Monday, May 26, 2014

' विवेकानन्द - दर्शनम् ' (7) - श्री नवनीहरण मुखोपाध्यायः

हिन्दी अनुवाद की भूमिका 
यह महामण्डल पुस्तिका मेरे हाथों में १९९३ के वार्षिक युवा प्रशिक्षण शिविर में आई थी। तब से मैंने इसको अनगिनत बार पढ़ा है। किन्तु इस पुस्तिका में स्वामी जी द्वारा अंग्रेजी में कहे गये जिन उक्तियों को उद्धरण के भीतर (within quotes) रखा गया है, वहाँ इन उक्तियों को 'Complete Works of Swami Vivekananda' के किस खण्ड से लिया गया है, इस सन्दर्भ को सूचित नहीं किया गया है। तत्वज्ञान से परिपूर्ण इस पुस्तिका का अनुवाद करने के लिये स्वामी जी ने किस प्रसंग में इन उक्तियों को कहा होगा, इसे समझना बहुत जरुरी था। 
'गूगल बाबा' के कृपा से नेट पर अंग्रेजी में सारे प्रसंग और सन्दर्भ मिल गये, किन्तु अद्वैत आश्रम, कोलकाता तथा मायावति से हिन्दी में प्रकाशित 'विवेकानन्द साहित्य' अभी तक नेट पर उपलब्ध नहीं है। इसका क्या कारण है, यह मुझे नहीं पता। 
मैंने स्वामी विवेकानन्द के अंग्रेजी में कथित उक्तियों को हिन्दी में अनुवाद करते समय अपने सन्तोष के लिये विवेकानन्द साहित्य से पूरे निबंध को ही उद्धृत कर दिया है, और जहाँ आवश्यक लगा है, कुछ पन्नों को स्वयं भी अनुवादित किया है। इसे पढ़ने से परम पूज्य श्रीनवनीहरण ने छोटे छोटे श्लोकों में जो गागर में सागर भरा है, उस अमृत का पान किया जा सकता है, समझने में आसानी हो सकती है। 
=========  
 ' विवेकानन्द - दर्शनम् '
७. 
' वेद का अर्थ है- अपरिवर्तनशील सत्यों का समूह '
 
(अखिल- भारत- विवेकानन्द- युवमहामण्डलम् अध्यक्षः  श्री नवनीहरण मुखोपाध्यायः विरचित )
[ In this book, within quotes, the words are of Swami Vivekananda. The ideas, of course, are all his.
इस पुस्तिका में, उद्धरण के भीतर लिखे गये शब्द स्वामी विवेकानन्द के हैं। निस्सन्देह विचार भी उन्हीं के हैं। ]  
 
'राधू' के साथ पवित्र माँ श्री श्री सारदा 
 
नमस्ते सारदे देवि दुर्गे देवी नमोsस्तुते |
वाणि लक्ष्मि महामाये मायापाशविनाशिनी ||
नमस्ते सारदे देवि राधे सीते सरस्वति | 
सर्वविद्याप्रदायिण्यै संसाराणवतारिणी ||
सा मे वसतु जिह्वायां मुक्तिभक्तिप्रदायिनी ||
सारदेति जगन्माता कृपागङ्गा प्रवाहिनी ||
विशुद्ध भावनाज्ञानतत्वप्रख्या च दर्शनम्

[ शक्ति का उपासक अन्यान्य साधना-मार्गियों की तरह शक्ति (महाविद्या-माँ सारदा देवी) को 'माया' नहीं मानता बल्कि अपनी 'माँ' समझता है जिसकी गोद में रहकर वह सदैव निर्भय रहता है क्योंकि उसकी माँ तो 'कोटि ब्रह्माण्ड नायिका' है जो प्रतिक्षण उसकी रक्षा तथा पालन करती है। वह इतनी प्रकाशमयी है कि मायारूपी अन्धकार स्वत: ही नष्ट हो जाता है।] 
==============
      ७. 
जीवः शिव इति ज्ञानं नरो नारायणो ध्रुवम् । 
जीवसेवा परो धर्मः परोपकृतये वयम् ।। 

1. Every being is God (Shiva) --this is true knowledge; ' man is the greatest of all beings.'

2. ' There is no greater Dharma than this service of living beings.'

3.  ' Blessed are they whose bodies get destroyed in the service of others.' 

१. प्रत्येक जीव ईश्वर (शिव) है --यही सच्चा ज्ञान है; " मनुष्य सब प्राणियों में श्रेष्ठ है ! "

२.  ' जीव-सेवा से बढ़कर और कोई दूसरा धर्म नहीं है।'

३. " धन्य हैं वे, जो अपने शरीर को दूसरों की सेवा में न्योछावर कर देते हैं।"

प्रसंग : [ १. श्रीमती ओली बुल (धीरा माता) को अगस्त १८९५ का पत्र/ २. गुरु-शिष्य संवाद : ऋग्वेद पर सायण भाष्य/ ३.' विश्वप्रेम और उससे आत्मसमर्पण का उदय' ४/५६ ]   
१. स्वामी जी द्वारा उद्धृत यह तात्विक दर्शन श्रीमती ओली बुल (धीरा माता) को अगस्त १८९५ को लिखे पत्र से लिया गया है।
वे लिखते हैं - " अपने देशवासियों के प्रति मैंने अपना थोड़ा-सा कर्तव्य निभाया है। अब जगत के लिये --जिससे कि मुझे यह शरीर मिला है, देश के लिये --- जिसने कि मुझे यह भावना प्रदान की है तथा उस मानवता (इंसानियत ) के लिये---जो मुझे उनमें से एक होने की अनुमति देती है, ताकि मैं भी अपनी गणना मनुष्य के रूप में कर सकूँ, कुछ करना है। " The older I grow, the more I see behind the idea of the Hindus that man is the greatest of all beings."  
जितनी ही मेरी उम्र बढ़ रही है, उतना ही मैं " मनुष्य सब प्राणियों में श्रेष्ठ है " --हिन्दुओं की इस धारणा का तात्पर्य अनुभव कर रहा हूँ। मुसलमान भी यही कहते हैं। अल्ला ने जब सारी सृष्टि रचना कर ली तो सबसे अंत में मनुष्य को बनाया, अपनी इस रचना को देखकर अल्ला बहुत खुश हुए, क्योंकि वह अपने बनाने वाले को भी जान सकने में सक्षम था ! अल्ला ने सभी फ़रिश्तों (Angels) को बुलवाया और आदम (Adam) को प्रणाम करने के लिये कहा। सारे फ़रिश्तों ने आदम के सामने अपने सिर को झुकाया पर इब्लीस (Iblis) ने प्रणाम नहीं किया। तब अल्ला ने कहा-दूर हटो शैतान ! इस प्रकार इब्लीस शैतान (Satan) बन गया। 
This earth is higher than all heavens; यह पृथ्वी (भारत माता) सब स्वर्गों से ऊँची है ---विश्व-ब्रह्माण्ड का यही सर्वश्रेष्ठ पाठशाला है ! मंगल ग्रह (Mars) या बृहस्पति ग्रह (Jupiter) पर यदि कोई प्राणी रहते भी हों, तो वे हमारी अपेक्षा उच्च स्तर के जीव नहीं हो सकते, क्योंकि वे अभी तक हमलोगों से सम्पर्क नहीं कर सके हैं।
मनुष्य की अपेक्षा तथाकथित उच्च प्राणी यदि कोई है, तो वे दिवंगत आत्मायें हैं, और वे 'मरे हुए लोग' अब भी मनुष्य ही हैं किन्तु इन्होंने अभी एक भिन्न प्रकार का शरीर ले लिया है। यह सत्य है कि अब उनका शरीर सूक्ष्म है, (जिन्हें हम इन चर्म चक्षुओं से नहीं देख सकते ) किन्तु अब भी वे दो-हाथ, दो पैर आदि से युक्त मनुष्य-शरीर ही है। और वे पूरी तरह से अदृश्य (absolutely invisible) हुए बिना, इसी धरती पर एक अन्य आकाश (another Âkâsha) में रहते हैंवे लोग भी सोच-विचार करते हैं, और हमलोगों की तरह ही समझ (consciousness -चैतन्य, संज्ञा या भान) तथा अन्यान्य सब कुछ रखते हैं। इसीलिये वे भी मनुष्य ही हैं, देवता लोगों और देवदूतों के बारे में भी यही बात है।
किन्तु केवल मनुष्य ही ईश्वर बन सकता है, तथा अन्य लोगों (दिवंगत लोगों, देवताओं या फ़रिश्तों) को पुनः मनुष्य-जन्म मिलने के बाद फिर से ईश्वरत्व (बुद्धत्व) की प्राप्ति हो सकती है। " 

