Saturday, May 31, 2014

' विवेकानन्द - दर्शनम् ' - श्री नवनीहरण मुखोपाध्यायः (11)

' विवेकानन्द - दर्शनम् ' 
११. 
श्रीरामकृष्ण परमहंस जीवनमुक्त और आचार्य दोनों थे ! 

(अखिल- भारत- विवेकानन्द- युवमहामण्डलम् अध्यक्षः  श्री नवनीहरण मुखोपाध्यायः विरचित )
 [ In this book, within quotes, the words are of Swami Vivekananda. The ideas, of course, are all his.
इस पुस्तिका में, उद्धरण के भीतर लिखे गये शब्द स्वामी विवेकानन्द के हैं। निस्सन्देह विचार भी उन्हीं के हैं। ] 

 
श्री श्री माँ सारदा  

नमस्ते सारदे देवि दुर्गे देवी नमोsस्तुते |


वाणि लक्ष्मि महामाये मायापाशविनाशिनी ||


नमस्ते सारदे देवि राधे सीते सरस्वति | 


सर्वविद्याप्रदायिण्यै संसाराणवतारिणी ||


सा मे वसतु जिह्वायां मुक्तिभक्तिप्रदायिनी ||


सारदेति जगन्माता कृपागङ्गा प्रवाहिनी ||


विशुद्ध भावनाज्ञानतत्वप्रख्या च दर्शनम्
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हिन्दी अनुवाद की भूमिका 

यह महामण्डल पुस्तिका मेरे हाथों में १९९३ के वार्षिक युवा प्रशिक्षण शिविर में आई थी। तब से मैंने इसको अनगिनत बार पढ़ा है। किन्तु इस पुस्तिका में स्वामी जी द्वारा अंग्रेजी में कहे गये जिन उक्तियों को उद्धरण के भीतर (within quotes) रखा गया है, वहाँ इन उक्तियों को 'Complete Works of Swami Vivekananda' के किस खण्ड से लिया गया है, इस सन्दर्भ को सूचित नहीं किया गया है। तत्वज्ञान से परिपूर्ण इस पुस्तिका का अनुवाद करने के लिये स्वामी जी ने किस प्रसंग में इन उक्तियों को कहा होगा, इसे समझना बहुत जरुरी था। 

'गूगल बाबा' के कृपा से नेट पर अंग्रेजी में सारे प्रसंग और सन्दर्भ मिल गये, किन्तु अद्वैत आश्रम, कोलकाता तथा मायावति से हिन्दी में प्रकाशित 'विवेकानन्द साहित्य' अभी तक नेट पर उपलब्ध नहीं है। इसका क्या कारण है, यह मुझे नहीं पता। इसीलिये मैंने स्वामी विवेकानन्द द्वारा अंग्रेजी में कथित उक्तियों को हिन्दी में अनुवाद करते समय अपने सन्तोष के लिये विवेकानन्द साहित्य से लगभग पूरे निबंध को ही फिर लिख दिया है, और जहाँ आवश्यक लगा है, कुछ पन्नों को स्वयं भी अनुवादित किया है।

