Thursday, November 6, 2014

४. मन क्या है ?(3H) [ " मनःसंयोग " लेखक श्री नवनीहरण मुखोपाध्याय ]

४. मन क्या है ? 
(मनुष्य को समूल '3H' जान लेना ही मुख्य बात है!)
(Head ): अब तक हमने देखा है कि श्रेष्ठतर जीवन जीने के लिये, हमें अपने कार्यों को सफलतापूर्वक सम्पन्न करना होगा तथा विभिन्न विषयों का ज्ञान प्राप्त करना होगा। इसके साथ ही साथ मनःसंयोग करने की क्षमता तो अर्जित करनी ही पड़ेगी। यदि हमलोग केवल जीवित ही रहना नहीं चाहते हों, बल्कि जीवन को रमणीय एवं सार्थक भी बनाना चाहते हों तो पहले इसे सुन्दर ढंग से गठित करना आवश्यक होगा। इसके लिये भी ज्ञान अर्जित करना होगा तथा अनेक प्रयास करने होंगे। इस प्रकार हम समझ सकते हैं कि जीवन-गठन करने के लिये भी मनःसंयोग सीखना अनिवार्य है।
अब प्रश्न यह है कि ' मन' कहने से हमारा तात्पर्य क्या है ? उसे तो देखा नहीं जा सकता, उसे मुट्ठी में भी नहीं पकड़ा जा सकता, तथापि मन के विषय  में हर कोई जानता है कि - मन है । 'मन नहीं है'  - ऐसी बात तो कोई नहीं कहता। यहाँ मेरा मन नहीं लग रहा है, मन घबड़ा रहा है, मन प्रसन्न है या दुःखी है- मन के विषय में ऐसी कितनी ही बातें हमलोग निरंतर कहते हैं। किन्तु यह मन है क्या चीज़ ? हमलोग भली-भाँति जानते हैं कि मन है। 'मन में याद नहीं है', 'मन में याद है ' --इस प्रकार बहुधा कहा जाता है। मन के बारे में इतना कहने-सुनने पर भी हम मन को ठीक से समझ क्यों नहीं पाते हैं ? वास्तव में मन हमारे इतने निकट है कि हम उसे देख ही नहीं पाते, किन्तु बहुत अच्छी तरह से जानते हैं वह है।  
(Heart): हमलोग जिसे 'मैं' कहते हैं, वह क्या है ? बिना सोंचे-समझे अकस्मात् हमारे मन में विचार कौंध उठता है- क्यों, यह शरीर ही तो है ! परन्तु यदि शरीर ही ' मैं ' होता हो, तो हमलोग - 'मेरा शरीर' क्यों कहते हैं ? बहुधा हम ऐसा भी कहते हैं, कि आज ' मुझे ' अच्छा नहीं लग रहा है। इस पर चिन्तन करने से यह स्पष्ट होता है कि मेरा मन उदास हो गया था। तब तो यह शरीर भी मेरा है, और मन भी मेरा है। अंततः हम यह सोचने पर बाध्य हो जाते हैं कि- ' मैं ', शरीर और मन के अतिरिक्त कुछ और ही वस्तु है।  इसी ' यथार्थ मैं ' को हमारे देश में ' आत्मा ' की संज्ञा दी जाती है। इस प्रकार विचार-विश्लेषण करने से यह स्पष्ट हो जाता है कि मनुष्य इन तीनों (3H) - ' शरीर (Hand), मन (Head)(या सूक्ष्म शरीर) और आत्मा (Heart) ' का सम्मिलित रूप है। इनमें से आत्मा ही हमारी वास्तविक सत्ता है।