७.२   'जीव-सेवा से बढ़कर और कोई दूसरा धर्म नहीं है।' यह तात्विक दर्शन गुरु-शिष्य संवाद का अंश है; स्वामीजी बागबाजार में स्व० बलराम बोस के भवन में ठहरे हुए हैं। विगत दस दिनों से शिष्य वहीँ  रहते हुए स्वामीजी के साथ ऋग्वेद पर सायण भाष्य पढ़ रहे थे। किसी धनी व्यक्ति के निजी पुस्तकालय से मैक्समूलर द्वारा प्रकाशित ऋग्वेद ग्रन्थ के सब भाग लाये गये हैं।
स्वामीजी ने मैक्समूलर के संबन्ध में कहा, " मुझे कभी कभी ऐसा अनुमान होता है कि सायणाचार्य ने अपने भाष्य को पुनरुज्जीवित करने के उद्देश्य से स्वयं मैक्समूलर के रूप में जन्म लिया है। ऐसा सिद्धान्त मेरा बहुत दिनों से था, पर मैक्समूलर से मिलने के बाद और भी दृढ हो गया है। ऐसा परिश्रमी और ऐसा वेद-वेदान्त सिद्ध पण्डित हमारे देश में भी नहीं पाया जाता। इसके अतिरिक्त श्रीरामकृष्ण पर भी उनकी कैसी गहरी भक्ति है! क्या तू समझ सकता है ? उनके अवतारत्व पर भी उन्हें विश्वास है। मैं उनके ही भवन में अतिथि रहा था --कैसी देखभाल और सत्कार किया ! दोनों वृद्ध पति-पत्नी को देखकर ऐसा अनुमान होता था कि मानो वशिष्ठ देव और देवी अरुन्धती संसार में वास कर रहे हैं। मुझे विदा करते समय वृद्ध की आँखों से आँसू टपकने लगे थे।"
शिष्य - अच्छा महाराज, यदि सायण ही मैक्समूलर हुए हैं तो पवित्र भूमि भारत को छोड़कर उन्होंने म्लेच्छ बनकर क्यों जन्म लिया ?
स्वामीजी - ' हम आर्य हैं ', 'वे म्लेच्छ हैं', आदि विचार अज्ञान से ही उत्पन्न होते हैं। जो वेद के भाष्यकार हैं, जो ज्ञान की तेजस्वी मूर्ति हैं, उनके लिये वर्णाश्रम या जातिविभाग कैसा ? उनके सामने यह सब अर्थहीन है। मानवजाति के कल्याण के लिये वे जहाँ चाहें जन्म ले सकते हैं । विशेषकर जिस देश में विद्या और धन दोनों हैं यदि वे वहाँ जन्म नहीं लेते, तो इतना बड़ा ग्रन्थ छापने का खर्च कहाँ से आता ? क्या तुमने नहीं सुना कि ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने इस ऋग्वेद को छपवाने के लिये ९ लाख रूपये नक़द दिये थे, परन्तु उससे भी काम पूरा नहीं हुआ। भारत के सैकड़ों वैदिक पण्डितों को मासिक वेतन देकर इस कार्य में नियुक्त किया गया था। विद्या और ज्ञान के निमित्त इतना व्यय और ऐसी प्रबल ज्ञान-तृष्णा वर्तमान समय में क्या किसी देश में देखी  है। इसकी भूमिका में मैक्समूलर ने लिखा है कि उन्हें २५ वर्ष तो केवल इसे लिखने में ही लगे और फिर छपवाने में २० वर्ष और लगे। ४५ वर्ष तक एक ही पुस्तक में लगे रहना क्या साधारण मनुष्य का कार्य है ? इसीसे समझ लो कि मैं उनको स्वयं सायण क्यों कहता हूँ ?
इस वार्तालाप के बाद पुनः ग्रंथपाठ होने लगा- प्रसंग था, 'वेद का आश्रय लेकर ही सृष्टि का विकास हुआ है।'  यह जो सायण का मत है, इसका समर्थन स्वामीजी ने नाना प्रकार से किया और कहा, 'Veda means the sum total of eternal truths' " वेद का अर्थ है- अपरिवर्तनशील सत्यों का समूह। वैदिक ऋषियों ने जिन शाश्वत सत्यों को प्रत्यक्ष किया था; उनका अनुभव केवल वैसे ऋषि ही कर सकते हैं जिनको अतीन्द्रिय दृष्टि प्राप्त हो जाती है, हमारे जैसे साधारण मनुष्य उनका अनुभव नहीं कर पाते। (क्योंकि ऋषि बनने के लिये पहले चरित्रवान मनुष्य बनना आवश्यक होता है, वर्ना लोग कहेंगे जिसे आप भगवान मानते हैं, वो तो एक अच्छा इंसान भी नहीं है। )
इसी कारण वैदिक ऋषि को "the seer of the truth of the Mantras" मन्त्र के अर्थ का द्रष्टा कहा जाता है; कोई भी ब्राह्मण (जिसे 'मैं ब्रह्म हूँ ' के अर्थ का अनुभव नहीं हुआ किन्तु) जिसके गले जनेऊ लटका हो, उसे हम ऋषि की उपमा नहीं दे सकते। समाज के अन्दर ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य-शूद्र आदि  की वर्ण-व्यवस्था, या जाति विभाग वेदों के बाद आया है। वेद-मंत्र (सो Sहम् आदि महावाक्य E=M के जैसा) अनन्त भावों की समष्टि को शब्दों में व्यक्त करने की चेष्टा मात्र है।
'शब्द' पद का प्राचीन वैदिक अर्थ है - वह सूक्ष्म भाव, जो बाद में अपने को स्थूल  रूप में व्यक्त करता है। इसीलिये महाप्रलय के समय भावी सृष्टि का सूक्ष्म बीज समूह वेदों में ही कुण्डलित रहता है। इसी कारण पुराणों में सबसे पहला अवतार 'मत्स्यावतार ' का उल्लेख मिलता है-  " ब्रह्म नामक नैमित्तिक प्रलय होने के कारण सारा लोक समुद्र मे डूब गया। श्री हरि ने हयग्रीव की चेष्टा जान ली और वेदों का उद्धार करने के लिए मत्स्यावतार ग्रहण किया।" प्रथमावतार में ही वेदों का उद्धार हो गया था !
[ बह्माजी के सोने का जब समय आ गया और उन्हें नींद आने लगी, उस समय वेद उनके मुख से निकल पड़े और उनके पास ही रहने वाले हयग्रीव नामक दैत्य ने उन्हें चुरा लिया। दैत्यों ने सोचा कि देवता लोग वेद मंत्रों के बल से प्रबल प्रतीत होते हैं। अतः मैं वेदों का अपहरण करूंगा। ऐसा निश्चय  करके उसने वेदों को हर लिया। ब्रह्माजी कार्तिक मास की प्रबोधनी एकादशी को भगवान की शरण में गये  भगवान ने उन्हें आश्वासन  दिया कि वे वेदों का उद्धार करेंगे और मछली के समान रूप धारण करके आकाश  मार्ग से वे विन्ध्य पर्वत निवासी कश्यप  मुनि की अंजलि में जा गिरे। मुनि ने उसे करूणवश क्रमशः कमंडल, कूप, सर, सरिता, आदि अनेक स्थानों में रखते हुए अंत में उसे समुद्र में डाल दिया। वहां भी वह बढ़कर विशालकाय हो गया। तदनन्तर उन मत्स्य-रूपधारी भगवान ने शंखासुर (हयग्रीव)  का बध किया और उसे हाथ में लिए बदरीवन में गए। वहां समस्त ऋिषियों को बुलाकर आदेश  दिया कि जल के भीतर बिखरे हुए वेदों की खोज करो और रहस्य सहित उनका पता लगाकर शीघ्र ले आओ। तब अपने अपने तेज बल से संपन्न समस्त ऋिषियों ने यज्ञ और बीज सहित वेदमंत्रों का उद्धार किया। जिस वेद के जितने मंत्रों को जिस ऋिषि ने उप्लब्ध किया, वही उतने भाग का तबसे ऋिषि माना जाने लगा। ब्रह्मा समेत सब ऋिषियों ने आकार प्राप्त किए हुए वेदों को भगवान को अर्पण कर दिया। (पद्म पुराण)
फिर उसी वेद से क्रमशः सृष्टि का विकास होने लगा। या दूसरे शब्दों में कहें तो वेद मंत्रों के शब्दों (नाम) में निहित भावों के अर्थानुसार सभी निर्मित वस्तुओं ने एक एक करके स्थूल आकार (रूप) लेना शुरू कर दिया। क्योंकि शब्द (नाम या भाव) ही सभी स्थूल पदार्थों (gross objects) के सूक्ष्म रूप (subtle forms) हैं। पूर्व समस्त कल्पों (previous cycles or Kalpas.) में भी इसी क्रमानुसार सृष्टि हुई थी, यह बात हमलोग वैदिक सन्ध्या-मंत्र में देख सकते हैं। वहाँ ऋषि कहते हैं -  

" सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत् ,
पृथिवीं दिवं चान्तरीक्षमथो स्वः। 
प्रजा: सृज यथापूर्वं याश्रच् मय्यनुशेरते । ससर्जेदं स पूर्ववत ॥ 
  
- विधाता ने सृष्टि को प्रक्षेपित (projected) किया है, विश्व-ब्रह्माण्ड का सृजन (created) नहीं किया है । भगवान ने या परमात्मा ने सूरज, चाँद, पृथ्वी, आकाश, उच्चतर वायु मण्डल और स्वर्ग आदि को पूर्व कल्पों के अनुरूप एक ही तरीके और प्रक्रिया के अनुसार प्रक्षेपित कर दिया है। "क्या तुम समझते हो भई, प्रक्षेपित करना क्या है?
(अर्थात अनादिकाल के हमारे कर्मों के द्वारा महाप्रलय में हमारी जो स्थिति थी वैसे ही सृष्टि प्रकट कर दिये! भगवान् ने अपनी जेब से निकाल कर कुछ बनाया वनाया नहीं है, जैसे सृष्टि पहले थी वैसे ही प्रकट कर दिया है। हम साधारण लोग (जो पुनर्जन्म में विश्वास करने के बाद भी यज्ञोपवीत के समय दिये जाने वाले संध्या -मंत्र का अर्थ नहीं जानते) समझते हैं कि भगवान् ने जब संसार बनाया  तो एक को मनुष्य बना दिया , एक को गधा बना दिया,  एक को कुत्ता बना दिया । ऐसा क्यों ? कोई जलचर, कोई भूचर, कोई खेचर, कोई स्वेदज, कोई अण्डज, कोई उदभिज, कोई जरायुज ये तमाम प्रकार का सृष्टि का वैषम्य चौरासी लाख योनियों का, ऐसा क्यों ? उस जीव ने क्या गुनाह किया था ? अभी तो सृष्टि शुरू हुई है। उन्होंने तो प्रकट किया है- ‘यथपूर्वम’ । इसलिये न वैषम्य है न ‘नैर्घृण्य’ है।
निर्दयी नहीं हैं भगवान। वो तो समदर्शी है । वह  भगवान, परमात्मा या ब्रह्म स्वयं  सत् चित् आनन्द स्वरूप होकर भी अनेकों रूप धारण कर लेते हैं । फिर दूसरे को भी अपने समान बना देता है । लेकिन जीव की पर्सनैलिटी सदा रहती है। जीव बह्रा नहीं बन सकता । संसार का प्राकट्य करना , संसार का रक्षण करना, प्रलय करना ये तमाम कार्य भगवान् स्वयं करते हैं । हां अपना अपना ज्ञान, अपना आनन्द ये सब कुछ दे देते हैं । -श्रीकृपालु जी महाराज)
शिष्य - परन्तु महाराज, जब पहले से ही कोई वास्तविक ठोस वस्तु (रूप) न रही  हो, तो शब्द (नाम) किसके लिये और कैसे प्रयोग किये जा सकते हैं ? और जिन पदार्थों को हमने पहले कभी देखा ही नहीं हो, उसे कोई नाम कैसे दे सकते हैं ?
स्वामी जी-  हाँ, ऊपरी तौर पर देखने से ऐसा ही लगता है। (नवनी दा से मैंने १९९७ में पूछा था मिट्टी को मिट्टी या पत्थर को पत्थर सबसे पहले इस नाम से किसने पुकारा था ? दादा बोले कुछ लोग ऐसे होते हैं जो धरती में कान लगाकर उसके नाम को सुन  सकते हैं ! ) परन्तु देखो यह जो घट है, इसके टूट जाने पर क्या इसके घटत्व का भी नाश हो जायगा ? नहीं, क्योंकि यह घट तो स्थूल कार्य (effect) है, परन्तु घटत्व घट की सूक्ष्म अवस्था या शब्दावस्था (कारण) है। ठीक उसी प्रकार सभी पदार्थों की शब्दावस्था ही उनकी सूक्ष्मावस्था है, और जिन वस्तुओं को हम देखते, सुनते, स्पर्श करते, या किसी भी तरीके से महसूस (perceive) करते हैं, वे ऐसी सूक्ष्म या शब्दावस्था में अवस्थित पदार्थों की स्थूल अभिव्यक्तियाँ मात्र हैं -जैसे कार्य (रूप) और उसका कारण (नाम) ! यहाँ तक कि जब सम्पूर्ण विश्व-ब्रह्माण्ड विलोपित (लय) हो जाता है, उस समय भी ब्रह्माण्ड की चेतना अथवा समस्त स्थूल पदार्थों की सूक्ष्म यथार्थता (स्वरुप) या जगत बोधात्मक शब्द- ' ॐ ' ब्रह्म के भीतर कारण रूप से वर्तमान रहते हैं। 
'creative manifestation' के पूर्व ' this sum total of causal entities vibrates into activity' अर्थात 'सृजनात्मक अभिव्यक्ति बिन्दु' अथवा जगत के विकास या प्रक्षेपण से पूर्व  इन पदार्थों की सूक्ष्मस्वरूप समष्टि या कारणात्मक सत्ताओं की समष्टि क्रियाशीलता के रूप में कम्पायमान होने लगती है।  तथा उसी का प्रकृतिस्वरूप शब्द-गर्भात्मक अनादि (eternal) एवं मौलिक (primal) नाद, 'ॐ' -कार अपने आप ही उठता रहता है।  उसके बाद उसी कारण स्वरुप समष्टि से प्रत्येक पदार्थ-विशेषों की प्रथम सूक्ष्म छवि (subtle image) अर्थात शाब्दिक रूप और तत्पश्चात उनका स्थूल रूप प्रकट होता है। वही कारण-शब्द या शब्द-चैतन्य ही ब्रह्म हैं, यह शब्द ही वेद है ! यही सायण का अभिप्राय है, समझे ? 
शिष्य - महाराज, ठीक समझ में नहीं आया ।
स्वामी जी - इतना तो समझ गये कि जगत में जितने घट हैं, उन सबके नष्ट होने पर भी ' घट ' शब्द रह सकता है। उसी प्रकार जगत का नाश हो जाने पर पर, अर्थात जिन वस्तुओं (महत तत्व या पंचभूतों+प्राण) की समष्टि से जगत बना है, उनके नाश होने पर भी - चेतना में उन सभी पदार्थों के प्रतिनिधित्व करने वाले, या उन पदार्थों के बोध कराने वाले शब्द क्यों नहीं रह सकते हैं? और समय आने पर उनसे पुनः सृष्टि क्यों नहीं प्रकट हो सकती ? 
शिष्य - परन्तु महाराज, ' घट घट ' चिल्लाने से तो घट नहीं बनता है। 
