Friday, July 20, 2012

स्वामी विवेकानन्द और हमारी सम्भावना [3] 'स्वामीजी का मन' (স্বামীজির ভাব )(व्यक्ति और मन),

 'मैं सुधार में नहीं स्वाभाविक उन्नति(growth) में विश्वास करता हूँ।'
'अनुसरण ही सच्चा स्मरण है'- इस बात की चर्चा करते समय हमलोगों ने देखा था कि स्वामीजी को स्मरण करना तभी सार्थक होगा जब हमलोग उनकी शिक्षा के मूल उद्देश्य को समझने की चेष्टा करेंगे। तथा उसे अपने जीवन का लक्ष्य बनाकर, उसी उद्देश्य का अनुसरण करने की चेष्टा करेंगे, भले ही वह अनुसरण कितने ही छोटे पैमाने पर क्यों न हो। manufacturing men with the capital 'M'- अर्थात साधारण मनुष्य को 'यथार्थ मनुष्य' (जिसे अपने सामर्थ्य में ऐसी अटूट श्रद्धा हो कि ठान लेने से मैं अपने बनाने वाले ईश्वर या ब्रह्म को भी जान कर 'ब्रह्मविद' बन सकता हूँ!) के साँचे में गढ़ना ही स्वामीजी की शिक्षाओं का मुख्य उद्देश्य है- इस बात पर भी चर्चा हुई थी।
हालाँकि यह कार्य," Be and Make " - ' मनुष्य बनने और बनाने ' के कार्य को सम्पूर्ण भारत में प्रसारित कर देना - एक बहुत बड़ी योजना है, फिर भी चाहे छोटे से पैमाने पर ही क्यों न हो, हम लोग उनके इसी उद्देश्य को धरातल पर उतारने की लिये उनका अनुसरण करने की चेष्टा करेंगे।
स्वामी विवेकानन्द की इस महत्वाकांक्षी योजना को धरातल पर उतारने के कार्य का प्रारंभ अभी हमें चाहे बहुत छोटे से पैमाने पर (इस छोटे से शहर से ही) क्यों न करना पड़े, किन्तु भविष्य में सम्पूर्ण मानव-जाति को ही उनके इस ' मनुष्य बनो और बनाओ ' के रास्ते पर चलना ही पड़ेगा ! क्योंकि यही एकमात्र रास्ता है," निन्दा-वाद " चलाते रहने से कुछ लाभ नहीं होगा । (कॉमन वेल्थ घोटाला, 2G घोटाला, कोयला घोटाला, हैलिकोप्टर घोटाला आदि आदि के लिये कौन कौन दोषी है ? को खोजकर उसकी निन्दा करते रहने से कोई लाभ नहीं होगा, क्योंकि बिना चरित्र-निर्माण किये सत्ता प्राप्त हो जाने पर कोई भी मनुष्य चरित्र-भ्रष्ट हो जाने को बाध्य है)  
इतने विशाल जगत में जहाँ बहुत से जाति-प्रजाति के अरबों मनुष्यों रहते हों, उनकी अनगिनत समस्याएं होती हैं, उन्हें दूर करने के लिये अनेकों सिद्धान्तों या मतवादों पर आधारित बहुत से राजनैतिक आन्दोलन भी चलते रहते हैं। - उसके सामने खड़े होकर अपने पसन्द के अनुसार (कार्ल मार्क्स के साम्यवाद जैसा) किसी एक सिद्धान्त पर आधारित राजनैतिक व्यवस्था को सम्पूर्ण विश्व में लागु कराने या सभी कुछ को अपनी योजना के अनुसार सजाने का स्वप्न देखना भी बहुत बड़े कलेजे की बात है। किन्तु इस प्रकार के किसी राजनैतिक व्यवस्था के अनुसार चलते हुए कार्य में अग्रसर होने की व्यावहारिक सम्भावना बहुत अधिक दिखाई नहीं पड़ती है।
