Tuesday, September 11, 2012

⚜️️🔱स्वामी विवेकानन्द और युवा समस्याएं ⚜️️🔱(স্বামী বিবেকানন্দ ও যুব-সমস্যা )[ रामकृष्ण मठ और मिशन का प्रतीक चिन्ह] SVHS- 3.3 स्वामी विवेकानन्द और हमारी सम्भावना : खण्ड 3 -स्वामी विवेकानन्द और युवा समाज ]

⚜️️🔱स्वामी विवेकानन्द और युवा समस्याओं की पहचान ⚜️️🔱

( शिक्षा, धर्म और आध्यात्मिकता में कोई मूलभूत अन्तर नहीं है। )
   
       प्रसिद्द ग्रीक दार्शनिक प्लेटो से एक बार पूछा गया, कि आप यथार्थ शिक्षा या श्रेष्ठ शिक्षा किसे समझते हैं ? तो उन्होंने इसके उत्तर में कहा था " यथार्थ  या श्रेष्ठ शिक्षा वह है जो मनुष्य को उसके शरीर तथा उसकी आत्मा को इतनी मात्रा में मधुरता और शुचिता प्रदान करे , जितने परिमाण में  वह उसे ग्रहण करने में सक्षम हो।" यदि हम इस परिभाषा के साथ स्वामी विवेकानन्द द्वारा दी गई शिक्षा की परिभाषा को तुलना करके देखें,तो पायेंगे कि स्वामीजी द्वारा दी गई परिभाषा अधिक स्पष्ट तथा सारगर्भित है। शिक्षा को परिभाषित करते हुए स्वामीजी कहते हैं - 'Education is manifestation of perfection already in man." अर्थात शिक्षा का अर्थ है उस पूर्णता (अन्तर्निहित ब्रह्मत्व) को अभिव्यक्त करना जो सब मनुष्यों में पहले से विद्यमान है। "  प्लेटो के कथन- "शरीर तथा उसकी आत्मा को इतनी मात्रा में मधुरता और शुचिता प्रदान करे, जितने परिमाण में  वह उसे ग्रहण करने में सक्षम हो" - इस उक्ति की अपेक्षा " मनुष्य के भीतर जो पूर्णता पहले से विद्यमान है उसकी अभिव्यक्ति " यह उक्ति और भी गहरे सत्य को उद्घाटित करती है। 
        शिक्षा की प्रथम परिभाषा में शिक्षा प्राप्त करने की पद्धति (प्रशिक्षण- पद्धति) या उसे ग्रहण करने की समस्या के समाधान का कोई स्पष्ट संकेत नहीं मिलता।  किन्तु शिक्षा की दूसरी परिभाषा में शिक्षा प्राप्त करने की वैज्ञानिक पद्धति का स्पष्ट संकेत मिलता है कि 'मनुष्यत्व का उन्मेष' करने वाली शिक्षा कभी बाहर से भीतर आने वाली वस्तु नहीं है। क्योंकि शिक्षा [नित्यानित्य विवेक या विवेकज-ज्ञान]  यदि बाहर से भीतर आएगी, तो किस वाहन के माध्यम से आयेगी, और विद्यार्थी उस शिक्षा को धारण कैसे करेगा ? स्वामी जी द्वारा दी गयी यह परिभाषा, शिक्षा की इन सभी आन्तरिक समस्याओं को एक क्षण में दूर कर देती है। इसके अतिरिक्त 'पूर्णता' शब्द 'मधुरता' के अभाव को भी समाप्त कर देती है, क्योंकि इस एक 'पूर्णता' शब्द भीतर ही ' सत्यं -शिवं -सुन्दरं' का भाव भी अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है 
    किन्तु, कोई पूछ सकता है कि इतनी अधिक समस्याओं के होते हुए भी अचानक शिक्षा की बात क्यों उठाई जा रही है? इसी कारण से हो रही है कि शिक्षा अपने-आप में तथा विशेषरूप में युवाओं के लिए- बहुत महत्वपूर्ण विषय है। क्योंकि युवावस्था ही 'जीवन-गठन' करने का सबसे उत्कृष्ट समय है, और उसका सर्वश्रेष्ठ उपाय है-शिक्षा ! इसलिए यहाँ शिक्षा के विषय में चर्चा हो रही है।श्रीरामकृष्ण के उपदेश -' जावत बाँची तावत सिखी ' का अर्थ केवल इतना ही नहीं है कि -शिक्षा का समय जीवनभर है। इस उपदेश से इस बात का संकेत भी मिलता है कि 'मनुष्य के जीवन का उद्देश्य ही शिक्षा प्राप्त करना है।' उसी प्रकार जब स्वामी विवेकानन्द यह कहते हैं कि 'This world is a spiritual gymnasium.' 'यह जगत एक अध्यात्मिक व्यायामशाला है'- तो उनके इस उपदेश में भी मनुष्य जीवन के उद्देश्य का ही संकेत प्राप्त होता है। (गौण उद्देश्य तो कई हो सकते हैं !) पर मनुष्य जीवन का मुख्य उद्देश्य क्या है इस बात को युवावस्था में ही समझ लेने की बात तो दूर रही, अधिकांश लोग तो जीवन की संध्या बेला में भी नहीं समझ पाते हैं! (94 साल की उम्र मेंभी नहीं समझ पाते हैं!) और विशेष करके युवा जीवन की समस्या का प्रारम्भ भी यहीं से होता है। हम जानते हैं कि हिमालय की ऊँचाइयों से निकली किसी नदी की गति या प्रवाह का कोई निश्चित लक्ष्य या उद्देश्य (समुद्र से मिल जाना ?) नहीं रहे , तो उस कल-कल बहती नदी की उद्दाम गति का कोई अर्थ ही नहीं होता। कोई लक्ष्य या उद्देश्य रहे बिना तो किसी भी गति का कोई अर्थ नहीं रह जाता। लेकिन गति के इस रहस्य को समझे बिना यदि जीवन-यात्रा शुरू कर दी जाये, और अधिकांश लोगों की जीवनयात्रा तो समाप्त होने के बिन्दु तक पहुँचने को ही है, तो वैसा लक्ष्यविहीन जीवन नदी जैसा जीवन जीने वाले व्यक्ति के बुद्धि की सूई (मति या दृष्टि) वृद्धावस्था में विभिन्न प्रकार के ससांसरिक-समस्याओं में, या किसी एक दुश्चिंता-(बिल का क्या हुआ ?) में ही अटक जाये तो उसमें किसी को आश्चर्य क्यों होना चाहिए ?    
  इसलिए यदि हम युवा जीवन की समस्त समस्याओं को हल करना चाहते हों तो सभी युवाओं में मानव-जीवन के मूल्य बोध को जाग्रत करना होगा। उन्हें यह समझना होगा कि मनुष्य जीवन को बहुमूल्य क्यों कहा जाता है ? युवाओं को समझना चाहिए कि इस बहुमूल्य मनुष्य शरीर का मिल जाना भी बहुत बड़ा अवसर है ,इसलिए यह जैसे-तैसे व्यतीत कर देने की वस्तु नहीं है, यह एक महान सम्भावना है। इस सम्भावना को अभिव्यक्त कर देना ही मनुष्य- जीवन का उद्देश्य है, तथा इस सम्भावना को अभिव्यक्त करने का उपाय है-शिक्षा
