Monday, October 28, 2013

" राजयोग पर छः पाठ " -स्वामी विवेकानन्द (6)

षष्ठ पाठ 
{प्रकाशकीय:  १८९५ में श्रीमती सारा सी. बुल के निवास-स्थान पर, अमेरिका में  उनके अमेरिकी शिष्यों के लिये आयोजित एक ‘चरित्र-निर्माण कारी प्रशिक्षण शिविर‘ में स्वामी विवेकानन्द  द्वारा दिए गए वर्ग-वार्ता के नोटों पर यह रचना आधारित है।    
जिन्हें स्वयं श्रीमती बुल ने लिपिबद्ध कर लिया था और बहुत संभाल कर रखा था। इन भाषणों को बाद में, सन् १९१३  में अन्य भक्तों एवं श्रद्धालु व्यक्तियों के बीच निजी वितरण के लिये एक पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया गया था।}
सुषुम्णा : सुषुम्णा का ध्यान करना अत्यन्त लाभदायक है। तुम इसका चित्र अपने भाव-चक्षुओं के सामने लाओ, यह सर्वोत्तम विधि है। इस लिये देर तक उसका ध्यान करो। “ It is a very fine, very brilliant thread, this living passage through the spinal cord, this way of salvation through which we have to make the Kundalini rise.” 
 सुषुम्णा एक अति महीन, अति तेजोमय तार जैसी है, जो मेरुदण्ड से होकर हुई एक प्राणवंत मार्ग है, जिसके द्वारा हम कुंडलिनी जाग्रत कर सकते हैं, मुक्ति का द्वार है।
 
योगियों की भाषा में सुषुम्णा के दोनों छोरों पर कमल हैं। निचे वाला कमल कुंडलिनी के त्रिकोण को आच्छादित किये हुए है, और उपर वाला ब्रह्मरंध्र या सहस्रार ( brain surrounding the pineal gland) को ढके हुए है। इन दोनों के बीच भी चार कमल हैं, जो इस मार्ग के विभिन्न सोपान हैं : 
षष्ठ --सहस्रार।
पञ्चम ---नेत्रों के मध्य --आज्ञाचक्र।
चतुर्थ--कण्ठ के नीचे --विशुद्ध।
तृतीय --ह्रदय के समीप --अनाहत।
द्वितीय--  नाभिदेश में --मणिपुर।
प्रथम ---मेरुदण्ड के नीचे --मूलाधार।
प्रथम कुंडलिनी को जगाना चाहिये, फिर उसे एक कमल से दूसरे कमल की ओर उपर लेते हुए अन्त में मस्तिष्क में पहुँचाना चाहिये। प्रत्येक सोपान मन का एक नूतन स्तर है।
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" राजयोग पर छः पाठ " -स्वामी विवेकानन्द (5)


पंचम पाठ
{प्रकाशकीय:  १८९५ में श्रीमती सारा सी. बुल के निवास-स्थान पर, अमेरिका में  उनके अमेरिकी शिष्यों के लिये आयोजित एक ‘चरित्र-निर्माण कारी प्रशिक्षण शिविर‘ में स्वामी विवेकानन्द  द्वारा दिए गए वर्ग-वार्ता के नोटों पर यह रचना आधारित है।    
जिन्हें स्वयं श्रीमती बुल ने लिपिबद्ध कर लिया था और बहुत संभाल कर रखा था। इन भाषणों को बाद में, सन् १९१३  में अन्य भक्तों एवं श्रद्धालु व्यक्तियों के बीच निजी वितरण के लिये एक पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया गया था।}
प्रत्याहार और धारणा : भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है, “चाहे जिस रास्ते से आओ, मुझ तक ही पहुंचोगे।”
“सभी को मुझ तक पहुंचना होगा !”
 मन को समस्त विषयों से हटाकर किसी अभीष्ट विषय में संगृहीत करने की चेष्टा का नाम प्रत्याहार है। इसका प्रथम सोपान है मन की गति को स्वछन्द कर देना : उस पर नजर रखो, देखो कि वह क्या चिन्तन करता है ? स्व्यं केवल साक्षी बनो। मन आत्मा नहीं है। वह केवल सूक्ष्मतर रूप लिये हुए जड़ (नाशवान) वस्तु ही है। हम उसके मालिक हैं, और स्नायविक शक्तियों के द्वारा इच्छानुसार इसका उपयोग करना सीख सकते हैं।
[The double presence of mind: मन स्वयं को दो भागों में विभक्त कर सकता है, “The body is the objective (वस्तुनिष्ठ-मन) view of what we call mind (subjective या व्यक्तिपरक मन).”]  शरीर मन (आन्तरिक) का बाह्य रूप है। [शरीर मन (आन्तरिक नश्वर मन) का बाह्य (नाशवान) रूप या आकृति है।] हम शरीर और मन दोनों (नाशवान वस्तुओं) से परे (अविनाशी) आत्मायें हैं। हम आत्मा हैं, नित्य, अनन्त, साक्षी। शरीर चिन्तन-शक्ति का स्थूल रूप है।
जब वाम रंध्र से श्वास-क्रिया हो, तब विश्राम करो और जब दक्षिण रंध्र से, तब कार्य करो। और जब दोनों से हो, तब ध्यान या एकाग्रता का अभ्यास करो। जब हम शान्त हों और दोनों नासिका-रंध्रों से समान रूप से श्वास ले रहे हों, तब समझना चाहिये कि हम मौन ध्यान की उपयुक्त स्थिति में हैं। (वीणा प्राण-वायु को सम किये ) पहले ही एकाग्रता के लिये संघर्ष करने से कोई लाभ नहीं होता। ‘Control of thought will come of itself.’  मन का निरोध अपने आप होगा।
