Thursday, August 20, 2015

पंचम वेद -७ " नाम-जप के विषय में -हिन्दू, बौद्ध, ईसाई, सिख, इस्लाम सभी एक हैं ! "

' मीरा कहे बिना प्रेम से नहीं मिले नन्दलाल। " 

मास्टर महाशय श्री रामकृष्ण से एक अद्भुत प्रश्न पूछते हैं - ' मन को ईश्वर में कैसे लगाया जाता है ? हमारा मन अत्यंत चंचल बना हुआ है,हमारे मन में अभी ईश्वर की कोई अवधारणा नहीं है, मन की गति प्रकाश की गति से भी अधिक तीव्र है, हम तो उसका नियंत्रण करना या मनःसंयोग करना सीखा नहीं है । ठाकुर ने जो उत्तर दिया है वह हजारों वर्षों से संसार भर में सभी आध्यात्मिक व्यक्तियों द्वारा अभ्यास में लाया जा रहा है। 
पिछले सत्र में हमने सुना था, मनःसंयोग की उन्नत प्रणाली को उद्घाटित करते हुए श्रीरामकृष्ण कहते हैं - " सर्वदा ईश्वर का नाम-गुणगान करना चाहिये, सत्संग करना चाहिये -बीच बीच में भक्तों और साधुओं से मिलना चाहिये । संसार में दिनरात विषय के भीतर पड़े रहने से मन ईश्वर में नहीं लगता। कभी कभी निर्जन स्थान में जाकर ईश्वर की चिन्ता करना बहुत जरुरी है। प्रथम अवस्था में बीच बीच में एकान्तवास किये बिना ईश्वर में मन लगाना बड़ा कठिन है।"  यही बात तुलसीदास कृत ‘श्रीरामचरितमानस’ में भगवान श्रीराम भी शबरी के समक्ष नवधा भक्ति का वर्णन करते हुए कहते है-

मंत्रजाप मम, दृढ बिस्वासा।
पंचम भजन सो वेद प्रकासा ||

‘ मेरे (राम) मंत्रका जाप और मुझमें दृढ विश्वास- यह पांचवीं भक्ति है, जो वेदोंमें प्रसिद्ध है।’ इसीलिये श्रीरामकृष्ण वचनामृत को पंचम वेद कहा जाता है। किन्तु 'निर्जन-स्थान' का तात्पर्य अरण्य में जाना नहीं है, महामण्डल युवा प्रशिक्षण शिविर में जाकर कम से कम तीन दिनों तक केवल ठाकुर-माँ -स्वामीजी की शिक्षाओं पर श्रवण-मनन-निदिध्यासन करना है।
महर्षि पतंजलि ने भी समाधिपाद में यही कहा है -

तस्य वाचकः प्रणवः।।१/२७॥

 उसका नाम ॐ है।    

तज्जपस्तदर्थभावनम् ॥ १/२८ ॥
तज्जपः= उस ॐकार का जप और साथ साथ - 
तदर्थभावनम्=" ॐ शब्द के अर्थ के भाव  पर चिंतन !

  ॐ भगवान का नाम है - ॐ कार के जप के साथ इसके अर्थ का चिन्तन इस प्रकार करना जिससे परमेश्वर के प्रति प्रगाढ़ प्रेम की भावना विकसित हो जाये ! प्रणव के जाप एवं स्मरण से ईश्वर के प्रति भक्ति एवं समर्पण बढता है। इसी को ईश्वर प्रणिधान भी कहा गया है ।
स्वामी विवेकानन्द कहते हैं " ये मंत्र क्या हैं ? भारतीयदर्शन के अनुसार नाम और रूप ही इस जगत की अभिव्यक्ति के कारण हैं। किसी व्यक्ति के चित्त (व्यष्टि महत्) में विचार तरंगे पहले शब्द के रूप में उठती हैं और फिर बाद में तदपेक्षा स्थूलतर 'रूप' धारण कर लेती है । इसी प्रकार बृहत ब्रह्माण्ड में भी समष्टि-महत् (ब्रह्मा या हिरण्यगर्भ) ने अपने को पहले नाम (शब्द ब्रह्म 'ॐ') के, और फिर बाद में रूप -अर्थात इस परिदृश्यमान जगत के आकार में अभिव्यक्त किया है। ईश्वर पहले स्फोट-रूप  में परिणत हो जाता है, फिर स्वयं को उससे भी स्थूल इन्द्रियग्राह्य जगत के रूप में परिणत कर लेता है। और चूँकि किसी भी उपाय से हम शब्द को भाव से अलग नहीं कर सकते, इसीलिये यह 'ॐ' भी उस भव्य और नित्यस्फोट (बिग बैंग) से नित्यसंयुक्त है। अर्थात 'ॐ' और स्फोट अभिन्न हैं । "

