Saturday, May 24, 2014

' विवेकानन्द - दर्शनम् ' (3) - श्री नवनीहरण मुखोपाध्यायः

' विवेकानन्द - दर्शनम् '
३. 
मनुष्य जाति को उसके दिव्य का स्वरुप का पता बता दो - जगत उसे सुनने को बाध्य है !  
(अखिल- भारत- विवेकानन्द- युवमहामण्डलम् अध्यक्षः  श्री नवनीहरण मुखोपाध्यायः विरचित )

[ In this book, within quotes, the words are of Swami Vivekananda. The ideas, of course, are all his.
इस पुस्तिका में, उद्धरण के भीतर लिखे गये शब्द स्वामी विवेकानन्द के हैं। निस्सन्देह विचार भी उन्हीं के हैं। ]


 Sarada Devi (left) and Sister Nivedita

नमस्ते सारदे देवि दुर्गे देवी नमोsस्तुते |
वाणि लक्ष्मि महामाये मायापाशविनाशिनी ||
नमस्ते सारदे देवि राधे सीते सरस्वति |
सर्वविद्याप्रदायिण्यै संसाराणवतारिणी ||
सा मे वसतु जिह्वायां मुक्तिभक्तिप्रदायिनी ||
सारदेति जगन्माता कृपागङ्गा प्रवाहिनी ||



[ शक्ति का उपासक अन्यान्य साधना-मार्गियों की तरह शक्ति (महाविद्या-माँ सारदा देवी) को 'माया' नहीं मानता बल्कि अपनी 'माँ' समझता है जिसकी गोद में रहकर वह सदैव निर्भय रहता है क्योंकि उसकी माँ तो 'कोटि ब्रह्माण्ड नायिका' है जो प्रतिक्षण उसकी रक्षा तथा पालन करती है। वह इतनी प्रकाशमयी है कि मायारूपी अन्धकार स्वत: ही नष्ट हो जाता है।] 
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[ विशुद्ध भावनाज्ञानतत्वप्रख्या च दर्शनम् ]  
 ३.
    आदर्शस्य वर्णनञ्च् कियत् शब्दैः तु शक्यते |
      ब्रह्मत्वञ्च् मनुष्याणामाचारे तत् प्रकाशनम् ||

" My ideal indeed can be put into a few words and that is: to preach unto mankind their divinity, and how to make it manifest in every movement of life."

 " मेरा आदर्श अवश्य ही थोड़े से शब्दों में कहा जा सकता है, और वह है- मनुष्य जाति को उसके दिव्य स्वरुप का उपदेश देना, तथा जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में उसे प्रकट करने का उपाय बताना । " 

प्रसंग -[निवेदिता की 'कोलकाता डायरी'; तथा ७ जून १८९६ को स्वामी विवेकानन्द द्वारा भगिनी निवेदिता को लिखित पत्र।]

