Saturday, November 15, 2014

७.'क्या करना आवश्यक है ?' ८.' जीवन के खेल में हार-जीत ' ९ .'प्रारंभिक कार्य' ["मनःसंयोग " - लेखक श्री नवनीहरण मुखोपाध्याय ]

७. क्या करना आवश्यक है ? 
( मन से मन की मन की क्रिया-विधि का निरिक्षण )  
हमलोगों ने अब यह समझ लिया कि, मनःसंयोग किये बिना किसी भी कार्य को श्रेष्ठतर तरीके से करना, या किसी विषय का सम्यक ज्ञान प्राप्त करना सम्भव नहीं है। और इसीलिये बिना मनःसंयोग किये सुंदर ढंग से जीवन का निर्माण कर उसे सार्थक करना भी सम्भव नहीं होता। (सफलता प्राप्त करना सब कोई चाहता है, किन्तु सफलता पाना केवल एक पड़ाव है, लक्ष्य तो जीवन को सार्थक करना है, जो बिना जीवन-गठन के सम्भव नहीं होता।) हमने यह भी समझ लिया कि यदि हम मन को, अर्थात उसकी शक्ति को अपनी इच्छा या आकांक्षा के अनुरूप किसी कार्य में नियोजित करना सीख लें, तो ऐसा कोई कार्य नहीं, जो हमारे द्वारा नहीं हो सकता,हम जो चाहें उसे प्राप्त कर सकते हैं।
मन की शक्ति असीम है, किन्तु मन स्वभावतः चंचल है, इसीलिये वह अपने आप ही जगत के विभिन्न विषयों की ओर सर्वदा दौड़ता रहता है। इसी कारण हमलोग बहुधा स्वयं को असहाय के जैसा अनुभव करते हैं और बहुत से कार्यों में असफल हो जाते हैं। हमारी पसंद के ढेरों ज्ञातव्य विषय हमारे लिये अज्ञात ही रह जाते हैं, इसीलिये हमलोग अपने जीवन को सार्थक नहीं बना पाते। तब ऐसी परिस्थिति में हमें क्या करना चाहिए ?
हम जिस विषय में मन को लगाना चाहते हों, अपनी इच्छा और प्रयत्न (उद्यम) के द्वारा केवल उसी विषय में मन को किस प्रकार लगा सकेंगे, सबसे पहले हमें उसी कौशल को सीख लेना चाहिए। यदि हम उस कौशल को सीख लें, तो चंचल मन को शांत कर, उसे विभिन्न विषयों से वापस खींचकर, अपनी इच्छा और आकांक्षा के अनुसार किसी भी कार्य या विषय पर मन को एकाग्र रख सकते हैं। उसे ही मनः संयोग कहते हैं, या सरल शब्दों में मनोयोग भी कहते हैं। इस कौशल को सीख लेने से, उसी मनोयोग की सहायता से मैं किसी भी कार्य को श्रेष्ठतर तरीके से कर सकूँगा, तथा जिस किसी विषय का सम्यक ज्ञान भी प्राप्त कर सकूंगा। जो सीखूँगा उसे याद भी रख सकूँगा तथा उस ज्ञान को उपयोग में लाकर, दूसरे कार्यों को और अधिक श्रेष्ठतर तरीके से कर सकूँगा, और अपने जीवन को सुंदर रूप गठित कर लूँगा।

किसी स्थान में एक दीपक जलाने से, जिस प्रकार प्रकाश की किरणें चारों ओर फ़ैल जाती हैं, ठीक उसी प्रकार मन की शक्ति भी सर्वदा चारों ओर प्रसारित हो जाती हैं। और जिस विषय पर पड़ती हैं, उसको प्रकाशित करके मन के सामने स्पष्ट रूप से प्रकट कर देती है। जिस प्रकार सूर्य का प्रकाश चारों ओर पड़ता है और सब कुछ को प्रकाशित कर उन्हें स्पष्ट रूप से प्रकट करता है। तुम लोगों ने ' उन्नतोदरताल ' (कन्वेक्स-लेंस) के बारे में अवश्य