अँगूठे और तर्जनी से नासिका-रंध्रों को बन्द करने का (अनुलोम-विलोम और कपाल-भाति) का पर्याप्त अभ्यास कर लेने के पश्चात् हम केवल अपनी संकल्प-शक्ति से ऐसा (निरोध - मन को विषयों में जाने से रोक सकते हैं) कर सकते हैं।
अब प्राणायाम को कुछ बदलना होगा। यदि साधक अपने ‘इष्ट’ (Chosen Ideal- वांछित आदर्श) का कोई नाम है, तो रेचक और पूरक के समय उसे ‘ॐ’ के बदले उस नाम का जप करना चाहिये और कुम्भक के समय ‘हुम्’ मंत्र का जप करना चाहिये।
अवरुद्ध श्वास को तेजी के साथ कुंडलिनी के सिर के उपर प्रत्येक ‘हुम्’ जपने के साथ निक्षिप्त करो, और कल्पना करो कि ऐसा करने से वह जाग रही है। अपने को ईश्वर (अपने इष्टदेव से या गुरु) से अभिन्न समझो। कुछ समय बाद विचार अपने आगमन की घोषणा करेंगे, और वे (मन-सरोवर की तली चित्त की स्मृतियों से) कैसे प्रारंभ होते हैं ---इस बात का हमें साक्षात् ज्ञान होगा। और हम जो कुछ भी सोचने जा रहे हैं, उसके प्रति सचेत हो जाएँगे, इस स्तर पर ठीक वैसे ही अनुभव होगा, जैसे कि हम साक्षात् किसी व्यक्ति को आते हुए देख रहे हों। इस सीढ़ी तक हम तभी पहुँच पाते हैं, जब कि हमने स्वयं को अपने मन से अलग करना सीख  लिया है,और निरंतर हम स्वयं को द्रष्टा के रूप में मन को एक अलग वस्तु (दृश्य) के रूप में देखते हैं। इन्द्रिय-विषयों से संबंधित विचार तुम्हें पकड़ने न पाये, हटकर खड़े हो जाओ, वे शान्त हो जायेंगे।
अब केवल पवित्र विचारों (इष्टदेव के नाम-रूप-लीला-धाम) का अनुसरण करो; “ when they melt away”-- you will find the feet of the Omnipotent God !! उनके साथ चलो और जब वे अन्तर्हित हो जायेंगे, तब तुम्हें सर्वशक्तिमान भगवान (सच्चिदानन्द श्रीरामकृष्ण या) के चरणों के दर्शन होंगे। यह स्थिति इन्द्रियातीत या अतिचेतन अवस्था है। “ This is the super-conscious state; when the idea melts, follow it and melt with it. जब विचार विलीन हो जाएँ, उसीका अनुसरण करो और उसीमें तन्मय हो जाओ। (जब सूर्य-चन्द्र-पृथ्वी सब कुछ विलुप्त हो जाये तब तुम भी उसी में गलकर उसके साथ मिल जाओ; किन्तु यदि माँ पुनः शरीर में लौटा दे तब ?)
प्रभामण्डल (Haloes,aura) : “ Haloes are symbols of inner light and can be seen by the Yogi.” अन्तर्ज्योति ‘inner light’ के प्रतीक हैं, और योगी उनका दर्शन कर सकते हैं। कभी कभी हम कोई ऐसा मुख देखते हैं, जो मानो ऐसी ज्योति से मण्डित है, जिसमें हम उसके चरित्र की झलक पा सकते हैं, और उसके बारे में एक अचूक निष्कर्ष पर पहुँच सकते हैं। हम अपने इष्ट का आगमन एक दिव्य-दर्शन के रूप में देख सकते हैं, और उसी प्रतीक को आलम्बन बनाकर सरलतापूर्वक अपने मन को पूर्णरूपेण एकाग्र कर सकते हैं। 
यद्दपि हम सभी अपनी समस्त इंद्रियों के माध्यम से कल्पना कर सकते हैं, तथापि अधिकतर हम आँखों की सहायता लेते हैं. यहाँ तक कि कल्पना भी अर्ध-जड़ है। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि बिना एक प्रारंभिक चित्र के हम चिन्तन नहीं कर सकते। [“ we cannot think without a phantasm.” जैसे बिना एक प्रारंभिक-चित्र के हम गणेश भगवान का चिन्तन नहीं कर सकते हैं, जिसको कार्ल जुंग-archetype या आर्किटाइप या आद्यरूप ‘original’ मौलिक-रूप कहते हैं !)] चूँकि पशु भी चिन्तन करते से प्रतीत होते हैं, किन्तु वे किस बारे में सोच रहे हैं, उसे बताने के लिये उनके पास शब्द नहीं हैं, अतः यह सम्भव है कि चिन्तन और चित्रों के बीच में कोई अविभाज्य संबन्ध न भी हो। 
योग में कल्पना को बना रहने दो, पर ध्यान रखो कि वह शुद्ध और पवित्र रहे। कल्पना-शक्ति की प्रक्रिया की हमारी सबकी अपनी अपनी अलग विशिष्टतायें हैं। जो मार्ग तुम्हारे लिये सबसे अधिक स्वाभाविक हो, उसीका अनुसरण करो, वही सरलतम मार्ग होगा। 
"वह श्रीराम जो श्रीकृष्ण थे, अब श्रीरामकृष्ण हो गये हैं !"