विषयवस्तु : 7th June, 1896. को भगिनी निवेदिता को एक पत्र में स्वामीजी लिखते हैं- " यह संसार कुसंस्कारों की बेड़ियों से जकड़ा हुआ है। जो अत्याचार से दबे हुए हैं, चाहे वे पुरुष हों या स्त्री, मैं उन पर दया करता हूँ, परन्तु मेरी दया अत्याचारियों के उपर सबसे अधिक है। एक बात जो मैं सूर्य के प्रकाश की तरह स्पष्ट देखता हूँ वह यह कि अज्ञान ही दुःख का कारण है और कुछ नहीं। जगत को प्रकाश कौन देगा ? भूतकाल में बलिदान ही नियम था, और दुःख है कि युगों तक ऐसा ही रहेगा। संसार के वीरों (हीरो) को और सर्वश्रष्ठों को 'बहुजनहिताय, बहुजनसुखाय ' अपना बलिदान करना होगा। असीम दया और प्रेम से परिपूर्ण सैकड़ों 'बुद्धों'  की आवश्यकता है। 
संसार के धर्म प्राणहीन और विकृत हो चुके हैं; आज जगत को जिस वस्तु की आवश्यकता है वह है - चरित्र! संसार को ऐसे लोग चाहिये जिनका अपना जीवन स्वार्थहीन ज्वलन्त प्रेम का उदाहरण हो। वह प्रेम उनके एक एक शब्द को बज्र के समान प्रभावकारी बना देगा। मेरी धारणा है कि तुममें कुसंस्कार नहीं है। तुममें वह शक्ति विद्द्यमान है जो संसार को हिला सकती है, धीरे धीरे और भी अन्य लोग आयेंगे। 'निर्भीक' शब्द और उससे अधिक निर्भीक (दिलेर) कर्मों की हमें आवश्यकता है।
हे महान आत्माओं, उठो ! उठो ! संसार दुःख से जल रहा है; क्या तुम सो सकते हो ? हम बार-बार पुकारें जब तक सोते हुए देवता न जग उठें, जब तक अन्तर्यामी देव उस पुकार का उत्तर न दें। जीवन में इससे महान कर्म क्या है ? चलते-चलते मुझे भेद-प्रभेद के साथ सभी बातें स्वतः ज्ञात हो जाती हैं। मैं उपाय कभी नहीं सोचता। कार्य-संकल्प का उदय स्वतः होता है और वह निज बल से ही पुष्ट होता है। मैं केवल कहता हूँ, जागो ! जागो !"  
" नोट्स ऑफ़ सम वन्डरिंग्स विथ द स्वामी विवेकानन्द " अर्थात स्वामी विवेकानन्द के साथ भ्रमण' शीर्षक अपनी डायरी  में सिस्टर निवेदिता ने (अमेरिका, 9 अक्टूबर, 12 और 13, 1899 के पन्नों पर) लिखा है -" उन दिनों स्वामीजी अक्सर कहा करते थे - " हिमालय में आओ और 'अहं' ('कच्चा मैं' या देहाध्यास) की भावना से रहित अपने सच्चे स्वरुप 'पक्का मैं' की अनुभूति करो। और जब तुम अपने यथार्थ स्वरुप को जान जाओगी, तब तुम्हारे शब्दों का प्रभाव  इस जगत के ऊपर बज्र के समान- आकस्मिक घटना (bolt from the blue) बनकर टूट पड़ेंगे !  Stand up in your own might. अपने पैरों पर खड़ी हो जाओ ! क्या तुम वैसा कर सकती हो ?
उन व्यक्तियों में मेरा थोड़ा भी विश्वास नहीं है जो यह पूछते हैं, कि 'क्या मेरे उपदेशों को कोई सुनेगा?' अभी तक जगत में इतना साहस नहीं है, कि वह उस व्यक्ति के उपदेश को सुनने से इनकार कर दे, जिसके पास देने के लिये कोई सन्देश है। तो हिमालय में आ जाओ, और सीखो कि अपने सच्चे स्वरुप की अनुभूति कैसे की जाती है!"  
निवेदिता लिखती हैं- " स्वामी विवेकानन्द अपने अनुयायियों के समक्ष जगतगुरु शंकराचार्य रचित 'मोह-मुद्गर' -भज गोविन्दम् मूढ़ मते के १६ श्लोकों की अक्सर आवृति किया करते थे। जिसमें जाति-समाज और परिवार आदि (व्यष्टि) के सभी क्षुद्र संबंधों, मैं और मेरा से छुटकारा पाकर (समष्टि) से जुड़ जाने की प्रेरणा दी गयी है। बलवान इन्द्रियों के पंजों से छुटकारा पाकर मन को अन्तर्मुखी बनाने और आत्मा में स्थित रहने के लिये यह अनुभव कर लेना चाहिये कि किसी पेंड़ की छाँव में धरती को बिछावन मान कर सोने, और पत्तल में खाने से  भी मन को उसी परमानन्द का अनुभव हो सकता है; जो किसी गद्देदार बिछावन या स्वादिष्ट भोजन में मिलता है। स्वामीजी नासमझ लोगों द्वारा की गयी 
'प्रशंसा अथवा निंदा ' दोनों को शरीर में आबद्ध रखने वाला ' घृणित जाल ' समझने जैसी शिक्षाओं को  अपना आदर्श मानते थे। 
वे अक्सर कहते थे, "प्रैक्टिस तितिक्षा," अर्थात तितिक्षा का अभ्यास करो; जिसका अर्थ होता है-
' bearing the ills of the body without trying to remedy' शरीर में होने वाली बिमारियों को, उपचार की कोशिश किये बिना, और उनका स्मरण किये बिना - उन्हें सहन करने का अभ्यास करो। बाद में उन्होंने समझाया - देखो केवल वे प्राचीन सभ्यतायें ही जीवित हैं, जिनमे वैराग्य की भावना प्रचूर मात्रा में थीं। 
कल स्वामी जी ने भगवान शिव के उपर चर्चा करते हुए कहा -" तुम भी काशी विश्वनाथ की तरह जगत को अपनी आत्मा का यथार्थ स्वरुप समझते हुए, ' निरन्तर 'अपनी आत्मा का कल्याण' अर्थात विश्व-कल्याण का चिन्तन करने' के सिवा अन्य कुछ मत करो । 'Even meditation would be a bondage to the free soul, यहाँ तक ​​कि ध्यान करना (meditation) भी किसी मुक्तात्मा के लिये बंधन का कारण होगा, फिर भी विश्व-कल्याण के लिए काशीविश्वनाथ लगातार ध्यान करते रहते हैं! "
हिन्दुओं का यह विश्वास है कि इन महान आत्माओं - ईश्वर के शाश्वत अवतारों की प्रार्थना और ध्यान करने से यह संसार (आवा-गमन का चक्र) एक क्षण में ध्वस्त हो जायेगा। " For meditation is the greatest service, the most direct, that can be rendered." इसीलिये सबसे बड़ी समाजसेवा युवाओं को यह सिखा देना है कि मन को एकाग्र करने की विधि क्या है ? अथवा मनः संयोग कैसे किये जाता है ? क्योंकि जिज्ञासुओं को इस ध्यान-विधि या अष्टांग-पद्धति के अभ्यास की शिक्षा बिल्कुल वैज्ञानिक ढंग से, सबसे अधिक प्रत्यक्ष तौर पर प्रदान की जा सकती है। इसीलिये  हम कह सकते हैं कि मनःसंयोग का अभ्यास करने का प्रशिक्षण देना सर्वोच्च समाज-सेवा है। आज उन्होंने उन्होंने हिमालय के बर्फ और उनमें पिघलती हुई जंगलों की हरियाली के उपर भी चर्चा की और महाकवि कालीदास को उद्धृत करते हुए कहा- " प्रकृति मानो महादेव के शरीर पर अविनाशी सती (eternal Suttee) का निर्माण कर रही है !" 
