Sunday, November 30, 2025

⚜️️🔱श्रीरामकृष्ण तथा ईश्वरलाभ के प्रति उनकी व्याकुलता ⚜️️🔱 स्वामी शुद्धिदानन्द जी महाराज; अध्यक्ष, अद्वैत आश्रम, मायावती | ⚜️️🔱( “Sri Ramakrishna and longing for God”) Bhakta Sammelan || Speech by Swami Shuddhidananda/(Ramakrishna Mission, New Delhi/ 2023)

"श्री रामकृष्ण तथा  जीवनमुक्ति की यात्रा "  

[Sri Ramakrishna and Journey towards Jivanmukti] 

[Bhakta Sammelan || Speech by Swami Shuddhidananda. 

Ramakrishna Mission, New Delhi


ॐ स्थापकाय च धर्मस्य सर्वधर्मस्वरूपिणे । 
अवतारवरिष्ठाय रामकृष्णाय ते नमः ॥

परमपूज्य स्वामी शान्तात्मानन्द जी महाराज, स्वामी विश्वात्मानन्द जी महाराज जी को मेरा प्रणाम , तथा उपस्थित समस्त प्रिय भक्तों के मेरा नमस्कार एवं शुभकामनायें। आज यहाँ हम सभी लोग भक्तसम्मेलन के उपलक्ष्य में एकत्रित हुए हैं। जब हम किसी ऐसे समूह के विषय में सोचते हैं , जो एक ही उद्देश्य के लिए सम्मलित हुए हैं , तो वह समूह बहुत विशेष और विलक्षण हो जाता है। जब ब्रह्माभ्यासी- भक्त लोग परपस्पर मिलते हैं , तो वे आपस में क्या चर्चा करते हैं ?  ऐसे भक्तों के विषय में भगवान श्रीकृष्ण भगवत गीता में (10/9) में कहते हैं , 
मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम्।
कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च।।10.9।।
मुझमें ही चित्त को स्थिर करने वाले और मुझमें ही प्राणों (इन्द्रियों) को अर्पित करने वाले ब्रह्माभ्यासी भक्तजन  जब एक जगह सम्मलित होते हैं , मेरे सत्यस्वरूप के बारे में  विवेक-विचार करते हैं , वे परस्पर चर्चा करके एक दूसरे को मेरे परम तत्व  (भगवान-अवतार-आत्मा-ईश्वर के एकत्व-Oneness ) के विषय में ज्ञान देते हैं और ऐसा करके वे तुष्यन्ति तथा रमन्ति महान संतोष प्राप्त करते हैं, अर्थात उसमें आनन्दित होते हैं। 
    और आज की यह विचारगोष्ठी (symposium या भक्त सम्मलेन) भी इसी उद्देश्य को सामने रखकर आयोजित किया जा रहा है, ताकि आपका मन अपनी स्वाभाविक मानसिक रुझान के अनुसार निरंतर उसी परम सत्य पर केंद्रित रहे; जिस सत्य को आप कोई खास रूपधारी व्यक्ति समझते हों या अरूप समझते हों।  लेकिन सच्चाई यही है कि हम सभी उसी परम सत्य के अन्वेषक या सत्यार्थी (seekers of truth) हैं। यह एक ऐसी विचारगोष्ठी है , जहाँ हमलोग यह जानने के लिए एकत्र हुए हैं कि जीवन में सत्य क्या है ? और हमारे समक्ष 'सत्यम" क्या है; सत्य क्या है इसके एक जीवन्त उदाहरण और अनुकरणीय आदर्श (role model) हैं भगवान , श्रीरामकृष्ण ! (4:25
   आज पूरा दिन आप श्रीरामकृष्ण के जीवन और उपदेशों पर चर्चा सुनेंगे। उनके व्यक्तित्व के विषय में स्वामी विवेकानन्द ने कहा था - " श्री रामकृष्ण वह सर्चलाइट हैं, जिनकी रोशनी में हम हिंदू वैदिक सनातन धर्म के समस्त पहलू को समझ सकते हैं!" ( Sri Ramakrishna is that searchlight, in whose illumination, we can understand the whole gamut of Hindu Vaidik Sanatan Dharma!)  स्वामी जी की यह युक्ति अत्यंत महत्वपूर्ण है, मैं इस बात को पुनः दोहराते हूँ। स्वामी जी कहते हैं - "श्री रामकृष्ण वह सर्चलाइट हैं जिनकी रोशनी में हम हिंदू वैदिक सनातन धर्म के पूरे विस्तार (रेंज) को समझ सकते हैं!" (Shri Ramakrishna is that searchlight in whose illumination we can understand the whole range of Hindu Vaidik Sanatan Dharma !) अब प्रश्न यह उठता है कि हिन्दू धर्म की मुख्य शिक्षा क्या है? "What is the central teaching of Hindu dharma ?" (5:23)
      हिन्दू धर्म की मुख्य शिक्षा क्या है? हिन्दू धर्म की शिक्षा का मूल बिन्दु (Crux) केवल इतना बता देना है कि मनुष्य का वास्तविक स्वरुप क्या है ? इसका कहना है कि मनुष्य मरण-धर्मा शरीर नहीं है, यह अविनाशी आत्मा है। और यही हम सभी का, हममें से प्रत्येक मनुष्य का सच्चा स्वरुप है,तथा इस सत्य की अनुभूति कर लेना ही मनुष्य जीवन का परम लक्ष्य है। उपनिषदों की शिक्षा है - "ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः"  - अर्थात ब्रह्म ही सत्य है, जगत मिथ्या है, और जीव ब्रह्म से अलग नहीं है।' परम सत्य का पूर्ण चित्रण यही है।  this is the complete picturisation of ultimate reality. 
     सत्य क्या है ? एकमात्र ब्रह्म या आत्मा ही सत्य है। और हमलोग अपनी इन्द्रियों से जिस जगत का अनुभव कर रहे हैं , उसके सम्बन्ध में हमारे हिन्दू वैदिक सनातन धर्म के विचार क्या हैं ? यही कि यह दृष्टिगोचर जगत मिथ्या है। और जीव का वास्तविक स्वरूप क्या है ? यह जीव भी ब्रह्म (आत्मा या ईश्वर) के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। तथा जिस जगत को हम देख रहे हैं , यह जगत भी स्वरूपतः  ब्रह्म या ईश्वर ही है। अस्तित्व में एकमात्र ब्रह्म ही है। ब्रह्म से भिन्न और पृथक किसी वस्तु का अस्तित्व नहीं है। उपनिषदों की यही मुख्य शिक्षा है। (7:15
       और यह विचार कि ब्रह्म से भिन्न और पृथक यह मिथ्या जगत जो हमको जैसा और जिस रूप में प्रतीत हो रहा है, वह हमारे हिन्दू सनातन वैदिक धर्म या उपनिषदों के अनुसार यह भ्रांत धारणा अज्ञान (Ignorance) में आधारित है। इसीलिए हमारे उपनिषदों के ऋषि भगवान से एक अद्भुत प्रार्थना करते हैं -
"ॐ असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्मा अमृतं गमय।"
      हर जगह आप पायेंगे कि- जीवन एक अवस्था से दूसरी अवस्था तक पहुँचने की यात्रा है। यहाँ ऋषि प्रार्थना कर रहे हैं कि- ॐ असतो मा सद्गमय, हे भगवान ! मुझे मिथ्या से सत्यं की ओर ले चलो ! मुझे अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो। मुझे मृत्यु से अमरता की ओर ले चलो।" तो आप देखेंगे कि जीवन बंधन की अवस्था से मुक्ति और अमरत्व की अवस्था में पहुँचने की यात्रा है। और इस सिद्धान्त के सर्वश्रेष्ठ मूर्तरूप (embodiment), एक ऐसा व्यक्तित्व जिसके जीवन और चरित्र में हमलोग मिथ्या पहलू का कोई भी चिन्ह दिखाई नहीं देता हो, वे हैं श्रीरामकृष्ण। 
       जब हम श्रीरामकृष्ण के portrait को उनके चित्र को या मंदिर में उनकी प्रतिमा को देखते हैं , तो हम एक विशेष रूप का दर्शन करते हैं; लेकिन उनका यह विशेष रूप किस चीज की द्योतक है ? But what does this  particular form denote ? उनका यह विशेष रूप किस विषय की ओर संकेत कर रहा है? हम श्री रामकृष्ण के जीवन, चरित्र और व्यक्तित्व में किस विशेषता को देखते हैं? जब हम श्रीराकृष्ण के चित्र के सामने बैठकर मनःसंयोग का अभ्यास कर रहे होते हैं , उस समय हमें इसी विषय के बारे में चिंतन करना चाहिए, कि उनके व्यक्तित्व में ऐसे कौन से गुण हैं , जिन्हें हम सभी भक्तों को अपने जीवन में आत्मसात करने चाहिए ? यही मुख्य चिंतनीय बात है। 
