Saturday, July 31, 2010

स्वामी विवेकानन्द की शतवार्षिकी [39] " कर्तव्य निष्ठा "


' रामनाम ' सुनने के लिये वेदान्त मठ जाते रहने से केष्टोदा (महामण्डल के वरिष्ट कर्मी पूजनीय उषादा) के साथ मेरी अच्छी जान-पहचान हो गयी थी. केष्टोदा ने एक दिन कहा, " जानते हैं, स्वामी रंगनाथानान्दजी 
( रामकृष्ण मठ मिशन के १३ वें अध्यक्ष ) दिल्ली से स्थानान्तरित होकर कलकाता के गोलपार्क रामकृष्ण मिशन ईन्सटिटिऊड ऑफ़ कल्चर  में आ गये हैं- और वे बड़े असाधारण वक्ता हैं !"    
मैंने कई लोगों के भाषण सुने हैं, राधाकृष्णन (सर्वपल्ली डाक्टर राधाकृष्णन, भारत के पूर्व राष्ट्रपति ) का भाषण भी सुना है.राधाकृष्णन एवं रंगनाथानान्दजी को एक एक साथ सुना है. उनके जैसा भाषण अपने पूरे जीवन में कभी नहीं सुना है. उनदिनों मेरी यह बिल्कुल आदत  बन गयी थी कि, ऑफिस से निकलने के बाद, जो पण्डित-व्यक्ति (विशिष्ट शिक्षाविद य़ा ज्ञानी-ध्यानी व्यक्ति) होते थे उनका भाषण होने से, उनको सुनने के लिये मैं अवश्य ही पहुँच जाता था.   
मेरी आदत यह भी थी कि, भाषण सुनने के लिये मैं अपने साथ एक डायरी और पेन लेकर जाता था, और उनके भाषण में से चुने हुए अंश को लिख लिया करता था. जब मैंने सुना कि ऐसे एक वक्ता आये हैं, तब तो उनको सुनना ही होगा. एक दिन गोलपार्क चला गया. वहाँ जाने पर देखता हूँ कि, Hall (सभा-भवन) पूरी तरह से ऊपर-नीचे- श्रोताओं से एकदम भरा हुआ है.वे आकार बैठे, बैठने के बाद बोलना प्रारम्भ किये.  उनके चेहरे को देखने से कुछ समझ नहीं सका. रीढ़ की हड्डी बिल्कुल सीधी रख कर बोलते थे. शान्तिवाचन " सहनाववतु, सहनौ भुनक्तु ...." कहते हुए प्रारम्भ किये. उस समय गीता के ऊपर उनका धारावाहिक प्रवचन चल रहा था. थोड़ा सा सुनते ही देखा, अरे वाः! सचमुच ही तो, ये एक बिल्कुल अनोखे वक्ता हैं !  इसके पहले मैंने राधाकृष्णन का भाषण सुना था, रमेशचन्द्र मजुमदार, सुनीति कुमार चटोपाध्याय, जवाहरलाल नेहरु का भाषण सुना था, कलकाता के तो अनेकों वक्ताओं को तो न केवल सुना था, बल्कि उनका स्नेह भी प्राप्त किया था. इनसब में राधाकृष्णन एवं जवाहरलाल नेहरु ये दोनों ही व्यक्ति अंग्रेजी में भाषण देने वाले अदभुत वक्ता थे, उनके अंग्रेजी भाषण को भी सुना था. किन्तु वे जिस तरह बोल रहे थे, वैसा तो कभी सुना नहीं था. मै तो दंग रह गया, साथ-साथ अपनी डायरी में नोट करने लगा.     
भाषण समाप्त हो जाने पर वे धीरे धीरे स्टेज से नीचे उतरे, कई लोग उनको प्रणाम करने लगे. मैं पीछे जाकर, जहाँ से हो कर वे आश्रम में प्रवेश करते, वहीं पर उनके आने की प्रतीक्षा करने लगा. वे बिल्कुल अकेले थे, मैंने प्रणाम किया. मेरे सिर को उठाते ही हँसते हुए उन्होंने पूछा- " What is your name ? "  बतला दिया. " Good, where do you stay ? " बता दिया. उन्होंने कहा, " Do come, do come here." कह कर चले गये.
मैं जाने लगा. एक तरह से रंगनाथानान्दजी के पास प्रतिदिन जाय़ा करता था..एक दिन शाम को उनके पास गया पहुँचा, वे अपने ऑफिस के कमरे में बैठ कर कोई कार्य कर रहे थे, मुझे लगा मानो वे कुछ लिख रहे थे. उनके सामने एक कुर्सी थी, मैं उस पर जाकर बैठ गया. उन्होंने मुँह उठा कर देखा तक नहीं.
वे जो लिख रहे थे उसको लिखते हुए ही बोले- " So; Nabani, what are you going to do now? "
मेरे कुछ कहने के पहले ही कहने लगे- " Certainly you will now choose a subject for a Ph.D ! " 
तो जैसे वे बोल रहे थे,  उन्ही के टोन में, बल्कि थोड़ा जोर देते हुए ही कहा- " Who told you so ? "     
  वे बोले," No,no, its true you never told me that, but Bengalee boys cannot think of anything else. "  फिर मुझे कुछ कहने का अवसर दिये बिना ही बोले, " I say don't do it, do Swamiji's work."  यह सन १९६५ ई०  की बात है. किन्तु बाद में  किसी किसी को Ph.D, य़ा M.Phil करने करने के लिये कहीं कहीं पर बौद्धिक परामर्श अवश्य देना पड़ा है. 
 दूसरी ओर प्रवचन के बाद, अब वे मुझे भी अपने साथ साधु निवास की ओर ले जाने लगे. उनदिनों वहाँ के दक्षिणी गेट (जो अक्सर बन्द ही रहा करता था) के समीप एक छोटे से दोतल्ला मकान में उपरी तल्ले पर बने कुछ छोटे छोटे कमरों में साधु लोग (सन्यासीगण ) निवास करते थे. 
वहीं एक छोटी सी रसोई और भोजन-कक्ष भी था.जो ब्रह्मचारी वहाँ की सारी व्यवस्था देखते थे, उनके पास मुझे लेजाकर बोले- " He is Nabaniharan, he will often come, take care of him." उसके बाद फिर मैं जब कभी भी वहाँ जाता, तो वे मुझे वहाँ बैठा कर कुछ खाने के लिये देते थे, ऐसा अक्सर होता था.
 स्वामी रंगनाथानान्दजी के साथ मेरा परिचय क्रमशः प्रगाढ़ होता चला गया. आत्मीयता बहुत बढ़ जाने के बाद, कहना शुरू किये- " Today don't go home stay with us. "  इसके बाद सन्यासियों के साथ मुझे भी उसी आश्रम में ठहरा देना, संध्या के बाद जब कभी साधु-ब्रह्मचारियों के लिये कोई विशेष अनुष्ठान हुआ करता उसमे भी वे मुझको अपने साथ ले जाना, उनके साथ मिलवाना बातचीत करना यह सब भी चलने लगा.
क्रमशः वहाँ के जो तत्कालीन Assistant Secretary थे- स्वामी भाष्यानन्द जी उनके साथ भी परिचय हुआ.उन्ही दिनों स्वामी विवेकानन्द  की शतवार्षिकी मानाने का अवसर उपस्थित हुआ. तब भाष्यानन्दजी मुझको कहे- " Nabani, you have to stay and work here. "  मैंने कहा " हाँ महाराज, आऊंगा, करूँगा. " उन्होंने कहा- " नहीं, तुमको यहीं पर रहना होगा. "  उस समय आयोजन में कुछ ही दिन बाकी रह गये थे. 
अमेरिका से कुछ प्राचीन सन्यासीगण आये, अन्यान्य जगहों से भी सन्यासी लोग आना शुरू किये. बहुत से सन्यासी वहाँ निवास कर रहे थे. मुझको अपने साथ ले जाकर भाष्यानन्दजी ईन्टरनेशनल गेस्ट हॉउस में रहने के लिये एक कमरा ठीक कर दिये. और वहाँ का किचेन और डाइनिंग के जगह का जो व्यवस्थापक लोग थे, उनसे मेरा परिचय करवाते हुए बोले, " यह यहीं रहेगा, रोज सुबह, शाम, रात्रि में जब भी आयेगा, उस समय जो भी खाने का हो दे देना." परिचय करा कर चले गये. मैं वहीं रहने लगा.  
अब वहाँ पर कार्य शुरू हो गया.  पार्क सर्कस मैदान में जहाँ पर प्रधान अनुष्ठान होने वाला था, एक बहुत विशाल पण्डाल का निर्माण किया गया था. मेरी डिउटी वहीं पर लगायी गयी थी.किन्तु कुछ व्याख्यान कल्चर के ईन्सटिचियुट में भी होते थे. जैसे वहाँ पर मैंने स्वामी निखिलानन्दजी का व्याख्यान सुना है.और स्वामी प्रभवानन्द जी इसीलिये उनके साथ प्रति दिन मेरी थोड़ी बहुत बातचीत हो जाया करती थी. निखिलानन्द जी का भाषण सुना हूँ, उनकी लिखी पुस्तकों को पढ़ा हूँ. विशेष रूप में उनके द्वारा लिखित स्वामी विवेकानन्द की जीवनी मुझे बहुत अच्छी लगती है. इसे तो मैंने उनसे मिलने से पहले ही पढ़ लिया था. क्नितु उनको देखने एवं उनकी बातें सुनकर बहुत आनन्द हुआ.
पार्क सर्कस मयदान में निर्मित जिस बहुत बड़े पण्डाल में इतना विशाल कार्यक्रम इतने दिनों तक चलने वाला था; उसके टिकट काउन्टर को सन्चालित करने का दायित्व मुझे दिया गया था. बहुत सारे टिकट काउन्टर बनाये गये थे, टिकट बिक्री करने के लिये बहुत से लोगों को नियुक्त किया गया था.किन्तु मेरा कार्य था काउन्टर में टिकट देना, बेचे गये टिकटों का हिसाब रखना, बिक्री से आये समस्त रुपये-पैसों को संभाल कर रखना. तथा भाष्यानन्दजी, अनुष्ठान प्रारम्भ होने के पहले ही मुझको प्रति दिन गोलपार्क से अपनी गाड़ी पर लेजा कर वहाँ उतार देते थे, और सब हो जाने के बाद,  लौटते समय वे मुझे अपने साथ ही लेकर आ जाते थे. मेरे पास रुपयों से भरी एक बड़ी सी झोली (बोरी जैसी ) हुआ करती थी, जिसमे कई प्रकार के नोट, खुचरा आदि सब रखे होते थे.
एक दिन ऐसा हुआ, यह मैं सुबह के समय की बात कह रहा हूँ - निर्धारित गायक के नहीं आने के कारण, वहाँ प्रातः काल में आयोजित होने वाले कार्यक्रम में मुझे ही प्रारंभिक गीत गाना पड़ा था. उस समय तक मैंने एक दो गीत, थोड़ा-बहुत गाना  सीखा था. अतः मुझे याद है कि, प्रातः काल में उपयुक्त समय न रहने से भी, ' तुम्ही ब्रह्म रामकृष्ण '- को मैंने उदघाटन संगीत के रूप में गया था. यह एक विशेष भाग्य जैसा महसूस हुआ था. 
एक रोज रात के समय ऐसा हुआ, सारे दिन का कार्यक्रम शेष हो चुका था, सभी लोग जो जिस व्यवस्था में नियुक्त थे अपना-अपना काम समाप्त करके जा चुके थे.
और मैं भी अपने उसी टिकट काउन्टर के अन्दर था, काउंटर के लिये जो एक बहुत लम्बा सा कमरा बनाया गया था, उसके भीतर रहने से बाहर का दृश्य कुछ दिखता नहीं था. मैं अन्दर बैठ कर सोंच रहा था, भाष्यानन्दजी कब आएंगे, और मुझे ले जायेंगे ! थोड़ी देर बाद मुझे ऐसा लगा जैसे सबकुछ निस्तब्ध हो चुका है, कहीं से कोई आवाज नहीं आ रही थी; काउन्टर से बाहर निकल कर देखता हूँ , तो पूरे पण्डाल में एक भी प्राणी नहीं है और लोहे के बड़े बड़े कोलैपसिबुल गेट में विशाल विशाल ताले झूल रहे हैं.
उसदिन टिकटें भी प्रचूर बिकी थीं. रुपयों से भरी एक लम्बी सी बोरी और बचे हुए टिकटों के अंश को लेकर उस समय मैं जाता भी तो कहाँ ? भय किस चिड़िया का नाम है, इस तरह की कोई चीज कभी महसूस हुई हो मुझे याद नहीं है. ठीक है, अब यहाँ से निकलने नहीं सकूँगा, अब आज तो जाना होगा नहीं, किन्तु इस ' बोरी ' को कहाँ रखूं ? बहुत निरिक्षण-परिक्षण कर के यही तय किया कि रुपयों से भरी इस झोली को लेकर मंच के ऊपर चढ़ा जाय और इसी के ऊपर सिर रख कर सो लिया जाय ! सो भी गया. भोजन तो दूर कि बात, पीने के लिये पानी भी नहीं था. सुबह में उठ कर देखता हूँ कि, गेट खोल कर कुछ लोग आये हैं और सब कुछ की सफाई हो रही है. मैं उस बोरी को लेकर, किसी प्रकार खींचते हुए एक ट्राम पर चढ़ गया, और मौलाली चला आया.
  निकट में ही सूरमहाशय के एक मकान में, स्वामीजी का शतवार्षिकी ऑफिस था.स्वामी सम्बुद्धानन्दजी जो ठाकुर और माँ के विश्वव्यापी शतवार्षिकी कमिटी के सचिव थे, उन्ही के ऊपर इसका दायित्व भी दिया गया था. उनके साथ मेरा बहुत पुराना परिचय था.
 वे उस समय शिमला मोहल्ला के एक भक्त के घर में रहते हुए, स्वामीजी का सिमला वाला पुश्तैनी मकान को बेलुड़ मठ के अधीन लाने के दायित्व का पालन कर रहे थे. तब से लेकर कितने वर्ष बीत जाने के बाद अभी हाल ही में तो स्वामीजी के पुश्तैनी मकान को नये ढंग से सजा-सवांर कर  नया रूप दिया जा सका है. उनकी आदत थी, जाते ही एक डायरी रखते थे, उसको खोलकर नाम लिखते थे कौन आया है.
और मुझसे कहा करते थे :- 
" नबनीहरण मुखोपाध्याय | एदिके आये, देख, हात टा तूले, देख ! 
देख मसल टा देख हातेर, पाएर मसल टा देख, 
घूषी मार, घुषी मार
स्वामीजी बोले छिलेन, ' Muscles of Iron, nerves of steel '
- मेरे ही जैसा, तुझे भी अपना शरीर  हृष्ट-पुष्ट बनाना होगा समझे ?  
उनका चेहरा बिल्कुल विशाल था. स्वामीजी की बातों को अनोखे ढंग से कहा करते थे. उनके ऊपर इतने बड़े अनुष्ठान का पुरा दायित्व दिया गया है, किन्तु उनके चेहरे पर व्यस्तता का एक भी चिन्ह नहीं था. सुबह का सारा कार्य समाप्त कर के शान्त हो कर चुपचाप बैठे थे. जिस समय पर जो कार्य करना होता था, ठीक उसी समय पर निबटा लेते थे. तो वहाँ पर मुझे प्रविष्ट होते देख कर कहते हैं- " नवनी, तुम अभी यहाँ क्यों आये हो ? " मैंने कहा, " महाराज, कल के बचे हुए इन टिकटों को लेकर आया हूँ." वे बोले, " यह तो पहले तुम नहीं लाते नहीं थे ! "
तब मैंने उनको जैसे सारी बातें सुनाई, वे व्यस्त होकर दूसरों को बोले, " पहले उसको खिलाओ, उसके बाद कुछ दूसरा काम होगा- इसने तो सारी रात से कुछ खाया नहीं है !"