स्वतंत्रता-प्राप्ति के लिए भारत का अहिंसात्मक संघर्ष, उसकी सर्वोच्च आध्यात्मिक परंपराओं का ही प्रमाण है। जिसे श्री रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद, महर्षि रमण, रवींद्रनाथ टैगोर, वैज्ञानिक जगदीशचन्द्र बोस, गांधी जी, श्री अरविंद, नेताजी सुभाष चन्द्र बोस आदि के रूप में कई महान शिक्षकों द्वारा पुनर्जीवित किया गया। यह जानना भी अत्यन्त दिलचस्प है, कि १८३६ ई ० में श्रीरामकृष्ण के आविर्भूत से लेकर १९४७ के महत्वपूर्ण १११ वर्ष के बीच संकट काल में  ही आविर्भूत हुए थे। 
प्रसिद्ध वैज्ञानिक जगदीशचन्द्र बोस को विदेश भेजने के लिए भारत ने जी जान से कोशिश की। रवीन्द्रनाथ सीधे त्रिपुरा नरेश से पहुँचे चन्दा लेने के लिए स्वामी विवेकानन्द पेरिस में बैठे हुए थे उस सभा में जिसमें उन्होंने विज्ञान पर अपना व्याख्यान दिया था और उन्होंने पत्र लिखा कि विज्ञान पर आज जगदीश चन्द्र बोल रहा है। आज भारत माता का एक सपूत है जो विज्ञान की पताका भी अपने हाथ में लेकर दुनियॉ के आगे–आगे चल रहा है। यह एक अद्भुत बात है कि विश्व इतिहास में कि भारत की ही धरती पर विज्ञान का धर्म ने स्वागत किया। 
इसीलिए यह भारतीय नवजागरण की एक विशेषता है, कि यह धर्म के क्षेत्र से शुरू होता है और विज्ञान को भी गले लगाता है। जो हायर फिजिक्स है, ब्रम्हाण्ड की उत्पत्ति का जो सिद्धान्त है जयंत नार्लीकर जिसमें अपनी एक हैसियत रखते हैं, वो सिद्धान्त कहाँ पहुंचा है? समस्त ब्रम्हाण्ड के पीछे एक पृष्ठभूमीय पदार्थ है उसको एनर्जी कह सकते हैं, और कुछ भी कह सकते हैं, लेकिन उस पृष्ठभूमि पदार्थ के भीतर ही ब्रम्हाण्ड की समस्त मूल स्थितियॉ मौजूद हैं, उनका प्रोजेक्शन होता है। अन्तर सिर्फ इतना ही है कि वेदान्त उसको चिन्मय मानता है और विज्ञान उसको जड़ मानता है। लेकिन खोज जारी है। दोनों दिशाओं से होकर मुख्यतः एकता का जो सिद्धान्त है, जो अनन्तता का सिद्धान्त है, उसकी ओर दुनियाँ बढ़ रही है। विवेकानन्द ने अपनी दूरदृष्टि से इसकी ओर संकेत किया।
 विवेकानन्द ने कहा - " पुरानी परिभाषा थी जो ईश्वर को नहीं मानता वह नास्तिक है, मैं परिभाषा करता हूँ कि जो अपने आप को नहीं मानता, अपने आप पर विश्वास नहीं करता वह नास्तिक है। "  इसलिए भारत के लिए, उनका जो आव्हान था वह यह था, अपने आप पर विश्वास करो और उठकर खड़े हो जाओ। और उन गरीबों के लिए, उन लांछितों के लिए उन जरूरतमंदों के लिए जो कुछ कर सकते हो, वह करो। किन्तु यह मानकर नहीं कि वे गरीब हैं, और रोगी हैं। बल्कि वे स्वयं शिव हैं, और तुम्हारी पूजा को स्वीकार करके तुम्हें आप्त या ब्रह्मविद् मनुष्य बनने का अवसर देने के लिये स्वयं गरीब और रोगी बन कर तुम्हारे सामने खड़े हैं ! इसलिये - ' निल डाउन एंड गिव'!
स्वामी विवेकानन्द के रूप में आविर्भूत वैसे ही एक नेता  देखकर रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने कहा था -मानों पूर्व और पश्चिम दोनों बीच में खडे़ होकर जैसे उन्होंने दोनों गोलाद्धों को उठा लिया और दोनों को बराबरी के साथ संबोधित किया।
पूर्वी गोलार्ध अर्थात प्राचीन भारत की कमियॉ उन्होंने किस रूप में देखीं? उन्होंने कहा कि छः सात आठ शताब्दियों के इस पतन को ध्यान से देखो तो इस प्रचीन भारत के सबसे अच्छे, पढे़ लिखे लोग मनीषी लोग बरसों भर यही सोचते रहे कि लोटा भर पानी दाहिने हाथ से पिएं कि बाएं हाथ से पिएं। हाथ चार बार मॉजे या पॉच बार मॉजे। कुल्ला आठ बार करना चाहिए कि दस बार यह भारतीय मनीषा का, उसकी बुद्धि का घनघोर पतन था और उसने कूल मिलाजुला के धर्म को रसोई घर में घुसा दिया। हमारा धर्म रसोई घर है। हमारा ईश्वर भात की हॉडी है। हमारा मंत्र है छुओ मत, छुओ मत। कुल मिलाजुला कर धर्म ने दुर्बलजनों को और दुर्बल बनाया है। यह धर्म का जो क्षयग्रस्त रूप है इसने भारतीय मत को दुर्बल किया है। उन्होंने धर्म के मामले में, भोजन के मामले में, हर चीज की कसौटी उन्होंने मानी फियरलेसनेस एंड स्ट्रेंग्थ । स्ट्रेंग्थ इज लाइफ एंड वीकनेस इज़ डेथ। जो कुछ खाने पीने से जो कुछ आचरण करने से शान्ति अनुभव करते हो, निर्भयता अनुभव करते हो, वह सब पवित्र है। यह धर्म की एक नयी परिभाषा थी। उपनिषदों के आधार पर दी गयी और यह परिभाषा इतनी उदार थी जिसका सपना सत्यार्थ प्रकाश, या ब्रह्मसमाज कभी नहीं देख सकता था।
 आज संसार का विकास जिस रूप में हो चुका है, उसमें कोई भी समस्या भारतीय स्तर पर केवल राष्टीय स्तर पर हल नहीं की जा सकती। आज दुनियाँ बहुत बदल चुकी है और आज दुनियाँ में जो विभन्न देश एक दूसरे के करीब आये हैं इसका लाभ उठाने की जरूरत है और इसलिए भारत केवल चार्टर ऑफ डिमान्ड पेश करके केवल अपनी मांगे पेश करके अंग्रेजी राज्य का या पाश्चात्य सभ्यता का या दुनियॉ की चुनौतियों का मुकाबला नहीं कर सकता। उसे आत्मश्रद्धा– जिसको कहते थे– सेल्फ कान्फीडेन्स। उस बराबरी के स्तर पर आकर बात करनी चाहिए पश्चिम से। वह कह सकता है कि हम भारतीय एक बडी़ संस्कृति के उत्तराधिकारी हैं और हमारे पास पश्चिम को देने के लिए एक संदेश है इसलिए बराबरी के स्तर पर उसे यह बात रखनी चाहिए कि भारत यूरोप के लिए अमेरिका के लिए, आध्यात्मिकता का संदेश दे सकता है। लेकिन भारत का भी कल्याण तभी होगा जब वह पश्चिम के विज्ञान का भौतिक ज्ञान का राजनीतिक संगठनों का, टीम स्पिरिट का, टीम वर्क का कौशल सीखे। इस तरह पूर्व और पश्चिम के समन्वय का भी उन्होंने रास्ता सुझाया। 