इस स्थूल शरीर का निर्माण जगत के विभिन्न पदार्थों से हुआ है। इस शरीर एवं स्थूल जगत (स्थूल शरीरHand) तथा हमारी आत्मा (Heart) के मध्य - हमारा मन (Head: सूक्ष्म शरीर) एक सेतु (Bridge) की तरह कार्य करता है।  शरीर और जगत की सभी वस्तुयें स्थूल जड़ पदार्थों द्वारा निर्मित है, मन सूक्ष्म पदार्थ है और आत्मा अत्यन्त सूक्ष्म। किन्तु आत्मा को शरीर अथवा मन के सदृश अन्य कोई  स्थूल या सूक्ष्म भौतिक वस्तु नहीं समझना चाहिये। सामान्यतः स्थूल भौतिक पदार्थ भी तीन प्रकार के होते हैं- ठोस, तरल और गैस।  ठोस पदार्थ को आसानी से देखा जा सकता है। द्रव या तरल पदार्थों को सर्वदा देखते हुए भी आसानी से पकड़ा नहीं जा सकता।  पानी से पूरे भरे ग्लास को भी दूर से देख कर नहीं कहा जा सकता की वह भरा है या रिक्त ?  वायु को भी हम देख नहीं सकते, फ़िर भी हम जानते है कि वह है, उसके अस्तित्व का ज्ञान हमें अन्य प्रकार से होता है। वृक्ष की पत्तियों या जल की सतह को हिलता हुआ देखने से हम समझ जाते हैं कि वायु प्रवाहित हो रही है। उसी प्रकार मन है- यह उसके कार्यो को देख कर समझा जा सकता है। 
किन्तु 'आत्मा ' (Heart) को इस प्रकार से किसी भी तरह समझा नहीं जा सकता। वह सर्वत्र समाहित है, और समस्त शक्तियाँ उसी की अभिव्यक्ति हैं। इस आत्मा को जानने का उपाय थोड़ा भिन्न है। जिस प्रकार इन्द्रियों के द्वारा जगत के विभिन्न पदार्थों तथा मन को जाना जाता है, उस तरह से आत्मा को नहीं जाना जा सकता, फिर भी उसको जानने का एक उपाय है! क्या हममें से किसी ने जगत के समस्त पदार्थों (सौर मण्डल के ९ ग्रहों आदि ) को प्रत्यक्ष देखा है ? फ़िर भी उन वैज्ञानिकों के वक्तव्य पर हम सभी लोग विश्वास करते हैं। ठीक उसी तरह जो लोग आत्मा के विषय में सम्यक ज्ञान रखते हैं, उन ऋषियों के वचनों पर विश्वास करने तथा उनके बताये गए मार्ग का अनुसरण करने से हम भी आत्मा के विषय में जान सकते हैं।
जिस प्रकार वैज्ञानिकों के समस्त आविष्कारों को उनके द्वारा बताये गए पद्धति का अनुसरण करके प्रमाणित किया जा सकता है, उसी प्रकार (ऋषि-पतंजलि के द्वारा आविष्कृत)  आत्मा को जानने की पद्धति के अनुसार प्रयास करने पर हममें से प्रत्येक उसके सम्बन्ध में स्वयं ही जान सकते हैं।
वास्तविकता यही है कि, (यथार्थ स्वरूपमें) हम ही आत्मा हैं। हमारे समक्ष यह संसार है, और इन दोनों के मध्य मन एक सेतु के समान है। मन के माध्यमसे ही हम समस्त जगत् को देख रहे हैं और व्यवहार कर रहे हैं।हमारी पाँचो इन्द्रियाँ बहिर्मुखी हैं और उनके साथ तादात्म्य कर लेने के कारण,हमारा मन भी बहिर्मुखी हो गया है। मन को इन्द्रिय विषयों से खींच कर,उसेअन्तर्मुखी बना कर यदि अपने ' यथार्थ स्वरूप ' पर ही केन्द्रीभूत कर लिया जाय,तभी हम स्वयं को जान सकते हैं, और पहचान सकते हैं कि - हम ही आत्मा हैं !  