वहाँ से जब गोलपार्क लौटा तो मुझको देखते ही भाष्यानन्दजी महाराज ने अपने सिर तक दोनों हाथों को उठा कर कहा, " Oh, what have I done ! " ( अरे, यह मैंने क्या कर डाला ! ) 
मैंने कहा, " महाराज ऐसा कुछ नहीं हुआ है, इतने कार्य में व्यस्त रहने के कारण एक दिन भूल गये तो क्या हो गया, - मुझे थोड़ी भी परेशानी नहीं हुई. एक रात नहीं खाने से, एक रात अच्छी तरह से ना सो पाने से क्या होता है ? कुछ भी फर्क नहीं पड़ता. "                  
वे कहने लगे, " फिर तुमने क्या किया " मैंने कहा- " महाराज, सारे रुपये मैंने सम्बुद्धानन्द महाराज के पास जमा करवा दिये हैं."  वे निश्चिन्त हुए, बोले- " अच्छा, अच्छा, बैठो ! " और मुझे एक बहुत सुन्दर अभिज्ञता हुई . 
बहुत अच्छा अनुभव रहा. कार्य करते समय भी -कितना निश्चिन्त होकर रहा जा सकता है ! 
किसी भी परिस्थिति में घिर जाने से, भय का नामो-निशान नहीं रहेगा ! किसी भी आभाव में पड़ने से भी कष्टबोध नहीं होगा; जो भी दायित्व सौप दिया गया हो, उसको सम्पूर्णतया पालन करना होगा.
उसी कैसावियेंकर के जैसा ! कहानी में है-
" He stood on the burning deck ! "
जहाज में आग लग गया है, उसको जहाँ पर खड़े रहने को कहा गया है- उसको वहीं पर खड़ा रहना होगा. आग के डर से भागना नहीं होगा. यदि ऐसा कर लिये- इसी में महाआनन्द है !    

{ Swami Prabhavananda Founder of the Vedanta Society of Southern California Swami Prabhavananda was one of the pioneer swamis sent to America by the direct disciples of Ramakrishna to build on the work started by Swami Vivekananda at the turn of the century.

The swami was born in India on December 26, 1893. In 1914, after graduating from Calcutta University, he joined the Ramakrishna Order of India and was initiated by Swami Brahmananda, a direct disciple of Sri Ramakrishna.

In 1923, Swami Prabhavananda came to the United States. After two years as assistant minister of the Vedanta Society of San Francisco, he established the Vedanta Society of Portland. In December 1929, he came to Los Angeles where he founded the Vedanta Society of Southern California the following year.
Under the able care of the swami, the Society grew into one of the largest Vedanta Societies in the West, with monasteries in Hollywood and Trabuco Canyon and convents in Hollywood and Santa Barbara.
Swami Prabhavananda was a man of letters as well as a man of God. He wrote and translated a number of books with the object of making the spiritual classics of India available and understandable to Western readers. He was assisted on several of the projects by Christopher Isherwood or Frederick Manchester.

His comprehensive knowledge of philosophy and religion attracted such disciples as Aldous Huxley and Gerald Heard. His publications, which include the Bhagavad-Gita, The Upanishads, Breath of the Eternal, How to Know God: The Yoga Aphorisms of Pantanjali, The Eternal Companion, and The Sermon on the Mount According to Vedanta, continue to this day to capture interest and draw people to the Vedanta philosophy.

Swami Prabhavananda passed away on the bicentennial of America's independence, July 4th 1976, fitting for one who gave so much of his life to this country.}
 भी उस समय आये थे, उनके साथ ईशारउड ( Isherwood ) भी वहीं ठहरे थे. सुबह के समय में जब Break-fast करने के लिये, ईन्टरनेशनल गेस्ट हॉउस जाता था, तब स्वामी प्रभवानंदजी, ईशारउड (Isherwood) एवं मैं एक ही टेबल पर बैठते थे!
{ Christopher Isherwood
Born
Christopher William Bradshaw Isherwood
8 February 1904(1904-02-08)
Wyberslegh Hall, High Lane, Cheshire in North West England
Died 4 January 1986 (aged 81)
Santa Monica, California, USA
Occupation Novelist
Nationality English, American
Born at Wyberslegh Hall, High Lane, Cheshire in North West England, Isherwood spent his childhood in various towns where his father, a Lieutenant-Colonel in the British Army, was stationed. After his father was killed in the First World War, he settled with his mother in London and at Wyberslegh.
After visiting New York on their way back to Britain, Auden and Isherwood decided in January 1939 to emigrate to the United States. Their emigration happened just months before Britain entered the Second World War, and exposed them to charges that they lacked patriotism and commitment to the war effort. After a few months with Auden in New York, Isherwood settled in Hollywood, California.
He met Gerald Heard, the mystic-historian who founded his own monastery at Trabuco Canyon that was eventually gifted to the Vedanta Society of Southern California. Through Heard, who was the first to discover Swami Prabhavananda and Vedanta, 

Isherwood joined an extraordinary band of mystic explorers that included Aldous Huxley, Bertrand Russell, Chris Wood (Heard's lifelong friend), John Yale and J. Krishnamurti. He embraced Vedanta, and, together with Swami Prabhavananda, he produced several Hindu scriptural translations, Vedanta essays, the biography Ramakrishna and His Disciples, novels, plays and screenplays, all imbued with the themes and character of Vedanta and the Upanishadic quest. Through Huxley, Isherwood befriended the Russian composer Igor Stravinsky.

In 1931 he met Jean Ross, the inspiration for his fictional character Sally Bowles. He also met Gerald Hamilton, the inspiration for the fictional Mr. Norris. In September 1931 the poet William Plomer introduced him to E. M. Forster.
They became close and Forster served as his mentor. Isherwood's second novel, The Memorial (1932), was another story of conflict between mother and son, based closely on his own family history.
After leaving Berlin in 1933, he moved around Europe, and lived in Copenhagen, Sintra, and elsewhere. He collaborated on three plays with Auden: The Dog Beneath the Skin (1935), The Ascent of F6 (1936), and On the Frontier (1939). 
Isherwood wrote a lightly fictionalized autobiographical account of his childhood and youth, Lions and Shadows (1938), using the title of an abandoned novel. Auden and Isherwood traveled to China in 1938 to gather material for their book on the Sino-Japanese War called Journey to a War (1939).
On Valentine's Day 1953, at the age of 48, he met teen-aged Don Bachardy among a group of friends on the beach at Santa Monica. Reports of Bachardy's age at the time vary, but Bachardy later said " at the time I was, probably, 16." Despite the age difference, this meeting began a partnership that, though interrupted by affairs and separations, continued until the end of Isherwood's life.
During the early months of their affair, Isherwood finished–and Bachardy typed–the novel on which he had worked for some years, The World in the Evening (1954). Isherwood also taught a course on modern English literature at Los Angeles State College (now California State University, Los Angeles) for several years during the 1950s and early 1960s.The more than 30-year age difference between Isherwood and Bachardy raised eyebrows at the time, but the two became a well-known and well-established couple in Southern Californian society with many Hollywood friends.}
     
 

Thursday, July 29, 2010

[38] मधुसूदन सरस्वती की 'अद्वैत-सिद्धि '

उसके बाद(श्री कृष्ण चैतन्य महाप्रभु के बाद) एक अन्य महापुरुष बंगाल में जन्म ग्रहण करते हैं, जिनका नाम था मधुसूदन सरस्वती. फरीदपुर जिले के कूषनिया नामक एक छोटे से ग्राम में उनका जन्म हुआ था.किन्तु उनके जन्म-मृत्यु इत्यादि के सम्बन्ध में कोई बहुत निर्भरयोग्य ऐतिहासिक प्रमाण प्राप्त करना बहुत कठिन है. किन्तु साधारण तौर पर यह ज्ञात होता है कि इनका जन्म सोलहवीं शताब्दी में हुआ था. एवं उनकी आयू भी असाधारण रूप से लम्बी थी. यह बहुत प्रमाणिक न होने पर भी कम से कम १०२ वर्ष की आयू तक जीवित थे.  
और ये मधुसूदन सरस्वती थे भी बड़े विद्वान्. उस समय नदिया जिला शाश्त्र-चर्चा के लिये विख्यात था. सम्पूर्ण भारतवर्ष के विभिन्न स्थानों से, वहाँ शास्त्र-अध्यन के लिये आया करते थे. यही बात हम परमहंस श्रीरामकृष्ण देव के जीवन में देख सकते हैं. उनके पास भी कई लोग विद्या अर्जन करने के लिये आये हैं.
तो मधुसूदन सरस्वती भी नदिया जाकर दर्शन-शास्त्र के विभिन्न पक्षों का विस्तार से अध्यन किये थे. जिससे उनके मन में यह विचार उठा कि, अब मुझे शास्त्र के आधार पर अद्वैतवाद का खण्डन करना चाहिये. और मैं इस बार इस अद्वैत ' मतवाद ' का इस प्रकार खण्डन करूँगा कि फिर वह कभी सिर उठा ही नहीं पायेगा. इसी दृढ-संकल्प को मन में रख कर वे काशी पहुँचे. वहाँ पहुँच कर नौका से उतरने के साथ ही साथ इस बात का पता लगा लिये कि, वहाँ पर दर्शन-शास्त्र के किन-किन विषयों को पढ़ाने में पारंगत विद्वान् कौन-कौन हैं.
खोजबीन करने के बाद एक व्यक्ति को उन्होंने चुन लिया, फिर उनके पास जाकर विद्या-अध्यन करने लगे.पढ़ते पढ़ते जब उनसे भी संतोषजनक ज्ञान नहीं मिला तो एकबार पुनः गुरु को बदल लिये. इसबार पण्डित विश्वनाथ सरस्वती के पास विद्या-अर्जन के लिये गये. उनके पास जाकर अद्वैत वेदान्त का अध्यन किये किन्तु उद्देश्य यही था कि, अद्वैत वेदान्त को ठीक से जानकर, बाद में उसका खण्डन कर दूंगा.एक दिन विश्वनाथ सरस्वती ने कहा," मैं थोड़ा तीर्थ-भ्रमण पर निकल रहा हूँ, तीर्थ से लौट कर आने के बाद तुमको पढ़ाना आरम्भ करूँगा. इसी बीच क्या तूम एक कार्य कर सकोगे ?
{गीता की भाषा इतनी सरल है कि, थोड़ा-बहुत संस्कृत समझने वाला व्यक्ति भी अपनी समझ के अनुसार उसकी व्याख्या कर सकता है|dada said to me on 24th July 2010 , a day before guru -purnima तुम टेलीफ़ोन पर मुझसे बात करते रहना - on 25th July 2010}
तो मैं चाहता हूँ कि तूम तबतक गीता के ऊपर कुछ लिखो.मैं लौटकर जब आऊंगा तब तुम्हारे द्वारा की गयी गीता की व्याख्या को एक बार देखने के बाद तुमको पढ़ाना प्रारम्भ करूँगा! " 
मधुसूदन सरस्वती ने गीता के ऊपर अपनी टीका लिख डाली. जब वे लौट कर आये और उनके द्वारा गीता पर लिखी गयी टीका को देखा तो बहुत संतुष्ट हुए, आनन्द व्यक्त करते हुए कहा-" वाह, तुम मेरे छात्र बनने के योग्य हो !" फिर उनको पढ़ाने लगे. पढ़ते पढ़ते मधुसूदन सरस्वती की अवस्था ऐसी हो गयी कि, अपने शिक्षक से एक दिन अपने दिल की बात उजागर करते हुए बोले-" गुरुदेव, आमि एकटा महा अपराध करेछि !"(-गुरुदेव, मैंने एक भारी अपराध किया है.) 
" कैसा अपराध ? " 
" यही कि, मैंने आपसे झूठ कहा था, मैं यहाँ अद्वैत को स्थापित करने के लिये नहीं आया हूँ, उसका खण्डन करने के उद्देश्य से ही आया हूँ. "तो जो हो बात आयी-गयी हो गयी. खण्डन तो खैर नहीं हुआ, बल्कि
 ' अद्वैत-सिद्धि ' हो गयी!
मधुसूदन द्वारा रचित ' अद्वैत-सिद्धि ' का अध्यन किये बिना ' अद्वैत ' में सिद्धि प्राप्त कर लेना कठिन है! ( बंगला भाषा में रचित अद्वैत-सिद्धि मेरे अपने घर के लाइब्रेरी में है, इसके अलावा और भी कई बहुमूल्य पुस्तकें हैं जो नष्ट होने के कगार पर हैं, किसको दूँ, पढने का भूख किसको है? तुम मेरे घर नहीं गये हो? क्या मुझे अपनी पुस्तकें मुझे देंगे ? पूछ कर जाऊंगा!)
मधुसूदन को बादशाह अकबर के राज-दरबार में दो बार आमन्त्रित किया गया था. उनके विद्वतापूर्ण उक्तियों को सुनकर अकबर की राजसभा के हिन्दू-मुसलमान विद्वतमण्डली मूग्ध रह गये हैं. अकबर ने अपने विद्वान् पण्डितों को आदेश दिया कि, मधुसूदन के प्रति संस्कृत भाषा में सम्मान व्यक्त किया जाय. उनलोगों ने जिस श्लोक को उनके सम्मान में रचा वह भी अनोखा है - 
" मधुसूदनसरस्वत्याः पारम् वेत्ति सरस्वती |
    पारम् वेत्ति सरस्वत्याः मधुसूदनसरस्वती ||"
Meaning : (Only) the Goddess of Learning, Sarasvati knows the limits of (knowledge of) Madhusūdana Sarasvati. And Madhusūdana Sarasvati knows the limits of (knowledge of) Goddess Sarasvati.
- विद्या की देवी सरस्वती की विद्या का पार (diameter)मधुसूदन सरस्वती जानते हैंऔर मधुसूदन सरस्वती की विद्या का पार कितना है,यह स्वयं विद्या की देवी सरस्वती  जानती हैं. 