इसीलिए विवेकानन्द ने राजनीति का क्षेत्र तो नहीं चुना लेकिन धर्म के क्षेत्र से उन्होंने भारतीय चित्र के परिष्कार और विस्तार का महत्वपूर्णक कार्य किया। आर्य समाज जो इस्लाम की, सिखिज्म की, क्रिश्चैनिटी की निंदा करता फिर रहा था, शुद्धि का आन्दोलन चलाता था, यह कट्टरपंथ का रास्ता उन्होंने पसंद नहीं किया। उन्होंने ब्रम्ह समाज, प्रार्थना समाज का, जो उच्च भद्र वर्ग के लोगों के बीच ही सीमित था, वह रास्ता भी उन्होंने नहीं चुना। उन्होंने वह रास्ता चुना जिसमें ब्राम्हण, चाण्डाल, स्त्री, पुरूष, शिक्षित,अशिक्षित ,मूर्ख, रोगी इन सबको साथ लेकर आगे बढ़ने का एक आव्हान का मूल्य इस बात में था कि कोई बुरा नहीं हैं। यह उनका बहुत प्रसिद्ध वाक्य है।
 किशोरावस्था में नरेन्द्रनाथ पहले ब्रम्ह समाज के सदस्य थे उन्होने रामकृष्ण परमहंस से हमेशा बहस ही की। उन्होंने सिस्टर निवेदिता से कहा था मैंने हमेशा अपने गुरू से बहस की और इसीलिए मैं भारतीय संस्कृति के पग पग का उसके इंच–इंच का रहस्य जान सका। वे तर्कशील थे। आप जानते हैं अमेरिका जाने से ठीक पहले, कन्याकुमारी की शिला पर उन्होंने तीन दिन तक जो ध्यान किया था वह विश्व धर्मो के इतिहास में ऐसा प्रथम ध्यान है गहरा ध्यान जिसका विषय कोई देवता नहीं था। उसका विषय आत्मतत्व भी नहीं था। उसका विषय था भारत। अपने गुरू के देहावसान के बाद उन्होंने पूरे भारत के कोने कोने की छः वर्षो तक यात्रा की थी, और उसके बाद सारे अध्ययन और अनुध्यान के बाद यूरोप से लौटकर जब वो भारत को संबोधित कर रहे थे, तो उनके सामने ब्रम्ह समाज, थियोसोफी आर्य समाज इन सबकी सीमायें स्पष्ट थी।
उन्होंने कहा कि अगर चुनाव ही करना हो तो भारत का जो धार्मिक चुनाव होगा वो वेदान्त होगा। इस वेदान्त में यह सृष्टि सातवें आकाश में बैठे किसी अलौकिक शक्ति  का क्रीयेशन नहीं है यह प्रोजेक्शन है मूलरूप से हमेशा बना रहता है। [मुण्डक उपनिषद (२. ४-११)