     जब हम श्रीरामकृष्ण के चित्र या उनकी प्रतिमा के सामने खड़े होकर इस बात का चिंतन करते हैं कि भगवान श्रीरामकृष्ण देव की छवि या प्रतिमा किस सिद्धान्त द्योतक है? और उसे एक वाक्य में कहना हो तो कहना पड़ेगा कि -श्रीरामकृष्ण की मूर्ति' जो वस्तु 'सत्यं' (ब्रह्म,आत्मा या ईश्वर) है, उसके प्रति तीव्र प्रेम और जो 'मिथ्या' है उसके प्रति उतना ही तीव्र वैराग्य या उतनी ही घोर अनासक्ति की द्योतक है। ठीक है ? श्री रामकृष्ण के जीवन, उनके व्यक्तित्व और उनके चरित्र से हमें यही शिक्षा प्राप्त होती है? अगर आप श्री रामकृष्ण के जीवन में घटित अलग-अलग घटनाओं का इस दृष्टिकोण से विस्तार पूर्वक अध्यन करेंगे;  तो यही पायेंगे कि भगवान श्री रामकृष्णदेव 'सत्यं' के मूर्तमान प्रतीक हैं , तथा जिसे 'मिथ्या' कहा जाता है, उसके प्रति इतना तीव्र वैराग्य और ऐसी घोर अनासक्ति के द्योतक हैं , यही उनका ज्वलंत सन्देश है जिसका दूसरा उदाहरण शायद मानवजाति के इतिहास में हमें खोजने से भी नहीं मिलेगा ! (10:31) श्री                  रामकृष्ण के बारे में बात करते हुए 'माँ' कहती हैं मैं सर्वधर्म समन्वय आदि बातों को नहीं जानती , किन्तु एक बात मैं कह सकती हूँ कि साधारण गणित के आधार पर भी श्रीरामकृष्ण के बारे में यह कहा जा सकता है , कि क्या आजतक जगत में ऐसा त्याग और वैराग्य का ऐसा उदाहरण कहीं और मिलता है ? यही वह ज्वलंत सन्देश है , जो श्रीरामकृष्ण के जीवन से हमें प्राप्त होता है। अतः भगवान श्री रामकृष्ण के एक भक्त के रूप में हमें यह सदा याद रखना चाहिए कि श्री रामकृष्ण उस परम 'त्याग' के प्रतीक हैं। पुनः शास्त्रों की ओर लौटते हुए - हम जिस अमरत्व की बात कर रहे हैं , उस अमरत्व को हमलोग प्राप्त कैसे करेंगे ? आप लोग अमरत्व (Immortality)  प्राप्त करने का तात्पर्य क्या समझते हैं ? इसके लिए- हमलोग ईश्वर लाभ, आत्मनुभूति आदि विभिन्न शब्दों का उपयोग करते हैं , लेकिन इन सभी शब्दों का केवल एक अर्थ है , और वह है मनुष्य का वह सत्य स्वरुप, आत्मसाक्षात्कार या आत्मानुभूति जो अभी हमें प्राप्त करनी है। यही मनुष्य जीवन का मुख्य लक्ष्य है। और इस लक्ष्य की प्राप्ति तभी सम्भव है , जब कुछ अनिवार्य शर्तों को पूरा किया जाये। आज के भाषण का विषय है - 'ईश्वर दर्शन की तीव्र इच्छा या ललक'  किन्तु ऐसी लालसा वैसे ही, अपने आप होने वाली चीज नहीं है। उसके लिए कुछ अनिवार्य शर्तों को पूरा करना जरुरी है , उसको किये बिना ईश्वर दर्शन की तीव्र इच्छा होना सम्भव नहीं है।
       कल्पना करके देखिये , क्या किसी राह चलते व्यक्ति के लिए ईश्वर दर्शन के लिए अचानक तीव्र रूप से व्याकुल हो जाना सम्भव है ? क्या आप अपने बच्चों से अचानक ईश्वर दर्शन के व्याकुल हो जाने की अपेक्षा करते हैं ? हम किसी के भी ऊपर ईश्वर लाभ की आकांक्षा को थोप नहीं सकते। लेकिन कुछ आधारभूत शर्तों को पूरा कर लेने के बाद 'आत्मा' जब इसके लिए तैयार हो जाती है, तब वह आपके लिए सत्य हो जाती है। जैसे मैंने कहा - हमलोग श्री रामकृष्णदेव के जीवन में क्या देखते हैं ? इसी ब्रह्म या आत्मा -जो 'सत्यं' है, नित्य वस्तु के प्रति अतिशय प्रेम (Extreme love)  और अनित्य सांसारिक वस्तुओं - 'कामिनी-कांचन और कीर्ति ' के प्रति चरम वैराग्य और अतिशय अनासक्ति। श्री रामकृष्ण की प्रतिमा या छवि, एक अवस्था से पीछे मुड़ने और दूसरी अवस्था में पहुँचने की यात्रा की द्योतक हैं।
        वेदान्त कहता है-  "ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या' और श्रीरामकृष्ण  हमें बार बार इसी बात को अपनी सरल बंगाली भाषा में  कहते हैं - "भगवान ही एकमात्र वस्तु है, बाकि सब अवस्तु है।" दोनों उक्ति एक ही बात की ओर इंगित करते हैं। किन्तु जब हमलोग इस ब्रह्म, ईश्वर या भगवान शब्द का उपयोग करते हैं , तो ये सभी शब्द और कुछ नहीं केवल उसी आत्मा के संदर्भ में ही कहा जाता है, जो मनुष्य का सच्चा स्वरुप है। और इस जगत में वह आत्मा ही एक मात्र सार वस्तु (substantial) है,और बाकि जो कुछ है सब insubstantial (काल्पनिक पदार्थ) या असार वस्तु है, उसमें कुछ भी सार नहीं है। " 
      अतएव जगत की जिन अनित्य सांसारिक वस्तुओं में (कामिनी-कांचन और कीर्ति में) कुछ भी सार नहीं है, जो बिल्कुल आसार वस्तु (insubstantial) या जो काल्पनिक पदार्थ हैं, उससे अनासक्त होकर, इस जगत में उस एकमात्र 'सार वस्तु' या 'सत्यं वस्तु' - जिसे हम नित्य 'आत्मा , ईश्वर या भगवान' कहते हैं,  की ओर मुड़ जाना ही आध्यात्मिक अन्वेषण की परम सत्य की खोज की; या स्वामी विवेकानंद के 'मनुष्य-निर्माण और चरित्र-निर्माणकारी शिक्षा!'  (Be and Make: चरैवेति,चरैवेति ) की सम्पूर्ण पद्धति है! 
   " So this turning away from that which is insubstantial towards that-substance which is the real in this creation , that is the whole process of Spiritual Pursuit (or 'Be and Make' :Man-making and Character Building Education" of Swami Vivekananda !) 
        अतएव जैसा मैंने पहले कहा था कि जब हम श्री रामकृष्ण की छवि या प्रतिमा के समक्ष खड़े होकर उन्हें निहारते हैं , तो वे हमें चरित्र के कौन से गुण के मूर्तमान रूप प्रतीत होते हैं? So, as I said before when we stand in front of Sri Ramakrishna's Portrait - what does he stand for? वे हमें नित्य ब्रह्म, आत्मा या ईश्वर-जो 'सत्यं' (आत्मज्ञान या ईश्वरलाभ) है, के प्रति अतिशय प्रेम (Intense Love )  और जो मिथ्या है, जो क्षणभंगुर (transient) अनित्य, आसार सांसारिक वस्तु 'कामिनी-कांचन और कीर्ति ' आदि है, उसके प्रति परम त्याग और अतिशय अनासक्ति के मूर्तमानरूप प्रतीत होते हैं। (14:10) आइए उनके जीवन से जुडी कुछ घटनाओं पर नज़र डालते हैं जो इस बात को बहुत साफ़ कर देंगे। हमें इस भक्त सम्मेलन से क्या सीखना है ? जब हम इस सम्मेलन से वापस लौटेंगे , तो अपने साथ क्या लेकर लौटेंगे ? हमलोग जब यहाँ से लौटेंगे तो अपने साथ त्याग की भावना, उस अनासक्ति की भावना को लेकर लौटेंगे जो हमारे जीवन के द्वारा परिलक्षित होंगे। यदि हमारे व्यवहार में त्याग और अनासक्ति का भाव परिलक्षित नहीं हुआ, तो इसका अर्थ यह होगा कि हमने श्रीरामकृष्ण देव के ऊपर ध्यान ही नहीं किया। जब हम श्री राकृष्णदेव पर ध्यान करते हैं, तो हमारे आसन से उठने के बाद उनके व्यक्तित्व में ये जो दो गुण हैं, संसार की अनित्य वस्तु के प्रति अनासक्ति के भाव में थोड़ी वृद्धि और नित्य आत्मा या ईश्वर के प्रति प्रेम में यदि थोड़ी वृद्धि होती हो , तब कहा जायेगा कि हमने सही ढंग से श्रीरामकृष्ण पर ध्यान किया है। 'It is not the question of just focusing the mind on a certain form." श्रीरामकृष्ण पर ध्यान करने का अर्थ मन को  किसी विशेष रूप पर सिर्फ केंद्रित करना ही नहीं है। बल्कि जब आप ध्यान के आसन से उठते हैं, तो उनके कुछ गुणों को - अनित्य सांसारिक वस्तुओं के प्रति त्याग और अनासक्ति तथा सत्य वस्तु के प्रति प्रेम में थोड़ी और अधिक वृद्धि को अपने जीवन में आत्मसात करने के बाद उठे,  और यदि यह नहीं हुआ तो श्रीरामकृष्ण पर ध्यान करने का कोई अर्थ नहीं हैं। क्योंकि वे स्वयं इसी अद्भुत घटना का प्रतिनिधित्व करते हैं। (15:19) त्याग की भावना को उनके जीवन में ध्यान पूर्वक देखिये। और जैसा मैंने पहले कहा, लोग इसके बारे में बहुत बातें करते हैं, कि श्री रामकृष्ण ने सर्वधर्म समन्वय -भाव और ऐसे ही अन्य चीज़ों के लिए अवतरित हुए थे। किन्तु श्री माँ ने कहा था - जगत ने इस तरह के त्याग को अभी तक देखा ही नहीं था , कितना आश्चर्यजनक उनका पर्यवेक्षण था ! श्री माँ कहती हैं - " मेरे मन को यह ठीक नहीं जँचता कि 'श्रीरामकृष्ण ने Harmony of Religion या सर्वधर्म समन्वय-भाव का प्रचार करने के उद्देश्य से ही विभिन्न धर्मों का साधन ' किया था। इस युग में उनका त्याग ही उनकी विशेषता है। इस प्रकार का स्वाभाविक त्याग कभी किसी ने देखा है क्या ?  इस अवतार में उन्होंने त्याग के महत्व को दिखाया है। वस्तुतः त्याग में प्रतिष्ठित न होने से ईश्वर लाभ की बात तो दूर रही , जन-सेवा भी ठीक -ठीक नहीं हो सकती।  मनुष्य तो भगवान को भूला हुआ ही है। इसलिए जब जब आवश्यकता पड़ती है, तब तब वे स्वयं आकर साधन के द्वारा मार्ग दिखा जाते हैं।" (श्रीमाँ सारदा देवी -श्रीमाँ और श्रीरामकृष्ण -पेज ५५६) 
