Tuesday, July 31, 2012

स्वामी विवेकानन्द और हमारी सम्भावना [9] " विवेकानन्द की विचारधारा का सम्पूर्ण रूप से परिचय "(व्यक्ति और मन),

" जीवन की सार्थकता विवेकज आनंद का अधिकार प्राप्त करने पर निर्भर है !"
स्वामी विवेकानन्द की विचारधारा का सम्पूर्ण रूप से परिचय प्राप्त कर लेना बहुत कठिन है। किसी एक व्याख्यान को सुनकर, भले ही उसमें कितना भी ज्ञानवर्धक विश्लेषण क्यों न हो, स्वामीजी की विचारधारा के समस्त पहलुओं के विषय में सम्पूर्ण अवधारणा नहीं हो सकती। इसके लिये नियमित रूप से 'विवेकानन्द साहित्य ' को पढ़ने और समझने की चेष्टा करने के साथ साथ उन्हें आचरण में उतारने का अभ्यास करना भी बहुत आवश्यक है
स्वामीजी के पास या तो इतना अवसर नहीं था, या उन्होंने इसकी कोई आवश्यकता महसूस नहीं की होगी कि एक ही स्थान पर बैठकर समस्त विषयों के उपर कुछ लिख पाते। किन्तु व्याख्यान देने के क्रम में, या पत्राचार करते समय, अथवा गुरु-शिष्य संवाद, वार्तालाप आदि के क्रम में उन्होंने समस्त गूढ़ विषयों के बिल्कुल जड़ में पहुंचकर, बहुत सुन्दर तरीके से और अत्यन्त स्पष्ट में रूप समझा दिया है। दूसरे  विचारकों के द्वारा लिखित कई पुस्तकों को पढने से उन विषयों की स्पष्ट धारणा तो नहीं हो पाती, उल्टे हम लोग कई बार और अधिक दिगभ्रमित हो जाते हैं। किन्तु क्रमशः स्वामीजी के साथ परिचय हो जाने के बाद वे सब भ्रम-भ्रान्तियाँ तो दूर हो ही जाती हैं, उसके अलावा प्रत्येक विषय के आधारभूत तथ्य को जानकर, हम अपने मन में उन विषयों की स्पष्ट धारणा भी बना सकते हैं । तथा हम यदि प्रयत्न करें, जो हमें अवश्य करना भी चाहिये, तो उस धारणा को हम अपने आचरण में उतार भी सकते हैं। हमें इस बात को अवश्य समझ लेना चाहिये कि कोई भी विद्या या ज्ञान, चाहे वह कितना भी महान या सुन्दर क्यों नहो, यदि उसे कार्यरूप नहीं दिया जा सके तो उसका कोई मूल्य नहीं है।
किसी भी सिद्धान्त या विद्या का मूल्य उसका जीवन में प्रयोग करने और अच्छा फल प्राप्त करने के ऊपर निर्भर करता है। इस तरह के विचार को ही अनुभवजन्य (empirical) या प्रायोगिक (Pragmatic) कहा जाता है। प्रैग्मटिज़म, यथार्थवाद या व्यावहारिकता को तो एक दार्शनिक मतवाद के रूप में स्वीकार भी किया गया है। किन्तु आजकल गहराई से सोच-विचार किये बिना ही किसी भी व्यक्ति के लिये 'आदर्शवादी'(idealist),जैसे कुछ शब्दों का प्रयोग किया जाता है। 
सही अर्थ को समझे बिना ही किसी शब्द का व्यवहार करने की आदत बन जाने के कारण, कई बार विवेकानन्द के विषय में कह दिया जाता है कि वे एक आदर्शवादी अथवा  कल्पना-लोक में विचरण करने वाले मनुष्य थे। किन्तु विवेकानन्द को कल्पनालोक या भावराज्य का मनुष्य, हमलोग तभी कह सकते हैं जब हमारे समझ में यह आ जाय; कि जिसको हमलोग 'भौतिक जगत' कहते हैं, जिसे हमलोग जीवन की वास्तविकता या व्यावहारिक पक्ष (Practical Side) समझते हैं,जीवन के वैसे समस्त कर्म-क्षेत्र तथा यह सम्पूर्ण विश्व-ब्रह्माण्ड भी केवल केवल एक भाव-राशी या मनःकल्पित वस्तु ही है ! और विचार-प्रक्रिया (मनन) ही सबसे मूल्यवान वस्तु है।
स्वामी विवेकानन्द जी के मतानुसार, कोई सिद्धान्त अथवा ज्ञान यदि इस वास्तविक या व्यावहारिक जीवन के लिये उपयोगी न हो, अथवा उस ज्ञान का प्रयोग करने से कोई शुभ फल प्राप्त नहीं होता हो, तो वैसी विद्या या सिद्धान्त का मूल्य कुछ भी नहीं है। अतः हमलोग यह निश्चित रूप से समझ सकते हैं कि स्वामीजी की सम्पूर्ण विचारधारा सकारात्मक है, जिसका प्रयोग हमलोग केवल अपने व्यावहारिक जीवन में ही कर सकते हैं। यदि हमलोगों के पास सत्यान्वेषी दृष्टि हो, तो हमलोगों यह समझ पाएंगे कि, स्वामीजी के जैसा व्यावहारिक और सकारात्मक सोच रखने वाले मनुष्य वास्तव में बहुत कम ही पैदा हुए हैं। 
किन्तु उनसे स्वयं परिचित हुए बिना, केवल दूसरों के मुख से सुनकर यदि हमलोग भी कहने लगें कि स्वामीजी एक आदर्शवादी व्यक्ति थे (व्यावहारिक नहीं थे ?), वे हर समय कल्पनालोक में ही विचरण करते रहते थे, तो अपने उस कथन के द्वारा हम अपनी अज्ञानता का ही परिचय देंगे। क्योंकि स्वामीजी ने तो बिल्कुल यथार्थ के कठोर धरातल पर खड़े हो जाने का उपदेश दिया है; यहाँ तक कि अपने पैरों पर खड़े होने का निर्देश दिया है। उनका उपदेश था- " अपने पैरों को यथार्थ के धरातल पर स्थापित करके, अपने हाथों के सहारे दूसरों को,जो अभी तुमसे निचले सोपान पर खड़े हैं, उन्हें भी उपर खीँच लो ! " अतः इस बात में थोड़ा में भी सन्देह नहीं रहना चाहिये कि स्वामीजी उपयोग-बुद्धि या व्यावहारिक-बुद्धि से सम्पन्न महापुरुष थे। 
इसीलिये, स्वामी विवेकानन्द से प्रत्यक्ष संपर्क में आने के बाद जो लोग जो लोग अपने को व्यावहारिक बुद्धि सम्पन्न मनुष्य या तकनीक-तंत्रवाद (Technocracy) में विश्वास रखने वाला एक टेक्नोक्रेटिक व्यक्ति समझते हैं, वास्तव में वैसे लोग ही सर्वाधिक लाभान्वित हो सकते हैं। किन्तु उनके बारे में 'अमुक' व्यक्ति ने क्या कहा है, 'तमुक' व्यक्ति ने क्या कहा है... ?  इन सब के ऊपर चर्चा करके स्वामीजी के साथ परिचय प्राप्त करने की चेष्टा करना- ' दूसरों के मुख से मिर्ची खाना ' जैसा कभी संभव नहीं होगा। हमलोगों को उनके विचारों को स्वयं समझने तथा उन्हें अपने आचरण में उतारने की चेष्टा करके स्वामीजी के साथ प्रत्यक्ष संपर्क स्थापित करना होगा। 
स्वामीजी ने स्वयं जो कुछ कहा है या लिखा है, उसके अविकृत (undistorted) अनुवाद को अच्छी तरह से पढ़ कर, उसके उपर गहन चिन्तन-मनन करने से ही हमलोग उनका सही परिचय प्राप्त कर सकते हैं।और उनकी विचारधारा को समझने के लिये, ऐसा करना नितान्त आवश्यक भी है। स्वामी विवेकानन्द ने सम्पूर्ण विश्व के कल्याण के लिया कार्य किया है। किन्तु लोग उनको एक महान देशप्रेमी के नाम से भी जानते हैं। हाँ, कुछ लोग इसी विषय को लेकर उनकी निन्दा भी किया करते हैं। परन्तु स्वामीजी का देश-प्रेम वास्तव में अतुलनीय था। वे कहते हैं, चाहे वे भारत में हों या अमेरिका में उनके लिये सारे देश एक समान हैं। सही मायने में स्वामीजी सम्पूर्ण मनुष्य-जाति को ही अपने हृदय के अन्तस्तल से प्रेम करने में समर्थ थे। किन्तु इतना होने पर भी, जब पहली बार विदेश से वापस लौटे, तब उन्होंने कहा था- भारतवर्ष का प्रत्येक धूलि-कण मेरे लिये और भी अधिक महान हो गया है, भारत मुझको अपने प्राणों से भी अधिक प्रिय प्रतीत हो रहा है। उन्होंने ऐसा क्यों कहा होगा ? इस बात पर बोलने से -कभी अन्त नहीं होगा। 
जिस विचार-धारा [रामकृष्ण-विवेकानन्द वेदान्त (परमहंसपरम्परामें प्रशिक्षित होने पर किसी व्यक्ति को ऐसी उपलब्धी हो जाती है, वैसे व्यक्ति हमारे अपने व्यक्ति-जीवन के लिये,तथा समस्त मानव जाति के लिये अत्यन्त मूल्यवान होते हैं। इतना स्वादिष्ट, ऐसा पौष्टिक इतना सर्वजन-हितकारी विचार एक साथ अन्य किसी व्यक्ति से मिल सकता होगा या नहीं, यह बात हम नहीं जानते। अन्य कई लोगों ने भी, अनेकों अच्छी बातें अवश्य कही हैं, किन्तु किसी व्यक्ति के मुख से उसके सम्पूर्ण जीवन में, जो भी बात निकली है, वे केवल मनुष्य के कल्याण के लिए हो, ऐसा कोई दूसरा उदाहरण दिखाई नहीं देता (नवनी दा ?) है।
स्वामी विवेकानन्द सभी मनुष्यों के कल्याण के विचारों से भरे, एक ऐसा अक्षय भण्डार हैं, जो अतुलनीय है। इसलिये वे अनुपम हैं और उनका व्यक्तित्व अचम्भित कर देने वाला है, इसीलिये वे हमारे श्रद्धा के पात्र हैं। इसीलिये हमें उनको अपना आदर्श मान कर ग्रहण करना चाहिए। सम्पूर्ण मानव-जाति के सार्वभौमिक कल्याण के लिये स्वामीजी ने कई विषयों पर अपने विचार विभिन्न प्रकार से व्यक्त किये हैं। किन्तु उन्होंने जो कुछ कहा है, उसके भीतर सबों को जोड़ने वाली एक अद्भुत कड़ी, एक प्रकार की तारतम्यता अवश्य देखि जा सकती है, दिखाई देती है। जाति-प्रथा, नारी-कल्याण, शिक्षा से आरम्भ करके अन्तरराष्ट्रीय एकता इत्यादि विभिन्न विषयों पर उन्होंने बहुत कुछ कहा हैं। किन्तु एक- एक मुद्दों के उपर अलग से सोच-विचार करने बाद कुछ नहीं कहा है। इस सम्पूर्ण विश्व-ब्रह्माण्ड का सत्य -(एको अहं बहु स्याम; वन हैज बिकम दी मेनी ) क्या है, यह तथ्य उनकी आँखों के सामने सदैव बना रहता था।  उन्होंने जगत और जीवन के भ्रम-रहित रूप का या इसके सच्चे स्वरुप का साक्षात् दर्शन किया था। क्योंकि वे विवेकज-ज्ञान के अधिकारी थे, और उसी अधिकार के बल पर वे ऐसा कर सके थे।
अतः हमलोगों को पहले ही यह समझ लेना होगा, कि अविवेकी की तरह अनुसन्धान करके हमलोग स्वामीजी का परिचय नहीं प्राप्त कर सकते हैं। उनका तो नाम ही था -' विवेकानन्द !', उन्होंने आनन्द के अधिकार को (परमहंस-पद को?) विवेक-प्रयोग के द्वारा प्राप्त किया था। 
हमलोग भी ज्ञान पाना चाहते हैं, आनन्द पाना चाहते हैं, सभी प्रकार के दुःखों से अत्यन्तिक निवृत्ति पाना चाहते हैं। किन्तु हमलोग विवेक का प्रयोग नहीं करते। विवेक क्या है, तथा इसका व्यव्हार जीवन में किस प्रकार किया जाता है, इसको सीख लेने से ही हमलोग अपने समस्त दुःखों के कारण को ही नष्ट कर सकते हैं। स्वामी विवेकानन्द कहते हैं- " देवता, स्वर्ग और शक्तियों से बचने का फिर क्या उपाय है ? उपाय है विवेक -सदसत विचार। इस विवेक ज्ञान को दृढ़ करने के उद्देश्य से ही इस संयम का उपदेश दीया गया है-
- क्षणतत्क्रमयोः संयमाद्विवेकजं ज्ञानम् ।।52।।  
 क्षण का अर्थ है, काल का सूक्ष्तम अंश। एक क्षण के पहले जो क्षण बीत चूका है, और उसके बाद क्षण प्रकट होगा- इस लगातार सिलसिले को ' क्रम ' कहते हैं। अतः उपर्युक्त विवेकजनित ज्ञान को दृढ़ करने के लिये क्षण और उसके क्रम में संयम करना होगा। क्षणतत्क्रमयोः क्षण और उसके क्रम में, संयमात् संयम करने से, विवेकजम् विवेकजनित, ज्ञानम् ज्ञान उत्पन्न होता है (विवेकानन्द साहित्य खण्ड 1/80)]
विवेक का अर्थ है- सद-असद विचार, कौन शाश्वत है और कौन नश्वर है-इसका परिक्षण करके अच्छे-बुरे का निर्णय करना। (सत्य,असत्य और मिथ्या के अन्तर को समझने की चेष्टा)  इसी को सरल भाषा में या प्रचलित भाषा में शुभ-अशुभ या भला-बुरा में अन्तर करना भी कह सकते हैं। किन्तु अच्छे और बुरे का निर्णय करने के समय अक्सर हमलोग भ्रम में पड़ जाते हैं। क्योंकि हमलोगों की प्रकृति या इन्द्रियों को जो अच्छा प्रतीत होता है, हमलोग उसी को अपने लिए भी अच्छा मान कर ग्रहण करते हैं, और इन्द्रियों को जो अच्छा नहीं लगता, उसको खराब समझते हैं, और उसे त्याग देना चाहते हैं। मिठाई यदि मुख में जाता है तो अच्छा कहते हैं, किन्तु तीखा नहीं खाना चाहते हैं। विवेकानन्द के नाम का तात्पर्य को याद रखते हुए विवेक-प्रयोग करके स्वामीजी को जानने के लिये उन्हीँ के उपर मनोनिवेश करने का अभ्यास करना होगा। विवेकज-ज्ञान किसे कहते हैं? पातंजलि योगसूत्र  विभुतिपाद में कहा गया है- 
तारकं सर्वविषयं सर्वथाविषयक्रमं चेति विवेकजं ज्ञानम् ।।54।। 
   तारकम् जो संसार समुद्र से तारने वाला है, सर्वविषयम् सबको जानने वाला है,  सर्वथाविषयम् सब प्रकार से जानने वाला है, एवं, अक्रमम् बिना क्रम के,  वह, विवेकजम् विवेकजनित, ज्ञानम् ज्ञान है।इस ज्ञान का नाम तारक-ज्ञान  इसीलिये है कि यह योगी को जन्म-मृत्यु के सागर से तारण करता है। समस्त  प्रकृति (वाह्य प्रकृति और अन्तः प्रकृति दोनों) की सूक्ष्म और स्थूल सर्वविध अवस्थाएँ इस ज्ञान की ग्राह्य हैं। इस ज्ञान में किसी प्रकार का क्रम नहीं है। यह सारी वस्तुओं को क्षण भर में एक साथ ग्रहण कर लेता है।
'विवेकज-ज्ञान ' ऐसा ज्ञान है- जो हमें समस्त विषयों, समस्त अवस्थाओं, समस्याओं से मुक्ति प्रदान करने में समर्थ है। जो भूत, भविष्य और वर्तमान समस्त अवस्थाओं का ज्ञान हो उसे - ' अक्रमम ' बिना क्रम में गये, अर्थात एक ही क्षण में परिपूर्ण रूप से प्राप्त कर लिया जाय -वही है विवेकज ज्ञान।जैसे किसी कमरे में हजार वर्ष से अँधेरा हो तो माचिस जलाने पर अँधेरा धीरे-धीरे नहीं जाता है,(बिना क्रम में गये ) एक ही बार में चला जाता है। जैसे साधारण ढंग से ज्ञान अर्जन के क्षेत्र में होता है, एक के बाद एक करके नहीं जानना पड़ता है।
अर्थात उसी ज्ञान को जान लेने की ज्वलन्त इच्छा लेकर, पूरी श्रद्धा रखते हुए स्वामीजी के सन्देशों को पढ़ना होगा, उसपर गहन चिन्तन करना होगा और जीवन में प्रयोग करना होगा। आम तौर से जो भी ज्ञान हमलोग प्राप्त करते हैं, उसे हम केवल अपनी बुद्धि का प्रयोग करके प्राप्त करते हैं। उस लौकिक ज्ञान या बौद्धिक ज्ञान के द्वारा किसी वस्तु या विषय की जितनी जानकारी मिलती है, वह क्षणिक और सामयिक होती है, अतः वह जानकारी सापेक्षिक और परिवर्तनशील होती है।
ज्ञाता और ज्ञेय वस्तुओं के बीच एक स्थानिक और त्वरित प्रभावी सम्पर्क स्थापित करने की प्रक्रिया से जो ज्ञान प्राप्त होता है, उसके द्वारा जगत और मनुष्य-जीवन की अपरिमित समस्यायों के मूल कारण का परिचय नहीं मिलता है। जिस दृष्टि में, जिस अनुसन्धान से एक क्षण में समग्र जगत, समस्त विश्व- ब्रह्माण्ड भास उठता है, उसी ज्ञानप्रसूत समस्या का स्वरुप और समाधान-सूत्र हमलोग एक साथ स्वामीजी से प्राप्त करते हैं। 
इसीलिये निश्चित रूप से विवेकानन्द एक भविष्यद्रष्टा भी हैं। अपने वैश्विक दृष्टिकोण के आधार पर ही उन्होंने भविष्य के मार्ग का संकेत दिया था। समग्र विश्व और उसकी समस्त समस्याओं के साथ उसके समाधान को उन्होंने एक साथ देख लिया था, और उसके बाद टुकड़ों टुकड़ों में करके जो कहा था, उन्हीं संदेशों में हमलोग उनसे विभिन्न प्रकार के विषयों से अवगत होते हैं, और हमें उनकी बातें इतनी मूल्यवान लगती हैं।
जिस प्रकार गीता में श्रीकृष्ण मुख्य-मुख्य वस्तुओं में अपनी योग शक्ति रूपी तेज़ के अंश की अभिव्यक्ति का वर्णन करके यह बतलाये थे कि समस्त जगत् मेरी योग शक्ति के एक अंश से ही धारण किया हुआ हैं-
अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन ।
                   विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत् ।।गीता: 10: 42।। 
' अथवा हे अर्जुन ! तुम अनेक को जानने की चेष्टा कर रहे हो। -यह क्या है, वह क्या है- इस प्रकार अलग अलग रूप से जानने की क्या आवश्यकता है! केवल इतना ही जान लो की मेरे एक ही अंश में यह समस्त विश्व-ब्रह्माण्ड अवस्थित है।
स्वामीजी के विचारों का यही वैशिष्ट है। उनके समस्त संदेशों के भीतर जो मूल बात है, वह है मनुष्य को मनुष्य के रूप में गढ़ लेना। वे कहते हैं, तुमलोग समाज का पुनर्गठन करो, समाज का नवीकरण करो, समाज की सेवा करो। तुम लोग राजनीती का उपयोग करो, विज्ञान का, आर्थिकनीति को उपयोग में लाओ -इन सभी चीजों की आवश्यकता है। किन्तु इतना समझ लो कि ये सभी विषय या योजनायें मनुष्यों के कल्याण के लिए ही हैं। इसलिये यदि तुम मनुष्य को ही पूर्ण मनुष्य के रूप में नहीं गढ़ सको, उसकी अन्तर्निहित सत्ता को यदि सम्पूर्ण विकसित और प्रकाशित (अभिव्यक्त) नहीं करा सको, तो वैसे विज्ञान, 
प्रयोद्द्गिकी, अर्थशास्त्र, समाज-विज्ञान, राजनीति, इतिहास, दर्शन - ये सभी किसी काम के न होंगे।
यदि इस इस मूल को तुम जान लो, तो बाकी सब कुछ को जान लोगे। यही है सच्चा ज्ञान। श्रीरामकृष्ण जैसा कहते थे, " एक को जानने का नाम है ज्ञान, और बहुत को जानने का नाम है अज्ञान।" हमलोगों की आकांक्षा यह होनी चाहिये कि हम सबकुछ को जान लेंगे, नहीं तो मूल सत्य हृदयंगम नहीं होगा। स्वामीजी के अनुसार इसी सब कुछ को जान लेने का अर्थ है- मनुष्य के (अपने) सच्चे स्वरूप को जान लेना एवं उसी ज्ञान की बुनियाद पर उससे संलग्न बाह्य विषयों को उचित रूप से अपने लिये उपयोगी बना लेना।स्वामीजी ने मनुष्य के स्वरुप का अन्वेषण करके, उसकी वास्तविक सत्ता का विकास करने तथा उसे अभिव्यक्त करने की साधना को ही प्राथमिक कार्य कहकर, उन्होंने इसी कार्य को करने पर बार बार जोर दिया है। 
विदेश से वापस लौट आने के बाद स्वामीजी भारत के प्रत्येक धूल-कणों को पहले से भी अधिक पवित्र कहकर और अधिक प्रेम इसीलिये किये थे, कि सार्वभौमिक-कल्याण के महान तत्व (वसुधैव कुटुम्बकम) का अविष्कार पृथ्वी पर सर्वप्रथम भारतवर्ष में ही हुआ था। वे यह देख पाने में समर्थ थे, उन्होंने अनुभव किया था, कि समस्त जगत का कल्याण करने के लिये, जिस मौलिक तत्व (हमसभी लोग स्वरूपतः ब्रह्मवस्तु हैं ) को जानने की आवश्यकता होती है,उसका आविष्कार भारतवर्ष में ही हजारों वर्ष पूर्व यहाँ के ऋषि-मुनियों ने अकस्मात अपने मनन-लोक में, प्रत्यक्ष आत्मानुभूति के लोक में कर लिया था। उन्होंने देख लिया था कि यदि हृदय के आलोक में उद्भासित, उस महान तत्व को, भारतवर्ष समग्र विश्व के मनुष्यों तक वहन करके पहुँचा सके, तभी जगत का यथार्थ कल्याण संभव होगा।
स्वामीजी सम्पूर्ण विश्व के मनुष्यों को अपने हृदय से प्रेम करते थे, इसीलिये वे भारत वासियों से अपेक्षा करते थे कि हमलोग उस तत्व को जानने और अभिव्यक्त करने की साधना करेंगे, और स्वयं उसकी अनुभूति प्राप्त करके, एक दिन सम्पूर्ण विश्व में उस ज्ञानालोक को फैला देंगे, इसीलिये भारत की धरती उनके नेत्रों के समक्ष एक पुण्यभूमि के रूप में प्रकट हो गयी थी। और इसीलिये जो तत्व प्राचीन युग में हमलोगों के लिये जटिल भाषा में लिपिबद्ध था, जो अरण्यों, पर्वत की कन्दराओं में छुपा हुआ था, जिसे केवल साधू-महात्माओं के चर्चा का विषय समझा जाता था, उसी महान तत्व को स्वामीजी ने हमलोगों के निकट अति सरल भाषा में प्रस्तुत कर दिया था। 
स्वामीजी ने अपने भावी संतानों से यह यह अपेक्षा की थी, कि उनकी भावी पीढ़ी उपनिषदों में वर्णित उसी महान तत्व को अरण्यों से निकालकर जनारण्य तक ले जाएगी। उस तत्व को जंगल-झाड़, पर्वत-पहाड़ से निकाल कर साधारण मनुष्यों तक, किसानों के झोपड़ियों तक, हाट-बाजार में, खेतों में, मैदानों में, कल-कारखानों में सर्वत्र प्रचारित और प्रसारित कर देगी। और तब किसानों के हल से, कारखाने के श्रमिकों से, एक नया महान तेजस्वी भारत-एक महाशक्ति के रूप में, उठ खड़ा होगा।
वह तत्व क्या है ? हम सभी लोगों के भीतर अनन्त शक्ति, अनन्त ज्ञान, एक अनन्त प्रेम का महासागर, प्रेम-सिन्धु ठांठे मार रहा है। उसे जानना होगा, उस सर्वग्रासी प्रेम को अभिव्यक्त करना होगा। हमलोग दीनहीन नहीं हैं, हमलोग बहुत शक्तिशाली हैं, हमारा अमित प्रताप है। हमलोग मोह-वश, महाभ्रम के कारण अपने को असहाय मरण-धर्मा शरीर मात्र (भेड़) समझ लिये हैं। इस असहनीय हीन भावना (Inferiority complex) के कारण ही हमलोगों ने स्वयं को अपने विराट स्वरुप से गिराकर एक छोटा-मनुष्य,एक पशु-मानव में परिणत कर लिया है। 
(तभी तो जो काम पशु भी नहीं करते उसे मनुष्य कर रहा है, सत्तर साल का बूढ़ा सात साल की लड़की को छेड़ता है,उच्च पदों पर बैठकर घोटाला करता है। किन्तु इसके लिये लोकपाल बिल के लिये भूख हड़ताल करने या कोसते रहने से कुछ नहीं होगा।) बल्कि जिस मनुष्य ने भ्रम के कारण, अज्ञान के कारण अपने को संकुचित कर लिया है, उसे एक बार पुनः बिराट स्वरुप (सिंह-स्वरुप ) में प्रतिष्ठित करा देना होगा। उसको ज्ञान आलोक से शक्ति-सम्पन्न करना होगा, और उसके जीवन को प्रेम-सिन्धु के रूप में गठित करना होगा।
स्वामीजी के द्वारा कथित उस विख्यात उपदेशसे हम सभी अवगत हैं- " प्रत्येक आत्मा अव्यक्त ब्रह्म है, बाह्य एवं अन्तः प्रकृति को वशीभूत करके आत्मा के इस ब्रह्म-भाव को व्यक्त करना ही जीवन का चरम लक्ष्य है।कर्म,उपासना,मनः संयम या ज्ञान, इनमें से एक, या एक से अधिक उपायों का सहारा लेकर अपना ब्रह-भाव व्यक्त करो और मुक्त हो जाओ। बस यही धर्म का सर्वस्व है। मत, अनुष्ठान-पद्धति, शास्त्र, अथवा अन्य बाह्य कर्म-काण्ड तो उसके गौण संकेत मात्र हैं। " 
वे कह रहे हैं, कि हम सभी लोग स्वरूपतः ब्रह्मवस्तु हैं, और हमलोगों का लक्ष्य - अपनी प्रकृति को नियंत्रित करके, उसके उपर विजय प्राप्त करके,उस ब्रह्मवस्तु को अभिव्यक्त कर लेना है। इसके लिये हमें अन्तः प्रकृति और वाह्य प्रकृति दोनों पर विजय प्राप्त करना होगा। और हमलोग अपनी अन्तर्निहित दिव्यता को, कर्म के द्वारा, मन को वशीभूत करने की साधना के द्वारा,  संयम के द्वारा, ज्ञान की चर्चा के द्वारा, सत्यानृत या सदसत विवेक-विचार द्वारा, तथा समस्त मनुष्यों की स्वार्थहीन सेवा में आत्मबलिदान के द्वारा अभिव्यक्त कर सकते हैं।
आधुनिक मनुष्य, विज्ञान की सहायता से बाह्य प्रकृति के उपर जितना अधिक नियंत्रण प्राप्त करता जा रहा है, उसी अनुपात में वह अन्तःप्रकृति के सामने मानो अपनी पराजय भी स्वीकार करता जा रहा है। मनुष्य की इस कंगाली (indigence) का चित्र स्वामीजी के मानस-चक्षुओं के समक्ष स्पष्ट रूप से उभर आया था, इसीलिये उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा था, " तुमने बाह्य प्रकृति को जीत लिया  है , इसीलिये विज्ञान की बड़ाई करते नहीं अघाते, किन्तु तुम्हारी अन्तःप्रकृति तुम्हारे साथ बिलियर्ड के बॉल के जैसा (ricochet) ठोकर-पर-ठोकर मारने का खेल, खेल रही है, और तुम्हारी महा-मूल्यवान परिसम्पत्ति रास्ते की धूल में यहाँ-वहाँ गच्चे खा रही है। ऐसी बेमिसाल, अनुपम वैभवशाली मूर्ति (देव-दुर्लभ मानव शरीर) वृत्तियों में उलझकर, धूल-कीचड़ से सन कर, उपेक्षित होकर, मुरझाती जा रही है ! ऐसा होते रहने नहीं दिया जा सकता है। तुमलोग आन्तरिक प्रकृति को जीत लो, वशीभूत करो, आन्तरिक शक्ति के उपर अधिकार प्राप्त करके, बाह्य जीवन में प्रकट करो। स्वयं को मोह-निद्रा से जाग्रत करो और आन्तरिक उर्जा से परिपूर्ण हो जाओ। किन्तु उस शक्ति का घमण्ड मत करना। शक्तिवान होकर, स्वयं को सबों की पूजा में, सबों की सेवा में, सबों के भीतर छूपी उसी शक्ति को जाग्रत करने के कार्य में, समर्पित कर दो। अपनी इन्द्रियों के सुख-भोग में निमग्न रहने से, भौतिक-सम्पदा को अधिकाधिक बढ़ाते जाने से, या नाम-यश स्वार्थपरता की छोटे से दायरे बंधा जीवन जीने से-वह शक्ति जाग्रत नहीं हो सकती; ऐसे जीवन को जीते रहने वाला मनुष्य अन्तः प्रकृति का (इन्द्रियों का) गुलाम बन जाता है।
 स्वामीजी कहते हैं, सचमुच में वही जीवित रहता है, जो दूसरों के लिये जीता है-बाकी लोगों का जीवन तो मृतक से भी अधम है। उनके इसी सन्देश में सूत्र-रूप से सन्निहित है, शक्तिमान मनुष्य बनने का आदर्श जो 'अपने पैरोंको जमीन पर जमा कर, दूसरों को अपने हाथों का सहारा देकर उपर उठा लेने में समर्थ है। स्वामीजी ने इसी आदर्श को हमारे समक्ष रखा है। यदि हमलोग यथार्थ मनुष्य के रूप में जीना चाहते हैं, तो हमें दूसरों के लिये जीना सीखना पड़ेगा। हम लोग परस्पर एक दूसरे से प्रेम करेंगे, आलिंगन में बांध लेंगे, एक दूसरे को उपर उठाने का प्रयास करेंगे, आपस में सहयोग का भाव रखेंगे। स्वार्थ-शून्य, सेवापरायण, प्रेमी मनुष्य ही शक्तिमान होता है, और देखने में सर्वांग-सुन्दर मनुष्य प्रतीत होता है। उसीके जीवन में विकास संभव है, कल्याणकारी नव-विप्लव और प्रगति का अग्रदूत वही बन सकता है,जो वास्तव में चरित्रवान मनुष्य है।
इसीलिये हमलोगों को अपना चरित्र गढ़ना होगा, (हिन्दू-मुसलमान-ईसाई या ब्राह्मण-क्षत्रिय,वैश्य-शूद्र,बंगाली -बिहारी नहीं) यथार्थ 'मनुष्य' बनना होगा, महाजीवन के विवेकज आनन्द का अधिकार प्राप्त करने के महान लक्ष्य (मृत्यु के भय को सदा के लिए समाप्त करके शाश्वत जीवन) पर पहुँचने के लिये अपने जीवन को महान रूप से गठित करना होगा।
जीवन की सार्थकता इसी कार्य (विवेकज ज्ञान से उत्पन्न विवेकज आनंद का अनुभव करने) पर निर्भर है, -अन्य जितने  भी सिद्धान्त या ज्ञान हैं, उनका मूल्य केवल इसी लक्ष्य को प्राप्त करने के उपाय के रूप में ही है। स्वामीजी की विचार-धारा का सम्पूर्ण रूप से परिचय प्राप्त कर लेने पर यह आधारभूत तथ्य या मूल सत्य प्रकटित हो जाता है। उसी सत्य को जानना होगा, समझना होगा और अपने जीवन में प्रयोग करना होगा।इसीलिये विवेक-प्रयोग की सहायता से सत्य-असत्य-मिथ्या का परिक्षण करके निष्ठा के साथ स्वामीजी का जीवन और सन्देश की ध्यानजन्य विवेचना, एवं उनके विचारों पर मनोनिवेश का अभ्यास करना वर्तमान युग का सबसे महत्वपूर्ण कार्य है। और इसी से चरित्र गठित होगा, तथा जगत का यथार्थ कल्याण भी संभव होगा। 
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Friday, July 27, 2012