ठाकुर के पास बात-चीत में प्रसंग आया था- 



" अग्निर्देवो द्विजातीनां मुनीनां हृदि देवतम |
       प्रतिमा स्वल्पबुद्धिनां सर्वत्र समदर्शीनः || "
- ब्राह्मणों के देवता अग्नि हैं, मुनियों के देवता ह्रदय में हैं, स्वल्प बुद्धि रखने वाले जो लोग हैं उनके लिये प्रतिमा ही देवता है| समदर्शी बन जाने वालों के लिये सर्वत्र देवता हैं. हमलोगों के पास यह बोध तो है नहीं |इसीलिये हमलोगों के लिये धर्म का अर्थ केवल मन्दिर, मस्जिद, गिर्जा में जाना भर रह गया है !
स्वामी अभेदानन्द अपने भाषण में एक वृद्धा की कहानी सुना रहे थे- 
एक वृद्धा नियमित रूप से चर्च जाया करतीं थीं, वहाँ पर दिये गये प्रवचनों को बड़े ध्यान से सुनती थीं. एकदिन उन्होंने सुना कि, प्रार्थना करने से सब इच्छाएँ पूर्ण हो जातीं हैं. वे जिस कमरे में रहती थीं, उसकी खिड़की से एक पहाड़ दिखायी देता था. उनकी खिड़की का निचला कपाट तो अक्सर बन्द रहता था, ऊपर वाले खुले कपाट से वे सामने का दृश्य देखतीं थीं. 
कई खिडकियों में इसी प्रकार के पल्ले लगे होते हैं. वे उस खिड़की से पहाड़ की ओर देखते देखते सोचने लगीं- आज ही तो उपदेशक से सुनी हूँ. जरा उसकी परीक्षा करके देखूं तो कि, सचमुच प्रार्थना करने से वह पूरी होती है य़ा नहीं !
वे वहीं जमीन पर बैठ जातीं हैं, वहाँ से तो अब पहाड़ नहीं दिख रहा था. खिड़की का निचला कपाट बन्द था. वे आँखें बन्द करके कह रही हैं, " हे ईश्वर, हे ईश्वर, इस पहाड़ को वहाँ से हटा दो | " बहुत  प्रार्थना कर रही हैं. बहुत देर तक प्रार्थना करने के बाद जब आस्ते आस्ते खड़ी हो रही हैं, मन में सोंच रही हैं, होगा क्या? होगा क्या ? प्रार्थना तो कर दी हूँ, पूरी होगी? जब खड़ी हुयीं और आँखों को खोला तो देखा कि, पहाड़ जिस जगह था, वहीं पर है |
हमलोग भी इसी प्रकार, आधे मन से प्रार्थना करते हैं; हमलोग प्रार्थना करना भी नहीं जानते हैं. कहा गया है कि, सही ढंग से कि गयी प्रार्थना फलवती होती है. किन्तु प्रार्थना करते समय वह प्रार्थना भीतर से निकलनी चाहिये.उस प्रार्थना को यदि बाहर से माथा में घुसाया जाय, तो वह प्रार्थना ' प्रार्थना ' नहीं कही जाएगी. प्रार्थना भीतर से निकलेगी, ह्रदय से उत्सारित होगी ! ह्रदय से प्रार्थना किस प्रकार  उत्सारित होती है? 
हमलोग प्रार्थना करेंगे- ' अमुक ' व्यक्ति का दुःख दूर हो ! किन्तु प्रार्थना करते समय उस ' अमुक ' व्यक्ति के लिये मन में संवेदना न हो, उसका दुःख भी यदि अपने ही दुःख के जैसा अनुभव नहीं होता हो, तो वह प्रार्थना भीतर से (ह्रदय से) उत्सारित नहीं होगी. 
इस प्रकार से यदि परीक्षा कर के देखा जाय तो, पायेंगे कि हमारी अनेकों प्रार्थनाएँ मंजूर हुई हैं, नहीं होतीं ऐसा नहीं है. 