इस ॐ शब्द का जाप करने से और उसकी प्रतीति करने से हम उस अलौकिक शक्ति से जुड़ते हैं जिसे ईश्वर (ठाकुर) कहा जाता है। क्योंकि उसी से सब कुछ निकला है, उसी में स्थित है, उसी में लीन भी हो जाता है । विज्ञान भी यह मानता है कि 1500 करोड़ वर्ष पूर्व इस ब्रह्माण्ड की रचना के समय  ऊर्जा का एक भव्य विस्फोट (बिग बैंग) हुआ था।  उसी विस्फोट से इस ब्रह्माण्ड की रचना हुई। इसीलिये हमारा ब्रह्माण्ड ऊर्जा-प्रधान है। 
आइनस्टाइन ने साबित कर के दिखाया है कि द्रव्यमान (भौतिक पदार्थ) भी ऊर्जा का ही रूप हैं। द्रव्यमान m ऊर्जा की एक मात्रा E के तुलनीय हैं। उन्होंने E और m के परस्पर समंध को  E=mc² सूत्र की सहायता से प्रमाणित किया था। अत: ऊर्जा का परिमाण किसी वस्तु के द्रव्यमान और प्रकाश के वेग के गुणनफल के तुलनीय होता है।
[ द्रव्यमान का मात्रक (यूनिट ऑफ़ पिण्ड Mass कि.ग्रा) और ऊर्जा का मात्रक (यूनिट ऑफ़ एनर्जी - जूल) के बीच परस्पर परिवर्तन का कारक c² है। मान लीजिये आपके पास एक ग्राम यूरेनियम (परमाणु-बम के निर्माण में उपयोग किया जाने वाला एक पदार्थ) है और यदि आप ऊर्जा-द्रव्यमान सूत्र की सहायता से पदार्थ की कुल ऊर्जा का कलन करेंगे तो वह लगभग 900000000000000000 जूल होगी! 
एक बार आइंस्टीन से एक पत्रकार नें यह पूछा कि छोटे -छोटे कणों में छिपी इस महान ऊर्जा की ओर किसी अन्य वैज्ञानिक का ध्यान क्यों नही गया? उन्होंने जवाब दिया, ”इसका उत्तर बहुत आसान है। ऊर्जा का पता तब तक नहीं लग सकता, जब-तक वह बाहर नहीं आ जाती”। उन्होंने मजाकिया लहजे में यह भी कहा कि, ”अगर कोई धनवान व्यक्ति अपना धन खर्च ही न करे तो लोगों को उसकी सम्पत्ति का पता कैसे चल सकता है?”]
 जिस ऊर्जा से यह सारा ब्रह्माण्ड संचालित होता है उसी ऊर्जा का प्रतीक ॐ शब्द है। ऊर्जा का कोई स्रोत जब ऊर्जा को प्रेषित करता है तो ऊर्जा के बण्डल ॐ .... ॐ .... ॐ .... जैसी गूँज  पल्स (स्पन्दन या कम्पन ) बन कर प्रेषित होते हैं । इसी को अंग्रेजी में ' Pulsing Movement of Energy' ( ऊर्जा की गत्यात्मक कम्पन को जापानी भाषा में रेकी ) कहा जाता है।
वास्तव में ॐ शब्द ऊर्जा के प्रसारण का द्योतक है। जाप की समाधि आधुनिक विज्ञान और अध्यात्मवाद को एक धरातल पर ला कर खड़ा कर देती है।  ॐ जाप की समाधि हमें किसी देवी-देवता से नहीं जोड़ती; बल्कि हमें उस शक्ति-स्रोत, सूपर-चेतना [Super Consciousness] से जोड़ती है जो इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का संचालक है! सूपर-कांशसनेस ही वह अदृश्य सृजनात्मक शक्ति हैं जो समस्त विश्व की आधारशिला हैं। चेतना समस्त पदार्थ और ऊर्जा का श्रृजन करती हैं, उन्हें व्यवस्थित और क्रियाशील करती हैं। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड पदार्थ- ऊर्जा -चेतना का सातत्य [continuum] है, अर्थात पदार्थ, ऊर्जा और चेतना के समन्वय से निर्मित और क्रियाशील हैं। इसलिए ॐ कार के जप से प्राप्त होने वाली यह समाधी (सूपर कॉन्शसनेस) किसी विशेष धर्म का अंग नहीं बल्कि मानव-जाति की सांझी धरोहर है। इसीलिये महर्षि पतंजलि कहते हैं -सभी योगीयों को प्रणव का जप करना चाहिये ।
जपुजी साहब में गुरु नानक ने भी कहा है-
' इक ओंकार सतिनाम करता पुरखु निरभउ निरवैर।
अकाल मूरति अजूनी सैभं गुरु प्रसादि।।'
 

