Saturday, November 29, 2014

१५.' परीक्षा और परिणाम ' १६." सीपियों की तरह होना होगा " [ " मनःसंयोग " लेखक श्री नवनीहरण मुखोपाध्याय ]

 १५. परीक्षा और परिणाम

 (धारणा -२)
हम यह कैसे जानेंगे कि मन की दृष्टि उसी ध्येय वस्तु (आराध्य-आदर्श) पर पड़ रही है या नहीं ? इसकी पहचान यही है कि मन जब किसी वस्तु पर पुर्णतः एकाग्र रहता है तो-उस समय मन में अन्य कोई विचार उठेगा ही नहीं। पहले से चयनित वह आदर्श ही मन के चिन्तन का एक मात्र विषय बन जाएगा। उस मूर्त आदर्श में जो उच्च-भाव हैं बस उन्हीं का चिन्तन चलता रहेगा। धीरे धीरे उनके विचार स्पष्ट से स्पष्टतर होते चले जायेंगे। अन्य किसी भी तरह के विचार मन में नहीं उठेंगे। उस चयनित आदर्श के चिंतन में ही मन इतना तल्लीन हो जायेगा कि कितनी अवधि तक धारणा की गयी है, उसका पता भी नहीं चलेगा। नियमित रूप से इसी प्रकार थोड़ी देर तक लगातार एक ही विषय पर मन को तल्लीन रखने में समर्थ होने से ही मनःसंयोग का अभ्यास करना हो जायेगा । 
प्रतिदिन इसी प्रकार अभ्यास करते रहने से धीरे-धीरे अपनी इच्छानुसार मन को किसी भी वस्तु पर धारण किये रखने की क्षमता बढ़ती ही जाएगी। इसके साथ ही साथ किसी भी इन्द्रिय विषय से मन को खींच लेने की क्षमता भी प्राप्त होगी, क्योंकि मैं अनवरत मन के ऊपर अपनी इच्छा का प्रयोग (विवेक-प्रयोग) करने का अभ्यास करता रहता हूँ । इसीलिये इच्छामात्र से मन को बहुत सारी चीजों से खींच कर (किसी अर्दली के समान) हमेशा अपने समक्ष खड़ा रख सकता हूँ,अब वह मेरी आज्ञा के बिना किसी भी विषय में नहीं जाता है।  
'धारणा' के अभ्यास को -अर्थात बार बार मन को इन्द्रियविषयों से खींच कर,थोड़ी देर तक पूर्व-निर्धारित मूर्त आदर्श में तल्लीन रखने की चेष्टा को मन का व्यायाम भी कहा जा सकता है। जिस प्रकार शरीर के व्यायाम से शारीरिक शक्ति में उत्तरोत्तर वृद्धि होती जाती है, उसी प्रकार मन के व्यायाम से मानसिक शक्ति भी बलवती होती जाती है। जिस प्रकार शरीर को शक्तिशाली बनाने का पौष्टिक आहार होता है, उसी प्रकार मन को भी शक्तिशाली बनाने का पौष्टिक आहार होता है। पवित्र विचार या शुभ-संकल्प ही मन को हृष्ट-पुष्ट बनाये रखते हैं। श्रेष्ठ साहित्य पढ़ने, अच्छी संगति में रहने, शास्त्रार्थ या रचनात्मक विचार-विमर्श तथा उच्च भावों का चिन्तन करने से मन को पौष्टिक आहार प्राप्त होता है। उसके साथ-ही-साथ मन का व्यायाम अर्थात 'प्रत्याहार और धारणा' का नियमित अभ्यास करने से मन को भी उन्नत और शक्तिशाली बनाया जा सकता है। 
ऐसे शक्तिशाली मन को यदि संयमित करके वशीभूत कर लिया जाय तो उसके द्वारा सभी कार्यों में सिद्धि प्राप्त की जा सकती है। जिस व्यक्ति ने मन की गुलामी करनी छोड़ दी हो, जो स्वयं अपने मन का प्रभु हो गया हो,अर्थात जिसने अपने मन को जीत लिया हो, उसने वस्तुतः जगत को भी जीत लिया है। वह कभी भी और कहीं भी पराजित नहीं होता, क्योंकि वह मन की अनन्त शक्ति का अधिकारी बन जाता है। अब वह जिस किसी विषय में अपना मनोनिवेश करगा, वह विषय उसे पुरी तरह ज्ञात हो जाएगा। ऐसे मन को जिस कार्य में लगाया जायेगा, वह कार्य सिद्ध हो जायेगा। इसी वशीभूत मन की शक्ति की सहायता से हम अपने जीवन के उद्देश्य या लक्ष्य का चयन कर सकते हैं, तथा उस लक्ष्य को प्राप्त करने के उपयुक्त उपायों पर मनोनिवेश कर, अपने जीवन को सार्थक कर सकते हैं। अपने वशीभूत मन की शक्ति का प्रयोग कर अपने चरित्र और जीवन को सुंदर रूप से गढ़ सकते हैं। इस प्रकार मनः संयोग का अभ्यास करने से कोई भी व्यक्ति इसी जीवन में यथार्थ सुख, शान्ति और आनन्द का अधिकारी बन सकता है।
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[एक विचार लो . उस विचार को अपना जीवन बना लो - उसके बारे में सोचो उसके सपने देखो , उस विचार को जीओ ।  अपने मस्तिष्क , मांसपेशियों , नसों , शरीर के हर हिस्से को उस विचार में डूब जाने दो , और बाकी सभी विचार को किनारे रख दो . यही सफल होने का तरीका है. ---स्वामी विवेकानन्द
 ।।देशबंधश्चितस्य धारणा।।-पतंजलि - अर्थात चित्त का देश विशेष में बँध जाना (perception या अनुभूति जन्य अभिज्ञता ) ही धारणा  है। धारणा से ही कठिन परीक्षा और सावधानी की शुरुआत होती है। यहीं से धर्म मार्ग का कठिन रास्ता शुरू होता है, जबकि साधक को हिम्मत करके और आगे रहस्य के संसार में कदम रखना होता है। कहते हैं कि यहाँ तक पहुँचने के बाद पुन: संसार में पड़ जाने से दुर्गति हो जाती है। ऐसे व्यक्ति को योगभ्रष्ट कहा जाता है, अब पीछे लौटना याने जान को जोखिम में डालना ही होगा। कहते हैं कि छोटी-मोटी जगह से गिरने पर छोटी चोट ही लगती है, लेकिन पहाड़ पर से गिरोगे तो भाग्य या भगवान भरोसे ही समझो। इसलिए 'जरा बच के'। यह बात उनके लिए भी जो योग की साधना कर रहे हैं और यह बात उनके लिए भी जो जाने-अनजाने किसी 'धारणा सिद्ध योगी' का उपहास उड़ाते रहते हैं। कहीं उसकी टेढ़ी नजर आप पर न पड़ जाए।
जिसे धारणा सिद्ध हो जाती है, कहते हैं कि ऐसा योगी अपनी सोच या संकल्प मात्र से सब कुछ बदल सकता है। ऐसे ही योगी के आशीर्वाद या शाप फलित होते हैं।इस अवस्था में मन पूरी तरह स्थिर तथा शांत रहता है। जैसे क‍ि बाण के कमान से छूटने के पूर्व लक्ष्य पर कुछ देर के लिए निगाहें स्थिर हो जाती हैं, ठीक उसी तरह योगी के मन की अवस्था हो चलती है।  जबकि उसके एक तरफ संसार होता है तो दूसरी तरफ रहस्य का सागर रूपी लक्ष्य पर नजर है । यह मन से मुक्ति की शुरुआत भी है। धारणा सिद्ध व्यक्ति की पहचान यह है कि उसकी निगाहें स्थिर रहती है। ऐसे चित्त की शक्ति बढ़ जाती है, फिर वह जो भी सोचता है वह घटित होने लगता है। ]
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१६." सीपियों की तरह होना होगा "


इस दृश्य-मन या जड़ चित्त में संग्रहीत वृत्तियां, वासनाएं, संस्कार ही मानस-पटल पर प्रक्षेपित होते रहते हैं। इन चित्त-वृत्तियों का प्रवाह प्रतिक्षण बिना विराम चलता रहता है। चेतना (शुद्ध-बुद्धि या द्रष्टा-मन) दर्शक है, साक्षी है- किन्तु वह इस वृत्ति-चित्रों के प्रवाह से तादात्म्य करके स्वयं को भूल जाती है। यह विस्मरण अज्ञान है। यह अज्ञान, मूल है संसार का, देहान्तरण का,जन्म-मरण के चक्र का। इस अज्ञान से जागना चित्त-वृत्तियों के निरोध में होता है। चित्त जब वृत्ति-शून्य होता है, सिनेमा के परदे पर जब चित्रों का प्रवाह रुकता है - और पर्दे पर 'दी इन्ड ' लिख दिया जाता है, तब ही दर्शक को अपनी याद आती है, और वह अपने गृह को लौट जाता है। चित्त-वृत्तियों के इस निरोध को ही पतंजलि ने योग कहा है। यह साधते ही सब सध जाता है।"

