Sunday, September 16, 2012

$$$स्वामी विवेकानन्द और हमारी सम्भावना [23] " सच्ची शिक्षा मिलनी चाहिये " (शिक्षा : समस्त रोगों का रामबाण ईलाज है),

' शिक्षा मनुष्य को यथार्थ मनुष्य में परिणत कर देती है !'
किस आधार पर एक मनुष्य और दूसरे मनुष्य में अन्तर आ जाता है ? केवल शिक्षा के आधार पर। शिक्षा के द्वारा असंस्कृत मनुष्य, सुसंस्कृत, परिशोधित (refined) मनुष्य में परिवर्तित हो जाता है। शिक्षा के द्वारा मनुष्य का जीवनबोध, जीव-जगत के प्रति उसका दृष्टिकोण, उसकी अवधारणा और विचार उदार, उन्नत और विस्तृत हो जाते हैं। शिक्षा से मनुष्य को विश्व और जीवन में अन्तर्निहित शक्तिसमूहों का ज्ञान तथा उन शक्तियों का उपयोग करने में दक्षता प्राप्त होती है। आत्म-शक्ति में उसका विश्वास दृढ हो जाता है। ज्ञान की परिधि में विस्तार होने के साथ ही साथ भय की सीमा का चरम बिन्दु (मृत्यु का भय ) भी घट कर छोटा होता जाता है।
सभी के साथ एकात्मता की अनुभूति के फलस्वरूप मनुष्य का स्वार्थबोध (खुदगर्जी) क्रमशः समाप्त होने लगती है। उसके आचार-विचार और व्यवहार में, या सब कुछ में संयम और सहानुभूति अभिव्यक्त होने लगती है। मनुष्य अपने स्वार्थ को भूल कर दूसरे के लिये कार्य करना चाहता है, सज्जनता,प्रेम और मैत्री की भावना के सामने-घृणा,द्वेष, हिंसा पराजित होने लगते हैं। आत्मसुख की इच्छा के अपेक्षा परहित की भावना बड़ी होने लगती है। बाहर में सुख और आनन्द की खोज बन्द हो जाने से -हृदय सर्वदा आनन्द से भरा रहता है। विभिन्न प्रकार के भेदों, अपने-पराये  की सीमारेखा क्रमशः दृष्टि से ओझल हो जाती है। सबों के लिये प्रेम हृदय में हिलोरे मारने लगता है। सुख और आनन्द की पहले वाली धारणा में आमूल परिवर्तन हो जाने के फलस्वरूप हृदय शुद्ध और पवित्र हो जाता है। 
शिक्षा ही किसी व्यक्ति को यथार्थ मनुष्य में परिणत कर सकती है। अशिक्षित मनुष्य और पशु में असमानता (Disparity या विषमता) क्या है ? पशु पूर्ण-पशु के रूप में ही आता है, जबकि मनुष्य असम्पूर्ण होकर आता है,प्रत्येक मनुष्य में कुछ न कुछ कमियाँ रहती हैं,किन्तु शिक्षा मनुष्य को सम्पूर्ण बना देती है। मनुष्य को पूर्णत्व प्राप्त करा देना ही शिक्षा का उद्देश्य है। किन्तु पूर्णता बाहर से नहीं आती है। (बाहर से कुछ ग्रहण करके पूर्ण नहीं हुआ जाता है) बल्कि मनुष्य के भीतर ही पूर्णता है, किन्तु सूप्त अवस्था में है। बाहर से मृदु आघात देकर भीतर की उस सूप्त पूर्णता को जाग्रत करा देना शिक्षक और शिक्षा का कार्य है। [जो मनुष्य विवेक-प्रयोग करके अपनी कमियों को दूर करता जाता है और अच्छाई के साथ जीने लगता है, तथा  अच्छे गुणों को आत्मसात करता जाता है, वह अच्छा मनुष्य बन जाता है। और जो विवेक-प्रयोग का अभ्यास नहीं करता  वह बुरा मनुष्य या पशु जैसा मनुष्य बना रहता है। यही अशिक्षित मनुष्य और पशु में असामनता है ]