     स्वामी विवेकानन्द के अद्वैत वेदान्त में आधारित विचारों का विश्लेषण करने पर हम यह समझ पाते हैं कि शिक्षा, धर्म और आध्यात्मिकता में मूलतः कोई अन्तर नहीं है। इसीलिए किसी युवा में भले ही धर्म या आध्यात्मिकता के विषय में कोई अवधारणा नहीं हो, धर्म को जानने के लिए   उसमें कोई रूचि भी नहीं हो, तथापि वह यदि शिक्षा प्राप्त करने के प्रति उत्सुक हो, तो उसको भी वही लाभ मिलेगा, जो किसी धर्म के प्रति उत्सुक रहने वाले व्यक्ति को मिलता है। मानवजाति के मार्गदर्शक नेता स्वामी विवेकानन्द ने कहा है, (Would be Leaders को आदेश दिया है) - 'जे जेखाने आछे तार स्तरे नेमे सेखान थेके पारले तार हात धरे ताके एकटु उपरे तुले दाओ !' 'जो युवा वर्तमान में चाहे जिस सापेक्षिक-स्तर पर भी खड़ा हो, अगर तुमसे सम्भव हो सके , तो उसके स्तर पर उतर कर, उसका हाथ पकड़ कर, उसको थोड़ा और उपर उठा दो।' जैसे भी हो , युवाओं के मन में यदि मनुष्य जीवन की सर्वोच्च सम्भावना के प्रति  थोड़ी सी भी श्रद्धा उत्पन्न कर दी जाय, तो उतने से भी बहुत बड़ा लाभ होगा। मनुष्य जीवन अत्यन्त मूल्यवान क्यों है ?  यदि युवाओं में केवल इसका बोध जाग्रत हो जाये , तो उसको अपने जीवन और व्यवहार में अभिव्यक्त करने के प्रति उसमें 'आकूति' (ardour-ललक या धुन) पैदा हो जायेगी। और इसी चेष्टा को (प्रशिक्षण को) शिक्षा कहते हैं। स्वामी विवेकानन्द द्वारा दी गयी शिक्षा की यह परिभाषा- "मनुष्य में अन्तर्निहित अनन्त सम्भावना (Inherent Divinity) या "पूर्णत्वं" (Perfection-24 गुण) को प्रस्फुटित और विकसित करने को ही शिक्षा कहा जाता है !" के तात्पर्य को ठीक से नहीं समझ पाने के कारण ही, हमलोग शिक्षा को अन्ततोगत्वा केवल एक मात्र 'अर्थकरी विद्या' में ही परिणत कर देते हैं इसी कारण जो शिक्षा जीवन की मौलिक समस्या (#3 एषणा में आसक्ति) के समाधान में सहायक हो सकती थी, वह उल्टे नई-नई समस्याओं को उत्पन्न करने का कारण बन जाती है।
         पश्चिम के एक विचारशील लेखक का उल्लेख करना, यहाँ अत्यंत प्रासंगिक होगा -" किसी बच्चे के लिये सबसे बड़े दुर्भाग्य की बात यह होगी कि वह ऐसे परिवेश में पले-बढ़े जहाँ सृष्टि के सौन्दर्य बोध (मधुरता और शुचिता) के प्रति प्रेम न होकर,केवल धन-लोलुपता का ही मनोभाव हो;  जहाँ उसको बचपन से ही दैनन्दिन जीवन में सबसे अधिक मूल्यवान वस्तु अधिक मनुष्यत्व, अधिक गुण, अधिक सौंदर्यबोध कैसे प्राप्त होता है- यह सब न सिखाकर केवल यही सिखाया जाता हो कि किस उपाय से अधिक से अधिक धन, अधिक ऐश्वर्य प्राप्त किया जाता है। इस प्रकार की कूशिक्षा के द्वारा किसी नये जीवन को 'ईश्वराभिमुखी पथ' - "पूर्णत्व-भिमुखी प्रस्फुटन पथ'    से बलपूर्वक हटाकर, उसके आध्यात्मिक केन्द्र से खींचकर, किसी मूल्यहीन साधारण सांसारिक लक्ष्य की ओर धकेल देना; बहुत ही निर्दयता का कार्य है। क्योंकि जब तक उसका मन कोमल है तभी तक उसे अच्छे-बुरे किसी भी साँचे में आसानी से ढाला जा सकता है।" 
        श्रीरामकृष्ण-विवेकानन्द वेदान्त शिक्षक -प्रशिक्षण परम्परा -"Be and Make" के तात्पर्य को यदि बहुत सरल ढंग से समझने की चेष्टा की जाये, (यद्यपि इसको और भी कई प्रकार से कहा जा सकता है।) तो उसे निम्न प्रकार से व्यक्त करना गलत नहीं होगा -" मनुष्य जीवन का एकमात्र उद्देश्य अपने अन्तर्निहित सत्य की ओर , अन्तर्निहित सत्ता, आत्मा, 'पूर्णता'  (100 % निःस्वार्थपरता) को अभिव्यक्त करने की ओर अग्रसर होते रहना है।  मनुष्य-जीवन का एक-मात्र उद्देश्य अपने (काचा आमि)  'कच्चे मैं' को (पाका आमि) 'पक्के मैं' में परिवर्तित कर लेना है। अपने 'क्षुद्र अहं' बोध को 'सर्वगत अहंकार' में निमज्जित कर देना है। दूसरों के कल्याण के लिए अपने स्वार्थ को तिलांजलि देना, अपने क्षूद्र व्यक्तित्व को एकमात्र अखण्ड व्यक्तित्व (इष्टदेव) के साथ अभिन्न बना लेना।  समस्त चालक शक्तियों को प्रेम में रूपान्तरित कर लेना है।"
['अविद्या जनित राग-द्वेष" से प्रेरित चालक शक्ति : 'राग-द्वेष" की उत्पति ही स्वयं को नश्वर शरीर मानने से होती है।  स्वयं को केवल 'M/F' समझने के कारण मूढ़बुद्धि या अविवेकी मनुष्यों की चालक -शक्ति राग-द्वेष होती है। जिसके कारण वे काम -वासना  द्वारा प्रेरित होकर स्वार्थीबुद्धि 'मूढ़-बुद्धि' स्वयं को केवल नश्वर शरीर से जोड़ लेती है , अपने यथार्थ स्वरुप अविनाशी आत्मा से जोड़ कर नहीं देखती। इसलिए देह के प्रति राग को ही प्रेम समझकर -विपरीत लिंग के शरीर में आकर्षित हो जाती है। उस 'तुच्छ अहं' या देहबुद्धि को, आत्मा से जोड़कर एकमात्र अखण्ड (इष्टदेव का दास) हूँ बुद्धि से सबको प्रेम (यथा-योग्य प्रेम ?) किया जा सकता है। देहबुद्धि से संचालित उस 'तुच्छ अहं' को  शुद्धबुद्धि के द्वारा संचालित उस एकमात्र सर्वगत अखण्ड व्यक्तित्व "Real I" के साथ (integrate) करना सम्बन्ध बना लेना या जोड़ देना।  একমাত্র অখন্ড ব্যক্তিত্বের অঙ্গীভূত করা/ To be integrated into a single, unified personality. "Apparent I" (काचा आमि) अर्थात स्वयं को नश्वर शरीर M/F (आदम और हव्वा) समझने वाली 'क्षुद्र बुद्धि' (मूढ़मति-सम्मोहित दृष्टि) को "Real I" "पाका आमि या सर्वगत अहंकार" अविनाशी आत्मा (ईश्वर, भगवान, ब्रह्म या सच्चिदानन्द) समझने वाली शुद्ध बुद्धि (ज्ञानमयी दृष्टि) में निमज्जित करके 'ब्रह्ममयं जगत्' देखना है ! "दृष्टिं ज्ञानमयीं  कृत्वा पश्येद्  ब्रह्ममयं जगत्! "देहबुद्धया तु दासोऽहं जीवबुद्धया त्वदंशक। आत्मबुद्धया  त्वमेवाहमिति मे निश्चिता मतिः ॥ शुद्ध बुद्धि !]    
               अर्थात अपने क्षुद्र अहंकार (M/F भाव) और स्वार्थबोध को जीतकर, मेरे हृदय में पहले से विद्यमान जो  " सत्य,मंगल और प्रेमपूर्ण सत्ता" आत्मा हैं- (ईश्वर , भगवान या इष्टदेव ठाकुर इष्टदेव होकर बैठे हैं!) उस सत्य -शिव और सुन्दर कोअपने व्यव्हार और आचरण के माध्यम से प्रस्फुटित और विकसित करते रहने का प्रयत्न करते रहना होगा। और जो व्यक्ति (सद्गुरु या नवनीदा जैसे नेता) ऐसा करने में पूरी तरह से समर्थ हो पाते हैं, वे ईश्वरलाभ कर चुके होते हैं। अन्य लोग जिस परिमाण में ऐसा जीवन जी पाते हैं , उन्होंने उसी परिमाण में देवत्व या मनुष्यत्व अर्जित किया होता है। मनुष्य जीवन की समस्त समस्याओं के समाधान का यही एकमात्र पथ है , इसके सिवा अन्य कोई पथ नहीं है। चुँकि, युवा कोई मनुष्येतर प्राणी नहीं है , इसीलिए युवा समस्याओं के समाधान का भी यही एकमात्र पथ है। यहाँ तक कि यदि युवावस्था में ही इस  'पथ' (सन्मार्ग) को ग्रहण कर लिया जाय तो मनुष्य-जीवन में आनेवाली अनगिनत समस्याओं के समाधान का मार्ग भी आसन हो जायेगा।