जब तक हम स्वयं ही ' आत्म-साक्षात्कार ' करके इसे सिद्ध नहीं कर लेते, तब तक यह विश्वास करना चाहिए और स्मरण रखना चाहिए कि शरीर और मन से भिन्न एक अन्य ' सत्ता ' हमारे ही भीतर है- जिसे आत्मा कहते हैं। और वह आत्मा वास्तव में हम स्वयं ही हैं !(जो अजर, अमर, अविनाशी है, जिसे शस्त्र नहीं काट सकते, वायू नही सुखा सकता, अग्नि नहीं जला सकती) 
अब हमलोग मन के सम्बन्ध में विस्तार से जानने की चेष्टा करेंगे। तथा यह समझने का प्रयास करेंगे कि किस प्रकार उसे सही ढंग से उपयोग में लाकर हममें से प्रत्येक व्यक्ति अपने अपने जीवन को सुन्दर रूप से गठित कर सकता है; तथा उस सुगठित-जीवन का सदुपयोग करके अपने जीवन को सार्थक कर सकता  है। आइये इन्ही सब बिन्दुओं पर गौर किया जाय। 
प्रश्न था कि मन क्या है ? जिसकी सहायता से हमें सब कुछ उपलब्ध होता है, अनुभव करते हैं और किसी भी वस्तु या विषय को समझ सकते हैं, उसको ही मन कहते हैं। यदि हमारे पास मन न रहता तो हमें किसी भी प्रकार की उपलब्धि नहीं हो सकती थी। हमलोग वाह्य जगत् को अपनी पञ्च इन्द्रियों - आँख, कान, नाक, जीभ और त्वचा के माध्यम से ही जान पाते हैं। यह जगत् पंचेन्द्रिय ग्राह्य है, इन्हीं इन्द्रियों के माध्यम से हम-  रूप, रस, गंध, शब्द और स्पर्श आदि पाँच विषयों को ग्रहण करते हैं। हमारी पाँचों इन्द्रियाँ इन्हीं पाँच विषयों का संवाद हम तक पहुँचाने का कार्य करती हैं। लेकिन इन संवादों का विश्लेषण कर उस वस्तु या विषय को वर्गीकृत कर उनके बारे में स्पष्ट धारणा बनाने का कार्य केवल मन का है, किसी अन्य का नहीं। 
जिन स्थूल पदार्थों को इन्द्रियों के माध्यम से पकड़ा जा सकता  है, उन सबके विषय में धारणा करना सहज है। किन्तु इनके अतिरिक्त जो वस्तुऐं सूक्ष्म या अत्यंत सूक्ष्म हैं, जो साधारण स्थूल पदार्थों की तरह इन्द्रियग्राह्य नहीं हैं; अथवा इन्द्रियातीत हैं उन सबके विषय में धारणा करना थोड़ा कठिन हो जाता है। इसीलिये जिसके माध्यम से समस्त वस्तुओं के सम्बन्ध में धारणा की जाती है,अर्थात 'मन'- उसके सम्बन्ध में धारणा करना थोड़ा कठिन है। फ़िर भी थोडी देर के लिए 'मन' को भी एक इन्द्रिय ग्राह्य वस्तु (द्रव) के समान मान लें, तथा उसके समस्त कार्यों को भी इन्द्रिय ग्राह्य विषयों जैसा देखने का प्रयास करें तो इस सूक्ष्म वस्तु (य़ा सूक्ष्म शरीर) 'मन' के सम्बन्ध में भी निश्चित रूप से कुछ धारणा बनाई जा सकती है। मन को समझने के लिए इसी प्रकार क्रमशः आगे बढ़ना होगा, क्योंकि स्थूल पदार्थों के अतिरिक्त अन्य सूक्ष्म वस्तुओं के बारे में धारणा करने, अथवा इन्द्रियातीत वस्तुओं के सम्बन्ध में ज्ञान प्राप्त करने का यही एकमात्र पथ है।