स्वामी विवेकानन्द और हमारी सम्भावना- [7] "हमलोग क्या मांगे?"(व्यक्ति और मन),

हमारी एक मात्र लक्ष्य-वस्तु (target object) है- ' मनुष्यत्व !' 
स्वामी विवेकानन्द क्या चाहते होंगे, उनकी हार्दिक इच्छा क्या रही होगी ? इसी प्रश्न को हमलोग यदि अपने देह-मन-सत्ता को एक करके समझने का प्रयास करें, और उनकी चाहत (Burning-Desire) के साथ यदि हम अपनी चाहत को एक कर लें, तो इस बात में कोई सन्देह नहीं है कि भारतवर्ष विश्वसभा में एक दिन अवश्य गौरवशाली आसन प्राप्त करेगा। स्वामीजी की जो चाहत थी, उससे बड़ी चाहत और कुछ हो ही नहीं सकती; क्योंकि उसको प्राप्त कर लेने के बाद और कुछ मांगने योग्य बचता ही नहीं है।
स्वामीजी ने कहा था, " मनुष्यत्व की प्राप्ति, हमारा जन्म-सिद्ध अधिकार है; और मैं इसी श्रेष्ठ जन्म-सिद्ध अधिकार को प्राप्त करना चाहता हूँ। "
थोड़ा शारीरिक भोग, थोड़ी धन-सम्पत्ति, बंगला-मोटरकार, थोड़ा नाम-यश, थोड़ी सी सामाजिक प्रतिष्ठा प्राप्त कर लेना - क्या मनुष्य जीवन इतना क्षुद्र है ? नहीं, बिलकुल नहीं। ' भूमैव सुखम ' - अल्प नहीं भूमा में जो महा आनन्द है ! मैं उसी भूमा-आनन्द का अधिकारी हूँ, हम सभी उसी आत्मा के अधिकारी हैं। यदि हमलोग सबसे बृहद वस्तु (ब्रह्म) को पाने की चेष्टा करें, मनुष्य बनने की चेष्टा करें, और उस बृहद का साक्षात्कार कर लें; तो फिर इस जीवन में- व्यावहारिक जीवन में और कुछ प्राप्त करने योग्य वस्तु अवशिष्ट ही नहीं रह जाती।
हमारी एक मात्र लक्ष्य-वस्तु (target object) है- 'मनुष्यत्व' या  इसी जीवन में पूर्णता की प्राप्ति।हम सभी लोग उस पूर्ण-जीवन के अधिकारी बन सकते हैं। स्वामीजी के मन में यही सबसे बड़ी कामना थी। और वे इसी आकांक्षा को वे सभी मनुष्यों के मन में, विशेष रूप से युवाओं के मन में जाग्रत करा देना चाहते थे।
एक दिन नरेन् श्रीरामकृष्ण के पास जाकर कहते है, ' मैं इन दिनों बड़ी मुफलिसी के दौर से गुजर रहा हूँ, माँ-भाई बहनों के लायक भोजन भी नहीं जुट पाता है। आप कोई उपाय कर दीजिये। माँ काली तो आपकी सब बातों को मान लेती हैं, और वे सबकुछ कर सकती हैं, तो मेरे लिये आप उनसे कहकर इतना करवा दीजिये। मेरे परिवार के लिये धन चाहिये और अन्न चाहिये - देखूँ, आप इसकी व्यवस्था कर सकती हैं या नहीं?"
 श्रीरामकृष्ण ने कहा, " मैं तो माँ से यह सब चीजें नहीं माँग सकता हूँ रे; तुम स्वयं माँ से ये सभी चीजें माँग लो, तुम स्वयं उनसे जाकर क्यों नहीं कहते ? तुम स्वयं माँ के पास जाकर उनसे कहो न।" किन्तु जब नरेन माँ से माँगने गए, तो महाकाली के सामने अपने मन की सर्वोच्च आकांक्षा ही व्यक्त कर दिये। उन्होंने जगत जननी से माँगा - " माँ, मुझे भक्ति दो, विवेक दो, वैराज्ञ दो, ज्ञान दो ! " नरेन् ने केवल वही माँगा, जो मनुष्यत्व-प्राप्त करने के अधिकारी होने के रूप में, एक मनुष्य के रूप में, वे माँग सकते थे। 
नरेन्,  म्याऊं म्याऊं करके छोटी छोटी वस्तुओं को माँगने वालों में से नहीं थे, वे बलपूर्वक वही माँगते है, जिसे प्राप्त करने के वे योग्य अधिकारी थे। क्योंकि बुद्धिमान नरेन् यह जानते थे, कि अधिक माँगने से यद्द्पि अधिक नहीं प्राप्त है, किन्तु कम मांगने से तो अधिक कभी मिल ही नहीं सकता है। किन्तु हमलोग जीवन में छोटी चीजों को ही अधिक माँगते हैं।
स्वामीजी कहते हैं, " तुम लोग केवल नौकरी दो, नौकरी दो ! कह कर चिल्लाते रहते हो। क्या अंग्रेजों के बेंत और जूतों का प्रहार खाय बिना तुम्हें चैन नहीं मिलता है रे ? क्या तुम स्वयं कुछ नहीं कर सकते? क्या तुम मिट्टी भी नहीं खोद सकते हो ? आधुनिक विज्ञान और प्रद्द्योतिकी की सहयता से तुमलोग भी आधुनिक उपभोग की वस्तुओं का निर्माण क्यों नहीं कर सकते ? जापान में जाकर देखो, उन लोगों का देश-प्रेम कितना अद्भुत है !"
स्वामीजी कहते थे- ' जब मनुष्य बन कर जन्म लिया है, तो मनुष्य-जीवन की महिमा को प्रकट तो करो। जीवन क्या है ? एक अन्तर्निहित शक्ति अपने को अभिव्यक्त करना चाह रही है, और बाहरी परिस्थितियाँ और बाधाएँ उसको दबाये रखना चाहती हैं, उन समस्त बाधा-विघ्नों का अतिक्रमण करके जो प्रकट हो जाता है, उसी को जीवन कहते हैं। "
स्वामी जी जीवन को विकसित करने का निर्देश दे रहे हैं। विकसित करने का अर्थ है, प्रस्फुटित करना। अपने जीवन की कलियों को प्रस्फुटित करके मनुष्यों को दिखा दो कि जीवन में क्या पाना चाहते हो, क्या करना चाहते हो ! थोड़ा धीरज रखो, और जीवन को थोड़ा प्रस्फुटित कर लो। अपने जीवन को विकसित करके अभिव्यक्त करो। विकास और अभिव्यक्ति । एक आश्चर्यजनक रूप से महान अस्तित्व हम सबों के भीतर छुपा हुआ है ! उसको आविष्कृत करना होगा,अर्थात  जानना होगा और अभिव्यक्त करना होगा।  
हम लोगों को अपने जीवन में प्रति मुहूर्त-चलते, बोलते एवं करते समय यह स्मरण रखना होगा, कि हमलोगों के भीतर अनन्त अविरोध हैं, अनन्त ज्ञान है, अनन्त शक्ति है, अनन्त प्रेम है। मेरे भीतर है, और प्रत्येक मनुष्य के भीतर है।  किन्तु हम उसे जानते नहीं हैं, उसका सम्मान नहीं करते हैं, उसे  अभिव्यक्त नहीं करते हैं। सर्वदा शारीरिक सुख प्राप्त करने, या क्षणिक-इन्द्रिय सुख को प्राप्त करने की कामना करते रहने से क्या हो रहा है ? यही हो रहा है कि हमलोग अपने अन्तर्निहित सर्वोच्च सुन्दर और बृहद वस्तु को उपेक्षित करके, उसे गँवा देने पर उतारू हैं।
स्वामीजी की तीव्र मनोकामना क्या थी ? वे जगदम्बा से क्या वर पाना चाहते थे, इस बात को पत्र-पत्रिकाओं या समाचार पत्र के पन्नों को पढ़कर नहीं जाना जा सकता है। इसको समझने के लिये अपने हृदय को विशाल बना लेना होगा। स्वामीजी ने स्वयं ही कहा है, कि (श्रीरामकृष्ण ही आधुनिक युग में ब्रह्म के अवतार हैं, वेदान्त की दृष्टि से नहीं साक्षात् !..... यह जान लेने से ) मुझे क्या लाभ हुआ है, सो तो मैं नहीं जानता किन्तु इतना अवश्य कह सकता हूँ कि मेरा हृदय जरुर बड़ा हो गया है। यह जो मेरा हृदय बड़ा हो गया है, -यही है असली चाहने वाली वस्तु, जिसे मैंने चाहा और प्राप्त किया है। स्वामीजी कहते हैं, कोई भी छोटी वस्तु पाने या भोगने की कामना को मन से निकाल दो, हर समय यही चेष्टा करो जिससे हम अपने हृदय को बड़ा सकें।
अगर कोई यह प्रश्न करे कि स्वामीजी क्या प्राप्त करना चाहते थे, इसे मैं जानने की चेष्टा क्यों करूँ ?
इसका उत्तर संक्षेप में यह है कि हमलोग एक बहुत बड़े संकट में घिर गये है, एक गंभीर परिस्थिति से घिरे हुए हैं, जिसमें पतन की सम्भावना ही अधिक है। यदि इसी उम्र (किशोरावस्था) से हमलोग यह नहीं जानें, कि हमें सचमुच वरदान में किस वस्तु को माँगने की इच्छा करनी चाहिये, तो हमलोग इतना अधिक नीचे भी गिर सकते हैं कि वहाँ से फिर हम कभी उठ ही नहीं सकेंगे। इसीलिये हमें (राजाधिराज से कोंहड़ा माँगने की अपेक्षा ) अपनी चाहत को बहुत अधिक बढ़ा लेना होगा, और सर्वोच्च वस्तु को पाने की कामना ही करनी होगी।
हमलोगों का सम्पूर्ण जीवन किस प्रकार सफल हो सकता है, स्वामीजी ने उसी का सूत्र दिया है। और वह सूत्र है- ' जिसने दूसरों के लिये जीना सिख लिया हो, केवल उसी ने जीवन को जाना है। ' दूसरों के लिये त्याग स्वीकार करने की आवश्यकता सदा रहने वाली वस्तु है। इसीलिये ऐसा सोचना बिलकुल सुसंगत नहीं होगा, कि हमलोग राजनैतिक स्वाधीनता प्राप्त कर चुके हैं, इसीलिये अब हमें त्याग करने की आवश्यकता नहीं रह गयी है। इस त्याग से ही सब कुछ प्रारंभ हुआ है। इस त्याग के भीतर ही जीवन का विस्तार करना होगा, तथा इस त्याग के द्वारा ही जीवन को सफल करना होगा।
श्रीरामकृष्ण के आश्चर्यजनक त्याग की तो धारणा भी नहीं की जा सकती। उनके त्याग का तो कहना ही क्या? सारदा देवी के त्याग की तुलना नहीं हो सकती। श्रीरामकृष्ण की माँ चन्द्रादेवी के असाधारण त्याग की बात हमलोग जानते हैं। एक बार मथुर बाबु ने उनसे पूछा था, " माताजी, आप क्या चाहती हैं, मुझे बताइये - आप जो कुछ भी माँगेंगी मैं आपको वही लाकर दूंगा। " उत्तर में उन्होंने कहा-" मैं कुछ भी मांग नहीं है।" किन्तु मथुर बाबु बिना कुछ मांगे छोड़ने वाले नहीं थे, फिर भी वे क्या माँगू यह सोच नहीं पा रही थीं, अन्त में बोली, " देखो इस समय क्या माँगू, बहुत सोचने से भी कोई जरूरत महसूस नहीं हो रही है।" उधर मथुर बाबु की प्रतिबद्धता दृढ़ हो रही है, कहते हैं-" संकोच मत कीजियेगा, आप जो भी मांगेंगी मैं अवश्य दूंगा। यदि जमीन, मकान, रुपया चाहिये, जो भी कहेंगी वही दे दूंगा। " चन्द्रादेवी कहती हैं, ' अभी तो सोचने से मुझे कुछ भी माँगने लायक वस्तु दिखाई नहीं दे रही है, कल मैं सोच तुमको  बता दूंगी। 'दूसरे दिन बहुत सोचने के बाद बोली, " एक पैसे का दोख्ता (जर्दा पत्ता ) ला दोगे ? ' इस मांगने की घटना के पीछे जो सत्य अंतर्निहित है, उसको समझने की चेष्टा करनी होगी। 
स्वामीजी हमलोगों को जिस वस्तु को माँगने के लिये कहा है, उसी वस्तु को यदि कोई माँगे, और उसको प्राप्त कर ले, या प्राप्त करने की चेष्टा में लगा रहे, तभी उसको मनुष्य कहा जा सकता है। यह चेष्टा, संग्राम या प्रयत्न ही मनुष्यत्व प्राप्ति की साधना है। "मनुष्य तभी तक मनुष्य कहा जा सकता है,जब तक वह प्रकृति के उपर उठने ले लिये संघर्ष करता है।" जिस क्षण वह इस चेष्टा को बन्द करके प्रकृति के सामने अपनी पराजय स्वीकार कर लेता है, उसी क्षण वह मनुष्य की महिमा से स्वयं को गिरा लेता है। इसीलिये स्वामीजी ने चाहा था, उनकी ज्वलंत कामना  यही थी कि- हमलोग मनुष्य (ब्रह्मविद-मनुष्य ) बन जाएँ। 
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[मेरे मित्रो ! पहले मनुष्य बनो,तब तुम देखोगे कि वे सब बाक़ी चीजें स्वयं तुम्हारा अनुसरण करेंगी। परस्पर के प्रति घृणित द्वेषभाव को छोड़ो और सदुद्देश्य,सदुपाय,सत्यसाहस एवं सदवीर्य का अवलंबन करो। तुमने मनुष्य योनि में जन्म लिया है, तो अपनी कीर्ति यहीं छोड़ जाओ।
तुलसी आयो जगत में, जगत हँसे तुम रोये।
ऐसी करनी कर चलो, आप हँसे जग रोये।।
अगर ऐसा कर सको, तब तो मनुष्य हो,अन्यथा तुम मनुष्य किस बात के ?१०/६२"

 "मनुष्य जाति के बड़े बड़े नेताओं की बात यदि ली जाये, तो हमें सदा यही दिखलाई देगा कि ..सच्चा मनुष्यत्व या व्यक्तित्व ही वह वस्तु है,जो हम पर प्रभाव डालती है।४/१७१
" मनुष्य के सच्चे स्वरूप में कोई विधि नहीं,कोई दैव नहीं,कोई अदृष्ट नहीं। अनन्त में विधान या नियम कैसे रह सकता है ?" श्रृंखला तोड़ डालो और मुक्त हो जाओ।"८/३२
 " आज के पाश्चात्य ईश्वरतत्व-अन्वेषियों का मूलमंत्र तो 'मनुष्य का सच्चास्वरूप' और आत्मा हो गया है।" ९/३७५ 
 " सैकड़ों युग के लगातार सामाजिक अत्याचार से तुम्हारा सारा मनुष्यत्व नष्ट हो गया है! ...आओ, मनुष्य बनो। अपने संकीर्ण अन्धकूप से निकलकर बाहर जाकर देखो, सभी देश कैसे उन्नति के पथ पर चल रहें है। क्या तुम मनुष्य से प्रेम करते हो? तुम लोग क्या देश से प्रेम करते हो? तो फिर आओ हम भले बनने के लिए प्राणपण से चेष्टा करे। "
 " माया के भीतर अग्रसर होने को एक वृत्त कहा जा सकता है-जो तुम्हें प्रस्थान बिंदु पर पुनः वापस ले आता है। अन्तर केवल इतना ही है कि यात्रा प्रारंभ करते समय तुम अज्ञानी थे और उस स्थान पर जब लौट कर आते हो, तब तुम पूर्ण ज्ञान उपलब्ध किये होते हो। यह है वह ज्ञान ,जो हमारा स्वभाव या स्वरूप है। इस ज्ञान को हमारा 'जन्मगत स्वत्व' भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि वास्तव में हमारा जन्म तो है ही नहीं।"७/१०८ 


" यह कहना कि केवल मनुष्यों में ही आत्मा होती है,पशुओं में नहीं, बिल्कुल बेतुका है। मैंने पशु से भी गये-गुजरे मनुष्यों को देखा है। किन्तु जब यह मनुष्य के रूप में उच्चतम स्तर पर रहती है, तभी उसे मुक्ति मिल पाती है। इस तरह मनुष्यत्व का स्तर सबसे उन्नत स्तर है, देवत्व से भी उन्नत। क्योंकि मनुष्यत्व के स्तर पर ही आत्मा को मुक्ति मिल सकती है।"२/२२०
[नरेन् जानते थे, जिनको जान लेने से यह जगत अदृश्य हो जाता है, वे भगवान श्रीरामकृष्ण परमहंस ही परमब्रह्म हैं। वे त्रिगुणातीत हैं, शुद्ध-स्वरुप हैं, बाकी जो कुछ दीखता है वह सब गुणमय है, इसलिये अशुद्ध है, अतः यदि हम अपने मन को श्रीरामकृष्ण से जोड़ लें तो हमारा अंतःकरण भी शुद्ध हो जायेगा। अतः हम लोगों को भी उसी शाश्वत जीवन को प्राप्त करने के लिये , अपनी समस्त प्रकार की संभावनाओं को प्रकट करने की साधना (मन को श्रीरामकृष्ण से जोड़ लेने की साधना) करनी होगी। एक अद्भुत महान सत्ता (परमहंसदेव या सत्य-वस्तु) हमलोगों के भीतर छुपे हुए हैं। उसका नाम है हरी, और जो शक्ति उस 'है' को  छुपा देती है, और जो नहीं है (नाम-रूपात्मक प्रपंच या जगत) को दिखाती है उसे ही माया कहते हैं। उस माया को दूर हटाने के लिये ही प्रार्थना की जाती है- ' सत्यम परम धीमहि '! सविता का अर्थ यह सूर्य नहीं है, वह ब्रह्म है जिससे सब निकला-स्थित और लय होता है।] 



Thursday, July 26, 2012

[VVI] स्वामी विवेकानन्द और हमारी सम्भावना-6 "नव विप्लव एवं स्वामी विवेकानन्द" 'द वे ऑफ़ द ड्राप-आउट्स ' (व्यक्ति और मन),

  ' कम आउट एंड स्टैंड अलोन'-- यही है स्वामीजी का नव-विप्लव !"
स्वामी विवेकानन्द कहते हैं " मुक्ति-ओ मुक्ति, मुक्ति- ओ मुक्ति! '- यही आत्मा का गीत है। किन्तु हाय! प्रकृति प्रकृति (माया) की सैकड़ों जंजीरों से बद्ध हो जाना ही उसकी नियति है। " (२/२९४) वे आगे कहते हैं- " परन्तु 'मनुष्य' भी नियम (जन्म-जरा-मृत्यु) के अधीन है ---इस बात को हम नहीं मानते और न मानेंगे ही। आत्मा सदैव चीत्कार करती रहती है - 'मुक्ति ! मुक्ति ! स्वाधीनता ! स्वाधीनता ! स्वामी विवेकानन्द ने जिस नये विप्लव (स्वाधीनता -आन्दोलन) में कूद पड़ने के लिये युवाओं का आह्वान किया था, उसके मूल को उन्होंने यहीं से (आत्मा के नित्य-मुक्त स्वाभाव से ) प्राप्त किया था।
स्वामीजी कहते हैं, "सबके भीतर ही (धनी हो या गरीब) एक प्रकार के असन्तोष का भाव दिखाई पड़ता है। इस सार्वजनीन असन्तोष का करण क्या है ? इसका कारण यह है कि स्वाधीनता ही मनुष्य का चरम लक्ष्य है- जब तक वह स्वाधीनता की प्राप्ति नहीं करता, तब तक किसी भी तरह उसका असन्तोष दूर नहीं हो सकता। मनुष्य सर्वदा ही स्वाधीनता का अनुसन्धान कर रहा है.... जीवन का अर्थ और उसके रहस्य के अविराम अनुसन्धान को छोड़ कर मन का और क्या अर्थ है? मनुष्य का समग्र जीवन ही केवल इस स्वाधीनता-प्राप्ति की चेष्टा है। विश्व का स्पन्दन स्वतंत्रता का ही प्रकाश है। "शिशु जन्म ग्रहण करते ही नियम के विरुद्ध विद्रोही हो जाता है। उसकी पहली आवाज रुदन की होती है, जो अपने बंधनों के प्रति उसका विरोध होता है। " (२/२९३-९७)
स्वामीजी के मतानुसार - " वेदान्त में संग्राम का स्थान तो है, किन्तु भय के लिए कोई स्थान नहीं है। "  ये सभी --'संग्राम', 'प्रतिवाद', 'विद्रोह', 'निर्भिकता',या' 'स्वाधीनता-प्राप्त करने की चेष्टा ' जैसे शब्द क्रांतिकारी मानसिकता द्वारा उच्चारित शब्द ही तो हैं। किन्तु हमारे मन में अन्य कई शब्दों की तरह विप्लव (अप्हीवल-महापरिवर्तन-upheaval-) शब्द के साथ भी राजद्रोह, बगावत, विद्रोह, विध्वंश, विक्षोभ आदि धारणायें इस प्रकार घुलमिल गयी हैं, कि 'क्रांति या विप्लव'  शब्द की जो अपनी एक गरिमा है, उसका जो एक सुंदर चरित्र है, जिस महापरिवर्तन के अनिवार्य रूप से आविर्भूत हो जाने की जो तीव्र छटपटाहट या तीव्र व्याकुलता है, उसे हमलोग बिल्कुल ही भूल चुके हैं।'विप्लव' शब्द का उद्भव 'प्लू'  धातु से हुआ है। 'प्लू' धातु का मूल अर्थ है- ' जाना '। विशेष तौर पर मानव-समाज प्रकृति के जिन बन्धनों में  जकड़ा हुआ है, मानवता जिन बेड़ियों में जकड़ी हुई है,'उन बेड़ियों  का टूट जाना '- उसका उलंघन करना; यही स्वामी जी के नव-विप्लव से यही सूचित होता है !
स्वामीजी कहते हैं- " मैं इस सिद्धान्त से सहमत नहीं हूँ कि - प्रकृति के नियमों का पालन ही मुक्ति है। मैं नहीं समझता कि इसका क्या अर्थ हो सकता है। मनुष्य की प्रगति के इतिहास को देखने से पता चलता है, कि, मनुष्य ने जो भी प्रगति की है, वह सब प्रकृति के नियमों का उल्लंघन करने से ही सम्भव हो सकी है। यह भले ही कहा जा सकता है कि मनुष्य ने प्रकृति के उच्चतर नियमों को (गुरुत्वाकर्षण का नियम आदि) आविष्कृत करके ही प्रकृति के निम्नतर नियमों पर विजय प्राप्त की है। परन्तु वहाँ भी विजय की कामना करने वाला मन (गुरुत्वाकर्षण के नियम का उल्लंघन करके ऊपर उड़ जाने की व्याकुलता रखने वाला मन ) ही किसी उपाय का अन्वेषण कर रहा था। जैसे ही उसने देखा कि वह संघर्ष नियमों के कारण ही था, उसने (क्रायोजेनिक इंजन का आविष्कार करके) उस नियम को भी जीतना चाहा। इस प्रकार हम देख सकते हैं,कि वैज्ञानिक अविष्कारों के प्रत्येक क्षेत्र में-- लक्ष्य सदा ही प्राकृतिक नियमों से मुक्ति प्राप्त करना ही था। वृक्ष कभी प्राकृतिक नियमों का उल्लंघन नहीं करते। मैंने कभी किसी गाय को चोरी करते हुए नहीं देखा, कोई घोंघा (सीपी या सितुहा oyster) कभी झूठ नहीं बोलता। फिर भी वे मनुष्य से बड़े नहीं हैं। स्वतन्त्रता के लिये एक उत्कट आग्रह का नाम ही जीवन है।" (2/261)
[" जीवित प्राणी से निर्जीव जड़ रोबोट्स की भिन्नता हम कैसे समझते हैं ? किसी रोबोट के निर्माता ने उसे जिस प्रकार परिचालित करने की इच्छा से उसका निर्माण किया है, वह यन्त्र-मानव (रोबोट) केवल उतना ही कार्य यन्त्रवत करता है। उसके कार्य जीवित प्राणी के भाँति नहीं होते। तो फिर जीवित प्राणी और मृत का भेद किस प्रकार किया जाय ? जीवित प्राणी में स्वाधीनता है -बुद्धि है, और निर्जीव जड़पदार्थ में स्वाधीनता नहीं है। कारण, उसके भीतर (आर्टिफिसियल इंटेलिजेंस तो है किन्तु) स्वाभाविक बुद्धि नहीं है! वह कुछ जड़ नियमों (आर्टिफिसियल इंटेलिजेंस) की सीमा में बद्ध है। जो स्वाधीनता हमें रोबोट्स से पृथक करती है, हमलोग उसी की प्राप्ति के लिये निरन्तर तत्पर रहते हैं। हमारी समस्त चेष्टाओं का उद्देश्य उत्तरोत्तर स्वाधीन होना है। क्योंकि, पूर्ण स्वाधीनता प्राप्त करने के बाद ही हम पूर्णत्व को पाप्त कर सकते हैं। हमें इस बात का ज्ञान हो या न हो, स्वाधीनता पाने की चेष्टा ही सभी प्रकार की उपासना-प्रणालियों की भित्ति है !" २/२९२ ] 
स्वामी जी कहते हैं, " इस देश में एक बात हर समय सुनता रहता हूँ कि हमारे लिये सदा प्रकृति के साथ ताल मिलाकर चलना ही उचित है। क्या तुम यह नहीं जानते कि आज विश्व में जितनी भी प्रगति हुई है, वह सब प्रकृति को जीत लेने से ही हुई है ?  यदि हमलोग किसी भी तरह से उन्नति करना चाहते हों, तो इसके लिये हर कदम पर हमें प्रकृति का प्रतिरोध करना होगा। यदि हमें कभी भी स्वाधीनता लाभ करना हो, तो प्रकृति को जीत कर ही हम उसे पाएंगे, प्रकृति से भागकर नहीं । कापुरुष कभी जययुक्त (विजयी) नहीं हो सकता। मृत्यु के भय, दुःख, कष्ट और आतंक से भागकर देखो ---वे तुम्हारा पीछा करेंगे, उनके सामने डटकर खड़े हो जाओ , वे भाग जायेंगे।  " सारा संसार सुख और आराम (या लस्ट ऐंड लूकर ) का उपासक है, इन दोनों का अतिक्रमण ही मुक्ति है ! जो कष्टप्रद है, उसकी उपासना करने का साहस  बहुत कम लोग करते हैं ! "२/२९८ 
[" रास्ता माया के साथ नहीं है, वह तो माया के विरुद्ध है-हम प्रकृति के सहायक होकर नहीं जन्मे हैं, वरन हम तो प्रकृति (माया) के प्रतियोगी होकर जन्मे हैं। यह मकान कहाँ से आया ? प्रकृति ने तो दिया नहीं। प्रकृति कहती है, ' जाओ, जंगल में जाकर बसो।' मनुष्य कहता है, ' नहीं, मैं मकान बनाउँगा और प्रकृति के साथ लडूंगा।'और वह ऐसा कर भी रहा है। मानव जाति का इतिहास तथाकथित प्राकृतिक नियमों के साथ लगातार संग्राम का इतिहास है। और अंत में मनुष्य ही प्रकृति पर विजय प्राप्त करता है। " 2/59 ] 
इसीलिये विनय कुमार सरकार ने कहा था, यदि विवेकानन्द के विचारों को किसी मतवाद की संज्ञा देनी ही हो तो उसको ' प्रकृति के उपर- मनुष्यवाद' (मैन-ओवर-नेचर-इज्म) कहना होगा।
प्रकृति तो मनुष्य को यह शिक्षा देती है कि स्वयं जीवित बचे रहने के लिये संग्राम करते रहो। किन्तु स्वयं बचे रहने के लिये संग्राम करना तो स्वार्थपरता को साधित करने का नामान्तर मात्र है, और विवेकानन्द के अनुसार वैसी चेष्टा किसी भी सामाजिक नैतिकता का सम्पूर्ण विरोधी है। इस स्वार्थपरता की प्रवृत्ति से ही विशेषाधिकार का जन्म होता है। विवेकानन्द कहते हैं, " विशेषाधिकार भोग करने की धारणा मनुष्य जीवन के लिये कलंक स्वरुप है।" किन्तु स्वामी विवेकानन्द इस विशेषाधिकार के कलंक स्वरूप अवधारणा को केवल आर्थिक क्षेत्र तक ही सीमित रखने के पक्षधर नहीं थे। वे कहते हैं, " प्रथम है- बाहुबल के द्वारा विशेष सुविधा भोग करने का विशेषाधिकार, जो सबल है वह निर्बल का शोषण करना चाहेगा, यही तो पाशविकता है। इस जगत में धनबल का विशेषाधिकार भी इसी प्रकार का है। यदि दूसरे की अपेक्षा किसी के पास अधिक द्रव्य है, तो वह कम द्रव्य वालों पर थोड़ा विशेषाधिकार चाहता है, या अधिक सुविधा भोग करना चाहता है। फिर बुद्धिबल का विशेषाधिकार उससे कहीं अधिक सूक्ष्म और शक्तिशाली है। एक आदमी दूसरों की अपेक्षा अधिक जानकारी रखता है, इसलिये वह अधिक विशेषाधिकार का दावा करता है। और सबसे अन्तिम तथा सबसे निकृष्ट, है आध्यात्मिक-ज्ञान से उत्पन्न विशेषाधिकार--यह सर्वाधिक अत्याचारपूर्ण है!  यदि कुछ पण्डे-पुरोहित लोग यह सोचते हैं कि उनका आध्यात्मिक ज्ञान अधिक है और वे ईश्वर के विषय में अधिक जानते हैं, तो वे अन्य सबकी अपेक्षा श्रेष्ठतर विशेषाधिकार का दावा करते हैं। वे कहते हैं, "ऐ भेड़-बकरियों! आओ और हमारी पूजा करो, हम ईश्वर के संदेशवाहक हैं और हमारी पूजा तुम्हें करनी ही पड़ेगी। किन्तु जो सच्चा वेदान्ती (नेता या पैगम्बर) होगा, वह कभी किसी के उपर शारीरिक,मानसिक अथवा आध्यात्मिक विशेषाधिकार के लिये दावा नहीं करेगा। 'स्वयं को आध्यात्मिक (नेता-लोकशिक्षक) कहना और विशेषाधिकार के लिये दावा भी करना' - दोनों बातें एक साथ नहीं चल सकतीं। किसी को रंचमात्र विशेषाधिकार नहीं है । प्रत्येक व्यक्ति में समान ही सामर्थ्य है--एक में उसकी अभिव्यक्ति अधिक है,दूसरे में कम। प्रत्येक में समान क्षमता है। फिर विशेषाधिकार के दावे का सवाल कहाँ? ईश्वर का कोई विशेष संदेशवाहक नहीं, न कभी हुए और न हो सकते हैं। छोटे-बड़े सभी जीव ईश्वर की समान रूप से अभिव्यक्तियाँ हैं -अंतर केवल अभिव्यक्तियों में है। कोई मनुष्य दूसरे से जन्मना श्रेष्ठ है, यह भाव वेदान्त की दृष्टि से निरर्थक है, अतः अद्वैत का कार्य इन सभी विशेषाधिकारों को तोड़ डालना है। वेदान्त इस विशेषाधिकार-वाद के विरुद्ध प्रचार करना चाहता है, मानव-आत्मा के उपर इस उत्पीड़न को चूर-चूर कर देना चाहता है। यह सब कार्यों से कठिन है, और विचित्र बात तो यह है कि अद्वैत अपने जन्मभूमि में अन्य किसी भूमि की अपेक्षा कम सक्रीय रहा है। " ९/१००-१०१ 
तथा स्वामी विवेकानन्द के वेदान्ती विप्लव की योजना में यही (Drift) नया मोड़ है। किन्तु वे बड़े क्षोभ के साथ कहते हैं- " इस देश में साध्य तो अनेक हैं, किन्तु साधन नहीं। मस्तिष्क तो है, परन्तु हाथ नहीं। हम लोगों के पास वेदान्त मत है, लेकिन उसे कार्य में परिणत करने की क्षमता नहीं है। हमारे ग्रन्थों में सार्वभौम-साम्यवाद का सिद्धान्त है, किन्तु कार्यों में महा भेद-वृत्ति है। महा निःस्वार्थ, निष्काम कर्म भारत में ही प्रचारित हुआ, परन्तु हमारे कर्म अत्यन्त निर्मम और अत्यन्त हृदयहीन हुआ करते हैं; और मांसपिण्ड की अपनी इस काया को (शरीर मन का आवरण है ) छोड़ कर, अन्य किसी विषय में हम सोचते ही नहीं। " 
विवेकानन्द के मतानुसार- " भगवान और शैतान (अहुरमज्द और अहिर्मन)  सुर और असुर में कुछ भेद नहीं हैं, भेद केवल स्वार्थशून्यता तथा स्वार्थपरता  में है। शैतान (असुर) भी उतना जानता है जितना सुर, उसमें बस पवित्रता नहीं होती-इसीसे वह असुर बन जाता है। शैतान भी भगवान के जैसा ही शक्तिशाली है, केवल उसमें पवित्रता नहीं है- इस पवित्रता के आभाव ने ही उसको शैतान बना दिया है। इसी कसौटी पर आधुनिक संसार को परख कर देखो। पवित्रता (chastity- चैस्टिटी या इन्द्रियनिग्रह की भावना) नहीं रहने से, ज्ञान और शक्ति का अतिरेक मनुष्य को शैतान में परिणत कर देता है। " ९/१०२ 
इस पवित्रता का अर्जन ही ' वेदान्ती-विप्लव ' का मुख्य अंग है। पवित्रता (ब्रह्मचर्य) की प्राप्ति ही आध्यात्मिकता को अर्जित करना है, एवं यह जीवन के प्रत्येक स्तर (चारो आश्रमों) के लिये वह अत्यन्त उपयोगी सिद्ध होता है। विवेकानन्द के मतानुसार  मनुष्य जीवन में- ' धार्मिक और धर्मनिरपेक्ष' (सैक्रिड और सेक्युलर) रूप से दो अलग-अलग कार्य-क्षेत्र नहीं हैं। क्योंकि जीवन एक ही वस्तु है, और हर प्रकार से अधि-आत्मिक है। किन्तु धर्म क्या है ? यदि कोई स्वामी विवेकानन्द से पूछे ---तो वे उत्तर देंगे," धर्म का अर्थ क्या इस प्रकार प्रार्थना करना है- " हमें यह दो, वह दो" ? नहीं, धर्म के संबन्ध में ये सब धारणायें प्रमाद हैं। हमारे गुरुदेव कहा करते थे, ' गीध बहुत ऊँचे उड़ते हैं, किन्तु उनकी दृष्टि रहती है जानवरों के शव की ओर।' जो हो, तुममें धर्म के सम्बन्ध में जो सब धारणायें हैं, उनका फल क्या है, बताओ तो सही ?  ..रास्ते की सफाई करना, और अच्छे अन्न-वस्त्र का संग्रह करके उनका वितरण कर देना; क्या धर्म का यही अर्थ है?  अन्न-वस्त्र के लिये कौन चिंता करता है? प्रति मुहूर्त लाखों व्यक्ति आ रहे हैं, लाखों जा रहे हैं--- कौन परवाह करता है ? तुम इस क्षुद्र जगत के सुख-दुःख को ग्राह्य मानते ही क्यों हो? यदि साहस हो, उनके बाहर चले आओ। सब नियमों के बाहर   चले जाओ, समग्र जगत उड़ जाय - तुम अकेले आकर खड़े हो जाओ।' हम परम् सत है,परम् चित और परम् आनंदस्वरूप हैं -सोSहं, सोSहं। ' /७९ यही है स्वामीजी का यथार्थ विप्लव (महापरिवर्तन) का आह्वान !