 ‘वह एक है, ओंकार स्वरूप है, सत नाम है, कर्ता पुरुष है, भय से रहित है, वैर से रहित है, कालातीत-मूर्ति है, अयोनि है, स्वयंभू है, गुरु की कृपा से प्राप्त होता है।’

नानक कहते हैं कि उस एक सत्  (अविनाशी-अस्तित्व) का जो नाम है, वह 'ॐ' कार है। और बाकी सब नाम तो मनुष्य ने दिए हैं। राम कहो, कृष्ण कहो,गॉड कहो, अल्लाह कहो, ये नाम आदमी के दिए हैं। ये हमने बनए हैं। सांकेतिक हैं। लेकिन एक उसका नाम है जो हमने नहीं दिया; वह ओंकार है, वह ॐ है। 
वह साहब महान है, और  उससे भी ऊंचा उसका नाम है।’
 उसका नाम, जिसको नानक ओंकार कहते हैं, वही कुंजी है। और कुंजी महल से भी बड़ी है। कुंजी महल में छिपी संपदा से ज्यादा मूल्यवान है। ऐसे तो दिखायी पड़ती है लोहे का टुकड़ा। लेकिन वही लोहे का टुकड़ा अनंत खजाने को खोलेगा। उसका अंत जानने के लिए कितने बिल्लाते हैं, तो भी उसका अंत नहीं पाया जाता। कोई भी उसका अंत नहीं जानता।नानक कहते हैं,  तू अंतहीन है। तू विराट है, तुझसे भी बड़ा तेरा नाम है। क्योंकि हमारे लिए तो नाम का सहारा है। नाम से ही हम तुझ से जुड़ेंगे। तू है भी, हमें पता नहीं। नाम से ही हमें तेरी खबर आएगी। नाम से ही हम धीरे-धीरे तेरी तरफ खिंचेंगे। और एक ऐसी घड़ी आती है कि जब नाद अपने आप गूंजता है, तो तुम खींच लिए जाते हो परमात्मा की तरफ।
 नानक कहते हैं कि उसका एक नाम 'ॐ कार' जो जान लेता है समझो उसे कुंजी मिल गयी। उस कुंजी से उसका द्वार खुलेगा। उसके ओर-छोर का अंत नहीं। और अगर ओंकार की सुरति तुम्हारे भीतर बैठने लगी, तो वह कुंजी तुम अपने भीतर ढाल लोगे। वह कुंजी कुछ ऐसी नहीं है कि कोई तुम्हें दे दे। वह तुम्हें ढालनी पड़ेगी। तुम्हें ही वह कुंजी बन जाना पड़ेगा। तुम ही धीरे-धीरे ओंकार की ध्वनि में गूंजते-गूंजते कुंजी बन जाओगे। तुम में ही वह क्षमता प्रकट हो जाएगी कि उसके द्वार को तुम खोल लो।" 