 
  " He who was Rama was Krishna and is now Ramakrishna"
“ We are the results of all reincarnations through Karma: "One lamp lighted from another", says the Buddhist — different lamps, but the same light.” हम सभी लोगों का वर्तमान जीवन अनेक पूर्व जन्मों के कर्मो का फल है। बौद्ध लोग कहते हैं, “एक से दूसरा दीप जलाया गया। दीप भिन्न भिन्न हैं, पर (भिन्न भिन्न दीपों में वही एक ज्योति चली आ रही है) प्रकाश एक ही है। “
सदा प्रसन्न रहो, वीर बनो, (वीर हो तो धीर बनो !), नित्य स्नान करो और 3P - धैर्य, पवित्रता और अध्यवसाय बनाये रखो। तभी तुम यथार्थतः योगी बनोगे। शीघ्रता कदापि न करो और यदि उच्च शक्तियाँ अवतरित होती हैं, तो याद रखो कि वे तुम्हारे अपने मार्ग से भिन्न पगडंडियाँ हैं !! वे तुम्हें अपने मुख्य पथ से भ्रष्ट न कर पायें। उन्हें अलग छोड़ दो और अपने एकमात्र लक्ष्य पर अटल रहो -ईश्वर। केवल अनन्त की छह करो, जिसे पाकर हमें अनन्त शान्ति प्राप्त होगी। पूर्ण को प्राप्त करने पर फिर प्राप्त करने के लिये कुछ भी शेष नहीं रहता। हम सदा के लिये मुक्ति और पूर्णता का लाभ कर लेते हैं--पूर्ण सत्, पूर्ण चित्, पूर्ण आनन्द ! 
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" राजयोग पर छः पाठ " -स्वामी विवेकानन्द (4)

चतुर्थ पाठ

{प्रकाशकीय:  १८९५ में श्रीमती सारा सी. बुल के निवास-स्थान पर, अमेरिका में  उनके अमेरिकी शिष्यों के लिये आयोजित एक ‘चरित्र-निर्माण कारी प्रशिक्षण शिविर‘ में स्वामी विवेकानन्द  द्वारा दिए गए वर्ग-वार्ता के नोटों पर यह रचना आधारित है।    
जिन्हें स्वयं श्रीमती बुल ने लिपिबद्ध कर लिया था और बहुत संभाल कर रखा था। इन भाषणों को बाद में, सन् १९१३  में अन्य भक्तों एवं श्रद्धालु व्यक्तियों के बीच निजी वितरण के लिये एक पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया गया था।}
मन को वश में करने की शक्ति प्राप्त करने के पूर्व हमें उसका भली प्रकार अध्यन करना चाहिये। चंचल मन को संयत करके हमें उसे विषयों में जाने या बहिर्मुखी होने से रोकना होगा, उसे खींच कर, या अन्तर्मुखी बनाकर, उसे एक ही विचार में केन्द्रित करना होगा। इस अभ्यास को बार बार करना होगा। संकल्प-शक्ति अर्थात इच्छा-शक्ति या ‘power of will’ के द्वारा मन को वश में करके, उसे अन्य विषयों का चिन्तन करने से रोककर, केवल ईश्वर (श्रीरामकृष्ण) की महिमा का चिन्तन करने में लगाना होगा। 
मन को स्थिर करने का सबसे सरल उपाय है, चुपचाप बैठ जाना और उसे देखते रहना। और उसे  कुछ क्षण के लिये वह जहाँ जाय, उसे जाने देना। दृढ़तापूर्वक इस भाव का चिन्तन करो,"I am the witness watching my mind drifting.’- “ मैं मन नहीं हूँ; मैं मन को विचरण करते हुए देखने वाला साक्षी हूँ !“ Then see it think as if it were a thing entirely apart from yourself. इसके बाद, ऐसी कल्पना करो मानो मन सोच रहा हो कि वह तो, तुमसे (द्रष्टा या साक्षी) से बिल्कुल ही भिन्न है। अपने को ईश्वर (सच्चिदानन्द) से अभिन्न (स्वयं को ‘शरीर-मन-बुद्धि-इन्द्रिय रूपी रथ’ में बैठा हुआ ‘महारथी’)मानो, मन अथवा जड़ पदार्थ के साथ एक करके कदापि न सोचो।
  
सोचो कि ‘मन’ (दृश्य)तुम्हारे सामने एक विस्तृत, बिल्कुल तरंग-रहित, शान्त सरोवर की तरह है, और जो विचार इसमें आ-जा रहे हैं, वे मानो इस शान्त-निर्मल झील की तली में उठने वाले बुलबुले हैं, जिसे ‘तुम’ (द्रष्टा) बिल्कुल स्पष्ट रुप में देख पा रहे हो ! इन बुलबुलों को, या उठने-मिटने वाले विचारों को रोकने का प्रयास न करो, वरन उनको देखते चलो, वे जैसे जैसे विचरण कर रहे हैं, वैसे वैसे तुम भी उनका पीछा करते रहो। यह क्रिया धीरे धीरे मन-सरोवर के सतह पर उठने वाले तरंग-वृत्तों को सीमित कर देगी।
‘For the mind ranges over wide circles of thought and those circles widen out into ever-increasing circles, as in a pond when we throw a stone into it.’ कारण यह है कि ‘मन’ विचार-तरंगों की विस्तृत परिधि में घूमता है, और ये परिधियाँ विस्तृत होकर निरन्तर बढ़ने वाले वृत्तों का निर्माण करती रहती हैं, ठीक वैसे ही जैसे किसी सरोवर में ढेला फेंकने पर होता है। (सरोवर में ढेला केवल बाहर से ही फेंका जा सकता है, किन्तु मन-सरोवर ऐसा है जिसमें इसकी तली या भीतर चित्त-भूमि में संचित स्मृतियाँ भी ढेला फेंकती हैं।) 
We want to reverse the process and starting with a huge circle make it narrower until at last we can fix the mind on one point and make it stay there.’
हम इस क्रिया को उलट देना चाहते हैं, और बड़े वृत्तों से प्रारंभ करके उन्हें छोटा छोटा बनाते चले जाते हैं, यहाँ तक कि अन्त में हम मन-सरोवर रूपी वृत्त के केन्द्र-बिन्दु पर स्थिर करके उसे वहीँ रोक सकें, निरुद्ध कर सकें या उसे तरंगायित ही न होने दें !! 