सुना होगा। सूर्य की किरणों को जब 'ताल' के मध्य से गुजारा जाता है, तो वे अपनी वक्रता के अनुसार, नजदीक या दूर के किसी बिन्दु पर केन्द्रीभूत हो जाती हैं। उसके फलस्वरूप उस बिन्दु पर जो कुछ रहता है, वह अधिक प्रकाशित हो जाता है। सूर्य की किरणें इस प्रकार जब 'लेन्स' के मध्य से गुजर कर जिस बिन्दु पर केन्द्रीभूत या संघटित होती हैं, उस स्थान पर यदि कागज रख दिया जाय तो पहले वह स्थान काला हो जाता है, फिर वहाँ से धुआं निकलने लगता है। प्रकाश की किरणों में ताप भी रहता है। इसीलिये उस बिन्दु पर ताप भी अधिक होता है। और थोडी अधिक देर तक कागज को वहाँ रखा जाय तो उसमें आग पकड़ लेती है। उसी प्रकार मन की शक्ति की रश्मियों को भी यदि मनःसंयोग की सहायता से किसी विषय पर एकाग्र किया जाय तो वह विषय  मन के सामने अधिक प्रकाशित हो जाता है। उसका सम्पूर्ण रहस्य, सभी जानने योग्य बातें बिल्कुल सही और विशुद्ध रूप में ज्ञात हो जाती हैं। एवं कार्य के क्षेत्र में भी मन की शक्तियों को इसी प्रकार एकाग्र या यूनिडाइरेक्सनल करके संयुक्त करने से वह कार्य भी श्रेष्ठतर तरीके से सम्पन्न हो जाता है।
मन की शक्ति की अदृश्य रश्मियों को अकारण चारों ओर बिखर कर नष्ट नहीं होने देकर;अंधाधुन्ध तरीके से विभिन्न विषयों में जाने से खींच कर उन्हें एकीकृत या संघटित करके आवश्यक विषय या कार्य में निक्षेप करना ही वास्तव में मनःसंयोग है। अर्थात मन की शक्ति का अपव्यय न कर उसके अधिकांश या कर सकें तो उसकी सम्पूर्ण उर्जा-रश्मियों को एकाग्र या एकमुखी बनाकर ज्ञातव्य विषय पर (जगत को कारण सहित जानने) या अन्य किसी इच्छित कार्य पर नियोजित करने को ही मनोयोग कहते हैं। और मेरे लिये यही करना आवश्यक है। स्वामी विवेकानन्द कहते हैं- " मन की शक्तियाँ इधर-उधर बिखरी हुई प्रकाश की किरणों के समान हैं। जब उन्हें केन्द्रीभूत किया जाता है, तब वे सब कुछ आलोकित कर देती हैं।" (१:३९)
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[स्वामी विवेकानन्द कहते है- " बचपन से हमने केवल बाहरी वस्तुओं में मनोनिवेश करना सिखा है, अन्तर्जगत में मनोनिवेश करने की शिक्षा नहीं पायी। इसीकारण हममें से अधिकांश मनुष्य अपने मन की क्रिया-विधि का निरिक्षण करने की शक्ति को खो बैठे हैं। न को अन्तर्मुखी करना, उसकी बहिर्मुखी गति को रोकना, उसकी समस्त शक्तियों को केन्द्रीभूत कर, उस मन के ऊपर उनका प्रयोग करना, तांकि वह स्वयं अपने ही स्वभाव को समझ सके, (अन्य वस्तुओं का विश्लेषण करने के बजाय) अपने आपको विश्लेषण करके देख सके- एक अत्यन्त कठिन कार्य है।...इसके लिए काफ़ी अभ्यास आवश्यक है। पर वैज्ञानिक पद्धति के अनुसार मन के विषय में जानने के लिए अग्रसर होने का यही एकमात्र उपाय है। " (वि० सा० ख० १ :४०)] 
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८ ." जीवन के खेल में हार-जीत "
(मन को यूनिडायरेक्शनल बनाना) 
किसी भी खेल के अन्तिम क्षणों में , हार-जीत का आमना-सामना होने पर उद्वेग और उत्तेजना कितनी बढ़ जाती है ? (२०-२० क्रिकेट में ५ बौल ५ रन के समय ?) अन्त में विजयी होने पर मन उल्लास और आनन्द की तृप्ति से भर उठता है। किन्तु जीत किसकी होती है ? जो खेलते समय मन को स्थिर करके अपना पूरा ध्यान खेल के ऊपर ही केंद्रित रख सकता है; जो बड़े धैर्य के साथ खेल में अनवरत लगा रहता है और अंत में विजयी भी वही होता है जो खेल के नियमों और जीतने के कौशल को अच्छी तरह से जानता है, तथा 'सही समय पर सही दाँव' खेलकर अपनी जीत पक्की कर लेता है। 
जो विजयी होता है उसे खेल जीतने की तकनीक (स्ट्रैटजी) में महारत हासिल करने के लिये, बहुत लम्बे समय तक कठोर परिश्रम करते हुए उसका अभ्यास करना पड़ता है। अच्छी तरह खेल सकने एवं निश्शंक होकर खेल की तकनीक का प्रयोग करने की विधि सीखने के लिये उसे कई नियमों का पालन करना होता है; तथा लगातार कई दिनों तक उनका अभ्यास (प्रैक्टिस) भी करना पड़ता है। जो कुशल खिलाड़ी (मैन ऑफ़ दी मैच) कितने ही लोगों को आनन्द पहुँचता है,अपने खेल का श्रेष्ठ प्रदर्शन कर लोगों की वाहवाही प्राप्त करता है तथा लक्ष्य स्तम्भ को छूने (वर्ल्ड- कप जीतने ) के गर्व का अधिकारी बन जाता है; उसे खेल जीतने की तकनीक तथा कुछ नियमों का अनुपालन अवश्य करना पड़ता है।
हमारा पूरा जीवन भी एक महान खेल के जैसा है। इस खेल में हार-जीत के ऊपर ही यह निर्भर करता है कि- हमारा मनुष्य-जीवन प्राप्त करना सार्थक हुआ या यूँ ही व्यर्थ (आहार,निद्रा,भय, मैथुन) में  नष्ट हो गया? और जीवन के इस खेल में विजयी होने से जिस आनन्द की अनुभूति होती है, उसके जैसा आनन्द क्या अन्यत्र कहीं और है ? लेकिन इस खेल में पराजित हो जाने पर जिस गहरी पीड़ा और निराशा का अनुभव होता है, उसे शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता। फ़िर भी कई लोगों का जीवन व्यर्थता में ही समाप्त हो जाता है। 
किन्तु जो लोग इस जीवन-संग्राम में विजयी होते हैं, ऐसे ही लोगों को मानव-जाति हमेशा-हमेशा के लए याद करती है, उनके प्रति श्रद्धा रखती है; तथा उनको ही अपना 'नेता' मानकर  का उनका अनुसरण करने की अभिलाषा रखती है। इसलिए इस बात का निर्णय हमें आज ही कर लेना होगा कि जीवन के खेल में पराजय-हमें कदापि स्वीकार नहीं है। और जितनी कम उम्र में इस निर्णय पर पहुँचा जाय उतना ही श्रेयस्कर होगा, क्योंकि ऐसा होने से खेल या जीवन-संग्राम के लिये पर्याप्त समय मिल जाता है। इस खेल में जीतने की तकनीक को कम उम्र में ही सीख लेने से जीवन-खेल में विजय सुनिश्चित हो जाती है। अब निर्णय हमें स्वयं करना है- क्या हम जीवन को व्यर्थ होने देंगे ? तुम क्या कहते हो ? 
किन्तु इस जीवन-संग्राम रूप खेल में विजयी होने का वास्तविक कौशल क्या है ? इसका वास्तविक कौशल है मन को अपनी इच्छा और प्रयोजनीयता के अनुसार जो करना आवश्यक हो, या जिस विषय का ज्ञान अर्जित करना हो,उसी विषय में मन को केन्द्रीभूत रखने की पद्धति सीखना। मन को संयमित और संघटित करके एकाग्र बनाने की तकनीक सीखना, तथा उस तकनीक या दाँव का प्रयोग करके अपने मन को पूरी तरह से वशीभूत कर लेना। 
मनमाने ढंग से मन को इधर-उधर भागने न देकर पूरी तरह से अपने वश में रखने को ही मन का संयम (mortification या आत्मसंयम) कहते हैं। मन की शक्ति इच्छानुसार (Ad lib) बहिर्मुखी होकर इन्द्रिय विषयों में बिखरी हुई है, समझा-बुझाकर उसको सहमत बनाने या एकत्रित करने को ही संहत करना कहते हैं। मन को पूरी तरह से अपने वश में लाना होगा, किसी भी परिस्थिति में मन को अपने नियंत्रण से बाहर नहीं होने दूँगा। मन की अदृश्य शक्ति-रश्मियों को यूनिडायरेक्शनल अर्थात एक ही दिशा में क्रियाशील या एकमुखी करलेने को ही मन की एकाग्रता (या कॉन्सन्ट्रेसन ऑफ़ माइंड) कहते हैं। और इस प्रकार से एकाग्र या एकमुखी मन को कुछ समय तक किसी एक ही विषय में संलग्न रख पाने को मनःसंयोग कहते हैं। इसे ही मनोयोग या मन को लगाना भी कहते हैं। 
किसी भी प्रयास की सफलता या विजय इसी मनोनिवेश के परिमाण पर निर्भर करती है। हमें आजीवन कितने ही प्रयत्न या कार्य निरंतर करने पड़ते हैं। उन्हें हर समय मनोयोग पूर्वक करते रहने में सक्षम होने से जीवन में विजय या सार्थकता अवश्यम्भावी है। इसलिए हमे अपने मन को वश में लाना ही होगा। हम जानते हैं कि यह कार्य बहुत कठिन है, किन्तु यह असम्भव नहीं है। मनुष्य मात्र के लिये कुछ भी करना असम्भव नहीं है। क्योंकि मनुष्य अनन्त शक्ति का अधिकारी है, और वह अनन्त शक्ति मन कि गहराई में छुपी हुई है। इसलिये उस शक्ति को प्राप्त करके जीवन को सार्थक बनाने के लिये जितना भी जितना भी जोर लगाना पड़े, जितना भी परिश्रम करना आवश्यक है उतना मैं अवश्य करूँगा। उत्साह और धैर्य कभी नहीं छोड़ूँगा !
मन को अपने वश में लाकर जीवन-संग्राम में अपनी विजय सुनिश्चित कर लूँगा। झूठी प्रशंषा या वाहवाही पाने की तरफ आँख उठाकर भी नहीं देखूँगा; किन्तु जब मनुष्य बनकर जन्म लिया है, तो विज्ञानी बनकर (जगत को कारण सहित जानकर) इस जीवन को सार्थक अवश्य करूँगा। कहिये, यह सब सोचते हुए भी कितना आनन्द मिलता है !
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स्वामी विवेकानन्द कहते हैं-" एक अन्तर्निहित शक्ति मानो लगातार अपने स्वरूप में व्यक्त होने के लिए- अविराम चेष्टा कर रही है, और बाह्य परिवेश या परिस्थितियाँ उसको दबाये  रखने के लिए प्रयासरत है, बाहरी दबाव को हटा कर प्रस्फुटित हो जाने के इस प्रयत्न (महान-खेल) का नाम ही जीवन है। " (विवेकानन्द-चरित पृष्ठ -१०८) "  
" यह चित्त अपनी स्वाभाविक पवित्र अवस्था को फ़िर से प्राप्त करने के लिये सतत चेष्टा कर रहा है, किन्तु इन्द्रियाँ उसे बाहर खींचे रखती हैं। उसका दमन करना, उसकी बाहर जाने की प्रवृत्ति को रोकना और उसे उलट कर, अन्तर्मुखी करके आत्मा के ओर जाने वाले मार्ग में ही एकाग्र रखने का अभ्यास करना,  मनः संयोग है।"(१:११८) 