मंत्र एक विशेष शब्द है। शास्त्रों में ईश्वर के लिये अनेक नामों का उल्लेख मिलता है, विष्णुसहस्रनाम में भगवान के १००० नाम हैं, सभी नाम सत्य हैं - पर कोई गुरु ही उनमें से किसी एक नाम को चुनकर अपने शिष्य को देता है, जो उसके अनुकूल होता है । तथा उस नाम की अनुभूति गुरु ने स्वयं कर ली है, तभी वह शिष्य को देता है। यही उस मंत्र की विशेषता है। उस सत्य को गुरु ने अपने अनुभव से जान लिया है। वह मंत्र केवल ध्वनि नहीं है, स्वयं ईश्वर हैं। 
जो नाम गुरु से मिलता है उसे किसी से कहना नहीं चाहिये। क्यों ? वह ईश्वर की कृपा से मिला है, बच्चों को मंत्र-दीक्षा नहीं दी जाति, बच्चों की बुद्धि परिपक्क्व नहीं होती। वे अपने एकमात्र खजाने की चाभी के महत्व को नहीं समझते जिस किसी से कह सकते हैं। जिन आश्रमों में १२ घंटे, २४ घंटे का जपयज्ञ किया जाता है, वहां का वातावरण चार्ज्ड हो जाता है। कोई युवक मंत्र लेने का बहुत इक्षुक था, रामकृष्ण मिशन में दीक्षा देने का अधिकार केवल प्रेसिडेन्ट या वाइसप्रेसिडेन्ट को ही होता है। इसीलिये दीक्षा लेने वालों की लम्बी प्रतीक्षा सूचि होती है । उसे  पहले किसी आश्रम के सचिव का अनुमोदन भी लेना पड़ता है। वे एक एप्लीकेशन फॉर्म देते हैं जिसमें ठाकुर-माँ-स्वामीजी की जीवनी और रामकृष्ण वचनामृत से १०० पेज पहले पढ़ने को कहा जाता है। अगर किसी ने नही पढ़ा होता तो उसे फिर से पढ़कर आने को कहा जाता है । बहुत प्रतीक्षा के बाद उस युवक को भी दीक्षा मिली। जब वह वापस लौटा तो बोला - मैं तो यह नाम पहले से जानता था ! मैं तो सोच रहा था, कोई विशेष मंत्र होगा ?
मंन्त्र शब्द ‘मन’ और ‘त्र’ दो शब्दों से मिलकर बना है, जिनका अर्थ है मनन और त्राण। मंत्र एक ध्वनि उर्जा है जो अक्षर(शब्द) एवं अक्षर के समूह से बनता है। मंत्रार्थ मंजरी के अनुसार-
मनन त्राण धर्माणो मंत्रः। 
अर्थात् मनन और त्राण मन्त्र के दो धर्म है। इस तरह मंत्र के जप के साथ इसके अर्थ पर मनन करते हुए अपने ध्यान को इष्टदेव पर केन्द्रित किया जाता है और इसकी कृपा से संसार सागर से त्राण व मुक्ति मिलती है, यही मंत्र- योग साधना है।  और सबसे अधिक आवश्यक है मंत्र साधना के प्रति श्रद्धा और विश्वास। भावपूर्वक जप करने से शब्द शक्ति के विस्फोट से निश्चित ही फलदायी परिणाम उपलब्ध होते हैं।
 उदाहरण देते हुए श्रीरामकृष्ण कहते हैं - " विश्वास हुआ कि सफलता मिली। विश्वास से बढ़कर और कुछ नहीं है। पुराणों में लिखा है कि भगवान श्रीरामचन्द्र को, जो साक्षात् पूर्णब्रह्म नारायण हैं, लंका जाने के लिये 'रामसेतु' बाँधना पड़ा था, किन्तु हनुमान रामनाम के विश्वास से ही कूद कर समुद्र के पार चले गए, उन्होंने सेतु की परवाह नहीं की। 
किसी व्यक्ति को समुद्र के पार जाना था। विभीषण ने एक कागज पर रामनाम लिख कर उस व्यक्ति की धोती के किनारे लपेट कर बाँध दिया और कहा कि तुम्हें अब कोई भय नहीं , विश्वास करके पानी के ऊपर से चले जाओ, किन्तु यदि तुम्हें अविश्वास हुआ तो तुम डूब जाओगे। वह मनुष्य बड़े मजे से आधा समुद्र पार कर गया, उसी समय उसकी यह इच्छा हुई कि गाँठ को खोलकर देखूँ तो इसमें क्या बँधा है, जो इतना शक्तिशाली है कि मुझे पानी पर चलने में मेरी मद्त कर रहा है ? मैं इतने आराम से पानी पर चल पा रहा हूँ ? गाँठ खोलकर उसने देखा तो एक कागज पर रामनाम लिखा था। ज्योंही उसने सोचा कि अरे इसमें तो सिर्फ दो अक्षर का रामनाम लिखा है-अविश्वास हुआ कि वह डूब गया। "