Hold to the idea, "I am not the mind, I see that I am thinking, I am watching my mind act", दृढ़तापूर्वक इस भाव का चिन्तन करो, “मैं मन नहीं हूँ, मैं देखता हूँ कि मैं सोच रहा हूँ अर्थात मेरा मन सोच रहा है। मैं द्रष्टा हूँ और मन दृश्य है। मैं अपने मन (दृश्य) तथा अपनी (द्रष्टा-अहं की) क्रिया का अवलोकन कर रहा हूँ। “ प्रतिदिन ऐसा अभ्यास करते रहने से मन और उसमें उठने वाले विचारों को अपने से अभिन्न समझने का भाव कम होता जायेगा, यहाँ तक कि अन्त में तुम अपने को मन से बिल्कुल कर सकोगे, और सचमुच इसे अपने से भिन्न जान सकोगे। 
इतनी सफलता प्राप्त करने के बाद मन तुम्हारा दास हो जायेगा, और उसके उपर इच्छानुसार शासन कर सकोगे। “The first stage of being a Yogi is to go beyond the senses. “ इन्द्रियों से परे हो जाना योगि की प्रथम अवस्था है। जब वह मन पर विजय प्राप्त कर लेता है, तब सर्वोच्च स्थिति प्राप्त कर लेता है।
जितना सम्भव हो सके, एकान्त सेवन करो। तुम्हारा आसन सामान्य ऊँचाई का होना चाहिये। प्रथम कुशासन बिछाओ, फिर मृगचर्म और उसके उपर रेशमी कपड़ा। अच्छा होगा कि आसन के साथ पीठ टेकने का साधन न हो, और वह दृढ हो।
‘Thoughts being pictures, we should not create them.’चूँकि विचार एक प्रकार के चित्र हैं, अतः हमें उनकी रचना नहीं करनी चाहिये। हमें अपने मन से सारे विचार हटाकर रिक्त कर देना चाहिये। जितनी ही शीघ्रता से विचार आयें, उतनी ही तेजी से उन्हें दूर भगाना चाहिये। इसे कार्यरूप में परिणत करने के लिये, ‘we must transcend matter and go beyond our body.’  हमें जड़-जगत और शरीर (की आसक्ति) के परे जाना परमावश्यक है। वस्तुतः मनुष्य का समस्त जीवन ही इसको सिद्ध करने का प्रयास है।
प्रत्येक ध्वनि (मंत्र) का अपना अर्थ होता है, हमारी प्रकृति में इन दोनों का परस्पर संबन्ध है। हमारा उच्चतम आदर्श ईश्वर (भगवान श्रीरामकृष्ण) हैं। उनका ही चिन्तन (नाम-जप) करो। यही नहीं कि हम ज्ञाता को जान सकते हैं, अपितु हम तो वही हैं। अशुभ को देखना तो उसकी सृष्टि ही करना है। जो कुछ हम हैं, वही हम बाहर भी देखते हैं, क्योंकि यह जगत हमारा दर्पण है। यह छोटा सा शरीर हमारे द्वारा रचा हुआ एक छोटा सा दर्पण है। बल्कि समस्त विश्व हमारा शरीर है। इस बात का हमें सतत चिन्तन करना चाहिये, तब हमें ज्ञान होगा कि न तो हम मर सकते हैं और न दूसरों को मार सकते हैं, क्योंकि प्रत्येक शरीर मेरा ही स्वरुप तो है ! हम अजन्मा हैं, और अमर हैं ! और हमारा एक मात्र कर्तव्य प्रेम करना है ! 
‘ यह समस्त विश्व हमारा शरीर है। समस्त स्वास्थ्य, समस्त सुख हमारा सुख है, क्योंकि यह सब विश्व के अन्तर्गत है।’ कहो, ‘ मैं विश्व हूँ !’ अन्त में हमें ज्ञात हो जाता है कि सारी क्रिया हमारे भीतर से इस दर्पण में प्रकट हो रही है।
यद्दपि हम छोटी छोटी लहरों के समान प्रतीत हो रहे हैं, तथापि समस्त समुद्र हमारा आधार है और हम उसके साथ एक हैं। समुद्र के बिना लहर का कोई अस्तित्व ही नहीं है।
यदि कल्पना का सदुपयोग करें, तो वह हमारी परम हितैषिणी है। वह युक्ति के परे जा सकती है। और वही एक ऐसी ज्योति है, जो हमें सर्वत्र ले जा सकती है।
अन्तःस्फुरण प्रदान करनेवाली शक्ति हमारे भीतर है। हमें स्व्यं अपनी उच्च मनःशक्तियों से प्रेरित होना होगा।
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" राजयोग पर छः पाठ " -स्वामी विवेकानन्द (3)


तृतीय पाठ 
(ओजस)
{प्रकाशकीय:  १८९५ में श्रीमती सारा सी. बुल के निवास-स्थान पर, अमेरिका में  उनके अमेरिकी शिष्यों के लिये आयोजित एक ‘चरित्र-निर्माण कारी प्रशिक्षण शिविर‘ में स्वामी विवेकानन्द  द्वारा दिए गए वर्ग-वार्ता के नोटों पर यह रचना आधारित है।    
जिन्हें स्वयं श्रीमती बुल ने लिपिबद्ध कर लिया था और बहुत संभाल कर रखा था। इन भाषणों को बाद में, सन् १९१३  में अन्य भक्तों एवं श्रद्धालु व्यक्तियों के बीच निजी वितरण के लिये एक पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया गया था।}
कुंडलिनी : आत्मा का अनुभव जड़ के रूप न करो, बल्कि उसके यथार्थ स्वरुप को जानो। हम लोग आत्मा को देह समझते हैं, किन्तु हमारे लिये इसको इन्द्रिय और बुद्धि से अलग करके सोचना आवश्यक है। तभी हमें इस बात का ज्ञान होगा कि हम अमृतस्वरूप हैं। परिवर्तन से आशय है कार्य और कारण का द्वैत; ‘all that changes must be mortal.’और जो कुछ भी परिवर्तनशील है, उसका नश्वर होना अवश्यम्भावी है। इससे यह सिद्ध होता है कि न तो शरीर और न मन अविनाशी हो सकते हैं, क्योंकि दोनों में परिवर्तन हो रहा है। केवल जो अपरिवर्तनशील है, वही अविनाशी हो सकता है; क्योंकि उसे कुछ भी प्रभावित नहीं कर सकता।