जिस प्रकार आधुनिक भौतिक विज्ञान (modern physics ) में, पहले तथ्यों को बड़े धैर्य के साथ प्रयोगात्मक पद्धति (Experimental method) के द्वारा परिक्षण करने के बाद, उससे उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर सिद्धान्त (theory) को सत्यापित किया जाता है।  ठीक उसी प्रकार हम स्वामी विवेकानन्द के व्याख्यान ' मनोविज्ञान का महत्व ' को गहराई से अध्यन करके यह समझ सकते हैं कि विज्ञानों का विज्ञान- (Science of Sciences) 'मनोविज्ञान' या (दी साइन्स अव साइकालजी) ही है! महामण्डल पुस्तिका 'मनःसंयोग' में वर्णित प्रयोगात्मक पद्धति (Experimental method) के द्वारा परिक्षण करने के बाद, उससे प्राप्त आंकड़ों के आधार पर स्वयं इस सिद्धान्त को परख कर देख सकते हैं, कि ' अपने चित्त की गहन से गहन गहराई में यथार्थ मनुष्य है-आत्मा !' (Deep, deep within, is the soul, the essential man, the Âtman.) 
इसलिये इस सर्वश्रेष्ठ विज्ञान 'मनोविज्ञान' (साइकालजी) को भारत में 'मनःसंयम' (Mental Concentration) 'मानसिक एकाग्रता' कहते हैं। इस विज्ञान का अध्यन भी 'Modern Physics' के अनुरूप पहले प्रयोग (experiment) करके उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर और बाद में सिद्धान्त (theory) को सत्यापित किया जा सकता है। अन्य पार्थिव विज्ञानों की ही तरह, जिस किसी जाति, धर्म या देश में जन्मा जो भी व्यक्ति महर्षि पतंजलि (मनोविज्ञान सर्वश्रेष्ठ विज्ञान है इसलिये इसके सर्वश्रेष्ठ वैज्ञानिक को महर्षि या ऋषि कहते हैं) द्वारा आविष्कृत 'पातंजल योग सूत्र' में दिये गये निर्देशों के अनुसार प्रयोग  करने की 'पात्रता' (eligibility:यम-नियम का पालन) अर्जित कर लेगा, उसे मनःसंयोग (आसन,प्रत्याहार,धारणा) का अभ्यास (एक्सपेरीमेन्ट) करके, अपने मन का अध्यन और विश्लेषण करने से जो तथ्य और आँकड़े उपलब्ध होंगे, उसका परिणाम होगा -अपने सच्चे स्वरुप (ब्रह्मत्व) की उपलब्धि !
जिस प्रकार विश्व भर के भौतिक शास्त्री (Physicists) प्रायः एक ही परिणाम पर पहुँचते हैं, उन्हें जिन सामान्य प्राकृतिक नियमों (general facts) का पता लगता है, और उनके अनुगामी बाद में उसी पद्धति से प्रयोग करके जिस निष्कर्ष (सिद्धान्त) पर पहुँचते हैं, उनके विषय में उनमें कोई मतभेद नहीं होता। उसी प्रकार मनःसंयोग के अभ्यास (एक्सपेरीमेन्ट) करने की पात्रता रखने वाले सभी संभावित मनोवैज्ञानिक (ऋषि या पैग़म्बर) भी एक ही निष्कर्ष (सिद्धान्त) पर पहुँचते हैं- जिन्हें भारत में महावाक्य या सार्वभौमिक तथ्य (universal facts) कहा जाता है। वैदिक ऋषियों के द्वारा अविष्कृत चार प्रमुख  महावाक्य इस प्रकार हैं -
१. प्रज्ञानं ब्रह्म (ऐतरेय उपनिषद ३/५/३)
ब्रह्म शुद्ध ज्ञान स्वरूप है
२. अहम् ब्रह्मास्मि (शतपथ ब्राह्मण ४/३/२/२१)
मै ब्रह्म हूँ
३. तत् त्वमसि (छान्दोग्य उपनिषद ६/८/७)
वह ब्रह्म तुम भी हो
४. अयमात्मा ब्रह्म (माण्डूक्योपनिषद २)
यह आत्मा ब्रह्म है
ये महावाक्य ही ऐसे तथ्य तथा आँकड़े हैं, जिन्हें सर्वश्रेष्ठ विज्ञान मनोविज्ञान के महान वैज्ञानिकों ने अपने मन का अध्यन और विश्लेषण करके, स्वानुभूति द्वारा जाना है या प्रत्यक्ष दर्शन किया है, उनमें भी कोई मतभेद नहीं होता। इसलिये फिलासफी को भारत में दर्शन-शास्त्र कहा जाता है, एवं उसके आविष्कारक वैज्ञानिकों को दार्शनिक या तत्त्ववेत्ता-'महर्षि' (पैग़म्बर-मानवजाति के मार्गदर्शक 'नेता') कहा जाता है।
वैसे विभिन्न समय में विभिन्न ऋषियों के द्वारा आविष्कृत सत्य के रूप में अन्य कई महावाक्य वेदों में संचित हैं। जिन्हें कोई भी भावी मनोविज्ञान का छात्र अपने मन का अध्यन और विश्लेषण करके, स्वानुभूति से सत्यापित कर सकता है। उनमें से कुछ इस प्रकार हैं- जैसे - 'नेति नेति' (यह भी नही, यह भी नहीं), 'यद् पिण्डे तद् ब्रह्माण्डे' ( जो पिण्ड में है वही ब्रह्माण्ड में है), 'वसुधैव कुटुंबकम' ( पूरी दुनिया ही मेरा परिवार है) , ' मातृ देवो भव, पितृ देवो भव, अतिथि देवो भव' (माता,पिता और अतिथि देवता समान होते हैं, स्वामीजी ने इसमें जोड़ दिया है -मूर्ख देवो भव, दरिद्र देवो भव), 'सत्यम् शिवम् सुंदरम्' (सत्य ही शिव है और सत्य ही सुंदर है; सत्, चित्त और आनन्द -'सच्चिदानन्द' का भी यही अभिप्राय है।)
उसी प्रकार महामण्डल के अध्यक्ष श्रीनवनीहरण ने विवेकानन्द साहित्य के दसों खण्ड का गहन अध्यन और विश्लेषण करने के बाद, आधुनिक भारत के सबसे महान ऋषि विवेकानन्द द्वारा आविष्कृत महावाक्यों को ' छोटे छोटे उद्धरणों ' के अन्दर, श्लोकों के रूप में पिरोकर प्रकार गागर में सागर भर दिया है।  इस महामण्डल पुस्तिका ' विवेकानन्द - दर्शनम् ' को 'विवेकानन्द-वचनामृत' के रूप में पान करके स्वयं अमर हो सकते हैं, और दूसरों को भी अमर बनने में सहायता कर सकते हैं !  