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अद्वैत सिद्धि

 ( स्वामी योगीन्द्रानन्द कृत ' अद्वैत्सिद्धि ' हिन्दी व्याख्या, चौखम्बा विद्दयाभवन, वाराणसी से प्रकाशित ग्रन्थ पर आधारित) 
  ' अद्वैतसिद्धि ' ग्रन्थ के रचयिता श्रीमधुसूदन सरस्वती (१५४०-१६४७ ) बंगाली-ब्राह्मण थे. फरीदपुर अंचल के कोटालीपाड़ा में इनका जन्म हुआ था. रामचरित मानस के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास आपके समसामयिक ही नहीं घनिष्ट मित्रों में थे. सरस्वतीजी का अकबर के अर्थ सचिव श्री टोडरमल से प्रेम था. अकबर का राज्यकाल सन १५५६ से १६०७ तक माना जाता है. अबुल्फज्ल ने १५९८ में आईने अकबरी लिखा था. उसमें उस समय के जिन प्रसिद्द विद्वानों के नामों का उल्लेख हुआ है, उसमें श्री मधुसूदन सरस्वती का भी नाम अंकित है. एकबार इनको अकबरी दरबार में आमंत्रित किया गया था वहां की विद्वत सभा में एक मत से स्वीकार किया गया था- 
वेत्ति पारं सरस्वत्या मधुसूदन सरस्वती । 
मधुसूदनसरस्वत्याः पारं वेत्ति सरस्वती ।।    
यहाँ इस ग्रन्थ का बहुत संक्षिप्त सारांश संकलित करने की चेष्टा की गयी है. उन्होंने अपने अंदाज में कहा है- 
" तस्मात वृथा रोदिषि मन्दबुद्धे- तव भ्रमादेव हि दुःखमेतत "   
हे मन्दप्रज्ञ ! द्वैतदर्शी ! तू व्यर्थ ही द्वैत के मोह में फंस कर रो रहा है, तेरी ही भूल के कारण यह दुःख दावाग्नि धधक उठी है. द्वैतवादी रूपी ' ग्राम-सिंहों ' (कुत्तों ) के भौंकने से अद्वैत रूपी सिंह कभी उनका अनुकरण नहीं किया करता.
 तत्व-जिज्ञाषु पुरुष के साथ शास्त्र-चर्चा को ' वाद ' कहते हैं, विजयाभिलाषी व्यक्ति के साथ होने वाली कथा को ' जल्प 'और अपने पक्ष की स्थापना से हिन् कथा को ' वितण्डा ' कहते हैं. वादी और प्रतिवादी को जब अपनी अपनी कोटि का निश्चय हो तब पत्येक वादी 'निश्चयवान -अस्मि' -इस प्रकार का अभिनय करता हुआ वादविवाद में प्रवृत्त होता है.
" द्वितीयाद्वै भयं भवति "
                                 " तस्मादेकाकी बिभेति " बृह०१.४.२/ १.४.३ 
द्वीतीय मात्र के दर्शन से भय होने लगता है, अतः अतत्वज्ञ व्यक्ति अकेला डरता है. ' एको देवः सर्वभूतेषु गूढः ' श्वेता ० ६.११ / सभी चेतनों (जीवों ) में गूढ़ (व्याप्त ) एक अंतर्यामी हैं. अंतर्यामी को भोक्ता नहीं माना जाता, अतः उसके द्वारा अधिष्ठित शरीर भी उसका भोगायतन नहीं कहला सकता. दृष्टि-सृष्टिवाद में सभी शरीर एक ही मन से युक्त माने जाते हैं, और स्वप्न के समान सभी व्यवस्था की उपपत्ति हो जाती है. ' मामेवाअंशो जीवलोके ' गी ० १५.७  ' त्वं स्त्री त्वं पुमांसी त्वं कुमार उत वा कुमारी त्वं जीर्णो दण्डेन गच्छसि त्वं जातो भवसि विश्वतोमुखः "
 ' त्रैकालिक निषेध ' काल में वस्तु का त्रैकालिक आभाव नहीं माना जाता. प्रपंच में ख-पुष्पआदि के समान असत्य हो जाता है. वादीगणों के निश्चय वान होने पर संशय का उत्पाद नहीं होता. ' शब्दज्ञानानुपाती वस्तुशून्यो विकल्पः ' यो० सु० १/९ ' ज्ञान अपने आकार को छोड़ कर कहीं भी प्रवृत्त नहीं होता.  
 जैसे ज्ञान और आनन्द का अभेद होने पर भी दोनों का स्वतंत्र अस्तित्व माना जाता है, किसी एक का भी परिलोप नहीं होता, वैसे ही यहाँ ' गुण और गुणी ' का अभेद होने पर भी दोनों का स्वतंत्र अस्तित्व बना रहता है. अन्यथा आनन्द और स्फुरण (ज्ञान) इन दोनों में से एक- स्फुरण का लोप हो जाने पर मोक्ष को पुरुषार्थ नहीं कहा जायेगा, क्योंकि अज्ञात या अस्फुरित सुख में किसी को अभिलाषा नहीं होती. ज्ञान और आनन्द दोनों अत्यंत अभिन्न होते हैं.
 ' दुःख-ज्ञान अनित्य वृत्ति रूप और आनन्द नित्य चिन्मात्र रूप माना जाता है.' 
- क्योंकि सुख-दुःख आदि अन्तःकरण  के धर्म होते हैं, आत्मा के नहीं. ब्र० सू० २,१.६/ पार्श्वस्थ व्यक्ति या आत्मस्थ व्यक्ति स्वामी विवेकानन्द जैसा व्यक्ति द्वारा ' उत्तिष्ठत जाग्रत ' ऐसा वाक्य सुनते ही मोहनिद्रा में सोया व्यक्ति वाक्य और वाक्यार्थ का सम्बंध जाने बिना भी जाग जाता है. यहाँ यह सभी जानते हैं कि जाग्रत के समान सुषुप्ति अवस्था में शब्द और अर्थ की समझ नहीं होती. इसीलिए ' उत्तिष्ठत जाग्रत ' का तात्पर्य किसी किसी विरले विशिष्ठ पुरुष को ही होता है, सभी को नहीं. इस विशिष्टता का कारण है- अन्तःकरण (चित्त ) की अशुद्धि (पाप-युक्तता ) ज्ञान की प्रतिबन्धक मानी जाती है. (७५३-९११)
' एको  नारायण आसीत न ब्रह्मा न च शंकरः ' 
- महाप्रलय के समय केवल नारायण (विष्णु ) थे का तात्पर्य नारायणीय शरीर नहीं, अखण्डमायोपाधिक ' ब्रह्म ' हैं, केवल उन्हीं की सत्ता महाप्रलय में कही गयी है, शरीर की नहीं. ज्ञान ज्योति जगाने का श्रेय जिस निराकार-निष्ठा को प्राप्त है, वह साकार(श्रीरामकृष्ण देव)-निष्ठा के उर्वरक धरातल पर ही अंकुरित हुई है.
यदि जगत का कोई मूल सत-वस्तु है, तब उसकी उपलब्धी क्यों नहीं होती ? उत्तर-विद्यमान वस्तु भी कभी उपलब्ध नहीं होती. जैसे उदक में विलीन लवण उपलब्ध नहीं होता, साधन-विशेष ( घोल को खौलाने) से जल को सुखा देने पर लवण की उपलब्धी होती है. ' आचार्यवान पुरुषो वेद ' छां ० ६.१४.२ ' में गांधार देश और पथिक पुरुष का दृष्टान्त में है- जैसे गांधार जैसे सुदूर देश का पथिक लोगों से पूछ पूछ कर अपना गंतव्य पा लेता है, वैसे ही ब्रह्मवेत्ता से कोई आचार्यवान (आचार्य का अन्तेवासी ) अधिकारी पुरुष नहीं होगा तो, आचार्य सेवा से वंचित व्यक्ति आत्मा को ही कर्ता-भोक्ता मानता हुआ विविध दुःख भोगता है. किन्तु आचार्यवान पुरुष चौर्य-कर्म रहित व्यक्ति के समान परीक्षा में उत्तीर्ण होकर सदा के लिए कारागार से छुटकारा पा कर मुक्त हो जाता है. जैसे समुद्र में नदियों के भेद की प्रतीति नहीं होती, वैसे ही ब्रह्म में जीवों का भरद भाव नहीं होता. वैसे ही गुरु-निर्दिष्ट पद्धति से मनःसंयोग करने पर जगत के मूल-तत्व की उपलब्धी हो जाती है. 
अंतःकरण (मन-बुद्धि-चित्त-अहंकार ) एक ऐसी स्थूल उपाधि है, जिसके रहने पर जीव-भेद बना रहता है. सुषुप्ति में अंतःकरण का विलय हो जाने पर भेद की प्रतीति नहीं होती. क्योंकि जैसे स्वर्ण ही कुण्डल हो जाता है, वैसे ही समुद्र ही नदी बन जाता है. समुद्र जैसा का तैसा है, नदियाँ समुद्र से निकल कर उसमें ही स्म जाती हैं. ' जल से उत्पन्न फेन बुद-बुद आदि जल में विलीन होकर नष्ट हो जाते हैं, किन्तु जीव प्रतिदिन स्वरूप में विलीन होकर भी नष्ट क्यों नहीं होता? जीव का अधिष्ठान शरीर जीवित रहता है, जीव के निकल जाने पर मर जाता है, किन्तु जीव नहीं मरता. ज्ञान न होने के कारण अविद्वान संसार में पुनः आता है, पर विद्वान् को पुनः आना नहीं पड़ता. ' तमेवैकं जानथ आत्मानम ' मु० २.२.५/ ' अहं हरिः सर्वम इदम जनार्दनः ' जब जीव ब्रह्म रूप ही है, तब वह ब्रह्मरूपता को कैसे प्राप्त करेगा ? कंठ गत स्वर्ण माला में जैसे किसी को विस्मरण के कारण अप्रप्तता का भ्रम हो जाता है- भ्रम की निवृत्ति होते ही प्राप्त मालूम होता है. ' परमं साम्य्मुपैती ' मु० ३.१.३ 
' आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यः मन्तव्यः निदिध्यासितव्यः' बृह ० २.४.६
  सभी कार्यों में मूलभूत तीन जिज्ञाषाएं होती हैं- किं कार्यम ? केन कार्यम ? कथं कार्यम ? किं कार्यम का उत्तर है- आत्मा द्रष्टव्यः (साक्षात् कर्तव्यः ). केन कार्यम ? का उत्तर है- आत्मा श्रोतव्यः (श्रवणेन साक्षात् कर्तव्यः ), कथं कार्यम ? का उत्तर है- मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः 
मनन और निदिध्यासन     
उद्दमन-निपातन रूप क्रिया की सहायता से कुल्हाड़ी काष्ठ-छेदन कर्ता है, वहां कुठार को करण और उठाना-गिराना आदि क्रिया को सहायक व्यापर मात्र कहते है. वैसे ही वेदान्त वाक्यों के मनन माने विचार रूपी श्रवण में शब्द या नाम विषयक ज्ञान को करण इतिकर्तव्य कहा जाता है. जिस कार्य की सहायता से करण में कार्य निष्पादन की क्षमता आ जाती है, उसी व्यापर को इतिकर्तव्य कहा जाता है. जिस प्रक्रिया से शब्द-शक्ति रूप तात्पर्य की अवधारणा हो जाती है- उसे ' विचार ' कहते हैं. मनन और निदिध्यासन के द्वारा एकाग्र किये चित्त में ही श्रवण के द्वारा आत्मसाक्षात्कार उत्पन्न होता है. अयुक्तिपूर्ण शंका के रहने पर चित्त विविध कोटियों में बंटा विक्षिप्त-सा रहता है, उस शंका के निवृत्त हो जाने पर शास्वत सत्य-स्वरूप की युक्तिपूर्ण अवधारणा हो जाने पर चित्त समाहित-सा होता दीखता है.
 ' ततस्तु तं पश्यते निष्कलं ध्यायमानः ' मु० ३.१.३ ' ततस्तु तं पश्यते ' ततः माने गुरुमुख से श्रवण करके - ' द्रष्टव्यः श्रोतव्यः '. अर्थात तत श्रवण आदि ध्यायमानः निष्कलं ब्रह्म पश्यति ' अतः श्रवण में ही साक्षात्कार की कारणता सिद्ध होती है. शुद्ध शाश्वत-चैतन्य को निर्विशेष आत्मा कहते हैं, एवं अहंकार आदि उपाधि से विशिष्ट को सविशेष-आत्मा कहते हैं. दोनों आत्माओं का तादात्म्य दूर करने के लिए गुरुमुख से नाम-श्रवण जरुरी होता है. सविशेष और निर्विशेष दो स्वथाओं में अनुस्यूत आत्मा को वेदान्त वाक्यों के श्रवण द्वारा आत्मबोध करना होता है. 
' श्रोतव्यः श्रुतिवाकेभ्यः ' ऐसा स्मृतियों में भी कहा गया है. श्रवण की विधि को ही जिज्ञाषा सूत्र- ' अथातो ब्रह्म जिज्ञाषा ' का मूल श्रोत माना जाता है. ' स्वाध्यायो अध्येतव्यः ' से प्रेरणा पाकर ही पुरुष स्वामी विवेकानन्द को पढने में प्रवृत्त होता है. ' तरति शोकम आत्मवित ' छां ० १.७.३
  'तव्य' प्रत्यय का प्रयोग कर्तव्यता का प्रतिपादक नहीं है, बल्कि आत्मा की महिमा का वैसे ही प्रतिपादक है, जैसे- ' अहो दर्शनीयो अयं महात्मा '
 ' उद्दालकः तत्त्वमसीतिवाक्येन श्वेतकेतुं बोधयति '
श्वेतकेतु को अपने पिता उद्दालक के उपदेश से आत्म-साक्षात्कार हुआ था.  ' तत्त्वं भविष्यसि ' फिर आचार्य ' तत्त्वं असी ' क्यों कहते हैं ? ' यो वै भूमा, तत सुखम ' छां ७.२३.१/ ' स आत्मा तत्वमसि '-छां० ६.८.७. ' परकीय ब्रह्म का अपने में अभिमान करनेवाला व्यक्ति ही स्तेन (चोर ) कहा जा सकता है, अपने में विद्यमान ब्रह्मत्व का अज्ञानी स्तेन नहीं कहला सकता. सुषुप्ति में जीव स्वरूपभूत ब्रह्म से अभिन्न रहता है. 
  ' श्रुतिशिखोत्थेति ' जैसे दीप-शिखा की प्रकाशन-क्षमता में तैल-वर्ती-पात्र का पूर्ण सहयोग होता है, वैसे ही 'तत्वमसि ' इत्यादि महावाक्यों की स्वार्थ-प्रकाशन-क्षमता में कर्म, उपासना और ज्ञान योग की उपकारिता निश्चित है, क्योंकि निष्काम-कर्म के अनुष्ठान से अन्तःकरण शुद्ध होता है, शुद्ध अन्तःकरण में अहैतुकी भक्ति उत्पन्न होने से एकाग्रता आती है, और एकाग्र अन्तःकरण में " तत्वं " पदार्थ-परिशोधन पूर्वक श्रुत महावाक्यों द्वारा वह ज्ञान ज्योति उदय होती है जो समूल द्वैत ध्वान्त को सदा के लिए समाप्त कर डालती है.
 जीवन्मुक्ति काल में मुक्ति होती है या विदेह मुक्ति में ?
 समस्त द्वैत-विरोधिनी वृत्ति अंतिम होती है, उसके पश्चात् और कुछ भी नहीं होता. उस वृत्ति के लिए-
 ' पश्चात् सा कुत्र गता ? ऐसा प्रश्न ही नहीं उठता, क्योंकि जब कोई काल ही नहीं रहता, तब वहां न पश्चात् कः सकते हैं न कुत्र. तत्वज्ञान के द्वारा जिस पुरुष की अविद्या नष्ट हो जाती है, उसको भी अविद्या के कार्यभूत देहादी का प्रतिभास होता रहता है, वह पुरुष जीवन्मुक्त कहलाता है. अविद्या का नाश होने पर शरीर तुरंत नहीं छूट जाता, जैसे रज्जू-सर्प भ्रम के निवृत्त हो जाने पर भी भ्रम का कार्यभूत भय-कम्प आदि कुछ समय तक बने रहते हैं. दण्ड को चाक पर से हटा देने पर भी वेग-संज्ञक संस्कार के बल पर चाक कुछ देर तक अपने आप घूमता रहता है. वैसे ही लशुन-भाण्ड में से लशुन के निकाल लेने पर भी भाण्ड में लशुन की वास बनी रहती है. उसी तरह अज्ञान का नाश हो जाने पर जीवन्मुक्त का शरीर वर्षों तक बना रह सकता है.
' विद्वान् नामरूपाद विमुक्तः ' मु० ३.२.८
प्रारब्ध कर्म का उपभोग हो जाने के बाद समस्त शक्तियों से समन्वित माया की निवृत्ति हो जाती है. जीवन मुक्त तत्ववेत्ता के विदेह कैवल्य में उतना ही विलम्ब ,जब तक प्रारब्धकर्म का क्षय नहीं होता.' यमेवैष वृणुते तेन लभ्यः, तस्यैष आत्मा विवृणुते तनुं स्वाम. ' मु० ३.२.१३  प्रारब्ध कर्म का क्षय उपभोग से ही होता है, ईश्वर कृपा से नहीं. ' एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म ' छां ० ६.२.१ ' ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशै: ' श्वेता ० ४.१६ द्वैत- मिथ्यात्व का निश्चय हो जाने पर ही अद्वैत सिद्धि होती है. अद्वैत निश्चय तभी होगा जब उससे पहले ' नेह नानास्ति किञ्चन ' बृह ० ४.४.१९ का अर्थ होता है- ' इह ब्रह्म भिन्नं किञ्चित नास्ति ' महावाक्य जन्य अद्वैत सिद्धि के पहले द्वैत में मिथ्यात्व सम्पन्न हो जाता है.  अस्ति में वर्तमानार्थक ' लट ' प्रत्यय प्रयुक्त है. ' प्रपंचो मिथ्या दृश्यवत ' यह निश्चित है कि अद्वैत निश्चय द्वैत-मिथ्यात्व निश्चय पूर्वक ही होता है.
  जीव ब्रह्म का प्रतिबिम्ब या प्रतिछाया है छाया नहीं. मोक्ष में तो अन्तःकरण का आभाव हो जाता है अतः गति और मुक्ति में महान अंतर है. जीव के अन्तःकरण में ज्ञान शक्ति (बुद्धि ) और क्रिया शक्ति (प्राण ) है. मन उत्क्रमण कर गया अनमनस्क आत्मा इसी शरीर में खता-पिता रहा. ' तदा विद्वान् नामरूपाद विमुक्तः ' मु० ३.२.८ केतकी (क्योड़ा ) का अमन्द गंध चारों ओर मिलती है. पर उसका पुष्प नष्ट नहीं होता. जो शरीर जिसके अदृष्ट से जनित है, वह उसका भोगायतन होता है. ईश्वर के अदृष्ट से कोई शरीर नहीं बना, अतः कोई भी शरीर उसका भोगायतन नहीं हो सकता.
  ' अत्र ब्रह्म समश्नुते ' कठ० ६.१४ इसी लोक में ब्रह्मज्ञानी को ब्रह्म का सायुज्य प्राप्त होता है. मुक्त पुरुष का आनन्द सभी कामों (सुखों ) का भी काम (सुख) है. ' भक्तिः सिद्धे: गरीयसी ' श्रीमद्भाग० ३.२५.३३ अर्थात भक्ति ज्ञान से भी श्रेष्ठ है, यह कहना वैसा ही है जैसे राम से कौशल्या को श्रेष्ठ क़ह दिया जाता है. भक्ति ज्ञान की जनक है, अतः उसका पद ज्ञान से अधिक माना गया है.गीता ० १३.२५ /९.३२ में अन्य तत्ववेत्ता पुरुषों से सुनकर जो व्यक्ति मेरी (ठाकुर की) उपासना करते हैं, ऐसे श्रवण परायण व्यक्ति भी मृत्यु को जीत लेते हैं, स्त्री-वैश्य-सूद्र आदि मन्द अधिकारी भी भक्ति के द्वारा मुक्त हो जाते हैं.
सर्वान गुरून सततमेव नमामि भक्त्या । 
विद्याप्रद  एवं दीक्षाप्रद अपने समस्त गुरुजनों को सदैव भक्तिपूर्वक नमस्कार करता हूँ. चिर काल से श्री मण्डन मिश्र की ब्रह्मसिद्धि, श्री सुरेश्वराचार्य की नैष्कर्म सिद्धि, श्री विमुक्तात्मा की इष्टसिद्धि नामसे तीन सिद्धि-ग्रन्थ ही प्रचलित थे, अब यह अद्वैत-सिद्धि नाम का चौथा सिद्धि ग्रन्थ बन गया है.  
' बहु स्याम प्रजायेय ' छां ६.२.३ इतना संकल्प मात्र होता है, और वह ' सच्च त्यच्चाभवत ' तै० उ० २.६ क्योंकि वह अनंत शक्ति-सम्पन्न है. ' ज्ञानं नित्यं क्रिया नित्या बलं नित्यं परमात्मनः ' एवं ' एष नित्यो महिमा ब्राह्मणस्य ' बृह ० ४.४.३३/  ' स एष नेति नेति ' बृह ० ३.९.२६ /   भेद बोधक वेदांत वाक्य -' द्वा सुपर्णा ' श्वेता ४.६ / ' तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप ' गी० १५.१७/ ब्रह्म तत्वतः जीव से भिन्न है या नहीं ? जैसे बाल्य और युवा अवस्था के शरीरों का भेद हो जाने पर भी अंतःकरण का भेद नहीं होता, वैसे ही जातिस्मर व्यक्तियों के शरीरों का भेद होने पर भी अंतःकरण का भेद नहीं होता, उनके सभी शरीरों का नियन्त्रण एक ही अंतःकरण द्वारा होता है. प्रत्येक दिन सुषुप्ति में मन (अंतःकरण ) विलय हो जाता है, वस्तुतः उसका न तो विनाश होता है, और न नूतन अन्तःकरण का निर्माण. चरम वृत्ति के द्वारा जो अज्ञान नष्ट होता है, उसे ही जीव-विभाजक माना जाता है. बिम्बगत कम्पन मूलतः जलरूप उपाधि का प्रतीत होता है, बिम्ब पर उसका आरोप नहीं हो सकता, ऐसे ही जीव में भोक्तृत्व उसके उपाधिभूत अंतःकरण की देन है, बिम्ब भूत ब्रह्म पर उसका आरोप संभव नहीं. ' शतमपि अन्धानां न पश्यति ' -सैकड़ो अन्धे मिल कर भी क्या देख लेंगे ?  यह वाक्य बुद्धि और जीव का बोधक माना गया है, जीव और ब्रह्म के भेद का बोधक नहीं है. नाम (शब्द या ॐ ) तत्व तो ब्रह्म का एक विकार ( विवर्त ) मात्र है, ब्रह्म के अधिष्ठानभूत नाम (ॐ ) में ' ब्रह्म ' शब्द गौण रूप से प्रयुक्त हुआ है, किन्तु ब्रह्म अविकारी है, जगत का एकमात्र कारण (अधिष्ठान ) है, तथा मुमुक्षुओं के द्वारा ज्ञेय है. ' तद विज्ञानेन परिपश्यन्ति धीराः ' मुं २.२.७ / ' सत्यस्य सत्यं ' बृह ० २.३.६/ प्रतिमा, मूर्ति आदि में भी देवता तत्व-बुद्धि से ही फल देता है, न कि देवता की तादात्म्य-बुद्धि से- इसीलिए जिस सच्चे कर्मी की शव रूपी (कफ-वात-पित्त ) त्रैधातुक शरीर में आत्मबुद्धि, स्तर-पुत्र आदि में स्वियत्व-बुद्धि (मेरा है !)   पार्थिव मृन्मय मूर्ति आदि में आराध्य-बुद्धि तथा जल में तीर्थ-बुद्धि कभी नहीं होती, अभिज्ञ पुरुषों में वही श्रेष्ठ माना जाता है. ' देवात्मशक्तिं स्वगुणेर्निगुढाम ' श्वेता ० १/३ , ' दैवी ही एषा गुणमयी ' गी० ७.१४,  ' विज्ञानमानंदम ब्रह्म ' बृह ० ३.९२.८ - ' आनन्द ' तत्व दृश्य नहीं है, बल्कि दृक (चैतन्य) से अभिन्न है. ' यत्साक्षाद अपरोक्षाद ब्रह्म ' बृह ० ३.४.१- जगत का साक्षात् द्रष्टा ब्रह्म है, तथा साक्षी वह है जो प्रत्यक्ष का नाश न हो सकने के कारण मन को दौड़ता हुआ देख रहा है. इसीलिए अविद्या एवं अविद्या के कार्य इन दोनों में से किसी एक दर्पण में प्रतिफलित चैतन्य को साक्षी कहा जाता है. दृक रूप चैतन्य तत्व स्वतः द्रष्टा नहीं, बल्कि जिस उपाधि के माध्यम से द्रष्टा बना करता है, उसके नाश से जनित संस्कार - काल स्मरण का निर्माण किया करते हैं. शुद्ध ब्रह्म तथा जीव से भिन्न चैतन्य को साक्षी माना जाता है. अविद्या वृत्ति में प्रतिफलित चैतन्य को साक्षी माना जाता है, सुषुप्ति में भी अविद्यावृत्ति मानी जाती है. क्योंकि अविद्या का संग करके भी ब्रह्म परिणामी नहीं होता, किन्तु विवर्तित होता है. ' जगत का उपादान कारण माया, निमित्त कारण-ईश्वर, शुद्ध ब्रह्म अधिष्ठान होता है.' ' जन्माद्द्यस्य यतः ' ब्र.सू.१.१.३ क्योंकि भ्रान्ति का अभिज्ञ पुरुष भ्रान्त नहीं कहलाता. ' तदेक्षत बहु स्याम ' छां ६.२.३ एक सद ब्रह्म ही असद्रूप जगत का उपादान कारण है. ' यथा उर्णभिः सृजते गृहन्ते च ' बृह ० २.१.२० - उर्णाभि (मकड़ी ) में भी तन्तु या जाले की उत्पत्ति और प्रलय देखे जाते हैं. किन्तु उर्णाभि पद (नाम-रूप) का वाच्य उसका शरीर नहीं होता, बल्कि शरीर से भिन्न चैतन्य होता है, जोकि तंतु के प्रति वैसे ही निमित्त कारण मात्र होता है, जैसे कि पुत्र के प्रति पिता. मकड़ी का विनाश हो जाने पर भी जाला जैसे-का तैसा बना रहता है.  ' नित्यानित्यवस्तु-विवेक ' अद्वैत मत में माया को ' अघटित-घटना-पटीयसी ' कहते है. अर्थात माया के लिए कुछ असम्भव नहीं, वह परस्पर-अपेक्षी पदार्थों का भी इन्द्रजाल के समान उपपादन कर देगी. मिथ्याभूत  इन्द्रजाल के रूप में कार्य-कारण भाव की व्यवस्था का उलंघन करने वाले ऐसे चमत्कार देखे जाते हैं, जो अन्यत्र सत्य व्यव्हार में नहीं देखे जाते, फिर भी उन्हें मिथ्या मानना ही उचित है. ' न स पुनरावर्तते ' छां.८.१५.१ ब्रह्मलोकस्थ जीवों के मुक्त हो जाने के बाद ही महासृष्टि प्रवृत्त होती है/ ' पुण्यपापे विधूय निरंजनः परमं साम्यमपैति ' मु० ३.१.३ ' ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति ' मु० ३.२.९/ शरीरोपाधिक जीव और अन्तर्यामी का जो भेद माना गया है, वह केवल अविद्या कल्पित अतात्विक मात्र है, तात्विक नहीं. जीव की अल्पज्ञता अनित्य होने के कारण भविष्य में जब कभी नष्ट होगी, तब वह इश्वर से अभिन्न होगा-अतः आचार्य को कहना चाहिए था-अथर्व ० १.४.२० प्रतिबिम्ब भी एक प्रकार की ' छाया ' ही है ? जहाँ प्रकाश का अवरोध होता है, वहां ही छाया होती है, प्रतिबिम्ब तो प्रकाश-देश में भी अनुभूत होता है, अतः उसे छायात्मक नहीं माना जा सकता.
Towards the end of his life, when he returned to Navadvip from Benares, he was given a reception for his monotheistic philosophy. He died in Mayapuri while meditating.}
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Wednesday, July 28, 2010