 माँ दुर्गा के एक भक्त को यह विश्वास था कि वह मर नहीं सकता क्योंकि उसकी माँ इतनी शक्तिशाली है कि वो उसे निश्चित रूप से स्वर्ग में ले जाएगी। क्योंकि मैं सदैव माँ दुर्गा का नाम जपता रहता हूँ !
आमी दुर्गा दुर्गा बोले माँ यदि मरि। 
आखेरे, आमारे, ना तारो केमोने ? देखा जाबे ---गो शंकरी !! 
अपनी भक्ति के बल पर वह माँ शंकरी अर्थात दुर्गा  को भी चैलेन्ज कर रहा है ! तुम्हें तो मुझे तारना ही पड़ेगा, क्योंकि तुम्हारे 'दुर्गा' नाम का अर्थ ही यही है ! यदि प्राण निकलते समय- मैं साहस के साथ यह देखने का प्रयास करूँ कि मैं तो अजर-अमर-अविनाशी आत्मा हूँ ! आज देखूँगा की मरता कौन है ? और उस समय भी मैं पूरी 
भक्ति के साथ केवल माँ 'दुर्गा' के नाम का उच्चारण करता रहूँगा तो  मैं निश्चित रूप से जानता हूँ कि तुम आकर मेरा उद्धार कर दोगी ! नाम जप में ऐसी शक्ति होती है !
নাশি গো ব্রাহ্মণ, হত্যা করি ভ্রূণ, সুরাপান আদি বিনাশি নারী ৷
এ-সব পাতক, না ভাবি তিলেক, ব্রহ্মপদ নিতে পারি ৷৷
इसीलिये भगवान श्रीरामकृष्ण देव भी यही कह रहे हैं कि - ' सर्वदा ईश्वर का नाम जपना / दूसरा भाग-गुणगान । अर्थात   सगुण भगवान (F या M जो भी आपके पर्सनल गॉड हैं ) के 'नाम-रूप-लीला-धाम ' का गुणगान करना चाहिये ।" शास्त्रों में जप के तीन प्रकार बतलाएं गए हैं। वाचिक जप - उच्च स्वर में उच्चारित किया जाता है। उपांशु जप - अत्यंत मंद स्वर जिह्वा या होंठ की सहायता से उच्चारित किया जाता है। मानसिक जप - बिना जिह्वा या होंठ हिलाए मन में किया जाता है। सांसारिक कार्य करते समय भी मन के एक हिस्से को जप करने में लगाये रखा जा सकता है। मानसिक जप को सबसे श्रेष्ठ माना गया है फिर भी साधक अपनी क्षमता एवं गुरुसे प्राप्त ज्ञान के अनुसार जप विधि का अनुसरण कर सकता है |बहुत श्रद्धा और प्रेम के साथ भगवान श्रीरामकृष्ण  के निरंतर नाम-जपने से उनके रूप लीला -धाम की चिन्तन के प्रभाव से जब क्षण-क्षण में रोमांच होने लगते हैं, तब उसके सम्पूर्ण पापों का नाश होकर भक्त को श्री ठाकुर देव के सिवा और कोई वस्तु अच्छी नहीं लगती।
माँ सारदा ने भी कहा है, " जपात्  सिद्धि " । जो लोग आध्यात्मिक जीवन जीना चाहते हैं,उन्हें २०००० बार ईश्वर का नाम जपना चाहिए। मैंने खुद करके देखा है, तुम भी ऐसा करोगे तो तुम भी ईश्वर को देख सकोगे ! जब एक भक्त ने माँ सारदा देवी से पूछा, " क्या जप करना ईश्वर लाभ का सबसे सीधा उपाय है ?"  माँ कहती हैं " जप और तपस्या कर्मों के बंधन को तो काट देंगे, किन्तु प्रेम और भक्ति के बिना ईश्वर दर्शन नहीं होगा। " केवल जप करने से नहीं होगा अपने इष्टदेव के प्रति प्रेम-भक्ति पूर्वक उनके गुणों का चिंतन भी करना होगा। मीरा का भजन है -