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 विशुद्ध भावनाज्ञानतत्वप्रख्या च दर्शनम्

 ' विवेकानन्द - वचनामृत '

११. 
जगति सति सत्ये तु न लाभश्चेत् किमु क्षतिः।
प्रपञ्चस्यापि देहस्य प्रयोगे पुरुषार्थता ॥ 

1. What is the gain or loss by kicking up a row over the reality of this world ? 

2. Objects of human life are attained by making the best use of human body and the visible world.

3. ' The Acharya has to take a stand between the two states. He must have the knowledge that the world is true, or else why should he teach ? Again if he had not realized the world as a dream, then he is no better than an ordinary man, and what could he teach ?' 

१. इस जगत के सच्चाइयों की जो लम्बी कतार (स्वप्नवत) है, उसके ऊपर दुलत्ती मारते रहने (या असन्तोष प्रकट करते रहने) में लाभ क्या और हानी क्या

२. इस मूर्खता को छोड़कर, देवदुर्लभ मानव शरीर एवं दृष्टिगोचर जगत का सर्वोत्तम उपयोग करने से मनुष्य जीवन का उद्देश्य (लक्ष्य) सिद्ध हो जाता है ! 

३. मुक्त पुरुषों को यह जगत स्वप्नवत जान पड़ता है, किन्तु आचार्य ( नचिकेता के गुरु यमाचार्य जैसा) को मानो स्वप्न और जाग्रत, इन दोनों अवस्थाओं के बीच खड़ा होना पड़ता है। उसे यह ज्ञान रखना ही पड़ता है कि जगत सत्य है, अन्यथा वह शिक्षा किसे और क्यों  देगा ? फिर, यदि उसे यह अनुभूति न हुई हो कि जगत स्वप्नवत है, तो उसमें और एक साधारण आदमी में अन्तर ही क्या ? - और वह शिक्षा भी क्या दे सकेगा ?
" देवगण ( यम, वरुण , इन्द्र, वायु, अग्नि ?)  और कोई नहीं उच्च अवस्थाप्राप्त दिवंगत मानव हैं। हमें उनसे  सहायता मिल सकती है। पर हर कोई आचार्य या गुरु  नहीं हो सकता, किन्तु मुक्त (liberated) बहुत से लोग हो सकते हैं।
गुरु को शिष्य के पापों का बोझ वहन करना पड़ता है; और यही कारण है कि शक्तिशाली आचार्यों (दीक्षा देने में समर्थ गुरु) के शरीर में भी रोग प्रविष्ट हो जाते हैं। यदि गुरु अपूर्ण हुआ, तो शिष्य के पाप उसके मन पर भी प्रभाव डालते हैं, और इस तरह उसका पतन हो जाता है। अतः आचार्य  होना बड़ा कठिन है।… श्री रामकृष्ण जीवन्मुक्त भी थे और आचार्य (teacher of mankind- मानवजाति का मार्गदर्शक नेता ) भी !  " ३/२६१
'भक्तियोग' के आचार्य श्रीरामकृष्ण !
द्वैतवादी सोचते हैं, जब तक हाथ में डंडा लिये दण्ड देने को सदैव प्रस्तुत, आसमान में सिंहासन पर बैठे किसी ईश्वर की कल्पना न की जाय, तब तक मनुष्य सदाचारी (नैतिक) नहीं हो सकता। यह कैसे? जैसे मान लो कोई घोड़ा, टमटम का ऐसा निकम्मा घोड़ा, जो चाबुक की मार खाये बिना अपनी जगह से हिलता भी नहीं हो, और मार खाते खाते उसका आदि हो चुका हो; हमें नैतिकता पर भाषण देने के लिये खड़ा हो जाय ! तो वह अपने भाषण का प्रारंभ यह कहते हुए करेगा, " सचमुच, मनुष्य बड़े ही अनैतिक हैं।" क्यों?- " इसीलिये कि, मुझे पता है- उन पर नियमित रूप से कोड़ों की मार नहीं पड़ती।" किन्तु सच बात तो यह है, कि कोड़ों का डर ही लोगों को और भी अधिक अनैतिक बना देता है।  