(ब्रह्म को या सत्य को जानने के बाद) हम सत्यस्वरूप हो नहीं जाते, बल्कि हम सत्यस्वरुप ही हैं; किन्तु हमें सत्य को आवृत करने वाले अज्ञान के पर्दे को हटाना होगा।  [एथेन्स का सत्यार्थी देवकुलीश जिस सत्य को खोज रहा था, जो सात पर्दे के पीछे छुपा था और सातवाँ पर्दा फाड़कर, जिसको देखने से देवकुलिश अँधा हो गया था- अर्थात उसका मिथ्या अहं (मैं देवकुलिश हूँ) ‘- मिट गया था और वह स्वयं सत्यस्वरुप हो गया था]  ‘ The body is objectified thought.’ देह विचार का ही रूप है। ‘सूर्य’ और ‘चन्द्र’ शक्ति-प्रवाह शरीर के सभी अंगों में शक्ति-संचार करते हैं। अवशिष्ट अतिरिक्त शक्ति सुषुम्णा के अन्तर्गत विभिन्न चक्रों अथवा सामान्यतया विदित स्नायु-जाल (plexuses) में संचित रहती है। 
ये शक्ति-प्रवाह मृत देह में दृष्टिगत नहीं होते और केवल स्वस्थ शरीर में ही देखे जा सकते हैं। योगी को एक विशेष सुविधा रहती है, क्योंकि वह केवल इनका अनुभव ही नहीं करता, अपितु इन्हें प्रत्यक्ष देखता भी है। वे उसके जीवन में ज्योतिर्मय हो उठते हैं। ऐसे ही उसके महान स्नायु-केन्द्र (nerve centres) भी हैं।
कार्य,जाग्रत (conscious) तथा अचेतन मन (unconscious), दोनों दशाओं में होते हैं। योगियों की एक एक 
दूसरी दशा भी होती है, वह है अतिचेतन अवस्था (super-conscious), जो सभी देशों और सभी युगों में समस्त समस्त धार्मिक ज्ञान का स्रोत रही है। ‘The super-conscious state makes no mistakes’ अतिचेतन या तुरीय अवस्था में कभी भूल नहीं होती, किन्तु जब जन्मजात-प्रवृत्ति (instinct) के द्वारा प्रेरित होकर कोई कार्य किया जाता है, तो वह कार्य पूर्णरूपेण यंत्रवत होता है, किन्तु पूर्ववर्ती अतिचेतन (इन्द्रियातीत) अवस्था, जाग्रत अवस्था (होश या चेतना consciousness) के परे की स्थिति होती है। इसे अन्तःप्रेरणा (inspiration) कहते हैं, परन्तु योगी कहता है, “ यह शक्ति प्रत्येक मनुष्य में अन्तर्निहित है और अन्ततोगत्वा सभी लोग इसका आनन्द प्राप्त करेंगे।”  
हमें ‘सूर्य’ और ‘चन्द्र’ की गतियों को एक नये रास्ते से परिचालित करना होगा और उनके लिये
‘सुषुम्णा’ का मुख खोलकर एक नया रास्ता देना होगा। जब हम इस ‘सुषुम्णा’ से होकर शक्ति-प्रवाह को मस्तिष्क तक ले जाने में सफल हो जाते हैं, उस समय हम शरीर से बिल्कुल अलग हो जाते हैं। मेरुदण्ड के तले त्रिकास्थि (sacrum) के निकट स्थित मूलाधार चक्र सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। यह स्थल काम-शक्ति (sexual energy) के प्रजनन-तत्व (generative substance) का निवास है, और योगी इसको एक त्रिकोण के भीतर छोटे से कुंडलीकृत सर्प के प्रतीक के रूप में मानते हैं। इस प्रसुप्त सर्प (sleeping serpent) को कुंडलिनी कहते हैं। इस कुंडलिनी को जाग्रत करना ही राजयोग का प्रमुख उद्देश्य है। 
महती कामशक्ति (sexual force) को पशु-सुलभ क्रिया से उन्नत करके मनुष्य शरीर के महान डाइनेमो मस्तिष्क (dynamo of the human system, the brain) में परिचालित करके वहाँ संचित करने पर ‘ओजस’ अर्थात महान आध्यात्मिक शक्ति बन जाती है। समस्त सत चिन्तन, समस्त प्रार्थनायें उस पशु-सुलभ शक्ति (that animal energy) के एक अंश को ओजस में परिणत करने में सहायता करती हैं और हमें आध्यात्मिक शक्ति प्रदान करती हैं। 
यह ओजस ही मनुष्य का सच्चा मनुष्यत्व है, और केवल मनुष्य के शरीर में ही इस शक्ति का संग्रह सम्भव है। “One in whom the whole animal sex force has been transformed into Ojas is a god. He speaks with power, and his words regenerate the world.”  जिसकी समस्त पशु-सुलभ काम-शक्ति ओजस में परिणत हो गयी है, वही देवता है। उसकी वाणी में शक्ति होती है और उसके वचन जगत को पुनरुज्जीवित करते हैं।
 योगी मन ही मन कल्पना करता है कि यह कुंडलिनी क्रमशः धीरे धीरे उपर उठकर सर्वोच्च स्तर अर्थात सहस्रार (pineal gland) में पहुँच रही है। जब तक मनुष्य अपनी सर्वोच्च शक्ति, काम-शक्ति (sexual energy) को ओजस में परिणत नहीं कर लेता, कोई भी स्त्री या पुरुष, वास्तविक रूप में आध्यात्मिक नहीं हो सकता।
“No force can be created; it can only be directed. Therefore we must learn to control the grand powers that are already in our hands and by will power make them spiritual instead of merely animal. Thus it is clearly seen that chastity is the corner-stone of all morality and of all religion.”