विवेकानन्द जी कहते हैं - " जब मनुष्य अपने मन का विश्लेषण करते करते ऐसी एक वस्तु के साक्षात् दर्शन कर लेता है, जिसका किसी काल में नाश नहीं, जो स्वरूपतः नित्यापूर्ण और नित्यशुद्ध है, तब उसको फ़िर दुःख नहीं रह जाता, उसका सारा विषाद न जाने कहाँ गायब हो जाता है। भय और अपूर्ण वासना ही समस्त दुखों का मूल है। पूर्वोक्त अवस्था के प्राप्त होने पर मनुष्य समझ जाता है कि उसकी मृत्यु किसी काल में नहीं है, तब उसे फ़िर मृत्यु-भय नहीं रह जाता। अपने को पूर्ण समझ सकने पर असार वासनाएं फ़िर नहीं रहतीं। पूर्वोक्त कारणद्वय का आभाव हो जाने पर फ़िर कोई दुःख नहीं रह जाता। उसकी जगह इसी देह में परमानन्द की प्राप्ति हो जाती है।"(१:४० ) 

" भारतवर्ष में एक सुंदर किंवदन्ती प्रचलित है। वह यह कि आकाश में स्वाति नक्षत्र के तुन्गस्थ रहते यदि पानी गिरे और उसकी एक बूंद किसी सीपी में चली जाय, तो उसका मोती बन जाता है। सीपियों को यह बात मालूम है। अतएव जब वह नक्षत्र उदित होता है, तो वे सीपियाँ पानी की ऊपरी सतह पर आ जाती हैं, और उस समय की एक अनमोल बूंद की प्रतीक्षा करती रहती है। ज्यों ही एक बूंद पानी उनके पेट में जाता है, त्यों ही उस जलकण को लेकर मुंह बन्द करके वे समुद्र के अथाह गर्भ में चली जाती हैं और वहाँ बड़े धैर्य के साथ उनसे मोती तैयार करने के प्रयत्न में लग जाती हैं।"
हमें भी उन्हीं सीपियों की तरह होना होगा। पहले सुनना होगा, फ़िर समझना होगा, अन्त में बाहरी संसार से दृष्टि हटाकर, सब प्रकार की विक्षेपकारी बातों से दूर रहकर हमें अन्तर्निहित सत्य-तत्त्व के विकास के लिए प्रयत्न करना होगा। 

एक भाव को पकडो, उसी को लेकर रहो। उसका अन्त देखे बिना उसे मत छोड़ो। जो एक भाव को लेकर उसी में मत्त रहते हैं, उन्हीं के ह्रदय में सत्य तत्त्व का उन्मेष होता है।...एक विचार लो उसी विचार को अपना जीवन बनाओ उसी का चिंतन करो, उसी का स्वप्न देखो और उसी में जीवन बिताओ। सब प्रकार की बकवास छोड़ दो। जिन्होंने प्रत्यक्ष अनुभव किया है, केवल उन्हीं के लिखे ग्रन्थ पढो। यदि हम सचमुच स्वयं कृतार्थ होना और दूसरों का उद्धार करना (Be and Make?)  चाहें, तो हमे मन की गहराई तक जाना पड़ेगा। पुरी लगन के साथ, कमर कसकर साधना में लग जाओ- फ़िर मृत्यु भी आये, तो क्या ! मन्त्रं वा साधयामि शरीरं वा पातयामि - काम सधे या प्राण ही जायें। फल की ओर आँख रखे बिना साधना में मग्न हो जाओ! " (१:८९-९०)

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ओशो कहते हैं - " वही आदमी प्रेम करता है, जो बस प्रेम करता है और किसका कोई सवाल नहीं है। क्योंकि जो आदमी ‘किसी से’ प्रेम करता है, वह शेष से क्या करेगा? वह शेष के प्रति घृणा से भरा होगा। जो आदमी ‘किसी का ध्यान’ करता है, वह शेष के प्रति क्या करेगा?" 

१२. 'मन को देखना ' १३.' मन को आदेश देना ' १४. "मनः संयोग" [ " मनःसंयोग " लेखक श्री नवनीहरण मुखोपाध्याय ]

१२. मन को देखना 
(प्रत्याहार -१ द्रष्टामन की सहायता से दृश्यमन की गतिविधियों का पर्यवेक्षण)
अब वास्तविक कार्य का प्रारम्भ होता है। और वह है अपने मन के रूबरू होना अर्थात मन के आमने-सामने स्वयं को रखना। हमें अपने मन को ( परहेज या यम-नियम 5dont's& do's के अभ्यास द्वारा) अनुशासित करके उसको शान्त और स्थिर करना होगा, उसकी बिखरी हुई शक्ति-रश्मियों को संघटित कर, उन्हें एकाग्र (तीक्ष्ण या नुकीला) बनाकर, उसे किसी वस्तु या विषय में केन्द्रीभूत कर उसी स्थान में रोके रखने का कौशल सीखना होगा। इसके लिए सबसे पहले अपने मन को देखना होगा, उसमें उठने वाले विचारों को, उसकी गति को, विभिन्न विषयों में बार-बार बिक्षिप्त (डिस्ट्रॉट) होने को - ऑब्जर्ब करना होगा अर्थात उसे ग़ौर से देखना होगा।
 बाह्य वस्तुओं को हमलोग आँखों के द्वारा देखते हैं। किन्तु मन को तो इन चर्म-चक्षुओं से देखा नहीं जा सकता। स्थूल पदार्थों को हम स्थूल आँखों के द्वारा देखते हैं। किन्तु हमने देखा है कि मन तो अत्यन्त सूक्ष्म पदार्थ है। इसलिये उसको किसी सूक्ष्म माध्यम से ही देखना होगा। परन्तु मन के जैसी सूक्ष्म, दूसरी कोई वस्तु तो है ही नहीं ! इसीलिये मन को मन के द्वारा ही देखना पड़ता है। शुरू -शुरू में यह सब सुनकर विस्मय होना स्वाभाविकहै। (मन की दोहरी विद्यमानता -'डबल प्रजेंस ऑफ़ माइंड'  प्रत्युत्पन्नमतित्व आदि के बारे में) किन्तु अनजाने में हमलोग प्रायः यही तो करते रहते हैं। जब हम किसी विषय पर बहुत तल्लीन हो कर विचार कर रहे होते हैं या गहन चिन्तन में डूबे रहते हैं, तब हमें यह भी याद नहीं रहता कि हम विचार कर रहे हैं। हम उन विचारों को ही देखने में ही खोये रहते हैं- जब अकस्मात हमारी तंद्रा भंग होती है तो स्वयं अवाक् होकर सोचने लगते हैं- अरे, क्या मैं ही इतनी देर से इसी विषय पर मैं चिन्तन कर रहा था ! अर्थात उस समय अचानक हमारी दृष्टि मन कि ओर पड़ जाती है। कौन से माध्यम से यह दृष्टि पड़ी; तथा यह स्मरण हुआ कि अरे, मैं इतनी देर से विचार कर रहा था ? मन के माध्यम से ही ! मानो मन का ही एक अंश इससे बाहर निकल कर, इससे थोड़ा परे हट कर खड़ा हो-  और शेष मन के कार्यों का अवलोकन कर रहा हो । 
अब उपरोक्त रीति से अर्धपद्मासन में बैठ जाने के बाद, इसी प्रकार द्रष्टामन या व्यक्तिपरक मन (सब्जेक्टिव माइंड) की सहायता से दृश्यमन या विषयाश्रित मन (ऑब्जेक्टिव माइंड ) की गतिविधियों को थोड़ी देर तक निगरानी (पर्यवेक्षण) करना है। मन में उठने वाले विचारों, चित्त की चंचलता को, विभिन्न विषयों में मन के इधर-उधर भागने को ग़ौर से देखना होगा। एक चलचित्र की भाँति न जाने क्या-क्या हमारे मानस पटल पर अंकित होता रहता है। कितने शब्द, कितने चित्र, कितनी यादें और क्या क्या नहीं ? कभी-
कभी तो हमें स्वयं ही अवाक् जाना पड़ता है कि अरे ! मेरे मन में क्या ऐसे-ऐसे विचार भी भरे हुए थे?
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स्वामी विवेकानन्द कहते हैं - " अतएव मनः संयम का पहला सोपान यह है कि कुछ समय के लिए चुप्पी साधकर बैठे रहो और मन को अपने अनुसार चलने दो। मन सतत चंचल है। वह बन्दर की तरह सदा कूद-फाँद रहा है। यह मन -मर्कट जितनी इच्छा हो, उछल-कूद मचाय, कोई हानि नहीं ; धीर भाव से प्रतीक्षा करो और मन की गति देखते जाओ। लोग जो यह कहते हैं कि ज्ञान ही यथार्थ शक्ति है, यह बिल्कुल ठीक है। जब तक मन कि क्रियाओं पर नज़र न रखोगे, उसका संयम न कर सकोगे। मन को इच्छानुसार घूमने दो।
सम्भव है, बहुत बुरी बुरी भावनाएँ तुम्हारे मन में आयें। तुम्हारे मन में इतनी असत भावनाएँ आ सकतीं हैं कि तुम सोचकर आश्चर्यचकित हो जाओगे। परन्तु देखोगे, मन के ये सब खेल दिन पर दिन कम होते जा रहे हैं, दिन पर दिन मन कुछ कुछ स्थिर होता जा रहा है। पहले कुछ महीने देखोगे, तुम्हारे मन में हजारों विचार आयेंगे, क्रमशः वह संख्या घटकर सैंकडो तक रह जायेगी। फ़िर कुछ और महीने बाद वह और भी घट जायगी, और अन्त में मन पूर्ण रूप से वश में आ जायगा। पर हाँ, हमें प्रतिदिन धैर्य के साथ अभ्यास करना होगा। " (१:८७)
" बाह्य जगत् के व्यापारों का पर्यवेक्षण करना अपेक्षाकृत सहज है, क्योंकि उसके लिए हजारों यन्त्र निर्मित हो चुके है, पर अन्तर्जगत के व्यापार को समझने में मदद करनेवाला कोई भी यन्त्र नहीं।..किन्तु फ़िर भी हम यह निश्चयपूर्वक जानते हैं कि किसी विषय का यथार्थ ज्ञान प्राप्त करने के लिए मन का पर्यवेक्षण करना अत्यन्त आवश्यक है। क्योंकि उचित विश्लेषण के बिना कोई भी विज्ञान निरर्थक और निष्फल होकर केवल बेबुनियाद (भित्तिहीन) अनुमान में परिणत हो जाता है।...द्रष्टा-मन ही अपने दृश्य-मन के अन्दर चल रहे व्यापारों का निरिक्षण-परिक्षण य़ा पर्यवेक्षण करने वाला यंत्र है। मनोयोग  की शक्ति का सही-सही नियमन कर जब उसे अन्तर जगत् की ओर परिचालित किया जाता है, तभी वह मन का विश्लेषण कर सकती है, और तब उसके प्रकाश में हम यह सही सही समझ सकते हैं कि अपने मन के भीतर क्या घट रहा है।" (१:३९)