तुम सभी कहते हो कि ईश्वर है और वह सर्वव्यापी है ! अब जरा आँखें बन्द करो और सोचो, तो वह क्या है? तुम्हें क्या ज्ञात होता है ? यही की मन में सर्वव्यापकता का भाव लाने के लिये तुम्हें या तो सागर की कल्पना करनी पड़ती है, या नील गगन, विस्तृत मैदान अथवा अन्य किसी वस्तु की, जिसे तुमने अपने जीवन में देखा है। यदि ईश्वर की सर्वव्यापकता का अर्थ तुम्हारे लिये इतना ही है, तो इसका अर्थ यह हुआ कि तुम उस विषय में कुछ नहीं समझते हो। ऐसी ही कठिनाई ईश्वर की अन्य उपाधियों का अर्थ समझने में भी होती है।
जैसे, ईश्वर के लिये सर्वशक्तिमान या सर्वज्ञ का जो विशेषण लगाया जाता है, उसके विषय में हमारी धारणा क्या है ?--कुछ भी नहीं। अनुभूति ही धर्म का सार है, और मैं तुम्हें ईश्वर का उपासक तभी मानूँगा, जब तुम उसके 'सच्चिदानन्द' स्वरुप अनुभव कर सकोगे। जब तक तुम्हें यह अनुभूति नहीं होती, तब तक तुम्हारे लिये 'अल्ला, ईश्वर या ब्रह्म' कुछ अक्षरों से बना एक शब्द मात्र है, इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं। यह अनुभूति ही धर्म का सार है; तुम चाहे जितने भी सिद्धान्तों, दर्शनशास्त्रों या नीतिशास्त्रों को अपने मस्तिष्क में ठूँस लो, पर इससे कुछ विशेष लाभ नहीं होगा। धर्मलाभ केवल तभी होगा जब तुम स्पष्ट रूप से यह जान लोगे कि ' what you are and what you have realised.' वास्तव में तुम स्वयं कौन हो ? क्या हो? और तुमने क्या अनुभव किया है?
जब निर्गुण ब्रह्म (परम तत्व-सच्चिदानन्द) को हम माया के कुहरे में से देखते हैं, तो वही सगुण ब्रह्म या ईश्वर (इष्टदेव 'The Personal God' या ठाकुर) कहलाते हैं ! जब हम परम-तत्व को पंचेन्द्रियों के माध्यम से पाने की चेष्टा करते हैं, तो उसे हम सगुण ब्रह्म  के रूप में ही देख सकते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि 'Self cannot be objectified.' अर्थात आत्मा को मन-वाणी का विषय नहीं बनाया जा सकता, क्योंकि आत्मा इन्द्रियगोचर वस्तु है ही नहीं ! How can the Knower know Itself ? जो  ज्ञाता है, वह स्वयं अपना ज्ञेय कैसे हो सकता है ?
किन्तु किसी प्रशान्त चित्त में उसका मानो प्रतिबिम्ब पड़  सकता है - चाहो तो इसे आत्मा का विषयीकरण कह सकते हो। इसी प्रतिबिम्ब का सर्वोत्कृष्ट रूप, ज्ञाता को ज्ञेय रूप में लाने का महत्तम प्रयास - यही सगुण ब्रह्म (ठाकुर या Personal God) कहलाते हैं। आत्मा शाश्वत ज्ञाता है, और हम निरंतर उसे ज्ञेय रूप में ढालने का प्रयत्न कर रहे हैं। इसी संघर्ष से इस जगत-प्रपंच की सृष्टि हुई है, इसी प्रयत्न से जड़ पदार्थ (पंचभूत) आदि की उत्पत्ति हुई है। 
