-पराये की भेदबुद्धि का स्वप्न भंग हो जाता है। उस धारा में स्नान करके हमलोग अपने छोटे छोटे स्वार्थ को त्याग करके, अपने यथार्थ जीवन-समुद्र के सामने खड़े हो जाते हैं। (अर्थातअपने मिथ्या-अहं, पाशविक-भाव, या स्वार्थपरता का त्याग करके वृहद ' मैं '-बोध ' पाका-आमी ' या अपने सच्चे स्वरुप में स्थित हो जाते हैं।) 
अपने इस क्षुद्र ' मैं '-पन (देहाध्यास, नाम-रूप या M /F भाव ) को खो कर अपने यथार्थ स्वरूप या ब्रह्मत्व की प्राप्ति  (ससीम से असीम बनने या बून्द से सागर बनने) को हमें क्यों भयप्रद मानना चाहिए ?  यह भय केवल अपनी जड़ावस्था को अचल रखने के दुराग्रहवश उत्पन्न होता है। इसीलिये स्वामीजी ने कहा था- ' चरैवेति चरैवेति '-चलते रहना ही जीवन है, और थम जाना ही मृत्यु है।' फिर कहते हैं- ' उठो, जागो ! अब और स्वप्न मत देखो ! ' (अपने को शरीर समझने की-देहाध्यास) घोर निद्रा को त्याग कर उठ खड़े होओ ! फिर केवल खड़े मत रहो, चलना भी शरू कर दो ! - यही है स्वामीजी का जीवन-प्रद मन्त्र, जो जड़-पिण्डों (मुर्दों) में भी जान डाल सकता है। स्वामीजी के अवतरित होने को स्मरण करके हमलोग यदि इस नव-जीवन में दीक्षित नहीं हो सकें, तो स्वामीजी के प्रति मौखिक श्रद्धा-सुमन चढ़ाने का कोई मोल नहीं है।
किन्तु केवल इतना ही काफी नहीं है। अपने जीवन-दीपक को प्रज्वलित करके दूसरों के जीवन को भी प्रज्वलित करा देने का प्रयत्न करना होगा। हम लोगों को ' सबों के जीवन से अपने जीवन को जोड़ कर देखना ' सीखना होगा। सभी युवाओं को व्यक्ति से पारिवारिक-जीवन में, पारिवारिक से सामाजिक-जीवन में, तथा इसी प्रकार राष्ट्रिय जीवन तक 'एक और अभिन्न ' बनते हुए आगे बढ़ने के मन्त्र में अनुप्राणित करना होगा।
इस महा-जागरण की वाणी को भारत के खेतों-खलिहानों, कल-कारखानों, स्कुल-कालेजों, ऑफ़िस-अदालतों, व्यापारियों की गद्दीयों, राष्ट्र-चालकों के मसनदों (सत्ता की कुर्सी पर बैठे नेताओं ) तक, सर्वत्र फैला देना होगा। स्वामीजी सम्पूर्ण भारतवर्ष को पूर्ण रूप से जाग्रत कर देने के लिये ही आये थे। हमलोगों ने अभी तक स्वामीजी को इस रूप में देखना नहीं सीखा है। किन्तु हमलोगों को स्वयं उन्हें इसी रूप में देखना सीखना होगा और सबों को इसी दृष्टि देखने की पद्धति समझानी होगी।
स्वामीजी ने कहा था- ' भारत झोपड़ियों में वास करता है। ' उसके जनसाधारण की उन्नति से ही भारत की उन्नति होगी। भारत को महान बनाने के लिये यहाँ की साधारण जनता को महान भावों से अनुप्राणित करना होगा। " माना कि तूँ  उन सबों को उपर नहीं उठा सकता, किन्तु तुम उनके कानों तक इस महा-जीवन की वाणी को पहुंचा तो अवश्य सकता है।"
 मानव-मात्र के भीतर अनन्त शक्ति अन्तर्निहित है। उस शक्ति के जाग्रत होते ही, वह किसी के भी दबाने से
दबेगा नहीं, अप्रतिरोध्य बन जायेगा। तब वह अपने अधिकार को जानने के साथ साथ अपने उत्तरदायित्व को भी जान लेगा। प्रत्येक मनुष्य जब इस बोध को प्राप्त करके अपने पैरों पर खड़ा हो जायेगा, सिर उठाकर चलने लगेगा, अपने निजी सुख-भोग को तुच्छ समझ कर दूसरों के लिये अपने जीवन को भी न्योछावर कर देने में नहीं हिचकेगा, तभी भारत जाग जायेगा।
जो शक्ति इस नवजीवन को जाग्रत करके उसे धारण किये रहती हो, वही है स्वामीजी का धर्म। इस धर्म को हम अफीम का नशा नहीं कह सकते। जिस जड़ता रूपी अफीम को खाकर हमलोग घोर सुषुप्ति की अचेत अवस्था में सोये पड़े हैं, उस निद्रा को त्याग कर उठ जाने के लिए ही स्वामीजी हमें पुकार रहे हैं। प्रत्येक छात्र, प्रत्येक युवक को उनका यह आह्वान समझना होगा, फिर दूसरों को भी समझाना होगा। देश की सम्पूर्ण  व्यवस्था को इस समझाने के दायित्व का निर्वहन करना होगा। "स्वामीजी बड़े महान थे", यह कहकर भाषण देने से, या समाचार-पत्र में छोटा सा लेख लिखकर श्रद्धांजली देने से ही देश आगे नहीं बढ़ेगा। भारतवर्ष अभी तक जितना भी सिर उठाकर खड़ा होने में समर्थ हुआ है, वह स्वामीजी के उसी मन्त्र से हुआ है, जिसे हमने भुला दिया है। 
उनका जो आह्वान हमलोगों के व्यक्तिगत  और सामाजिक जीवन को महाजीवन प्रदान करने में समर्थ है, उसको अस्वीकार करके, उसकी उपेक्षा करके हमलोग उनके अमर सन्देश ' Be and Make ' रूपी रतन को खो देंगे ? यदि हम इसे खोयें नहीं, यदि उनके इस सन्देश के उचित मूल्य को समझकर उन्हें प्रत्येक युवा अपना आदर्श माने तभी उनके आविर्भूत होने की तिथि पर उनको श्रद्धांजली देना सार्थक होगा। 
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