वायु को न तो हम अपनी आँखों से देख सकते, और न उसे हम अपनी मुट्ठी से पकड़ ही सकते हैं। उसी प्रकार मन को भी न तो हम अपनी आँखों से देख सकते हैं, न उसे अपनी मुट्ठी से पकड़ सकते हैं। फिर भी हवा है, इस बात को हम उसकी विभिन्न गतिविधियों द्वारा जान लेते हैं। उसी प्रकार मन के विभिन्न क्रिया-कलापों को देख कर, हम यह जान सकते हैं कि 'मन' है। मन की तुलना हम किसी विशेष प्रकार के दर्पण या कैमरे की फिल्म से कर सकते हैं, जिसके ऊपर मानो बाह्यजगत् के समस्त दृश्य, शब्द, गंध,स्वाद, स्पर्श आदि के प्रतिबिम्ब या छाप पड़ते रहते हैं। कुछ प्रतिबिम्ब और दाग तो साथ ही साथ मिट जाते हैं, किन्तु कोई कोई प्रतिबिम्ब या दाग बहुत लम्बे समय तक स्थायी रह जाते हैं। फिर कुछ गहरे दाग ऐसे होते हैं, जो विलुप्त या डिलीट हो चुके प्रतीत होने से भी, तत्सम्बन्धी चिंतन करने से पुनः मानो उभर कर सामने आ जाते हैं। उसको ही हमलोग स्मृति-कोष (मेमोरी बैंक) कहते हैं। 
मन के विविध कार्य इस प्रकार हैं - मन के द्वारा ही हमलोग ज्ञानार्जन करते हैं, चिंतन-मनन करते हैं, कल्पना करते हैं, पुरानी पड़ चुकी यादों को ताज़ा करते हैं। मन के द्वारा ही विभिन्न इन्द्रियों से प्राप्त होने वाले संवादों का विश्लेषण करते हैं, उन्हें वर्गीकृत करके बुद्धि के द्वारा निर्णय लेते हैं, भले-बुरे के बीच अंतर करते हैं। इच्छा या संकल्प करते हैं तथा सुख-दुःख का अनुभव करते हैं। यदि इन समस्त कार्यों को सम्पादित करने वाला कोई ऐसा उपकरण (मन या सूक्ष्म शरीर) हमारे पास नहीं होता; उसका अस्तित्व और स्थायित्व न होता, तब इतने सारे कार्य किस प्रकार हो सकते थे ? फिर भी जिसकी सहायता से इतना सब कुछ हो रहा है, उसको हमलोग बाह्य पदार्थों जैसा नहीं जान पाते हैं; क्योंकि वह स्थूल नहीं बल्कि सूक्ष्म पदार्थ है। 
जिस विधि हमलोग बाह्य सूक्ष्म पदार्थों (हवा आदि) को उनके कार्यों को देखकर जानने की चेष्टा करते हैं, उसी प्रकार मन भी एक सूक्ष्म पदार्थ है उसके कार्यों को देखने की चेष्टा करने से हम अपने मन (या सूक्ष्म शरीर) के विषय में भी बहुत कुछ जान सकते हैं। जैसे इस बात से हम इन्कार नहीं कर सकते कि मन की सहायता से ही हमलोग विचार करते हैं, कल्पना करते हैं, बीती बातों का स्मरण करते हैं, विश्लेषण करते हैं, निष्कर्ष निकालते हैं, संकल्प करते हैं-  उसी तरह हम इससे भी इन्कार नहीं कर सकते कि- मन है ! 