स्वामीजी - तेरे या मेरे इस प्रकार चिल्लाने से नहीं बनते, किन्तु सिद्धसंकल्प ब्रह्म में घट की स्मृति होते ही घट का प्रकाश हो जाता है। जब साधारण धर्म-अभ्यासी (मनःसंयोग में प्रतिष्ठित) की इच्छा-शक्ति से अघटन घटित हो जाता है, तब सिद्ध-संकल्प ब्रह्म का तो कहना ही क्या ! सृष्टि से पूर्व ब्रह्म पहले शब्दात्मक (सूक्ष्मभाव-नाम) बनते हैं, फिर ॐ-कारात्मक या नादात्मक रूप धारण करते हैं, तत्पश्चात पूर्व कल्पों के विशेष विशेष शब्द जैसे भूः, भुवः, स्वः अथवा गो, मानव, घट, पट इत्यादि का प्रकाश उसी ओंकार से होता है। पूर्ण इच्छा-शक्ति से सम्पन्न ब्रह्म, या सिद्ध-संकल्प ब्रह्म में जैसे ही कोई भाव (नाम) उठता है, तदनुरूप (corresponding) स्थूल पदार्थ (रूप) भी प्रकट हो जाता है, इसी प्रकार क्रमशः विविधता-पूर्ण जगत अभिव्यक्त होता चला जाता है। अब तो समझे न कि कैसे शब्द ही सृष्टि का मूल है ?
शिष्य - हाँ, महाराज, समझ में तो आया, किन्तु ठीक धारणा नहीं होती। 
स्वामी जी - अरे बेटे ! ब्रह्मस्वरूपता की आन्तरिक अनुभूति (inward realisation) उसकी स्पष्ट अवधारणा होना क्या इतना सुगम समझता है ? जब मन (अहं) ब्रह्म में स्वयं को लीन करने के लिये आगे बढ़ता है, वह एक एक करके ऐसी समस्त अवस्थाओं में से गुजरता है और अन्त में निर्विकल्प अवस्था को प्राप्त होता है। समाधि में प्रविष्ट होने की प्रक्रिया में, सर्व प्रथम ब्रह्माण्ड (सूर्य-चन्द्र आदि अत्यन्त द्रुत गति के साथ परिवर्तित होता हुआ) विचारों का एक समूह प्रतीत होता है, तत्पश्चात समस्त वस्तुएं (ज्ञाता) स्वयं को ॐ (ज्ञेय-ज्ञान स्वरुप परमात्मा) के अथाह महासागर में खो देता है। तत्पश्चात मैं-पन भी पूरी तरह से पिघल जाता है, वह है भी या नहीं इस पर सन्देह होने लगता है। यही उस अपरिवर्तनशील नाद-ब्रह्म की अनुभूति है ! इस अवस्था से आगे ही मन (अहं) ब्रह्म की सत्यता में लीन हो जाता है! बस, सब निर्वाक, स्थिर, निश्चल, परमानन्द, परम शान्ति ! 
स्वामीजी की बातों को सुनकर शिष्य मूक होकर बैठ गया, और सोचने लगा जिस प्रकार स्वामीजी समाधी अवस्था का वर्णन कर रहे है, उसे समझा रहे हैं- उस अनुभव से स्वयं गुजरे बिना दूसरा कोई वैसी व्याख्या नहीं कर सकता ! 
स्वामीजी ने फिर कहा, " अवतारतुल्य महापुरुष (ईश्वर-कोटि ?) लोग समाधि अवस्था से जब ' मैं ' और ' मेरा' के राज्य में लौट आते हैं, तब वे प्रथम ही अव्यक्त नाद का अनुभव करते हैं। फिर नाद के स्पष्ट होने पर ओंकार का अनुभव करते हैं। ओंकार के पश्चात् शब्दमय जगत (क्या हुआ, उठो उठो !) का अनुभव कर अन्त में स्थूल पंचभौतिक जगत को प्रत्यक्ष देखते हैं।
(रोहनिया उंच, से कबीर चौरा अस्पताल का दृश्य ?) किन्तु साधारण साधक लोग (जीव कोटि) अनेक कष्ट सहकर यदि किसी प्रकार नाद के परे पहुँचकर ब्रह्म की साक्षात् उपलब्धि कर भी लें, तो फिर जिस अवस्था में स्थूल जगत का अनुभव होता है, वहाँ वे उतर नहीं सकते -(शरीर अहं में लौट नहीं सकते ?) -ब्रह्म में ही लीन हो जाते हैं-क्षीरे नीरवत्, दूध में जल के समान। " स्वामीजी द्वारा कथित वेदोक्त ज्ञान की महिमा से शिष्य इतना मोहित हो गया कि अब उसकी नजर में भक्ति-कर्म- मनःसंयोग का कोई महत्व नहीं रह गया। 
गिरीश बाबू ने शिष्य को ज्ञान-भक्ति-कर्म का समान महत्व समझाने के लिये स्वामी जी से कहा, " हाँ जी नरेन्द्र, तुम्हें एक बात सुनाऊँ ? वेद-वेदान्त तो तुमने इतना पढ़ लिया, परन्तु देश में जो घोर हाहाकार, अन्नाभाव, व्यभिचार, भ्रूण हत्या, तथा अन्य महापातक आँखों के सामने रत-दिन हो रहे है, उन्हें दूर करने का भी कोई उपाय क्या तुम्हारे वेद में बतलाया गया है ?
आज तीन दिन से अमुक की गृहणी का, जिसके घर में पहले प्रतिदिन ५० लोग खाते थे, चूल्हा नहीं जला है। अमुक घर की कुल-बधुओं को गुण्डों ने अत्याचार करके मार डाला, कहीं भ्रूण हत्या हुई, कहीं विधवाओं को छल-कपट करके लूट लया गया है- इन सब अत्याचारों को रोकने का कोई उपाय क्या तुम्हारे वेद में है ? " इस प्रकार जब गिरीश बाबू समाज के भीषण चित्रों को एक के बाद एक सामने लाने लगे तो स्वामीजी निस्तब्ध होकर बैठ गए। जगत के दुःख-कष्टों को सोचते सोचते स्वामीजी की आँखों से आँसू टपकने लगे, और इसके बाद वे उठकर बाहर चले गये, मानो वे हमसे अपने मन की अवस्था छिपाना चाहते हों। 
गिरीश बाबू बोले- ' देखो, स्वामीजी कितने उदार ह्रदय हैं ! मैं तुम्हारे स्वामीजी का आदर केवल इसी कारण नहीं करता कि वे वेद-वेदान्त के एक बड़े पण्डित हैं; वरन उनकी इसी महाप्राणता के कारण उन पर श्रद्धा करता हूँ। देखो न, जीवों के दुःख से वे कैसे रो पड़े और रोते रोते बाहर चले गये। मनुष्यों के दुःख और कष्टों की बातें सुनकर उनका ह्रदय दया से पूर्ण हो गया और वेद-वेदान्त न जाने कहाँ भाग गये ! ' 
शिष्य- महाशय, हम कितने प्रेम से वेद पढ़ रहे थे ! आपने मायाधीन जगत की ऐसी-वैसी बातें सुनाकर क्यों स्वामीजी का मन दुख दिया ? 
गिरीश बाबू- क्या जगत में ऐसे दुःख और कष्ट रहते हुए भी स्वामीजी उधर न देखकर एकान्त में केवल वेद ही पढ़ते रहेंगे ? उठाकर रख दो अपने वेद-वेदान्त को। 
शिष्य - आप स्वयं हृदयवान हैं, इसीसे केवल ह्रदय की भाषा सुनने में आप की प्रीति है, परन्तु इन सब शास्त्रों से जिनके अध्यन से लोग जगत को भूल जाते हैं, आपकी प्रीति नहीं है। अन्यथा आपने ऐसा रंगभंग न किया होता। 