  अब प्रश्न यह उठता है कि आखिर हम इस 'कठिन व्रत के व्रती' किस प्रकार बन सकते हैं ? तो इसका उत्तर हमें श्रीरामकृष्ण के एक छोटे से उपदेश -'जेमन भाव, तेमन लाभ ' में प्राप्त होता है।['As you think, so you gain.' "हम वो हैं जो हमारी सोच ने बनाया है, इसलिए इस बात का ध्यान रखें कि आप क्या सोचते हैं !" - स्वामी विवेकानन्द ] अर्थात " जिसकी बुद्धि (मति या दृष्टि) जैसी होगी उसको 'उसी' की प्राप्ति होगी !" हम जिस वस्तु की उपलब्धि (एकत्व -सर्वगत अहं की उपलब्धि) करना चाहते हैं , जिस 'घटना' (event) को घटित करना चाहते हैं, तो सर्वप्रथम उन विचारों से अपने ह्रदय को परिपूर्ण कर लेना होगा। तो जैसी चर्चा पहले हो रही थी कि, " जब तक मन (बुद्धि, मति या दृष्टि) कोमल है, तब तक उसे किसी भी साँचे में ढाला जा सकता है।" [अर्थात बुद्धि को 'नश्वर देह' से न जोड़कर, आत्मा (इष्टदेव) से सम्बन्ध बनाकर मूढ़/सम्मोहित बुद्धि को शुद्ध बुद्धि में बदला जा सकता है।] जिस आदर्श के साँचे में कोमल मन (बुद्धि) को ढाला जायेगा, मन (शुद्धबुद्धि-ज्ञानमयी दृष्टि) उन्हीं विचारों से (ब्रह्ममय जगत) भरा रहेगा , और उस दृष्टि के अनुरूप ही कार्य होंगे ! [ भारत के राष्ट्रीय आदर्श'- 'त्याग और सेवा' के अनुरूप ही कार्य भी होंगे। ] इस विषय में एक पाश्चात्य मनीषी (नेपोलियन हिल) कहते हैं, " अपने मन की आँखों के सामने, अर्थात अपनी कल्पना में  तुम जिस प्रकार के आदर्श की छवि को निरंतर रखने की चेष्टा करोगे, अपने हृदय  सिंहासन पर जिस आदर्श को सदैव आसीन रखोगे, वही आदर्श तुम्हारे जीवन को आकार देने लगेगा, और तुम स्वयं भी वही बन जाओगे। " बिल्कुल यही बात यहाँ भी कही जा रही है। बाह्य जगत की सामग्रियों के द्वारा 'मनुष्य-निर्माण' नहीं होता। हमारा मन (बुद्धि, मति या दृष्टि) ही अपने आदर्श (इष्टदेव) के वैशिष्ट्य के अनुरूप, मनुष्य के व्यक्तित्व को उसी साँचे ढाल देती है।  स्वामीजी अक्सर कहा करते थे - ' जैसी मति, वैसी गति'- ' या मतिः सा गतिर्भवेत।' (अष्टावक्र गीता)
        इस प्रकार हम यह देख सकते हैं- कि मन के भाव या आदर्श के उपर ही जीवन- गठन निर्भर करता है। इसके लिये हमें दो कार्य करने होंगे। पहला, मन को अपने वश में लाकर, उसे प्रयोजन के अनुसार कार्य में नियोजित करना होगा। दूसरा, ह्रदय में धारण करने के लिए पहले से किसी उच्च भाव या श्रेष्ठ युवा -आदर्श का सही चुनाव कर लेना होगा।  किन्तु, मन का स्वाभाव अत्यन्त चंचल है, मन के शक्ति की कोई सीमा नहीं है। सच तो यह है कि हमलोग मन की सहायता के बिना कोई भी कार्य नहीं कर सकते हैं। इसीलिये, मन को एकाग्र और नियंत्रित रखते हुए उसकी शक्ति की सहायता से हमलोगों को सभी कार्य करने पड़ते हैं।  हमारा मन ही किसी पवित्र भाव या आदर्श को धारण करता है। कल्पना में जो आदर्श (साँचा) निरंतर हमारे आँखों के सामने रहता है , जिनके विचारों (उपदेशों) को हम क्रियान्वित करना चाहते हैं, वैसा क्रियान्वन मन की कल्पना शक्ति (Power of Imagination)  द्वारा ही सम्भव होता है। किन्तु चित्त यदि चंचल बना रहे तो आदर्श की वह छवि विकृत हो जाती है।  तथा उसे उचित रूप से समझने की चेष्टा में ही मन की सारी शक्ति नष्ट हो जाती है और दुर्बल मन फिर उस आदर्श को वास्तविकता के धरातल पर उतारने में असमर्थ हो जाता है। इसीलिये मन को एकाग्र और नियंत्रित करने का अभ्यास नियमित रूप से करते रहना विशेष रूप से आवश्यक है। इसके लिए मन के द्वारा मन को शासित करना पड़ता है। (Double presence of mind -मन अपने को ही द्रष्टा  मन और दृश्य मन में बाँट लेता है।) इसलिए मन को शासित करने का उपाय है -'प्रत्याहार और धारणा ' का निरंतर अभ्यास करते रहना। निरंतर अभ्यास करते रहने से मन धीरे -धीरे नियन्त्रण में आने लगता है, और वशीभूत मन एकाग्र-चित्त होकर किसी  भाव या आदर्श को मूर्तरूप देने लगता है। 
    कहा गया है कि मन को एकाग्र रखने में 'वैराग्य'  बहुत बड़ा सहायक है। मन स्वभावतः रूप-रस आदि इन्द्रिय-विषयों में बिना चेष्टा के ही आकृष्ट हो जाता है। यदि किसी विशेष भोग्य पदार्थ के प्रति मन यदि अत्यन्त आसक्त हो जाये तो , तो उसी के चिंतन में मन की सारी शक्ति खर्च हो जाएगी। इसलिए हम यदि किसी भी प्रयोजनीय विषय में मन को एकाग्र करना चाहते हों, या उसको नियन्त्रित करके उसकी शक्ति को बढ़ाना चाहते हों, तो यथा संभव 'वैराग्य परायण'  होना आवश्यक है। भोगों विषयों में आसक्त नहीं रहने से मन आसानी से बिना किसी दबाव के किसी भी उच्चतर विषय में अपनी सम्पूर्ण ऊर्जा के साथ प्रयुक्त हो कर उपयुक्त परिणाम दे सकता है। इस प्रकार वशीभूत मन (बुद्धि) को पूरी एकाग्रता के साथ किसी भी आदर्श पर नियोजित रखने मात्र से ही हमलोग उस आदर्श को अपने जीवन में रूपायित कर सकते हैं। इस प्रकार यह स्पष्ट होता है कि किसी निर्दिष्ट आदर्श (इष्टदेव) को अपने जीवन में रूपायित कर पाने से ही हमलोगों का सुंदर जीवन-गठन, और चरित्र-निर्माण होता है।   
        अब प्रश्न है, कि वह आदर्श क्या है ? कोई सर्वश्रेष्ठ आदर्श वह भाव-समष्टि है, जिसमें बहुत सारे परस्पर सम्बद्ध भाव ग्रथित होकर इस प्रकार एकत्र हो जाते हैं कि उन भावों को क्रियान्वित करने से व्यक्ति या समाज हर दृष्टि से पूर्ण विकास करने लगता है। इसीलिये सच्चा आदर्श वह है जो किसी व्यक्ति या समाज को पहले तो एक 'समग्र-जीवन दृष्टि' का उपहार प्रदान करता है, फिर जीवन-यात्रा को लक्ष्य तक पहुँचा देने के लिए ज्ञातव्य तथ्य प्रदान कर सहायता करता है। तथा श्रेय-मार्ग से चलते समय कहीं फिसल न जायें इसके लिए समयानुसार विशिष्ट परामर्श भी देता रहता है।
      आदर्श के भी दो रूप हैं- मूर्त और अमूर्त। वह आदर्श कोई निराकार भवमूर्ति हो सकता है या कोई ज्वलंत आदर्श से रूपायित जीवन भी हो सकता है। निराकार भावमूर्ति किसी व्यक्ति की पूर्णता की उच्चतम धारणा का वहन करता है। यह आदर्श एक ऐसी काल्पनिक आकृति (माँ) है, जो किसी वास्तविक वस्तु के समान ही हमारे मन के समक्ष निरन्तर जगमगाता रहता है , और जिसका अनुकरण करके हमलोग आसानी से अपने जीवन को विकसित कर सकते हैं।  किन्तु, साकार आदर्श में रूपायित कोई जीवन बहुत विरले ही देखने को मिलता है। लेकिन ऐसा जीवन निराकार भावमूर्तिरूपी किसी काल्पनिक आदर्श की अपेक्षा बहुत अधिक लाभदायक सिद्ध होता है। उस आदर्श के वास्तविक जीवन की उष्णता से कल्पनालोक में चित्रित आदर्श की विचार द्वारा मूर्तियों में प्राण  स्पन्दित होने लगते हैं; तथा वे विचार आसानी से मन में भीतर तक प्रविष्ट हो जाते हैं। मनुष्य को अमूर्त विचारों की अपेक्षा जीवन्त उदाहरण देखने से अधिक विश्वास होता है। 