किन्तु यदि स्वामी विवेकानन्द की योजना के अनुसार - हममें से प्रत्येक व्यक्ति स्वयं यथार्थ मनुष्य बनने की चेष्टा करें, तथा हमारी उस चेष्टा से यदि दूसरों को भी मनुष्य बनने में सहायता मिल सके, तो 'भारत के पुनर्निर्माण' जैसे बड़े कार्य को इस प्रक्रिया को छोटे पैमाने से शुरू करके भी  पूरा किया जा सकता है। इसी पथ से अग्रसर होने का परामर्श, हमलोगों को स्वामीजी ने कई प्रकार से दिया है। स्वामीजी के जीवन-संगीत की रागिनी में बार-बार दुहराया जाने वाला आलाप था- " स्वयं मनुष्य बनो और दूसरों को मनुष्यत्व अर्जित करने में सहायता करो। "
स्वामीजी ने कहा है- " मेरे आदर्श को कुछ शब्दों में ठीक से व्यक्त किया जा सकता है, और वह है- सम्पूर्ण मानवता को उसके देवत्व का संदेश सुनाना, तथा किस प्रकार उस देवत्व (आत्मज्ञान) को जीवन के प्रत्येक कार्य में उसे प्रस्फुटित किया जा सकता है- उस पद्धति से सबों को परिचित करा देना। " यदि इस आदर्श का अनुसरण किया जाय- तो जितने परिमाण में इस कार्य किया जायेगा, उसी परिमाण में समाज की मुखाकृति भी परिवर्तित होती जाएगी। यही है सम्पूर्ण क्रांति ! या समाज को आमूल-चूल परिवर्तित कर देने वाली अध्यात्मिक क्रांति (Spiritual Revolution)  
समस्त प्राणीयों  (जिसमें भी जीवन होता है ) की प्रथम चेष्टा है- अपने प्राणों की रक्षा करने की चेष्टा करना।
सभी जीवों में यही सहज-स्वभाव, या जन्मजात प्रवृत्ति रहती है। किन्तु बिना किसी को साथ लिये, अकेले ही प्रयत्न करने से जीवन के सभी क्षेत्रों में सफलता नहीं प्राप्त होती है। ' প্রাণ রাখিতে সদাই প্রানান্ত '- अर्थात लगातार दम (साँस) रोके रहने की चेष्टा करने से दम निकल जाता है। ' - इसी अनुभव के आधार पर मनुष्यों ने अपने समाज का निर्माण किया था। इस सत्य को स्वीकार करने के बावजूद (कि केवल अपने स्वार्थ को पूरा करे के लिये जीना कोई जीना नहीं है) फिर भी इसी के लिये न जाने कितने प्रयत्न किये जाते हैं। और इसीलिये मानव-समाज को पुनः अधिक उपयुक्त रूप में गढ़ने के लिये कितने ही प्रकार की परियोजनाएँ चलाई जाती हैं। और इसी कारण समय समय पर विप्लव (क्रान्ति) की आवश्यकता भी पड़ती रहती है।  
विप्लव शब्द की व्युत्पति ' प्लु ' धातु से हुई है। सम्पूर्ण समाज को किसी विचार-धारा से आप्लावित कर देना ही विप्लव की मूल बात है। किन्तु जो विचारधारा अपने साथ सब कुछ को (मनुष्य के चरित्र आदि को भी) को बहा कर ले जाता हो, उसको प्लावन (बाढ़) कहते हैं, विप्लव नहीं कहते। समस्त जीवों या प्राणियों का पहला धर्म अपने प्राण की रक्षा करना होने पर भी, श्रेष्ठ जीव का कार्य अपने प्राण को विकसित करना होता है। क्योंकि साधारण प्राणियों के क्षेत्र में जिसे सहज वृत्ति कहते है, मनुष्य के क्षेत्र में उसी को महत प्रवृत्ति कहते हैं।