 प्रणवो धनुः शारो ह्यात्मा ब्रह्म तल्लक्ष्यमुच्यते। । 
तमेवैकं जानथ आत्मानमन्या वाचो विमुञ्चथामृतस्यैष सेतुः॥५॥ 

भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः।
क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे॥८॥

हिरण्मये परे कोशे विरजं ब्रह्म निष्कलम्।
तच्छुभ्रं ज्योतिषं ज्योतिस्तद् यदात्मविदो विदुः॥९॥ 

न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः।
 तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति॥१०॥ 

ब्रह्मैवेदममृतं पुरस्ताद् ब्रह्म पश्चाद् ब्रह्म दक्षिणतश्चोत्तरेण। 
अधश्चोर्ध्वं च प्रसृतं ब्रह्मैवेदं विश्वमिदं वरिष्ठम्॥११॥]

यह समूचा का समूचा सतत परिवर्तनशील जगत ब्रम्ह ही है जो इस रूप में अभिव्यक्ति हो गया है। ऐसा नही है किसी ने खडे़ होकर, किसी ने कही बैठकर और ध्यान लगाकर इस दुनियां को बना दिया और जब वह चाहेगा तब इसका नाश हो जायेगा। इस प्रकार परसॉनीफाइड गॉड का जो भी कान्सेप्ट था उस सबको उन्होंने खारिज कर दिया। इसलिए वह धर्म की भी नई व्यवस्था कर सकते थे मानववाद की हयूमैनिज्म की सीमा को भी पहचान सकते थे। और एक दिव्य मानववाद - जीव ही शिव है - की परिकल्पना कर सकते थे।
वह बनारस में अपनी मृत्यु से कुछ पहले आए। वहाँ कुछ विद्यार्थियों ने पुअर रिलीफ़ एसोसिएशन बनाया था, उन्होंने कहा, तुम किसको पुअर, गरीब कहते हो और तुम उसकी सहायता करोगे यह अहंकार तुम्हारे भीतर आया कहां से? ये चेरिटी का, दान देने का और लोगों को ऊपर उठाने का यह जो अभिमान है, उसको छोड़ो। उन्होंने एक नया कानसेप्ट दिया। सर्व गॉड इन मैन एंड बी फ्री। ये जो पत्थर में बने हुए भगवान हैं उनकी पूजा तुमने बहुत दिनों की। लेकिन ये जो जीव रूपी शिव है, जागृत दरिद्र नारायण हैं, वे जो कोटि–कोटि परमात्मा हैं, उनकी सेवा करो और मुक्त हो जाओ। मोक्ष का यह एक नया मार्ग है। उन्होंने संन्यासियों को इस काम में उतार दिया और इस तरह से हजारों वर्षो के संन्यास के इतिहास में उन्होंने एक नया अध्याय जोड़ा है।

विश्व  के समस्त धर्मों को एक साथ समेट सकने की एक शक्ति,  एक विराट आध्याम्तिक संपदा ले कर जिस प्रकार विवेकानन्द आविर्भूत हुए थे,  वे कह सकते थे द्वैत भी सही है, विशिष्टताद्वैत भी सही है। वे  वेदान्त की व्याख्याओं को लेकर जितनी पुरानी बहसें हैं उन सब पर आधिकारिक कमेन्ट कर सकते थे। किन्तु आर्यसमाज या ब्रह्मसमाज या ऐसा कोई विचार भारतीय नवजागरण की सब धाराओ को समेट नही सकता था; सबको संबोधित नहीं कर सकता था जैसा कि गाँधीजी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय राजनीतिक जागरण काल में हुआ। जिस प्रकार स्वामी जी सभी धर्मों  के बीच अविरोध या समन्वय स्थापित करने में सक्षम व्यक्ति थे, गांधी जी भी भारतीय राजनितिक आन्दोलन के स्वाभाविक नेता इसलिए हो सकते थे कि वह सब धाराओं एक साथ समेट सकते थे । पढ़े लिखे लोगों की कांग्रेस पार्टी में कमी नहीं थी लेकिन ठीक स्वामीजी के समान भारत की  समस्त राजनितिक विचार धाराओं को समेटने का विराट राजनीतिक अनुभव ले कर केवल गांधी जी ही आये थे।