पर ये सब आत्मा के निम्नतम रूप हैं, और हमारे लिये आत्मा का सर्वोच्च सम्भव ज्ञेय रूप तो वह है, जिसे हम 'ईश्वर' कहते हैं। विषयीकरण का यह प्रयास हमारे स्वयं अपने स्वरुप के प्रकटीकरण का प्रयास है। सांख्य के अनुसार, प्रकृति यह सब खेल पुरुष को (शरीर के साथ तादात्म्य में बाँधे रखने के लिये) दिखला रही है, और जब पुरुष को यथार्थ अनुभव हो जायगा (मैं मरणधर्मा शरीर नहीं हूँ !!), तब वह अपना स्वरुप जान लेगा। अद्वैत वेदान्ती के मतानुसार, जीवात्मा अपने को अभिव्यक्त करने का प्रयत्न कर रही है। लम्बे संघर्ष के बाद जीवात्मा जान लेती है कि ज्ञाता तो ज्ञाता ही रहेगा, ज्ञेय नहीं हो सकता, तब उस जीवात्मा को वैराग्य हो जाता है, और वह मुक्त हो जाती है। 
जब मनुष्य उस पूर्णता को प्राप्त कर लेता है, तब उसका स्वाभाव ईश्वर जैसा हो जाता है। जैसे ईसा ने कहा है, " मैं और मेरे पिता एक हैं !" तब वह जान लेता है कि वह ब्रह्म से. निरपेक्ष सत्ता से-- एकरूप है, और वह ईश्वर के समान लीला करने लगता है। जिस प्रकार बड़े से बड़ा सम्राट भी कभी कभी खिलौने से खेल लेता है, वैसे ही वह भी खेलता है। 
कुछ कल्पनायें ऐसी होती हैं, जो अन्य दूसरी कल्पनाओं से उद्भूत होने बंधनों को छिन्न-भिन्न कर देती हैं। यह समस्त जगत ही कल्पनाप्रसूत है, परन्तु यहाँ एक प्रकार की कल्पना दूसरे प्रकार की कल्पनाओं से उत्थित होने वाली बुराइयों को नष्ट कर देती हैं। जो कल्पनायें हमें यह बतलाती हैं कि यह संसार पाप, दुःख और मृत्यु से भरा हुआ है, वे बड़ी भयानक हैं; परन्तु जो कहती हैं, कि ' तुम पवित्र हो; ईश्वर है; दुःख का अस्तित्व ही नहीं है ' वे सब अच्छी हैं, और प्रथमोक्त कल्पनाओं से होने वाले बंधन का खण्डन कर देती हैं। सबसे ऊँची कल्पना, जो समस्त बंधन-पाशों को तोड़ सकती है-सगुण ब्रह्म या ईश्वर (श्रीरामकृष्ण) की है। 
भगवान से यह प्रार्थना करना कि ' प्रभु, अमुक वस्तु मुझे दो, अमुक वस्तु की रक्षा करो, मेरे सिर दर्द को अच्छा कर दो' आदि आदि --यह सब भक्ति नहीं है। ये तो धर्म के हीनतम रूप हैं, कर्म के निम्नतम रूप हैं। यदि मनुष्य शारीरिक वासनाओं की पूर्ति में ही अपनी समस्त मानसिक शक्ति खर्च कर दे, तो तुम भला बताओ तो, उसमें और पशु में अंतर ही क्या है ? भक्ति एक उच्चतर वस्तु है, स्वर्ग की कामना से भी ऊँची।