    स्वामी विवेकानन्द ने  मानव की महानता तथा मनुष्य जीवन की संभावनाओं को अभिव्यक्त करने के जिस महान आदर्श का प्रचार किया था, वे स्वयं उसके एक जीवन्त प्रतिमूर्ति हैं। हमलोग स्वामी विवेकानन्द रूपी इस जीवन्त आदर्श के माध्यम से एक असाधारण जीवन दर्शन, जीवन का एक महान उद्देश्य, उसे प्राप्त करने का आलोकित पथ तथा फिसलन भरे मार्ग पर रपट पड़ने की आशंका  को दूर करने वाला बज्र जैसा मजबूत हाथों का सहारा-एक साथ प्राप्त कर सकते हैं। दुर्गम यात्रा पथ पर साहस पूर्वक चलने का आत्म-विश्वास, उत्साह और इसी जीवन में पूर्णता प्राप्त करने का आशीर्वाद - यह सब कुछ हम विवेकानन्द से  प्राप्त कर सकते हैं। उनका  आदर्श, उनकी भावमूर्ति आज नश्वर शरीर के न रहने पर चिर-अपरिवर्तनीय  होकर पूर्व की अपेक्षा अधिक प्रेरणास्पद तथा माननीय हो उठी है।  
       अब हम  युवा जीवन की समस्याओं के और गहराई में प्रविष्ट होकर यह देखने की कोशिश करेंगे कि स्वामीजी के आदर्श से उन समस्यायों का समाधान किस प्रकार संभव हो सकता है?  
     युवा जीवन प्राण उर्जा से छलकती रहती है, इस आयु में उत्साह और उत्कण्ठा का कोई आभाव नहीं होता। क्रियाशीलता अपने चरम पर रहती है। किन्तु युवाकाल में 'विवेक' ('नित्य-अनित्य विवेक') पर्याप्त मात्रा में क्रियाशील नहीं रहता है। युवाकाल में प्राणशक्ति  (अन्तर्निहित जीवनी-शक्ति या vitality) बेलगाम घोड़ों की तरह उछाल मारता रहता है। मानव-जीवन का आदर्श , उद्देश्य क्या होना चाहिए ? किस बात को जान लेना अत्यन्त आवश्यक है ? इन सब बातों का यथोचित ज्ञान युवावस्था में  यथोचित मात्रा में उपलब्ध नहीं रहता। लेकिन किसी युवा आदर्श से प्रेरित होकर , यदि युवा काल में ही दृढ़ उत्साह, उत्कण्ठा, क्रियाशीलता के साथ आदर्श, उद्देश्य और उपाय को ग्रहण कर लिया जाय, फिर आत्मविश्वास के साथ सफलता की सम्भावना में अटल आस्था रखते हुए यदि दृढ संकल्प , धैर्य, अध्यवसाय , और पवित्रता के साथ प्रयत्न किया जाये तो जीवन केवल समस्यामुक्त ही नहीं होता बल्कि 'श्रीसे' सम्पन्न बुद्धि, मति या दृष्टि प्राप्त हो जाती है!  किन्तु , अक्सर युवाकाल में इन विषयों के बारे में सुनने को नहीं मिलता है।  इसीलिए इस ओर ध्यान भी नहीं जाता है। जिसके फलस्वरूप युवा जीवन समस्यायों से भर उठता है। इसका मुख्य कारण है, स्वाभाविक अज्ञानता जो मुक्ति की धारणा को अस्पष्ट बना देती है, जिसके फलस्वरूप युवा संयमहीनता को ही शक्ति की अभिव्यक्ति समझ बैठता है।  
    प्राणों के साथ जुड़ी होने के कारण 'मुमुक्षुत्व' या मुक्ति की भावना हर वस्तु में रहती है। मनुष्य जीवन का उद्देश्य इसी मुक्ति की समग्रता का (नित्य मुक्त आत्मा का) अनुसन्धान करना है। जब तक 'मुक्ति का रहस्य' (मैं कौन हूँ ?यह) उद्घाटित नहीं हो जाता, जीवन कभी स्थिर नहीं रह सकता है। विविध प्रकार की चंचलताओं के माध्यम से युवा सर्वदा मुक्ति का ही अनुसन्धान कर रहा होता है। 'आत्मा' की खोज में वह जगह -जगह जाता है फिर 'यहाँ नहीं ', 'यहाँ नहीं' कहीं और देखो " - करके भागता रहता है। यही है युवा जीवन की समस्याओं का वास्तविक कारण युवा जीवन में जो समस्यायें ऊपर-ऊपर दिखाई देतीं हैं, वे सभी आमतौर से बाहरी  या गौण समस्यायें हैं। किन्तु, मूल समस्या आंतरिक है। इसका मूल अज्ञान (अविद्या) में है, जो उसको मुक्ति के सच्चे रूप (Real I -आत्मा या इष्टदेव) को देखने नहीं देती और वह संयमहीन जीवनीशक्ति के उफान में ही मुक्ति की पहेली का हल ढूँढ़ता है।
   युगों-युगों से 'युवा-नेताओं' के प्रति जिन कटाक्षों और अपशब्दों का प्रयोग किया जाता रहा है, आज के युवा यदि उन पर ध्यान देने लगें, तो अपने आप पर से उनकी श्रद्धा ही उठ जाएगी। किन्तु,यदि वे सचमुच अपने युवा जीवन में युगान्तकारी परिवर्तन लाने का दृढ़ संकल्प कर लें, तो स्वामी विवेकानन्द को अपने आदर्श के रूप ग्रहण करके उनके मार्गदर्शन में चलकर देख सकते हैं। किन्तु, युवाओं को अपनी एक पारम्परिक मान्यता का त्याग करना होगा कि दूरस्थ कल्याण की अस्पष्ट सम्भावना की अपेक्षा वर्तमान का अस्थि-चर्म द्वारा अनुभूत सुख ही बड़ा है। यह भूलना नहीं चाहिए कि बंगला कवि रामप्रसाद के सुर से सुर मिलते हुए एक पाश्चात्य कवी ने भी गाया है- " मानव की सबसे बड़ी गलती यही है,जो सृष्ट हुआ है उसका दुरूपयोग (misuse) करना  तथा सम्पूर्ण अतीत (डिविनिटी) को अर्थहीन वर्तमान में डुबो देना है।'
             प्रसिद्द जर्मन साहित्यकार गोएथे की प्रसिद्द रचना है 'फ़ाउस्ट (Faust) की त्रासदी' जिसमें वह अपने अध्यनकक्ष में बैठकर स्वगत-भाषण (soliloquy- बातचीत जो अपनेआप से की जाये।) कर रहा है - " Alas, I have studied philosophy,  the law as well as medicine,  and to my sorrow, theology;  studied them well with ardent zeal,  yet here I am, a wretched fool,  no wiser than I was before." --- Faust,
(These words set up the central motivation of the play, Faust's desire to transcend 'human knowledge' in order to gain 'divine knowledge'.) अर्थात "मैंने दर्शनशास्त्र, कानून और आयुर्विज्ञान (medicine) की पढ़ाई की है,  मैंने 'Theology' (वेदान्त) भी बड़े जोश के साथ पढ़ा है, लेकिन अफ़सोस ! बड़े दुःख की बात है कि, अब भी मैं उतनी ही मूढ़मति (मूर्ख) हूँ जितना पहले था !"  -फ़ाउस्ट। 
 नाटक के पात्र फ़ाउस्ट का यह स्वगत -भाषण हमें 'काचा आमि ' (Apparent I देह और मन ) से परे उठकर इन्द्रियातीत सत्य, आत्मज्ञान या 'पाका आमि' (Real I) का ज्ञान  प्राप्त करना ही मनुष्य जीवन का चरम लक्ष्य है, यह दर्शाता है।      