विवेकानन्द ने भारत की आने वाली केवल आजादी ही नहीं बल्कि उसकी जो विश्वस्तर पर आयी भूमिका है, उसकी ओर संकेत किया था । मद्रास  अभिनंदन के उत्तर में उन्होंने कहा था कि मान लो कि सारे देवता सो रहे हैं और आज से केवल एक देवता की उपासना शुरू कर दो । वह देवता है भारत। १८९७ में ही उन्होंने कहा था अगले 50 वर्षो के लिए भारत को ही अपना जागृत देवता बना लो। कलकत्ते में वह कह रहे थे अगले 50 वर्षों के लिए भारत को अपना देवता बना लो और उसकी उपासना करे। और इसके ठीक ५० वर्ष बाद १९४७ में भारत आजाद हो गया।
क्रिश्चैनिटी की भी उन्होंने सीमा बताई। क्रिश्चियन आदर्श है – पड़ोसी को अपना भाई मानो। भई ही क्यों, तुम स्वयं वह हो। वेदान्त के हिसाब से उन्होंने कहा कि तुम्ही वह हो। सर्वभूतस्थ–मात्मानम् सर्वभूवानि चात्मानि। तुम अपने आप की सेवा कर रहे हो। जितना ही अधिक से अधिक लोगों की सेवा करते हो तुम अपने आप की सेवा करते हो। उन्होंने इसका संकेत किया कि भारत के पास दुनियाँ को देने के लिए एक संदेश है लेकिन यह संदेश वह तभी दे सकता है जब भूख और गरीबी और अकाल के मारे हुए जो करोड़ों करोड़ लोग हैं, बुनियादी जरूरतों को पूरा करने में जी जान से लग जायं, और यही एक विशिष्टता है जो भारतीय नवजागरण के सभी चिन्तकों से विवेकानन्द को अलग करती है। बाकी किसी नेता के चिन्तन के केन्द्र में ये गरीब नहीं हैं। विवेकानन्द के भारतीय व्याख्यानों की ये जो विशेषता है, करोड़ों–करोड़ों दलितों और गरीबों को अपने विचार के केन्द्र में रखो और इसीलिए दूसरे जो धार्मिक उपदेशक हैं, इन लोगों की तुलना में विवेकानन्द ने यह कहा कि गरीबों के लिए तो रोटी ही ईश्वर है, भूखे पेट को तुम आध्यात्म का, धर्म का उपदेश दिये जा रहे हो इससे उसकी दुर्बलता और बढ़ेगी।
उनकी वाणी ने, उनके संदेश ने, एक ठोस आकार भी लिया जिसमें भारतीय जन जीवन को, विशेष रूप से गरीबों को भगवान मानकर उनकी सेवा का आदर्श आगे बढ़ा। दरिद्र देवो भव, गरीबों के लिए पाठशालाएं खोलो, उन्हें शिक्षित करों, रोगी देवो भव। रोगियों के उपचार के लिए अस्पताल खोलो, औषध दो, पथ्य दो। उन्होंने देश को ठोस काम में लगाया।  आप जानते हैं कि थियोसोफी ने उस समय जो भूतप्रेत का चक्कर चलाया था, भूतों और प्रेतों की जो आत्माएं बुलायीं जाती थीं और उन आत्माओं से अतीत, वर्तमान और भविष्य की बातें पूछी जाती थीं। कहा जा रहा था कोई एक गुप्त लोक है जहां तमाम महान आत्मायें रहती हैं और उन लागों के आदेश से यह दुनियां चला करती है। विवेकानन्द ने कहा, इस राहस्यवाद के पीछे बिल्कुल न जाओ। उन्होंने कहा,  यह जो धर्म के नाम पर नया रहस्यवाद चल रहा है, यह जो नया भूत प्रेतवाद चल रहा है, यह आदमी को दुर्बल बनाता है।यह आदमी को कमजोर बनाता है। यह आपने ऊपर विश्वास करना नहीं, भूत प्रेत पर विश्वास करना सिखाता है। उन्होंने एक नई परिभाषा दी। 
पुरानी परिभाषा थी जो ईश्वर को नहीं मानता वह नास्तिक है, मैं परिभाषा करता हूँ कि जो अपने आप को नहीं मानता, अपने आप पर विश्वास नहीं करता वह नास्तिक है। इसलिए भारत के लिए, उनका जो आव्हान था वह यह था, सेल्फ कान्फीडेन्स, आत्म श्रद्धा,  अपने आप पर विश्वास करो और उठकर खड़े हो जाओ। और उन गरीबों के लिए, उन लांछितों के लिए उन जरूरतमंदों के लिए जो कुछ कर सकते हो, वह करो। यह मानकर नहीं कि वे गरीब हैं, और रोगी हैं।
 विधवाओं की शादियाँ हो जाने से क्या नारी पराधीनता की समस्या हल हो जाएगी? हो सकता है नयी समस्याएं बढ़ जाएं। इसीलिए भारतीय नवजागरण में नया अध्याय जोड़ने के ख्याल से उन्होंने कहा स्त्री पराधीनता को दूर करना है, उसको स्वावलम्बी बनाना है तो उसको शिक्षित करो। और वहां से हट जाओ। उसका नेतृत्व उसके भीतर से ही विकसित होना चाहिए। स्त्री नेतृत्व। इसके लिए उन्होंने सरला घोषाल से बात भी की थी। उन्होंने कहा भारत अगर मेरी बातों का सही उत्तर नहीं देगा तो मुझे पश्चिम से नेतृत्व चुनना पड़ेगा और उन्होंने सिस्टर निवेदिता को बुलाया।
मानववाद की सीमा क्यों थी धर्म बनाम विज्ञान मनुष्य बनाम ईश्वर तर्क बनाम श्रद्धा और चर्च बनाम इस्टेट की जो लम्बी लड़ाई चली, उस लम्बी लडा़ई में ईश्वर को खण्डित करके मनुष्य को प्रतिष्ठित किया गया। धर्म को खण्डित करके विज्ञान की पताका फहराई गयी और चर्च की जगह पर स्टेट पावर को सब कुछ माना गया और इसीलिए एक सेक्यूलिरिज्म की अवधारणा आई जिसमें राज्य ही सब कुछ है। लेकिन कुल मिला जुलाकर मनुष्य की जो नैतिक ऊचाई है, कुल मिलाजुला के उसकी जो मानवीय सार्थकता है, उसकी जो आध्यात्मिक पिपासा है उसको देने के लिए सेक्यूलिरिज्म के पास कुछ नही है। वह मनुष्य को कुल मिलाजुलाकर इन्द्रिय और बुद्धि के बीच का या कहना चाहिए इन दोनों से मुक्त कोई एक तत्व मानता है। हद से हद। 
भारत की प्यास इससे नहीं बुझ सकती थी और इसीलिए भारत के आने वाले बाद के राज नेताओं के चिन्तन में धर्म इसीलिए, समेट लिया गया है और एक  इलाहाबाद हाईकोर्ट का अयोध्या  पर फैसला भी इस बात को बताता है कि कुछ लोग अपने जीवन में नास्तिक हो सकते है कुछ लोग ईश्वर का खण्डन कर सकते हैं आप अपने व्यक्तिगत जीवन में कुछ भी हो सकते हैं, लेकिन समग्र भारतीय जीवन को संबोधित करने के लिए आपको सभी धर्मों में समन्वय करना होगा ; अर्थात सभी धर्मों को परस्पर 'अविरोध ' में समेटना पड़ेगा।
पश्चिम का दुर्भाग्य यह भी था कि उसकी धार्मिक चेतना केवल बाईबिल तक ही सिमटी हुई थी, वह नवीन वैज्ञानिक अनुसंधानों पर भी विश्वास करने को तैयार नहीं थी। वह इतनी संकीर्ण थी कि विज्ञान से टकरा गयी। आज एक छोटा बच्चा जानता है कि पृथ्वी सूर्य के इर्दगिर्द घुमती है, मगर उस वक्त़ अपने गणित के आधार पर उसे प्रमाणित करनेवाले गियार्दानो ब्रूनो, को जिंदा जला दिया गया। वहाँ के वैज्ञानिकों की क्या स्थिति हुई?  कहा जाता है कि अपनी जान बचाने का विकल्प उसके सामने था, बशर्ते वह अपने गणित को खारिज कर देता। किन्तु ब्रूनो ने क्राईस्ट को नहीं बल्कि ग्रन्थ और अवतारवाद पर आधारित चर्चिनिटी  को  चुनौती दी थी।  चर्च ने विज्ञान की चुनौतियों का जवाब देने की बजाये- उससे लोहा लिया। 
विज्ञान और धर्म के बीच की टक्कर में यूरोप का इतिहास खून से रंगा हुआ है।  धर्म बनाम विज्ञान, तर्क बनाम श्रद्धा, मनुष्य बनाम  ईश्वर, और चर्च के विरुद्ध इस्टेट की जो लम्बी लड़ाई चली, उस लम्बी लडा़ई में ईश्वर और धर्म को खण्डित करके मनुष्य को प्रतिष्ठित किया गया। धर्म को खण्डित करके विज्ञान की पताका फहराई गयी और चर्च की जगह पर स्टेट पावर को सब कुछ माना गया।  मात्र ग्रन्थ एवं अवतार-वाद पर आधारित धर्म के आवरण को भेदते हुए बिल्कुल सेक्युलर आधारों पर ज्ञान की विवेचना उसके बाद ही प्रारम्भ हुई।
मार्क्सवाद या साम्यवाद के नाम पर सेक्यूलिरिज्म की एक ऐसी अवधारणा सामने आई जिसमें राम-राज्य को नहीं बल्कि धर्म को अफ़ीम समझने वाली निरंकुश राज्य-सत्ता को ही सर्वोपरि माना गया । लेकिन मनुष्य की जो नैतिक ऊचाई है, कुल मिलाजुला के उसकी जो मानवीय सार्थकता है, उसकी जो आध्यात्मिक पिपासा है उसको देने के लिए सेक्यूलिरिज्म के पास कुछ नही है।