मेरे भीतर में पूर्णता विद्यमान है, इस सत्य को स्वीकार कर लेने या विश्वास करने को ही श्रद्धा कहते कहते हैं। इसीलिये मनुष्य बन जाने की साधना में श्रद्धा अत्यन्त आवश्यक वस्तु है । क्योंकि मेरे भीतर पहले से ही पूर्णत्व (perfection) विद्यमान है; इस सत्य को नहीं जानने से, उसको जगाया कैसे जा सकता है? इसीलिये कहा जाता है- श्रद्धावान लभते ज्ञानम। एक मनुष्य (लीडर) से दूसरे मनुष्य (ऑर्डिनरी मैन) में अन्तर केवल इसी श्रद्धा के तारतम्य के कारण होता है। जिसकी जैसी श्रद्धा होती है, उसको वैसा लाभ मिलता है।
इसी श्रद्धा के साथ संयुक्त होने का प्रयत्न करते करते भीतर की पूर्णता क्रमशः अभिव्यक्त होने लगती है। पूर्णत्व की इसी अभिव्यक्ति को शिक्षा कहते हैं। जिस व्यक्ति जितनी मात्रा में पूर्णत्व विकसित हुआ हो, उसे उतनी ही मात्रा में शिक्षित कहा जा सकता है। इसके साथ ही साथ मनुष्य में जो कच्चापन का भाव (या स्वयं को केवल शरीर मानने का भ्रम या देहाध्यास ) या अपूर्णता  का भाव (स्वयं को केवल शरीर-मन युक्त यंत्र समझने का भाव) रहता है- वह क्रमशः कम होता जाता है। तथा उपरोक्त गुण -(आत्म-श्रद्धा,निर्भीकता, निःस्वार्थपरता,त्याग, सेवा आदि ) उसके चरित्र में क्रमशः प्रस्फुटित होने लगते हैं। 
'कच्चा' या अधूरा (imperfect) रहने का तात्पर्य क्या है ? कच्चापन का अर्थ है, कुछ और (Something else) प्राप्त करने की प्रत्याशा (expectancy) में रातदिन पड़े रहना। मैं यदि पूर्ण होता जाउँगा, तो मेरी कामनायें (चाहतें) क्रमशः कम होती जायेंगी। मेरी स्वार्थपरता कम होती जाएगी, मेरा डर बिल्कुल समाप्त हो जायेगा (मैं खुद देख लूँगा कि-डर के आगे जीत है !) मेरी पर-निर्भरता कम होती जाएगी,  अर्थात मैं दासत्व से मुक्ति की ओर  (emancipation) अग्रसर होता जाऊंगा । परवशता का मनोभाव, गुलामी का मनोभाव, हीन भाव कम होता जायेगा। क्या गुलामी की जंजीर में बंधा व्यक्ति कभी सुख पा सकता है? 'पराधीन सपनेहूं सुख नाहीं'-- दासत्व में सुख कहाँ है ? शिक्षा के द्वारा ही हमलोग यथार्थ सुख (मुक्ति) के अधिकारी बन सकते हैं। 
जैसे जैसे शिक्षा के द्वारा आत्मशक्ति विकसित होने लगती है,उसके साथ साथ आत्मविश्वास या आत्मश्रद्धा भी और अधिक बढने लगती है। यह बात स्पष्ट हो जाती है, कि समस्त शक्ति का स्रोत मेरे हृदय में ही है। यह बात स्पष्ट रूप से समझ में आने लगती है, कि दैहिक शक्ति की अपेक्षा मानसिक शक्ति कई गुना अधिक मूल्यवान है। मानसिक शक्ति (मनःसंयम) के विकास के फलस्वरूप ज्ञान की परिधि और अच्छा-बुरा (सदसत) विवेक-प्रयोग करने की क्षमता भी बढती जाती है। जगत और जीवन का अभिप्राय क्रमशः स्पष्टतर और बोधगम्य होने लगता है। स्वार्थपूर्ण विचारों का आवेग कम होता जाता है, दूसरे मनुष्यों के साथ सम्बन्ध में मधुरता आने लगती है।
शिक्षा के फलस्वरूप अपने भीतर ज्ञान और मनन करने की शक्ति जाग्रत होने के साथ साथ, यह आस्था और अधिक दृढ होती जाती है; कि मुझसे भिन्न प्रत्येक मनुष्य के भीतर भी पूर्णता के विकास की पूरी सम्भावना है। इसीलिये आत्मश्रद्धा सभी मनुष्यों के प्रति श्रद्धा का रूप धारण कर लेती है। सच्ची शिक्षा एक मनुष्य को दूसरे मनुष्य के हृदय के निकट खीँच लाती है। क्रमशः मनुष्य-मात्र  के प्रति प्रेम उमड़ने लगता है, सबों के साथ अपना अभेद या एकत्व की धारणा बढती जाती है।