[37] " अद्वैतवाद कई बार खण्डित हुआ है.


" भेद और अभेद - ये दोनों अचिन्त्य हैं "
{यह जो सभी प्राणी अपने अपने आहार के पीछे दौड़े चले जा रहे हैं, और महाकाल (जरासन्ध) सब कुछ को अपना ग्रास बना लेने हेतु इन सबों के पीछे लगा हुआ है,किन्तु उसकी ओर किसी की दृष्टि नहीं जाती है. ..सचमुच सबकुछ कितना क्षणभंगुर है ! मनुष्य को इस जगत की नश्वरता के प्रति जाग्रत करा देने वाले सर्वग्रासी ' महाकाल ' पर किसी की दृष्टि नहीं जाती!!} 
इसी कारण इस विश्व सृष्टि के पीछे का यही रहस्य है! व्यास-देव (महर्षि वेदव्यास) ने वेद उपनिषदों से महावाक्यों को चुन-चुन कर व्यास-सूत्र की रचना किये हैं, उन्होंने जिस ब्रह्मसूत्र की रचना की है।
  आचार्य-शंकर ने उसके ऊपर भाष्य लिखा है.जिसको शंकर-भाष्य के नाम से जाना जाता है| ब्रह्म-सूत्र के ऊपर आचार्य शंकर ने जो भाष्य लिखा था उसी के ऊपर अद्वैतवाद (वेदान्त) प्रतिष्ठित हुआ है. इस अद्वैतवाद के प्रतिष्ठित होने के बाद ( यह अष्टम शताब्दी की बात है.) अष्टम शताब्दी से लेकर " श्री चैतन्य महाप्रभु " के आविर्भूत होने तक से यह अद्वैतवाद कई बार खण्डित हुआ है|अद्वैतवाद के बाद द्वैतवाद, विशिष्टाद्वैतवाद आदि अनेक वाद, श्री चैतन्य महाप्रभु **के आविर्भूत होने तक आठ-नौ प्रकार के वाद की सृष्टि हुई है. 
{** श्री कृष्ण-चैतन्य महाप्रभु का संक्षिप्त परिचय :  
श्री श्री चैतन्य महाप्रभु सन १४८६ में फाल्गुन पूर्णिमा (होली) के दिन बंगाल के नवद्वीप में अवतीर्ण हुए. इनके पिता का नाम श्री जगन्नाथ मिश्र और माता का नाम शची देवी था. इनका नाम विश्वंभर रखा गया. माता ने इनका नाम निमाई रखा. इन्होंने एक पाठशाला खोली थी. पहली पत्नी के मरने के बाद, इनका दूसरा विवाह विष्णुप्रिया के साथ हुआ. निमाई ने गया में ईश्वर पूरी से दीक्षा ग्रहण किया.गया से लौटने के बाद गृहस्थी तथा पाठशाला के प्रति इनकी तीव्र वितृष्णा दिखायी देने लगी. नवद्वीप में पण्डित श्रीवास का आँगन संकीर्तन का मुख्य स्थान हुआ. संकीर्तन में प्रायः उनकी समाधी अवस्था तथा शरीर में दिव्य और अलौकिक प्रेम के लक्षण दिखाई देने लगे. साधारण लोग इस दिव्य भाव को उन्माद य़ा पागलपन कह कर उपहास करने लगे. एक दिन शांतिपुर के अद्वैताचार्य ने संकीर्तन के समय भाव में निमग्न निमाई की अपने इष्ट (श्रीकृष्ण) रूप में पूजा की. उस समय के समाज में श्री अद्वैताचार्य की विशेष मान्यता थी. उसी समय से भक्त लोग निमाई को गौरांग महाप्रभु के नाम से पुकार कर अपनी श्रद्धा प्रदर्शित करने लगे.   
जिस प्रकार चुम्बक के आकर्षण से लोहे के टुकड़े अपने आप चले आते हैं, उसी प्रकार गौरांग महाप्रभु के दिव्य लक्षणों से आकर्षित हो विभिन्न स्थानों से भक्त वैष्णवगण आने लगे. इनके अनन्य पार्षद श्री नित्यानन्द भी आ गये. भक्त वैष्णवगण नित्यानन्द को बलराम तथा गौरांग महाप्रभु को श्री कृष्ण का अवतार मान कर उपासना करने लगे. माता शची देवी नित्यानन्द को अपने प्रथम पुत्र विश्वरूप के समान प्यार करने लगी. वे इन्हें निताई कहने लगी. भक्तगण भी इन्हें निताई अथवा नित्यानन्द के नाम से पुकारने लगे.
नित्यानंदजी और हरिदासजी ने नगर में नाम-संकीर्तन का प्रचार कार्य चालू किया. वे रास्ते में जाते हुए हर व्यक्ति के चरणों में प्रणाम कर उनसे कृष्ण नाम जप करने की भिक्षा माँगने लगे. यह कार्य सहज नहीं था. कोई व्यंग करता था तो कोई गाली-गलौज तथा उपहास करता था. कुछ इनके प्रति श्रद्धा भी प्रदर्शित करते थे.
एकदिन  वे नवद्वीप के कुख्यात दस्यु जगन्नाथ एवं माधव (जगाई-मधाई ) के पास जोर-जोर से नाम-कीर्तन करते हुए पहुँचे.  उस समय दोनों शराब के नशे में थे. क्रोध में आकार मधाई ने नित्यानंद के सिर पर प्रहार कर दिया.नित्यानन्द के सिर से खून की धारा बह निकली. चारों तरफ भीड़ जम गयी. इसी समय गौरांग महाप्रभु भी वहाँ पहुँच गये. इनको क्षमा कर दिये, और नित्यानन्दजी ने करुणावश कहा- " आज तक तुमने जो कुछ पाप किये हैं वह सब मैंने ग्रहण किया. श्री कृष्ण की कृपा से तुम्हें दुर्लभ प्रेम की प्राप्ति हो|"  तब से जगन्नाथ और माधव दोनों पारं वैष्णव हो गये. इस प्रकार के ह्रदय परिवर्तन से लोगों को महाप्रभु की अलौकिक क्षमता पर विश्वास गहरा हो गया. इनके नाम पर नवद्वीप में गंगा जी का ' जगाई- माधाई घाट ' आज भी प्रसिद्ध है. 
उस समय नवद्वीप का शासक एक मुसलमान काजी था.वह उच्च स्वर से संकीर्तन को हिन्दू शास्त्र विरोधी कार्य कह कर बन्द करवा दिया, किन्तु जब महाप्रभु ने उसे नाम कीर्तन का माहात्म्य बताया, तो वह काजी भी परम वैष्णव बन गया. उसका समाधी आज नवद्वीप में ' काजी की समाधी ' नाम से प्रसिद्ध दर्शनीय स्थलों में है.
गया से आने के एक वर्ष बाद महाप्रभु ने अपने मन में प्रेम-धर्म के प्रचार के लिये सन्यास लेने का विचार किया. और माता से अनुमति भी प्राप्त कर ली. एक दिन आधी रात के समय, विष्णुप्रिया को सोती हुई छोड़ कर अपने घर से सन्यास लेने के लिये, काटवा के प्रसिद्ध सन्त श्री केशवभारती के पास पहुँचे. सन्यास लेने के समय महाप्रभु की उम्र चौबीस वर्ष की थी. केशव भारतीजी ने गंगाजी के किनारे विरजा होम करवा कर सन्यास प्रदान किया. 
सन्यास लेने के बाद इनका नाम श्रीकृष्ण चैतन्य भारती पड़ा. पर वे चैतन्य महाप्रभु के नाम से ज्यादा परिचित हुए. सन्यास के बाद उन्होंने जगन्नाथपूरी में रहने का निश्चय किया.राज पण्डित सार्वभौम भट्टाचार्य शंकराचार्य द्वारा प्रतिपादित वेदान्त के अनुसार शिक्षा देने वाले प्रसिद्ध विद्वान् थे. महाप्रभु ने वेदान्त की आलोचना करते हुए भगवत-प्रेम की प्राप्ति करने को परम पुरुषार्थ एवं श्री भगवान (अवतार) को सच्चिदानंदमय प्रमाणित किया. महाप्रभु से इस प्रकार की अपूर्व व्याख्या सुन कर सार्वभौम आश्चर्य चकित हो गये.
अन्त में महाप्रभु ने सार्वभौम को अपना षट्भुज रूप दिखाया. इस घटना के बाद से सार्वभौम अपने इष्ट के रूप में महाप्रभु की पूजा करने लगे. अद्वैतवादी राज पण्डित सार्वभौम भट्टाचार्य की इस प्रकार की स्वीकृति से (अद्वैतवाद एक बार पुनः खण्डित हुआ) और एक ही श्लोक की महाप्रभु ने १८ तरह से व्याख्या करते हुए भक्तिमार्ग की श्रेष्ठता को प्रमाणित कर दिया. फिर वे रामेश्वर की ओर अग्रसर हुए. भ्रमण करते हुए महाप्रभु श्री रंगमंदिर में पहुँचे. वहाँ एक भक्त ब्राह्मण संकृत का ज्ञान कम होने से भी रोज मन्दिर में बैठ कर गीता के १८ अध्याय का पाठ करता था, पर उसके अशुद्ध उच्चारण को देख कर साधारण लोग उसका उपहास करते थे. पर पाठ के समय भावावेश में उसके नेत्रों से अश्रु की धारा बहती रहती थी. एक दिन महाप्रभु ने उससे पूछा कि आप गीताजी का अर्थ समझ पाते हैं य़ा नहीं? 
ब्राह्मण ने उत्तर दिया- 
" मुझे गीताजी के श्लोकों का अर्थ कुछ भी समझ में नहीं आता है. पर जब मैं गीताजी का पाठ करता हूँ तब मुझे श्रीकृष्ण, अर्जुन को कुछ उपदेश दे रहे हैं, ऐसा दृश्य बिल्कुल स्पष्ट दिखायी  पड़ता है. श्रीकृष्ण के मधुर रूप को देख कर भावावेश में मैं रोता रहता हूँ |" 
महाप्रभु उसको अपने बाँहों में भर कर बोले- " भाई तुमको मूर्ख कौन कहेगा ? गीताजी का भावार्थ तुमने ही ठीक समझा है. तुम्हारा गीताजी का पाठ ही ठीक है ! "
साधारणतः लोग शब्दों की विभिन्न प्रकार की व्याख्या और पाण्डित्य प्रदर्शन में अपना समय व्यतीत करते हैं. जबकि हमारे शास्त्रों का प्रमुख उद्देश्य " ईश्वर-लाभ " (भगवत्प्राप्ति ) है! 
सके लिये सदगुरु से आवश्यक साधना की पद्धति को प्राप्त होने के बाद उसी में डूब जाना चाहिये. तभी लक्ष्य की प्राप्ति हो सकती है.लक्ष्य की प्राप्ति ( ईश्वर-प्राप्ति ) होने तक विश्राम नहीं लेना चाहिये!
दो वर्ष तक विभिन्न स्थानों में भ्रमण करने के बाद महाप्रभु रथ यात्रा के पहले पूरी पहुँचे.रथ के आगे संकीर्तन में महाप्रभु को मधुर प्रेमावेश में नृत्य करता देख कर  उत्कल राज प्रतापरूद्र भी सर्वदा के लिये महाप्रभु के भक्तों में सम्मिलित हो गये.
एक दिन नित्यानंदजी को बुलाकर मह्प्रभु ने कहा- " मैंने सर्वदा के लिये गृह-त्याग कर सन्यास ले लिया है.तुम भी यदि मेरी तरह अवधूत-वृत्ति से इधर-उधर भटकते रहो तो संसारी गृहस्थ लोगों का उद्धार कैसे होगा ?
मेरा अनुरोध है कि तुम विवाह करो. तुम्हारे द्वारा आदर्श गृहस्थ धर्म की स्थापना हो. गृहस्थ लोग तुम्हें अपनी दो पत्नियों के साथ भी 
आदर्श जीवन व्यतीत करते देख कर अपना जीवन भी उसी तरह व्यतीत करेंगे. मनुष्य के कल्याण के लिये तुम्हें गृहस्थ आश्रम में रहते हुए वैष्णव धर्म का प्रचार करना पड़ेगा. " 
तबतक नित्यानंदजी सन्यासी के समान अवधूत रूप में रहते थे पर उन्होंने सन्यास ग्रहन नहीं किया था. महाप्रभु के निर्देश से पूरी से वापस लौट कर नित्यानंदजी ने विवाह किया. खड़दह (प.बंगाल) में उन्होंने अपना अधिक समय व्यतीत किया.( खड़दह के प्रसिद्ध श्यामसुंदर के मन्दिर की कहानी नवनी दा पहले ही कह चुके हैं.) 
काशी में उस समय अद्वैतवादी सन्यासी संप्रदाय में स्वामी प्रकाशानंद सरस्वती प्रधान माने जाते थे. काशी सदा से शास्त्र अध्यन का केन्द्र रहा है. उनकी विद्वता से प्रभावित हो कर विभिन्न स्थानों से, विद्यार्थी वेदान्त तथा अन्य शास्त्रों का अध्यन करने आते थे. महाप्रभु द्वारा नाम-संकीर्तन में भावावेश में किये गये नृत्य को उन्होंने सन्यासी के आचरण के प्रतिकूल कहा. 
सन्यासी होते हुए भी वेदान्त का अध्यन न कर महाप्रभु केवल नाम जप और संकीर्तन करते हैं, यह कार्य उन्हें अच्छा नहीं लगा. पर श्री चैतन्य महाप्रभु ने विभिन्न शास्त्रों से प्रमाणित किया कि, मनुष्य जीवन का प्रधान लक्ष्य भगवत्प्रेम की प्राप्ति (ईश्वरलाभ करना है)!
और उसकी प्राप्ति की मुख्य साधना है- " नाम जप तथा नाम-संकीर्तन " (जैसे हमलोग खण्डन भवबन्धन आदि आरात्रिक गाते हैं) ! महाप्रभु के पास से वेदान्त-सूत्र य़ा ब्रह्मसूत्र की इस प्रकार व्याख्या सुन कर प्रकाशानंद जी महाप्रभु के शिष्य बन गये. इस परिवर्तन से काशी में भी महाप्रभु का नाम स्थापित हो गया.
काशी से भ्रमण करते हुए महाप्रभु नीलाचल पूरी पहुँचे. पूरी आने के बाद शेष १८ वर्ष उन्होंने वहीं बिताये. उत्तर और दक्षिण भारत की धर्म और संस्कृति  की मिलनभूमि है- नीलाचल पूरी. जहाँ के दारुब्रह्म श्री जगन्नाथ जी का दर्शन एवं महाप्रसाद का सेवन करके सारे भारतवर्ष के लोग अपने को धन्य समझते हैं. इसी नीलाचल से महाप्रभु धीरे-धीरे सारे भारतवर्ष (उत्तर-दक्षिण) में प्रसिद्ध हो गये. (नीलाचल पूरी में महामण्डल का केन्द्र है? उसको मजबूत करना होगा.)
पूरी में महाप्रभु गंभीरा नामक मठ में रहते थे. अपने भक्त हरिदास को प्रखर धूप में भी नाम जप मग्न देख कर छाया करने के लिये महाप्रभु ने मौलश्री (बकुल) की एक टहनी को जमीन में लगा दिया. थोड़े ही समय में उसने एक विशाल वृक्ष का आकार धारण कर लिया. आज भी पूरी में वह, ५०० वर्ष प्राचीन वृक्ष- 'सिद्ध बकुल वृक्ष ' के नाम से प्रसिद्ध है. 
महाप्रभु के गृहस्थ भक्तों में श्री अद्वैताचार्य, श्री नित्यानन्द, राघव पण्डित, श्रीवास आदि द्वारा वैष्णव धर्म का प्रचार हुआ.
साधारणतः दीक्षा की दो परम्परायें प्रचलित हैं. एक है त्यागी शिष्यों की ' शिष्य-प्ररम्परा ' (जैसे रामकृष्ण-विवेकानन्द भावधारा य़ा गुरु-शिष्य परम्परा) और दूसरी गृहस्थ महात्माओं की वंश परम्परा. गृहस्थ वैष्णवों की वंश परम्परा के आचार्य कुलगुरु कहलाते हैं. साधारण गृहस्थ लोग {जिनमे साधारण बोध (common sens ) कम रहता है? } इनके आदर्शों को आसानी से अनुसरण कर सकते हैं.
महाप्रभु के इस प्रकार त्यागी(निमाई) और गृहस्थ (निताई) वैष्णवों के द्वारा प्रेम-धर्म का प्रचार कार्य बहुत शीघ्रता से हुआ. 
(उसी प्रकार श्रीरामकृष्ण परमहंस देव के द्वारा कहे गये महावाक्य - " ईश्वर ही वस्तु और सब अवस्तु है! " एवं " शिवज्ञान से जीव सेवा " पर आधारित नूतन प्रेमधर्म को पहले पूरे भारतवर्ष में;  फिर सम्पूर्ण पृथ्वी पर शीघ्रता से फैला देने के लिये मानव-प्रेमी स्वामी विवेकानन्द ने ठाकुर के त्यागी और गृहस्थ दोनों संतानों के लिये क्रमशः दो महावाक्य दिये| 
सन्यासियों के लिये-  " आत्मनोमोक्षार्थम जगत हिताय च "  एवं गृहस्थों (समाज के अभिभावकों  जैसे बासूदा, उषादा, रनेनदा...आदि) के लिये -" Be and Make " " मनुष्य बनो और बनाओ! "
इस प्रकार श्रीरामकृष्ण परमहंसदेव के त्यागी और गृहस्थ भक्तों के सम्मिलित प्रयास( चरित्र निर्माण कारी आन्दोलन) के माध्यम से ठाकुर के  दोनों महावाक्य -" ईश्वर ही वस्तु और सब अवस्तु है! "एवं " शिवज्ञान से जीव सेवा " - सम्पूर्ण भारत में फ़ैल जाएगी!}
श्री चैतन्य महाप्रभु ने ' रागानुगा भजन ' भजन की पद्धति का प्रचार किया. उन्होंने स्वयं कोई ग्रन्थ नहीं लिखा और न किसी ' विशिष्ट मतवाद ' पर आधारित मन्दिर आदि की स्थापना की. अपने उपदेशों को उन्होंने आठ श्लोकों में वर्णित किया है जो " शिक्षा-अष्टक" श्लोक के नाम से प्रसिद्ध है. वेदों में परमात्मा को सत चित आनन्दमय कहा गया है. महाप्रभु का जीवन मानो सत चित आनन्द का साकार विग्रह है. उनका कहना था- ईश्वर परम करुणामय एवं मंगलमय हैं, उनका प्रेम हर जीव पर समान रूप से है, मायाबद्ध जीव का उद्धार करना उनका मुख्य कार्य है.
{अपने दिव्य प्रेम से वे भक्तों को १००० माइल से भी अपनी ओर आकर्षित करते हैं.स्वामी विवेकानन्द के आह्वान पर  महामण्डल के युवा- शिविर में भागलेने से भगवान श्री रामकृष्ण परमहंस देव की कृपा दृष्टि युवा शिविरार्थी भाइयों पर अवश्य पड़ती है, और वे चरित्र-निर्माण के पथ पर अग्रसर हो जाते हैं. इस सत्य को हम-आप अपने व्यक्तिगत जीवन में आये परिवर्तन को देख कर समझ सकते हैं.} 
भगवान के साथ मनुष्य का नित्य सम्बन्ध है. वह ईश्वर का नित्य दास है. इस नित्य-सम्बन्ध को साधक (केवल चरित्रवान दीक्षाप्राप्त साधक) नामस्मरण (गुरु-प्रदत्त मन्त्र का स्मरण), विग्रह सेवा (T की छवि की पूजा ) मन में ठाकुर-माँ -स्वामीजी की लीला के स्मरण-मनन से साधक ' मनुष्य ' बन कर - " ब्रह्म अवलोक धिषनम पुरुषं विधाय मुदमाप देवः " का अर्थ जान लेने के बाद वह- प्रेम भक्ति धर्म (दिव्यप्रेम का ) अधिकारी (नेता) बनकर य़ा
" giver will kneel down and pray "and 
" reciever will standup and parmit " 
का अर्थ जानकर अपने को गुरु य़ा नेता रूपी ईश्वर (T) का नित्य दास मानने लगता है.} 
चाहे सन्यासी हो अथवा शूद्र य़ा ब्राह्मण, जिन्होंने श्री कृष्ण प्रेम की प्राप्ति की हो- (सिया-राममय जगत में मनुष्य को ही अपना इष्ट समझता है) - वही गुरु (नेता) हो सकता है. इसी कारण मुसलमान कुल में पालित होने पर भी ' हरिदासजी ' नामजप से जगत्पूज्य हो गये.
श्री चैतन्य महाप्रभु ने भगवान के ' रसो वै सः ' स्वरुप (God is LOVE ) को अपने जीवन से प्रकाशित किया. भगवान (महामण्डल के नेता) की लीला मधुरतम है. शब्द तथा मन के द्वारा इसका वर्णन (कल ही से चैतन्य महाप्रभु के " अचिन्त्य-भेदाभेद वाद " पर चर्चा हुई और आज (२५-७२०१० को) हावड़ा स्टेसन के सर्वोदय बुकस्टाल में प्रो. रामसिंह तोमर,हिन्दी भवन, विश्भारती, शान्तिनिकेतन द्वारा लिखित पुस्तक मेरे हाथ में कैसे आ गयी ?) विश्वास पूर्वक सब समय नाम स्मरण एवं संकीर्तन की जगह केवल महामण्डल का कार्य करने से भक्तगण ठाकुर की कृपा का अनुभव कर सकते हैं.
इस परम तत्व को उन्होंने " अचिन्त्य- भेदाभेद " नाम से कहा है.सच्चिदानंदमय भगवान की लीला " अखिल भारत विवेकानन्द युवा महामण्डल " का युवा प्रशिक्षण शिविर पूर्ण -साधना पथ है.}
भगवान की लीला मधुरतम है. उनकी लीला में विरह और मिलन दोनों सत्य हैं. शब्द और मन के द्वारा इसका वर्णन और इसकी धारणा करना असम्भव है. विश्वासपूर्वक सब समय नाम स्मरण एवं संकीर्तन से भक्तगण उनकी कृपा अनुभव कर सकते हैं. इस परम तत्व को उन्होंने " अचिन्त्य- भेदाभेद " नाम से कहा है. सच्चिदानंदमय की लीला पूर्ण है. उनकी उपासना ही मनुष्य जीवन का प्रधान कर्तव्य है. इस सहज मार्ग का प्रदर्शन श्री चैतन्य महाप्रभु ने अपने जीवन में दर्शाया. ( श्री श्री विजयकृष्ण भक्त संघ पोस्ट -रघुनाथपुर, जिला- पुरुलिया, पश्चिम बंगाल पिन कोड- ७२३१३३ द्वारा प्रकाशित पुस्तक साधना पथ नामक पुस्तक के अंश से साभार लिया गया )                   
               श्रीचैतन्य ने स्वयं लिख कर किसी वाद की रचना नहीं की है; किन्तु उन्होंने जो उपदेश दिये हैं, अपने भावों को जिस प्रकार से अभिव्यक्त किया है, उन सबको आधार मानकर उनकी शिष्य-परम्परा ने उनसबको ग्रथित किया है, एवं इस प्रकार से संग्रहित करके उनके भाव को - " अचिन्त-भेदाभेद " भाव कहते हैं. कितना अपूर्व भाव है, भेद और अभेद - ये दोनों अचिन्त्य हैं. अब इस अचिन्त-भेदाभेद से भी शंकर का अद्वैतवाद एक पुनः खण्डित हुआ| फिर उसकी पुनर्प्रतिष्ठा भी हुई.
इसी प्रकार हम समझ सकते हैं कि से सप्तम शताब्दी से लेकर सोलहवीं शताब्दी तक, यह अद्वैतवाद कई-कई बार खण्डित होकर पुनः पुनः प्रतिष्ठित होता आया है ! 
(पूर्ण चन्द्र को देखकर समुद्र जैसा प्रसन्न होना चाहिये। ईर्ष्या नहीं करो, जलो मत,दूसरों को बढ़ता देखकर प्रसन्न हो जाओ। पौन्ड्रक राजा नकली हाथ लगाकर अपने कृष्ण कहने लगा। कृष्ण के घर झगड़ा क्यों नहीं है ? मैं एक से अनेक हो सकता हूँ, फिर अनेक से एक हो सकता हूँ। नारद को दिखाया कि सभी नारियों के साथ ईश्वर बैठ सकते हैं, नारद कृष्ण को साधारण मनुष्य समझने की भूल कर रहे थे।
भीम के साथ जरासंध का युद्ध २७ दिन क्यों चला ? जरासंध सब के उपर अपना प्रभाव डालता है। संसार में जो आएगा उसको बुढ़ापे से युद्ध करना ही पड़ेगा। सीढ़ी पर चढ़ते समय घुटना से रोज हराता है।जरासंध को कैसे हराएँ ? मानसिकता बनानी होगी, रीभैटल खाओ, पर ममता मत आने दो, दोनों बेटों से सामान प्रेम नहीं होगा, छोटका कैसे भी एडजेस्ट हो जाये! तो प्राण ठीक से निकलें , भजन नहीं करोगे तो ह्रदय जलता रहेगा।भजन करना सीख लेंगे तो चिंता निवृत हो जाती है। भीम को संकेत-सूत्र में जरासंध को मारने उपाय दिए,एक फूल को बीच से तोड़ कर विपरीत दिशा में फेंक दिए। माने-शरीर को संसार की सेवा में लगा दो,मन को भगवान में लगा दो. हमलोग उल्टा ही करते हैं, शरीर से गंगा में डुबकी लगाते हैं, पर मन में पति,पुत्र,पोता रहता है, उनके नाम की भी डूबकी लगते हैं। पोता-नाती से नाता नहीं जोड़ कर प्रभु में नाता जोड़ो। पुत्र के विवाह के बाद श्रीकृष्ण ने १६००० विवाह किया था। श्यामान्तक मणि से ८ तोला सोना प्रकट होता था। श्रीकृष्ण ने कहा सत्राजित तुम उस मणि को राजकोष में जमा कर दो।राजनीती ये कहती है कि सीमा से अधिक धन किसी के पास नहीं हो, जैसे आजकल टैक्स लगता है। वो नहीं माना, तो बाद में वार्ता से समझाने का तारीख दिए। इसी बीच उसके भाई प्रसेन को मार कर वो मणि एक भालू ने ले लिया। पर सत्राजित ने कलंक लगाया की श्रीकृष्ण ने ही मणि लेने के लिये मार दिया। उसी दिन श्रीकृष्ण ने कुर्सी छोड़ दिया। और खुद खोज में निकले। आज तो कोई प्रमाण होने से भी इस्तीफा नहीं देता। सारी लीला में मंथरा कारण नहीं है, सरसवती का भी नहीं है, सबकुछ ठाकुर की इच्छा है। माया को नचाने वाले भगवान श्रीराम हैं। देखा आँख ने, मुख ने चखा और पेट ने रखा। आम के मालिक ने चार डंडा मारा , मार किसको लगी पीठ को, आंसू कहाँ से निकले आँखों से, शुरुआत जहाँ से होती है, अंत में दंड भी उसको ही मिलता है। रघुवीर ही पृथ्वी के श्रेष्ठ वीर हैं, जामवंत से युद्ध अगले अवतार करूँगा। आपकी कला मैं लीला पुरुषोत्तम में देखूंगा। ]
      