स्वर्ग का अर्थ असल में है क्या ? --तीव्रतम भोग का एक स्थान। वह (इन्द्र) ईश्वर कैसे हो सकता है ? केवल मूर्ख ही इन्द्रियसुखों के पीछे दौड़ते है, इन्द्रिय भोगों में लगे रहना बिल्कुल आसान है। इसीलिये आजकल के कुछ बाबा लोग, शिक्षा देते हैं, जीवन में मौज उड़ाते रहो, उस पर थोड़ी सी धर्म की छाप भी लगा दो। इन आशारामों के चेले बनने में बहुत बड़ा खतरा है। इन्द्रिय भोगों में रचे-पचे रहना ही मृत्यु है। आत्मा के स्तर पर का जीवन ही सच्चा जीवन है; अन्य मन -इन्द्रिय के स्तरों का जीवन मृत्यु स्वरूप है। यह सम्पूर्ण जीवन एक व्यायामशाला के जैसा है। यदि हम सच्चे जीवन का आनन्द लेना चाहते हैं तो हमे मन-इन्द्रियों से परे जाना ही होगा। 
जब तक मुझे 'मुझे मत छू-वाद' युम्हारा धर्म है और रसोई की पतीली तुम्हारा इष्टदेव है, तब तक तुम्हें आध्यात्मिक मनुष्य नहीं कहा जा सकता, तुम्हारी कोई आध्यात्मिक उन्नति नहीं हो सकती। धर्म धर्म के बीच जो क्षुद्र मतभेद हैं, वे सब केवल शाब्दिक हैं, उनमें कोई अर्थ नहीं। हर व्यक्ति (अहमक) सोचता है, ' यह मेरा मौलिक-मत है' और वह अपने मन-माने ढंग से ही काम करना चाहता है। इसीसे संघर्षों की उतपत्ति होती है। 
दूसरों की आलोचना करने में हम सदा यह मूर्खता करते हैं कि किसी एक विशेष गुण हम अपने जीवन का सर्वस्व समझ लेते हैं, और उसी को मापदण्ड मानकर दूसरों के दोषों को खोजने लगते हैं। इस प्रकार दूसरों को पहचानने में हम भूलें कर बैठते हैं। 
इसमें सन्देह नहीं कि कट्टरता (fanaticism) और धर्मान्धता (bigotry) द्वारा किसी धर्म का प्रचार बहुत तेजी से किया जा सकता है, किन्तु नींव उसी धर्म की दृढ़ होती है जो हर एक को अपना अभिमत व्यक्त करने की स्वतंत्रता देता है, और इसतरह उसे उच्चतर मार्ग पर आरूढ़ कर देता है; भले ही इससे धर्म-प्रचार की गति धीमी हो। 
भारत को पहले आध्यात्मिक विचारों से आप्लावित कर दो, फिर अन्य विचार अपने आप ही आ जायेंगे। आध्यात्मिकता और आध्यात्मिक ज्ञान (spiritual knowledge) का दान सर्वोत्तम दान है, क्योंकि यह हमें संसार के आवागमन से मुक्त कर देता है; इसके बाद है लौकिक ज्ञान ( secular knowledge) का दान, क्योंकि यह आध्यात्मिक ज्ञान के लिये हमारी आँखें खोल देता है; इसके बाद अत है जीवन-दान, और चौथा है अन्न दान।
यदि  साधना (मनः संयोग- ' austerities for realisation' अपने ब्रह्मस्वरूपता की अनुभूति करने के लिये तपस्या ) करते करते शरीरपात भी हो जाय, तो होने; इससे क्या ? सर्वदा साधुओं की संगति (सत्संग)  में रहते रहते समय आने पर आत्मज्ञान तो होकर रहेगा ! एक ऐसा समय भी आता है, जब मनुष्य की समझ में यह बात आ जाती है कि किसी दूसरे व्यक्ति के लिये चिलम भरकर उसकी सेवा करना लाखों बार के ध्यान से कहीं बढ़कर है। जो व्यक्ति ठीक ठीक चिलम भर सकता है, वह ध्यान भी ठीक तरह से कर सकता है।
देवगण ( यम, वरुण , इन्द्र, वायु, अग्नि ?)  और कोई नहीं उच्च अवस्थाप्राप्त दिवंगत मानव हैं। हमें उनसे  सहायता मिल सकती है। हर कोई आचार्य या गुरु  नहीं हो सकता, किन्तु मुक्त (liberated) बहुत से लोग हो सकते हैं।