गिरीश बाबू - अच्छा ज्ञान और प्रेम में भेद कहाँ है, यह मुझे समझा दो । देखो तुम्हारे गुरु स्वामीजी जैसे पण्डित हैं, वैसे ही प्रेमी भी हैं। तुम्हारा वेद भी तो कहता है कि 'सत-चित -आनन्द ' ये तीनों एक ही वस्तु है। देखो स्वामीजी कितना अभी कितना पाण्डित्य दिखा रहे थे, परन्तु जगत के दुःख की बात सुनते ही और उन क्लेशों का स्मरण आते ही वे जीवों के दुःख में रोने लगे। यदि वेद-वेदान्त में ज्ञान और प्रेम में भेद दिखलाया गया है, तो मैं ऐसे शास्त्र को दूर से ही दण्डवत करता हूँ।
 शिष्य निर्वाक होकर सोचने लगे -' बिल्कुल ठीक, गिरीश बाबू के सब सिद्धान्त यथार्थ में वेदों के अनुकूल ही हैं।'इतने में स्वामीजी वापस आये और शिष्य को सम्बोधित करके उन्होंने कहा, ' कहो, क्या बातचीत हो रही थी ?'
 शिष्य ने उत्तर दिया, ' वेदों का ही प्रसंग चल रहा था। गिरीश बाबू ने इन ग्रंथों को नहीं पढ़ा है, परन्तु इनके सिद्धान्तों का ठीक ठीक अनुभव कर लिया है । यह बड़े विस्मय की बात है ! ' 
स्वामीजी - जिसमें सच्ची गुरुभक्ति होती है उसके समक्ष समस्त सत्य स्वयं  प्रकट हो जाते हैं। फिर पढ़ने या सुनने की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती, किन्तु अपने गुरु में ऐसी भक्ति और विश्वास जगत में दुर्लभ हैं। जिनको गिरीश बाबू के समान अपने गुरु में भक्ति और विश्वास मिला है, उन्हें शास्त्रों को पढ़ने की कोई आवश्यकता नहीं, किन्तु गिरीश बाबू की नकल करना औरों के लिये हानिकारक है। उनकी बातों को मानो, पर उनके आचरण देखकर कोई कार्य न करो। 
शिष्य- जी महाराज । 
स्वामीजी- केवल 'जी' कहने से काम नहीं चलता। मूर्खों की तरह हर बात पर 'जी' मत करो, मैं जो कहता हूँ पहले उसके तात्पर्य को ठीक ठीक समझो। मेरे कहने से ही किसी बात पर विश्वास न किया करो। जब ठीक समझो तभी उसको ग्रहण करो । श्री रामकृष्ण ने अपनी सब बातों को समझकर ग्रहण करने को मुझसे कहा था । युक्ति-तर्क और शास्त्र जो कहते हैं, उन पर कसने के बात ही उसको ग्रहण करना। सतत चिन्तन-मनन करते रहने से बुद्धि निर्मल होती है, और फिर उसी बुद्धि में ब्रह्म का प्रकाश होता है। समझे न? 
शिष्य - जी हाँ; परन्तु भिन्न भिन्न लोगों की अलग अलग मतों को सुनने से मस्तिष्क मस्तिष्क ठीक नहीं रहता। गिरीश बाबू ने कहा, ' क्या होगा यह सब वेद वेदान्त को पढ़ने से ? फिर आप कहते हैं -तुम जो कुछ भी पढ़ो या सुनो उस पर मनन करो । अब मुझे क्या करना चाहिये ?
स्वामीजी - मेरी और उनकी दोनों बातें सत्य हैं; परन्तु दोनों की युक्ति दो भिन्न दृष्टिकोण से आई है-बस। एक व्यक्ति की अवस्था ऐसी है, "मूकास्वादनवत् - मानो किसी गूँगे व्यक्ति ने गुड़ खाया पर उसके स्वाद को अभिव्यक्त करने में असमर्थ है !" ( जब स्वयं आत्मा ही किसी को अनायास चयन कर लेती है) जहाँ युक्ति या तर्क का अन्त हो जाता है । 
अन्य व्यक्ति के आध्यात्मिक जीवन में एक दूसरी अवस्था भी हो सकती है, जहाँ किसी साधक को वेदादि शास्त्रों की आलोचना या पठन-पाठन करते करते ही सत्य वस्तु का प्रत्यक्ष ज्ञान हो पाता है। तुम्हे अध्यन और गहन चिन्तन-मनन करते हुए ही आगे बढ़ना होगा, तुम्हारे लिये आत्मानुभूति करने का यही सही मार्ग है। समझते हो न ? 
निर्बोध शिष्य ने, अपने लिए स्वामीजी के इस आदेश को सुनकर यह समझा कि गिरीश बाबू परास्त हो गये हैं, उनकी ओर देखकर कहा, ' महाशय, सुना आपने ? स्वामीजी ने मुझे वेद-वेदान्त के पठन-पाठन और विचार करने का ही आदेश दिया है। '
गिरीश बाबू- हाँ, तुम ऐसा ही करते जाओ। स्वामीजी के आशीर्वाद से तुम्हारा सब काम इसीसे ठीक होगा। 
इसी समय स्वामी सदानन्द वहाँ आ पहुँचे ; उनको देखते ही स्वामीजी ने कहा, " अरे, जी० सी ० से देश की दुर्दशाओं को सुनकर मेरे प्राण बड़े व्याकुल हो रहे हैं । देश के लिये क्या तुम कुछ कर सकते हो ? (केवल देश के लिये ही जी सकते हो ? )
स्वामीजी - पहले एक छोटा सा सेवाश्रम स्थापित करो, जहाँ से सब दीन -दुःखियों को सहायता मिला करे और जहाँ रोगियों ( भवरोग ?) तथा असहाय लोगों की बिना जाति या धर्म भेद के सेवा हुआ करे । समझे ?
सदानन्द - जो महाराज की आज्ञा।
स्वामी जी - ** जीव-सेवा से बढ़कर और कोई दूसरा धर्म नहीं है। यदि कोई व्यक्ति पूरी निष्ठा के साथ इस 'Be and Make' रूपी सेवा-धर्म का अनुष्ठान (महामण्डल कैम्प) करने का प्रयत्न करेगा तो उसका संसार बंधन सुगमता से छिन्न हो जायगा -हाथ पर रखे आँवले के समान ' मुक्तिः करफलायते'। There is no greater Dharma than this service of living beings. If this Dharma can be practiced in the real spirit, then " मुक्तिः करफलायते — Liberation comes as a fruit on the very palm of one's hand".
अब गिरीश बाबू से कहने लगे, " देखो गिरीश बाबू, लगता है कि यदि जगत के दुःख को दूर करने के लिये मुझे सहस्रों बार जन्म लेना पड़े, तो भी तैयार हूँ ! इससे यदि किसी का तनिक भी दुःख दूर हो, तो वह मैं करूँगा। और ऐसा भी मन में आता है कि केवल अपनी ही मुक्ति से क्या होगा ? सबको अपने साथ लेकर उस मार्ग पर जाना होगा। क्या तुम बता सकते हो कि ऐसे भाव मेरे मन में क्यों उठते हैं ? 