भारत की आध्यात्मिक पिपासा  इस चार्वाक दर्शन से नहीं बुझ सकती थी, यहाँ हजारों सालों से प्रत्येक मनुष्य को धार्मिक स्वतंत्रता प्राप्त थी। कुछ लोग अपने जीवन में नास्तिक हो सकते है-ईश्वर का खण्डन कर सकते हैं, कुछ लोग द्वैतवादी, कुछ विशिष्टाद्वैत वादी, तो कुछ अद्वैतवादी या एकेश्वरवादी भी हो सकते हैं। आप अपने व्यक्तिगत जीवन में हिन्दू-मुसलमान-नास्तिक कुछ भी हो सकते हैं, लेकिन समग्र भारतीय जीवन को संबोधित करने के लिए आपको सभी धर्मों में -प्रकृति के विरुद्ध संघर्ष करने के लिये जो उपाय बताये गए हैं - उनमें समन्वय लाना पड़ेगा। धार्मिक कट्टरता को समेटना ही पड़ेगा।
अगर इस विशाल देश को विभिन्न धर्मो को मानने वाले करोड़ो– करोड़ जन समुदाय को इकट्ठा करना चाहते हों तो धर्म के बारे में तुम्हारी एक गंभीर नीति अपनानी होगी; और वह गंभीर नीति एक्सेप्टेन्स की हो सकती थी निगेशन (असहमति ) की नहीं हो सकती थी।  क्योंकि चीन, जहाँ की सत्ताधारी पार्टी में सबसे अधिक कम्युनिस्ट मेम्बर हैं; धर्म की समस्या को वह केवल इस असहमति के भरोसे आज तक हल नहीं कर सका है। सारी दुनियाँ के लोग बडी़ संख्या में नास्तिक नही हो सकते है।
लेकिन भारत की एक दूसरी स्थिति थी। यहाँ का वेदान्त जिस ऊँचाई पर था और जिन तत्वों की खोज में लगा था, वास्तव में वैज्ञानिक अनुसंधान के जरिये, विशेष रूप से हायर फिजिक्स के अनुसंधानों के जरिये, जिस ब्रम्हाण्ड की एकता, सृष्टि की अनन्तता का सिद्धान्त आ रहा था, वह भारत को स्वीकार्य था। उससे भारत का सत्य और सही प्रमाणित हो रहा था और इसीलिए विज्ञान की खोजों का भारत ने कभी विरोध नहीं किया।
इनमें से सब लोगों ने पश्चिम का इतिहास खूब ठीक ठाक से पढ़ा था, और इसीलिए सर्वधर्म समभाव की संकल्पना यहां पर उदित हुई। यह आगे बढ़ा हुआ कदम था जो भारतीय परिवेश से निकला था और ख्याल कीजिए शिकागो में अपने पहले भाषण में उन्होंने जो पहला वाक्य कहा था वो यही कहा था कि मैं चार हजार वर्ष पुरानी सभ्यता की ओर से तुम लोगों को यह बोलने आया हूँ,(उससे पहले सब लोग कह चुके थे कि मेरा धर्म सही है, बाकी धर्म गलत हैं। उन्होंने कहा था मैं यह कहने आया हूँ) कि हम लोग मानते हैं कि सभी धर्म सत्य हैं, सत्यानुसंधान के मार्ग हैं और हम महज सहिष्णुता में नहीं विश्वास करते, हमलोग सर्वधर्म समन्वय को स्वीकार करते हैं ! टॉलरेन्स तो बहुत छोटा मूल्य है, हम इससे बडा़ मूल्य अपने सामने रखते हैं हम सबको स्वीकार कर सकते हैं। नॉट ओनली टॉलरेन्स बट युनिवर्सल एक्सेप्टेन्स। आई ऐम प्राउड टू बिलांग टु ए रिलिजन व्हिच हैज टॉट द वर्ल्ड बोथ टॉलरेन्स ऐन्ड युनिवर्सल एक्सेप्टेन्स वी बिलीव नॉट ओनली इन युनिवर्सल टॉलरेशन बट वी एक्सेप्ट आल रिलीजन्स ऐज ट्रू । हम सभी मतों को सरत्यानुसंधान के विविध मार्गों के रूप में स्वीकार करते हैं। यह एक नई आवाज थी इसीलिए यूरोप ने उसको ध्यान से सुना और यह आगामी भारत के लिए भी एक संकेत था।  कि अगर इस विशाल देश को विभिन्न धर्मो को मानने वाले करोड़ो– करोड़ जन समुदाय को इकट्ठा करना चाहते हों तो धर्म के बारे में तुम्हारी एक गंभीर नीति होनी चाहिए और वह गंभीर नीति एक्सेप्टेन्स की हो सकती थी निगेशन की नहीं हो सकती थी क्योंकि चीन, जिसमें सबसे अधिक कम्युनिस्ट मेम्बर हैं वहां की पार्टी में, धर्म की समस्या को वह केवल इसके भरोसे आज तक हल नहीं कर सका है। सारी दुनियाँ के लोग बडी़ संख्या में नास्तिक नही हो सकते है।
 एकमात्र रास्ता नास्तिकता ही नहीं है, इस समस्या का एक हल भारत ने सुझाया है अपनी बडी़ राजनीतिक प्रयोगशाला में सुझाया है और इससे दुनियॉ भी सीख सकती है। और यह मैं कहना चाहता हूँ कि इसका पहला संदेश स्वामी विवेकानन्द ने सूत्रबद्ध किया था। दूसरे उन्होंने अपने व्याख्यानों में इस बात को बार बार कहा भारतीय संस्कृति में एक नया जागरण एक नया अध्याय जोडना चाहते हो तो धर्म को समेटना होगा।
विभिन्न धर्मों में प्रचलित पारम्परिक अवतारवाद का सिद्धान्त भारत की वर्तमान आवश्यकता की आपूर्ति नहीं कर सकता। " 
स्वामी विवेकानंद ने दुनिया के दो बड़े मजहब, हिंदू धर्म और इस्लाम धर्म की बीच आपसी सहकार-  या " गंगा-जमुनी तहजीब " को स्पष्ट करते हुए कहा था कि 'हमारी मातृभूमि, दो संस्कृतियों - हिन्दू और मुस्लिम की मिलनस्थली है। मैं अपने मानस नेत्रों से देख रहा हूँ - कि आज के संघात और बवंडर के अंदर से ही ' वेदान्त का मस्तिष्क और इस्लाम का शरीर  लेकर ' एक भारत श्रेष्ठ भारत - अपराजेय भारत ' का आविर्भाव होगा !
 जगदीश चन्द्र बोस ने कहा था - "ऐन अवतार्स -डॉक्ट्रिन  कुड नोट सप्लाई इंडिया'ज़ प्रेजेंट नीड ऑफ़ अ रिलिजन ऑल- एम्ब्रसिंग, सेक्ट-युनाइटिंग,ई.टी.सी ."-  भारत की वर्तमान आवश्यकता की एक ऐसे नेता की है, जो सार्वभौम-धर्म (वेदान्त) में विश्वासी हो और जो विश्व के सभी विभिन्न सम्प्रदायों और मतों को गले लगा सके और सभी संप्रदाय में परस्पर सौहार्द और भाईचारे के साम्य को स्थापित कर सके।  
 गुलामी की मानसिकता से ग्रस्त भारत को जाग्रत करने की पहली शर्त या प्राथमिक आवश्यकता थी उसके खोये हुए सेल्फ कान्फीडेन्स, आत्म श्रद्धा को लौटा देने की तथा  ' एकं सत्य विप्राः बहुधा वदन्ति ' रूपी वेदान्ती साम्यवाद के आधार पर सभी धर्मों के बीच परस्पर सौहार्द और भाईचारे - 'सर्वधर्म समन्वय' को स्थापित करने की !  इसीलिये उन्होंने मानवता को मेल-फीमेल या हिन्दू-मुस्लिम-सिख -ईसाई में विभाजित न करते हुए कहा था - " ईच सोल इज पोटेन्शली डिवाइन - प्रत्येक आत्मा अव्यक्त ब्रह्म है " -अर्थात प्रत्येक जीव संभावित ईश्वर है ! और अपने ईश्वरीय स्वरूप को अभिव्यक्त करना ही मानव-जीवन का चरम लक्ष्य है।
उन्होंने कहा – बुरे से अच्छे की ओर यात्रा नहीं होती। अच्छे से और अच्छे की ओर यात्रा होती है।  इसीलिए रवीन्द्रनाथ ने कहा – विवेकानन्द में सब कुछ पॉजिटिव है - देयर इज़ आल पॉजिटिव। सब कुछ सकारात्मक है। तुम अच्छे हो, थोड़ा और अच्छे हो जाओ। भारत जाग गया है। थोड़ा और इसको जगाने की जरूरत है। इसीलिए उन्होंने मूर्ति पूजा की निन्दा नहीं की, इसीलिए उन्हों अवतारवाद की निंदा नहीं की और इसलिए भारतीयों को भी महज कोसने में सारी ताकत नहीं लगा दी। उन्होंने लोकाचारों के पार धर्म का प्रशस्त, उदात्त, ऊँचा आदर्श तो दिखलाया, लेकिन उन्होंने कहा कि उसकी ओर तुम क्रमश: ही चल सकते हो?। धीरे–धीरे ही आगे बढ़ सकते हो। और इसीलिए उन्होंने कठोर आलोचना का, कठोर भर्त्सना का रास्ता अपनाकर अपने स्वभाव के अनुसार उन्नति करने का आव्हान किया। व्यक्ति को भी, व्यक्ति के बाहर भी, व्यक्ति के भीतर भी, भारत को और भारत के बाहर भी, सब कुछ बदलने पर, और सबको जोड़कर साथ चलने पर जोर दिया। संक्षेप में यही उनके संदेश का सार है। 
सेक्युलरिज्म मनुष्य को केवल पशुओं के जैसा ' आहार-निद्रा-भय -मैथुन ' में संलग्न  - इन्द्रियखाओ-पीयो मौज करो' में बाधा न पहुँचे - ऐसा दो पाया जन्तु मानता है । लेकिन भारत की एक दूसरी स्थिति थी। भारत एक धर्म-प्राण देश है; हमारे ऋषियों ने कहा है -