इस स्थूल शरीर और जगत् को समग्र रूप से जानने, समझने तथा देखने के लिए, मन मानो एक अद्भुत आँख है, जिसे हमारी आत्मा के समक्ष रख दिया गया है। यह मानो एक ऐसा अद्भुत लेन्स है जो - एक साथ टेलिस्कोप (दूरवीक्षण यंत्र) और माइक्रोस्कोप (अनुवीक्षण-यंत्र) दोनों के सम्मिलित रूप जैसा कार्य करता है। यह एक ऐसा कम्प्यूटर है जो केवल सूचनाओं और संवादों को एकत्र ही नहीं करता, बल्कि कई प्रकार से उनका विश्लेषण भी करता है, उन्हें वर्गीकृत कर उनकी व्याख्या करता है, उनमें से सार अर्थ ढूंढ़ निकालता है, फिर यही कल्पना करता है, इच्छा करता है, उद्यम करता है। वस्तुतः मन कि शक्ति के द्वारा ही हमलोग सबकुछ जानने और करने में समर्थ होते हैं। इस प्रकार मन की शक्ति अनन्त है।
[इसलिये कहा जाता है कि -"माइंड इज डिवाइन आईज ऑफ़ आत्मन" अर्थात मन (सूक्ष्म शरीर?)  हमारी आत्मा का दिव्य चक्षु है ! ]

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अब एक उदहारण के द्वारा हम लोग मन की क्रिया- विधि को समझने का प्रयास करेंगे। तुमने ईश्वरचंद्र विद्यासागर का नाम सुना होगा। वे बड़े गरीब किन्तु मेधावी छात्र थे, एग्जाम के समय फुटपाथ पर एक लैंप पोस्ट के नीचे बैठ कर पढने में तल्लीन थे। उनके सामने रोड से एक बारात गुजर गई , थोडी ही देर के बाद एक व्यक्ति आकर उनसे पूछता है, क्या आप बता सकते हैं कि अभी-अभी इधर से जो बारात गुजरा वह किस ओर मुड़ा था ? वे मानो नींद से चौंक कर उठे हों, कहते हैं- ' sorry, no ? ' वे बारात को क्यों नहीं देख सके ? आँखें खुलीं थीं, मस्तिष्क भी जाग्रत और क्रियाशील था किन्तु मन वहाँ नहीं था, तब उनका मन अध्यन में तल्लीन था ! इसीलिये पूरी बारात गुजर गई पर वे उसे देख नहीं सके।
अगर तुम से यह पूछा जाय कि हमलोग देखते कैसे हैं ? तो तुम कहोगे क्यों, हमलोग आंखों के द्वारा देखते हैं। परन्तु दर्शन क्रिया के लिए इतना ही काफी नहीं है। ये आँखें तो केवल एक बाह्य यन्त्र हैं, आँखे हमारी वास्तविक दर्शन-इन्द्रिय नहीं हैं। आँखें तो एक खिड़की के समान हैं, वास्तविक दर्शन इन्द्रिय या उसके स्नायु-केन्द्र जिसे Optic-nerve कहते हैं पीछे हमारे मस्तिष्क में स्थित हैं। उसी प्रकार प्रत्येक इन्द्रियों के अलग-अलग स्नायुकेन्द्र (नर्व-सेंटर) मस्तिष्क में अवस्थित हैं, उनके वाह्य उपकरणों को ही इन्द्रिय नहीं समझना चाहिए । कोई-कोई मनुष्य आँखें खोल कर भी सोया रहता है। कैसे? आँखे ठीक हैं, रेटिना पर चित्र भी बनता है, जिसका संवाद मस्तिष्क में स्थित Optic-nerve तक पहुँच भी रहा है, किन्तु एक चीज मिसिंग है- वह है मन। जिसके आभाव में दर्शन क्रिया हो या अन्य कोई इन्द्रिय विषय हो उसकी उपलब्धि हमें नहीं हो सकती है। 
इस प्रकार हम समझ सकते हैं कि किसी भी इन्द्रिय विषय को जानने के लिए स्थूल शरीर में अवस्थित 'नेत्र' और मस्तिष्क में स्थित उसका कौरेस्पोंडिंग 'स्नायु केन्द्र' (ऑप्टिक-नर्व) तथा  'मन' - इनतीनों के मिलने से ही दर्शन क्रिया संपन्न होती है।