( অহো ! হের মনুষ্যের হেন ভগ্ন দশা !
 
 এবে জানি আমাদের অপূর্ণতা কোথা।)

अहो ! हेर मनुष्येर हेन भग्न दशा !
एबे जानि आमादेर अपूर्णता कोथा। 
" Alas! Behold the wretched state of mankind!
Now we know where our imperfections lie. "

"अरे देखो, मानवों की ऐसी भग्न दशा और, 

जानने की चेष्टा करो कि हमारी अपूर्णता कहाँ है? "

        क्या मनुष्य अपनी अपूर्णता को पूर्णता में परिणत नहीं कर सकता ? जो सृष्ट हुआ (तुमने नहीं बनाया) है, उस शक्ति का दुरूपयोग करना क्या हम बन्द नहीं कर सकते ? क्या मनुष्य दूरस्थ कल्याण की के अस्पष्ट सम्भावना " ब्रह्मैव इदं सर्वं" को, अनुभूत विश्वास में परिणत नहीं किया जा सकता ? निश्चित रूप से किया जा सकता है ! यौवन की उत्ताल प्राण-शक्ति को अनुशासित करना होगा। नित्यमुक्त आत्मा के स्वरूप पर (Real I) अज्ञान (अविद्या Apparent I) का जो आवरण पड़ा है उसे क्रमशः उन्मोचित करते हुए , पूर्णतः अनावृत करने के साथ ही साथ स्पष्ट रूप से देख लेना होगा।
[स्वामी विवेकानन्द ने कहा है - " योगशास्त्र के मतानुसार,आत्मा 'अज्ञान' के कारण प्रकृति के साथ संयुक्त हो गयी है। इस 'प्रकृति' के पंजे से छुटकारा पाना ही हमारा उद्देश्य है। यही सारे धर्मों का एकमात्र लक्ष्य है। प्रत्येक आत्मा अव्यक्त ब्रह्म है! बाह्य एवं अंतःप्रकृति को वशीभूत करके आत्मा के इस ब्रह्मभाव को व्यक्त करना ही जीवन का चरम लक्ष्य है। कर्म, उपासना, मन:संयम अथवा ज्ञान, इनमें से एक, एक से अधिक या सभी उपायों का सहारा लेकर अपने ब्रह्मभाव को व्यक्त करो और मुक्त हो जाओ। बस, यही धर्म का सर्वस्व है। मत, अनुष्ठान – पद्धति, शास्त्र, मन्दिर अथवा अन्य बाह्य क्रिया कलाप तो उसके गौण ब्यौरे मात्र है।" 
                "अज्ञान (अविद्या माया) के कारण हमारी बुद्धि देह,मन और इन्द्रियों के साथ जुड़ गयी है।मन को नियंत्रित करके प्रकृति के उपर प्रभुत्व स्थापित करना होगा। तब केवल स्वस्थ और पवित्र विचार ही हमारे मन को उत्प्रेरित कर सकेंगे, जीवन का एक नया दर्शन प्राप्त होगा, एक लक्ष्य निर्धारित हो जायेगा, मार्ग पर लगे मील के पत्थर  (रोहनिया ऊँच से बनारस कितनी दूर?)  दिखाई देने लगेंगे।  इच्छाएं [श्रेय -प्रेय विवेक से चुनी गयी एषणायें -वित्तैषणा, पुत्रैषणा तथा लोकैषणा ] उपयोगी होकर काम में आएँगी, उनको नियंत्रण में रखने का सामर्थ्य भी प्राप्त होगा। और हमारे चरित्र में (बाहरी व्यवहार में, अपने घर और मुहल्ले के लिए  त्याग और सेवा रूपी व्यावहारिक वेदान्त ) उसकी  अभिव्यक्ति प्रतिबिंबित होगी। इसके परिणाम स्वरुप चरित्रबल आएगा, जीवन गठित होने लगेगा, और सुगठित जीवन में समस्त समस्याओं का समाधान मिलने  लगेगा। 
स्वामी विवेकानन्द के विचारों के आलोक में युवाओं की समस्या का विश्लेषण करने से उसके समाधान का ऐसा ही मार्गदर्शन प्राप्त होता है। किन्तु, सामान्य प्रचलित विचार-धारा की अपेक्षा यह मार्ग  इतना अलग है, कि हर कोई आसानी से इस विचारधारा का स्वागत करने का साहस नहीं कर पायेगा।  इसका कारण यह है कि हमलोग अपने को चाहे कितना भी क्रान्तिकारी प्रदर्शित क्यों न करें पर किसी नई विचारधारा को स्वीकार करने से हमें बहुत डर लगता है।
      सचमुच स्वामी जी  विचारधारा जीवन के समस्त पहलूओं में क्रान्तिकारी परिवर्तन लाने में सक्षम है। किन्तु उनकी नई क्रान्ति के आह्वान के प्रतिउत्तर में  जनकल्याण के कार्यों में अपने जीवन तक को न्योछावर कर देने वाला साहस से भरपूर मन का बहुत बड़ी संख्या में मिलना संभव नहीं है। किन्तु, जितने भी युवा साहसी और मरजीवड़े है, जो उल्टी धारा के तैराक हों -उनके सामने आ जाने का समय अब आ गया है। वे लोग भी स्वामीजी के जैसा कहने का साहस रखकर कहेंगे, " सारी दुनिया भी हाथों में तलवार लेकर मेरे विरुद्ध क्यों न खड़ी हो जाये, किन्तु मैं ने  एक बार जिसे (अवतार वरिष्ठ को) 'सत्य,शिव और सुन्दर' समझ कर ग्रहण कर लिया हूँ, उसको छोड़ नहीं सकता।" {"बरउँ संभु ,न त रहउँ कुआरी॥}
[" अपने धर्म के (सनातन-वैदिक धर्म के) उसी एक केन्द्रवर्ती सत्य पर खड़े हो जाओ - जो हिन्दू, बौद्ध और जैनियों के लिए पैतृक सम्पत्ति है। वह सत्य है मनुष्य की 'आत्मा' ! अजर, अमर, अविनाशी, सर्वगत मानवात्मा जिसकी महिमा का वर्णन वेद भी नहीं का सकते, जिसके वैभव के सामने सूर्य-चंद्र , तारागण और आकाशगंगा समेत सारा विश्व-ब्रह्माण्ड एक 'बिन्दु' जैसा है। प्रत्येक स्त्री-पुरुष, यही नहीं, उच्चतम देवों से लेकर छोटे -छोटे जीव सब वही अनन्त 'आत्मा ' हैं , कोई विकसित कोई अविकसित हैं। अन्तर प्रकार में नहीं , केवल परिमाण में है। आत्मा की इस अनंत शक्ति का प्रयोग जड़ वस्तु (देह,मन इन्द्रिय) पर होने से 'मूढ़ बुद्धि' का विकास होता है, और 'अपने पर' ही होने से  - 'मनुष्य' का ईश्वर बन जाता है। (मूढ़ बुद्धि को देह-मन के तादात्म्य से हटाकर आत्मा से जोड़ लेने पर, स्वार्थी क्षुद्र अहं, पूर्णतः निःस्वार्थी सर्वगत अहं ईश्वर में परिणत हो जाता है -क्योंकि Unselfishness is God!पहले हमें ईश्वर बन लेने दो। तत्पश्चात दूसरों को ईश्वर बनाने में सहायता देंगे।  'बनो और बनाओ', "Be and Make" यही हमारा मूलमंत्र रहे। ऐसा न कहो कि मनुष्य पापी है। उसे यह बताओ कि तू ब्रह्म है। " (९/३७९) 
" मुझे तो केवल इसी बात की शिक्षा देनी है कि ईश्वर बार बार आता है , वह भारत में कृष्ण, राम और बुद्ध के रूप में आया और वह पुनः आयेगा। यह प्रायः दिखाया जा सकता है कि प्रत्येक 500 वर्ष के पश्चात दुनिया नीचे जाती है, और एक महान आध्यात्मिक लहर आती है और उस लहर के शिखर पर एक 'ईसा' होता है! ... और श्रीरामकृष्ण की जन्मतिथि से ही सत्ययुग का प्रारम्भ हो चुका है। (१०/३९)
> मनुष्य और ईसा (अवतार) में अन्तर : अभिव्यक्त प्राणियों में बहुत अन्तर होता है। अभिव्यक्त प्राणी के रूप में तुम ईसा कभी नहीं हो सकते। मिट्टी से एक मिट्टी का हाथी बना लो , उसी मिट्टी से एक मिट्टी का चूहा बना लो। उन्हें पानी में डालदो - वे एक बन जाते हैं। मिट्टी के रूप में वे निरंतर एक हैं , गढ़ी हुई वस्तुओं के रूप में निरंतर भिन्न हैं। ब्रह्म ही ईश्वर (भगवान-अवतार वरिष्ठ) तथा मनुष्य दोनों का उपादान है। पूर्ण सर्वव्यापी सत्ता के रूप में हम सब एक हैं, परन्तु वैयक्तिक प्राणियों के रूप में ईश्वर (भगवान) शाश्वत स्वामी हैं और हम शाश्वत सेवक हैं।
    "तुम्हारे पास तीन चीजें '3H'  हैं- 1. शरीर, 2. मन 3. आत्मा! आत्मा इन्द्रियातीत हैमन (मिथ्या अहं) जन्म और मृत्यु का पात्र है और वही दशा शरीर की है। तुम वही (अजर-अमर-अविनाशी) आत्मा हो, पर बहुधा तुम सोचते हो की तुम (नश्वर) शरीर हो। जब मनुष्य कहता है- 'मैं यहाँ हूँ',  तो उस समय वह शरीर की बात सोचता है। फिर एक दूसरा क्षण आता है , जब तुम उच्चतम भूमिका में होते हो, तब तुम यह नहीं कहते - " मैं यहाँ हूँ ! (अभी मजा चखाता हूँ!)" किन्तु जब कोई तुम्हें गाली देता है, या तुम्हारा अपमान करता है, और तुम भीतर से क्रोधित नहीं हो जाते, तब तुम आत्मा हो। "(खंड 10. पृष्ठ 40)]      
        हमलोग इस देव-दुर्लभ मनुष्य जीवन की उपेक्षा करके इसे नष्ट नहीं होने देंगे। तात्क्षणिक देह-सुख के बदले हम भूमानन्द पाने की सम्भावना को धूल में फेंकना नहीं चाहेंगे। करोड़ों भुखमरी के शिकार मनुष्यों के आर्तनाद को अनसुनी  कर व्यक्तिगत स्वार्थों को पाने की चेष्टा नहीं करेंगे, जीवन्त देवता की अनदेखी करके उसकी अनन्त अभिव्यक्ति का अपमान नहीं होने देंगे।"
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1895 
प्रिय आलासिंगा, 

हम हिन्दू सनातन वैदिक धर्म के अनुयायियों का कोई एक अलग संघ नहीं है, और न ही हम कोई संघ बनाना ही चाहते हैं। हमारे सनातन धर्म के अनुसार प्रत्येक पुरुष या नारी जो भी व्यक्ति 'शिक्षा' प्रदान करना चाहें, या 'धर्म-उपदेश' करना चाहें, इसके लिए वे पूर्ण रूप से स्वतंत्र हैं। 

(हमारा विश्वास है कि ) यदि तुम्हारे अन्दर 'spirit' है- अर्थात परम सत्य की अनुभूति है, तो तुम लोगों का ध्यान आकृष्ट करने में कभी असफल न रहोगे। 'थियोसोफिस्ट' # लोगों की कार्य-प्रणाली का अनुसरण हम (सनातनी हिन्दू) कभी नहीं कर सकते, इसका बहुत सीधा सा कारण यह है कि वे एक 'संघबद्ध सम्प्रदाय' (organised sect) हैं, और हम सनातनी हिन्दू लोग वैसे नहीं हैं। 

[# थियोसोफी (Theosophy) क्या है ?  १९वीं शताब्दी के अन्तिम काल में संयुक्त राज्य अमेरिका में स्थापित क्या गया एक धर्म है। इसकी स्थापना मुख्यतः रूसी प्रवासी हेलेना ब्लावट्स्की द्वारा की गयी थी। इसके सिद्धान्त मुख्यतः उनके ही लेखन पर आधारित हैं। यह धर्म निओप्लेटोनिज्म (Neoplatonism नव-प्लेटोवाद) आदि यूरोप के प्राचीन धर्म तथा हिन्दू और बौद्ध धर्म के मूल सिद्धान्तों से बहुत कुछ ग्रहण करता है।


निओप्लेटोनिज्म (नव-प्लेटोवाद) प्राचीन यूनानी दर्शन की एक प्रमुख विचारधारा है जो प्लेटो के विचारों को पुनर्जीवित और प्रचारित करती है, जिसका मुख्य सिद्धान्त "The One" या 'एक' की अवधारणा है, जिससे सब कुछ निकलता है, जिसमें सबकुछ स्थित है , और अंततः उसी में विलीन हो जाता है।  जिसमें आत्मा की पवित्रता और दिव्य मिलन (divine union) पर जोर दिया जाता है, और यह पश्चिमी तथा पूर्वी आध्यात्मिकता को प्रभावित करने वाला एक महत्वपूर्ण दार्शनिक और रहस्यवादी पंथ था।- इसलिए स्वामीजी आलासिंगा को लिखित इस पत्र में कहते हैं - "Individuality is my motto. I have no ambition beyond training individuals up."]