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१३. 'मन को आदेश देना '
(२. प्रत्याहार- मन को बालक और मित्र के समान सलाह देना )
इसके बाद (द्रष्टामन की सहायता से दृश्यमन की गतिविधियों को थोड़ी देर तक निगरानी (पर्यवेक्षण) करने के बाद) हमें वास्तविक कार्य की ओर एक कदम और आगे बढ़ना होगा। थोड़ी देर तक मन को उसकी मनमानी वस्तुओं की ओर जाने की छूट देने बाद, अब उसे समझा-बुझाकर अपने नियंत्रण में रहने को कहना पड़ेगा। अब मन को और अधिक उसकी इच्छानुसार जिस किसी भी विषय अथवा वस्तु पर भटकने नहीं दिया जायगा। उसे इधर-उधर दौड़ने से रोकना होगा। मन पर धीरे धीरे अंकुश रखना होगा। उससे कहना होगा, नहीं अब तुम्हें पहले जैसा इधर-उधर दौड़ने नहीं दिया जायगा, मन को एक बालक के समान सलाह देनी होगी। 
साथ- ही-साथ स्वयं को भी समझाना होगा कि अब तक हम नासमझ बने हुए थे, फलस्वरूप हम मन के चलाये चल रहे थे। मन की गुलामी कर रहे थे। मन को जो अच्छा लग रहा था, उसको ही यह मान बैठा था कि वह मुझे अच्छा लगता है। अब तक जो कुछ मन ने देखना चाहा,सुनना चाहा, करना चाहा, वह सब कुछ मैंने देखा, सुना और किया। अब यह समझ पा रहा हूँ कि यह तो मन का दास होना है। अब आगे से ऐसा नहीं होने दूँगा। मन तो मेरा ही एक शक्तिशाली उपकरण (पावरफुल इंस्ट्रूमेंट) है, अतः उसे मेरी आवश्यकता और प्रयोजनीयता के अनुसार ही कार्य करना चाहिए। अब से मन के ऊपर अपना प्रभुत्व जमाना होगा। 
हमने शुरू से ही उस पर शासन नहीं चलाया है,जिसके फलस्वरूप वह इतना शरारती हो गया है कि मेरी कोई सुनना ही नहीं चाहता। हर समय मनमानी करने पर उतारू रहता है। किन्तु अब इसे मेरा आदेश पालन करने के लिये किसी आदेशपाल (अर्दली) की भाँति सदैव तत्पर रहना होगा। इसे प्रेमपूर्वक सिखाने से यह सीख सकता है और हमारी बात मानने लगता है। 
[ लालयेत् पंच वर्षाणि दश वर्षाणि ताडयेत्।
प्राप्ते षोडशे वर्षे पुत्रे मित्रवदाचरेत्॥
अर्थ- पाँच वर्ष की अवस्था तक पुत्र को लाड़ करना चाहिए, दस वर्ष की अवस्था तक (उसी की भलाई के लिए) उसे ताड़ना (डाँटना और कान खींचना) भी दिया जा सकता है; किन्तु उसके सोलह वर्ष की अवस्था प्राप्त कर लेने पर उससे मित्रवत व्यहार करना चाहिए] . 
मन के साथ एक बालक के समान और एक मित्र के समान बात-चीत करनी होगी। कहना होगा- " ऐ मेरे मन ! शान्त होओ, इतना दौड़ते रहना ठीक नहीं है। आज तक तेरा कहना मानकर मैं भटक रहा था। अब तू एक बार मेरा कहना मानकर तो देख ! शास्त्र के वचन का कहना मानकर तो देख ! ऐसा दुःख नर्क में भी नहीं जैसा चंचल चित्त में होता है। ऐसा सुख स्वर्ग और वैकुण्ठ में भी नहीं जैसा सुख निश्चल चित्त में प्रकट होता है। ऐ चित्त ! तेरा चंचल होना तेरा और मेरा विनाश है। तेरा स्थिर होना बेड़ा पार होने का हेतु है। 
ऐ मेरे चित्त ! तू मान जा इसी में तेरा कल्याण है।’  यदि मनःसंयोग करने की इच्छा बहुत तीव्र हो, और इसी संकल्प पर यदि दृढ़ रहा जाय, यम-नियम का पालन प्रतिमुहूर्त करते रहा जाय, किसी वस्तु या विषय की घोर आसक्ति को त्याग दिया जाय, यदि इसी लगन के साथ मनःसंयोग का अभ्यास करने के लिये नियमित चेष्टा की जाय, -तो हमें यह देखकर ख़ुशी होगी कि मन धीरे-धीरे कहना मानना सीख रहा है, शान्त और स्थिर रहने लगा है, मेरे ही वश में रहता है। ऐसे आज्ञाकारी मन को बाह्य विषयों से खींचकर, एकाग्र बनाकर अपनी इच्छा और प्रयोजनीयता के अनुसार किसी भी विषय में केन्द्रीभूत किया जा सकता है!

 [यत्ने कृते यदि न सिध्यति कोऽत्र दोषः।-पंचतंत्र 
अर्थात यत्न करने पर भी यदि काम सिद्ध न हो रहा हो, तो आत्मनिरीक्षण करो और देखो कि दोष कहाँ रह गया था? स्वामी विवेकानन्द कहते हैं- " जो इच्छा मात्र से अपने मन को (मस्तिष्क में स्थित) समस्त स्नायू केन्द्रों में संलग्न करने अथवा उनसे हटा लेने में सफल हो गया है, उसीका प्रत्याहार सिद्ध हुआ है। प्रत्याहार का अर्थ है-एक ओर आहरण करना अर्थात खींचना। मन कि बहिर्गति को रोककर, इन्द्रियों की अधीनता से मन को मुक्त करके उसे भीतर की ओर खींचना। इसमे कृतकार्य होने पर हम यथार्थ में चरित्रवान होंगे; .... इससे पहले तो हम मशीन (रबोट) मात्र हैं। " (१:८६)]