कोई शक्ति उत्पन्न नहीं की जा सकती, उसे केवल एक दिशा में परिचालित या रूपान्तरित क्या जा सकता है। अतः हमें चाहिये कि हम अपनी महती शक्तियों को अपने वश में करना सीखें और अपनी इच्छा-शक्ति की सहायता से उन्हें पशुवत रखने के बजाय आध्यात्मिक बना दें। अतः यह स्पष्ट है कि पवित्रता ( ब्रह्मचर्य chastity) ही समस्त धर्म और नीति की आधारशिला है। विशेषतः राजयोग में मन-वचन-कर्म की पूर्ण पवित्रता अनिवार्य है। विवाहित हों या अविवाहित, सभी लोगों के लिये एक ही नियम लागु होता है। शरीर के इस सार अंश को वृथा नष्ट कर देने पर आध्यात्मिकता की प्राप्ति सम्भव नहीं है।
इतिहास बताता है कि सभी युगों में बड़े बड़े द्रष्टा महापुरुष या तो तपस्वी और संन्यासी थे, या उम्र की एक अवस्था में आने के बाद विवाहित-जीवन का परित्याग कर देने वाले थे। पवित्रता ही सबसे महान शक्ति है। केवल पवित्रात्मा ही भगवत-साक्षात्कार कर सकते हैं। 
Verily, verily I say unto thee, except a man born be born again, he cannot see the Kingdom of God.
प्राणायाम से पूर्व इस त्रिकोण-मंडल को ध्यान में देखने की चेष्टा करो। आँखें बंद करके इसके चित्र की मन ही मन स्पष्ट कल्पना करो। सोचो कि इसके चारों ओर अग्निशिखा है और उसके बीच में कुंडलिनी सोयी पड़ी है। जब तुम्हें कुंडलिनी स्पष्ट रूप में दिखने लगे, अपनी कल्पना में इसे मूलाधार चक्र में स्थित करो और कुम्भक में श्वास को अवरुद्ध करके कुंडलिनी को जगाने हेतु श्वास के द्वारा उसके मस्तक पर आघात करो। जितनी ही शक्तिशाली कल्पना होगी, उतनी ही शीघ्रता से वास्तविक वास्तविक फल की प्राप्ति होगी और कुंडलिनी जाग्रत हो जायेगी। जब तक वह जाग्रत नहीं हुई है, तब तक यही सोचो कि वह जाग्रत हो गयी है, तथा शक्ति-प्रवाहों को अनुभव करने की चेष्टा करो और उन्हें सुषुम्णा पथ में परिचालित करने का प्रयास करो। इससे उनकी क्रिया में शीघ्रता होती है। 
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" राजयोग पर छः पाठ " -स्वामी विवेकानन्द (2)

  द्वितीय पाठ
{प्रकाशकीय:  १८९५ में श्रीमती सारा सी. बुल के निवास-स्थान पर, अमेरिका में  उनके अमेरिकी शिष्यों के लिये आयोजित एक ‘चरित्र-निर्माण कारी प्रशिक्षण शिविर‘ में स्वामी विवेकानन्द  द्वारा दिए गए वर्ग-वार्ता के नोटों पर यह रचना आधारित है।    
जिन्हें स्वयं श्रीमती बुल ने लिपिबद्ध कर लिया था और बहुत संभाल कर रखा था। इन भाषणों को बाद में, सन् १९१३  में अन्य भक्तों एवं श्रद्धालु व्यक्तियों के बीच निजी वितरण के लिये एक पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया गया था।}
इस योग का नाम अष्टांग योग ‘eightfold Yoga’ है, क्योंकि इसको प्रधानतः आठ भागों में विभक्त किया गया है। वे हैं -” यम-नियम-आसन-प्राणायाम-प्रत्याहार-धारणा-ध्यान और समाधी! " 
प्रथम- यम। यह सर्वाधिक महत्वपूर्ण अभ्यास है और मनुष्य का सारा जीवन इसके द्वारा शासित होना चाहिये। इसके पाँच विभाग हैं -सत्य,अहिंसा,ब्रह्मचर्य,आस्तेय और अपरिग्रह।
१. सत्य - मन,कर्म और वचन की पूर्ण सत्यता।
२. अहिंसा -मन,कर्म, वचन से किसी की हिंसा न करना।
३. ब्रह्मचर्य - मन,कर्म, और वचन की पवित्रता।
४. आस्तेय - चोरी का आभाव, मन,कर्म,वचन से लोभ न करना, बिना पूछे दूसरे की वस्तु न लेना।
५. अपरिग्रह - किसी से कोई उपहार लेने की इच्छा भी नहीं रखना। (Non-receiving of gifts.)  