 जीवन को पूर्ण विकसित करने की सम्भावना एक अध्यात्मिक विषय है,तथा उस सम्भावना को विकसित करने की चेष्टा ही, आध्यात्मिकता है। तथा इस अध्यात्मिक-ज्ञान प्राप्त करने के लक्ष्य को समाज के सभी क्षेत्रों में संचारित कर देना ही अध्यात्मिक क्रांति ( विप्लव ) है। और सभी कुछ (अपनी सांस्कृतिक विरासत) को सैलाब में नहीं बहा कर, उसको विकसित कर लेना ही इस क्रांति का उद्देश्य होता है।राजनैतिक तौर पर समाज में परिवर्तन लाने की जितनी भी चेष्टायें की जाती हैं, वे सभी एक पक्षीय होती हैं। जिस प्रकार कभी हमलोग खादान्न उत्पादन में वृद्धि लाने के लिये कभी हरित-क्रांति करते हैं,दुग्ध उत्पादन में वृद्धि या वस्त्र, यातायात, शिक्षा, निवास-स्थान आदि के लिये भी विप्लव करते हैं। और भी कितनी चीजों के लिये विप्लव करते हैं।
 किन्तु जो सभी चीजों की नियन्ता (controller) है- जो मनुष्य की अन्तर्तम सत्ता है, जिसके पूर्ण विकसित होने से मनुष्य स्वयं सर्वशक्तिमान् बन जाता है, अपनी समस्त समस्यायों का समाधान करने में समर्थ बन जाता है, उसी प्राणप्रद (जीवनदायी) धारणा को सभी मनुष्यों के लिये उपलब्ध बना देने वाले आध्यात्मिक विप्लव की हमलोग उपेक्षा कर देते हैं, या इसके उपर चर्चा करने से भी बचना चाहते हैं। किन्तु इस बात के उपर हमलोग थोड़ा भी विचार नहीं करते कि यही तो यथार्थ मनुष्य के विकास की क्रांति को दबा देने प्रयत्न करना, और उसके रास्ते में बाधाएँ खड़ी करना है !
इसीलिये स्वामीजी ने कहा था, ' मैं छोटे-मोटे परिवर्तन या समाज-सुधार में विश्वास नहीं करता, मैं आमूल-चूल परिवर्तन लाना चाहता हूँ।' समाज के सभी स्तर पर रहने वाले मनुष्यों के हृदय को इन्हीं विचारों से, इसी भाव से आप्लावित कर देना ही वेदान्तिक या आध्यात्मिक विप्लव है। कवि रामप्रसाद ने गाया था- ' মূল ধরে টান দেওয়ার' गान अर्थात - ' जड़ को ही पकड़ कर खीँच देने ' वाला गाना। स्वामी विवेकानन्द ने उसी जड़ को पकड़ कर खींचना चाह था।
 जड़ को पकड़कर खीँच देने से क्या होता है - जो कुछ भी प्राचीन कूड़ा-करकट (निरर्थक बकवास) है, जितनी भी घिसी-पिटी बातें हैं, वे स्वतः गिर कर समाप्त हो जाती हैं। फिर उसी जड़ से नयी डालीयाँ, नये पत्ते, नयी कलियाँ आदि उगने लगते हैं।वृक्ष के उपर पानी डालने से पत्तों को चमकाया जा सकता है। किन्तु उसके जड़ में रस का (या शक्ति का) संचार बाहर से नहीं किया जा सकता है। उसके जड़ को पानी से सींचना पड़ता है।तभी उस वृक्ष का  मूल को अपनी जड़ों से मिट्टी को जकड़े रखने की शक्ति प्राप्त करता है। वही मिटटी से रस को खीँच करके वृक्ष को जीवित रखता है, डालियों और पत्तों सहित सम्पूर्ण पौधे को बचाए रखता है। केवल जीवित ही नहीं रखता, उसमें वृद्धि होती है, उसको फूलों-फलों से सजा देता है। 
मनुष्य-वृक्ष के मूल को सींचने की बात कहकर स्वामीजी रुक नहीं गये थे, उन्होंने उसको पूर्ण रूप से सार्थक बना लेने मार्ग भी दिखलाया है। उन सब बातों को हमें धीरे धीरे जानना होगा, उसके उपर गहराई से चिन्तन करना होगा, फिर उन भावों को अपने जीवन में रूपायित करने के साथ साथ सामाजिक जीवन में भी रूपायित करने का प्रयास करना होगा।