        'What He actually has come to show to the world the importance of Tyaga, Renunciation .' वास्तव में भगवान श्रीरामकृष्णदेव सर्वधर्म समन्वय का प्रचार करने के उद्देश्य से ही जगत में नहीं आये थे , बल्कि अपने व्यक्तित्व के माध्यम से जगत को जीवन में त्याग और अनासक्ति (सेवा) के महत्व को दिखाने के लिये आये थे। अतः श्रीरामकृष्णदेव के हम सभी भक्तों को यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि श्री रामकृष्णदेव सिर्फ और सिर्फ सत्यं और सत्यं के ही प्रतिमूर्ति हैं। और 'सत्यं' क्या है ? यह वही आत्मा, ईश्वर, भगवान या ब्रह्म है -जो हमारे ह्रदय के भीतर स्पंदनशील है, धड़क रहा (throbbing) है ! और यह एक ऐसा मामला है जिसकी खोज या जांच-परख हमें स्वयं करनी होगी। (16:19
      अब आप उनके त्याग की ओर - उनके ज्वलंत त्याग की ओर नजर डालिये। हम सभी साधारण मनुष्य हैं, और हम अपनी इंद्रियों माध्यम से जो कुछ देखते हैं, उसके प्रति हमे अत्यधिक आसक्ति या दीवानापन की हद तक आकर्षण उत्पन्न हो जाता है। This actually possessing us -वास्तव में यह इन्द्रिय विषयों का तीव्र आकर्षण या मोह हमारे मन -बुद्धि को अपने वश में  कर लेता है। संसार के इन्द्रियग्राह्य मिथ्या विषयों में घोर आसक्ति के लिए श्रीरामकृष्ण दो शब्दों का प्रयोग करते थे - काम और कांचन। इन्द्रिय जगत की समस्त मिथ्या वस्तुओं के प्रति पागल मोह (Mad infatuation-that greed and that lust को,  सरल भाषा में  'काम और कांचन ' के प्रति घोर आसक्ति के रूप में इंगित किया जा सकता है। और इन दो चीजें (या 3K) में आसक्ति ही हम सभी मनुष्यों को अपने जीवन में इतना दीन, हीन और लाचार बना देती है। इसीलिए श्रीरामकृष्ण ने अपनी साधना के दौरान क्या किया था ? अपने ह्रदय से कांचन- आसक्ति को निर्मूल करने के लिए एक दिन उन्होंने अपने एक मुट्ठी में मिट्टी को लिया , और दूसरी मुट्ठी में कुछ चाँदी की मुद्राओं को लिए और कहा, 'टाका -माटी, माटी -टाका ' अर्थात ' रुपया मिट्टी है, मिट्टी रुपया है। ' यह रुपया भी उतना ही व्यर्थ की वस्तु है , जितना यह मिट्टी;  किन्तु सारी दुनिया तो पैसे के पीछे ही पागल है। धन-दौलत के लिये कभी न समाप्त होनेवाली लालच - जगत की मिथ्या वस्तुओ के प्रति ऐसा मोह - देखकर दोनों को एक साथ लेकर गंगाजी में विसर्जित कर दिया। यह भाव श्रीरामकृष्ण के जीवन में इतना अधिक घर कर गया कि जब बाद में वे किसी भी धातु से बनी वस्तु को छूने में असमर्थ हो गए। यह उनके लिए रिफ्लेक्स एक्शन बन गया, क्या आप कल्पना कर सकते हैं ? हम इस अनित्य मिथ्या जगत की निरर्थकता के विषय में सोंच सकते हैं , किन्तु उनके लिए यह इतना स्वाभाविक था कि वे सिक्का को छूने में असमर्थ हो गए थे।
      एक बार लक्ष्मीनारायण मारवाड़ी ने श्रीरामकृष्ण को 10,000 रूपये दिए , और हम जानते हैं कि उसका फल क्या हुआ? वे सचमुच में मूर्छित हो गए। जब उनको होश हुआ तो, उन्होंने कहा -मुझे ऐसा प्रतीत हुआ जैसे कोई व्यक्ति तलवार से मेरा गला काट रहा है। यह घटना यही दर्शाता है कि  सत्यम के प्रति उनका प्रेम इतनी गहराई से जुड़ा हुआ था कि वे इस जगत के मिथ्या पहलु को बिल्कुल ही सहन नहीं कर सकते थे। फिर हम देखते हैं कि कोई व्यक्ति श्रीरामकृष्ण को महँगा शॉल भेंट करता है। कहा जाता है कि उस ज़माने में उस शॉल की कीमत 1000 रूपये थी। शरू में श्रीरामकृष्ण उसको ग्रहण कर लेते हैं और कुछ मिनटों के लिए उसको शरीर पर ओढ़ लेते हैं। फिर विचार करते हैं - यह शॉल किस चीज का बना हुआ है ? हमलोगों को भी यही सीखना है की जगत के अनित्य या मिथ्या पहलु से कैसे वापस मुड़ना है ? मिथ्या पहलु से वापस मुड़े बिना , हमारे जीवन में इस 'सत्यम' को पाने की व्याकुलता (longing, तड़प , लालसा) कभी उत्पन्न ही नहीं हो सकती। यह असम्भव है। हम इस जगत के दोनों पहलुओं से - सत्य और मिथ्या (नित्य और अनित्य) से एक साथ मित्रता नहीं कर सकते। आपको एक पहलू से अनासक्त होना होगा या वापस मुड़ना ही होगा। श्रीरामकृष्ण कहते हैं - यदि आपको पश्चिम की तरफ जाना है , तो आपको पूरब को छोड़ना ही होगा। आप दोनों तरफ पैर जमाकर खड़े नहीं रह सकते। अगर आप किसी दिशा में जाना चाहते हों , तो आपको दूसरी दिशा को छोड़ना ही पड़ेगा। इसी बात को आप श्रीरामकृष्ण के जीवन प्रत्येक घटना में देख सकते हैं। और यही त्याग के महान गुण का द्योतक है। तो जब वह महँगा शॉल उन्हें दिया गया तो वे सोंचने लगे - यह शॉल किस पशु के बालों से बना हुआ है, और बहुत महँगा है। यह ठीक है यह शॉल शरीर को कुछ गर्म रखेगा। किन्तु जब मैं इस मँहगे शॉल को ओढूँगा , तो इससे मेरा अहंभाव बढ़ जायेगा, और मैं यह सोंचने लगूँगा की मैं दूसरों की अपेक्षा श्रेष्ठ हूँ। और यह अहंकार ऐसी चीज है जो मुझे ईश्वर से विमुख कर देगा। और जो कोई भी चीज मुझे 'आत्मा' (ईश्वर, भगवान या सच्चिदानन्द) से विमुख करता हो , वह अत्यंत तुच्छ है। और तुरंत उन्होंने उस शाल को थू -थू कहते हुए भूमि पर पटक दिया और रौन्दने लगे तथा अंत में आग लगाकर उसे जलाने की चेष्टा भी की। उसी समय कोई व्यक्ति वहाँ आ पहुँचा तथा उसने उनके हाथों से उसे ले लिया।" (लीलाप्रसंग -२/१६६)  
जब श्रीराकृष्ण दुनिया के मिथ्या पक्ष से निर्लिप्त रहना चाहते थे, तो उस समय उनकी प्रतिक्रिया कैसी होती है, यह सीखने की चीज है। जगत के क्षणभंगुर, अनित्य विषयों (3K) के प्रति उनका पूर्ण त्याग और सत्यम और सत्यम के प्रति उनका प्रबल अनुराग का कितना ज्वलंत दृष्टान्त उन्होंने हमारे समक्ष रखा है। इसके अतिरिक्त एक और दृष्टान्त मिलता है -मथुर बाबू श्रीरामकृष्ण बहुत बड़ी जमीन का टुकड़ा दान देना चाहते हैं , यह सुनकर श्रीरामकृष्ण सचमुच उनको पीटने के लिए उतारू हो गए थे। तो ये कुछ दृष्टान्त हैं जो उनके कांचन के प्रति अनासक्ति के द्योतक हैं। (21:33)
  इस काम के पीछे सारा संसार इतना पागल बना हुआ है , श्री रामकृष्ण के जीवन में उस काम का लेश मात्र भी नहीं दीखता। काम के प्रति अनासक्ति का दृष्टान्त भी अद्भुत है। उनके विवाह के उपरान्त जब श्री श्री माँ 19 वर्ष की आयु में पहली बार दक्षिणेश्वर पहुँची तब श्री रामकृष्ण और माँ श्री सारदा देवी दोनों ने कई महीनों तक एक वर्ष से भी अधिक काल एक ही कमरे में निवास किया किन्तु उनके संयम का बाँध नहीं टूटा। यह एक ऐसा प्रयोग था जो जगत आध्यात्मिक इतिहास में और किसी महापुरुष के बारे में सुनने को नहीं मिलती हैं। फलतः मुग्ध होकर मानवहृदय स्वतः ही इनके अवतार होने के प्रति विश्वासी हो उठता है तथा अपने ह्रदय की भक्ति-श्रद्धा इनके श्री चरणों अर्पण करने के लिए विवश हो जाता है। (लीलाप्रसंग -१/४२९) 
यह  दृष्टान्त हमे यह शिक्षा देता है कि, जो आध्यात्मिक मार्ग का सबसे बड़ा शत्रु है उस काम-वासना से हम कैसे ऊपर उठ सकते हैं ? भगवत गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं -आध्यात्मिक खोज (spiritual pursuit-आध्यात्मिक व्याकुलता)  का सबसे बड़ा और सबसे बुरा दुश्मन है काम-जन्य सम्मोहन या दीवानगी वाला आकर्षण !   
काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः।
महाशनो महापाप्मा विद्धि एनम् इह वैरिणम्।।3.37।। 