 [ধর্ম কি—ধর্ম মানে কি এইরূপ প্রার্থনা, ‘আমাকে ইহা দাও, উহা দাও’? ধর্ম সম্বন্ধে এ-সকল আহাম্মকি ধারণা! যাহারা ধর্মকে ঐরূপ মনে করে, তাহাদের ঈশ্বর ও আত্মার যথার্থ ধারণা নাই। আমার গুরুদেব বলিতেন, ‘চিল-শকুনি খুব উঁচুতে ওড়ে, কিন্তু তার নজর থাকে গো-ভাগাড়ে।’ যাহা হউক, আপনাদের ধর্মসম্বন্ধীয় যে সকল ধারণা আছে, তাহার ফলটা কি বলুন দেখি?—রাস্তা সাফ করা, আর ভাল অন্নবস্ত্রের যোগাড় করা? অন্নবস্ত্রের জন্য কে ভাবে? প্রতি মুহূর্তে লক্ষ লোক আসিতেছে, লক্ষ লোক যাইতেছে- কে গ্রাহ্য করে? এই ক্ষুদ্র জগতের সুখ-দুঃখ গ্রাহ্যের মধ্যে আনেন কেন? যদি সাহস থাকে, ঐ-সকলের বাইরে চলিয়া যান। সমুদয় নিয়মের বাইরে চলিয়া যান, সমগ্র জগৎ উড়িয়া যাক—আপনি একলা আসিয়া দাঁড়ান। ‘আমি নিরপেক্ষ সত্তা, নিরপেক্ষ জ্ঞান, ও নিরপেক্ষ আনন্দস্বরূপ সৎ-চিৎ—আনন্দ সোহহং, সোহহম্।]
हम लोग ठीक उनके इसी उक्ति की प्रतिध्वनी, प्रसिद्द इतिहासकार एवं विचारक अर्नाल्ड टायनबी की पुस्तक 'सरवाइविंग द फ्यूचर' (Surviving the Future) में भी सुन सकते हैं। वे कहते हैं- " सच्चे और दीर्घ स्थायी शान्ति को प्राप्त करने के लिये, जिस सच्ची शिक्षा (तैत्तरीय उपनिषद की शीक्षा) को प्राप्त करना अत्यन्त आवश्यक है, वह है जीवन में एक आध्यत्मिक-विप्लव का घटित हो जाना!" उन्होंने अपनी पुस्तक में दो प्रकार की क्रांति का उल्लेख किया है -- एक में व्यवस्था के प्रति क्षोभ और मुक्ति की आकांक्षा, विध्वंस का विस्फोटक रूप धारण कर लेती है, और दूसरे प्रकार की आध्यात्मिक-क्रांति जिस मनुष्य के भीतर घटित होती है, (जन्म-मरण के बन्धन से मुक्ति प्राप्त करने की अदम्य इच्छा से), वह अधिकांशतः मौन (गूँगा) क्रांति होती है, और बाहर से देखने पर कम क्रियाशील प्रतीत होती है। ठीक विवेकानन्द की भाषा में -"একলা আসিয়া দাঁড়ান " (वे हिप्नोटाइज्ड स्टेट ऑफ़ माइंड से निर्द्वन्द्व होकर बाहर निकल आते हैं) और अकेले अपने पैरों पर खड़े हो जाते हैं---'The way of the drop-outs '  ' कम आउट एंड स्टैंड अलोन'- 'निर्द्वन्द्व होकर अकेले अपने पैरों पर खड़े हो जाने वालों' की तुलना 'सेंट फ्रांसिस ऑफ असीसी' से करते हुए अर्नाल्ड टायनबी (Arnold Joseph Toynbee) कहते हैं-"इस प्रकार विसम्मोहित (डी-हिप्नोटाइज्ड या निर्द्वन्द्व) होकर अकेले खड़े हो जाने वाले महापुरुषों के और भी कई उदाहरण (बुद्ध,नवनीदा आदि) हैं, जिनके कारण समाज विशेष रूप से उपकृत हुआ है।"
["सेंट फ्रांसिस ऑफ़ असीसी (११८२-१२२६)" सेंट फ्रांसिस को यीशु मसीह के त्यागपूर्ण जीवन का अनुकरण करने वाले, ईसाई परंपरा में संतों में एक श्रेष्ठ उदाहरण माना जाता है। उन्होंने गरीबी और पवित्रता (इन्द्रिय-निग्रह, chastity) के जीवन को गले लगाने के लिए,अपने पूर्व-जीवन के धन और सामाजिक स्थिति का त्याग कर दिया था। जिस प्रकार हिप्पी उप-संस्कृति मूल रूप से धन का प्राचुर्य में जीने वाले युवाओं का एक आंदोलन था जो 1960-70 के दशक के मध्य में संयुक्त राज्य अमेरिका में उभरा और बड़ी तेजी से दुनिया के अन्य देशों में फ़ैल गया था। धनाड्य युवावर्ग के हिप्पी की तरह, सेंट फ्रांसिस भी इटली के एक समृद्ध और धनाड्य व्यापारी के पुत्र थे। उनके पिता ने बहुत सारा धन कमाया था, उन्हें अपने धन-सम्पत्ति का बहुत गर्व भी था। वे चाहते थे कि उनका पुत्र  एक विलासमय और खर्चीला जीवन जीये और महँगे -महँगे कपड़ों पहन कर शानदार ढंग से रहे। सेन्ट फ्रांसिस भी कुछ समय तक तो उस प्रकार का जीवन जीये, किन्तु इस प्रकार के आडम्बरी जीवन से वे बिल्कुल संतुष्ट नहीं हुए, क्योंकि आध्यात्मिक विकास में ऐसा जीवन उन्हें बहुत बड़ा बाधक प्रतीत होता था । और उनके मन में इस जीवन के विरुद्ध बहुत कड़ी प्रतिक्रिया हुई। जब उनके पिता उनके आदर्शवादी जीवन पर ताने देने लगे; तो उनके जीवन में एक ऐसा पल भी आया, जब इस पर हिप्पी ढंग से प्रतिक्रिया करते हुए उन्होंने अपने को निर्वस्त्र कर लिया, और पिता के सामने नग्न होकर खड़े हो गए। तब असीसी के बिशप ने उस नग्न लड़के के शरीर को अपने सभावस्त्र से ढँक कर,अर्थात अपना शिष्य बनाकर उसकी रक्षा की। 
सेन्ट फ्रांसिस के विद्रोह की तुलना हिप्पी आंदोलन के क्रन्तिकारी युवा से करने का कारण यही दिखाना है कि सेन्ट फ्रांसिस ऑफ़ असीसी ने अपना विप्लव एक “drop-out”  की तरह ही प्रारम्भ किया था, किन्तु उनके जीवन का अन्त एक हिप्पी के रूप में नहीं, बल्कि एक मानवजाति के सच्चे नेता की तरह हुआ। जो अपने लिए धनी होने के कारण किसी भी प्रकार का विशेषाधिकार नहीं चाहते थे। उन्होंने युवावस्था में अपनी क्रांति का प्रारम्भ अपने पिता के भौतिकवादी मानसिकता का हिप्पियों की तरह नग्न होकर नकारात्मक विरोध किया था, किन्तु वे क्रमशः चरित्र-निर्माण की सकारात्मक पद्धति को सीखकर अपना आध्यात्मिक जीवन गठित कर लिया था। इसीलिए अर्नाल्ड टायनबी कहते हैं - मैं हिप्पी-आंदोलन के ऊपर अभी कोई नकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं दूंगा, मैं इस आंदोलन की परिणीति को देखने के बाद ही हिप्पी युवाओं के विषय में कुछ कहूँगा। ] 
'द वे ऑफ़ द ड्राप-आउट्स ' की व्याख्या करते हुए ठीक विवेकानन्द की भाषा में अर्नाल्ड टायनबी का भी यह कहना कि - ' कम आउट एंड स्टैंड अलोन' - अकेले होकर अपने पैरों पर खड़े हो जाओ बहुत आश्चर्यजनक है। हम यह नहीं जानते कि ऐसा कहते समय उनके मन में विवेकानन्द का नाम था या नहीं, किन्तु हमलोग यह निश्चित रूप से जानते हैं कि हमारे युग के इस प्रकार के (' আমাদের যুগে এমন এক ছন্নছাড়া গোষ্ঠীর পুরোধা ছিলেন স্বামী বিবেকানন্দ') रूढ़िमुक्त युवा सम्प्रदाय (Bohemian -बोहेमियन युवावर्ग) के नेता, 'म्यान से निकली हुई तलवार' जैसे युवा-वर्ग विशेष के पुरोधा या समग्र (आध्यात्मिक) क्रांति के अग्रदूत का नाम था स्वामी विवेकानन्द ! जो न केवल अपने समुदाय में एक क्रांतिकारी परिवर्तन लाने के लिये दृढ़ संकल्प थे, बल्कि सम्पूर्ण भारत के युवाओं  के विचार-जगत में एक क्रांतिकारी परिवर्तन लाने के लिए कृतसंकल्प थे। और यही एक नई क्रांति की शुरुआत भी है। 
स्वामी विवेकानन्द ने घोषणा की थी, " बाह्य रूपों तथा अवस्था में कभी साम्य प्राप्त नहीं हो सकता। किन्तु जिसकी सम्प्राप्ति हो सकती है, वह है विशेषाधिकार का निराकरण। सृष्ट जगत की स्वाभाविक विविधताओं को नष्ट किये बिना, साम्य-प्राप्ति और एकत्वबोध की दिशा (विशेषाधिकार के निराकरण की दिशा) में अग्रसर होते रहना होगा। सारे संसार के समक्ष वास्तव में यही कार्य है।" 
यहीं पर अध्यात्मिक क्रांति की दृष्टि से विवेकानन्द की सकारात्मक कार्य पद्धति में सृजन की खोज दिखाई देती है। जड़वादियों के इन्कलाब और अध्यात्मवादियों की क्रांति में यही अंतर है। संस्कृत के कवि भास बहुत सुंदर ढंग से कहते हैं- 
 'प्राज्ञस्य मूर्खस्य च कार्ययोगे, 
    समत्वम् अभ्येति तनुः न बुद्धिः||' 
-अर्थात ज्ञानी और मूर्ख मनुष्य के कर्म करने में शरीर तो एक जैसा रहता है, परन्तु बुद्धि में भिन्नता रहती है।
जब कोई कार्य किसी प्राज्ञ या मूर्ख व्यक्ति के द्वारा सम्पादित होता है, तो बाहर से देखने पर उसमें कोई अंतर नहीं रहता। किन्तु बुद्धि या विचार की दृष्टि से देखा जाय तो - एक विशेषाधिकार पाने या बॉसिज्म की इच्छा से कर्म करता है, और दूसरा आध्यात्मिक साम्य में स्थापित रहने की इच्छा से, दोनों के बीच बहुत अधिक अंतर होता है।
[गीता १३/२५ में भी कहा गया है, कर्म में आसक्त हुए अज्ञानीजन जैसे कर्म करते हैं वैसे ही विद्वान् पुरुष अनासक्त होकर लोकसंग्रह (लोक कल्याण) की इच्छा से कर्म करे। यह संभव है कि सामान्य मनुष्य को ज्ञानी (नेता) और अज्ञानी के कर्मों के मध्य सूक्ष्म भेद विशेष महत्त्व का प्रतीत न हो जब तक कि उसका ध्यान इस ज्ञान---BE AND MAKE की सार्वभौमिक उपयोगिता की ओर आकर्षित नहीं किया जाय। 
"पूर्णसाम्य की अवस्था सृष्टि रचना के व्यक्त होने के पूर्व की अवस्था है, सृष्ट जगत में विभेद और असमानता रहेंगी ही ! स्वामी जी कहते हैं , " भारत के ब्राह्मण अन्य सब लोगों के विरुद्ध समाज के विशेष वर्ग के विशेषाधिकारों को बनाये रखने के लिए, तथा वर्गभेद और वर्ण-व्यवस्था का प्रतिपादन करने में इन्हीं तर्कों पर बल देते हैं। वे घोषणा करते हैं कि जातिभेद के विनाश से समाज का भी विनाश हो जायेगा। जिन्हें कोई सुविधा प्राप्त है, वे उसे बनाये रखना चाहते हैं। जब तक जीवन का अस्तित्व है, तबतक ऐसी अवस्था का होना असम्भव है, जिसमें सारी विविधताओं का लोप होकर एक सी मृत समरूपता कायम हो जाय। यह वांछनीय भी नहीं। साथ ही तथ्य का दूसरा पहलु है --एकत्व का अस्तित्व पहले से ही है। ९/१०८
"प्रत्येक जाति और प्रत्येक देश के सामाजिक जीवन में यह संघर्ष होता रहा है। संघर्ष है उस विशेषाधिकार के उन्मूलन का।" अन्य  के उपर सुविधा के उपभोग को विशेषाधिकार कहते हैं और इसका विनाश करना युग युग तक नैतिकता और धर्म का उद्देश्य रहा है। यह कार्य ऐसा है,जिसकी प्रवृत्ति साम्य और एकत्व की ओर है तथा जिससे विविधता का विनाश नहीं होता। इन विविधताओं को अनन्त काल तक रहने दो; यह तो जीवन का सार है। अनन्त काल तक हम सब इस प्रकार लीला करेंगे। तुम धनी होगे, मैं निर्धन; तुम बहुत बड़े आध्यात्मिक (नेता-सिंह ) होगे और मैं कम (अपने को भेंड़ समझने वाला सिंहशावक हरि)। किन्तु उससे क्या ? ... सभी विरोधाभासों के बावजूद आत्मा की शाश्वत, अनन्त और तात्विक पवित्रता को स्वीकार करना नीतिशास्त्र का कार्य रहा है और भविष्य में भी रहेगा, न कि विविधता का विनाश करना, और बाह्यजगत में एकरूपता की स्थापना करना- (सभी को सिंह बना देना) जो असम्भव है। क्योंकि उससे मृत्यु तथा विनाश हो जायेगा। " ९/११२
स्वामी विवेकानन्द कहते हैं -" मैं उस महापुरुष का शिष्य हूँ, जिन्होंने सर्वश्रेष्ठ ब्राह्मण (चट्टोपाध्याय? इस युग में श्री नवनीहरन  मुखोपाध्याय !) होते हुए भी एक पैरिया (चाण्डाल) के घर को साफ करने की अपनी इच्छा प्रकट की थी। अवश्य वह इस पर सहमत हुआ नहीं -और भला होता भी कैसे ? एक तो सर्वश्रेष्ठ ब्राह्मण, उस पर भी संन्यासी, वे आकर घर सफाई करेंगे ? इस पर क्या वह कभी राजी हो सकता था ? निदान,  क दिन आधी रात को उठकर गुप्त रूप से उन्होंने उस पैरिया के घर में प्रवेश किया और उसका शौचालय साफ कर दिया, उन्होंने अपने लम्बे बालों से उस स्थान को पोंछ डाला।और यह काम वे लगातार कई दिनों तक करते रहे, ताकि वे अपने को सबका दास बना सकें ! (विशेषाधिकार की भावना का उन्मूलन कर सकें !) मानवजाति का सच्चा मार्गदर्शक नेता या आचार्य शब्दों से उपदेश देने से अधिक अपने आचरण द्वारा शिक्षित करते हैं ! ताकि मानवजाति के भावी मार्गदर्शक नेताओं के मन में यह बात बैठ जाये कि - जब दृष्टि ज्ञानमयी हो जाने के बाद जगत ब्रह्ममय है (पवित्र ट्रिनिटी है) तो मैं आस-पास रहने वाले सभी स्वजनों, बन्धुबान्धव, जिज्ञासुओं का दास हूँ,मुझे विशेषाधिकार क्यों मिलना चाहिए ?  नेता को दास बनकर- उपदेश नहीं व्यव्हार से विद्यादान करने का अभ्यास करना चाहिये !  मैं उन्हीं महापुरुष के चरण कमलों को अपने मस्तक पर धारण किये हूँ ! वे ही मेरे आदर्श हैं -मैं उन्हीं आदर्शपरुष श्रीरामकृष्ण परमहंस के जीवन का अनुकरण करने की चेष्टा करूँगा ! क्योंकि सबका सेवक बनकर ही एक हिन्दू (= नेता) अपने को उन्नत करने की चेष्टा करता है।  