गिरीश बाबू- यदि ऐसा न होता तो श्रीरामकृष्ण तुम्हीं को सबसे ऊँचा आधार क्यों कहते ? 
यह कहकर गिरीश बाबू अन्य किसी कार्य के लिये चले गये। 
 ========
७.३  ***" धन्य हैं वे, जो अपने शरीर को दूसरों की सेवा में न्योछावर कर देते हैं।"
स्वामी जी का उपरोक्त तात्विक दर्शन उनके ' पराभक्ति व्याख्यान माला ' ' Universal love and how it leads to self surrender ' ' विश्वप्रेम और उससे आत्मसमर्पण का उदय' ४/५६ : में प्राप्त होता है। 
समष्टि (the universal-ब्रह्म श्रीरामकृष्ण) से प्रेम किये बिना हम व्यष्टि (उसकी सन्तानों) से प्रेम कैसे कर सकते हैं ? ईश्वर (ब्रह्म) ही वह समष्टि है, सम्पूर्ण विश्व-ब्रह्माण्ड को यदि अखण्ड रूप से चिन्तन किया जाय, तो वही ईश्वर है, और उसे पृथक पृथक रूप से देखने पर वही यह दृश्यमान संसार है-व्यष्टि है। समष्टि वह इकाई है, जिसमें लाखों छोटी छोटी इकाईओं का योग है। इस समष्टि के माध्यम से ही सारे विश्व को प्रेम करना सम्भव है। भारतीय दार्शनिक व्यष्टि (The particularised thing, M/F) पर ही नहीं रुक जाते; वे तो व्यष्टि पर एक सरसरी दृष्टि डालकर तुरन्त एक ऐसे व्यापक या समष्टि भाव की खोज में लग जाते हैं, जिसमें सब व्यष्टियों या विशेषों का अन्तर्भाव हो। इस समष्टि की खोज ही भारतीय दर्शन और धर्म का लक्ष्य है। 
ज्ञानी पुरुष (ज्ञान पिपाशु सत्यार्थी) ऐसे एक समष्टि (wholeness of things) की, ऐसे एक निरपेक्ष (absolute) और व्यापक तत्व (generalised Being-श्रीरामकृष्ण) की कामना करता है, जिसे जानने से वह सब कुछ जान सके। 
भक्त उस एक सर्वव्यापी पुरुष (ठाकुर देव) की साक्षात् उपलब्धि कर लेना चाहता है, जिससे प्रेम करने से वह सारे विश्व से प्रेम करने की पात्रता अर्जित कर सके।  
योगी उस मुलभुत शक्ति (one generalised form of power) को अपने अधिकार में लाना चाहता है, जिसके नियमन से वह इस सम्पूर्ण विश्व का नियमन कर सके। यदि हम भारतीय चिन्तन प्रणाली के इतिहास का अध्यन करें, तो देखेंगे कि भारतीय मन सदा से हर विषय में - भौतिक विज्ञान, मनोविज्ञान, भक्ति तत्व, दर्शन आदि सभी में-- एक समष्टि या व्यापक तत्व की इस अपूर्व खोज में लगा रहा है। 
इसलिए भक्त इस निष्कर्ष पर पहुँचता है, कि यदि तुम एक के बाद दूसरे व्यक्ति से प्रेम करते चले जाओ, लगातार अपने प्रेम के पात्र को बदलते चले जाओ, तो भी अनन्त काल में भी संसार को एक समष्टि के रूप में प्यार करने में प्यार करने में समर्थ न हो सकोगे। पर अन्त में जब यह मूल सत्य ज्ञात हो जाता है कि समस्त प्रेम की समष्टि ईश्वर है (sum total of all love is God या समस्त सत्यों का सार प्रेम है !), संसार के मुक्त, बद्ध या मुमुक्षु (struggling towards liberation) सारे जीवात्माओं की आदर्श समष्टि ही ईश्वर (श्रीरामकृष्ण) है, तभी यह विश्व-प्रेम सम्भव होता है। ईश्वर (ठाकुर) ही समष्टि है और यह परिदृश्यमान जगत उसी का परिच्छिन्न भाव है, उसी की अभिव्यक्ति है। यदि हम इस समष्टि -(ब्रह्मस्वरूप श्रीरामकृष्ण) को प्यार करें, तो इससे सभी को प्यार करना हो जाता है। तब जगत को प्यार करना और उसकी भलाई करना सहज हो जाता है। ' it is no joke to do good to the world' किन्तु पहले भगवत्-प्रेम (ठाकुर का नाम जप) के द्वारा हमें यह शक्ति प्राप्त कर लेनी होगी, अन्यथा संसार की भलाई करना (भारत का कल्याण -बनो और बनाओ!) कोई हँसी-खेल नहीं है। 
भक्त कहता है, " सब कुछ उसीका है, वह मेरा प्रियतम है, मैं उससे प्रेम करता हूँ।" इस प्रकार भक्त को सब कुछ पवित्र प्रतीत होने लगता है, क्योंकि वह सब आखिर उसी का तो है ! सभी उसी की सन्तान हैं, उसके अंगस्वरूप हैं, उसी की प्रतिमूर्तियाँ हैं-तब फिर हम किसी को चोट कैसे पहुंचा सकते हैं !? फिर हम दूसरों को बिना प्यार किये कैसे रह सकते हैं ? भगवान (सत्य) के प्रति प्रेम के प्राप्त होते ही, उसके निश्चित परिणामस्वरूप उसके सभी बन्दे के प्रति, सर्व भूतों के प्रति प्रेम अवश्य आयेगा। हम ईश्वर के जितने समीप आते हैं, उतने ही अधिक स्पष्ट रूप से देखते हैं, कि सब कुछ उसी में अध्यस्त है! जब जीवात्मा इस परम प्रेमानन्द को आत्मसात करने में सफल होती है, तब ईश्वर को सर्व भूतों में देखने लगती है।
इस प्रकार हमारा हृदय प्रेम का एक अनन्त स्रोत बन जाता है। फिर जब हम इस प्रेम की और भी उच्चतर अवस्थाओं में कदम रखते हैं, तब संसार की वस्तुओं में क्षुद्र भेद की भावनाएँ हमारे हृदय से सर्वथा लुप्त हो जाती हैं। तब मनुष्य मनुष्य (नर) के रूप में नहीं दीखता, वरन साक्षात ईश्वर (नारायण) के रूप में ही दीख पड़ता है; पशु में पशु-रूप नहीं दिखायी पड़ता, वरन उसमें भी स्वयं भगवान ही दीख पड़ते हैं; यहाँ तक कि ऐसे प्रेमी की आँखों से बाघ-रूप लुप्त हो जाता है, और उसमें स्वयं भगवान प्रकाशमान दीख पड़ता है। इस प्रकार भक्ति की इस प्रगाढ़ अवस्था में सभी प्राणी हमारे लिये उपास्य हो जाते हैं। श्री विष्णु पुराण में प्रह्लाद जी के चरित्र का उदाहरण देते हुए कहा गया है -