साधन करना चाही रे मनवा भजन करना चाहिये ।
प्रेम लगाना चाही रे मनवा प्रीत करना चाहिये ।।
नित नाहन से हरि मिले तो जल-जन्तु बहु होय ;
फल मूल खाके हरि मिले तो भरे बान्दुर बाँद्राय ।।
तुलसी पूजन से हरि मिले तो मैं पूजूँ तुलसी झाड़ ;
पत्थर पूजन से हरि मिले तो मैं पूजूँ पहाड़ ।।
तीरण भखन से हरि मिले तो बहुत हैं मृगी अजा;
स्त्री छोड़न से हरि मिले तो बहुत रहे हैं खोजा ।।
दूध पीवन से हरि मिले तो बहुत रहे वत्स वाला ; 
' मीरा ' कहे बिना प्रेम से नहीं मिले नन्दलाला ।।
मनवा साधन करना चाहिये ........।

क्या आप (बंगाली) लोग कैम्प में मछली भी खाते हैं ? जाति न पूछो साधु की पूछो ज्ञान की बात ! देखिये मीरा ने क्या कहा है ? आहार केवल मुख से नहीं होता है-पाँच इन्द्रियों से हमलोग ,रूप-रस-शब्द-गंध-स्पर्श का निरंतर जो भी विषय आहरण करते है, लेते हैं वह भी आहार है। उन सबके छाप हमारे मन पर पड़ते रहते हैं, मन अत्यंत दूषित हो जाता है, उसी मन को लेकर ईश्वर के पास जाना होता है। खुदा के पास जाने के लिये हमारे पास जो एक मात्र यान या वाहन है वह मन है। यदि उस यान या साधन को दुरुस्त रखना है, तो लगातार ईश्वर के नाम का जप और गुण का गान करते रहना चाहिये। मथुरा कृष्ण-नाम मय है अयोध्या रामनाम मय है। फिर भी वहाँ धार्मिक आध्यात्मिक मनुष्य क्यों नहीं हैं ? 
ठाकुर ने कारण बताया है, केवल नाम जपने से नहीं होगा उनके गुणों का चिंतन भी करना होगा। राम का विशेष गुण क्या है ? सत्य ! राम अपने पिता को समझाते है कि ' रघुकुल रीति सदा चलि आई, प्राण जाए पर वचन जाई।' यह बात कहकर राम अपने पिता दशरथ के वचन की लाज रखते हुए वन की ओर चले जाते है।यही सत्यनिष्ठा नचिकेता में दिखाई पड़ती है -उसके पिता कह देते हैं -तुझे मैं यम को देता हूँ ! जब नचिकेता यम के घर जाने की आज्ञा माँगता है ,तब उसके पिता कहते हैं नहीं नहीं वह तो मैंने गुस्से में का दिया था। छोटा सा लड़का कहता है -
 अनुपश्य यथा पूर्वे प्रतिपश्य तथापरे।
सस्यमिव मर्त्य: पच्चते सस्यमिवाजायते पुन:।। 6।।