अब, पशुओं के जैसा अपने को ही केन्द्र में रखकर, सभी कुछ पर अपना अधिकार जमाने की बातें सोचना संभव नहीं होता। शिक्षित व्यक्ति दूसरों के लिये सोचना सीखता है। हृदय की संवेदनाओं का केन्द्र-बिन्दु अपने ही भीतर अचल न रहकर, सार्वजनिक विस्तार को प्राप्त होता है, सभी मनुष्यों के हृदय को स्पर्श करने में समर्थ हो जाता है। पहले के समान अब उसको अपना सुख उतना बड़ा नहीं दीखता है। दूसरों का सुख, आनन्द और कल्याण ही मानो उसको अपना सुख या आनन्द के जैसा महसूस होने लगता है। सुख या आनन्द की धारणा एक नया रूप धारण कर लेती है। यह बात बिल्कुल स्पष्ट हो जाती है कि भोगों में, या मन की अनियंत्रित शैतानियों (waywardness) में सुख या आनन्द नहीं है; सभी का सुख ही मेरा सुख है, सबों का कल्याण ही मेरा कल्याण है, सबों का आनन्द ही मेरा आनन्द है।
शिक्षा के फलस्वरूप अपने लिये अग्राधिकार को अस्वीकार करके सबों के अधिकार का ध्यान रखने से ही  नैतिकता का जन्म होता है। क्योंकि नैतिकता का मुख्य सिद्धान्त यही है। पूर्णत्व के अभिव्यक्त होने के साथ साथ हमलोग सबों के साथ एक होना सीखते हैं। हमलोग सबो के साथ अभिन्न हैं, इसको जान लेना ही ज्ञान है, अपने को दूसरों से अलग समझना,भेदबुद्धि ही अज्ञान है। शिक्षा के द्वारा हमलोगों के हृदय में ज्ञान की यह ज्योति प्रज्वलित हो जाती है, कि  हमलोगों में से प्रत्येक के भीतर जो पूर्णत्व है, वही सर्वत्र विद्यमान है। 
इसको जान लेना ही पूर्णत्व को जानना है ! इसको जान लेना ही यथार्थ शिक्षा है। वह पूर्णत्व ही हमलोगों की समस्त शक्तियों और ज्ञान का स्रोत है। उसको उद्घाटित करके जीवन के समस्त आचार व्यवहार में अभिव्यक्त करने में सक्षम हो जाने को ही ' शिक्षित होना ' कहते हैं। इस शक्ति और ज्ञान के स्रोत को उद्घाटित करने से ही यथार्थ सुख और आनन्द प्राप्त होता है। 
सच्ची शिक्षा प्राप्त कर लेने से हमलोग मानो एक नया जीवन (डी-हिप्नोटाइज्ड अवस्था) प्राप्त करते हैं। और उस नये जीवन की दृष्टि से एक नया जीवन-बोध प्राप्त करते हैं, हमलोगों की आँखों के सामने, यह जगत मानो एक नये आलोक से उद्भासित हो उठता है। ऐसी शिक्षा से ही हमलोगों के जीवन की सार्थकता, समाज और राष्ट्र का कल्याण, इस शिक्षा के फलस्वरूप ही विश्वभ्रातृत्व की आधारशिला प्राप्त हो सकती है।
हमलोगों को सच्ची  शिक्षा अवश्य  मिलनी चाहिए। इस  शिक्षा को नहीं प्राप्त करने से हमलोग पशु-जीवन में ही पड़े रह जायेंगे, समाज से अनैतिकता, अत्याचार, शोषण, भ्रष्टाचार दूर नहीं हो सकता है, एक राष्ट्र का दूसरे राष्ट्र के साथ, एक धर्म का दूसरे धर्म के साथ जो विद्वेष है, वह कभी दूर नहीं होगा, मानव-समाज में एकता की बातें केवल कहने की बातें ही बनी रह जाएगी। 
==========
$$$पुनश्च $$$स्वामी विवेकानन्द और हमारी सम्भावना [२२] "शिक्षा ही समाधान है" देखने के लिये मेरे नये ब्लॉग 'Mahamandal.blogspot.com' को देखें ! 






No comments: