Saturday, June 4, 2011

आह्वान का प्रतिउत्तर दो !

भारत के युवाओं, स्वामी विवेकानन्द तुम्हें पुकार रहे हैं, उनके आह्वान का प्रतिउत्तर दो ! किसी अन्य व्यक्ति (क्षद्म-भेषी स्वामी) के आह्वान को सुनकर दिग्भ्रमित मत होना. किसी दूसरी दिशा से आने वाले आह्वान पर ध्यान देने से न तो तुम्हारा कुछ भला होगा और न देश का ही. केवल स्वामीजी के आह्वान को ही अपने ह्रदय में प्रविष्ट होने दो. मोहनिद्रा के व्यामोह से स्वयं को जाग्रत करो, सभी प्रकार की दुर्बलताओं (नाम-यश पाने की वासना को भी) अपने मन से बहार निकाल दो.
अपनी अन्तर्निहित शक्ति (दिव्यता-पवित्रता) को अभिव्यक्त करो तथा महामण्डल द्वारा संचालित " मनुष्य-निर्माणकारी एवं चरित्र-निर्माणकारी " आन्दोलन के पहियों में गति देने हेतु अपने कन्धों को भिड़ा दो. हमें अपनी प्यारी मातृभूमि के लिए अवश्य कार्य करना है. स्मरण रखो कि स्वामीजी अपने देशवासियों और अपनी मातृभूमि को  कितनी सिद्दत के साथ प्रेम करते थे.
मनुष्यों के बीच रहने वाला यह ' नरसिंह ' अपने देश के पीड़ित-वंचित मनुष्यों के लिए आँसू बहाया करते थे. उन्होंने अपने लिए कभी कुछ नहीं चाह था- वे अपने लिए सुख और धन तो क्या नाम-यश पाना भी नहीं चाहते थे. वे मानवमात्र को प्यार करते थे तथा चाहेथे कि सभी मनुष्य " यथार्थ मनुष्य " बने, अपने पैरों पर खड़ा होना सीखे, आत्मविश्वासी और साहसी बने,  निर्भय होकर अपनी महिमा में प्रतिष्ठित हो जाय; ताकि आवश्यकता पड़ने पर सार्वलौकिक कल्याण के लिए अपना सबकुछ  न्योछावर कर सके. 
हमारा यह पावन कर्तव्य है कि हम इस देश के प्रत्येक व्यक्ति के उन्नति के लिए समर्पित होकर कार्य करें. वस्तुतः यही हमारा नियत कर्म है। हम अपने लिए न तो मुक्ति की कामना करते हैं, न ही हमे ईश्वर के पास पहुँचने की कोई जल्दी है। क्योंकि ईश्वर न तो स्वर्ग में निवास करते हैं, और न ही वे किसी विशेष मन्दिर-मस्जिद, चर्च या गुरूद्वारे में कैद हैं। वे न तो जंगलों में प्राप्त हो सकते हैं, और न किसी पर्वत की गुफा में ही मिल सकते हैं। वे सर्वव्यापक हैं, प्रत्येक जीव में निवास करते हैं, प्रत्येक ' मानव-शारीर ', ही ईश्वर का एक ' मन्दिर '  है। 
और यदि स्वामीजी की भाषा में कहा जाय तो प्रत्येक ' मानव-शरीर ' समस्त  " मन्दिरों का ताजमहल " है ! उन्होंने हमें आदेश दिया है कि हमलोग वहीँ( मानव-देह रूपी देवालय में ही ) उनकी उपासना करें. और जरा रुक कर हमलोग यह विचार तो करें, कि ईश्वर का यह चलता-फिरता मन्दिर, यह मनुष्य; कितने दुःख-कष्टों के बीच अपना जीवन बिता रहा है, केवल अज्ञान के कारण इस जगत के असंख्य बन्धनों में जकड़ा हुआ है.  
उन्हें कैसे मुक्त कराया जाय, उनको अपनी अन्तर्निहित अनन्तशक्ति के प्रति पुर्णतः जाग्रत कैसे कराया जाय ? स्वामीजी इसका अत्यन्त सरल किन्तु सटीक विश्लेषण करते हुए घोषणा करते हैं-" एक एक व्यक्ति को मिलाने से समाज बनता है, इसीलिए यदि आप एक एक व्यक्ति कोअपना जीवन-गठन करने में सहायता कर रहे हैं,
तो आप वस्तुतः सम्पूर्ण देश को जाग्रत कर रहे हैं.राष्ट्र-निर्माण का उपाय केवल " यथार्थ मनुष्यों " का निर्माण करना है.प्रत्येक व्यक्ति का जीवन यथार्थ रूप में विकसित करने के लिएकार्य करते रहना ही देश कि सर्वोच्च सेवा है."  " Society comprises of individuals; therefore,if you take care of the individual,you actually awaken the whole nation.the way to nation-building is only through the making of real men.The work for the proper development of each individual is the truest service to the nation."