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जनक-विचार
श्रीयोगवाशिष्ठ ग्रन्थ में वशिष्ठजी कहते हैं- ‘हे रामजी ! फिर उस महीपति ने अपने मन से कहा- ऐ मेरे मन ! आज तक मैं तेरे कहने में रहा और तूने जो कहा वह मैंने स्वीकार किया। तूने जो वासना की वह मैंने पूर्ण की। ऐ मेरे मन !   ऐ मन ! तू शान्त हो जा। राज्य तेरा नहीं। पुत्र-परिवार तेरा नहीं। यह शरीर भी तेरा नहीं। जिसका सब कुछ है वह परमात्मा तेरा है। ऐ मेरे चित्त ! तू उसी परमात्मा में शान्त हो जा। तेरा भला होगा।’
ऐ मेरे चित्त ! तेरा सच्चा राज्य तो आत्मा का राज्य है। इस जनकपुरी में तो कई राजा आये। जिसने यहाँ राज्य किया वह जनक कहलाया। तू कब तक इस झूठे पद-प्रतिष्ठा पृथ्वी-राज होने का गर्व करके अपने को धरती का राजा मानेगा ? तू इस पृथ्वी का पति नहीं, महिपति नहीं, तू तो इस पृथ्वी का एक ग्रास मात्र है। तेरे जैसे तो कई राजा आ-आकर इस पृथ्वी में दफनाये गये। उनकी हड्डियाँ भी गल गईं। 'माटी कहे कुम्हार से तू क्या रौंदे मोय।एक दिन ऐसा आयगा मैं रौंदूगी तोय।।'
महिपति अपने चित्त को समझाता हैः ‘ऐ चित्त ! तू परमात्मा की शान्ति में शान्त हो जा। नहीं तो ऋषि लोग मेरी हँसी करेंगे। कहेंगेः समझदार होकर मूर्खों की नाईं आयुष्य बिता दिया। बुद्धिमान होकर पशुओं की नाईं शरीर को पालने-पोषने में जीवन गँवा दिया। ऐ मेरे मन ! जिस परमात्मा ने तुझे अनुराग का दान दिया है उससे संसार के विषय तू क्या माँगता है ? उससे नश्वर चीजों की चाह तू क्यों करता है ? अब तू शान्त पद का आश्रय ले। जैसे ज्ञानवान संत पुरूष आत्म-विचार करते शान्त पद का आश्रय लेकर संसार-समुद्र से तर जाते हैं, तू भी उस आत्मपद का आश्रय़ ले।"
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१४. "मनः संयोग"
( मन को अन्य विषयों से हटाते हुए एक विशेष ध्येय की ओर स्थिर करना)
 (Fixing the mind on a particular subject धारणा-१)
पिछले अध्याय में बताये गये विधियों के अनुसार मन को बार-बार समझा-बुझाकर नाना प्रकार के विषयों से खींच कर अपने सामने खड़ा करना होगा। परन्तु मन कभी खाली नहीं बैठता, उसे किसी न किसी वस्तु पर अवश्य ही लगाना पड़ेगा। इसीलिये मन में धारणा करने योग्य किसी-न-किसी वस्तु या विषय को पहले से निर्धारित करना होगा। [धारणा का अर्थ है मन को अन्य विषयों से हटाते हुए एक विशेष ध्येय की ओर स्थिर करना, जैसा कि पतंजलि कहते हैं -' देशबन्धः चित्तस्य धारणा ' अर्थात चित्त को देश-विशेष में बाँधना धारणा है। ] धारणा का उद्देश्य है किसी ध्येय वस्तु पर चित्त को एकाग्र करना । इसके द्वारा मानसिक शक्ति के प्रवाह को एक ही विषय की ओर प्रेरित करना सम्भव हो जाता है।
किन्तु यह ध्येय (ध्यान का विषय) क्या होना चाहिये ? हम अपनी श्रद्धा के अनुसार किसी भी वस्तु का चुनाव कर सकते हैं। हम अपने मन को दीपक की लौ पर या दीवार पर वृत्त बनाकर उसके केन्द्र पर या अन्य किसी अमूर्त वस्तु (ॐ) पर भी मन को लगाने का प्रयत्न कर सकते हैं। लेकिन किसी ऐसे मूर्त आदर्श पर मन को बैठना ज्यादा अच्छा होता है जिस पर हमारे मन में स्वाभाविक रूप से श्रद्धा-भक्ति रहती हो। किसी ऐसे देवी-देवताओं, महापुरुष या इष्ट की मूर्ति या चित्र पर मन को केन्द्रीभूत करना अधिक सहज होता है, जिन्हें हम पवित्रता स्वरूप या प्रेम-स्वरूप मानकर श्रद्धा-भक्ति के साथ पूजने योग्य मानते हैं। ऐसे ध्येय मूर्त आदर्श पर मन को स्थिर रखने की चेष्टा करने से, 'लॉ ऑफ़ एसोसिएशन' या साहचर्य के नियमा-नुसार उस जीवन्त आदर्श के सदगुणों का विचार भी हमारी कल्पना में आने लगते हैं। इसलिये किसी मूर्त-आदर्श पर मन को केन्द्रीभूत करना अधिक श्रेयस्कर होता है। यदि अभी तक हमने किसी पूजनीय मूर्ति या श्रद्धेय महापुरुष को अपने आदर्श के रूप में सतत ध्यान करने का पात्र नहीं चयन किया हो तो अब बिना देर किये चयन कर लेना चाहिये।
हमलोग चरित्र के गुणों को अपने में धारण कर यथार्थ मनुष्य बनना चाहते हैं तथा देश-सेवा से जुड़कर अपना जीवन धन्य करना या सार्थक करना चाहते हैं। यदि ऐसा ही लक्ष्य है तो स्वामी विवेकानन्द की मूर्ति या जीवन्त छवि हमारे लिये एक अत्यन्त प्रेरणादायी आदर्श हो सकती है। जितना उनका ध्यान सिद्ध था वैसा ही कर्म भी था। वीर योद्धा जैसी मुखाकृति है। वे चरित्र के सभी गुणों के वे मूर्तरूप लगते हैं। फ़िर समस्त मानव जाति के लिए उनके ह्रदय कितना प्रेम था ! उन्होंने अपने उपदेशों में बहुत सरल भाषा में मनुष्य जीवन का उद्देश्य तथा यथार्थ मनुष्य बनने के उपाय ही नहीं सुझाया है- बल्कि बनकर दिखा भी दिया है। उन्होंने मन या जगत का दास न बन कर संयमी बनने का निर्देश दिया है। मन को एकाग्र करने की शिक्षा को ही उन्होंने सर्वोपरि शिक्षा माना है। उन्होंने तैंतीस कोटि देवता पर विश्वास करने से पहले ' आत्मविश्वासी ' होने की शिक्षा दी है। उनकी छवि पर मनः संयोग का अभ्यास करने से इसी प्रकार का आत्मविश्वास हममें भी पैदा होगा। उन्होंने कहा है- " मनुष्य सब कुछ कर सकता है, मनुष्य के लिए असाध्य कुछ भी नहीं है।" इसीलिये उनकी मूर्ति या छवि पर मन को एकाग्र करने का प्रयास किया जा सकता है। वे मानव-मानव के बीच किसी प्रकार का भेद नहीं देखते थे। जाती, धर्म, शिक्षा, धन-संपत्ति आदि के आधार पर वे किसी भी मनुष्य को अपने से अलग नहीं मानते थे।उनके लिए सभी मनुष्य एक समान थे। अतः हम चाहे जैसे भी मनुष्य क्यों न हों, उन्हें अपना आदर्श मान सकते हैं। अतः उनकी छवि पर मनः संयोग का अभ्यास किया जा सकता है। 