द्वितीय- नियम। इसके भी पाँच विभाग हैं-शौच,संतोष,तपः,स्वाध्याय और ईश्वरप्रणिधानम्।
१. शौच- अंतर और बाहर की शुद्धता, नित्य स्नान-शरीर मन को सवच्छ रखना।
२. संतोष - जो भी मिल जाय उतने में संतुष्ट रहना, परिमित आहार।
३. तपः - कुछ शारीरक-कष्ट सहने के लिये तैयार रहना।
४. स्वाध्याय - नित्य सद्ग्रन्थों का पाठ करना या स्वामीजी को पढ़ना।
५. ईश्वर-प्रणिधान - इस सृष्टि को बनाने वाला कोई है या नहीं, इसके अनुसन्धान में लगे रहना।
तृतीय- आसन। मेरुदण्ड के उपर जोर न देकर कमर,गरदन और सिर सीधा रखना। 
चतुर्थ- प्राणायाम। प्राणवायु अथवा जीवन-शक्ति को वशीभूत करने के लिये श्वास-प्रश्वास का संयम।
पंचम- प्रत्याहार। मन को अन्तर्मुख करना तथा उसे बहिर्मुख होकर इन्द्रिय-विषयों में जाने से खींचकर भीतर लाना और जड़-तत्व (शरीर-मन-बुद्धि आदि चेतन द्रष्टा या आत्मा से कैसे भिन्न हैं?) को समझने के लिये उसे मन में घुमाना, अर्थात उस पर बार बार विचार करना।   
षष्ठ- धारणा। शरीर के भीतर किसी एक स्थान पर- (ह्रदय में) ध्यान केन्द्रित करना।
सप्तम- ध्यान।
अष्टम- समाधी: ज्ञानालोक, हमारी समस्त साधना का लक्ष्य ! हमें यम-नियम का अभ्यास जीवन पर्यन्त करना चाहिये। जहाँ तक दूसरे अभ्यासों का संबन्ध है, हम ठीक वैसा ही करते हैं, जैसा कि जोंक बिना दूसरे तिनके को दृढ़तापूर्वक पकड़े पहलेवाले को नहीं छोड़ती है। दूसरे शब्दों में हमें अपने पहले कदम को भली-भाँति समझकर अभ्यास कर लेना है और तब दूसरा उठाना है। 
इस पाठ का विषय प्राणायाम अर्थात प्राण का नियमन है। राजयोग में 'प्राणवायु' चित्त-भूमि (psychic plane) में प्रविष्ट होकर हमें आध्यात्मिक राज्य में ले जाती है। यह समस्त देहयंत्र की मुख्य फ्लाइवील है। प्राण प्रथम फेफड़ा (lungs या फुफ्फुस) पर क्रिया करता है, फेफड़ा ह्रदय को प्रभावित करते हैं, ह्रदय रक्त-प्रवाह को और वह क्रमानुसार मस्तिष्क तथा तथा मस्तिष्क मन पर क्रिया करता है। जिस प्रकार इच्छा बाह्य संवेदन उत्पन्न करती है, उसी प्रकार बाह्य संवेदन इच्छा-शक्ति (will ) या संकल्प शक्ति को जाग्रत कर देता है।
अभी हमारी संकल्प-शक्ति दुर्बल है, हम जड़-पदार्थों (शरीर-मन-इन्द्रिय) के इतने बंधन में हैं, कि हम अपनी ‘संकल्प-शक्ति के महा-तेज’ से परिचित नहीं हैं। हमारी अधिकांश क्रियायें बाहर से भीतर की ओर होती हैं। बाह्य प्रकृति हमारे आन्तरिक साम्य को नष्ट कर देती है, किन्तु जैसा कि हमें चाहिये, हम उसके साम्य को नष्ट नहीं कर पाते। किन्तु यह सब भूल है, वास्तव में प्रबलतर शक्ति तो भीतर की शक्ति है। वे ही महान संत और आचार्य (या नेता) हैं, जिन्होंने अपने भीतर के मनोराज्य को जीता है। और इसी कारण उनकी वाणी में इतनी शक्ति (ओजस्वीता) होती है।
एक ऊँची मीनार पर बंदी किये गये एक मंत्री की कहानी है (१/५४-५५)। वह अपनी पत्नी के प्रयत्न से मुक्त हुआ। पत्नी एक लंबी रस्सी, सुतली, पतले से धागे का और रेशम के धागे का बंडल, एक भौंरा (beetle), और मधु लायी थी। 
यह रूपक इस बात को स्पष्ट करता है कि किस प्रकार हम रेशमी धागे की भाँति प्रथम प्राणवायु का नियमन करके अन्त में एकाग्रता रूपी रस्सी को पकड़ सकेंगे, जो हमें देहरूपी कारागार से निकल देगी और हम मुक्ति प्राप्त करेंगे। मुक्ति प्राप्त कर लेने पर उसके हेतु प्रयुक्त साधनों का हम परित्याग कर सकते हैं। 
प्राणायाम के तीन अंग हैं :१. पूरक-श्वास लेना। २. कुम्भक- श्वास रोकना। ३. रेचक -श्वास छोड़ना।
मस्तिष्क में से होकर मेरुदण्ड के दोनों ओर बहनेवाले दो शक्ति-प्रवाह हैं, जो मूलाधार में एक दूसरे का 
अतिक्रमण करके मस्तिष्क में लौट आते हैं। इन दोनों में से एक का नाम ‘सूर्य’ (पिंगला) है, जो मस्तिष्क के बायें गोलार्ध से प्रारंभ होकर मेरुदण्ड के दक्षिण पार्श्व में मस्तिष्क के आधार (सहस्रार) पर एक दूसरे को लांघकर पुनः मूलाधार पर अंग्रेजी के आठ ‘8’ अंक के अर्ध भाग के आकार के समान एक दूसरे का फिर अतिक्रमण करती हैं।
दूसरे शक्ति-प्रवाह का नाम ‘चन्द्र’ (इड़ा) जिसकी क्रिया उपयुक्त क्रम के ठीक विपरीत है और जो इस आठ ‘8’ अंक को पूर्ण बनती है। हाँ, इसका निम्न भाग उपरी भाग से कहीं अधिक लम्बा है। ये शक्ति-प्रवाह दिन-रात गतिशील रहते हैं, और विभिन्न केन्द्रों में, जिन्हें हम ‘चक्र’ (स्नायुजाल plexuses) कहते हैं, बड़ी बड़ी जीवनी शक्तियों का संचय किया करते हैं। पर शायद ही हमें उनका ज्ञान हो। एकाग्रता द्वारा हम उनका अनुभव कर सकते हैं और शरीर के विभिन्न अंगों में उनका पता लगा सकते हैं। इस श्वास-क्रिया के साथ, ‘सूर्य’ और ‘चन्द्र’ का शक्ति प्रवाह घनिष्ट रूप से संबद्ध है, और इसके नियमन द्वारा हम शरीर पर नियंत्रण प्राप्त कर लेते हैं।