"आगे बढो ! सैकडों युगों तक संघर्ष करने से एक चरित्र का गठन होता है। निराश न होओ ! ... मुझे सच्चे मनुष्य की आवश्यकता है, मुझे शंख-ढपोर चेले नहीं चाहिए।" (३:३४४) 
 
 ९ .प्रारंभिक कार्य 
(यम-नियम)
आओ अब हम यह देखें कि मनःसंयोग करना सीखा कैसे जाता है ? हमने यह समझ लिया है कि मुख्य कार्य  मन को संयत करना है, अर्थात उसे अपना ऑर्डर्ली, (orderly- या चपरासी जो किसी अफसर के साथ रहता है) अनुशासित आदेशपाल जैसा बना लेना है ! किन्तु यदि अपने दैनन्दिन जीवन में संयम नहीं हो तो किसी भी उपाय से स्वभावतः चंचल मन को  शिक्षा देना, या उसे अपने नियंत्रण में रखना सम्भव नहीं है। 
इसलिये कार्य का प्रारंभ दैनंदिन जीवन को संयम में रखने की चेष्टा से ही करना होगा। जीवन में संयम रखने से तात्पर्य है हमलोगों की सोच (thinking, विचार करने की क्रिया), बोल (utterance) , एवं कर्म (action-कार्यकलाप) सभी पर हमारा नियंत्रण हो।यदि हमारा जीवन ही असंयत (extravagant) हो, तो मन को विनयशील (disciplined) बनाना या उस पर शासन करना,अथवा मनःसंयोग या मन की एकाग्रता (कॉन्सनट्रेशन ऑफ़ माइंड) प्राप्त करना असम्भव है । जीवन को या मन को संयमित करने के लिये आवश्यक है -संकल्प, मन की दृढ़ता, उत्साह, धैर्य और कर्मठतापूर्वक किया जाने वाला प्रयास, उद्यम या अभ्यास।  किन्तु यदि हम जीवन में कुछ नियमों का पालन नहीं करें तो इन गुणों को अर्जित नहीं किया जा सकता। इसीलिये मनःसंयोग सीखकर यदि जीवन को सुंदर और सार्थक करना चाहते हों, तो सबसे पहले हमें अपनी इच्छाओं के ऊपर लगाम लगाना सीखना होगा। विचार करते समय, बोलते समय और कुछ भी करते समय- हमेशा अनुशासित रहना होगा, तथा कुछ नियमों का पालन भी करना होगा। तभी मनःसंयोग की पद्धति के अनुसार अभ्यास करने पर, हमलोग इसे भी वैज्ञानिक ढंग से प्रयोग करने जैसा सीख सकते हैं
मन का स्वभावतः चंचल होना बुरा नहीं है, किन्तु मन में रहने वाले षडरिपू-(काम,क्रोध,लोभ,अहंकार,मोह,
मात्सर्य आदि) जो उसको निरंतर अत्यधिक चंचल बनाये रखते हैं, वह ठीक नहीं है। इसलिये पहले अपने जीवन को अनुशासित करना होगा, विवेक-प्रयोग की सहायता से भोगों के प्रति जरूरत से ज्यादा बढ़ चुके लोभ-लालच को  धीरे धीरे कम करते जाना होगा। जीवन को संयमित और अनुशासित रखने के लिये कुछ गुणों (यम-नियम) के विषय में जानकर उन्हें सदैव याद रखना, तथा उन्हें अपने जीवन में धारण करने का अभ्यास करना आवश्यक होगा। 
यम - दैनंदिन जीवन में संयम रखने के लिए जिन पॉँच अकरणीय कार्यों से विरत रहना होगा वे हैं- अहिंसा, सत्य, आस्तेय, ब्रह्मचर्य, और अपरिग्रह। मनसा, वाचा, कर्मणा किसी भी प्राणी को कभी कष्ट न पहुँचाना 'अहिंसा' कहलाती है। स्वामी विवेकानन्द कहते हैं, "मैं किसी भी व्यक्ति या जीव को विचार,वचन या कर्मों से कभी आहत नहीं करूँगा ! - एक बार इस प्रकार का दृढ़-मनोभाव बना लेने से ह्रदय में जिस आनन्द कि उपलब्धि होती है, उससे अधिक आनन्द अन्य किसी चीज़ से प्राप्त नहीं होती! " उसके बाद है 'सत्य' के ऊपर आरूढ़ रहना। जो सत्य है, सर्वदा वही बोलना -यह