     
 
 

Thursday, July 22, 2010

' वैराग्यसूक्ति ' [36] महाकाल सब का ग्रास करने के लिये दौड़ रहा है

संगीत सिखाने वाले गुरु का प्रणाम-मन्त्र क्या होगा? 

विषयासक्ति रहे तो सन्यास लेने पर भी कुछ नहीं होता-जैसे थूक को फेंककर फिर चाट लेना|" वीरेश्वरदा 
 कहा करते थे,देखो- सुर, ताल और शब्दों की सहायता से मन की भावनाओं को अभिव्यक्त कर देने को ही संगीत कहते हैं. इसीलिये बहुत दिनों पूर्व बाल-कौतुक (बचपना) के तरंग में आकर मन में यह विचार उठा था कि, गाना सिखाने वाले गुरु का प्रणाम-मन्त्र क्या होगा? मन (बुद्धि) ने उत्तर दिया

" रागश्रुति-लयज्ञानं यस्मिन भावाश्रेये स्थितम |
    नादब्रह्म  मतं  यस्य  तस्मै  श्रीगुरुवे   नमः   ||"

--जिस मनुष्य का मत यह है कि ' ॐ शब्द ' ही ब्रह्म ( प्रथम) है; उन सदगुरु को मेरा नमस्कार है ! इस (स्व-रचित) प्रणाम-मन्त्र को एक दिन उनको (वीरेश्वरदा को) भी सुना दिया, फिर तो उनके आनन्द के ठिकाना न था- वे बहुत खुश हुए!
नाद (शब्द य़ा ॐ ) ही तो ब्रह्म हैं !ब्रह्म तो अनन्त हैं, वे निश्चल हैं, उनका तो कोई ओर-छोर (आदि-अन्त) नहीं है| किन्तु जब वे कम्पायमान (य़ा स्पन्दित vibrate) होते हैं, उसी समय सृष्टि 
(Creation 'or better to say 'Projection ') अस्तित्व में आ जाती है!' नादब्रह्म ' " अर्थात नाद है प्रथम  " { प्रथम य़ा एक ही है- अद्वैत !}  उसी (शब्द ॐ य़ा नादब्रह्म) से प्रक्षेपित (निर्गत) होकर सृष्टि का प्रारम्भ हुआ, और यह सम्पूर्ण विश्व-ब्रह्माण्ड अस्तित्व में आ गया  है !! 
आज का विज्ञान भी इसी बात को अन्य प्रकार से कहता है कि इस जगत में सबकुछ " एक " (महा-विस्फोट अथवा Big -Bang ) से आया है !! धीरे धीरे जगत में प्राणी (य़ा जीव - जिसमे जीवन स्पन्दित होता य़ा धड़कता है) का आविर्भाव हुआ | 
वह प्राणी बिल्कुल सूक्ष्म, ' कीटानुकीट ' छोटा सा कीट य़ा जीव-कोष (जीवाणु जो बढ़कर एक नया प्राणी (SPORE ) हो जाता है-  से आरम्भ करके कितने बड़े बड़े प्राणी ( डायनासोर आदि)की सृष्टि हो गयी वे सभी प्राणी समय के प्रवाह में {जीवों का क्रम- FOOD -CHAIN : जिसमें एक दूसरे को खाता है }लुप्त होते चले गये, पहले बहुत वृहद् आकार के मानो कोई छोटा सा पहाड़ हो, इतने विशाल-विशाल आदि, जीव हुआ करते थे. किन्तु इन सभी जीवों में ' मनुष्य ' नामक प्राणी एक विचित्र जीव है !!
श्रीमद भागवत (के " एकादश- स्कंध ") में बड़े ही सुन्दर ढंग से कहा गया है कि,  मनुष्य क्यों एक विचित्र (सर्वश्रेष्ठ) प्राणी है, एवं स्वामीजी की रचनाओं (विवेकानन्द साहित्य खंड १: पृष्ठ ५३ ) में भी हमलोग देख सकते हैं. ईसाईधर्म के ग्रन्थ (बाइबिल) में भी, सृष्टि की रचना का उल्लेख है:तो इस प्रकार भगवान ने नाना प्रकार की सृष्टि रचना की. किन्तु कोई मनुष्य जब किसी वस्तु की रचना करता है, तो उस रचना को देखने से उसको एक प्रकार का आनन्द भी प्राप्त होता है ! स्वयं किसी वस्तु का निर्माण करने से आनन्द होता है ! जैसे किसी कथाकार को एक अच्छी कहानी लिखने से,किसी को अच्छा निबन्ध लिखने से,किसी को एक सुन्दर कविता लिखने से,किसी को अपने द्वारा बनाय गये सुन्दर चित्र को देखने से ...से आरम्भ करके जो कुछ भी मनुष्य रचता है (सुन्दर-ढंग से बनाता है) उसमे उसको उस रचना करने का सुख य़ा आनन्द तो प्राप्त होता है| एक प्रकार के  संतुष्टि का भाव मन में अवश्य आता है. किन्तु भगवान को समस्त विश्व-ब्रह्माण्ड रच देने के बाद भी आनन्द नहीं आ रहा था| तब उन्होंने मनुष्य की रचना की, और अपनी इस कीर्ति को देख कर स्वयम अवाक् रह गये|
भागवत में यह प्रसंग आता है--      
      सृष्ट्वा पुराणि विविधान्यजयात्मशक्त्या |
          वृक्षान-सरीसृप-पशुन-खग- दंश- मत्स्यान ||  
    तैस्तैरतुष्टहृदयः    पुरुषं     विधाय |
           ब्रह्मावलोकधिष्णम       मुदमाप     देवः ||   
(भागवत : ११:९:२८)
 देव (सृष्टा य़ा परमहंस देव) ने पूर्व-काल में अपनी आत्मशक्ति के द्वारा भाँती-भाँति के स्थावर,जंगम सभी प्रकार के जीवों; यथा गाँछ-वृक्ष, सरीसृप, पशु-पक्षी, डंक मारने वाले, मत्स्य आदि जलचर जीवों की सृष्टि करके भी तृप्त नहीं हो सके, तब उन्होंने 'मनुष्य' की रचना की - जो मनुष्य ब्रह्म (प्रथम) को, अपने बनाने वाले को भी जान सकता है| जब (परमहंस) देव ने यह देखा कि मनुष्य तो ब्रह्म-ज्ञान तक प्राप्त कर सकता है, तब उनको अपनी इस अदभुत रचना को देख कर महा आनन्द हुआ|  
भगवान (ठाकुर) ने मनुष्य की रचना कर के कहा - " समस्त देवदूतदेर डेके आनो ! "" -- समस्त देवदूतों (messengers of God य़ा फरिस्तों) को बुलाकर ले आओ ! " 
सभी देवदूतगण (य़ा मानवजाति के सच्चे ' नेता ' गण) जब आये, तो आनन्द से पुलकित होकर भगवान बोले - देखो, देखो, मेरी इस रचना को देखो, इस बार मैंने कैसी अदभुत रचना की है- जरा इसको तो देखो! उनलोगों ने अवाक् होकर देखा | भगवान ने देवदूतों को आदेश दिया- 
" इस मनुष्य को तूम सभी लोग प्रणाम करो ! 
यही मेरी श्रेष्ठ रचना है, यह मनुष्य ही 
सबों के लिये प्रणम्य है; तुमलोग इसे प्रणाम करो !" 
सभी फरिस्तों ने तो प्रणाम किया, पर एक फरिस्ते ने प्रणाम नहीं किया| जिस देवदूत ने मनुष्य को प्रणाम नहीं किया- उसका नाम हुआ शैतान! जो ' मनुष्य '- मनुष्य के सामने अपने सिर को नहीं झुकाता है, वही है शैतान ! 
हमलोग ' श्रीरामकृष्ण परमहंस देव ' के जीवन में क्या देखते हैं ? हमलोगों ने देखा है कि वे सभी के सामने अपने सिर को झुका रहे हैं. बलराम बसु के घर पर गिरीश चन्द्र घोष को उनका प्रथम दर्शन हुआ था. उस दिन बलराम बसु के घर पर श्रीरामकृष्ण परमहंसदेव आये हुए थे. उनके घर के बिल्कुल निकट में ही गिरीश चन्द्र घोष का मकान भी था. उनके साथ और एक विशिष्ठ व्यक्ति थे, जो पत्रकार थे. वे गिरीश घोष के बड़े करीबी मित्र थे. वे आकार गिरीश घोष को कहते हैं-
" वहाँ एक ' परमहंस ' आये हैं, आप भी देखने जायेंगे क्या ? "   
 परमहंस कहने के बाद कुछ लोग 'परमहंस'  की नकल किस प्रकार किया करते हैं- यह बात ठाकुर भी जानते थे| बगुला के आकार जैसा अपने हाथ को ऊँचा करके कहते थे "परमहंस", और पीछे से अपने मुँह को बगुला के जैसा बना कर दिखाते थे.यह बात को ' ठाकुर देव 'जानते थे - इस बात पर हँसा करते थे, तथा उसका आनन्द उठाते थे. 
जो हो, वह सज्जन मित्र अपने साथ गिरीश घोष को भी ले गये और सीढियों पर चढ़ कर बरामदे में पहुँचे. देखते हैं किनारे एक कमरा है, उसी कमरे में एक व्यक्ति बैठे हैं. कमरे के अन्दर नहीं गये हैं, खिड़की से ही झांक कर देख रहे हैं. बहुत से लोग उस कमरे के भीतर प्रवेश कर रहे हैं, एवं उनको प्रणाम कर रहे हैं. किन्तु किसी व्यक्ति के प्रणाम करने के पूर्व ही, जमीन पर सिर रख कर वे ही उसको प्रणाम कर दे रहे हैं. अच्छे-बुरे में भेद किये बिना सभी मनुष्य को प्रणाम कर रहे हैं.
सतोगुणी व्यक्ति बाहरी रूप से वैसा न कर, यदि मन ही मन समस्त मनुष्य को प्रणम्य बोध करे | (साधु और पापी में अन्तर देखे बिना) मानवमात्र को प्रणम्य बोध करते हुए, उसके समक्ष कम से कम मानसिक रूप से भी अपने सिर को झुकाने के लिये सदैव तत्पर रहता हो - तब ऐसे किसी मनुष्य को देख कर समझ लेना होगा कि वे साधारण मनुष्य नहीं हैं !
गिरीश चन्द्र के मित्र ने उनसे कहा- " परमहंस- को तो देख लिया न ? अब यहाँ से निकल लो !" 
किन्तु उसके बाद से तो गिरीश घोष के मन में उत्ताल तरंगे उठने लगीं ; कौन है यह अदभुत ' मनुष्य '? जो सभी मनुष्य को (नीच से नीच को भी) अवनत हो कर, (उसके चरणों में गिर कर) प्रणाम करने में समर्थ हुआ है?
{इसीलिये गाना के गुरु के प्रणाम मन्त्र में कहा गया है - 
Music maestro of the Mahamandal, 
" बीरेश्वर  चक्रबर्ती "