श्रीभगवान् ने कहा -- रजोगुण में उत्पन्न हुई यह 'काम' के प्रति तीव्र आसक्ति,  यही क्रोध; यह महाशना (जिसकी भूख बड़ी हो) और महापापी है, इसे ही तुम आद्यात्मिक मार्ग का सबसे बड़ा शत्रु जानो।। The biggest enemy of the spiritual pursuit is this bad infatuation for lust  (22:41) 
      काम और कांचन के प्रति श्रीरामकृष्ण की त्याग और अनासक्ति के कई सुंदर उदाहरण हमें देखने को मिलते हैं। श्रीरामकृष्ण की साधना के समय रानी रासमणि तथा उनके दामाद मथुरा- मोहन विश्वास जी ने ऐसा सोचा था की अखण्ड ब्रह्मचर्य (Unbroken Brahmacharya) पालन के फलस्वरूप श्रीरामकृष्णदेव का मस्तिष्क विकृत हुआ होगा, इसी कारण उनमें आध्यात्मिक व्याकुलता (ईश्वर , आत्मा या परम सत्य को जानने की व्याकुलता -मैं कौन हूँ ? को जानने की व्याकुलता ?) प्रकट होने लगी है। ब्रह्मचर्य के भंग होने पर पुनः उन्हें शारीरिक स्वस्थता प्राप्त हो सकती है। ऐसा समझकर उन्होंने श्रीरामकृष्ण को प्रलोभित (seduce) करके उनके ब्रह्मचर्य को खण्डित करने के लिए कुछ बदनाम औरतों या वेश्याओं  की व्यवस्था की थी, तथा दो तीन बार उनलोगों ने श्रीरामकृष्ण देव को प्रलोभित करने का प्रयास भी किया। लेकिन श्रीरामकृष्ण देव उन नारियों में श्री जगन्माता का दर्शन प्राप्त किया और समाधि में चले गए। उनकी इन्द्रिय संकुचित हो कछुए की अंग की तरह उनके शरीर के अंदर प्रविष्ट हो गयी थी। यह देखकर तथा उनके बालक जैसे आचरण से मुग्ध होकर उन नारियों के ह्रदय में वात्सल्य का संचार हो गया था। और वे औरतें जो श्रीरामकृष्णदेव को प्रलोभित करने आयी थीं खुद रूपांतरित हो गयीं; और अपने-आप को सचुमच में श्रीरामकृष्णदेव की माँ समझने लगीं। उनके ब्रह्मचर्य को भंग करने के निमित्त प्रलोभित करने में प्रवृत्त हो उन्होंने महान अपराध किया है , यह सोचकर भयभीत हो अश्रुपूर्ण नेत्रों से उनके समीप क्षमायाचना तथा उनको बारम्बार प्रणाम कर वे चली गयीं।" (लीलाप्रसंग १/२६१) श्रीरामकृष्णदेव की ज्वलंत पवित्रता की यह अमोघ शक्ति थी। (23:57 )  
तो जैसा मैंने पहले कहा कि श्रीरामकृष्ण के चित्र या उनकी प्रतिमा के ऊपर ध्यान करने के बाद  हमें इनके व्यक्तित्व के कौन से गुण को आत्मसात करके अपने जीवन और व्यवहार में उतारना चाहिए ? तो ऊपर में जिन गुणों- जगत के मिथ्या चीजों में त्याग और अनासक्ति का भाव तथा सत्यम (आत्मा -ईश्वर) के प्रति प्रबल प्रेम आदि गुणों की जो चर्चा हुई उन्हीं गुणों के मानांक में -अपने आचरण और व्यवहार में -'slowly and gradually increase ' धीरे-धीरे और क्रमशः वृद्धि करते रहने की अनवरत चेष्टा करनी होगी। 'It is not going to happen all of a sudden ! हमारे लिए भगवान श्रीरामकृष्ण देव जैसी सत्यनिष्ठा, पवित्रता , त्याग और अनासक्ति आदि गुणों में एक ही बार में, बिल्कुल अचानक से प्रतिष्ठित हो जाना सम्भव नहीं होगा, इन गुणों में  धीरे-धीरे और क्रमशः वृद्धि करते रहने का प्रयास करते रहना होगा। लेकिन जब कभी हमलोग श्रीरामकृष्ण के विषय में सोंचे या जब हम श्री रामकृष्ण के चित्र के सामने बैठकर उनपर ध्यान लगाने का अभ्यास करते हों, उस समय हमलोगों को उनके इन गुणों पर मन को एकाग्र करना चाहिए, और अपने जीवन में इस जगत के मिथ्या पहलू (3K) कामिनी-कंचन में आसक्ति को दूर करके  'Longing for that which is satyam (आत्मा-ईश्वर लाभ'- अनासक्ति और सत्यं की खोज के गुणों में वृद्धि करनी चाहिए। (24:32श्रीरामकृष्णदेव के जीवन में कई ऐसी घटनायें हैं , जिसमें सत्यम के प्रति प्रेम और मिथ्या पहलू के प्रति त्याग और अनासक्ति की भावना का ज्वलंत दृष्टान्त दिखाई देता है। 
          अब प्रश्न यह उठता है कि ईश्वर को पाने या सत्य को पाने की आध्यात्मिक व्याकुलता हमारे भीतर कैसे जाग्रत होगी ? तो जैसा मैंने पहले कहा, जब तक जब तक कुछ शर्तें पूरी न हों, सत्य को जानने की वह तड़प या व्याकुलता किसी भी व्यक्ति में अचानक उत्पन्न ही नहीं हो सकती। जब तक कुछ शर्तें पूरी नहीं हो जाती, और अन्तरात्मा उसके लिए तैयार न हो जाये, वैसी आध्यात्मिक व्याकुलता उत्पन्न ही नहीं हो सकती। और आज की चर्चा का मुख्य विषय यही है -'श्री रामकृष्ण और भगवान के लिए तड़प' जो एक बहुत महत्वपूर्ण और सुन्दर विषय है। 'ईश्वर को' जानने की तड़प /अभिलाषा' का अर्थ है अपने 'सत्य स्वरुप' को जानने की लालसा। मैं दुबारा यह बात कहता हूँ कि - " ईश्वर (भगवान, ब्रह्म या आत्मा) कहीं दूर स्वर्ग या सातवें आसमान में  बैठकर , वहाँ से इस सृष्टि का संचालन नहीं कर रहे हैं। हमारा हिन्दू वैदिक सनातन धर्म ईश्वर के बारे में 'Semitic idea of God' सेमिटिक (यहूदी) विचार) में आधारित नहीं है। वेद और उपनिषद हमें उस अविनाशी आत्म तत्व की शिक्षा देते हैं, जो हममें से प्रत्येक मनुष्य का सत्य-स्वरुप है। प्रत्येक पुरुष और प्रत्येक स्त्री अपने सत्य स्वरुप में आत्मा (ईश्वर, भगवान या ब्रह्म) ही हैं। और यही हमारी एकमात्र सच्ची पहचान (true identity) है। इसके अतिरिक्त  हमारे अपने बारे में अन्य कोई भी विचार कोरी कल्पना #मात्र है ! हमारे उपनिषद हमें यही शिक्षा देते हैं।  
[# Every other ideas about ourselves - based upon worldly relation is just an imagination.सभी अपने सत्य स्वरुप में अजर-अमर -अविनाशी आत्मा ही हैं, इसके अतिरिक्त दुनियावी रिश्तों पर आधारित हमारे अपने बारे में बाकी सभी विचार कोरी कल्पना मात्र है।
      किन्तु इस आत्म जागरूकता (Atman awareness) की दिशा में अग्रसर होने के लिए पहले कुछ शर्तों को पूरा करना अनिवार्य होता है। इसके बिना हम अपने आत्मस्वरूप में प्रतिष्ठित नहीं हो सकते ! तो वे शर्तें क्या हैं? So what are those conditions ? (आत्मज्ञान की पूर्वनिर्धारतीत शर्तें क्या हैं ? ) If we have to develop this longing for God , see we are all bhaktas, as I said let us not make big fuss about Bhakti and Jnana. यदि हमें अपने अंदर भगवान को पाने की चाहत या तीव्र लालसा उत्पन्न करनी हो, तो जैसा मैंने कहा था, हमलोगों को भक्तिमार्ग और ज्ञानमार्ग के बारे में बहुत ज़्यादा वाद-विवाद  नहीं करनी चाहिए। क्योंकि-these differentiation are always only on the surface, क्योंकि ये भेदभाव हमेशा केवल सतह पर ही होते हैं। चाहे भक्तिमार्ग हो या ज्ञानमार्ग - इनके विषय में यह कहना कि वह ज्ञान का मार्ग है , और यह भक्ति का मार्ग है ! इस प्रकार का वर्गीकरण - 'these  compartmentalisation' केवल सतह पर ही दीखता है। वास्तव में यह आत्मा द्वारा अपने ही सत्यस्वरूप की खोज मात्र है - बस इतना हीEssentially it is the soul's search for Reality ; that's all ! Essentially it is nothing but the soul's, the human soul striving to understand and experience that which is real वास्तव में विभिन्न मार्गों के द्वारा 'ईश्वरलाभ ' की यह चाहत या तड़प, 'आत्मा' के द्वारा (मनुष्य की आत्मा के द्वारा) अपने ही सत्य-स्वरूप को समझने तथा अनुभव करने का प्रयास मात्र है ! So what are the conditions which we have to fulfillतो फिर आत्मा को या अपने ही सत्य -स्वरुप को समझने तथा अनुभव करने के लिए , हमें किन-किन शर्तों को पूरा करना होगा? (26:45
पहली शर्त - सबसे पहले हमें इस जगत की क्षणभंगुर प्रकृति को समझना होगा। जब तक हम इस भौतिक जगत को ही सबसे महत्वपूर्ण (Important) और मूल्यवान (Valuable) स्तु समझते रहेंगे; तब तक हमारा मन ईश्वर या आत्मा को चाहने या खोजने की दिशा में जाना ही नहीं चाहेगा; यह असम्भव है। अतएव हमारे लिए सबसे पहले इस अनित्य जगत की क्षणभंगुर प्रकृति को समझना अनिवार्य है। हमें, अपने जीवन में जगत के जिन अलग-अलग वस्तुओं (कामिनी-कांचन और कीर्ति आदि) में आसक्ति का  दिन-प्रतिदिन सामना करना पड़ता है, उनकी क्षणभंगुर को समझ लेना ,यह है पहली शर्त। (27:23)
दूसरी शर्त यह समझना है कि मानव जीवन में केवल एक ही चीज़ मूल्यवान है, वह है आत्मा, ईश्वर या भगवान की प्राप्ति। इस अनित्य जगत में एक मात्र आत्मा ही सबसे मूल्यवान वस्तु है। मैं ऐसा क्यों कह रहा हूँ ? The psychology of human mind is that, it will always move towards that thing which it considers to be valuable . मनुष्य के मन की मनोवृत्ति (साइकोलॉजी) यह है कि वह एक बार जिस वस्तु को मूल्यवान या महत्वपूर्ण समझ लेगा, वह उसी वस्तु को प्राप्त करने की तरफ दौड़ेगा। मन का स्वभाव ही ऐसा है, कि जिसे वह एकबार मूल्यवान समझ लेता है , उसी दिशा में प्रवाहित होने लगता है।  It is natural for the mind to flow towards that which it considers to be valuableif the mind is completely drowned in the idea that money is valuable, all physical pleasures are valuable . यदि किसी व्यक्ति का मन पूरी तरह से इस विचार में डूबा हुआ है कि रुपया-पैसा ही दुनिया की सबसे बहुमूल्य चीज है , दुनिया के सभी भौतिक सुख वड़े मूल्यवान हैं , मन यदि जगत के क्षणिक आयाम को ही सबसे मूल्यवान वस्तु समझ लेगा , और उसीके साथ साथ यदि हमारा मन आत्मा की दिशा में भी बढ़ने की चेष्टा करेगा, तो यह एक विरोधाभास (contradiction) होगा। अतएव सबसे पहले हम जिस जगत का अपनी इन्द्रियों से अनुभव कर रहे हैं , इस इन्द्रियगोचर अनित्य जगत के क्षणभंगुर, अल्पकालिक (ephemeral) आयाम को समझ लेना होगा। इसका कोई मतलब नहीं कि आपने कितनी धनदौलत जमा कर ली है , एक न एक दिन वे सभी वस्तुएं चली जाएँगी। प्रति क्षण यह जगत बदलता रहता है - प्रतिक्षणं अन्यथा स्वभाव। जगत हर क्षण बदलता रहता है।  अंत में हमारे हाथों में कुछ नहीं आयेगा। 
अतः सबसे पाहले  अपनी इन्द्रियों के द्वारा जिस जगत का अनुभव कर रहे हैं, इसके मिथ्या , क्षणभंगुर , अनित्य स्वरुप को समझ लेना चाहिए।  यह पहली शर्त है , और दूसरी शर्त है , यह समझ लेना कि मनुष्य जीवन में सबसे बहुमूल्य वस्तु क्या है ? वह एकमात्र वस्तु आत्मा , ईश्वर , भगवान या ब्रह्म ही है। श्रीरामकृष्ण कहते हैं - "भगवान ही एक मात्र वस्तु हैं , और बाकि सब अवस्तु है।" यदि हमारा मन रात-दिन इसी विचार में डूबा रहे , तो स्वाभाविक रूप से हमारा मन उस एकमात्र वस्तु को पाने की दिशा में बहने लगेगा। क्योंकि मन का यह स्वभाव है कि वह जिस वस्तु को बहुत महत्वपूर्ण और मूल्यवान समझता है , उसे पाने की दिशा में बढ़ने लगता है। वर्तमान में हमारा मन भ्रान्त है , उसकी यह गलत समझ है (misunderstanding) कि वह  इस मिथ्या जगत को, 'अवस्तु' को ही एकमात्र 'वस्तु' समझ रहा है। और यही मूल समस्या है कि जिसको हमारा हमारा मन एक बार 'वस्तु' मान लेगा -it will always stick to it' वह हमेशा उसी से चिपका रहेगा। वहाँ से मुड़ना ही नहीं चाहेगा। इसलिए यदि हम अपने मन को अवस्तु से मोड़ना और वस्तु पर लगाना चाहते हों , तो सबसे पहले हमारे जीवन में यह स्पष्टता आनी चाहिए कि नित्य क्या है ? और अनित्य क्या है ? शाश्वत क्या है , और नश्वर क्या है ? जब  'शाश्वत और नश्वर' की स्पष्ट समझ में प्रतिष्ठित रहने के लिए मन को पूरी तरह से प्रशिक्षित कर दिया जाता है , तब आप देखेंगे कि मन में ईश्वर को पाने की लालसा का प्रारम्भ भी हो जायेगा। जब हम इस बात को समझ जायेंगे इस अनित्य जगत का हरेक अनुभव दुःखों से भरा हुआ है। इसीलिए गीता ९/३३ में भगवान कृष्ण कहते हैं - having come to this impermanent and unhappy world, do thou worship Me. यह जगत अनित्य है , और इसमेँ कोई सुख नहीं है। 

किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा।
अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम्।।9.33।।
।।9.33।। जो पवित्र आचरणवाले ब्राह्मण और ऋषिस्वरूप क्षत्रिय भगवान्  के भक्त हों, वे परमगतिको प्राप्त हो जायँ, इसमें तो कहना ही क्या है। इसलिये इस अनित्य और सुखरहित शरीरको प्राप्त करके तू मेरा भजन कर। (30:15
    भगवान श्रीशंकराचार्यजी ईशावास्योपनिषद के भाष्य में कहते हैं - इह संसारे सुखस्य गंध मात्र न अस्ति। इस संसार में लेशमात्र भी सुख नहीं है। यह इन्द्रियों से दिखने वाला जो जगत है , जिसके प्रति हम इतने आसक्त और सम्मोहित हैं , उस संसार में सुख की एक बून्द भी नहीं है। फिर भी -तदपि न मुञ्चत्याशा पिण्डम् ! (अङ्गं गलितं पलितं मुण्डं दशनविहीनं जातं तुण्डम् ।
वृद्धो याति गृहीत्वा दण्डं तदपि न मुञ्चत्याशा पिण्डम्॥६॥) हमारी (3K) कामनायें , हमारी आशायें कभी समाप्त होने का नाम नहीं लेतीं। अतएव यह समझ लेना यह जगत वास्तव में क्षणभंगुर है,अनित्य है और इसमें एक मात्र मूल्यवान वस्तु आत्मा या भगवान हैं, जो हमारे ह्रदय में ही विद्ययमान हैं ! जब हमारी समझ , हमारी बुद्धि इस नित्य-अनित्य विवेक में प्रतिष्ठित हो जाती है , तब हमारा मन स्वतः (automatically-खुद ब खुद) उस वस्तु की ओर प्रवाहित होने लगता है जो शाश्वत है , सत्य है , नित्य है , आत्मा , ईश्वर या सच्चिदानन्द है ! इसी को विवेक कहते हैं। इस विवेक के जाग्रत हुए बिना आध्यात्मिक जीवन की शुरुआत भी नहीं होती है। (31:16) जो अविवेकी व्यक्ति होगा , जिसको यह विवेक नहीं होगा सचुमच में मूल्यवान क्या है और तुच्छ क्या है , वस्तु क्या है ? और अवस्तु क्या है ? तब तक तो उसके आध्यात्मिक जीवन की शुरुआत भी नहीं होगी। आप कल्पना करके देखिये जो अविवेकी , जो इस अनित्य दृश्यमान जगत को ही परम सत्य मानकर चल रहा हो , उसके लिए ईश्वर प्राप्ति के लिए व्याकुल होने का प्रश्न भी उठेगा क्या ? जो व्यक्ति इस मिथ्या जगत की नश्वर वस्तुओं में ही घोर रूप से डूबा हुआ है, उसके लिए आध्यात्मिक व्याकुलता का प्रश्न ही कहाँ उठता है ? बिल्कुल असम्भव है। 
     अतएव पहली शर्त, जिस पर हमें सर्वाधिक ध्यान देने की जरूरत है , वह यही है कि हमें पहले इस सुप्त विवेक को जाग्रत करने की चेष्टा करनी चाहिए। जैसे जीवन में विवेक आता तब स्वतः, खुद ब खुद ,अपने आप वैराग्य भी चला आता है। जैसे ही जगत के मिथ्या आयाम के प्रति वैराग्य आता है, वैसे आत्मा के लिए अनुराग उत्पन्न हो जाता है। विवेक के जाग्रत होते ही, जगत के प्रति वैराग्य और ईश्वर, भगवान , आत्मा , सच्चिदानन्द , ब्रह्म के लिए प्रेम उत्पन्न हो जाता है। यह ईश्वर-प्रेम स्वाभाविक हो जाता है। यही वह उपाय है जिसके द्वारा हम सत्य वस्तु को प्राप्त करने की दिशा में अग्रसर हो सकेंगे। 
अब यह प्रश्न उठता है कि इस विवेक को जाग्रत कैसे किया जाये ? क्या इस विवेक को आसानी से जाग्रत करना सम्भव है ? इसीलिए शंकराचार्यजी कहते हैं , और श्रीरामकृष्ण बारम्बार इस बात को दुहराते हैं - कि हमारे अंदर विवेक का जागरण कैसे हो सकता है ? शंकराचार्य जी कहते हैं - जगत के प्रति अनासक्ति लाने का एकमात्र उपाय, विवेक जाग्रत करने का उपाय है - सत्संग। जिसको हमलोग अभी कर रहे हैं। शंकराचार्यजी कहते हैं - " सत्संगत्वे निःसंगत्वं, निःसंगत्वे निर्मोहत्त्वं निर्मोहत्वे निश्चलत्त्वं, निश्चलत्त्वे जीवन्मुक्तिः ॥"  Our Journey towards this God realization (Jivanmukti)  starts from Satsang ! What we are doing here, merely reading of the books (स्वाध्याय) won't serve the purpose .जीवन के एक छोर पर जीवनमुक्ति है , किंतु उस जीवनमुक्ति प्राप्त करने की दिशा में हमारी यात्रा का शुभारम्भ, अथवा इस ईश्वरलाभ (शुभलाभ-God realization) की ओर हमारी यात्रा की शुरुआत  सत्संग से होती है। इसीलिए हमलोग इस साप्तहिक पाठचक्र (भक्तसम्मेलन) में नियमित रूप से भाग लेते हैं। क्योंकि, केवल सदग्रन्थों का पाठ करने या स्वाध्याय करने से ही हम अपने लक्ष्य तक नहीं पहुँच सकते। (33:16) [जिस प्रकार 'मनुष्य बनने और बनाने के लिए चरित्र-निर्माण के प्राथमिक कार्य'  को शुरू करते समय Be and Make- पाठचक्र में नियमित रूप से भाग लेना अनिवार्य होता है;  उसी प्रकार ईश्वरलाभ (आत्मज्ञान या जीवनमुक्ति) की दिशा में यात्रा का प्रारम्भ करने के लिए भी ' श्रीरामकृष्ण -विवेकानन्द भगवान-भक्त परम्परा/ या गुरु-शिष्य परम्परा में आयोजित सत्संगों (भक्त-सम्मेलनों) में भाग लेना अनिवार्य होता है।] 
It is (P.C) good for the beginning, but what really is more important to be in the physical company of with those people who are leading a life of Vairagya for the world and Anuraga for the God !  शुरुआत के लिए (चरित्र-निर्माण के लिए) पाठचक्र में नियमित रूप से भाग लेना  अच्छा है, लेकिन वास्तव में इससे भी अधिक ज़रूरी है शारीरिक तौर पर सत्संग में रहना या उन लोगों के (नवनीदा जैसे लोगों के) निकट सानिध्य में रहना, जो सांसारिक विषयों (3K) के प्रति वैराग्य और भगवान के प्रति अनुराग का जीवन जी रहे हैं! (33:31) जब आप ऐसे ईश्वरानुरागि लोगों से मिलते हैं, और उनके निकट सानिध्य में रहने लगते हैं, जो एक छोर से दूर होकर दूसरे छोर की ओर यात्रा में अग्रसर होने का निरंतर अभ्यास कर रहे होते हैं, ऐसे ईश्वरानुरागि और संसार से अनासक्त लोगों की संगति ही बड़ी संक्रामक/ छुतहा होती है। जो लोग संसार (3K) की आसक्ति को त्याग कर , वैराग्य पूर्वक ईश्वर के प्रति तीव्र अनुरागी होने का अभ्यास कर रहे होते हैं , यदि आप ऐसे लोगों के निकट सानिध्य में रहेंगे यह संगति आपको संक्रमित कर देगी और आप जगत की अनित्य वस्तुओं से वैरागी और भगवान के प्रेमी होने के महान गुणों से भरपूर कर देगी। [When you come and meet these people , When you are in the company of such people who are practicing this turning away from one and moving towards the other, Those who are practicing that - the very company is contagious ! To be in the company of such people who are doing this that company is literally contagious , it will infect you with this great virtue of this dispassion for the world and love for the God .] यह सत्संग-प्रभाव कितना सत्य है, इसके बारे में श्रीरामकृष्ण बारम्बार कहते हैं, भक्ति -विवेक को जाग्रत करने का उपाय है -प्रभु की महिमा का गुणगान करो, और साधुसंग करो !  Sing the glories of the God and Sadhu-sanga ! (34:24) श्रीरामकृष्ण किस बात के प्रतीक हैं ? यदि उनके समस्त उपदेशों  को संक्षेप में कहा जाये तो, श्री रामकृष्ण जगत के 'मिथ्या' आयामों (3K)  से दूर होकर 'सत्यम' (आत्मा , ईश्वर , भगवान या ब्रह्म) की ओर बढ़ने की इस जबरदस्त घटना के प्रतीक हैं। Sri Ramakrishna stands for this tremendous phenomenon of turning away from the mithya dimensions and moving towards that which is satyam. मनुष्य के मन में नित्य और अनित्य के विषय में बहुत स्पष्ट धारणा होना होनी चाहिए , यदि मन को इस शाश्वत -नश्वर या नित्य-अनित्य विवेक -विचार के लिए प्रशिक्षित किया जाये , तो अपने-आप ही हमारा मन तुच्छ अनित्य पदार्थों से दूर हटने लगेगा और जो नित्य वस्तु है उसकी ओर अग्रसर होने लगेगा। उदाहरण के मान लीजिये कि भगवान स्वयं आते हैं और आप सबों से यह कहते हैं कि आज 5 बजे शाम को तुम मरने वाले हो, आज संध्या 5 बजे तुम अपनी अंतिम साँस लेने वाले हो। मानलो कि भगवान स्वयं आकर तुमसे यह बात कहते हों , तो जीवन के लिए आपकी (priorities) या प्राथमिकता क्या होगी ? तब क्या आप आजके Share Market प्राइस की चिंता करेंगे ? तब क्या आप अमुक -अमुक मित्र या रिश्तों के यहाँ विवाह-समारोह या अन्य किसी function में जाने बात सोचोगे ? यदि यह बात आपको ज्ञात हो कि आज शाम के 5 बजे संसार से ही कूच कर जाने का समय तय होचुका है ,  तब उस अवस्था में आपकी प्राथमिकतायें क्या होंगी ? तब आपके लिए हर कार्यक्रम परिवर्तित हो जाएगी। वास्तव में हमलोग संसार में ऐसी मानसिकता लेकर जी रहे हैं , कि हमें जैसे कभी मरना ही नहीं हो ? और यही समस्या है। जबकि मृत्यु तो किसी भी क्षण आ सकती है ! मृत्यु ठीक हमारी छाया के जैसी है। यह हम में से प्रत्येक के पीछे मौत बनकर खड़ी हुई है। 

अजरामरवत् प्राज्ञो विद्यामर्थं च चिन्तयेत् ।
 गृहीत इव केशेषु मृत्युना धर्ममाचरेत् ॥

शास्त्रों में कहा गया है - मृत्यु हमारी छाया जैसी है और यह हम में से प्रत्येक के पीछे खड़ी हुई है। अतएव विवेकी मनुष्य (सूझबूझ वाला मनुष्य) विद्या एवं धन अर्जित करने का विचार यूं करे जैसे कि वह बुढ़ापा और मृत्यु से मुक्त हो । किंतु साथ में धर्माचरण भी यूं करे जैसे कि काल उसके बाल पकड़ कर बैठा हो और कभी भी उसे इहलोक से उठा सकता हो । लेकिन हमलोग इस बात से बिल्कुल बेखबर और निश्चिन्त हैं। लेकिन जीवन का अंत किसी भी क्षण हो सकता है। अतएव हमें क्या करना चाहिए ?  
भज गोविन्दं, भज गोविन्दं,
गोविन्दं भज मूढ़मते।
संप्राप्ते सन्निहिते काले,
न हि न हि रक्षति डुकृञ् करणे ॥१॥

कितना सुंदर और अनोखा सत्योपदेश (exotic exhortation) है ! भगवान शंकराचार्य जी कहते हैं -तुम चाहे जितने व्यर्थ के कामों में , जैसे व्याकरण के सूत्रों को रटते रहने में अपने को  व्यस्त कर लो , किन्तु मेरे बच्चे मृत्यु से तुम्हारी रक्षा नहीं हो सकती। इसलिए भज गोविन्दं, भज गोविन्दं का अर्थ क्या हुआ ? सत्य को जानो, सत्य को जानो ! अपने सत्य स्वरुप का अन्वेषण करो! मृत्यु आने से पहले अपने सत्यस्वरूप का अनुभव कर लो !(आत्मा, ईश्वर, भगवान, ब्रह्म सच्चिदानन्द को जानो।)  हे मोह से ग्रसित बुद्धि वाले मित्र, गोविंद को भजो, गोविन्द का नाम लो, गोविन्द से प्रेम करो क्योंकि मृत्यु के समय व्याकरण के नियम याद रखने से आपकी रक्षा नहीं हो सकती है ॥१॥(site/vedicscripturesinc/home/srishankaracharya/bhajagovindam)  
श्रीमद्भागवत में राजा परीक्षित की कहानी में  इसका बहुत सुंदर दृष्टान्त देखने को मिलता है। राजा परीक्षित, अभिमन्यु और उत्तरा के पुत्र और अर्जुन के पोते थे, जो महाभारत युद्ध के बाद कुरुवंश के राजा बने। उनको यह पता चलता है कि उनकी सिर्फ 7 दिनों की आयु बची हुई है। अब उस राजा की 'priorities' या प्राथमिकतायें बदल जाती हैं।   Parikshit goes to Shukdev and from the mouth of Shukdev he listens  to That wonderful discourse on the Leela of Divine in a certain form !अगर आप यह जान जाओ कि सात दिनों के बाद आपकी मृत्यु होने वाली है, तो उन्होंने क्या खोजना शुरू किया ? जब उनको यह ज्ञात हुआ कि उनके पास बहुत ही कम समय बचा हुआ है ; तब उन्होंने सत्य को खोजना शुरू किया। और शुकदेव मुनि के पास पहुँचे और उनके मुख से उन्होंने एक विशेष नाम-रूप में अवतार की लीला कथा का श्रवण किया। इसी को संस्कृत में लीला -चिन्तनं कहते हैं - यही कार्य हमलोग अभी यहाँ पर कर रहे हैं। परीक्षित के द्वारा जब लीला-चिन्तनं या आत्म-चिन्तनं किया जाता है , तब परीक्षित इस संसार सागर से (जन्म-मृत्यु के चक्र से) पार चले जाते हैं। To windup the whole talk ' सार रूप से मैं यही कहना चाहता हूँ कि, So we should understand, जब हम श्रीरामकृष्ण देव के चित्र या प्रतिमा पर ध्यान करते हैं , उस समय हमें यह याद रखना चाहिये कि श्रीरामकृष्ण देव एक अद्भुत लीलाधर हैं जो इस जगत के मिथ्या आयाम या संसार अनित्य पदार्थों (3K) के प्रति  तीव्र अनासक्ति और घोर त्याग का भाव तथा जो सत्यं है, (नित्य,आत्मा, ईश्वर या ब्रह्म-हमारा ही सत्यस्वरूप है) उसके प्रति उतना ही तीव्र आकर्षण, प्रेम या ईश्वर-लाभ की तीव्र लालसा के एक आश्चर्यजनक प्रतिक हैं ! (This wonderful phenomenon of extreme revulsion for that which is mithya dimension and equally intense love, intense longing for that which is satyam.) जब हम श्रीरामकृष्ण पर ध्यान कर रहे होते हैं, या ध्यान के बाद जब आसन से उठते हैं , तब  श्रीरामकृष्ण के व्यक्तित्व में यही वो दो गुण हैं, जिन्हें हमें अपने जीवन में विकसित करना है। धन्यवाद ! 
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#The Searchlight : Sri Ramakrishna
" श्रीरामकृष्ण का जीवन एक असाधारण ज्योतिर्मय खोजी दीपक है, जिसके प्रकाश में हिन्दूधर्म के विभिन्न अंग एवं आशय समझे जा सकते हैं। शास्त्रों में निहित सिद्धान्त-रूप ज्ञान  के वे प्रत्यक्ष उदाहरण स्वरुप थे। ऋषि और अवतार हमें जो वास्तविक शिक्षा देना चाहते थे, उसे उन्होंने अपने जीवन द्वारा द्वारा दिखा दिया है। शास्त्र (महावाक्यों) मतवाद मात्र हैं , रामकृष्ण उनकी प्रत्यक्ष अनुभूति। उन्होंने 51 वर्ष की आयु में 5000 वर्ष का राष्ट्रीय आध्यात्मिक जीवन जिया और इस तरह वे भविष्य के सन्तानों के लिए अपने-आप को एक शिक्षाप्रद उदाहरण बना गए। " ३/३३९   