भी एक बहुत बड़ा गुण है। दूसरों की वस्तुओं को छुपाकर, बिना उससे पूछे ही चुरा लेना या बल पूर्वक छीन लेना बहुत बुरी बात है, ऐसा करना कभी उचित नहीं है। दूसरे की वस्तु को चोरी करने की भावना का आभाव-' आस्तेय ' कहलाता है। एक अन्य अत्यन्त महत्वपूर्ण गुण है 'ब्रह्मचर्य'! मन, वचन और शरीर की शक्ति को चाहे जैसे भी नष्ट नहीं होने देना ही ब्रह्मचर्य कहा जाता है। अर्थात मन, वचन और शरीर से सर्वदा पवित्र रहने की चेष्टा को ही ब्रह्मचर्य कहते हैं।  जिस प्रकार का चिन्तन करने, बोलने या कर्म करने के बाद मन में ग्लानी या अवसाद आता है - उसे तत्काल (विष के समान) त्याग देना ही ब्रह्मचर्य का मुख्य सिद्धान्त है। दूसरों से कोई अच्छी वस्तु पाने की इच्छा, कहीं से कोई उपहार, भेंट या चढावा मिलते ही उसे उठा लेना- इन सबसे भी मन दुर्बल और अपवित्र हो जाता है। मुफ्त में कुछ भी लेने से बचना -अपरिग्रह कहलाता है । ये पाँच सद्गुण मन को पवित्र बना देते हैं, अतः जीवन को संयमित रखने के लिये 'यम' बहुत आवश्यक है । जीवन को संयमित और मन को शुद्ध किये बिना मनःसंयोग ठीक ठीक नहीं होता।
फिर कुछ नियम ऐसे हैं जिन्हें बिल्कुल आदत में परिणत कर लेना अनिवार्य है !जितना भी खेल सीखने की चेष्टा क्यों न की जाय, इनका पालन तो हर हाल में करना ही होगा। जीवन-खेल में विजय को सुनिश्चित करने के लिये किसी कुशल खिलाड़ी की तरह नियम-पालन में महरात तो हासिल करनी ही होगी। ये पाँच नियम हैं- शौच, संतोष, तपः, स्वाध्याय और ईश्वर- प्रणिधान। 
पहला है शौच अर्थात शुचिता या स्वच्छता- शरीर और मन दोनों को स्वच्छ रखना होगा। इतना ही नहीं, अपने उपयोग में आने वाली हर वस्तु - निवास स्थान, बिछावन, कपड़े, पढाई का टेबल, आलमीरा, खाने का तरीका और भोजन की थाली आदि  को सदैव स्वच्छ रखने की आदत डाल लेनी होगी। इसके साथ ही साथ मन को भी सर्वदा स्वच्छ,शुद्ध और पवित्र रखना होगा, अर्थात मन में केवल शुभ-संकल्प ही रखने की आदत डालनी होगी। 
दूसरा है -संतोष या संतुष्टि का भाव। जो कुछ जितना मिला है, उतने से संतुष्ट नहीं रहता, और चाहिये, और चाहिये- मन यदि सर्वदा ऐसे ही छटपट करता रहे (राजा ययाति की तरह), तो उस मन को नियंत्रित करके  किसी कार्य में मनोनिवेश करना सम्भव नहीं होता। तीसरा नियम है तपः - जीवन में सभी प्रकार के दुःख-
कष्टों को सहन करने की क्षमता भी रहनी चाहिए। कुछ कठिनाई या हार्डशिप को तो जान-बूझकर उठाने की आदत रहनी चाहिये। जीवन-गठन करने में तो कई दुःख-कष्ट उठाने होंगे। इसीलिये सुकुमार बनने से, या हर समय बहुत सुख में रहने की इच्छा करने से, जीवन में सार्थकता (परमानंद का स्वाद या fruition) प्राप्त करना कठिन हो जाता है। कुछ उत्तम वस्तु को प्राप्त करने के लिए, कुछ कष्ट उठाने में समर्थ होना आवश्यक है। इसको ही तप कहा जाता है। [कहा गया है-सुखार्थी त्यजते विद्याम् विद्यार्थी त्यजते सुखम् ।
सुखार्थिनः कुतो विद्या विद्यार्थिनः कुतो सुखम् ।।  सुखके पीछे दौडनेवाला विद्याका त्याग करता है और विद्या प्राप्तिका इच्छुक सुखका त्याग करता है। सुखार्थीको विद्या कहाँसे मिलेगी और विद्यार्थीको सुख कहाँसे मिलेगा?] 