क्योंकि नेता अपने ईश्वरत्व को कभी नहीं भूलता, और अपने स्वरूप में अटल रहने के लिये, कहीं नेतागिरी
 या 'गुरुगिरि' का अहंकार न हो जाय। सच्चा नेता (अवतार) केवल विद्या का अहंकार, दास मैं, या भक्त मैं की सहायता से ईश्वर (परमसत्य) से जुड़ने में भावी नेताओं का सेवक बनकर नेतृत्व प्रदान करने की चेष्टा करता है। हमें इसी प्रकार (त्याग और सेवा के माध्यम से ) भारत की सर्वसाधारण जनता को उन्नत करना चाहिये न-कि पाश्चात्य समाज-सेवी क्लबों जैसी पद्धति का अनुकरण करके ! हमारे इन सुधारकों या तथा-कथित समाज- सेवियों (क्लब और समिति के सदस्यों) में से एक भी, ऐसा जीवन गठन करके दिखाये दिखाये तो सही जो एक पैरिया की भी सेवा के लिए तत्पर हो ! फिर तो मैं भी उसके चरणों में बैठकर शिक्षा ग्रहण करूँ, पर हाँ -उसके पहले नहीं ! लम्बी-चौड़ी बातों की अपेक्षा थोड़ा कुछ कर दिखाना लाख गुना अच्छा है।"५/१०६
विवेकानन्द के इन्हीं विचारों में नयी क्रांति की योजना --'Be and Make' में सन्निहित है। इसे सब समझते हैं, सब इसे सत्य घोषित करते हैं, किन्तु व्यवहार में लाने की बात कहो, तो लोग कहने लगते हैं कि इसमें लाखों वर्ष लगेंगे। " बहुत से वीर तथा अदभुत आध्यात्मिक होने का दावा करने वाले व्यक्ति - दुनिया से अपना सम्बन्ध विच्छेद कर के, ध्यान-धारणा के लिये गुफाओं और वनों में चले जाते हैं। दूसरी ओर हमें ऐसे महापुरुष भी मिलते हैं जो ब्रह्मज्ञ और यशस्वी होते हुए भी, समाज में प्रवेश करते हैं, तथा जनसाधारण एवं दीन-दुःखीयों की समुन्नति के लिए (अर्थात विवेक-प्रयोग और आध्यात्मिक दृष्टि खोलने के लिये) प्रयत्न करते हैं। 
जो लोग साधु बनकर अपने भाई मनुष्यों से पृथक गुफा में निवास करते हैं, वे उन लोगों पर (महामण्डल नेताओं पर) व्यंग की दृष्टि से हँसते हैं, जो अपने भाई मनुष्य की पुनरुद्धार के लिए (आध्यात्मिक दृष्टि खोलने के लिये) कार्य कर रहे हैं। वे कहते हैं, किंतनी मूर्खता की बात है, माया का संसार सदा मायामय रहेगा। वह बदल नहीं सकता। वहाँ हमारा क्या काम ?......  जब अद्वैत को मानते हो, तो छूत से बचने के लिये कूदते क्यों हो ? वह जवाब देता है, " अरे भाई, उपनिषदों के चार महावाक्य गृहस्थों के लिए तो केवल सिद्धान्त का विषय हैं,(बोलने के लिए हैं करने के लिए नहीं।) जब मैं संन्यास लेकर वन में चला जाऊँगा, तो मैं भी समदर्शी हो जाऊँगा।" अतएव कई हजार वर्षों तक अद्वैतवाद कोरा सिद्धान्त ही रहा है, और कभी कार्य में परिणत नहीं हुआ। इसे सब समझते हैं, वेदान्त के सिद्धान्तों को सभी लोग सत्य घोषित करते हैं, किन्तु जब व्यवहार में लाने की बात कहो, तो लोग कहने लगते हैं---कि अभी इसमें लाखों वर्ष लगेंगे।
 एक राजा था, जिसके बहुत से सभासद थे और इन सभासदों में से प्रत्येक यह दम भरता था कि अपने स्वामी के लिए वह जीवनोत्सर्ग भी करने को तैयार है ! और उससे बढ़कर निष्कपट व्यक्ति दूसरा कोई कभी पैदा ही नहीं हुआ। कालान्तर में एक संन्यासी राजा के यहाँ आया। राजा ने उससे कहा - मेरे पास जितने अधिक सच्चे सभासद हैं, उतने किसी राजा के पास पहले कभी नहीं थे। संन्यासी मुस्कुराने लगा और बोला -मैं इस पर विश्वास नहीं करता। राजा ने कहा कि यदि सन्यासी महोदय चाहें तो परीक्षा ले सकते हैं। तब संन्यासी ने घोषणा की वह एक बहुत बड़ा यज्ञ करेगा, जिसके कारण राजा का राज्य-काल बहुत दीर्घ स्थायी हो जायेगा। लेकिन एक शर्त यह है कि एक छोटा सा दूध का  तालाब बनना चाहिये, जिसमे अमावस्या की रात्रि के अंधकार में प्रत्येक सभासद एक एक घड़ा दूध उड़ेल दे। 
राजा मुस्कुराया -बस इतनी छोटी सी परीक्षा है ? उसने सभासदों को अपने पास बुलवाया और उन्हें बताया कि क्या करना है। सबने प्रस्ताव पर अपनी सहर्ष स्वीकृति प्रदान की और वे सब लौट गए। निशीथ वेला में आकर उन्होंने अपने घड़े उड़ेले। परन्तु सबेरे देखा गया तो वह केवल पानी से भरा था। सभासद एकत्र किये गए, और उनसे इस मामले में पूछताछ की गयी। उनमेंसे प्रत्येक ने यही सोचा था कि इतने घड़ों का दूध हो जायेगा कि उसके द्वारा उड़ेले गए पानी का पता न लगेगा। " ---दुर्भाग्य से हममें से अधिकांश का भाव यही होता है, और हम अपने कार्य-भाग (सौंपे हुए कर्तव्य) को उसी प्रकार करते हैं, जैसा कहानी के सभासदों (या आज के एम.पी.लोग )  ने किया है। " ९/१०५ 

लोमड़ी की क्रूरता सिंह की क्रूरता से अधिक भयानक है। पुरोहित सोंचता है-  पैगम्बरों की समदर्शिता का भाव इतना अधिक है कि मेरे छोटे से विशेषाधिकार की पोल नहीं खुलेगी।  पौरोहित्य (आडम्बरी नेतृत्व) स्वाभाविक रूप से क्रूर तथा हृदयहीन होता है ! जिस संस्था में पौरोहित्य का उदय होगा, वहाँ धर्म का (उच्च स्तर की समाज-सेवा का ) अधःपतन हो जाता है। वेदान्त कहता है - हमें विशेषाधिकार का भाव (गुरुगिरि का भाव, होलियर देन दाऊ का भाव ) अवश्य त्याग देना होगा, तभी धर्म आएगा। उसके पूर्व तो तुममें धर्म का लेश भी नहीं है !'
अन्य लोगों की अपेक्षा मैं अधिक पवित्र हूँ '- यह भाव उन सबसे अधिक भयावह है, जिनका प्रवेश कभी मानव के हृदय में हो सकता है। तुम, भला किस अर्थ में (nda,bda,pda,kjn,smdgpta आदि से) अधिक पवित्र हो? तुम्हारे अन्दर जो परमात्मा है, वही परमात्मा सबमें है। यदि तुमने यह न जाना, तो कुछ न जाना। भेद कैसे हो सकता है ? यह सब तो एक है। प्रत्येक प्राणी प्रभु का सर्वोच्च मन्दिर है। यदि तुम सभी मनुष्यों के हृदय में विराजमान उसे देख सके तो ठीक है, यदि नहीं देख सके, तो तुममें आध्यात्मिकता अभी तक नहीं आयी।"९/१०६  (तब तुम उच्च-स्तर की समाजसेवा , आध्यात्मिक दृष्टि खोलने की सेवा का प्रशिक्षण देने का नेतृत्व कैसे करोगे? लीडरशिप ट्रेनिंग क्लास कैसे लोगे   ?) '
" जब हम समत्व (समदर्शिता) की अद्भुत स्थिति में पहुँच जायेंगे अर्थात साम्यभाव (आत्मसाक्षात्कार के बाद) प्राप्त कर लेंगे,तब उन सभी वस्तुओं पर हमें हँसी आयेगी, जिन्हें हम दुखों और अशुभों का कारण समझते आ रहे थे। 'सुख-दुःख में सम,जय-पराजय में सम' --इस प्रकार की (डी -हिप्नोटाइज्ड) मनःस्थिति मुक्तावस्था के निकट तो है, किन्तु मन आसानी से नहीं जीता जा सकता। मान-अपमान, की प्रत्येक छोटी सी घटना उपस्थित होते ही, जो मन तरंगायित होने लगते हैं, उनकी दशा भला क्या होगी ? मन की यह अस्थिर दशा बदलनी ही होगी। ..... जब दुनिया की सारी शक्तियों को (kjn-pda-sdasgpta-bida-enda को) हम अपना सन्तुलन (poise) बिगाड़ने से रोकने में सफल हो जायें तभी हम मुक्त हैं, उसके पूर्व नहीं !! यही उद्धार है। वह इसी जन्म में, इसी क्षण में है, अन्यत्र नहीं ! (९/१०३) ]
स्वामी विवेकानन्द के मन में स्वाधीनता की परिकल्पना बहुत व्यापक थी। वे सम्पूर्ण मानव जाति के लिये राजनैतिक, सामाजिक, बौद्धिक, आध्यात्मिक स्वाधीनता उपलब्ध करना चाहते थे। इसीलिये १९२९ ई ० में हुगली जिला छात्र सम्मेलन के अध्यक्षीय भाषण में नेताजी सुभाषचन्द्र बोस ने कहा था- " राममोहन के युग से लेकर विभिन्न आंदोलनों के माध्यम से भारत की स्वाधीनता प्राप्त करने की आकांक्षा क्रमशः प्रकटित होती आ रही है। उन्नीसवीं शताब्दी में यह आकांक्षा विचार-जगत और समाज के भीतर दिखाई दिया था, किन्तु राष्ट्रिय क्षेत्र में उस समय भी दिखाई नहीं दिया था- क्योंकि उस समय भी भारतवासी पराधीनता के मोहनिद्रा में निमग्न होकर ऐसा समझते थे कि अंग्रजों का भारत पर विजय प्राप्त करना 'divine dispensation' या ईश्वरीय विधान है। 
उन्नीसवीं शताब्दी के अंत में एवं बीसवीं शताब्दी के आरंभ में स्वाधीनता के अखण्ड रूप का आभास रामकृष्ण-विवेकानन्द की विचार धारा में प्राप्त होता है। Freedom, freedom is the song of the soul - यह सन्देश जब स्वामीजी के हृदय के बन्द दरवाजे को भेदन करके प्रकट हुआ उस समय वह समग्र देशवासी को मंत्रमुग्ध और उत्साहित बना दिया था। उनकी साधना (जीवन-गठन) के माध्यम से, आचरण के माध्यम से एवं व्याख्यानों के माध्यम से यही सत्य प्रकट हुआ था। स्वामी विवेकानन्द जहाँ " एक ओर मनुष्य को समस्त प्रकार के बन्धनों से स्वाधीन होकर यथार्थ मनुष्य बनने का आह्वान करते हैं, तथा दूसरी ओर सर्वधर्म समन्वय के प्रचार द्वारा भारत की राष्ट्रीयता की बुनियाद को भी स्थापित कर देते हैं। "
इसीलिये बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में Sedition Committee या ' राजद्रोह जाँच समीति ' के रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत के क्रांतिकारियों को कोर्स के रूप में मैजनी, गैरीबाल्डी की जीवनी के साथ भगवदगीता और विवेकानन्द साहित्य पढ़ाये जाते थे। तात्कालीन बंगाल के राज्यपाल रोनाल्ड ने क्रांतिकारी हरिकुमार से ढाका के जेल में पूछा था - " क्या आप कहीं विवेकानन्द के अनुयायी और वेदान्ती तो नहीं हैं ?
 विपिन चन्द्र पाल विवेकानन्द को ' राष्ट्रवाद के प्रवक्ता ' कहते थे। दूसरे लोग उनको 'भारत का रूशो ' के नाम से संबोधित करते थे। अरविन्द ने लिखा था, " दक्षिणेश्वर की मिट्टी से डायनामाईट का निर्माण हुआ था।" शायद इसीलिये 'ग्रे-स्ट्रीट' के निवास में जब अरविन्द को बम बनाने के मुकदमे में गिरफ्तार किया गया था, उस समय तलाशी में पुलिस को वहाँ से केवल एक ही सन्देहास्पद पुड़िया प्राप्त हुई थी। उनलोगों को लगा कि उसमें कोई बिस्फोटक पदार्थ रखा हुआ है। अरविन्द ने हँसी करके बाद में लिखा था, " पुलिस का सन्देह गलत नहीं था, क्योंकि पुड़िया बांध कर ताखे में जो रखा हुआ था, वह वास्तव में बिस्फोटक पदार्थ तो था ही। क्योंकि उसमें दक्षिणेश्वर की थोड़ी सी मिट्टी रखी हुई थी।" 
ये सब इसीलिये संभव हो सका था, कि स्वामी विवेकानन्द के भीतर इस विशेषाधिकार उन्मूलन करने सक्षम अध्यात्मिक-क्रांति का बीज (निर्विकल्प-समाधी जन्य विवेकज ज्ञान-बीज) सन्निहित था !  इसीलिये  विवेकानन्द ने आह्वान किया था- "लाखों स्त्री-पुरुष पवित्रता के अग्निमन्त्र से दीक्षित होकर, भगवान के प्रति अटल विश्वास से शक्तिमान बनकर और गरीबों, पतितों तथा पददलितों के प्रति सहानुभूति से सिंह के समान साहसी बनकर इस सम्पूर्ण भारत देश में सर्वत्र उद्धार के सन्देश का, सेवा के सन्देश का, सामाजिक उत्थान के सन्देश का, समानता (विशेषाधिकार उन्मूलन) के सन्देश का प्रचार करते हुए विचरण करेंगे। " पत्रावली 
[हे नर-नारियों! उठो,  आत्मा के सम्बंध में जाग्रत होओ, सत्य में विश्वास करने का साहस करो, सत्य के अभ्यास का साहस करो। संसार को कई सौ साहसी नर-नारियों की आवश्यकता है। अपाने में वह साहस लाओ, जो सत्य को जान सके, जो जीवन में निहित सत्य को दिखा सके, जो मृत्यु से न डरे, प्रत्युत उसका स्वागत करे, जो मनुष्य को यह ज्ञान करा दे कि वह आत्मा है और सारे जगत में ऐसी कोई भी वस्तु नहीं है, जो उसका विनाश कर सके। " 2/18] उठो जागो ! क्योंकि तुम्हारी मातृभूमि इसी महाबली की प्रार्थना कर रही है।
[स्वामी विवेकानन्द कहते हैं, " अनेक लडकों की आवश्यकता है, जो सब कुछ छोड़-छाड़ कर देश के लिये जीवनोत्सर्ग करें। पहले उनके जीवन का निर्माण करना होगा, तब कहीं काम होगा।   हमें इस अवसर पर मुख्यतः आवश्यकता है एक ' वीर ' (पूज्य नवनी दा ) को अपना आदर्श या ' रोल मॉडल ' के रूप में ग्रहण करने की - ऐसा वीर जिसके सिर से लेकर पैर तक नस नस में प्रचण्ड ' रजस ' की भावना से ओतप्रोत हो- ऐसा वीर जो सत्य को जानने के लिये समुद्र में कूद पड़े और प्राणों तक का मोह न करे-वह वीर जिसका कवच त्याग हो और खड्ग ज्ञान। हमें इस समय जीवन के युद्ध क्षेत्र में आवश्यक है बहादुर सेनानी का जोश, न की प्रणय में दीवाने व्यक्ति की भावुकता जो जीवन में सब्ज-बाग ही देखता रहता है। " (वि0 के संग में- 256]
किन्तु इस अध्यात्मिक क्रांति का मार्ग छुरे की तीक्ष्ण धार पर चलने के समान दुर्गम है। यदि भारत के युवा लोग व्यवस्था में परिवर्तन लाना चाहते हों, तथा समाज से गन्दगी को दूर करने के लिये दृढ़ संकल्प हों, तथा इस नई आध्यात्मिक-क्रांति से प्रेम करने का साहस (कच्चे मैं को जीतेजी मरते देखने का साहस) रखें, तब उन्हें अपनी मानवीय सम्भावना का विकास और अभिव्यक्ति के लिये आंतरिक प्रेरणा (ब्रह्म को जानने की तीव्र व्याकुलता) प्राप्त करनी होगी। इस मार्ग पर चलने का एकमात्र संबल है, विवेकानन्द निर्देशित 'मनुष्यत्व -उन्मेषक और चरित्र निर्माणकारी शिक्षा।' चरित्र-निर्माण ही इस क्रांति  का एकमात्र हथियार है; और इस आध्यात्मिक-क्रन्तिकारी को पूरी निर्दयता के साथ उस क्रांति की चोट दूसरों पर नहीं अपने आप पर करना होगा। वे लोग यदि अपने चरित्र में क्रांतिकारी परिवर्तन ला सकें, तभी उनके द्वारा समाज में परिवर्तन लाना संभव होगा। अन्यथा जड़वादी इन्कलाब का भोथरा तलवार निष्फल होकर किसी न किसी दिन वापस लौट आएगा। जो लोग त्याग और सेवा के माध्यम से अपना चरित्र गठन करते हैं, केवल वैसे ही लोग ' अध्यात्मिक क्रांति की पताका ' (महामण्डल का वज्रांकित ध्वज) के नीचे एकत्र हो सकते हैं। आज भारत को जिस चीज की घोर आवश्यकता है, वह है चरित्र ! चरित्र-निर्माण आंदोलन ही समाज के पतन और वैषम्य को दूर कर सकता है। विशेषाधिकार और शोषण को समाप्त कर सकता है। समानता और न्याय तथा परस्पर सौहार्द को स्थापित कर सकता है। 
[" पहले सब संकीर्ण धारणाओं का त्याग करो, और हर व्यक्ति में ईश्वर का दर्शन करो--वे सब हाथों से काम कर रहे हैं, सब पैरों से चल रहे हैं, सब मुखों से भोजन कर रहे हैं ! हर व्यक्ति में वे निवास करते हैं, सब मनों से वे सोचते हैं। वे हमसे भी हमारे अधिक निकटवर्ती हैं। इसे जानना ही धर्म है --यही विश्वास है; प्रभु हमें ऐसा दृढ़ विश्वास प्रदान करें !
जब हम समग्र संसार से एकत्व का अनुभव करेंगे, तब हम भौतिक दृष्टि से देखने पर भी अमर हो जायेंगे ! जब तक एक भी व्यक्ति इस संसार में श्वास ले रहा है, मैं उसके भीतर जीवित हूँ !! मैं यह संकीर्ण क्षुद्र व्यष्टि जीव नहीं हूँ, मैं समष्टिस्वरूप हूँ । मैं ही बुद्ध, ईसा और मुहम्मद की आत्मा हूँ ! मैं सब आचार्य गणों की आत्मा हूँ। मैं सर्वमय हूँ !!! अतएव उठो --यही श्रेष्ठ पूजा है। तुम स्वयं समग्र जगत के साथ अभिन्न हो !
यही यथार्थ विनय है- घुटने टेक कर ' मैं पापी हूँ , मैं पापी हूँ '( मैली चादर ओढ़कर कैसे द्वार तुम्हारे आऊँ ?)---कहकर आजीवन रुदन करते रहने का नाम विनय नहीं है समस्त जगत का एकत्व -यही श्रेष्ठ धर्ममत है । मैं अमुक हूँ ----व्यक्ति विशेष -यह बहुत ही संकीर्ण भाव है , यथार्थ 'अहम्' (पक्का मैं) के लिये यह  सत्य नहीं है!! मैं विश्वव्यापक हूँ ----इस धारणा में प्रतिष्ठित हो जाओ;  ......किन्तु इस महान धारणा में सदैव प्रतिष्ठित बने रहना कितना कठिन है !!! 
मैं 'दृष्टि को ब्रह्ममयी बनाकर जगत को ब्रह्ममय अनुभव करने ' के लिए दार्शनिक विचार करता हूँ, कितनी बातें करता हूँ (कैम्प में सिंहशावक हरि की कथा सुनाता हूँ !) इतने में मेरे प्रतिकूल कोई घटना होती है (कोई अपना गुरु -भाई ही ईर्ष्यालु होकर मेरे ब्रह्मज्ञान की बातें और मेरे अतीत के व्यावहारिक जीवन पर कुछ कहता है )-------- मैं अनजाने ही क्रुद्ध हो उठता हूँ (?) भूल जाता हूँ कि ----इस विश्व में मेरे इस क्षुद्र ससीम (नाम-रूप) के नश्वर अस्तित्व से भिन्न मेरा यथार्थ अविनाशि स्वरूप भी है ! मैं कहना भूल जाता हूँ कि "मैं चैतन्य स्वरूप हूँ ," मैं भूल जाता हूँ कि यह सब (kjn-pda-sdgpta) मेरी ही लीला है; मैं ईश्वर को भूल जाता हूँ, मैं मुक्ति की बात भी भूल जाता हूँ । {गीता ९/११  में भगवान् कहते हैं, 
अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम्।
परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम्।।
 अवजानन्ति disregard? माम् Me? मूढाः fools? मानुषीम् human? तनुम् form? आश्रितम् assumed? परम् higher? भावम् state or nature? अजानन्तः not knowing? मम My? भूतमहेश्वरम्/ मूढ़लोग मेरे अवतार (आध्यात्मिक क्रांति के बाद पुनः शरीर में लौट आने) के तत्त्व को न जानकर मुझको भी अन्य साधारण मनुष्यों की तरह ही शरीर-मन के आश्रित (शरण) मानते हैं। अर्थात् उनको होना तो चाहिये मेरे (आत्मा ) की शरण में, पर मानते हैं मेरे को मनुष्य-शरीर के शरण में देखते हैं, तो वे मेरे शरण कैसे होंगे? हो ही नहीं सकते। यही बात भगवान्ने सातवें अध्यायमें कही है कि बुद्धिहीन लोग मेरे(आत्मा के)अज-अविनाशी परम-भाव को न जानते हुए मुझको भी साधारण मनुष्य ही मानते हैं (गीता7। 24 -- 25)। इसलिये वे मेरे शरण न होकर देवताओं के (साईंबाबा के) शरण होते हैं (गीता 7। 20)।]
‘‘मूढ़ लोग मानुषी तन में निवास कर रहे मुझको (आत्मा को), समग्र भूतों के महान् ईश्वर को तुच्छ समझकर तिरस्कृत करते हैं; क्योंकि वे मेरे सर्वलोक महेश्वर परमभाव को नहीं जानते (अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम् ....)।’’ इन विचारों को सामने रखकर यदि हम भगवान् के दिव्य जन्म और दिव्य कर्म के मर्म को समझ सकें, तो ठीक रहेगा।
" प्रश्न पूछा जाता है - विश्व की उत्पत्ति किससे होती है, किसमें उसकी स्थिति है और फिर किस में वह लय होता है ? और उत्तर है --- प्रेम से उसकी उत्पत्ति होती है, प्रेम में वह स्थित होता है और प्रेम में ही लीन हो जाता है। " ९/९९ " जिन्हें हम सिद्धियाँ, प्रकृति के रहस्य और शक्ति कहते हैं, वे सब भीतर विद्यमान हैं। प्रकृति में कोई ज्ञान नहीं; मानव की आत्मा से समस्त ज्ञान उदभुत होता है। मनुष्य ज्ञान व्यक्त करता है, अपने भीतर ही वह उसका आविष्कार करता है, जो पहले से -शाश्वत काल से विद्यमान है। प्रत्येक व्यक्ति चितस्वरुप है, प्रत्येक व्यक्ति आनन्दस्वरूप और सतस्वरुप है!! (---प्रत्येक व्यक्ति अव्यक्त रूप में सच्चिदानन्द ही है !!)।  
विद्याविनयसंपन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि।
           शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः।।5.18।। 
सचमुच वही ऋषि और पण्डित (नेता) है, जो विद्या तथा विनय से युक्त ब्राह्मण, गाय, हाथी, कुत्ते और चाण्डाल में समदृष्टि रखता है। ९/१०२ [ ब्राह्मण होनेसे वह जातिसे तो ऊँचा है ही साथहीसाथ विद्या और विनयसे भी सम्पन्न है यह ब्राह्मणत्वकी पूर्णता है। जहाँ पूर्णता होती है वहाँ अभिमान नहीं रहता। अभिमान वहीं रहता है जहाँ पूर्णता नहीं होती। ब्राह्मण और चाण्डाल में तथा गाय हाथी एवं कुत्ते में व्यवहार की विषमता अनिवार्य है। इन पाँचों प्राणियोंका उदाहरण देकर भगवान् यह कह रहे हैं कि इनमें व्यवहार की समता सम्भव न होने पर भी तत्त्वतः सब में एक ही परमात्मतत्त्व परिपूर्ण है। महापुरुषोंकी दृष्टि उस परमात्मतत्त्व पर ही सदा सर्वदा रहती है। इसलिये उनकी दृष्टि कभी विषम नहीं होती।
इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः।
निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद्ब्रह्मणि ते स्थिताः।।5.19।।
जिसका अन्तःकरण (मन) समदर्शित्व (समता) में अर्थात सब भूतों में अन्तर्निहित दिव्यता में समभाव से निश्चलतापूर्वक स्थित हो गया है; उसने जीवित अवस्था में ही जन्म (जन्म-जरा-मृत्यु के नियम) को जीत लिया है। और क्योंकि वह ब्रह्म निर्दोष है, इसलिए जो समदर्शी एवं निर्दोष हैं, वे ब्रह्म में ही स्थित कहे जाते हैं ! 
" चाहे हम कितना भी प्रयत्न क्यों न करें, सब मनुष्य एक से कभी नहीं हो सकते। मनुष्य जन्म से ही भिन्न-भिन्न होंगे ; कुछ में अन्य की अपेक्षा अधिक सामर्थ्य होगा, कुछ में स्वाभाविक क्षमता होगी, दूसरों में नहीं; कुछ के शरीर पूर्ण विकसित होंगे, और दूसरों के नहीं। हम इसे कभी रोक नहीं सकते। फिर जगतगुरु श्रीकृष्ण कहते हैं -
समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम्।
न हिनस्त्यात्मनाऽऽत्मानं ततो याति परां गतिम्।।13.29।।
एक ही ईश्वर को सबमें समभाव से देखने वाला मनीषी पुरुष या समदर्शी पुरुष आत्मा से आत्मा की हिंसा नहीं करता, और इस प्रकार परमगति को प्राप्त करता है ।
 वह फिर अपनी हत्या नहीं करता अर्थात् जन्ममरणके चक्करमें नहीं जाता ।  वास्तवमें नाशवान् शरीरके साथ तादात्म्य करना ही अपनी हत्या करना है? अपना पतन करना है? अपनेआपको जन्ममरणमें ले जाना है।ततो याति परां गतिम् -- शरीरके साथ तादात्म्य करके जो ऊँचनीच योनियोंमें भटकता था? बारबार जन्मतामरता था? वह जब परमात्माके साथ अपनी अभिन्नताका अनुभव कर लेता है? तब वह परमगतिको अर्थात् नित्यप्राप्त परमात्मा को प्राप्त हो जाता है। 
हम इसे अस्वीकार नहीं कर सकते यही यथार्थ भाव है, फिर भी इसी के साथ यह कठिनाई उपस्थित होती है कि बाह्य रूपों तथा अवस्था में कभी साम्य प्राप्त नहीं हो सकता। यह स्वयंसिद्ध तथ्य है कि अन्य लोगों की अपेक्षा कुछ लोगों में शारीरक बल अधिक होगा, और वे निर्बल को आसानी से दबा देंगे या परास्त कर देंगे। परन्तु हमारा कानून ऐसा नही कहता। कठिनाई यह नहीं है कि कोई जनसमूह (जातिविशेष ) किसी अन्य जनसमूह से स्वाभाविक तौर से अधिक मेघावी क्यों है ? परन्तु क्या जिस जनसमूह को बौद्धिक सुविधाएँ प्राप्त हैं, उसे उन लोगों के शारीरिक सुख-भोग भी छीन लेने का अधिकार है, जिनको वे सुविधाएँ प्राप्त नहीं हैं ? संघर्ष है इसी विशेषाधिकार के उन्मूलन का। सारे संसार के समक्ष वास्तव में यही कार्य है !
बाहरसे देखनेपर महापुरुष (नेता ) और साधारण पुरुष में खाना-पीना चलना-फिरना आदि व्यवहार एक सा ही दीखता है,किन्तु महापुरुषों के अन्तःकरण में निरन्तर समता निर्दोषता शान्ति आदि रहती है और साधारण पुरुषों के अन्तःकरण में विषमता दोष अशान्ति आदि रहती है। ऐसे ही जिनके मनबुद्धि पर मान-अपमान निन्दा-स्तुति सुख-दुःख आदि का कोई असर नहीं पड़ता, उनकी स्वरूप में स्वाभाविक स्थिति अवश्य होती है। कारण कि स्वरूपमें स्वाभाविक स्थितिके बिना मनबुद्धिमें अटल और एकरस समता का (poise) रहना सम्भव ही नहीं है। महापुरुषों के अन्तःकरण में असत् का  महत्त्व न रहने से उन पर असत् का  कोई प्रभाव नहीं पड़ता। असत् का  कोई प्रभाव न पड़नेसे उनका अन्तःकरण निर्दोष और सम हो जाता है। निर्दोष और सम होनेसे उनकी परमात्मतत्त्व में स्वतः स्वाभाविक स्थिति हो जाती है जो कि पहले से ही है। जैसे जहाँ धुआँ है वहाँ अग्नि अवश्य है क्योंकि अग्निके बिना धुआँ सम्भव ही नहीं ऐसे ही जिनके अन्तःकरणमें समता (poise) है वे अवश्य ही परमात्मतत्त्व में स्थित हैं क्योंकि परमात्मतत्त्व में स्थिति हुए बिना पूर्ण समता (अविचलता ) आनी सम्भव ही नहीं। वेदान्ती नैतिकता का यही सारांश है --सबके प्रति साम्य का भाव या समदर्शित्व ! अपने को शुद्ध कर लो और संसार का विशुद्ध होना अवश्यम्भावी है। " ९/१०२
स्वामी विवेकानन्द ने १ फरवरी,१८९५ को कुमारी मेरी हेल को लिखे पत्र में कहा था - "आइ डु नॉट बिलीव इन हूमिलिटी, ई बिलीव इन समदर्शित्व —मैं झूठी विनयशीलता में विश्वास नहीं करता, मैं समदर्शित्व में विश्वास रखता हूँ -अर्थात सबके प्रति सम-भाव। साधारण मनुष्यों का धर्म है, समाज को ही ईश्वर मानकर उसकी आज्ञा का पालन करना,'बट द चिल्ड्रेन ऑफ़ लाइट नेवर डू सो' -- किन्तु जो परब्रह्म के अवतार श्रीरामकृष्ण परमहंस की सन्तानें हैं, वे ऐसा कभी नहीं करते। यह एक अटल नियम है। एक व्यक्ति सामाजिक विचारों के अनुरूप अपने को ढाल लेता है, दूसरा एकाकी खड़ा रहता है और समाज को अपनी ओर खीँच लेता है। परन्तु लोकमत के उपासकों का एक क्षण में विनाश होता है और सत्य की सन्तान सदा जीवित रहती है। " ३/३७८
" इस जगत में या अन्य किसी जगत में मेरे लिए कोई कार्य नहीं है। मेरे पास एक सन्देश है, वह मैं अपने ढंग से ही दूँगा। मैं अपने सन्देश को न हिन्दू धर्म, न ईसाई धर्म, न संसार के किसी और धर्म के साँचे में ढालूँगा। बस, मैं केवल उसे अपने साँचे में ढालूँगा। मुक्ति ही मेरा एकमात्र धर्म है, और जो भी उसमें रुकावट डालेगा, उससे मैं लड़कर या भागकर बचूँगा ! यदि तुम निकल सकती हो,तो इस मूर्खता की जाल से निकलो, जिसे दुनिया कहा जाता है। तभी मैं तुम्हें वास्तव में साहसी और मुक्त कह सकूँगा।" ३/३८०]
आज भारत की स्वाधीनता का 27 वर्षों बाद (यह लेख 1974 में  प्रकाशित हुआ था) टायनबी उल्लेखित पुराने ढंग की (हिप्पी) क्रांति का प्रयोजन समाप्त हो गया है। आज आवश्यकता है एक नये ढंग की क्रांति की। अपने संयमित उत्तेजनाहीन जीवन को गढ़ते हुए- देश को गढना; अराजक विभत्सता में मर जाने से भी कठिनतर है ! ' मृत्यु हो जाने तक, यह जीवन (नवनी दा का?) दुःख की तपस्या मात्र है! इस सत्य-पथ पर चलना अत्यन्त कठिन है; किन्तु इसे समझ-बूझ कर ही, मैंने ' कठिनतर ' से प्यार किया है।" 
उपनिषदों ने घोषणा की है - " मुक्ति का पथ उस्तरे की धार की भाँति तीक्ष्ण , दीर्घ और कठिन है, किन्तु हमलोग उस पथ का अवश्य अतिक्रमण करेंगे। क्योंकि मनुष्य तो देवताओं और असुरों से भी श्रेष्ठ है, उनका प्रभु है ! ' उठो, जागो, जब तक उस लक्ष्य पर नहीं पहुँचते , रुको नहीं । '  २/३००

 जीवन में कर्तव्य कठोर हैं,
सुखों के पंख लग गये हैं,

मंजिल दूर, धुँधली सी झिलमिलाती है,
फिर भी अन्धकार को चीरते हुए बढ़ जाओ,

अपनी पूरी शक्ति और सामर्थ्य के साथ !
हे वीरात्मन,तुम्हारे उत्तराधिकारी अवश्य जन्मेंगे,

यह भीड़ सही बातें देर से समझती है,
तो भी चिन्ता न करो, मार्ग-प्रदर्शन करते जाओ।

तुम्हारा साथ वे देंगे, जो दूरदर्शी हैं,
तुम्हारे साथ शक्तियों का स्वामी है,

आशीषों की वर्षा होगी तुम पर,
ओ महात्मन, तुम्हारा सर्वमंगल हो !

"वेदान्ती नैतिकता का यही सारांश है-सबके प्रति साम्य । हम देख चुके हैं कि वह अन्तर्जगत है, जो बाह्य जगत पर शासन करता है। विषयी को परिवर्तित करो, विषय भी परिवर्तित हो जायेगा। स्वयं को शुद्ध कर लो और संसार का विशुद्ध होना अवश्यम्भावी है। लोग बदल जाएँ, तो जगत भी बदल जायेगा। 'हम बदलेंगे युग बदलेगा '- पहले के किसी समय से अधिक आजकल इस एक बात की शिक्षा देने की आवश्यकता है। क्योंकि हमलोग अभी अपने विषय में उतरोत्तर कम और अपने पड़ोसियों के विषय में क्रमशः अधिक व्यस्त होते जा रहे हैं।  यदि हम परिवर्तित होते हैं, तो संसार परिवर्तित हो जायेगा; यदि हम निर्मल हैं, तो संसार निर्मल हो जायेगा। " ९/१०२ (पूज्य नवनी दा के शरीर त्याग देने के बाद)  इस नई क्रांति की रण-गर्जना को अपने हृदय से श्रवण करो- ' उठो उठो, महातरंग आ रहा है '

' जागो वीर ! सदा ही सिर पर काट रहा है चक्कर काल। 
छोड़ो अपने सपने, भय क्यों ? काटो-काटो यह भ्रमजाल ।।

फोड़ो वीणा प्रेमसुधा का पीना छोड़ो, तोड़ो वीर ।
दृढ़ आकर्षण है जिसमें उस नारी-माया की जंजीर।। 

 सदा घोर संग्राम छेड़ना उनकी पूजा के उपचार।
वीर ! डराये कभी न, आये पराजय सौ सौ बार।।

चूर चूर हो स्वार्थ, साध, सब मान, हृदय हो महाश्मशान।
            नाचे उस पर श्यामा, लेकर घन रण में निज भीम कृपाण ।।   ' 9/335
[किन्तु हमारे युग के रूढ़िमुक्त यथार्थ ब्राह्मण पुरोधा का नाम है -श्री नवनीहरन मुखोपाध्याय ! जो न केवल अपने समुदाय (बंगाली ब्राह्मण समुदाय) में एक क्रांतिकारी परिवर्तन लाने के लिये दृढ़ संकल्प थे, बल्कि सम्पूर्ण भारत के युवाओं  के विचार-जगत में एक क्रांतिकारी परिवर्तन लाने के लिए कृतसंकल्प थे। और यही एक नई क्रांति की शुरुआत भी है। This is the beginning of a new revolution. It was the message of Navni Da to the youths of India- to get out of their hypnotized state of mind, and spread the man-making and character building ideas of Swami Vivekananda in every villages of India. उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत, ’'कम आउट फ्रॉम दी हिप्नोटाइज्ड स्टेट ऑफ़ माइंड, फ्रॉम द हर्ड ऑफ़ शिप्स; एंड स्टैंड अलोन लाइक अ लॉयनलाइक अ ट्रू लीडर ऑफ़ मैनकाइंड ! ' " BE AND MAKE " ---महामण्डल का लीडरशिप ट्रेनिंग द्वारा ---मानवजाति के सच्चे मार्गदर्शक 'नेता बनो और बनाओ', ---यही है नवनी दा  के नव-विप्लव का आह्वान !   जिसका सूत्रपात पूज्य नवनीदा ने अपने आदर्श जीवन को एक आदर्श नेता के रूप में गठित करते हुए किया था। उन्होंने आजीवन अपनी शारीरिक, मानसिक, धन-संपत्ति से परिपूर्ण भुवन-भवन में जन्म ग्रहण, अथवा आध्यात्मिक श्रेष्ठता के आधार पर कोई विशेषाधिकार का दावा नहीं किया ! ]  