आहार-निद्रा-भय-मैथुनश्च सामान्यम् एतद्पशुभिर्नराणाम्।
धर्मो हि तेषाम् अधिको विशेषः धर्मेण हीनः पशुभिः समानः॥ !


पशु प्रकृति (आहार-निद्रा-भय मैथुन ) के विरुद्ध संघर्ष नहीं कर सकता, किन्तु मनुष्य में विवेक-शक्ति होती है, इसके बल पर वह प्रकृति के विरुद्ध संघर्ष करके स्वयं को पशु-मानव से देव-मानव में रूपान्तरित सकता है। 
जब कोई नेतृत्व-प्रशिक्षु आप्त -पुरुष बन जाता है, तब वह इस जगत की घटनाओं (विभिन्न सम्प्रदायों के बीच चलने वाले झगड़ों ) को देखकर विचलित नहीं होता। तब इस जगत  रूपी टेलीविजन धारावाहिक का कोई सीन यदि पसन्द नहीं आ रहा हो तो वह उस दृश्य को फ़ास्ट-फॉरवर्ड मोड में डाल कर अपने सत्य-स्वरूप में स्थित रह सकता है।  स्वामी विवेकानन्द ने वैदिक ऋचा " संगच्ध्वं संग्वदध्वं संग वो मनांसि जानताम्" को उद्धृत करते हुए कहा था- " सफलता का सम्पूर्ण रहस्य "संगठन" में है, शक्ति संचय में है और इच्छा -शक्ति के समन्वय में है। इसी लिए प्रकृति के विरुद्ध संघर्ष करके यथार्थ मनुष्य बनने के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये संघ बद्ध हो कर आगे बढो!नास्तिकता ही एकमात्र रास्ता नहीं  है, इस समस्या का एक हल भारत ने सुझाया है, अपनी बडी़ राजनीतिक प्रयोगशाला में सुझाया है और इससे दुनियॉ भी सीख सकती है। मानव-जाति में एकता को स्थापित करने वाले इस ' संघ-मंत्र ' को पढ़ने के बाद ही गाँधीजी  ने कहा था - ' स्वामी विवेकानन्द को पढ़ने के बाद मेरी देशभक्ति हजार गुना बढ़ गयी!' और उनके निर्देशानुसार ही उन्होंने  स्वाधीन भारत में वेदान्ती साम्यवाद पर  आधारित भारत में राम-राज्य स्थापित करने पर बल दिया था। आर्यसमाज या ब्रह्मसमाज या ऐसा कोई विचार भारतीय नवजागरण की सब धाराओ को समेट नही सकता था, सबको संबोधित नहीं कर सकता था, इसलिये  गांधी जी उनके स्वाभाविक नेता हो सकते थे; क्योंकि वे सब सम्प्रदायों को एक साथ समेट सकते थे।  किन्तु  स्वाधीन भारत की राष्ट्रीय राजनीति में वोटबैंक -पोलिटिक्स का प्रवेश हो गया, जिसके कारण उनके बाद के काँग्रेसी राज नेताओं के चिन्तन से सर्वधर्म समन्वय या राम-राज्य की परिकल्पना ही विलुप्त हो गयी। और अपने को कट्टर कम्युनिस्ट या कट्टर धर्मनरपेक्ष प्रदर्शित करने के चक्कर में उन्होंने सर्वधर्म समन्वय को स्यूडो सेक्यूलिरिज्म में परिणत कर दिया ।
यहाँ का वेदान्त जिस ऊँचाई पर था और जिन तत्वों की खोज में लगा था, वास्तव में वैज्ञानिक अनुसंधान के जरिये, विशेष रूप से हायर फिजिक्स के अनुसंधानों के जरिये, बिगबैंग- थ्योरी जिस ब्रम्हाण्ड की एकता, सृष्टि की अनन्तता का सिद्धान्त आ रहा था, वह भारत को स्वीकार्य था। उससे भारत ऋषियों द्वारा आविष्कृत सत्य वैज्ञानिक कसौटी पर भी सही प्रमाणित हो रहा था और इसीलिए विज्ञान की खोजों का भारत ने कभी विरोध नहीं किया।
स्वामी विवेकानंद न सिर्फ धार्मिक कट्टरता और रूढि़वाद के विरोधी थे, बल्कि साम्प्रदायिकता और धर्मान्धता को भी इंसानियत का दुश्मन मानते थे।  स्वामी विवेकानंद विश्व बंधुत्व ही नहीं - ' एकं सत्य विप्राः बहुधा वदन्ति ' रूपी वेदान्ती साम्यवाद में प्रतिष्ठित वैश्विक एकत्व के बेखौफ प्रवक्ता थे। उनके दिल में सभी धर्मों का समान रूप से सम्मान था। उनकी नजरों में धर्म एक अलग ही मायने रखता था। उनका कहना था- 'अगर कोई यह ख्वाब देखता है कि सिर्फ उसी का धर्म बचा रह जाएगा और दूसरे सभी नष्ट हो जाएंगे, तो मैं अपने दिल की गहराइयों से उस पर तरस ही खा सकता हूं। जल्द ही सभी झंडों पर, कुछ लोगों के विरोध के बावजूद यह अंकित होगा कि लड़ाई नहीं दूसरों की सहायता, विनाश नहीं मेलजोल, वैमनस्य नहीं बल्कि सद्भाव और शांति। इसीलिए सर्वधर्म समभाव की संकल्पना यहां पर उदित हुई।

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