स्वामीजी द्वारा प्रदत्त राष्ट्र-निर्माण सूत्र है -" Be and Make " अर्थात तुम स्वयं यथार्थ मनुष्य बनो और दूसरों को भी यथार्थ मनुष्य बनने में सहायता करो ! यह बिलकुल सरल फ़ॉर्मूला है। यदि हम समाज का कल्याण करना कहते हों तो हमें व्यक्ति-जीवन गठन के ऊपर ही अपना पूरा ध्यान केन्द्रित रखना होगा। आप पूछ सकते हैं कि हमलोग कैसे किसी व्यक्ति का कल्याण कर सकते हैं ?
सामान्य रूप से हम लोग सोंचते हैं कि मनुष्य की सेवा उसके दैनंदिन जीवन की आवश्यकताओं को पूर्ण करके  ही की जाती है। उदहारण के लिए उसकी भौतिक आवश्यकताएँ में भोजन, वस्त्र, आवास, चिकत्सा-सुविधा आदि को ले सकते हैं। निश्चित रूप से सार्वभौमिक रूप से किसी भी समाज में ये ही बुनियादी मानवीय आवश्यकताएँ हैं, इस बात से कोई इन्कार नहीं कर सकता।
किन्तु इन मूलभूत आवश्यकताओं की देखभाल करने के लिए व्यापक सरकारी-तन्त्र है,  तथा कई प्रकार की राष्ट्रीय अन्तर्राष्ट्रीय गैर सरकारी संस्थाएँ N.G. O आदि हैं , जो इस प्रकार के सेवा कार्य में लगी हुई हैं। किन्तु थोड़ी गहराई से विचार-विश्लेषण करने पर यह तथ्य बिलकुल स्पष्ट हो जाता है, कि जब तक हम मनुष्य को
उसके खोये हुए व्यक्तित्व को वापस दिलाने के लिए - मनुष्य-निर्माण और चरित्र-निर्माण के कार्य का देश-व्यापी प्रयत्न नहीं करते, इन भौतिक-प्रावधानों का कितना भी प्रबन्ध क्यों न करा दिया जाय, जनता की मूलभूत
आवश्यकताओं का यथार्थतः समाधान नहीं हो सकता।
इन ६३ वर्षों में भारत को यथेष्ट रूप से इन कड़वी सच्चाईयों का अनुभव हो चूका है कि - भारत की जनता को यथार्थ मनुष्य बनाये बिना या चरित्र गठित किये बिना, वे अपने कल्याण के लिए मिलने वाली इन भौतिक सेवाओं का न तो समुचित लाभ ही उठा सकेंगे, और न ही उन प्रावधानों को सुरक्षित रख पाने में ही समर्थ हो सकेंगे। स्वतन्त्रता प्राप्ति के समय से लेकर विगत ६३ तक इस तरह की परियोजनाओं पर अरबों-खरबों रूपए खर्च किये जा चुके हैं, तब भी आम जनता को अब तक कोई विशेष फायदा नहीं पहुँचा है। (वर्ल्ड हंगर इंडेक्स के अनुसार अब भी भारत में प्रतिवर्ष पचहत्तर हजार मनुष्य भूख और कुपोषण के कारण मर जाते हैं.)
अतः इतने वर्षों के अनुभव से यह बात बिल्कुल स्पष्ट हो जानी चाहिए कि जब तक हम यथार्थ मनुष्यों का निर्माण करने में सफलता नहीं प्राप्त कर लेते, तब तक किसी भी परिमाण में दी जानी वाली भौतिक प्रावधानों से मनुष्यों की सेवा करने में हम सफल नही हो सकते. इसीलिए स्वामी विवेकानन्द की योजना थी कि सम्पूर्ण भारत में - ब्रह्मपुत्र से लेकर सिन्धु तक और कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक,' मनुष्य-निर्माणकारी शिक्षा केन्द्रों ' (Man-Making Education Centers ) का जाल बिछा दिया जाय। तथापि स्वाधीन भारत में अभी तक इस दिशा में, उनके परामर्श को अमल में लाने की कोई भी चेष्टा नहीं की गयी है।
निःसन्देह इतने महत्वपूर्ण कार्य की उपेक्षा के लिए वे लोग ही जिम्मेवार हैं, जो " सत्तापरिवर्तन की प्रक्रिया " (वोट-बैंक की राजनीती) के द्वारा बारी- बारी से सत्ता की कुर्सी को हथियाते रहते हैं। किन्तु आजादी के बाद से किसी भी नेता या दल ने ' मनुष्य-निर्माण और राष्ट्रीय-चरित्र गठन '  करने के लिए ' मनुष्य-निर्माणकारी शिक्षा केन्द्रों ' का प्रारम्भ करने की दिशा में स्वामी विवेकानन्द द्वारा प्रदत्त," व्यवस्था परिवर्तन की प्रक्रिया" की दशा में एक भी कदम आगे नहीं बढ़ाया है। क्योंकि अधिकांश राजनीतिज्ञ स्वार्थपरायण होते हैं- और 'राजनीती' को एक हथियार जैसा अपने उपयोग में लाते हैं। अधिकांश राजनीतिज्ञ राजनीती को एक व्यवसाय मानते हैं, और स्वयं को ' जनता का सेवक ' न मानकर, अपने को ' जन-प्रतिनिधि ' मानते है, और लाल-बत्ती की गाड़ियों में बैठ कर अपना रौब गाँठने तथा केवल अपने क्षुद्र स्वार्थों को पूरा करने के लिए ही राजनीती करते है.
किन्तु इसके लिए समान रूप से हम लोग भी जिम्मेवार हैं, क्योंकि राज्य की व्यवस्था चलाने के लिए हम लोग ही तो उनको वोट देते हैं, और जाति-धर्म के नाम पर ऐसे लोभी-स्वार्थी, अपराधी लोगों को भी सत्ता की कुर्सी - सौंप देते हैं। हमलोग ऐसा इसीलिए करते हैं, क्योंकि हमलोग सही रूप से शिक्षित नहीं हैं। हमलोगों के पास डिग्रियां तो हैं, किन्तु हम सही रूप से शिक्षित नहीं हैं क्योंकि, हमलोगों ने अभी तक अपने सच्चे पुरुषार्थ की शक्ति को अभिव्यक्त नहीं किया है। हमारे चार पुरुषार्थ हैं- धर्म,अर्थ, काम और मोक्ष ! धर्म को जीवन में धारण करके त्याग पूर्वक अर्थ और काम का भोग करते हुए, कैसे चरम उपलब्धी-'मोक्ष' तक को प्राप्त किया जाता है, अपने पूर्वजों की इस विद्या को हमने भुला दिया है। मन को एकाग्र कर के हृदय की वास्तविक शक्ति - प्रेम को अभिव्यक्त करने का तरीका नहीं सीखाया गया है। क्योंकि, अपने बच्चों को हमने यह नहीं सिखाया है कि ऊँचे ओहदों पर बैठने, ऊँची डिग्रियां प्राप्त करने, और पर्याप्त धन अर्जित करना ही सबकुछ नहीं है, हमें अपने देशवासियों से भी सचमुच अपने जैसा ही प्यार करना चाहिये। उसका तरीका सीखना बाकी है, इसीलिए हमलोग इतना दुःख भोग रहे हैं, और हमें इसका दण्ड अवश्य भोगना होगा। 
अतः परिस्थिति की गम्भीरता को समझ कर, बिना और अधिक देरी किये, तत्काल, अपने जीवन और चरित्र को गढने के उद्देश्य से, स्वयं को सही रूप से शिक्षित करने के कार्य में कूद पड़ना चाहिए ! ताकि हमलोग भारत माता और उसके संतानों के प्रति अपने अन्तर्निहित प्रचण्ड प्रेम को प्रकट कर सकें. अरे, हमलोग तो स्वयं से भी सच्चे अर्थों में प्रेम नहीं कर सकते, और इसीलिए हमलोग अपने कल्याण का वास्तविक अर्थ समझ पाने में भी नाकाम हो जाते हैं. अपने अन्तर्निहित इस प्रचण्ड-प्रेम की शक्ति को प्रकट करने तरीका सीखना ही, भारत-निर्माण का प्रथम उचित-कदम होना चाहिए.
यदि हमलोग अकेले ही, इस  कार्य को करने का प्रयास करेंगे, तो वर्तमान में जैसा सामाजिक परिवेश है, वह अतिशीघ्र ही हमारे सारे उत्साह के ज्वार को भाटा में परिणत कर देगा। हमारा सम्पूर्ण प्रयास या उद्दम ही विफलता के रूप समाप्त होने के खतरे में पड़ जायेगा. अतः अनिवार्य रूप से इस कार्य का प्रारम्भ हमें संगठित रीती से, या संगठन बना कर ही करना होगा. इसीलिए स्वामीजी ने कहा था - " ईच्छा-शक्ति के संचय, आपसी तालमेल, जैसा पूर्व में था (देवता लोग एक-मन होकर सारे कार्य करते थे ), पुनः हम सभी भारत-वासियों (देव-देवियों ) को मिल-जुल कर एक ही उद्देश्य, " मनुष्य-निर्माण और चरित्र-गठन " के कार्य पर अपना सारा ध्यान संकेन्द्रित करना होगा !" " संगठित- कार्यवाही की अनिवार्यता " का स्पष्ट रूप से वर्णन करने में स्वामीजी कभी थकते नहीं थे. उन्होंने स्पष्ट रूप से समझया था- 
" No great work can be done without
this Centralization of Individual-forces ! "
 
" इस वैयक्तिक- शक्तियों का केन्द्रीकरण किये बिना
कोई भी महान कार्य सम्पन्न नहीं किया जा सकता है !" 
स्वामी विवेकानन्द के इसी विचार को राष्ट्रव्यापी स्तर पर कार्यान्वित करने के उद्देश्य से १९६७ में ही ' अखिल भारत विवेकानन्द युवा महामण्डल ' की स्थापना हुई थी. विगत ४४ वर्षों से लगातार इस दिशा में प्रयासरत रहने के बावजूद अभीतक बहुत थोड़ी सी सफलता ही हाँसिल हो सकी है. सम्पूर्ण भारत वर्ष में ऐसे हजारों-हजार केंद्र अवश्य बनने चाहिए जहाँ युवाओं को जीवन का अर्थ एवं उद्देश्य को समझने, एवं जीवन-गठन करने की सम्पूर्ण-पद्धति से अवगत होने में सहायता मिल सकती हो.
स्वामीजी के विचारों को व्यावहारिक जीवन में अपनाने और सही ढंग से अपना जीवन गठित करने में युवाओं की सहायता अवश्य करनी चाहिए, ताकि वे अपना जीवन सही ढंग से गठित कर के अपनी समस्त उर्जा को राष्ट्र को सम्पूर्ण- जाग्रत करने के कार्य में नियोजित कर सकें, उन्हें स्वामीजी की योजना - " Be and Make " के कार्य को भारत के द्वार-द्वार तक पहुँचा देने में अवश्य ही सहायता करनी चाहिए.
अतः इस संगठन का प्रधान कार्य है, युवा लोग जहाँ कहीं भी एकत्र होते हों वहीँ पहुँच कर, वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में 'मनुष्य-निर्माणकारी शिक्षा ' के जीवनदायी विचारों से जोड़ कर, इसे बाहर से परिपूर्ण कर देना, जिस शिक्षा को प्राप्त करने से उन्हें विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों के स्तर तक महरूम ही रखा जाता है. विगत ४४ वर्षों से हमलोग इसी दिशा में प्रयासरत हैं. इन वर्षों में हमारे संगठन के ' मनुष्य-निर्माणकारी शिक्षा केन्द्रों ' की संख्या बढती गयी है, हांलाकि इसकी गति धीमी है, फिर भी वर्तमान समय में इस संगठन के २८० से भी अधिक केंद्र भारत के १२ राज्यों में सक्रिय रूप से कार्यरत हैं. 
कुछ युवक गण इस कार्य में योगदान करने हेतु आगे आये हैं, और उन लोगों ने पवित्रता, प्रेम तथा जनमानस की सम्मिलित शक्ति पर श्रद्धा करना सीखा है. युवा प्रशिक्षण शिविरों में लगातार युवाओं की बढती हुई संख्या ने स्वामीजी द्वारा प्रस्तावित चरित्र-निर्माण पद्धति की क्षमता के ऊपर हमारे मन में पूर्ण-विश्वास उत्पन्न कर दिया है. अब हमलोग पूर्ण विश्वास के साथ कह सकते है कि यदि हम केवल उनके विचारों को निष्ठांपूर्वक प्रयोग में लायें तो हम जीवन की अपरिमित सम्भाव्यताओं को प्रकट कर सकते हैं.  
और हमारा यह दृढ विश्वास है कि भारत के पुनर्निर्माण का यही एकमात्र रास्ता है। यदि हम इस परम अनिवार्य कार्य को टाल कर देश के लिए जितनी भी परियोजनाओं को लागु करने का प्रयास करेंगे, वे समस्त योजनायें विफल होने को बाध्य होंगी. ' चरित्र-निर्माणकारी और मनुष्य-निर्माणकारी शिक्षा केन्द्रों ' का आभाव,भ्रष्टाचार, 
आपसी फूट, हिंसा, और दंगे-फसाद को और अधिक बढ़ावा देने वाला सिद्ध होगा.            
 नोट : (यह लेख अखिल भारत विवेकानन्द युवा महामण्डल के द्विभाषी मुखपत्र VIVEK- JIVAN के अक्टूबर २००६ अंक में अंग्रेजी में प्रकाशित, सम्पादकीय का हिन्दी अनुवाद है) 

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