मुक्त पुरुषों को यह जगत स्वप्नवत जान पड़ता है, किन्तु आचार्य ( नचिकेता के गुरु यमाचार्य जैसा) को मानो स्वप्न और जाग्रत, इन दोनों अवस्थाओं के बीच खड़ा होना पड़ता है। उसे यह ज्ञान रखना ही पड़ता है कि जगत सत्य है, अन्यथा वह शिक्षा क्योंकर देगा ? फिर, यदि उसे यह अनुभूति न हुई हो कि जगत स्वप्नवत है, तो उसमें और एक साधारण आदमी में अन्तर ही क्या ? - और वह शिक्षा भी क्या दे सकेगा ? गुरु को शिष्य के पापों का बोझ वहन करना पड़ता है; और यही कारण है कि शक्तिशाली आचार्यों (दीक्षा देने में समर्थ गुरु) के शरीर में भी रोग प्रविष्ट हो जाते हैं। यदि गुरु अपूर्ण हुआ, तो शिष्य के पाप उसके मन पर भी प्रभाव डालते हैं, और इस तरह उसका पतन हो जाता है। अतः आचार्य  होना बड़ा कठिन है। 
आचार्य या गुरु  होने की अपेक्षा जीवन्मुक्त (free in this very life) होना सरल है। क्योंकि जीवन्मुक्त संसार को स्वप्नवत मानता है और उससे कोई वास्ता (concern) नहीं रखता; पर आचार्य को यह ज्ञान होने पर भी कि जगत स्वप्नवत है, (करुणा से वशीभूत होकर) उसमें रहना और कार्य करना पड़ता है। हर एक के लिये आचार्य होना सम्भव नहीं है। आचार्य तो वह है, जिसके माध्यम से दैवी शक्ति कार्य करती है ! आचार्य का शरीर अन्य मनुष्यों के शरीर से बिल्कुल भिन्न प्रकार का होता है ! उस (आचार्य के) शरीर को निर्दोष-अवस्था (perfect state या आदर्श अवस्था) में बनाये रखने का एक विज्ञान (मनःसंयोग या पातंजल योग-सूत्र) है! उसका शरीर बहुत ही कोमल (मक्खन के समान), उसका हृदय अत्यंत संवदेनशील (seismograph भूकंप- सूचक यंत्र के समान) - तीव्र खुशी और तीव्र पीड़ा के कंपन को महसूस करने में सक्षम होता है ! वह असाधारण होता है।
जीवन के सभी क्षेत्रों में हम यही देखते हैं, कि हृदयस्थ सच्चे व्यक्तित्व (person within) की ही विजय होती है; और वह यथार्थ व्यक्तित्व (that personality : ब्रह्म-स्वरुपता की उपलब्धि) ही समस्त सफलता का रहस्य है। 
नदिया के पैग़म्बर ' चैतन्य महाप्रभु ' (या भगवान श्री कृष्ण चैतन्य) के ह्रदय में संवेदनशीलता का विकास (unfoldment) जिस सीमा तक हुआ था, वैसा उद्दात विकास अन्यत्र कहीं देखने में नहीं आता।
श्री रामकृष्ण एक महान दैवी शक्ति हैं। तुम्हें यह नहीं सोचना चाहिये कि उनका सिद्धान्त यह है या वह। बल्कि यही सोचना चाहिये कि वे एक महान शक्ति हैं, जो अब भी उनके शिष्यों में वर्तमान है और संसार में कार्य कर रही है ! मैंने उनको, उनके विचारों के रूप में (अपने ही भीतर) विकसित होते हुए देखा है। वे आज भी कई मनुष्यों के भीतर विकसित हो रहे हैं। 'Shri Ramakrishna' was both a Jivanmukta and an Acharya. श्री रामकृष्ण जीवन्मुक्त भी थे और आचार्य (teacher of mankind- मानवजाति का मार्गदर्शक नेता ) भी !
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