उसने अपने पिता से कहा : आपके पूर्वज पितामह आदि जिस प्रकार अपने वचन का पालन  करते आए हैं उस पर विचार कीजिए और ( वर्तमान में भी) दूसरे श्रेष्ठ लोग जैसा आचरण कर रहे हैं उस पर भी दृष्टिपात कर लीजिए फिर आप अपने कर्तव्य का निश्चय कर लीजिए।  यह मरणधर्मा मनुष्य अनाज की तरह पकता है अर्थात जराजीर्ण होकर मर जाता है तथा अनाज की भांति ही फिर उत्पन्न हो जाता है।अतएव इस अनित्य जीवन के लिए मनुष्य को कभी कर्तव्य का त्याग करके मिथ्या आचरण नहीं करना चाहिए। आप शोक का त्याग कीजिए और अपने सत्य का पालन कर मुझे मृत्यु ( यमराज) के पास जाने की अनुमति दीजिए। 

कर्म का फल मिलेगा ही, आप उस पर विश्वास करें या न करे। इसीलिये ठाकुर कहते हैं सत्संग करो साधु के पास जाओ निर्जन में रहो ! रघुवीर (राम) के भक्त क्षुदि राम चटोपाध्याय जी  जमींदार के लिये झूठी गवाही न देकर सत्य निष्ठा के लिये देरे गाँव छोड़ कर, कामारपुकुर आ जाते हैं ! इसीको चरित्रवान मनुष्य कहते हैं । चरित्रवान मनुष्य वह है जो प्रलोभन या लालच के फेर में नहीं पड़ कर, बिना किसी भय के नहीं कह  सकता है। इसीलिये भगवान उससे कहते हैं, खुदीराम मैं तुम्हारा पुत्र बनना चाहता हूँ। वे कहते हैं मैं बहुत गरीब हूँ आपकी सेवा नहीं कर पाउँगा। क्षुदिराम अमर हो गए, जब उनके पुत्र श्रीरामकृष्ण का नाम रहेगा लोग उन्हें भी याद करेंगे। क्योंकि उन्होंने कभी झूठ नहीं बोला। 
कृष्ण का गुण क्या है ? त्याग ! ठाकुर कहते थे तुम गीता गीता गीता कहो त्यागी या तागी हो जाता है । रामकृष्ण का नाम जपने से उनके सत्य और त्याग के गुणों का चिंतन हो जाता है । ठाकुर ने सरल उपाय बताया है - कोई भी भय की बात हो तो हाथ की ताली बजाते हुए ईश्वर का नाम जपने लगो। सारे बुरे विचार मन से भाग जायेंगे।
  शास्त्रों में कहा गया है -
जपात् सिद्धि सिद्धिर्जपात् सिद्धिर्न संशयः।

अर्थात जप से निश्चित ही सिद्धि ही मिलती है, इसमें कोई संशय नहीं।  जप के साथ दोष मिटते जाते हैं और अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है। इसी क्रम में एक दिन साधक सिद्धि प्राप्त कर लेता है। प्रथम तो यह कि अपने गुरु द्वारा प्रदत्त   मंत्र को आधार मान कर लग जाये , सफलता मिलती नहीं दिख रही हो तो भी करते जाये "जपात सिद्धि : के अनुसार एक दिन तो सफलता मिलेगी ही, तो फिर परेशान क्यों होना?  द्वितीय हमेशा साधनामय रहे ! और हमारे पास हर कार्य के लिये समय होता है, पर उस नाम को जपने का समय नहीं होता। एक प्रसिद्द हिन्दी भजन है- 

नाम जपन क्यों छोड़ दिया?
क्रोध न छोड़ा झूठ न छोड़ा,
सत्य बचन क्यों छोड दिया।


झूठे जग में दिल ललचा कर,
असल वतन क्यों छोड दिया।


कौड़ी को तो खूब सम्भाला,
लाल रतन क्यों छोड दिया।


जिन सुमिरन से अति सुख पावे,
तिन सुमिरन क्यों छोड़ दिया।


खालस इक भगवान भरोसे;
तन मन धन क्यों ना छोड़ दिया?


नाम जपन क्यों छोड़ दिया ॥
मन निरंतर कुछ न कुछ सोचता ही रहता है, किन्तु जैसे ही उसे मंत्र जपने को कहा जाता है- वह विद्रोह कर देता है। उसको शांत करने के लिये पहले यम-नियम का पालन करो ! ठाकुर यह नहीं कहते, कहते हैं -" सर्वदा ईश्वर का नाम-गुणगान करना चाहिये'!
 रिचुअल्स की दृष्टि से विभिन्न धर्मों की उपासना पद्धति अलग अलग है, किन्तु नाम-जप के विषय में -हिन्दू, बौद्ध, ईसाई, सिख, इस्लाम सभी एक हैं ! जप करने का प्रचलन सभी धर्मों में मिलेगा। प्रार्थना की जपमाला हमें अपने विचारों को केंद्रित करने और भगवान के करीब लाने में मदद करती हैं। साधकों के लिए जपमाला ऐसे ही है जैसे कि किसी छात्र के लिए अबैकस (abacus या कैलकुलेटर) की तरह यह एक आसान और आश्वस्त उपकरण है।
.कुरान में अल्लाह की इबादत करने के लिए जो तरीके बताये गए हैं , उनमे नमाज और तस्बीह अधिक प्रसिद्ध हैं। इस्लाम में जप माला को तस्बीह कहा जाता है। तस्बीह में 99 मनके होते हैं, जो कि अल्लाह के 99 नाम जप हैं। यही बात इस्लाम में सूफ़ी संत बुल्लेशाह कहते हैं अल्ला का नाम जपना सबसे मधुर है। कुछ मुसलमान अल्लाह के नाम का जाप बार-बार इस तरह से करते हैं: सुभान अल्लाह ( भगवान की जय), 33 बार, अलहमदुलिल्लाह ( परमेश्वर की स्तुति), 33 बार और अल्लाहो अकबर (अर्थात भगवान महान है), 34 बार। 
ईसाई धर्म में भी गॉड के कॉन्स्टेन्ट कम्पनी में रहने के लिये उनके नाम को जपने की बात कही गयी है। ईसाई पादरी जिस माला से जप करते हैं उसे " रोजरी  (Rosary) " कहा जाता है । ईसाई मत के कैथोलिक समुदाय के श्रद्धालुओं में मां मरियम की भक्ति ऊंचा स्थान रखती है। श्रद्धालु मानते हैं कि मां अपने भक्तों की प्रार्थनाएं कभी अनसुनी नहीं जाने देतीं। वह अपने बच्चों के दुख और सुख में हमेशा उनके साथ रहती हैं। इसलिए ईसाई लोग मां मरियम के माध्यम से प्रभु यीशु को अपनी प्रार्थनाएं समर्पित करते हैं। अतिपूजनीय और कृपालु मां मरियम अपने भक्तों की प्रार्थना सुनकर आशीर्वाद देती हैं।
 मदर टेरेसा हमेशा अपने साथ क्रुसिफिक्स (क्रॉस ) और रोजरी (माला) लेकर चलती थीं। उनका यह विश्वास था कि यही ऐसे दो साधन हैं जिनसे कहीं भी गरीबों की सेवा की जा सकती है।
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