जिस किसी भी लक्ष्य पर मनः संयोग का अभ्यास करना हो, तो आँख बन्द करने से पहले उस लक्ष्य को खूब ध्यानपूर्वक थोड़ी देर तक देखते रहना चाहिए। ऐसा करने से यह होगा कि, आँखें बन्द करने के बाद भी वही छवि या आकृति मन में बस जायेगी। आराध्य के ही श्रीचरण हृदय में बस जायेंगे। तदुपरांत जैसा हम पहले सुन चुके हैं - मन को समझाकर समस्त विषयों से खींच कर उसी आदर्श रूप से चुन लिए गए प्रतीक या मूर्ति पर मन को एकाग्र रखने का प्रयास करेंगे। हो सकता है कि खींचकर कर लाया गया मन पुनः वहाँ से भाग जाय। मन की चालाकियां आपको पकड़नी पड़ेंगी। यह तभी संभव होगा जब मन पर आप पैनी नजर रखें। आप द्रष्टा मन के द्वारा दृश्य मन पर पैनी नजर गड़ाये रखिये हां, यह विवेक-दर्शन में लगा है। अचानक यह आपको चकमा देता है और सांसारिक प्रपंच में चला जाता है। चूंकि आप मन के प्रति सजग और सचेत हैं, इसलिए इसे फिर विवेक-दर्शन के लिये अनुप्रेरित कीजिये, पास खींच लाइए। इसमें ऊबने से काम नहीं चलेगा।
उस स्थिति में उसका तब तक पीछा करना होगा जब तक वह बैठ न जाए। उसे फ़िर से आदेश देते हुए अपने ही इष्ट का चिन्तन करने के लिए समझाना होगा। कभी कभी ऐसा भी हो सकता है कि मन अपने इष्ट वस्तु से हट कर अन्य बातों का चिन्तन करने में इतना रम जाये, कि हम कहाँ और क्यों बैठे हैं वह भी हमें स्मरण न रह जाये। अगर ऐसा होता है, तो भी हतोत्साहित होने की आवश्यकता नहीं है। हम जान चुके हैं कि मन का स्वभाव ही वैसा है। उसे आज तक कभी भी संयम का पाठ पढ़ाया ही नहीं गया था, तभी तो उसका यह हाल बन गया है। यदि मन कि चंचलता से बहुत असुविधा होने लगे तो पुनः आँखे खोल कर मनः संयोग के लक्ष्य को, खूब मन से निर्बाध दृष्टि से एकटक देखने के बाद पुनः मन को लगाना सहज हो जाता है।
जिस लक्ष्य या इष्ट वस्तु पर मनः संयोग करना चाहते हैं, उसी पर मन को लगाने का अर्थ क्या है ? हमलोग पहले ही समझ चुके हैं कि मन की अदृश्य शक्ति-रश्मियों को चारों ओर से समेट कर अर्थात उसे अन्तर्मुखी बना कर एक ही (स्नायु) केन्द्र में निवेशित रखना मनः संयोग है। हमारी पाँच इन्द्रियाँ हैं जो जगत के रूप, रस, गंध,शब्द और  स्पर्श आदि पाँच विषयों के संवाद हम तक पहुँचाते रहते हैं। अभी सिर्फ़ एक इन्द्रिय के कार्य पर ही विचार करें। मान लो कि मैं अभी आँखों से विवेक-दर्शन का अभ्यास कर रहा हूँ, या विवेकानन्द की छवि पर मनःसंयोग कर रहा हूँ। जब तक यह विचार मन में रहता है कि मैं विवेक-दर्शन कर रहा हूँ, तब तक यह समझना चाहिए कि मन अपने आराध्य-देव का दर्शन करने में ही लगा हुआ है। इसका अर्थ यह हुआ कि नेत्रों कि दृष्टि जिस वस्तु पर पड़ रही है, मन की दृष्टि भी उसी वस्तु के ऊपर केन्द्रीभूत है। किन्तु कभी-कभी ऐसा भी तो होता है, कि आँख की दृष्टि जिस वस्तु पर पड़ रही है, मन की दृष्टि उस वस्तु पर नहीं पड़ रही है, अर्थात उस समय मन की शक्ति रश्मियाँ दूसरी ओर जा रही हैं। इस समय ऑंखें कुछ देख ही नहीं सकेंगी। इसीलिये वस्तु को नेत्र दृष्टि के सम्मुख रहने पर भी हम उसे देख नहीं पाते हैं।
मनः संयोग का अर्थ है मात्र यथा रीति (usually) ही नहीं, बल्कि हमारी इच्छा और प्रयास से आँखों की दृष्टि और मन की दृष्टि दोनों को एक ही वस्तु पर लगाये रखने का सामर्थ्य प्राप्त कर लेना। अर्थात मनःसंयोग के लिये जिस लक्ष्य-वस्तु का चयन कर लिया हूँ, जिन्हें अभी देख रहा हूँ, या जिनकी छवि को एक बार देखकर मन में बसा चुका हूँ, अब स्वयं की इच्छा और प्रयास से
मन की शक्ति-रश्मियों को समेटकर, संघटित और एकाग्र करके समग्र रूप से उन्हीं के ऊपर बलपूर्वक इस प्रकार से केन्द्रीभूत करना है कि मन की शक्ति-रश्मियों का छोटा सा कण भी अन्य किसी विषय में जाने न पाये! 
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स्वामी विवेकानन्द कहते हैं-" कुछ काल तक प्रत्याहार की साधना करने के बाद, उसके बाद की साधना अर्थात धारणा का अभ्यास करने का प्रयत्न करना होगा। धारणा का अर्थ है - 'मन को देह के भीतर या उसके बाहर किसी स्थानविशेष में धारण या स्थापन करना।'  मन को स्थानविशेष में धारण करने का क्या अर्थ है? इसका अर्थ यह है कि मन को शरीर के अन्य सब स्थानों से अलग करके किसी एक विशेष अंश के अनुभव में बलपूर्वक लगाये रखना। मान लो, मैंने मन को हाथ में धारण किया। तब शरीर के अन्यान्य अवयव विचार के विषय के बाहर हो जायेंगे। जब चित्त अर्थात मनोवृत्ति किसी निर्दिष्ट स्थान में आबद्ध रहती है, तब उसे धारणा कहते हैं। इस धारणा के अभ्यास के समय किसी कल्पना की सहायता लेने से काम अच्छा सधता है। मान लो,हृदय के एक बिन्दु में मन को धारण करना है। इसे कार्य में परिणत करना बड़ा कठिन है। अतएव सहज उपाय यह है कि हृदय में एक पद्म की भावना करो और कल्पना करो कि वह ज्योति से पूर्ण है (वाइब्रेन्ट या जीवन्त है)-चारों ओर उस ज्योति की आभा बिखर रही है। उसी जगह मन की धारणा करो । " (१:८७)