[   'नजरें बदली तो नज़ारे बदल गये'-  भगवान श्रीकृष्ण भी गीता (१५/१) में कहते हैं- ' इस संसार रूप अश्वत्थ वृक्ष का मूल उपर ब्रह्म में है और शाखाएँ नीचे की ओर हैं. इस अश्वत्थ को (मनुष्य सहित सृष्ट जगत को ) जो समूल जानता है वही 'वेदवित् ' -अर्थात ' ज्ञानी' है, और श्रीरामकृष्ण की भाषा में ' विज्ञानी ' है। " मनुष्य को ' समूल ' (3H ) जान लेना ही मुख्य बात है. 'मनुष्य' (3H) को या जगत (कार्य-सूर्योदय) को केवल उपरी तौर पर जान लेना ही काफी नहीं है, बल्कि इसको 'समूल' -अर्थात कारण-सहित जानना ही वास्तविक ज्ञान है।
अर्थात  लंबी साधना (विवेक-प्रयोग) एवं चिंतन-मनन के उपरांत अथर्ववेद का एक उद्गाता ऋषि इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि—" तस्मात् वै विद्वान् पुरुषमिदम् ब्रह्मेति मन्यते।"- इन्हीं सब कारणों से विद्वान व्यक्ति मानवमात्र को ब्रह्मस्वरूप ही जानते हैं. " विवेकानन्द और युवा आन्दोलन" के निबंध 'मनुष्य बनना पड़ता है !'
महत् से 'यूनिवर्सल ईगोइज़म' अर्थात सर्वव्यापी अहं-तत्व की उत्पत्ति हुई है। उसी प्रकार यह सर्वव्यापी अहं-तत्व भी दो रूपों में परिवर्तित हो जाता है। यह 'अहंभाव' (egoism) इन्द्रिय एवं जड़ (तन्मात्राओं), इन दो भागों में विभक्त हो जाता है । इसका एक रूप इन्द्रियों में परिवर्तित हो जाता है। इन्द्रियाँ भी दो प्रकार की होती हैं - संवेदक इन्द्रियाँ (ओर्गन्स ऑफ़ सेंसेशन ) और प्रतिक्रिया करने वाली इन्द्रियाँ (ओर्गन्स ऑफ़ रिएक्शन) । ये आँख और कान नहीं हैं, बल्कि मस्तिष्क में अवस्थित इनके पृष्ठ भाग हैं, जिन्हें हम 'ब्रेन-सेंटर्स, एंड 'नर्व-सेंटर्स' अर्थात मस्तिष्क-केन्द्र और स्नायु-केन्द्र आदि कहते हैं। यह अहं तत्व या जड़ पदार्थ ही परिवर्तित हो जाता है, और इस पदार्थ से ब्रेन-सेंटर्स अथवा केन्द्र निर्मित होते हैं। इसी पदार्थ (अहं-तत्व) से अन्य प्रकारों -तन्मात्राओं का अर्थात पदार्थ के सूक्ष्म कणों का निर्माण होता है, जो 'ओर्गन्स ऑफ़ परसेप्शन' या प्रत्यक्ष करने वाली हमारी इन्द्रियों पर आघात करते हैं और संवेदना (सुगंध) उत्पन्न होती है। तुम उन्हें देख नहीं सकते, मात्र जानते हो कि वे हैं। तन्मात्राओं से स्थूल पदार्थ - पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश और पवन तथा उन सब वस्तुओं का, जिन्हें हम देखते और अनुभव करते हैं, निर्माण होता है। इन्हीं पंच-तन्मात्राओं से यह अत्यंत अधम शरीर रचा गया है।“ क्षिति जल पावक गगन समीरा। पंच रचित अति अधम शरीरा।”– मानस – किषकिंधा काण्ड 11/2.   

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1 comment:

Anusia said...

Vivek Ananda ji ki tulna aur kisi bhi mahann sant se nahi hota. Unka jeevni hi hamara marg darsan hai.