स्वामीजी ने कहा है, 'मैं सुधार में नहीं स्वाभाविक उन्नति(growth) में विश्वास करता हूँ।' जिसमें जीवन होता है, जो सजीव है, वह स्वयं विकसित होकर परिवर्तित होता है। उसमें बाहर से कोई वस्तु डाल कर उसको ग्रहण नहीं करवाया जा सकता है। [जैसे एक बीज नष्ट होकर अंकुर में, अंकुर नष्ट होकर पौधे में,फिर मक्के का असंख्य बीज प्राप्त होता है। विवेकानन्द का कहना है कि " मनुष्य भ्रम से सत्य की ओर नहीं जाता,वरन सत्य से सत्य की ओर अग्रसर होता है; निम्नतर सत्य से उच्चतर सत्य की ओर जाता है।" तथा "मुक्ति का सिद्धान्त यह है कि 'मनुष्य को ईश्वर का साक्षात्कार करके ईश्वर होना है' गीता १०/४१ में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं - 'जहाँ मानव-जाति को पवित्र और उसका उन्नयन करती असामान्य पवित्रता,असामान्य शक्ति,तेरे देखने में आये,तू जान कि मैं वहाँ हूँ!'
आज का जीव-विज्ञान (Biology) जीव-कोशिकाओं के मूल को जानने या उसके तह तक पहुँचने की चेष्टा कर रहा है। 'जीन' (Gene) या पित्रैक का अविष्कार करके, जीन उत्परिवर्तन (Gene Mutation) की प्रक्रिया द्वारा उसका रूप, प्रकृति और आचार-व्यवहार में परिवर्तन कराकर जीवधारी की संघटित शरीर रचना (organism) में आमूल परिवर्तन लाने पर शोध कर रहा है। इसीको वैज्ञानिक पद्धति (Scientific method) कहते हैं। स्वामीजी ने वर्षों पहले समाज के ' जीन ' का अविष्कार करके उसका अध्यन संवर्धन करके उन्नत मनुष्य बनने का उपाय बतलाया है। 
समाज की मूल इकाई मनुष्य है, इसीलिये एक एक करके प्रत्येक मनुष्य को ही भला (निर्दोष या पापरहित) मनुष्य बना लेने से ही समाज परिवर्तित हो सकता है। यदि हमलोग मनुष्य के समाज को किसी पशु-समाज में परिवर्तित होते नहीं देखना चाहते हों, तो  इस बात को हमें इसी वक्त समझ लेना होगा कि इस कार्य को धरातल पर उतारने में - केवल आध्यात्मिक विप्लव ही समर्थ है। 
अन्धे की तरह पाश्चात्य सभ्यता का अनुकरण करने के जिस पथ से  हमलोग चल रहे हैं, उस प्रकार हमलोग इस दुर्भाग्य से बच नहीं सकते। आने वाली विपत्ति की गंभीरता को हमें इसी समय समझ लेना होगा। कोई बाघ या सिंह,  मनुष्य की अपेक्षा बहुत अधिक शक्तिशाली होता है, किन्तु उसकी शक्ति को पाशविक शक्ति कहा जाता है। उस शक्ति का अनुशीलन करने से मनुष्य की प्रगति नहीं होती। पीछे लौटना ही पड़ता है। मनुष्य की वास्तविक शक्ति है - उसका मनुष्यत्व ! 
स्वामीजी के  इसी सन्देश को सभी मनुष्यों तक ले जाना होगा। उन्हें इस सच्चाई को समझा देना होगा, कि कोई मनुष्यत्व-सम्पन्न (यथार्थ) मनुष्य दूसरों की किसी प्रकार की हानी पहुँचाकर, निन्दा कर, या  दूसरों का सिर तोड़ कर अपना स्वार्थ पूरा करने की चेष्टा कभी नहीं करता है। वह तो दूसरों का कल्याण करने के माध्यम से, अपना कल्याण करने के मार्ग से होकर चलता जाता है। यही भाव - आदर्श भाव है। और यही स्वामीजी के मन का भाव है। 
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