Wednesday, November 19, 2014

१०."अभ्यास " ११. "किस प्रकार से बैठना होगा ? "[ " मनःसंयोग " लेखक श्री नवनीहरण मुखोपाध्याय ]

 १०."अभ्यास "
[डिस्क्रिमनेशन- बुद्धि और पुरुष के बीच अंतर को पहचानना 
 एवं रिनन्सिएशन- परहेज यम-नियम पालन दोनों काअभ्यास
मन ही हमलोगों का सबसे अनमोल संसाधन (प्रेशियस रिसोर्सेज) है; मनुष्य को ईश्वर का सबसे बड़ा वरदान है। यदि हमारे पास मन ही नहीं होता, तो हमलोगों के पास भला बचता ही क्या ? मन की शक्ति के द्वारा ही हमलोग सारे कर्म करते हैं, जानते हैं और अनुभव करते हैं। किन्तु मन के स्वभाव में दो बातें ऐसी हैं जिसके कारण मन का उपयोग करके अपने जीवन को सार्थक करना बहुधा सम्भव नहीं हो पाता। वे दो कारण हैं - " चित्त की स्वाभाविक चंचलता और विभिन्न विषयों में दौड़ने वाली बहिर्मुखी प्रवृत्ति " (षडरिपुओं से मलिन मन की 'बंडल ऑफ़ प्रोपेनसिटी') तथापि ये दो शक्तियाँ स्वाभाविक रूप से मन में विद्यमान हैं, तभी तो मन की सहायता से हमलोग सारे कर्म कर पाते हैं, जान पाते हैं, तथा अनुभव कर पाते हैं। ऐसी परिस्थिति में हमारे लिये क्या करना उचित होगा ?  
हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि मन अपनी इच्छा से अतिरिक्त-चंचल नहीं बना रहेगा, और मेरी आज्ञा के बिना जब तब जिस तिस विषयों में जाने की चेष्टा भी नहीं करेगा। इसका अर्थ यह हुआ कि हमें अपने मन की दोनों प्रबल शक्तियों (चित्त की स्वाभाविक चंचलता और बहिर्मुखी प्रवृत्ति) को स्थिर और नियंत्रित करना होगा, उसे अपने वश में लाना होगा, उस पर शासन करना होगा। तभी हमलोग मन को संघटित करके एकाग्र कर सकेंगे, और जिस कार्य में उसे लगाना हमारे लिये आवश्यक है, उसी में केन्द्रीभूत रख सकेंगे। अर्थात मनःसंयोग कर सकेंगे। [महाभारत (शान्तिपर्व ३१६/२) में चित्तवृत्ति निरोध या योग को सर्वश्रेष्ठ मानसिक बल कहा गया है- "नास्ति सांख्यसमं ज्ञानं नास्ति योगसमं बलं"। ] मगर यह सब किया कैसे जाता है ? 
यह होता है- अभ्यास के द्वारा। अभ्यास का अर्थ है पुनः पुनः चेष्टा करना। खिलाड़िओं की सफलता के क्षेत्र में हमलोग देखते हैं कि उनको खेल के कुछ नियमों को जानने और दीर्घ समय तक उनका अभ्यास (प्रैक्टिस) करना बहुत आवश्यक होता है। जिस प्रकार कोई पहलवान (रेस्लर) या खिलाड़ी -'सही समय पर सही दाँव' (हुनर या स्किल- 'बाउंसर बॉल पर हैलीकॉप्टर शॉट') खेलकर अपनी जीत सुनिश्चित कर लेता है; उसी प्रकार मनःसंयोग करने के लिये भी " चित्त की स्वभाविक चंचलता और बहिर्मुखी प्रवृत्ति " को संयमित, नियंत्रित कर उसे कार्योपयोगी बनाने के लिये पहले कहे गये नियमों (5Do's) को जानना होगा, संयमों (5 don't) को अर्जित करना होगा, फिर प्रतिदिन पूरे मनोयोग के साथ मनःसंयोग का अभ्यास करना होगा। 
किन्तु केवल अभ्यास करने से ही काम नहीं चलेगा, इसके साथ-ही-साथ एक अन्य गुण भी रहना अनिवार्य है। और वह है किसी भी विषय में मन को अत्यधिक आकृष्ट (या मोहग्रस्त) नहीं होने देना। यदि किसी भी वस्तु के प्रति हमारे मन में बहुत अधिक लालच रहेगा या अत्यधिक आसक्ति रहेगी, तो हम अपने मन को सब कुछ से खींच कर जिस आवश्यक कार्य में लगाना चाहते हैं, वहाँ नहीं लगा सकेंगे । इसीलिये 'उभय अधीनः' " चित्त की स्वाभाविक चंचलता और बहिर्मुखी प्रवृत्ति " का संशोधन किसी भी विषय में अत्यधिक आकर्षित न रहना - अर्थात थोड़ा 'त्याग' का भाव (रिनन्सिएशन) और (डिस्क्रिमनेशन) शास्वत-नश्वर को पहचानने की क्षमता अर्थात विवेक-प्रयोग; इन दोनों के अभ्यास पर निर्भर है। 
मनुष्य का मन भी किसी पेंडुलम (दोलक) की तरह स्वाभाविक तौर से आगे-पीछे (back and forth) दोनों दिशाओं में जा सकता है। एक दिशा में (आत्मोन्मुखी या ह्रदय की ओर) जाने से मन शान्त होता है, शक्तिशाली होता, असाध्य को भी साधने की शक्ति अर्जित करता है और मनुष्य के जीवन को कल्याण के मार्ग पर आरूढ़ करा देता है। जबकि दूसरी दिशा में (संसारोन्मुखी या बाह्यविषयों की ओर) जाने से और अधिक चंचल हो जाता है, दुर्बल हो जाता है,अशक्त हो जाता है। प्रयत्न के द्वारा मन के प्रवाह को कल्याण की दिशा में मोड़ा जा सकता है। जैसे खाद्य-पदार्थ भी दो प्रकार के होते हैं। एक प्रकार का आहार लेने से शरीर हृष्ट-पुष्ट होता है और शक्तिशाली बन जाता है। जबकि दुसरे प्रकार का आहार बहुत स्वादिष्ट होता है किन्तु अंत में उसका परिणाम ठीक नहीं होता, स्वास्थ्य ख़राब हो जाता है, शरीर दुर्बल और रोगी बन जाता है। 
उसी प्रकार मन को भी प्रयत्न के द्वारा कल्याण के मार्ग (श्रेय -शाश्वतमार्ग ) में ले जाने की चेष्टा करने से जीवन सुंदर होता है, और उसकी इच्छा (प्रेय -नश्वरमार्ग) के ऊपर छोड़ देने से जीवन नष्ट हो जाता है। इसलिये किसी भी वस्तु के प्रति मन में अत्यधिक आसक्ति न रखकर, केवल चरित्रवान मनुष्य बनने की इच्छा को लेकर मन को स्थिर और नियंत्रित करने का नियमित अभ्यास करने से, मन वश में आ जाता है। [कहा भी गया है - 'करत- करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान। रसरी आवत जात से सिल पर परत निसान॥' अर्थात् अभ्यास करते- करते एकदम जड़मति भी सुविज्ञ- सुजान हो जाते हैं। कुछ उसी तरह से जैसे निरन्तर रस्सी की रगड़ से पाषाण पर भी निशान पड़ जाते हैं। मनुष्य की सारी क्षमताएँ उसके अभ्यास का ही फल है।] और उसी शान्त और नियंत्रित मन के द्वारा अपने जीवन को सुन्दर ढंग से गठित कर मनुष्य-जीवन को सार्थक बनाया जा सकता है।
अब हमलोग मन-ही-मन निश्चित रूप से यह संकल्प ले रहे हैं कि हम ' मनः संयोग ' अवश्य सीखेंगे और किस तरह अभ्यास किया जाता है, उसकी जानकारी भी अवश्य लेंगे। अपने जीवन को सम्पूर्ण  रूप से गठित करके जीवन में सार्थकता लाभ करने के लिये हम निश्चय ही कठोर परिश्रम करने और धैर्यपूर्वक प्रयत्न को तत्पर तथा संकल्प पर अटल रहेंगे। [नीतिशतक में कहा गया है -आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः । नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कुर्वाणो नावसीदति ॥  – अर्थात आलस्य ही मनुष्यके शरीरमें उपस्थित सबसे बडा शत्रु है और उद्यम (प्रयास) से अच्छा मित्र नहीं है। जो उद्यमी (परिश्रमी) होता है उसे कभी कष्ट नहीं होता।] पाँचो प्रकार के परहेज या संयम (5dont's) को विवेक-प्रयोग करके अपने आचरण में उतार लेंगे; पाँचो नियम (5do's) का पालन करेंगे, और इसके साथ-ही-साथ शरीर को स्वस्थ रखने के लिये नियमित रूप से, बिना आलस्य किये थोड़ा व्यायाम भी अवश्य करेंगे। मन में पवित्र और सुंदर भावों को धारण करने के लिये प्रतिदिन सन्मार्ग में रखने वाली पुस्तकों का या विवेकानन्द-साहित्य का अध्यन (स्वाध्याय) करेंगे, तथा स्वयं को सिर्फ सुसंगति (गुड कंपनी) में ही रखेंगे। 
किंतु अभ्यास नियमित रूप से प्रति दिन करना होगा। मनः संयोग के अभ्यास को एक भी दिन छोड़ना नहीं होगा। प्रति दिन दो बार अभ्यास हेतु समय निकलना होगा। एक बार प्रातः और एक बार सायंकाल में। यदि संध्या में देर हो जाय तो रात्रि में सोने से पहले। इसके लिये हाथ-मुँह धोकर, स्वच्छ होकर बैठना होगा।
 प्रातःकाल और सूर्यास्त (गोधुली बेला) के समय प्रकृति स्वतः इतनी शांत अवस्था में रहती है उस समय मन भी अनायास (स्पान्टेनीअस्ली) कुछ कुछ शान्त ही रहता है। इस लिए उस समय अभ्यास करने का फल अच्छा होता है।
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" एकमात्र पुरुष (आत्मा) ही चेतन है। मन (बुद्धि) तो मानो आत्मा के हाथों एक यन्त्र है। उसके द्वारा आत्मा बाहरी विषयों को ग्रहण करती है। मन सतत परिवर्तनशील है, इधर से उधर दौड़ता रहता है, कभी समस्त इन्द्रियों से लगा रहता है, तो कभी केवल एक से, और कभी कभी तो किसी इन्द्रिय के सम्पर्क में नहीं रह जाता न जाने कहाँ खो जाता है ? मान लो, मैं मन लगाकर एक घड़ी की टिक टिक सुन रहा हूँ। ऐसी दशा में आँखें खुली रहने पर भी मैं कुछ देख न पाऊँगा। इससे यह स्पष्ट समझ में आ जाता कि-मन जब श्रवण इन्द्रिय से लगा था, तो दर्शन इन्द्रिय (अर्थात मस्तिष्क में स्थित उसका स्नायु केन्द्र optic- nerve) से उसका संयोग न था।  
परन्तु पूर्णता प्राप्त मन (प्रशिक्षित मन ) को (बाह्य विषयों में जाने से रोक कर) सभी स्नायु-केन्द्रों या इन्द्रियों से एक साथ लगाया जा सकता है। यह उसकी " अन्तर्दृष्टि " की - शक्ति है, जिसके बल से मनुष्य अपने अन्तर के सबसे गहरे प्रदेश तक में नज़र डाल सकता है। इस अन्तर्दृष्टि को विकसित करना ही योगी का उद्देश्य है।" (१:४५)
 
पतंजलि के सूत्र तो साधकों के लिए भेजे गए टेलीग्राम हैं। इनमें इधर- उधर का एक भी फालतू शब्द नहीं है। कभी- कभी तो एक सूत्र पूरा वाक्य तक नहीं है। वह तो अल्पतम सारभूत है। ये सूत्र ऐसे हैं, जैसे कोई तार करने जाय और वहाँ बेकार के अनावश्यक शब्द काट दे। तार का मतलब ही यही है, कम से कम शब्दों में सम्पूर्ण सन्देश कह दिया जाय। उसी प्रकार सन्त तुलसीदास का भी साधकों के लिये भेजा गया एक बड़ा ही प्रसिद्द टेलीग्राम है-'अली-मृग-मीन-पतंग-गज जरै एक ही आँच, तुलसी वे कैसे जियें जिन्हें जरावें पाँच ? ' अर्थात अली (भवंरा, सूंघने की), पतंग (पतंगा, देखने की), मृग (हिरन, सुनने की), मीन (मछली, जिव्हा की), गज (हाथी, त्वचा की), ये सब तो एक एक इन्द्रिय के वश में आकर मर जाते हैं। तुलसी वो (इंसान) कैसे बचे जिसमें ये पाँचो  इन्द्रियाँ  मौजूद हैं ?  
इसके उत्तर में महर्षि पतंजलि कहते हैं- अथ योगानुशासनम् ॥१॥ अब गुरु-शिष्य परंपरा के अनुसार योगविषयक शास्त्र आरम्भ करते हैं । 

योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः ॥२॥ 
चित्त की वृत्तियों का निरोध योग है। वृत्तिशून्य मन - अर्थात इन्द्रिय-विषयों अनासक्त मन शुद्ध ही है। मन को विषय रहित करने से ही वह शान्त होता है। ईंधन (ऑक्सीजन) के अभाव में जिस प्रकार अग्नि बुझ जाती है उसी प्रकार विषय-वृत्ति न रहने से ही मन शान्त हो जाता है।  तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम् ॥३॥  उस समय द्रष्टा की अपने रूप में स्थिति हो जाती है ।  