एवं सर्वेषु भूतेषु भक्तिरव्यभिचारिणी । 
कर्तव्या पण्डितैर्ज्ञात्वा सर्वभूतमयं हरिम् ॥९॥ 

' हरि को सब भूतों में अवस्थित जानकर ज्ञानी को सब प्राणियों के प्रति अव्यभिचारिणी भक्ति (केवल एक सर्वशक्तिमान परमेश्वर को ही अपना स्वामी मानते हुए स्वार्थ और अभिमान का त्याग करके, श्रद्धा और भाव सहित परम-प्रेम से भगवान का निरन्तर चिन्तन करना ‘अव्यभिचारिणी’ भक्ति है) रखनी चाहिये।' 
इस प्रगाढ़, सर्वग्राही प्रेम के फलस्वरूप पूर्ण आत्मसमर्पण की अवस्था उपस्थित होती है। तब यह दृढ विश्वास हो जाता है कि संसार में भला-बुरा जो कुछ होता है, कुछ भी हमारे लिये अनिष्टकर नहीं होता। शास्त्रों ने इसी को 'अप्रातिकूल्य' कहा है। ऐसे अनन्य प्रेमी के जीवन में जब कोई दुःख आता है, तो कहता है - " दुःख ! स्वागत है तुम्हारा।" यदि कष्ट आये, तो कहेगा, " आओ कष्ट ! स्वागत है तुम्हारा। तुम भी तो मेरे प्रियतम के पास से ही आये हो । " यदि सर्प आये तो कहेगा," विराजो, सर्प!" यहाँ तक कि मृत्यु भी आये, तो वह अपने अधरों पर मुस्कान लिये उसका स्वागत करेगा। " धन्य हूँ मैं, जो ये सब मेरे पास आते हैं; इन सबका स्वागत है।" 
इस पूर्ण निर्भरता की अवस्था में, भगवान (श्री रामकृष्ण) और जो उनकी संतानें हैं, उन सबके प्रति प्रगाढ़ प्रेम में की खुमारी में भक्त स्वयं को प्रभावित करने वाले गम और ख़ुशी के फर्क को महसूस नहीं कर पाता। इसलिये दुःख-कष्ट आने पर वह तनिक भी विचलित नहीं होता। जहाँ पहुँचकर गम और ख़ुशी का फर्क महसूस ही नहीं होता, तो वह शिकायत किस बात की करे ? ' प्रेम स्वरुप ठाकुर, तेरी इच्छा पूर्ण हो '-- इस अटल शरणागति को प्राप्त कर लेना, सभी प्रकार की भव्य और वीरतापूर्ण उपलब्धियों से भी सचमुच एक बहुत विलक्षण और बहुमूल्य उपलब्धि है !
अधिकांश मनुष्यों के लिये शरीर ही सब कुछ प्रतीत होता है, देह ही उनकी सारी दुनिया है; दैहिक सुख-भोग ही उनका सर्वस्व है। शरीर और दैहिक-भोग से सम्बन्धित वस्तुओं की पूजा करने का भूत हम सब में प्रविष्ट हो गया है। भले ही हम लम्बी-चौड़ी बातें करें, बड़ी ऊँची ऊँची उड़ानें भरे, किन्तु हमारा आचरण गिद्धों के जैसा है, जो उड़ता तो बहुत ऊँचाई पर है, किन्तु उसकी निगाहें नीचे पड़े हुए सड़े-गले मांस के टुकड़े को ही ढूँढ़ती रहती हैं। उसी प्रकार हमारा मन भी सदा सड़े-गले मांस के टुकड़े में ही पड़ा रहता है।
 हम शेर से अपनी शरीर की रक्षा क्यों करें ? हम उसे शेर को क्यों न दे दें। कम से कम उससे शेर की तृप्ति होगी, और यह कार्य आत्मत्याग और उपासना से अधिक भिन्न न होगा। क्या तुम ऐसे एक भाव की उपलब्धि कर सकते हो, जिसमें स्वार्थ की तनिक भी गन्ध न हो ? क्या तुम अपना अहं-भाव सम्पूर्ण रूप से नष्ट कर सकते हो ? यह प्रेम-धर्म की वह चोटी है, सिर को चकरा देनेवाली ऐसी ऊँचाई है, जिस पर बहुत थोड़े से लोग ही चढ़ पाते हैं। किन्तु जब तक मनुष्य इस आत्म-बलिदान के लिये सतत तत्पर और सदा तैयार रहने के इस सर्वोच्च अवस्था को प्राप्त नहीं हो जाता, वह कभी उत्तम भक्त नहीं बन सकता। हम अपने इस शरीर को अल्प अथवा अधिक समय तक भले ही बनाये रख लें, पर उससे क्या ? हमारे शरीर का एक न एक दिन नाश होना तो अवश्यम्भावी है। उसका अस्तित्व चिरस्थायी नहीं है।  'Blessed are they whose bodies get destroyed in the service of others.' " धन्य हैं वे, जो अपने शरीर को दूसरों की सेवा में न्योछावर कर देते हैं।"