'Individuality is my motto.' - 'व्यक्ति-निर्माण' ही मेरा सिद्धांत है। 'शिक्षा' के द्वारा प्रत्येक व्यक्ति को 'विवेक-सम्पन्न' मनुष्य बनने का प्रशिक्षण देने के सिवाय मेरी और कोई अन्य अभिलाषा नहीं है।[ शिक्षा अर्थात "Be and Make' प्रशिक्षण " के द्वारा साधन-चतुष्टय सम्पन्न 'मनुष्य बनने और बनाने' का प्रशिक्षण देने के सिवाय, मेरी और कोई अन्य अभिलाषा नहीं है। where I am ignorant, I confess it as such !
मैं बहुत कम जानता हूँ, (मेरा ज्ञान बस 'चार महावाक्यों' तक सीमित है !) मैं उस सीमित ज्ञान की शिक्षा बिना किसी संकोच के "without reserve" (जाति या धर्म के नाम पर भेदभाव किये बिना) देता रहता हूँ। जिस विषय को मैं नहीं जानता हूँ , उसके बारे में स्पष्ट कह देता हूँ कि उक्त विषय में मेरा कोई ज्ञान नहीं है। जब मैं यह सुनता हूँ कि थियोसोफिस्ट, ईसाई, मुसलमान अथवा अन्य किसी भी (सम्प्रदाय के) व्यक्ति से संसार में लोगों के दुःख को कम करने में थोड़ी भी सहायता मिल रही है, तो इसे सुनकर ही मुझे जो आनंद मिलता है, उसे मैं व्यक्त नहीं कर सकता। ('I am a Sannyasin; as such I consider myself as a servant, not as a master in the world.') मैं तो एक संन्यासी (निष्काम 'शिक्षक' -'नेता') हूँ -'नेतृत्व करते' समय या 'शिक्षा देते'- समय मैं अपने को सबका सेवक (दादा कहते थे देह रूपी देवालय का 'पुजारी') समझता हूँ , न कि अपने को कोई 'गुरु' (या 'गोसाईंजी') समझता हूँ ! (If people love me, they are welcome, if they hate, they are also welcome.) ... यदि लोग मुझसे प्रेम करते हों , तो उनका स्वागत है और यदि वे मुझे घृणा की दृष्टि से देखते हों , तो देख सकते हैं , यह उनकी ख़ुशी है। [दादा कहते थे -"उद्धरेत् आत्मना आत्मानं !" यहाँ स्वामीजी भी कहते हैं ! Each one will have to save himself, each one to do his own work.]  
  प्रत्येक व्यक्ति को अपना उद्धार स्वयं करना होगा -प्रत्येक व्यक्ति को आत्मनिर्भर बनना होगा ! मैं किसीसे सहायता की भीख नहीं माँगता, और न मैं किसी की दी हुई सहायता की उपेक्षा ही करता हूँ। न तो संसार में किसी से सहायता लेने का कोई अधिकार मुझको है। जिस किसी ने मेरी सहायता की है,या जो कोई भविष्य में ऐसा करेगा , यह मुझ पर उसकी उदारता है, मेरा अधिकार नहीं, और इस प्रकार मैं सतत आभारी हूँ। 

जब मैंने संन्यास ग्रहण किया, अपना यह कदम मैंने 'consciously'- सोच-समझकर उठाया,  यह जानते हुए कि यह शरीर भूख से पीड़ित होकर विनष्ट हो जायेगा। गरीब मेरे मित्र हैं , मैं गरीबों से प्रेम करता हूँ, मैं दरिद्रता आदरपूर्वक अपनाता हूँ। जब कभी भोजन के बिना उपवास रखना पड़ता है , तब मैं आनन्दित ही होता हूँ। मैं किसी से सहायता नहीं माँगता, उससे लाभ ही क्या है? सत्य (अवतार वरिष्ठ) अपना प्रचार स्वयं कर लेगा, मेरी सहायता के बिना भी वह कभी विनष्ट नहीं हो सकता। "Truth will preach itself, it will not die for the want of the helping hands of me!" 
सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ।

          ततो युद्धाय युज्यस्व न एवम् पापम् अवाप्स्यसि।।2.38।।

।।2.38।।सुखदुःखे समे  कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ। ततः  युद्धाय युज्यस्व  न एवम् पापम् अवाप्स्यसि। 
 सुख-दु:ख,  लाभ-हानि और जीत और हार में समदृष्टि (equanimity, संतुलन,धीरज,सम बुद्धि, एक समान-मति) रखते हुए युद्ध लग जाओ; इस प्रकार तुमको पाप नहीं होगा। 
 
["Making happiness and misery the same, making success and failure the same, fight thou on" 
[सुख और दुख, लाभ और हानि, जीत और हार को एक समान मानकर,-'engage thou in battle for the sake of battle' युद्ध के लिए युद्ध करो (फल की चिंता छोड़कर, समदृष्टि या संतुलित बुद्धि से, 'बुद्धि' को 'प्रभु' का यंत्र बनाकर (अवतार-वरिष्ठ आत्मा का यंत्र बना कर)- कर्म करो; इस तरह तुम्हें पाप नहीं लगेगा। 'युद्ध स्वधर्म है' - यह मानकर युद्ध करने वाले के लिये यह उपदेश है। 
2.38 (Gita)-Having made pleasure and pain, gain and loss, victory and defeat the same, engage thou in battle for the sake of battle; thus thou shalt not incur sin.] 

 'स्वस्थ शरीर, ईर्ष्या (राग)-द्वेष से मुक्त तथा सभी परिस्थितियों में शांत मन (poise), तथा शाश्वत प्रेम से परिपूर्ण ह्रदय', एक मात्र इसी (3H-एकता) से कार्य हो सकता है, अन्य किसी प्रकार से नहीं।'.... 

        
तुम्हारा,
विवेकानन्द 
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1895.

DEAR ALASINGA,

We have no organisation, nor want to build any. Each one is quite independent to teach, quite free to preach whatever he or she likes.

If you have the spirit within, you will never fail to attract others. Theosophists' method can never be ours, for the very simple reason that they are an organised sect, we are not.

Individuality is my motto. I have no ambition beyond training individuals up. I know very little; that little I teach without reserve; where I am ignorant, I confess it as such, and never am I so glad as when I find people being helped by Theosophists, Christians, Mohammedans, or anybody in the world. I am a Sannyasin; as such I consider myself as a servant, not as a master in the world. . . . If people love me, they are welcome, if they hate, they are also welcome.

Each one will have to save himself, each one to do his own work. I seek no help, I reject none. Nor have I any right in the world to be helped. Whosoever has helped me or will help, it will be their mercy to me, not my right, and as such I am eternally grateful.

When I became a Sannyasin, I consciously took the step, knowing that this body would have to die of starvation. What of that, I am a beggar. My friends are poor, I love the poor, I welcome poverty. I am glad that I sometimes have to starve. I ask help of none. What is the use? Truth will preach itself, it will not die for the want of the helping hands of me! "Making happiness and misery the same, making success and failure the same, fight thou on" (Gita). It is that eternal love, unruffled equanimity under all circumstances, and perfect freedom from jealousy or animosity that will tell. That will tell, nothing else.
Yours,
VIVEKANANDA.
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।।2.38।। सुख-दु:ख,  लाभ-हानि और जय-पराजय को समान करके युद्ध के लिये तैयार हो जाओ;  इस प्रकार तुमको पाप नहीं होगा।।

।।2.38।। इस श्लोक में कर्मयोग का दिशा निर्देश है। इसी अध्याय में आगे भक्तियोग का भी संक्षेप में संकेत किया गया है। यहाँ आत्मोन्नति की साधना का स्पष्टरूप से वर्णन करते हैं। 
'3H' शरीर मन और बुद्धि ( देह से नहीं आत्मा से जुड़ी हुई 'शुद्ध बुद्धि' दृष्टि या मति) इन तीन उपाधियों के माध्यम से ही हम जीवन में विभिन्न अनुभव प्राप्त कर सकते हैं। इन तीन स्तरों पर प्राप्त होने वाले सभी अनुभवों का समावेश इस श्लोक में कथित तीन प्रकार के द्वन्द्वों में किया गया है। 
अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितियों को सुख और दुख के रूप में अनुभव करना बुद्धि की प्रतिक्रिया है।  लाभ और हानि ये मन की कल्पनायें हैं जिस कारण वस्तु की प्राप्ति पर हर्ष और वियोग पर शोक होना स्वाभाविक है। भौतिक जगत् की उपलब्धियों को यहाँ जय- पराजय शब्द से सूचित किया है।  श्रीकृष्ण का उपदेश यह है कि मनुष्य को इस प्रकार की विषम परिस्थितियों में सदैव मन के सन्तुलन (Poise) को बनाये रखना चाहये। 
इसके लिये सतत जागरूकता - [Real I' अपने सत्यस्वरूप की स्मृति, इष्टदेव, पाका आमि]   की आवश्यकता है। अज्ञानी पुरुष (स्वयं को 'Apparent I' नश्वर देह समझने वाला, अविद्या माया को सत्य समझने की भ्रमित बुद्धि, अविवेकी मूढ़मति का मनुष्य) यही चाहता है कि उसके जीवन में किसी प्रकार की समस्यायें  न आयें, जो सर्वथा असम्भव है  जीवन नदी के लक्ष्य तक पहुँचने के प्रवाह या गति में सुख- दुःख, लाभ-हानि और जय-पराजय, की लहरें उठना अनिवार्य है अन्यथा गतिहीन जीवन तो मृत जीवन जैसा है। जीवन नदी में उठती तरंगों के आघातों से  'विचलित हुये बिना जीवन जीने की कला' हमको सीखनी चाहिये। भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन को युद्ध करो लेकिन साथ ही साथ समत्व का भाव भी बनाये रखो ! अर्थात युद्ध भी करो और साथ में  मेरा स्मरण भी करते रहो ! मन में किसी के भी प्रति घृणा का भाव न रहने से मनुष्य वास्तविक स्फूर्ति और प्रेरणा का जीवन जी सकता है। और ऐसे व्यक्ति की उपलब्धियां सच्ची सफलता की आभा से युक्त होती हैं। हम जब दैवी प्रेरणा के आनन्द से अविभूत कोई कार्य कर रहे होते हैं तब हमारी कल्पनायें विचार और कर्म अपनी एक निराली ही सुन्दरता से ओत-प्रोत होते हैं। पाश्चात्य विचारकों के लिये दैवी -प्रेरणा मात्र संयोग है , जिस पर मानव का कोई नियन्त्रण नहीं रहता,  जबकि भारतीय मनीषियों के अनुसार दैवी प्रेरणा का जीवन मनुष्य का वास्तविक लक्ष्य है जिसे वह अपने आत्मस्वरूप के साथ (अपने आदर्श या इष्टदेव के साथ) पूर्णतया तादात्म्य स्थापित करके जी सकता है।