 " The life of Shri Ramakrishna was an extraordinary searchlight under whose illumination one is able to really understand the whole scope of Hindu religion. He was the object-lesson of all the theoretical knowledge given in the Shastras (scriptures). He showed by his life what the Rishis and Avataras really wanted to teach. The books were theories, he was the realisation. This man had in fifty-one years lived the five thousand years of national spiritual life and so raised himself to be an object-lesson for future generations. " (Letter To Alasinga Perumal, 30th November, 1894) 
" भगवान श्रीराकृष्णदेव का अध्यन किये बिना वेद-वेदान्त भागवत और अन्य पुराणों का महत्व समझना असम्भव है। उनका जीवन हिन्दू वैदिक सनातन धर्म के सारे पहलू (gamut विचार-समूह) पर एक अनन्त तेज रौशनी वाले खोज दीप का तीव्र प्रकाश है। श्रीरामकृष्णदेव वेदों तथा उनके उद्देश्य के जीवन्त भाष्य हैं , भारत के जातीय धार्मिक जीवन का एक समग्र कल्प उन्होंने एक जीवन में पूरा कर दिया था। भगवान श्रीकृष्ण का जन्म जन्म हुआ था या नहीं , यह मुझे मालूम नहीं और बुद्ध और चैतन्य इत्यादि एक देशीय हैं; पर श्रीरामकृष्ण देव सबकी अपेक्षा आधुनिक (latest) और सबसे पूर्ण (most perfect) हैं - ज्ञान, भक्ति , वैराग्य , उदारता और लोकहितैषणा -इन सब गुणों के वे मूर्तस्वरूप हैं। जो उनके गुणों का आदर नहीं कर सकता है , उसका जीवन व्यर्थ है। मैं परम भाग्यशाली हूँ कि मैं जन्म-जन्मान्तर से उनका दास रहा हूँ। उनका एक भी शब्द मेरे लिए वेद-वेदान्त से अधिक मूल्यवान है। तस्य दासादासोअहं - अरे, मैं तो उनके दासों के दासों का दास हूँ। " (पत्रावली /२५८ )      

" Without studying Ramakrishna Paramahamsa first, one can never understand the real import of the Vedas, the Vedanta, of the Bhâgavata and the other Purânas. His life is a searchlight of infinite power thrown upon the whole mass of Indian religious thought. He was the living commentary to the Vedas and to their aim. He had lived in one life the whole cycle of the national religious existence in India. Whether Bhagavân Shri Krishna was born at all we are not sure; and Avataras like Buddha and Chaitanya are monotonous; Ramakrishna Paramahamsa is the latest and the most perfect — the concentrated embodiment of knowledge, love, renunciation, catholicity, and the desire to serve mankind. So where is anyone to compare with him? (U. S.A.,1894. Letter to  Swami Shivananda.) 
(The) books were theories, he (Ramakrishna) was the realization. 
CWSV Vol 5 p.53
Shri Ramakrishna was both a Jivanmukta and an Acharya. 
CWSV Vol 5 p.269
Shri Ramakrishna is a force. 
CWSV Vol 5 p.269
He (Ramakrishna) is a power, living even now in his disciples and working in the world. 
CWSV Vol 5 p.269
Never did come to this earth such an all-perfect man as Shri Ramakrishna.
CWSV Vol 6 p.480
Ramakrishna Paramahamsa came for the good of the world. 
CWSV Vol 6 p.266
India can only rise by sitting at the feet of Shri Ramakrishna.
CWSV Vol 6 p.281
It won’t do merely to call Shri Ramakrishna an Incarnation, you must manifest power. 
CWSV Vol 6 p.267
Ramakrishna has no peer; nowhere else in this world exists that unprecedented perfection, that wonderful kindness for all that does not stop to justify itself, that intense sympathy for man in bondage. 
CWSV Vol 6 p.231
His life is the living commentary to the Vedas of all nations. 
CWSV Vol 6 p.320
What the whole Hindu race has thought in ages, he lived in one life. 
CWSV Vol 6 p.320
He who will bow before him will be converted into purest gold that very moment.
CWSV Vol 6 p.266
From the day Shri Ramakrishna was born dates the growth of modern India and of the Golden Age.
CWSV Vol 6 p.318
He was the living commentary to the Vedas and to their aim. 
CWSV Vol 7 p.483
His life is a searchlight of infinite power thrown upon the whole mass of Indian religious thought. 
CWSV Vol 7 p.483/letter dated 1894/ to Swami Shivananda . 
Shri Ramakrishna was born to vivify all branches of art and culture in this country.
CWSV Vol 7 p.205
In Shri Ramakrishna Paramahamsa the man was all dead and only God remained.
CWSV Vol 7 p.85
Shri Ramakrishna’s purity was that of a baby.
CWSV Vol 7 p.85
He had lived in one life the whole cycle of the national religious existence in India.
CWSV Vol 7 p.483
Ramakrishna Paramahamsa is the latest and the most perfect—the concentrated embodiment of knowledge, love, renunciation, catholicity, and the desire to serve mankind.
CWSV Vol 7 p.483
Without studying Ramakrishna Paramahamsa first, one can never understand the real import of the Vedas, the Vedanta, of the Bhagavata and the other Puranas. 
CWSV Vol 7 p.483
One glance, one touch is enough.
CWSV Vol 7 p.8
Ramakrishna had given us one great gift, the desire, and the lifelong struggle not to talk alone, but to live the life.
CWSV Vol 8 p.348
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आखिर ईश्वर लीलाएं क्यों रचाते हैं और इनका उद्देश्य क्या होता है ? लीला का अर्थ होता है दिव्य क्रीडा यानी दिव्य -खेल।  लीलाएं वास्तविक नहीं होती, परंतु एक सत्य घटना पर आधारित होती है।  भगवान ऐसी लीलाएं रचाते हैं और उनमें भक्तों को शामिल करते हैं।  जैसे मां यशोदा, देवकी, पिता वसुदेव आदि।  भगवान इन लीलाओं के माध्यम से अपना ज्ञान छोड़कर जाते हैं, जो हम सब ग्रंथ पुराणों में पढ़ा करते हैं। रामायण ग्रंथ में श्रीराम द्वारा माता सीता की खोज में वन में दर दर भटकने की कथा मिलती है।  जैसा कि सभी जानते हैं कि श्रीराम तो स्वयं भगवान रहे हैं और वो अंतर्यामी है।  तो वो अपनी माया से सीता को खोज कर सकते थे। परंतु, भगवान की लीला ऐसी ही है कि श्रीराम ने सामान्य पुरुष की तरह माता सीता की खोज की।  लीलाएं भगवान द्वारा रचित है और उनसे मनुष्यों को ज्ञान व सही मार्ग की प्राप्ति होती है। जैसे श्रीकृष्ण ने राधा से प्रेम करके दुनिया को प्रेम की सीख दी। श्रीराम ने शबरी के जूठे बेर खाकर भगवान और भक्त के बीच प्रेम भाव को दर्शाया है।  ऐसे में लीलाओं का उद्देश्य भगवान और भक्त के बीच एक संबंध स्थापित करना होता है।  इसलिए कहते हैं कि गीता, रामायण जैसे धार्मिक ग्रंथ पढ़ने से हमारा मन शांत होता है और मानसिक विकास होता है। 

[11 दिसंबर, 2025 दिन गुरुवार को ज्ञानदायिनी माँ श्रीश्री सारदा देवी की जन्म तिथि पूजा का आयोजन बड़ी धूमधाम से मनाया जायेगा।]
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