वृत्तिसारूप्यमितरत्र॥१/४॥ 
साक्षी होने के अलावा अन्य सभी अवस्थाओं में चित्त की वृत्तियों (मन-बुद्धि-चित्त-अहंकार)  के साथ तादात्म्य हो जाता है। ये वृत्तियाँ साधक की अन्तर्चेतना को मनचाहा भटकाती हैं। सुख- दुख के सपने दिखाती हैं। कभी हँसाती हैं, कभी रुलाती हैं। इच्छाओं के कच्चे धागों से बाँधती हैं। कल्पनाओं और कामनाओं की मदिरा पिला कर बेहोश करती हैं। 
या तो साक्षी भाव को उपलब्ध कर अपने स्वरूप में अवस्थित हो जाओ या फिर वृत्तियों के साथ तादात्म्य करके भटकते रहो। इन दो के अलावा कोई तीसरी सच्चाई नहीं हो सकती। और चित्तवृत्तियों का निरोध तो अभ्यास और वैराग्य (परहेज) से ही होता है।
वैराग्य शब्द का अर्थ है अनात्म वस्तुओं (जड़ मन-बुद्धि) के साथ अपने तादात्म्य को या आसक्ति को त्याग देना। जड़ विषयों में अनासक्ति और आत्मा में अत्यन्त अनुरक्ति ही यथार्थ वैराग्य है। 'इहामुत्रार्थ-फलभोग' वैराग्य ही मन को आत्माभिमुख करता है। शरीर, मन, वाणी से पुनः पुनः अभ्यास के द्वारा विषयों का दोष-दर्शन करा कर मन के बहिर्मुखी विषयोन्मुख प्रवाह को आत्मा की ओर लौटा लिया जाता है। इस प्रकार असार विषयों से वैराग्य उत्पन्न होता है। 
यम-नियम का निरंतर अभ्यास (प्रैक्टिस)करना है, तो मन को राजसिक और तामसिक सुखों में दोष-दर्शन कराकर, विवेक-प्रयोग द्वारा सात्विक सुख प्राप्त करने के लिये इन्द्रिय सुखों से मुँह मोड़ना ही होगा। भोगियों की दृष्टि से कहें तो , एकदम रूखी- सूखी जिन्दगी जीनी होगी। यह तो बाद में पता चलता है कि इस रूखे- सूखे पन में आनन्द की अनन्तता समायी है। मनुष्य मात्र को यदि भटकन, उलझन, तनाव, चिन्ता, दुःख, पीड़ा, अवसाद से सम्पूर्ण रूप से मुक्ति पानी है, तो साक्षी भाव को उपलब्ध होने के अलावा अन्य कोई चारा नहीं है। 
क्योंकि अन्य अवस्थाओं में तो मन की वृत्तियों के साथ तादात्म्य बना ही रहेगा। मनुष्य की प्रकृति ही ऐसी है। यह बात किसी एक पर, किसी व्यक्ति विशेष पर लागू नहीं होती। बात तो सारे मनुष्यों के लिए कही गयी है। मानव प्रकृति की बनावट व बुनावट की यही पहचान है। साक्षी के अतिरिक्त दूसरी सभी अवस्थाओं में मन के साथ तादात्म्य बना रहता है।
उपनिषद का उपदेश है - "आत्मानं वै विजानथ-अन्या वाचो विमुंचथ" -आत्मा को जानने की चेष्टा करो, अन्य बातें छोड़ो। इसके लिये अभ्यास और वैराग्य आवश्यक है।  सबसे श्रेष्ठ उपाय है भगवान श्रीरामकृष्ण की कृपा। विवेक-दर्शन का बार बार अभ्यास से ही मन शान्त होता है और विषय अपने आप छूट जाते हैं। भगवान का नाम जपना बहुत सहायक होता है। बार बार आत्मचिंतन या विवेक-दर्शन के अभ्यास के फलस्वरूप मन आनन्दमय आत्मा में तन्मय हो जाता है। अतः इस प्रकार अभ्यास और वैराग्य साधक के मन को अहं-शब्द के लक्ष्य आत्मा में संलग्न करके 'अहं ब्रह्म अस्मि' इस ज्ञान में प्रतिष्ठित करेंगे। मन को अनुशासित और नियंत्रित करने का शास्त्रविहित उपाय है-अभ्यास और वैराग्य।मेशा सतर्क रहना होगा कि किसी भी विषय में मन अत्यधिक आसक्त न हो जाये ! इस सच्चाई को जान सको तो जानो, मान सको तो मानो।
पतंजलि योगसूत्र (१.१२) अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः ॥१२॥ को अधिक स्पष्ट करते हुए व्यास-भाष्य  में कहा गया है - " चित्तनदी नाम उभयतो वाहिनी, वहति कल्याणाय वहति पापाय च। या तु कैवल्यप्राग्भारा विवेकविषयनिम्ना सा कल्याणवहा। संसारप्राग्भाराऽविवेकविषयनिम्ना पापवहा। तत्र वैराग्येण विषयस्रोतः खिलीक्रियते विवेकदर्शनाभ्यासेन विवेकस्रोत उद्घाट्यते। इत्युभयाधीनश्चित्तवृत्तिनिरोधः। 
-मन (चित्त) की 'स्वाभाविक चंचलता और बहिर्मुखी प्रवृत्ति ' - नदी के नाम से जानी जाती है जो कि दोनों दिशाओं (आगे-पीछे उभयतः) में (वाहिनी) बहने वाली है। यह प्रवाह श्रेय (कल्याणाय) की दिशा में भी बहती है, और (च) अशुभ या पाप (पापाय) की ओर भी बहती है' विवेकविषयनिम्ना सा चित्तनदी कल्याणाय वहति' -- चित्तनदी की धारा जब विवेकविषय, विवेक के क्षेत्र (विषय)  की ओर झुका (निम्ना) है,अर्थात विख्याति या विवेकशील ज्ञान, जो किसी व्यक्ति को बुद्धि (नश्वर) और पुरुष (शाश्वत) के बीच के अंतर को अनुभव करने की अनुमति देता है; वह धारा (सा) 'कैवल्यप्राग्भारा' कैवल्य (मुक्ति) की ओर ले जानेवाली है और कल्याण-वहा है। 'अविवेकविषयनिम्ना सा पापाय वहति'-  दूसरी ओर यह धारा जब अविवेक के क्षेत्र में, अर्थात जब बुद्धि और पुरुष के बीच रहने वाले अंतर का अनुभव नहीं करने की दिशा में झुकी होती है, वह 'संसारप्राग्भारा' संसार या देहान्तर-गमन  (Transmigration) की ओर ले जाने वाली धारा पाप-वहा है, जो बुराई की ओर बहती है।  
उस (तत्र) बाह्य वस्तुओं या विषयों की ओर बहने वाली धारा पर (वैराग्येण) वैराग्य (रिनन्सिएसन या परहेज) का फाटक लगाकर विषयस्रोत को मन्द बनाते हुए शक्तिहीन (खिलीक्रियते) किया जाता है; तथा विवेक-दर्शन का अभ्यास या विवेकशील ज्ञान (डिस्क्रिमिनेटीव-नॉलेज) पर चिंतन-मनन करते रहने के परिणामस्वरूप (एक दिन चित्तवृत्ति निरुद्ध और) विवेकस्रोत उद्घाटित हो जाता है। इति उभय अधीनः चित्तवृत्तिनिरोधः = इस प्रकार (इति) चित्तवृत्तिनिरोधः (चित्त की स्वाभाविक चंचलता और बहिर्मुखी प्रवृत्ति, अर्थात विषयों में दौड़ने वाली प्रॉपेनसिटी का दमन या संशोधन,) परहेज,निवृत्ति या "रिनन्सिशन" और विवेक-दर्शन अर्थात "डिस्क्रिमनेशन" अर्थात (बुद्धि-पुरुष विवेक या शास्वत-नश्वर को पहचानने की क्षमता) दोनों के अभ्यास पर निर्भर है।
"विवेकदर्शनाभ्यासेन विवेकस्रोत उद्धाटयत " इसे पढने से ऐसा प्रतीत होता है, मानो  व्यासदेव हजारों साल पहले जान चुके थे, कि 'विवेक-शक्ति' जो सभी के ह्रदय में विद्यमान अन्तर्यामी गुरु है; वह एक दिन  (१२ जनवरी १८६३ को) स्वयं स्वामी विवेकानन्द की आकृति में आविर्भूत होगी ! और तब उस गुरु विवेकानन्द के मूर्त रूप पर पुनः पुनः मन को धारण करने के अभ्यास से ' विवेक-स्रोत ' उदघाटित हो जायेगा ! 