 अविचलता और आत्मनिर्भरता के गुण को अपने जीवन और व्यवहार में अभिव्यक्त करते समय, हम मान -अपमान से, या अनुकूलता -प्रतिकूलता से अप्रभावित रहकर अपनी बुद्धि (मति या दृष्टि) के साक्षी बनकर देखते रहते हैं कि वह - M/F नश्वर देह से जुड़ी हुई है या अविनाशी आत्मा से ?      
जब हम मन और बुद्धि के साक्षी बनकर रहते हैं, तो वे  क्षण अहंकार की विस्मृति के क्षण होते हैं, जो हमारे कर्मों को उषकाल की जगमगाती लाली की आभा से समृद्ध कर देते हैं। जबकि सामान्य मनुष्य की धारणा होती है कि 'अहंकार के अभाव में'  हम कार्य करने में अकुशल या असमर्थ बन जायेंगे परन्तु यह मिथ्या धारणा है। योगी होकर अपनी बुद्धि को आत्मा के साथ जोड़कर , या आस्तिक -बुद्धि से बिना विचलित हुए कर्म भी कर सकते हैं। 
युद्ध की ओर केवल नैतिकता की भावना से देखने के कारण अर्जुन उस परिस्थिति को उचित रूप में समझ नहीं सका। शत्रुपक्ष में खड़े अपने ही बन्धुबान्धवों को विनष्ट करना नैतिकता के विरुद्ध था।  किन्तु स्वयं को देह (M/F) समझने वाली मूढ़बुद्धि, सम्मोहित बुद्धि, भावावेश-जनित बुद्धि की भ्रमित अवस्था में उसने विवेकी बुद्धि के अन्य दृष्टि-कोणों पर विचार ही नहीं किया, जिससे वह पुन संयमित हो सकता था। 
 तो अंततोगत्वा आस्तिकबुद्धि का श्राद्धवान अर्जुन भगवान् कृष्ण की शरण में जाता है। पार्थसारथी श्रीकृष्ण (पार्थ के बुद्धिरूपी सारथि स्वयं भगवान कृष्ण) उसके मार्गदर्शन का उत्तरदायित्व अपने ऊपर लेकर ,जीवन के सभी दृष्टिकोणों को उसके सामने प्रस्तुत करते हैं। सम्पूर्ण गीता में श्रीकृष्ण मनुष्य को प्राप्त 'विवेकशील बुद्धि' की भूमिका निभाते हैं जो कठोपनिषद् की भाषा में देहरूपी रथ (इन्द्रियाँ घोड़े , मन लगाम और शुद्धबुद्धि) सारथि का योग्य सारथि हैं। पार्थसारथी भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को आध्यात्मिक, बौद्धिक, नैतिक और पारम्परिक दृष्टियों से विचार करने के बाद  युद्ध करने की सम्मति देते हैं। और जिस भावना से कर्म करना चाहिये उसका विवेचन इस श्लोक में श्रीकृष्ण ने किया है। 
स्वयं को स्थूल देह (Apparent I' M/F आदम और हव्वा) समझकर कर्म करने से जो चिन्तायें विक्षेप,व्याकुलतायें होती हैं उनसे ऊपर उठकर,सभी विषम परिस्थितियों में, बुद्धि को आत्मा (इष्टदेव) में जोड़ते ही मूढ़बुद्धि भी समभाव (अविचलता या शुद्ध बुद्धि में स्थित होकर) आत्मस्थ बुद्धि ( विवेकी बुद्धि, विवेकी मति -ब्रह्मैव इदं सर्वं, विवेक-दृष्टि, मति ) से कर्म करना चाहिये। क्योंकि जैसी मति वैसी गति। क्योंकि बुद्धिनाशात् प्रणश्यति ! मन-बुद्धि के समत्व भाव में रहने से जीवन की वास्तविक सफलता निश्चित होती है। 
इस सृष्टि में सभी मनुष्य (जीव) अपनी-अपनी वासनाओं का/कर्मों का क्षय करने के लिये ही विभिन्न प्रकार शरीर (नाम-रूप) धारण किये हुये हैं। इस प्रकार वृक्ष, पशु अथवा मनुष्य सभी (का मन-बुद्धि) वासनाओं के भण्डार हैं। सब परिस्थितियों में समभाव में स्थित हुआ मन (राग-द्वेष से मुक्त मन) वासनाओं के उन्मूलन का मार्ग बन जाता है। मन के समत्व भाव में रहने से जीवन की वास्तविक सफलता निश्चित होती है। यह द्वार जब अहंकार और स्वार्थ से अवरुद्ध होता है तब वासनाक्षय के स्थान पर असंख्य नयी वासनाएँ उत्पन्न होती जाती हैं। 

सब परिस्थितियों में समभाव में स्थित हुआ मन बुद्धि 'क्षुद्र अहंकार' अपने को कर्ता मानकर कर्म नहीं करता - गुण ही गुणों में बरत रहे हैं - क्षुद्र अहं फिर सर्वगत अहं में परिणत होकर , प्रारब्ध कर्मों के/ क्षय या का वासनाओं के निस्सारण का मार्ग बनता है। 'क्षुद्र अहं' से ह्रदय का द्वार बंद रहने के कारण, स्वार्थी बुद्धि से युक्त आत्मा  अंतर्निहित ब्रह्मत्व को अभिव्यक्त नहीं कर पाती, तब वासनाक्षय के स्थान पर असंख्य नयी वासनाएँ उत्पन्न होती जाती हैं। 
  कर्मयोग की भावना से निष्काम -कर्म करते हुये जीवन जीने पर अन्तकरण की शुद्धि  यानि बुद्धि/दृष्टि/मति की शुद्धि प्राप्त होती है। तत्त्वज्ञान और सामान्यजन की दृष्टि से विचार करने के पश्चात् भगवान् अर्जुन को कर्मयोग की भावना से युद्ध करने का उपदेश देते हैं। अद्वैत (एक ही अनेक बन गया है ,तत्त्वज्ञान) को समझ कर उसे जीवन में जीना ही व्यावहारिक वेदान्त है।
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हम स्वयं अपना उपकार करते हैं , संसार का नहीं। 
इस प्रकार आज के व्याख्यान का सारांश यह है कि : सर्वप्रथम हमें यह ध्यान में रखना चाहिये कि यह तो हमारा सौभाग्य है कि हमें संसार में कुछ सेवा करने का अवसर मिला है। हमीं जगत के ऋणी हैं, जगत हमारा ऋणी नहीं है ![जीवो ब्रह्मैव न अपरः] संसार की सहायता करने से हम वास्तव में अपना ही कल्याण करते हैं। दूसरी बात यह कि इस विश्व का अधिष्ठाता एक ईश्वर है। यह बात सच नहीं कि संसार पिछ्ड़ गया है, और इसे तुम्हारी या मेरी सहायता की आवश्यकता है। ईश्वर सर्वत्र विराजमान हैं। वह अविनाशी सतत क्रियाशील और जाग्रत है। जब सारा विश्व सोता है, तब भी वह जागता रहता है। वह निरंतर कार्य में लगा हुआ है। संसार के समस्त परिवर्तन और विकार उसी के कार्य हैं। 
तीसरी बात यह कि हमें किसी से घृणा नहीं करनी चाहिये। यह संसार सदैव ही शुभ और अशुभ का मिश्रण-स्वरूप रहेगा। हमारा कर्तव्य है कि हम दुर्बल के प्रति सहानुभूति रखें और एक अन्यायी के प्रति भी प्रेम रखें। यह संसार तो चरित्र-गठन के लिये एक विशाल नैतिक व्यायामशाला (grand moral gymnasium)  है। इसमें हम सभी को अभ्यास रूपी कसरत करनी पड़ती है, जिससे हम आध्यात्मिक बल से अधिकाधिक बलवान बनते रहें
[(3H विकास के 5 अभ्यास : इसमें विवेक-सम्पन्न बुद्धि, विवेकी दृष्टि या विवेकी मति का प्रयोग के बाद ही कोई कार्य करने का अभ्यास करके अपना चरित्र गठित करने का मौका प्राप्त होता है।]
चौथी बात यह है कि हममें किसी प्रकार का दुराग्रह नहीं होना चाहिये, क्योंकि दुराग्रह प्रेम का विरोधी है। बहुधा दुराग्रहियों को तुम यह गाल बजाते सुनोगे, " हमें  पापी से घृणा नहीं है, हमें तो घृणा पाप से है। " परन्तु यदि कोई मुझे ऐसा मनुष्य दिखा दे, जो सचमुच पाप और पापी में भेद कर सकता हो, तो ऐसे मनुष्य को देखने के लिये मैं कितनी भी दूर जाने को तैयार हूँ, ऐसा कहना सरल है। किन्तु यदि हम सचमुच वास्तविक सत्ता (आत्मा)  और उसके गुण (शक्ति, माया) में भली-भाँति भेद कर सकें, तो हम पूर्ण हो जाएँ। (3H में जो दीखता है वो नश्वर (माया) है, और जो वास्तव में है वह आत्मा है !) पर इसे व्यवहार में लाना इतना सरल नहीं। हम जीतने ही शान्तचित्त होंगे और हमारे स्नायु जीतने संतुलित रहेंगे, हम उतने ही अधिक प्रेमसंपन्न होंगे और हमारा कार्य भी उतना ही उत्तम होगा। (खंड ३/ ५४-५५)
[साभार : विवेक जीवन ब्लॉग /July 5, 2014/ ' विवेकानन्द - दर्शनम् ' - श्री नवनीहरण मुखोपाध्यायः (26)]
" तुम अपने प्रेम और नम्रता की परीक्षा करो। ईर्ष्यालु व्यक्ति नम्र और प्रेममय नहीं होता। ईर्ष्या एक भयंकर भयावह पाप है ; यह मनुष्य में अत्यन्त रहस्यमय तरिके से प्रवेश कर जाती है। अपने से पूछो , तुम्हारा मन घृणा अथवा ईर्ष्या की प्रतिक्रिया करता है या नहीं ? " ३/२७१)   