कठोपनिषद (१/३/३-५) में शरीर को रथ, मन को लगाम, इंद्रियों को घोड़े, विषय को पथ और बुद्धि को सारथी कहा गया है। इस रथ में बैठी हुई आत्मा रथी है। यदि रथी समझदार नहीं है और सारथी से घोड़ों को नियंत्रित नहीं करा सकता तो, वह कभी भी अपने ध्येय तक नहीं पहुँच सकता। अपितु, दुष्ट अश्वों के समान इन्द्रियाँ उसे जहाँ चाहेंगी, खिंच ले जायेंगी। यहाँ तक कि उसकी जान भी ले सकती है।

ये दो शक्ति-प्रवाह सारथी (मन) के हाथों में रोकथाम के हेतु लगाम हैं; और अश्वों (इंद्रियों) को अपने वश में करने के लिये उसे इनके उपर नियंत्रण करना आवश्यक है। हमें नीतिपरायण होने की शक्ति प्राप्त करनी ही होगी। जब तक हम उसे प्राप्त नहीं कर लेते, हम अपने कर्मों को नियंत्रित नहीं कर सकते। नीतिशिक्षाओं (यम-नियम) को कार्यरूप में परिणत करने की शक्ति हमें केवल योग से ही प्राप्त हो सकती है। नैतिक मनुष्य होना योग का उद्देश्य है। जगत के सभी बड़े बड़े आचार्य (मानव-जाति के नेता) योगी थे और उन्होंने प्रत्येक शक्ति-प्रवाह को वश में कर रखा था। योगी इन दोनों प्रवाहों को मेरुदण्ड के तले में संयत करके उनको मेरुदण्ड के भीतर के केन्द्र से होकर परिचालित करते हैं। तब ये प्रवाह ज्ञान के प्रवाह बन जाते हैं। यह स्थिति केवल, योगी की ही होती है। 
प्राणायाम की द्वितीय शिक्षा : प्राणायाम की एक ही पद्धति सभी के लिये नहीं है। प्राणायाम का लयपूर्ण क्रमबद्धता (Rhythmic Regularity) के साथ होना आवश्यक है, और इसकी सबसे सहज विधि ‘easiest way is by counting’ है गणना। चूँकि यह (गणना या जप) पूर्णरूपेण यंत्रवत हो जाती है, हम इसके बजाय एक निश्चित संख्या में पवित्र मंत्र ‘ॐ’ का जप करते हैं।(गुरु के निर्देशानुसार सावधानी नहीं रखने से दिमाग बिगड़ भी सकता है। इसीलिये सद्गुरु के निर्देशानुसार १०८ की माला में नाम-जप करना, प्राणायाम की सबसे सरल पद्धति है,)
प्राणायाम की क्रिया इस प्रकार है : दायें नथुने को अंगूठे से दबाकर चार बार ‘ॐ’ का जप करके धीरे धीरे बायें नथुने से श्वास लो।
तत-पश्चात्, बायें नथुने पर तर्जनी रखकर दोनों नथुनों को कसकर बन्द कर दो और ‘ॐ’ का मन ही मन आठ बार जप करते हुए श्वास को भीतर रोके रहो। पश्चात, अंगूठे को दाहिने नथुने से हटाकर चार बार ‘ॐ’ का जप करते हुए उसके द्वारा श्वास को बाहर निकालो।
जब श्वास बाहर हो जाये, तब फेफड़े या फुफ्फुस से समस्त वायु निकालने ने के लिये पेट को दृढ़तापूर्वक संकुचित करो। फिर बाएं नथुने को बंद करके चार बार ‘ॐ’ का जप करते हुए दाहिने नथुने से श्वास भीतर ले आओ। इसके बाद दाहिने नथुने को अँगूठे से बंद करो और आठ बार ‘ॐ’ का जप करते हुए श्वास को श्वास को भीतर रोको। फिर बाएं नथुने को खोलकर चार बार ‘ॐ’ का जप करते हुए पहले की भाँति पेट को संकुचित करके धीरे धीरे श्वास को बाहर निकालो। इस सारी क्रिया को प्रत्येक बैठक में दो बार दुहराओ अर्थात प्रत्येक नथुने के लिये दो के हिसाब से चार प्राणायाम करो। प्राणायाम के लिए बैठने के पूर्व सारी क्रिया प्रार्थना से प्रारंभ करना अच्छा होगा। एक सप्ताह तक इस अभ्यास को करने की आवश्यकता है।
फिर धीरे धीरे श्वास-प्रश्वास की अवधि को बढ़ाओ, किन्तु अनुपात वही रहना चाहिये। अर्थात तुम यदि श्वास भीतर ले जाते समय छः बार 'ॐ' का जप करते हो, तो उतना ही श्वास बाहर निकलते समय भी करो, और कुम्भक के समय बारह बार करो। इन अभ्यासों के द्वारा हम और अधिक पवित्र, निर्मल और आध्यात्मिक होते जायेंगे। किसी कुमार्ग में जाने (??) से अथवा कोई सिद्धि (??) की चाह से बचे रहो।
प्रेम ही एक ऐसी शक्ति है, जो चिरकाल तक हमारे साथ रहती है और बढ़ती जाती है। राजयोग के द्वारा ईश्वर को प्राप्त करने की इच्छा रखने वाले व्यक्ति को मानसिक, शारीरिक, नैतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से सबल होना आवश्यक है। अपना प्रत्येक कदम इन बातों को ध्यान में रखकर ही बढ़ाओ।
लाखों में कोई बिरला ही कह सकता है, “ मैं इस संसार के परे जाकर ईश्वर का साक्षात्कार करूँगा।” शायद ही कोई 'सत्य' के सामने खड़ा हो सके! (??) किन्तु अपने उद्देश्य की सिद्धि के लिये हमें मरने (??) के लिये भी तैयार रहना पड़ेगा।
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