चौथा नियम है- स्वाध्याय, अर्थात नियमित रूप से विशेष अध्यन करना । कोर्स या पाठ्यक्रम की पढाई तो करते ही हैं, किन्तु हमें जीवन-गठन के कौशल को सीखने के लिये भी निरंतर विशेष-पढाई करने का अभ्यास करते रहना चाहिये। ऐसी पुस्तकों का अध्यन करना चाहिए, जिससे मनुष्य जीवन को गठित करने की प्रेरणा प्राप्त हो और उसके उपाय को भी सीखा जा सकता हो। जितना सम्भव हो सके इन बातों के सम्बन्ध में रोज पढ़ना चाहिये कि -जीवन क्या है, जीवन का उद्देश्य क्या है, मनुष्य जीवन को सार्थक कैसे किया जाता है ? इस तरह के अध्यन के लिए महापुरुषों द्वारा लिखित कई पुस्तकें उपलब्ध हैं,कई महापुरुषों के जीवन और सन्देश बाजार में मिलते हैं। किन्तु युवाओं के लिए स्वामी विवेकानन्द की जीवनी और वाणी का नियमित स्वाध्याय करना सर्वाधिक उपयोगी होगा। जैसे हम प्रतिदिन बिना भोजन और बिना सोये नहीं रह सकते, उसी प्रकार स्वाध्याय किए बिना एक भी दिन व्यर्थ में नहीं गँवाना चाहिए। 
इसके आलावा एक अन्य नियम ऐसा है जो मनःसंयोग के लिये विशेष रूप में सहायक है। 
जीवन में संयम रखने के लिए,मन रूपी भूत को वशीभूत करने का पाँचवा और सबसे महत्वपूर्ण नियम है -' ईश्वर-प्रणिधान '। अथवा महापुरुष-प्रणिधान ! ब्रह्म या ईश्वर  में विश्वास रखते हुए, ईश्वर-स्मरण करने से मन सहजता से शांत और संयत हो जाता है। किन्तु अनेक लोगों को ईश्वर (निराकार ब्रह्म,ॐ,अल्ला) की सर्वव्यापकता का चिंतन करना कठिन मालूम पड़ता है। इसीलिये उनके अवतार या संदेशवाहक (पैगम्बर) के रूप में जिन्होंने मनुष्य शरीर धारण करके जन्म ग्रहण किया है , जैसे- राम, कृष्ण, बुद्ध, यीशु, मोहम्मद, श्रीचैतन्य, श्री रामकृष्ण- आदि में से किसी को भी अपना आदर्श मान कर उनका चिन्तन-मनन करने से जीवन और मन को संयमित करना सुगम हो जाता है। 
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[' ईश्वर-प्रणिधान '-***  किसी मनचले (अतिमहत्वाकांक्षी-या लालची) व्यापारी ने एक सिद्ध संत से व्यापार में शीघ्र-सिद्धि का मंत्र पूछा। संत ने उसकी मंशा भाप कर उसे भूत सिद्धि का मंत्र बता दिया। उस सिद्धयोगी के बताए हुए विधान से उसने एक भूत को वश में कर लिया और उसे कहा- ‘हम जो कहें तुम्हें वही करना होगा।’ उस भूत ने उस व्यापारी से कहा- ‘ठीक है, पर मेरी भी एक शर्त है। मैं तुम्हारी आज्ञा इस शर्त पर मानने के लिए तैयार हूं कि जिस समय मुझे कुछ काम नहीं दोगे उस समय मैं तुम्हें खा जाऊंगा।’ मतलब ये कि उस भूत को वह व्यापारी चैबीसो घंटा काम दे। ऐसा न होने की स्थिति में वह भूत उस व्यापारी को मार देगा।
ऐसे तो उस व्यापारी का बहुत बड़ा कारोबार था और उसके पास काम की उसे कोई कमी नहीं दिखती थी। किन्तु वह व्यापारी उस भूत को जो भी काम देता था उस काम को वह अपनी दिव्य शक्ति से पलक झपकते ही समाप्त कर देता था; और दूसरे काम की फरमाइस कर देता था। इस तरह अब व्यापारी को इस बात की हमेशा चिंता बनी रहती थी कि उसे अगला कौन सा काम बताया जाय?  इस चिंता के कारण उसका शरीर क्षीण होने लगा और वह दुर्बल सा हो गया। उसकी खबर सुनकर उसका एक पुराना हितैषी मित्र एक उस व्यापारी से मिलने आया। वह अपने मित्र को इस तरह कृषकाया हुआ देख कर अचंभित हुआ और उससे इसका कारण पूछा। व्यापारी ने उसे सारा वृतांत कह सुनाया और अपने द्वारा खरीदे गए इस दुख से छुटकारा पाने का उपाय पूछा। अपने मित्र की परेशानी सुन कर उस अनुभवी मित्र ने व्यापारी को एक दूसरे सिद्ध के पास ले गया। सिद्ध ने उस व्यापारी की समस्या सुनने के बाद उससे कहा- ‘तुम उस भूत से कहना कि तुम एक हजार गांठ वाला बांस लाओ और उस बांस को आंगन में गाड़ दो,और खाली समय में तुम उस बांस पर चढ़ो उतरो,बांकी जब मेरे पास काम होगा तो तुम्हें उस काम को करना है।’ और व्यापारी ने वैसा ही किया। इस तरह उसे उस भूत के भय से छुटकारा मिला। 
ऐसे ही अतिसामर्थ्यवान् किन्तु उदण्ड मन रूपी भूत को भगवान या आदर्श के चरणों में लगाए रहे तो जीव हमेशा  सुखी रहता है, उसका जीवन सार्थक हो जाता है। अन्यथा उसे व्यर्थ के असद् विषयों में भटकना पड़ता है। सन्त तुलसीदास जी ने (विनयपत्रिका-८२) कहा है -


नयन मलिन परनारि निरखि, मन मलिन बिषय सँग लागे।
हृदय मलिन बासना-मान-मद, जीव सहज सुख त्यागे।।


पर-स्त्रियोंकी ओर देखनेसे नेत्र मलिन हो गये हैं, विषयोंका संग करनेसे मन मलिन हो गया है और वासना, अहंकार तथा गर्वसे हृदय मलिन हो गया है तथा जीव, स्व-स्वरूपके निजानन्द रूपी सहज-सुख को त्याग देने से मलिन हो गया है।।



परनिंदा सुनि श्रवण मलिन भे, बचन दोष पर गाये।
सब प्रकार मलभार लाग निज नाथ-चरण बिसराये।।
 

परनिन्दा सुनते-सुनते कान और दुसरोंका दोष कहते-कहते वचन मलिन हो गये हैं। अपने नाथ श्रीरामजी के चरणोंको भूल जानेसे ही यह मलका भार सब प्रकारसे मेरे पीछे लगा फिरता है।।



तुलसिदास ब्रत-दान, ग्यान-तप, सुध्धिहेतु श्रुति गावै।

राम(ठाकुर) -चरन-अनुराग-नीर बिनु मल अति नास न पावै।।


इस पापके धुलनेके लिये वेद तो व्रत, दान, ज्ञान, तप आदि अनेक उपाय बतलाता है; परंतु हे तुलसीदास! श्रीराम के " ठाकुर - माँ - स्वामीजी" चरणों के प्रेमरूपी जल बिना इस पापरूपी मलका समूल नाश नहीं हो सकता ।।
जो विकार मन को अतिरिक्त चंचल बना देते हैं उन्हें षडरिपू कहा जाता है.वेप्रमुख शत्रु हैं- काम(Desire), लोभ और अहंकार, क्रोध, मोह, ईर्ष्या; इनको पहले नियन्त्रण में लाना अनिवार्य है. वरना ये हमें खा डालते हैं।  तात्पर्य यह कि जो भगवान का भक्त नहीं है,या किसी आदर्श के प्रति समर्पित नहीं है, उसमें महापुरुषों के जैसे गुण आ ही कहां से सकते हैं? वह तो तरह तरह के संकल्प करके निरंतर तुच्छ बाहरी विषयों की ओर ही दौड़ता रहता है। अतः मन रूपी इस भूत को निश्चय ही वश में रखने का कौशल सीखना अनिवार्य  है।  ]
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