>>We help ourselves, not the world – Swami Vivekananda

Belief in God Makes Karma Yoga Easier
To recapitulate the chief points in today’s lecture: First, we have to bear in mind that we are all debtors to the world and the world does not owe us anything. It is a great privilege for all of us to be allowed to do anything for the world. In helping the world we really help ourselves. The second point is that there is a God in this universe. It is not true that this universe is drifting and stands in need of help from you and me. God is ever present therein, He is undying and eternally active and infinitely watchful. When the whole universe sleeps, He sleeps not; He is working incessantly; all the changes and manifestations of the world are His. Thirdly, we ought not to hate anyone. This world will always continue to be a mixture of good and evil. Our duty is to sympathise with the weak and to love even the wrongdoer.
The world is a grand moral gymnasium wherein we have all to take exercise so as to become stronger and stronger spiritually. Fourthly, we ought not to be fanatics of any kind, because fanaticism is opposed to love. You hear fanatics glibly saying, “I do not hate the sinner. I hate the sin,” but I am prepared to go any distance to see the face of that man who can really make a distinction between the sin and the sinner. It is easy to say so. If we can distinguish well between quality and substance, we may become perfect men. It is not easy to do this. And further, the calmer we are and the less disturbed our nerves, the more shall we love and the better will our work be."
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" अब उपाय है -शिक्षा का प्रसार। पहले आत्मज्ञान। ...जिस ज्ञान के द्वारा मनुष्य संसार-बंधन तक से छुटकारा पा जाता है, उससे क्या तुच्छ भौतिक उन्नति नहीं हो सकेगी ? अवश्य ही हो सकेगी। प्रत्येक जीवात्मा में अनंत शक्ति अव्यक्त भाव से निहित है।  वह (अविनाशी) आत्मा चींटी से लेकर ऊँचे से ऊँचे सिद्ध पुरुष तक सभी में  विराजमान है , अन्तर केवल उसके प्रकटीकरण के भेद में हैं। वरणभेदस्तु ततः क्षेत्रिकवत्। किसान जैसे खेतों की मेंड़ तोड़ देता है और एक खेत का पानी दूसरे खेत में चला जाता है, वैसे ही आवरण टूटते ही (क्षुद्र अहं काचा आमि हटते ही) आत्मा (सर्वगत अहं, पाका आमी)  भी प्रकट हो जाती है। इस शक्ति को सर्वत्र जा जा कर जगाना होगा। (कैवल्य पाद-४.३) (24 अप्रैल, 1897 को सरला घोषाल को लिखा पत्र 6/312)


रामकृष्ण मिशन का प्रतीक चिह्न

चित्र में लहराता पानी कर्म का प्रतीक है, कमल भक्ति का और उगता सूरज ज्ञान का। घेरा बनाता हुआ सर्प योग और जागृत कुंडलिनी शक्ति का प्रतीक है, जबकि चित्र में हंस परमात्मा का प्रतिनिधित्व करता है। अतः, चित्र का आदर्श यह है कि कर्म, ज्ञान, भक्ति और योग के मिलन से परमात्मा के दर्शन प्राप्त होते हैं।
रामकृष्ण मिशन की स्थापना 1 मई, सन् 1897 को रामकृष्ण परमहंस के परम् शिष्य स्वामी विवेकानन्द ने की। इसका मुख्यालय कोलकाता के निकट बेलुड़ में है। इस मिशन की स्थापना के केंद्र में अद्वैत दर्शन का प्रचार-प्रसार है। 
रामकृष्ण मिशन दूसरों की सेवा और परोपकार को कर्म योग मानता है जो कि हिन्दू धर्म का एक महत्वपूर्ण सिद्धान्त है। रामकृष्ण मिशन का ध्येयवाक्य है - आत्मनो मोक्षार्थं जगद् हिताय च (अपने मोक्ष और संसार के हित के लिये) रामकृष्ण मिशन को भारत सरकार द्वारा १९९६ में डॉ॰ आम्बेडकर राष्ट्रीय पुरस्कार से और १९९८ में गाँधी शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।
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[1.ग्रीक दर्शन के अनुसार शिक्षा (पाश्चात्य शिक्षा) छात्र को #'capable of receiving' जानकारी ग्रहण करने के योग्य बनाती है जबकि भारतीय गुरु-शिष्य वेदान्त शिक्षक प्रशिक्षण परम्परा में दी जानेवाली मनुष्यत्व-उन्मेषक शिक्षा (नित्य-अनित्य विवेकज-ज्ञान' उन्मेषक शिक्षा : दीर्घ 'ई०' वाली शीक्षा) मनुष्य में अन्तर्निहित ब्रह्मत्व (Inherent Divinity-पूर्णत्वं को) अभिव्यक्त करने की पद्धति में प्रशिक्षित करती है।]
2. मनुष्य जीवन की सर्वोच्च सम्भावना को अभिव्यक्त करने के प्रति, छात्रों में श्रद्धा उत्पन्न कर देना शिक्षक/नेता का दायित्व है। सर्वोच्च सम्भावना को व्यक्त करने का उपाय है -शिक्षा।  
3. शंकराचार्यजी द्वारा रचित विवेकचूड़ामणि में वर्णित विवेक की परिभाषा :  
ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्येत्येवरूपो विनिश्चयः |
सोयं नित्यनित्यवस्तुविवेकः समुदाहृतः || 20 ||
20. मन की यह दृढ़ धारणा कि ब्रह्म सत्य है और जगत मिथ्या है, सत्य और मिथ्या के बीच विवेक कहलाती है। 
4. मनुष्य जीवन को देवदुर्लभ क्यों कहा गया है ? 

"दुर्लभं त्रयमेवैतद्देवानुग्रहहेतुकम्।

मनुष्यत्वं मुमुक्षुत्वं महापुरुषसंश्रयः॥3।।

अर्थात् यह तीन बातें अत्यंत दुर्लभ हैं और केवल ईश्वर की कृपा से ही प्राप्त होती हैं — (1) मनुष्यत्व, अर्थात् मनुष्य का जन्म, (2) मुमुक्षुत्व, अर्थात् मोक्ष की तीव्र इच्छा और (3) महापुरुषसंश्रय, अर्थात् किसी महान आत्मज्ञानी पुरुष का संग या उनके सान्निध्य में रहना।
5. 'The Law of Success' :मन को सदैव उच्च विचारों से परिपूर्ण रखना ही 'सफलता का नियम' है , इसलिए 'जीवन-गठन' का रहस्य है।  

विचार करके देखो प्यारे, जगत बना है मन से। 
 
जैसे शेर भेंड़ बन बैठो, भय मानत सिंघन से।।

यह मन (बुद्धि) ही देह बन गया है। और यम से (मृत्यु के भय से) डरता रहता है। ये 'शुद्ध बुद्धि'  बहुत दिनों से मन -इन्द्रियों के साथ रही। उनकी आदत इस बुद्धि में आ गयी। उसी तरह से सोंचती है। इन्द्रियों के द्वारा मिले दुःखों -सुखों से बुद्धि सम्मोहित है। प्रभावित है। कभी आत्मा के आनन्द को नहीं जानती। 
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