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बहुत पहले गांधी के जमाने में विश्वविख्यात अंग्रेज इतिहासकार महान प्रो अर्नाल्ड  टायनबी (14 अप्रैल 1889 – 22 अक्टूबर 1975) ने भी लिखा था, ‘‘संसार का इतिहास"---'चैलेंज एण्ड रिस्पांस (चुनौती एवं प्रत्युत्तर) का ही इतिहास' है, इसीसे सभ्यता तथा संस्कृति का जन्म होता है। मानव को सृष्टि के आरंभ से ही चुनौती मिलती रही है एवं वह उसका प्रत्युत्तर देता रहा है। तभी तो वह आज तक जीवित है। चुनौती भौतिक भी हो सकती है, सामाजिक भी, आध्यात्मिक भी। जब यह चुनौती उग्र रूप ले लेती है, तो एक संकट का जन्म होता है, तब कहीं कोई दैवीय शक्ति, निस्सहायों की पुकार सुन उनके अंदर से आत्मबल के प्रवाह के रूप में फूट पड़ती है। हम ललकार का उत्तर देते हैं। कोई करुणामय सत्ता आकर हमें संकट से बचा लेती है। यही विश्व का नियम है एवं इसी को गीता ने अवतारवाद व शेष धर्म- संप्रदायों ने पैगंबर कह दिया है।’’ 
अर्नाल्ड टायनबी ने अपनी पुस्तक सरवाइविंग द फ्यूचर में नवजवानों को सलाह देते हुए लिखा है मरते दम तक जवानी के जोश को कायम रखना। उनको यह इसलिये कहना पड़ा क्योंकि जो जोश उनमें भरा जाता है, यौवन के परिपक्व होते ही उन चीजों को भावुकता या जवानी का जोश कहकर भूलने लगते हैं। वे नीति विरोधी काम करने लगते है, गलत और विध्वंसकारी दिशाओं की ओर अग्रसर हो जाते हैं। इसलिये युवकों के लिये जरूरी है कि वे जोश के साथ होश कायम रखे। वे अगर ऐसा कर सके तो भविष्य उनके हाथों संवर सकता है। 
इसीलिये सुकरात को भी नवयुवकों पर पूरा भरोसा था। वे जानते थे कि नवयुवकों का दिमाग उपजाऊ जमीन की तरह होता है। उन्नत विचारों का जो बीज बो दें तो वही उग आता है। एथेंस के शासकों को सुकरात का इसलिए भय था कि वह नवयुवकों के दिमाग में अच्छे विचारों के बीज बोनेे की क्षमता रखता था। आज की युवापीढ़ी में उर्वर दिमागों की कमी नहीं है मगर उनके दिलो दिमाग में विचारों के बीज पल्लवित कराने वालेे सच्चे नेता ( स्वामी विवेकानन्द और नवनी दा जैसे लोग) दिनोंदिन घटते जा रहे हैं। कला, संगीत और साहित्य के क्षेत्र में भी ऐसे कितने लोग हैं, जो नई प्रतिभाओं को उभारने के लिए ईमानदारी से प्रयास करते हैं? हेनरी मिलर ने एक बार कहा था- ‘‘मैं जमीन से उगने वाले हर तिनके को नमन करता हूं। इसी प्रकार मुझे हर नवयुवक में वट वृक्ष बनने की क्षमता नजर आती है।" 
अर्नाल्ड टायनबी का कहना है,आज दुनिया इतनी बेचैन क्यों ह़ै?तनाव क्यों है? भ्रष्टाचार, आतंकवाद......वगैरह-वगैरह क्यों है ? इन सबकी जड़ पश्चिम का भौतिक विकास मॉडल में है। पश्चिम इस संकट से उबरने के लिए पूरब की ओर देखता है. पूरब से आशय है भारत।  भारत की आजादी से पश्चिम को नयी रोशनी मिलेगी।  पाश्चात्य भौतिक ग्रस्त सभ्यता को पूरब से ही नये विचार और जीवनमूल्य मिलेंगे। 
किंतु उनका ऐतिहासिक विश्लेषण मुख्यत: धार्मिक दृष्टि से प्रभावित था, और उन्हें मानव सभ्यता के इतिहास में मनुष्य की ईश्वर की ओर प्रगति दिखाई देती थी।
राष्ट्रीय नव जागरण के पुरोधा स्वामी विवेकानन्द ने इस महाक्रान्ति के विचार बीज बोए थे। इसकी भावी आवश्यकता का प्रतिपादन करते हुए कहा था- राष्ट्र की सबसे पहली आवश्यकता- मनुष्य निर्माण है। मनुष्य होने का परिचय केवल मानवीय कलेवर भर नहीं है। उसमें मानवीय गुणों का समन्वय भी चाहिए। मानवीय गुणों, भावों एवं सम्वेदनाओं से मनुष्य गढ़ने के लिए चरित्र-निर्माण क्रान्ति की कार्यशाला या शिविर की आवश्यकता है। इसी से मनुष्य को अपनी खोयी पहचान मिलेगी। उसका अपनी लुप्तप्राय महिमा और गरिमा से परिचय होगा। 
ऐसे गरिमा सम्पन्न महिमान्वित व्यक्तित्व की प्रचण्ड चेतना धारा में अनेकों नए व्यक्तियों की चेतना परिष्कृत होगी। एक दीपक की लौ दूसरे नए दीपों को जलाएगी। मनुष्यों की मनःस्थिति बदलेगी तो परिस्थितियाँ भी बदलेंगी ही। व्यक्ति ही व्यवस्था का बीज है। व्यक्ति बदलता है- तो व्यवस्था के गुण और मूल्य बदल जाते हैं। मनुष्य-निर्माण क्रान्ति में व्यक्ति और व्यवस्था दोनों के ही परिवर्तन के सूत्र और कार्यक्रम निहित हैं।चरित्र-निर्माण क्रान्ति ही इससे जूझने और उबरने का एक मात्र उपाय है। यही वह ब्रह्मास्त्र है, जिससे मानव की मनःस्थिति बदलेगी। उसकी आस्थाएँ, मान्यताएँ और धारणाएँ बदलेंगी। विश्वास और मूल्य बदलेंगे। व्यक्ति का व्यक्तित्व बदलेगा। यह क्रान्ति लहू और लोहे से नहीं विचारों और भावनाओं से की जा सकेगी। ‘बनो और बनाओ ' BE AND MAKE - ही  इस महाक्रान्ति का ध्येय वाक्य होगा। 
वस्तुतः भगवान् के पार्षद, विभूतियाँ, सिद्धपुरुष, स्वयं भगवान् अवतार लेते हैं। चेतना के अति उच्च शिखर से नीचे आकर मानव रूप में आते हैं। हर अवतार (या सच्चे नेता ) के पीछे महाकरुणा का भाव होता है। महा- करुणा नहीं होती, तो इतने ऊँचे शिखर पर बैठा आदमी नीचे क्यों उतरता और हम सबके जीवन में वैसा ही जीवन जीते हुए क्यों जाता, जो कि सामान्य मनुष्य सारा भोग भोगते हुए जीता है। लोक-शिक्षण के लिए करुणा के अवतार के रूप में धरती पर नेता (स्वयं भगवान्) आते हैं और उन्हें अपनी संतानों के बीच आना, उनका दुःख बाँटना बहुत अच्छा लगता है। श्री रामकृष्ण परमहंस कहा करते थे, ‘‘मैं तो माँ का चपरासी हूँ। माँ की जमींदारी देखने आया हूँ।’’ ईश्वर का अवतार माँ के चपरासी के रूप में, माँ की जमींदारी अर्थात् उनकी सारी संतानों की देखभाल करने के लिए होने की बात श्री रामकृष्ण ने कही है। श्रीरामकृष्ण परमहंस नेता (अवतार) के विषय में कहा करते थे, ‘‘सामान्यजन जिनने बैरागी का चोला तो पहन लिया है, साधु- महात्मा भी कहलाते हैं, सड़ी लकड़ी की तरह हैं, जिस पर एक कौवा भी बैठ जाये तो वह डूब जाती है। सड़ी लकड़ी पानी में बहते- बहते फूल तो जाती है, अटक भी जाती है, स्वयं भी पार नहीं हो पाती। जबकि मानव-जाति के मार्गदर्शक नेता (अवतार) एक बड़े जहाज की तरह है, जो सारी नदी- समुद्र का चक्कर लगाकर कइयों को पार उतारकर आता है।’’जरा- सी सिद्धि आते ही अपने मद में फूलने वालों की तुलना ठाकुर श्री रामकृष्ण ने सड़ी लकड़ी से की है। मानवजाति का मार्गदर्शक नेता (अवतार) कितनी बड़ी शक्ति है, इस उदाहरण से इसलिए समझना जरूरी है कि आज के इस कलियुग में ढेरों अवतार- भगवान् दिखाई देते हैं। एक और उदाहरण रामकृष्ण दिया करते थे, ‘‘नेता -निर्माण की प्रक्रिया (अवतार की प्रक्रिया)  एक जादूगर के खेल की तरह है। वह आता है गाँव में जादू दिखाने, कई गाँठें लगी रस्सी को लेकर। कहता है सभी इसे खोलो। लोग खोल नहीं पाते, और उलझ जाते हैं। जादूगर तब हवा में रस्सी फेंकता है एवं सभी गाँठें खुल जाती हैं।’’ वे कहते थे कि नेता (अवतार भी)  ऐसे ही हमारी जन्म- जन्मांतरों की गाँठों की रस्सियों को लेकर आता है एवं एक क्षण में खोल देता है। गीता में  काम, क्रोध, और लोभ को नरक-रूपी  तीन द्वार कहा गया है।  उनसे बचाकर ऊँचा उठाने का कार्य नेता (अवतार) ही करता है। 
इसीलिए गीता ४/७ में मानव की सबसे बड़ी त्रासदी एवं समाज की सबसे बड़ी दुर्घटना अनाचार का बढ़ना, सज्जनों का घटना बताया गया है व इन सबका उपचार है, नेता (अवतार)  का प्रकटीकरण। 
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
 अभ्युत्थानमधर्मस्य तदाऽऽत्मानं सृजाम्यहम्।।
जब धर्म की हानि और अधर्म का उत्कर्ष होता है तब ईश्वर अवतार लेते हैं। धर्म एक पवित्र सत्य है जिसके पालन से ही समाज धारणा सम्भव होती है। जब बहुसंख्यक लोग धर्म का पालन नहीं करते तब द्विपद-पशुओं के समूह द्वारा (भृतृहरि के चौथे प्रकार के मनुष्यों के द्वारा) यह जगत् जीत लिया जाता है उस समय परस्पर सहयोग और आनन्द से जीवन व्यतीत करते हुये सुखी परिवार दिखाई नहीं देते। मनुष्य को शोभा देने वाला उच्च जीवन भी कहीं दृष्टिगोचर नहीं होता। इतिहास के ऐसे काले युग में कोई महान् व्यक्ति समाज में आकर लोगों के जीवन और नैतिक मूल्यों का स्तर ऊँचा उठाने का प्रयत्न करता है।
समाज में विद्यमान नैतिक मूल्यों को आगे बढ़ाने से ही यह कार्य सम्पादित नहीं होता वरन् साथसाथ दुष्टता का भी नाश अनिवार्य होता है। इस कार्य के लिये अनन्तस्वरूप परमात्मा कभीकभी देहादि उपाधियों को धारण करके पृथ्वी पर प्रगट होते हैं उस बड़ी सम्पत्ति के स्वामी के समान जो कभी-कभी अपनी सम्पत्ति का निरीक्षण करने और उसे सुव्यवस्थित करने के लिये हाथ में अस्त्र आदि लेकर निकलता है। धूप में काम करते श्रमिकों के बीच वह खड़ा रहता है तथापि अपने स्वामित्व को नहीं भूलता
 इसी प्रकार समस्त जगत् के अधिष्ठाता भगवान् शरीर धारण कर र्मत्य मानवों के अनैतिक जीवन के साथ निर्लिप्त रहते हुए उनको अधर्म से बाहर निकालकर धर्म मार्ग पर लाने के लिये सदैव प्रयत्नशील रहते हैं।भगवान् के इस अवतरण में यहाँ एक बात स्पष्ट की गई है कि यद्यपि वे शरीर धारण करते हैं तथापि अपने स्वातन्त्र्य को नहीं खोते। उपाधियों में वे रहते हैं परन्तु उपाधियों के वे दास नहीं बन जाते। किस प्रयोजन के लिये?  यह तो स्पष्ट है कि बिना किसी इच्छा अथवा प्रयोजन के ईश्वर अपने को व्यक्त नहीं करता। इच्छाओं के आत्यन्तिक अभाव का अर्थ है कर्मों का पूर्ण अभाव। 
सब इच्छाओं में सर्वोत्तम दैवी इच्छा है जगत् की निस्वार्थ भाव से सेवा करने की इच्छा किन्तु वह भी एक इच्छा ही है। कर्तव्य पालन करने वाले साधु पुरुषों के रक्षण का कार्य करते हुये अपनी माया का आश्रय लेकर एक और कार्य अवतारी पुरुष को करना होता है वह है दुष्टों का संहार। दुष्टों के संहार से तात्पर्य शब्दश दुष्ट व्यक्तियों के संहार से ही समझना आवश्यक नहीं है उसमें दुष्ट प्रवृत्तियों का नाश अभिप्रेत है। अवतारी पुरुष साधुओं का उत्साह बढ़ाते हैं दुष्टों के स्वभाव को परिवर्तित करने का प्रयत्न करते हैं,किन्तु कभी-कभी दुष्टों का पूर्ण संहार भी आवश्यक हो जाता है। अर्जुन के लिये इतना सब कुछ विस्तार से बताना पड़ा क्योंकि वह श्रीकृष्ण के वास्तविक स्वरूप के विषय में सर्वथा अनभिज्ञ था। [साभार [https://www.gitasupersite.iitk.]
श्री अरविंद कहते हैं, ‘‘भगवान् का अवतरण इसलिए होता है कि मनुष्य और उनके बीच के परदे को फाड़कर दिखाया जा सके, जिस परदे को अपनी प्रकृति में सीमित मनुष्य, जीवन भर उठा तक नहीं पाता।’’श्री अरविंद ने और एक स्थान पर लिखा है, ‘‘अवतार ऐंद्रजालिक जादूगर बनकर नहीं आते, प्रत्युत मानवजाति के मार्गदर्शक नेता और भागवत् मनुष्य के एक दृष्टांत बनकर आते हैं।’’ ‘‘व्यापक शक्तियाँ सूक्ष्म और निराकार होती हैं। उनका कार्यक्षेत्र अदृश्य जगत् है। परब्रह्म श्रीरामकृष्ण की अवतार सत्ता युग असंतुलन को सँभालने- सुधारने के लिए आती हैं। यह कार्य वह उन व्यक्तियों से कराती है, जिनमें दैवीतत्त्वों का चिरसंचित बाहुल्य पाया जाता है।’’ प्रेमस्वरूप मानवजाति का मार्गदर्शक नेता वही होता है-  जो ‘स्व’ का ‘पर’ के लिए समग्र समर्पण कर दें। समर्पण- शरणागति का विसर्जन कर वे आत्मदानी बन जाते हैं।गोस्वामी तुलसी दास अपने ग्रंथ श्रीरामचरित्र मानस में लिखते हैं-
जब-जब होई धरम के हानि। बाढ़हि असुर अधम अभिमानी।।
तब-तब प्रभु धर विविध षरीरा। हरहिं कृपा निधि सज्जन पीरा।। 
तुलसीदास जी कहते हैं - ‘‘जब- जब होहि धरम की हानी, बाढ़हि असुर अधम अभिमानी’’ अर्थात् जब धर्म, कर्मों की हानि होती है असुरों का अभिमान व एकाधिकार बढ़ता है, तब भगवान श्री हरि विष्णु अवतारों को धारण करते हैं।
इस दिव्य अवतरण के दो पहलू हैं, एक है अवतरण, मानवजाति में भगवान् का जन्म लेना, मानव आकृति और प्रकृति में भगवान् का प्रकट होना। दूसरा है आरोहण, भगवान् के भाव में मनुष्य का जन्म ग्रहण, भागवत् चेतना में उसका उत्थान। यह जीव का नवजन्म है, द्वितीय जन्म है। भगवान् का अवतार लेना और धर्म की स्थापना करना इसी नवजन्म के लिए होता है। यह जो दूसरा पहलू है, यही सबसे महत्त्वपूर्ण है ! 
सर्वशक्तिमान भगवान् का जीव- जगत् के कल्याण के लिए मनुष्य देह धारण कर आना, प्रकट होना संसार के आध्यात्मिक इतिहास में एक बहुत बड़ी घटना है। अवतारों के द्वारा धर्म की संस्थापना एक प्रकार से तोरण द्वार बनाना है, जिसके माध्यम से वे स्वयं प्रवेश करते हैं और मनुष्यों के सामने अपना ही द्रष्टांत रखते हैं, अपने आप को ही एकमात्र मार्ग बताते हैं। प्रत्येक अवतार में धर्म- संस्थापन की पद्धति भिन्न- भिन्न प्रकार की होती है। देश, काल और प्रयोजन के अनुसार कार्य की प्रणाली बदल जाती है। अवतार का अर्थ ही होता है, नीचे उतरना। अवतार में दिव्य चैतन्य की अभिव्यक्ति के हमें निरंतर दर्शन होते रहते हैं। अवतार में तो दिव्यसत्ता मानो हमारे समक्ष स्वयं ही प्रत्यक्ष प्रकट हो जाती है।
नादान 'मैं' ने १९९२ के अनुभव के बाद नवनीदा को एक पत्र में लिखा था - ‘‘मैं तो उस आनंद को छोड़ कर पुनः शरीर में आना नहीं चाहता था, पर मुझे किसने धकेल कर नीचे भेज दिया ?"  क्या  माँ मुझसे इस धरती पर अपना कोई विशेष काम करवाना चाहती है ? ’’स्‍वामी विवेकानन्‍द ने कहा है-‘‘अतीत से ही भविष्‍य बनता है। अतः यथासम्‍भव अतीत की ओर देखो, पीछे जो चिरन्‍तन निर्झर बह रहा है, भरपेट उसका जल पिओ और उसके बाद सामने देखो और भारत को उज्‍ज्‍वलतर, महत्‍तर और पहले से अधिक ऊँचा उठाओ।‘‘ 
अतीत गौरव के ज्ञान से हम निश्‍चय ही पहले से भी श्रेष्‍ठ भारत बनाएँगे। हम भारत के गौरवशाली अतीत का जितना ही अध्‍ययन करेंगे, हमारा भविष्‍य उतना ही उज्‍ज्‍वल होगा। हमारे पीछे परम्‍परागत संस्‍कार और हजारों वर्षाें के सत्‌-कर्म हैं, उन्‍हीं से सम्‍बल प्राप्‍त कर वर्तमान सामाजिक व्‍यवस्‍था और भी सुदृढ़ बन सकेगी। हमारे उपनिषदों, पुराणों और अन्‍य सब शास्‍त्रों में जो अपूर्व सत्‍य छिपे हुए हैं, उन्‍हें इन ग्रन्‍थों के पन्‍नों से बाहर निकालकर, मठों की चाहरदीवारियाँ भेदकर, वनों की निर्जनता से निकालकर, कुछ विश्‍ोष सम्‍प्रदायों के हाथ से छीनकर देश में सर्वत्र बिखेर देना होगा, ताकि नयी पीढ़ी उससे सीख लेकर आगे बढ़ सके। आज समय की आवश्‍यकता है भारत के नेतृत्‍व की महत्‍वाकांक्षा रखने वाले प्रत्‍येक व्‍यक्‍ति में हमारे महापुरूषों जैसे महान्‌ त्‍याग, महान्‌ निष्‍ठा तथा महान्‌ धैर्य के भाव को भर देने की, ताकि स्‍वार्थगंध-रहित शुद्ध बुद्धि की सहायता से राष्‍ट्रोत्‍थान के महान्‌ उद्यम में वे जुट सकें।
विवेकानन्‍द का ज्‍वलंत प्रश्‍न है-‘‘क्‍या भारत मर जाएगा?........ तब तो संसार से सारी आध्‍यात्‍मिकता का समूल नाश हो जाएगा। सारे सदाचारपूर्ण आदर्श जीवन का विनाश हो जाएगा, धर्माें के प्रति सारी मधुर सहानुभूति नष्‍ट हो जाएगी, सारी भावुकता का भी लोप हो जाएगा और उसके स्‍थान पर कामरूपी देव और विलासिता-रूपी देवी राज करेंगे। धन उनका पुरोहित होगा। छल, पाशविक बल और स्‍पर्धा - ये ही उनकी पूजा-पद्धति होगी और मानवात्‍मा उनकी बलि-सामग्री हो जाएगी। ऐसा कभी नहीं हो सकता। क्रियाशक्‍ति की अपेक्षा सहनशक्‍ति कई गुना प्रबल होती है। घृणा के बल से प्रेम का बल अनन्‍त गुना सबल है।‘‘ निश्‍चित रूप से इस संसार से सत्‍य, नैतिकता और मानवीयता को यदि बचाये रखना है तो भारत और उसकी आध्‍यात्‍मिकता को जीवित रखना ही होगा। जीवन-मूल्‍य समाप्‍त हो गये तो फिर यह संसार भी समाप्‍त ही हो जाएगा। इसलिए आने वाले इस युग का केन्‍द्र विश्‍व में यदि कोई हो सकता है तो वह है - भारत। ‘अतीत तो हमारा गौरवमय था ही, परन्‍तु मेरा द्‌ढ़ विश्‍वास है कि हमारा भविष्‍य और भी अधिक गौरवमय होगा।‘ भारत का पुनरूत्‍थान होगा, पर जड़ की शक्‍ति से नहीं, वरन्‌ आत्‍मा की शक्‍ति से। यह उत्‍थान विनाश से नहीं, वरन्‌ शान्‍ति और प्रेम की ध्‍वजा लेकर सम्‍पन्‍न होगा। हमारी विजय की गाथा को भारत के महान्‌ सम्राट अशोक ने धर्म तथा आध्‍यात्‍मिकता की ही विजय बताया है। एक बार फिर भारत को विश्‍वविजय करना होगा। यही हमारे सामने महान्‌ आदर्श है। अपनी आध्‍यात्‍मिकता और दार्शनिकता से हमें जगत्‌ को जीतना होगा। संसार में मानवता को जीवित रखने का और कोई उपाय नहीं है। स्‍वामी विवेकानन्‍द के इन ओजस्‍वी संदेशों के माध्‍यम से यह अवश्‍य होगा, इसी में मानव जाति का कल्‍याण है।    

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