तत्र स्थितौ यत्नोऽभ्यासः॥ १/१३॥ 
शब्दार्थ- तत्र= उन दोनों (विवेक-दर्शन या विवेक-प्रयोग का अभ्यास बुद्धि और पुरुष के बीच अंतर को पहचानना डिस्क्रिमनेशन और रिनन्सिएसन वैराग्य या अनात्म जड़ इन्द्रिय-विषयों से परहेज ) में चित्त को प्रतिष्ठित रखने का प्रयास करना अभ्यास है। 
अभ्यास की सामान्य महिमा से तो हममें से प्रायः सभी परिचित हैं। अभ्यास के बारे में एक कहावत अक्सर सुनी जाती है- 'करत- करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान। रसरी आवत जात है सिल पर परत निसान॥' अर्थात् अभ्यास करते- करते एकदम जड़मति भी सविज्ञ- सुजान हो जाते हैं। कुछ उसी तरह से जैसे निरन्तर रस्सी की रगड़ से पाषाण पर भी निशान पड़ जाते हैं। मनुष्य की सारी क्षमताएँ उसके अभ्यास का ही फल है। यहाँ- तक कि पशु- पक्षी भी अभ्यास के बलबूते ऐसे- ऐसे करतब दिखाने लगते हैं, जिन्हें देखकर दाँतों तले उँगली दबाने का मन करता है।  
बालकाण्ड : शिव-पार्वती संवाद में कहा गया है -
 जगत प्रकास्य प्रकासक रामू। मायाधीस ग्यान गुन धामू॥
                        जासु सत्यता तें जड़ माया। भास सत्य इव मोह सहाया॥4॥ (बा. का.११७)

भावार्थ:-यह जगत (बुद्धि) प्रकाश्य है और श्री रामचन्द्रजी (पुरुष ) इसके प्रकाशक हैं। वे माया के स्वामी और ज्ञान तथा गुणों के धाम हैं। जिनकी सत्ता से, मोह की सहायता पाकर जड़ माया भी सत्य सी भासित होती है॥4॥ जो जगत का द्रष्टा (साक्षी) है वही राम है; शिवजी कहते हैं - "सब कर परम प्रकाशक जोई। राम अनादि अवधपति सोई ॥ " - सारा जगत जिसके कारण प्रकाशित है वही राम अवधपति हैं। 
रजत सीप महुँ भास जिमि जथा भानु कर बारि।
जदपि मृषा तिहुँ काल सोइ भ्रम न सकइ कोउ टारि॥117॥
भावार्थ:-जैसे सीप में चाँदी की और सूर्य की किरणों में पानी की (बिना हुए भी) प्रतीति होती है। यद्यपि यह प्रतीति तीनों कालों में झूठ है, तथापि इस भ्रम को कोई हटा नहीं सकता॥117॥
एहि बिधि जग हरि आश्रित रहई। जदपि असत्य देत दुख अहई॥
जौं सपनें सिर काटै कोई। बिनु जागें न दूरि दुख होई॥1॥
भावार्थ:-इसी तरह यह संसार भगवान के आश्रित रहता है। यद्यपि यह असत्य है, तो भी दुःख तो देता ही है, जिस तरह स्वप्न में कोई सिर काट ले तो बिना जागे वह दुःख दूर नहीं होता॥1॥

  झूठेउ सत्य जाहि बिनु जानें। जिमि भुजंग बिनु रजु पहिचानें॥
जेहि जानें जग जाइ हेराई। जागें जथा सपन भ्रम जाई॥1॥

भावार्थ:-जिसके बिना जाने झूठ भी सत्य मालूम होता है, जैसे बिना पहचाने रस्सी में साँप का भ्रम हो जाता है और जिसके जान लेने पर जगत का उसी तरह लोप हो जाता है, जैसे जागने पर स्वप्न का भ्रम जाता रहता है॥1॥ 
गीता ६/३४ में अर्जुन मन की इसी प्रबल चंचलता को देखकर भगवान श्रीकृष्ण से कहते हैं- 
चज्चलं हि मन: कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम् ।
           तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् ।।34।।
क्योंकि हे श्रीकृष्ण! यह मन बड़ा चंचल, प्रमथन स्वभाव वाला, बड़ा दृढ़ और बलवान है। इसलिये उसको वश में करना मैं वायु के रोकने की भाँति अत्यन्त दुष्कर मानता हूँ ।।34।।  
असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् ।
          अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गुह्राते ।।35।।
श्रीभगवान् बोले- हे महाबाहो! नि:सन्देह मन चंचल और कठिनता से वश में होने वाला है; परंतु हे कुन्ती पुत्र अर्जुन! यह अभ्यास और वैराग्य से वश में होता है ।।35।। 
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 ११. किस प्रकार से बैठना होगा ? 
(सम्यक आसन और स्वच्छ परिवेश)
मन (सूक्ष्म शरीर) सदा हमारे साथ ही होता है, उसे ढूँढ़ने के लिये किसी पहाड़ पर या गुफ़ा में नहीं जाना पड़ता। फिर भी शान्त और एकान्त वातावरण में मौन होकर बैठने से मन की गहराइयों में उतरना सहज हो जाता है। चाहे किसी भी स्थिति में बैठें, मन की उपस्थिति देखी जा सकती है; किन्तु हमारे बैठने का ढंग (आसान) यदि ऐसा हो कि कुछ ही समय के बाद शरीर में यहाँ वहाँ दर्द उठने लगे, तो हमारा मन बार बार उसी कष्ट की ओर जायगा। इसीलिये सम्यक आसन (प्रॉपर पोस्चर) में बैठना आवश्यक हो जाता है। बैठने का ढंग ऐसा होना चाहिये, जिससे बैठने के बाद शरीर में किसी पीड़ा का अनुभव न हो, और कुछ समय तक स्थिर होकर सुखपूर्वक बैठा जा सके। 
बैठने का स्थान शान्त और परिवेश स्वच्छ होना चाहिये। स्वयं भी हाथ- मुँह धोकर, या स्वच्छ होकर शान्त भाव से बैठना चाहिये। बाबू  की भाँति पालथी मारकर सुखासन में बैठा जा सकता है। अथवा उसी प्रकार तनाव-मुक्त होकर बैठे हुए एक पैर के तलुए को दूसरे पैर के जाँघों पर रखकर बैठने से थोड़ी देर तक सुकून के साथ बैठा जा सकता है। इसको ही पद्मासन कहते हैं। किन्तु जिनको इस प्रकार बैठने  अभ्यास नहीं है, उन्हें दोनों पैरों को इस प्रकार रखने से कष्ट हो सकता है। किन्तु एक ही पैर को दूसरे पैर की जंघा पर रखकर बैठने से, सुखासन में पालथी मारकर,जेन्टिलमैन होकर बैठने की अपेक्षा अधिक आराम मिलता है, और कुछ देर तक निश्चिन्त होकर बैठना सहज हो जाता है। इसे अर्धपद्मासन कहते हैं। 
इस आसन में बैठने से एक सुविधा और होती है कि इसमे कमर, मेरुदण्ड और गर्दन को एक सीध में रखा जा सकता है। कमर और रीढ़ की हड्डी को सीधा रख कर बैठने से श्वास-प्रश्वास सहज रूप में चलता रहता है। ऐसा न होने पर कुछ ही समय के बाद शरीर में थकावट का अनुभव होगा, और मन उसी ओर चला जायेगा। इस प्रकार अर्ध-पद्मासन  में बैठकर धीरे धीरे लंबा स्वांस लेना और छोड़ना यथेष्ट होता है। हमें तो (स्वाभाविक रूप से चंचल और विभिन्न विषयों में दौड़ने वाले)  ' मन ' को पकड़ कर अपने सामने उपस्थित करना है। इसीलिये शरीर, साँस-प्रस्वांस  या अन्य किसी बात की तरफ मन को जाने देना उचित न होगा। गर्दन को सीधा रखते हुए दृष्टि को जमीन के सामानांतर (पैरेलल टु दी ग्राउंड) रखना अच्छा होता है। नहीं तो कुछ ही समय बाद गर्दन में व्यथा का अनुभव हो सकता है। फिर दोनों हाथों को एक पर दूसरा फैला कर, इस प्रकार धीरे से गोद में रख लेना पर्याप्त है। 
इतना करने से यह तो हो गया कि शरीर के कारण मन को व्यस्त नहीं होना पड़ा, लेकिन बाहरी वस्तुएं भी तो मन को प्रभावित कर सकती हैं। जब इस प्रकार बैठ गया तो स्वाद ('रस') एवं 'स्पर्श' इन्द्रिय की ओर मन के खींच जाने की सम्भावना नहीं रह जाती। किन्तु कहीं से अचानक कोई अप्रिय 'गंध' आ जाय, तो मन उधर भटक सकता है। इसीलिये किसी सुगन्धित-फूल या धूपबत्ती कि भीनी-भीनी खुशबू यदि नासिका तक आती रहे तो अच्छा ही है। क्योंकि मन धीमी सुगंध से प्रसन्न रहता है। किन्तु दोनों कान तो खुले हैं, उनमे विभिन्न प्रकार के 'शब्द', गीत या बातचीत सुनाई पड़ सकती है। इसे रोकने का कोई उपाय नहीं है, किन्तु मैं इतना तो कर सकता हूँ कि उस ओर मन को जाने ही नहीं दूंगा ! आँखों को मूंद कर रखने से अन्य कोई वाह्य 'रूप'  मन को प्रभावित नहीं कर सकती, इसलिए एक बार अपने आदर्श कि छवि को ध्यान से निहार कर नेत्रों को मूंद लेना अच्छा है। यही है सम्यक आसन और स्वच्छ परिवेश का महत्व।
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