"नादब्रह्म मतं यस्य तस्मै श्रीगुरुवे नमः ||" }
इसी लिये तो, जब वृक्ष, लता, जल इत्यादि बनालिये, समुद्र इत्यादि बना लिये- तब भी उनको अपनी रचना में वह आनन्द नहीं मिला, तब -      
            "  .... पुरुषं  विधाय..ब्रह्मावलोकधिष्णम..."   
  ब्रह्म की ही प्रतिमूर्ति स्वरुप - 'मनुष्य'  की रचना करके, जो मनुष्य ब्रह्म को भी जान सकता है-- ऐसे अदभुत-मनुष्य का निर्माण करके, " मुदमापदेवः " - तब सृष्टा को महा आनन्द हुआ ! 
{२ जून १८८३ को श्रीरामकृष्ण दक्षिणेश्वर मन्दिर से कलकत्ता आ रहे हैं. ...श्रीरामकृष्ण गाड़ी में आते आते राखाल, मास्टर आदि भक्तों से कह रहे हैं,..." देखो, उन पर प्रेम हो जाने पर पाप आदि सब भाग जाते हैं, 
जैसे धूप से मैदान के तालाब का जल सुख जाता है....विषय की वासना तथा कामिनी-कांचन पर मोह रखने से कुछ नहीं होता. यदि विषयासक्ति रहे तो सन्यास लेने पर भी कुछ नहीं होता-जैसे थूक को फेंककर फिर चाट लेना|"
थोड़ी देर बाद गाड़ी में श्रीरामकृष्ण फिर कह रहे हैं, " ब्रह्मसमाजी लोग साकार को नहीं मानते| (हँसकर) नरेन्द्र कहता है, ' पुत्तलिका !' (गुड्डा-गुड्डी बनाकर उसकी पूजा करने वाले मूर्ति-पूजक) फिर कहता है, ' वे अभी तक कालीमंदिर जाते हैं|' 
श्रीरामकृष्ण बलराम के घर आये हैं, वे एकाएक भावाविष्ट हो गये हैं| सम्भव है देख रहे हैं,ईश्वर ही जीव तथा जगत बने हुए हैं, ईश्वर ही मनुष्य बनकर घूम रहे हैं|  जगन्माता से कह रहे हैं, " माँ, यह क्या दिखा रही हो ? रुक जाओ; यह सब क्या दिखा रही हो ? राखाल आदि के द्वारा क्या दिखा रही हो, माँ ! रूप आदि सब उड़ गया| अच्छा माँ, मनुष्य तो केवल ऊपर का ढाँचा ही है न ? चैतन्य (उसमे नाद य़ा vibration) तो तुम्हारा ही है! "(श्रीरामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग) : पृष्ठ:२०६ )}
ये जो ब्रह्म हैं, जिनसे वह नाद (ॐ vibration) उथित हुआ था, और जिसके कारण ही प्रत्येक वस्तु ने अपनी चंचलता (य़ा चैतन्य) को प्राप्त किया है, समस्त सृष्टि बनी है, उस (नाद-ब्रह्म य़ा) ' प्रथम नाद ' से ही समस्त सृष्टि (जीव-जन्तु, पशु-पक्षी, उद्भिज) निकली है ! ! - उस ' प्रथम-वस्तु ' (ब्रह्म) को कौन समझ सकता है ? - एकमात्र ' मनुष्य ' ही समझ सकता है, मनुष्य के जीवन का उद्देश्य भी यही है ! 
मनुष्य जीवन का श्रेष्ठ उद्देश्य (Chief Aim of Life) क्या है ? (मननशील) मनुष्य के मन में यह विचार अवश्य उठता है कि, मैं जहाँ से आया हूँ- उस उद्गम य़ा श्रोत को पहले जान लेना होगा! (जब सारे शास्त्र और गुरु कहते हैं कि नादब्रह्म य़ा) ब्रह्म से ही मैं भी आया हूँ, तो मुझे उस ब्रह्म (नाद, ॐ य़ा सत्य) को अवश्य ही जान लेना होगा| 
कुछ उपनिषदों में प्राचीन ऋषियों द्वारा उदघाटित य़ा आविष्कृत सत्यों  को " महावाक्य " कहा जाता है! महावाक्य के अन्तर्गत अनेक वाक्य कहे गये हैं| उन में से मात्र कुछ वाक्यों को लेकर, आचार्य शंकर ने (कुल ११) उपनिषदों पर भाष्य की रचना की है. महर्षि व्यासदेव ने ब्रह्मसूत्र की रचना की थी, एवं उसके ऊपर भाष्य लिखा था आचार्य-शंकर ने| उनमे अनेकों सूत्र दिये गये हैं, किन्तु उसमे कहे गये तीन सूत्रों  को सदा के लिये अपने मन में बैठा लेने की आवश्यकता है| वे तीन (प्रमुख) महावाक्य हैं- 
" तत्वमसि "   
 - 'तत ' वह ब्रह्म तत, ' त्वम असि '; अर्थात वह ब्रह्म तूम ही हो !
" अहं ब्रह्मास्मि " 
    - अर्थात मैं (पाका-आमि) ही ब्रह्म हूँ !
" सर्वं खल्विदं ब्रह्म "
- यह सब कुछ ब्रह्म ही हैं !  
इसी जीवन में इन तीनों सत्यों को स्वयं आविष्कृत कर लेना, य़ा (पहले सुन कर फिर अपने अनुभव से ) जान लेना ही मनुष्य जीवन का उद्देश्य है| जिस उद्गम-श्रोत (य़ा उर्ध्व-मूल) से आया हूँ, उसी मूल में लौट जाना ही मेरे जीवन का परम-लक्ष्य य़ा श्रेष्ठ-उद्देश्य है! जिसको अपने इसी जीवन में इस सत्य की अनुभूति नहीं हुई - फिर उसका और क्या हुआ ? (यह दुर्लभ मनुष्य जीवन तो व्यर्थ में ही बीत गया)
यहाँ आया, खाया-पिया और नाना प्रकार के विषयों का भोग किया, सारे जीवन भर भोगों में डूबा रहा, फिर एकदिन -भोगों के बीच ही मर गया ! किन्तु भोगों के बीच ही मर जाने के समय तो कुछ बोध नहीं होगा। और अभी- यहाँ संसार में (जीवित ) रहते समय हमलोग क्या कर रहे हैं ? स्कूल में पढ़ते समय अपने पण्डित-महाशय (संस्कृत शिक्षक) से एक बहुत ही सुन्दर ' वैराग्यसूक्ति ' इसी सम्बन्ध में हमलोगों ने सुना था -
भेको धावति तं च धावति फणी सर्पं शिखी धावति
व्याघ्रो धावति केकिनं विधिवशाद् व्याधोऽपि तं धावति ।
स्वस्वाहारविहारसाधनविधौ सर्वे जना व्याकुलाः
कालस्तिष्ठति पृष्ठतः कचधरः केनापि नो दृश्यते ॥४५॥


  - एक बेंग दौड़ा जा रहा है. साप का खाद्य पदार्थ बेंग है, साप बेंग के पीछे से धोखा देकर उसको खा डालने के लिये दौड़ रहा है. मयूर साप को खाता है, साप के पीछे मयूर दौड़ता है. मयूर के पीछे बाघ, बाघ के पीछे शिकारी दौड़ता है. सभी अपने अपने आहार के पीछे दौड़े चले जाते हैं|और सबों के पीछे महाकाल सब का ग्रास करने के लिये दौड़ रहा है, पर उसकी ओर किसी का भी ध्यान नहीं जाता !
 [ जरासन्ध का पहला आक्रमण बालों पर होता  है, पर डाई करके हरा देते हैं। फिर डेन्टिस्ट से दांत ठीक करा लेते हैं। घुटनों पर होता है। आँखों पर होता है। ४ बार जरा संध को हमलोग हरा लेते हैं, ६० में रिटायर हो जाने के बाद भी हमलोग अपने को बूढ़ा नहीं समझते हैं। कुछ न कुछ उपार्जन के कार्य में या नयी नौकरी खोज लेते हैं। बूढ़ा तो हमलोग मरने के बाद होते हैं। मरने के पहले कोई बूढ़ा होने को तैयार नहीं होता। श्रीकृष्ण ने जरासंध को १७ बार हर दिया था। मथुरा हमारा शरीर है, मथुरा को एक दिन सब को छोड़ना पड़ेगा। श्रीकृष्ण ने मथुरा छोड़ने के पहले ही द्वारका का निर्माण कर लिया था। उसी प्रकार ६० के बाद ह्रदय को द्वारिका पहले बना लो, मथुरा छोड़ कर सीधा बैकुंठ धाम में रहने का प्रबन्ध कर लो। 
यदुवंशियों के पतन का समय आ गया था। धन बहुत आ जाता है, तो धर्म कम करते हैं, अपराध ज्यादा करते हैं। धन यौवन का मद -कपूर की तरह उड़ जायेगा। नारायण गोपाल भज क्यों चाटे जगधूल? धन का सदुपयोग करो, युवावस्था में सेवा करो, ताकत ज्यादा है तो ब्राह्मणों का अपमान मत करो। नृग राजा को गिरगिट योनि क्यों मिला ? सूर्यवंश में जन्म लिया था, दान तीन है। सतो गुणि दान करने वाला बदले में कुछ चाहता नहीं है। दान देने का अहंकार ही पतन का कारण है। देन हार कोई  और है, पर अहंकारी अपने को दानी समझता है। गलती से दूसरे की गाय दान कर दिया। नृग को गिरगिट बना दिया। पर भूख से अधिक मत खाओ, एक रोटी ज्यादा खा लोगे तो कोई दूसरा भूखा रहेगा। मातायें अन्न बचाने के बहाने ज्यादा खा लेती है।
प्रथम पत्नी रुक्मिणी का हरण करके द्वारका में लायें हैं, आपने कृष्ण-काले को क्यों पसंद किया ? शिशुपाल से तुम्हारी सगाई हो गयी है, फिर करा दूँ ?वो मजाक को नहीं समझने से बेहोश हो गयी। दाम्पत्य जीवन का लाभ है कि वे हर समय प्रसन्न रहें। 
भगवान को भी कलंक लगा था। ग्रह का प्रभाव था ? जामवन्त का गुफा (गुजरात) से युद्ध करना पड़ा। जामवंती के साथ दूसरा विवाह , तीसरा विवाह सत्यभामा से हुआ। १६००० स्त्रियों को स्वीकार किया। सत्यभामा के साथ अमरावती गए, कल्प वृक्ष को द्वारका ले आये। ]