' एक साधु पुरुष केवल अपनी सम्पत्ति ही नहीं, वरन अपने प्राण भी दूसरों की सेवा में उत्सर्ग कर देने के लिये, सदैव उद्दत रहता है। इस संसार में जब मृत्यु निश्चित है, तो श्रेष्ठ यही है कि बीमारी से सड़ कर मरने के बजाय, यह शरीर किसी उत्तम कार्य में ही अर्पित हो जाय!' हम भले ही अपने जीवन को पचास वर्ष, या बहुत हुआ तो, सौ वर्ष तक खींच ले जाएँ, पर उसके बाद? उसके बाद क्या होता है? 
जो वस्तु संयोजन से उत्पन्न होती है, वह एक दिन विघटित होकर नष्ट भी होती है। ऐसा समय अवश्य आता है, जब उसे विघटित होना पड़ता है। ईसा, बुद्ध और मुहम्मद सभी दिवंगत हो गये। संसार के सारे महापुरुष और आचार्यगण आज इस धरती से उठ गये हैं। भक्त कहता है, " इस क्षणभंगुर संसार में, जहाँ प्रत्येक वस्तु टुकड़े टुकड़े हो धूल में मिली जा रही है, हमें अपने समय ल सदुपयोग कर लेना चाहिये।" और वास्तव में जीवन का सर्वश्रेष्ठ उपयोग यही है कि उसे सर्व भूतों की सेवा में न्योछावर कर दिया जाय। हमारा सबसे बड़ा भ्रम यह है कि हम शरीर हैं, और चाहे जिस प्रकार हो, हमें इसकी रक्षा करनी होगी, इसे सुखी रखना होगा। और यह भयानक देहात्मबुद्धि ही संसार में सब प्रकार के स्वार्थपरता की जड़ है। 
यदि तुम यह निश्चित रूप से जान सको, कि तुम शरीर से बिल्कुल पृथक हो, तो फिर इस दुनिया में ऐसा कुछ भी नहीं रह जायगा, जिसके साथ तुम्हारा विरोध हो। तब तुम सब प्रकार की स्वार्थपरता के अतीत हो जाओगे। हमें ऐसा रहना चाहिये, मानो हम दुनिया की सारी चीजों के लिये मर गये हों। ' बाज़ार से गुजरा हूँ, खरीद-दार नहीं हूँ ' और वास्तव में यही आत्मसमर्पण है। Let things come as they may. ' जो होने का है, हो!' --यही सच्ची शरणागति है। यही 'तेरी इच्छा पूर्ण हो' का तात्पर्य है। किन्तु इसका तात्पर्य यह नहीं कि हम हर किसी से झगड़ते रहें, गलत कार्यों में संलग्न रहें, पर हर समय यही सोचते रहें, कि हमारी ये सारी कमजोरियाँ और सांसारिक आकांक्षायें भगवान की इच्छा से हो रही हैं। 
हो सकता है कि हमारे स्वार्थपूर्ण प्रयत्नों से भी कुछ भला हो जाय; पर वह ईश्वर देखेगा, उसमें हमारा-तुम्हारा कोई हाथ नहीं। यथार्थ भक्त अपने लिये कभी कोई इच्छा या कार्य नहीं करता। उसके हृदय के अन्तर्तम प्रदेश से तो बस यही प्रार्थना निकलती है, " प्रभो, लोग तुम्हारे नाम पर बड़े बड़े मन्दिर बनवाते हैं, बड़े बड़े दान देते हैं; पर मैं तो निर्धन हूँ, मेरे पास कुछ भी नहीं है। अतः मैं अपने इस शरीर को ही तुम्हारे चरणों में अर्पित करता हूँ। मेरा परित्याग न करना, मेरे प्रभो !" जिसने एक बार इस अवस्था का आस्वादन कर लिया है, उसके लिये परमप्रिय श्रीभगवान् के चरणों में ऐसा चिरस्थायी आत्मसमर्पण कुबेर के धन और इन्द्र के ऐश्वर्य से भी श्रेष्ठ है; नाम-
यश और सुख-सम्पदा की महान आकांक्षा से भी महत्तर है। 
भक्त के शान्त आत्मसमर्पण से हृदय में जो शान्ति आती है, उसकी तुलना नहीं हो सकती, वह बुद्धि के अगोचर है। इस अप्रातिकूल्य अवस्था की प्राप्ति होने पर उसमें किसी प्रकार का स्वार्थ नहीं रह जाता; और तब फिर स्वार्थ में बाधा देनेवाली कोई वस्तु भी संसार में नहीं रह जाती; (जिसे हटाने के लिये उसे क्रोधित होना पड़े।) इस परम शरणागति (=शान्ति) की अवस्था में (- जहाँ गम और ख़ुशी का फर्क भी महसूस नहीं होता) सब प्रकार की आसक्ति समूल नष्ट हो जाती है। तब रह जाती है, केवल प्रेमात्मिका भक्ति या सर्वभूतों की अन्तरात्मा और आधारस्वरूप उस भगवान (श्रीरामकृष्ण) के प्रति 'all-absorbing love' सर्वग्रासी-प्रेम ! भगवान के प्रति प्रेम की यह आसक्ति ही सचमुच ऐसी है, जो जीवात्मा को नहीं बाँधती, बल्कि उसके समस्त बन्धनों को सफलतापूर्वक छिन्न कर देती है। 
============






No comments: