Friday, August 10, 2012

स्वामी विवेकानन्द और हमारी सम्भावना [15] ' सुन्दरतर मनुष्यों का सुन्दरतर समाज ' (समस्या और समाधान),

 "उच्चतर स्तर की समाज-सेवा : युवाओं को विवेक-प्रयोग (मनःसंयोग) सिखा देना  !"
'नया भारत गढ़ो ' -भारतमाता की सभी संतानों का सबसे पहला उद्देश्य यही होना चाहिये। तथा यह समझ लेना चाहिए कि देश को सुन्दर ढंग से गढ़ने के लिये, पहले हमें स्वयं को सुन्दर रूप में गढ़ लेना होगा। फिर यह जानना होगा कि अपने जीवन को सुन्दर ढंग से गढ़ने का कार्य किस प्रकार किया जाता है ? तत्पश्चात इस प्रयत्न में जुट जाना ही हमलोगों का एकमात्र कर्तव्य है।
इस प्रकार की मूर्खतापूर्ण कल्पना तो कोई भी समझदार व्यक्ति नहीं कर सकता, कि राष्ट्र-संचालन के लिये किसी देश में कोई प्रशासनिक व्यवस्था नहीं होनी चाहिये, या कई राजनैतिक दल नहीं होने चाहिये अथवा अन्य किसी प्रकार की समाज-सुधारक या समाज-सेवी संस्थाएँ भी नहीं होनी चाहिये। हमलोगों को इसी प्रजातान्त्रिक परिवेश में और ऐसी ही सामाजिक संगठनों के बीच रहते हुए अपने कार्य-'बनो और बनाओ ' - में लगे रहना होगा।

हमलोग यदि किसी व्याख्यान को सही तरीके से सुने, और मन लगाकर सुने तो-वक्ता द्वारा कथित समस्त विचारों से भले ही हम एकमत न हों; तो भी उस विषय में हमलोगों का अपना कथन क्या होना चाहिये, इस बात की स्पष्ट धारणा हो जाती है। स्वामी विवेकानन्द ने भी अपने भाषण में कहा है - " यदि मुझे फिर से अपनी शिक्षा आरम्भ करनी हो और उसमें मेरा वश चले, तो मैं तथ्यों का अध्यन कदापि न करूँ। सबसे पहले मैं 'मनःसंयोग ' या मन की एकाग्रता के विषय में शिक्षा ग्रहण करूँगा। उसके बाद संसार में जितने भी विषय हैं, अपनी पसन्द के अनुसार उन सब विषयों को जानने की चेष्टा करूँगा।" हम लोग भी यदि 'मन को एकाग्र' कर पढ़ने या सुनने को अपनी आदत बना लें, तो बहुत से विषयों को बड़ी सहजता से भली-भाँति सीख सकते हैं। 
श्रीरामकृष्ण-विवेकानन्द वेदान्त परम्परा में मनःसंयोग का प्रशिक्षण इस जगत की सर्वश्रेष्ठ विचारधारा है या नहीं, इसे सिद्ध करने के लिये- विभिन्न प्रकार के ढेरों युक्ति-संगत तर्क दिए जा सकते हैं। किन्तु उसी को लेकर यदि हमेशा दूसरों के साथ तर्क-वितर्क करने में ही उलझे रहें, तो उससे कोई फल प्राप्त नहीं होगा, और हमलोगों का समय तथा शक्ति व्यर्थ में ही नष्ट होगी। किन्तु हमलोग यदि स्वामीजी की उपरोक्त कथन को स्वीकार करने में सहमत हो जाएँ कि हमलोग सभी लोगों की सभी बातों को सुनने-समझने की चेष्टा तो करेंगे, किन्तु पहले मनःसंयोग करना अवश्य सीखेंगे; तो हमलोग भी बहुत कुछ प्राप्त कर सकेंगे। छात्र लोग यदि रीढ़ की हड्डी सीधी रखकर बैठना सीख जाएँ, और सभी बातों को मन लगाकर सुनना सीख जाएँ तो वे स्कूल में अपनी पढाई-लिखाई बहुत अच्छे ढंग से कर सकेंगे। उसके बाद यदि वे यह भी जान लें कि मनुष्य-जीवन का उद्देश्य क्या है ?  तब तो उनके लिये यह सोने पर सुहागा जैसी बड़ी बात होगी। 
कई अच्छे विद्यार्थी स्कूल की पढ़ाई समाप्त करने के बाद, बाहर निकल कर जीवन में भी बड़े बने हैं। किन्तु बड़े बनने का अर्थ केवल इतना ही नहीं है कि अच्छी नौकरियों में चले गये हैं, या बहुत धन कमा रहे हैं, बल्कि सच्चे मनुष्य जैसा 'मनुष्य' बन गये हैं, या नहीं- ? इसलिये हमलोगों को, विशेषरूप से ' मनःसंयोग - सभी विषयों को ध्यान से सुनने और सुनी गयी बातों को याद रखने ' की विधि, अर्थात मन की एकाग्रता को सीखना अत्यन्त आवश्यक है।  हमलोग यदि पूरे व्याख्यान को मनोयोग पूर्वक नहीं सुनेंगे, तो उसमें कौन सी बात अच्छी है, कौन सी बात बुरी है, इसका निर्णय नहीं कर पायेंगे। और इसी भले-बुरे के बीच निर्णय कर लेना, या विवेक-पूर्ण निर्णय ले पाने की क्षमता रखना ही  मनुष्य का विशेष गुण, या मनुष्य की विशेष पहचान है।
धर्म किसे कहते हैं ? धर्म की मूल बात है विवेक-प्रयोग ! विवेक का अर्थ होता है, न्याय के मार्ग से चलना। (चार पुरुषार्थों-धर्म,अर्थ,काम, और मोक्ष में पहला  पुरुषार्थ-'धर्मलाभ' की सार बात है 'विवेक-प्रयोग।) अच्छी या बुरी --कौन सी वस्तु शाश्वत है, बहुत दिनों तक टिकती है, या चिर काल तक स्थायी रहती है, इसका विवेक-विचार करके चलना आवश्यक है। जैसे सूती कपड़ा बहुत दिनों तक नहीं टिकता, इसीलिये आजकल हमलोग टेरीकॉटन का पैन्ट ही अधिक पहनते हैं। क्यों ? प्रत्येक अच्छी वस्तु को, बुरी को नहीं - हम लोग चिरस्थायी करना चाहते हैं। किन्तु यदि सत-असत (अविनाशी और नश्वर ) के बीच बीच अंतर का निर्णय लेने वाली बुद्धि ही न रहे, तो हम उस सुख को चिरस्थायी नहीं बना सकेंगे। (शरीर तो नश्वर है, आत्मा अविनाशी है, सच्चा सुख वो है जो स्थायी होता है, आने के बाद कभी जाता नहीं है, जो सुख आने के बाद चला जाता है, वो कल्पना है।अतः सुख को चिरस्थायी बनाने के लिये मनःसंयोग सीखना आवश्यक है। मनःसंयोग किस प्रकार किया जाता है ? उसको जानने के लिये, हम लोगों अपने देश की प्राचीन काल के मनोविज्ञान - ' पतंजली योगसूत्र ' या 'अष्टांग योग' के कम से कम पाँच अंगों (यम-नियम, आसन-प्रत्याहार-धारणा) के सम्बन्ध में विस्तार से समझ लेना आवश्यक है।
किन्तु आजकल हमलोग हर बात के लिये, पश्चिम की तरफ देखना जरुरी समझते हैं। इसीलिये स्वामी विवेकानन्द ' स्वदेश-मन्त्र  ' में स्वामीजी स्पष्ट रूप से कहते हैं, कि दूसरों की ही नकल कर,या परमुखापेक्षी होकर कोई मनुष्य बड़ा नहीं बन सकता है। किन्तु हमलोग लगातार वैसा ही करते आ रहे हैं। स्वाधीनता के पहले तो यह था ही, किन्तु स्वाधीनता के ६५ वर्षों बाद भी हमलोग दूसरों की नकल करना छोड़ कर और कुछ नहीं कर पाये हैं। हम लोग अभी तक क्यों परमुखापेक्षी बने हुए हैं ? यदि हम उन कारणों का विश्लेषण करें, जिसके चलते हम दूसरों की नकल करना नहीं छोड़ पाते, तो यही देखेंगे कि हमलोगों ने अभीतक विवेक-वान मनुष्य का निर्माण करने के महत्व को नहीं समझा है; यह बात जितनी सत्य है, उतना ही सत्य यह भी है कि हमने परानुकरण करना भी नहीं छोड़ा है।
आजादी प्राप्ति के बाद भी - हमलोगों की सरकार कैसी होगी ? (' समाज को बाँटो- और राज करो!' के अंग्रेजों वाली नीति के आधार पर जनता को मूर्ख बनाकर) वोट कैसे लेना होगा ? पार्लियामेन्ट सिस्टम कैसा होगा ? हमारा संविधान कैसा होगा? उसमें कौन कौन सी बातें रखी जायेंगी ? हमारी विकास की परिकल्पना (रूस से उधार ली हुई पंच-वर्षीय योजना आदि ) कैसी होगी ?- इन समस्त विषयों को अपनाने में भी हमलोगों ने केवल परानुकरण ही किया है। क्यों किया ? इसीलिये कि हमलोगों में आत्मविश्वास नहीं है ! इसीलिये स्वामी विवेकानन्द ने हम लोगों से बार बार कहा था- " पहले तुम लोग आत्मविश्वासी मनुष्य बनो ! उसके बाद सबकुछ अपने आप प्राप्त हो जायेगा। 
वे कहते हैं- " कोई व्यक्ति या राष्ट्र जिस दीन से स्वयं को घृणा करना आरम्भ कर देता है, उसी दीन से उसकी मृत्यु प्रारंभ हो जाती है।' स्वाधीनता के बाद से हमलोग बार बार यही दुहराते आये हैं,कि हमलोग दुर्बल हैं, हमारा कोई अतीत नहीं है, हमारा कोई भविष्य नहीं है। इसी बात को सदियों से सुनते आये हैं, इसको सही मानने लगे हैं, स्वयं को सिखाते आये हैं, दूसरों को भी यही सिखाते आ रहे हैं। जब छात्र पहली बार स्कूल में आया, तो उसने सुना कि उसके बाबूजी तो बिल्कुल पागल हैं! क्योंकि उसके पिताजी का रहन-सहन बिल्कुल सादा है, तथा वे बिल्कुल ईमानदारी से जीवन व्यतीत करते हैं। उनको वहाँ सिखाया जाता है, कि ईमानदारी से जीने का कोई अर्थ ही नहीं है। चाहे जैसे भी धन कमाया हो,ऐशो-आराम से जीवन बिताना ही श्रेय है। जाने-अनजाने छात्रों के सामने इसी प्रकार का आदर्श रखे जाते हैं, और यही विचारधारा सर्वत्र फैलती जा रही है। (जबकि दूसरों के पापाजी या डैडीजी की उपरी इनकम बहुत है, इसलिए वे बड़े ठाट-बाट से रहते हैं इसीलिये कहा जाता है, तुम्हारे पिता इतनी बड़े पद पर रहकर भी कुछ नहीं बनाये, इसलिए एकदम पागल हैं।)
स्वामी विवेकानन्द कहते हैं, "जो व्यक्ति दिन-रात अपने को दीन-हीन या अयोग्य समझे हुए बैठा रहेगा, उसके द्वारा कुछ भी नहीं हो सकता। वास्तव में अगर दिन-रात वह अपने को दीन,नीच एव, 'कुछ नहीं' समझता है तो वह 'कुछ नहीं' ही बन जाता है। हम तो उसी सर्व शक्तिमान परम पिता की सन्तान हैं, उसी अनन्त ब्रह्माग्नि की चिनगारियाँ हैं, -भला हम 'कुछ नहीं' क्योंकर हो सकते हैं ? हम सब कुछ हैं, सब कुछ कर सकते हैं, और मनुष्य को सब कुछ करना ही होगा, हमारे पूर्वजों में ऐसा ही दृढ़ आत्मविश्वास था। इसी आत्मविश्वास रूपी प्रेरणा-शक्ति ने उन्हें सभ्यता की उच्च से उच्चतर सीढ़ी पर चढ़ाया था;और जिस दिन हमारे पूर्वजों ने अपना यह आत्मविश्वास गँवाया, उसी दिन से हमारी यह अवनति, यह दुरवस्था आरम्भ हो गयी। आत्मविश्वास-हीनता का मतलब है ईश्वर में अविश्वास. " ५/२६७
यदि स्वामी विवेकानन्द के विचारों का गहराई से विश्लेष्ण किया जाय, पायेंगे कि आज सारे देश के लोग ही लोभ, इन्द्रिय-परायणता, व्यक्तिगत-स्वार्थ या अपने अपने दलगतस्वार्थ (वोटबैंक -जातिवाद-आरक्षण) के उपर जरूरत से  ज्यादा ध्यान दे रहे हैं। सम्पूर्ण देश के स्वार्थ या साधारण जनता के स्वार्थ की ओर थोडा भी ध्यान नहीं दे रहे हैं। फिर देश का भला कैसे होगा ? यदि हम सम्पूर्ण देश का भला करना चाहते हों,उच्चतर स्तर की समाज-सेवा करना चाहते हों, तो इसके लिये हमें शिक्षा के आरम्भ से ही विवेक पूर्ण निर्णय करने का तरीका- अर्थात मनःसंयोग की पद्धति को सीखना होगा, और दूसरों को भी सिखाना होगा। क्या हमलोगों के पास अपनी कोई स्वतंत्र शिक्षा-नीति या आर्थिकनीति नहीं होनी चाहिए? किन्तु किसी के पास स्वतन्त्र रूप से चिन्तन करने का समय ही नहीं है, इसलिए हम केवल दूसरों की ही नकल कर रहे हैं, और परमुखापेक्षी होकर बैठे हुए हैं। इसीलिये हमलोगों के देश का सर्वांगीन विकास भी नहीं हो पा रहा है। हम सभी लोग यदि मनःसंयोग का अभ्यास करने लग जायें, तो किसी भी समस्या या, परिचर्चा के उपर मन को एकाग्र करके विचार-विश्लेष्ण द्वारा, 'विवेक-प्रयोग द्वारा, विवेक-पूर्ण निर्णय लेकर'-- स्वयं ही सभी प्रकार समस्याओं के समाधान का आविष्कार कर सकते हैं।
स्कूल में पढ़ते समय हमलोग यह जानते हैं कि हमारी पुस्तकों में सब कुछ लिख दिया गया है, किन्तु हम यह भी सोचते हैं कि जो तथ्य पुस्तक में लिखे हुए हैं, उन तथ्यों को अपने चित्त में भी लिख कर रख लेने की आवश्यकता है। हमलोग जो कुछ पढ़ते हैं या सुनते हैं, उसको यदि विवेक-प्रयोग की सहायता से, मन ही मन सार-असार को अलग करके समझ लिया जाय, तो उन प्रबंधों और व्याख्यानों की बातें, हमें बिलकुल अपने निर्णय जैसी प्रतीत होंगी।
जैसे विभिन्न वक्ता यहाँ आकर स्वामीजी के बहुत से संदेशों या विचारों के उपर कई व्याख्यान दिये और चले गये। हमलोग यदि उन विचारों का, तार्किक विश्लेष्ण (logical analysis) करके,लेकर उन्हें अपने सिद्धान्त के रूप में ग्रहण नहीं कर लेते, तब तक वे बातें स्वामीजी के विचार या विभिन्न वक्ताओं के विचार,या महामण्डल नामक किसी संस्था के विचार ही बने रहेंगे। इसलिए -Be and Make आदि  विचार, जब तक बिल्कुल मेरे अपने विचार नहीं बन जाते, तब तक व्याख्यान सुनने से कोई लाभ नहीं होने वाला है। 
स्वामीजी ने वर्तमान समाज को सुन्दर रूप से गठित करने के लिये जो तर्क,बुद्धि या परियोजना, पद्धति या उपाय की बात की है, उन्हीं विचारों को श्रेष्ठ या सर्वोपरी विचार इसलिए कहा जा सकता है कि, वे ही पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने अपने कार्यों को दो भागों में विभक्त नहीं किया था। जबकि, हमलोगों के सभी कार्यों दो प्रकार के होते हैं। एक है लौकिक (secular) दुनियावी या धर्म से संबन्ध न रखने वाले कार्य, और दूसरा लौकिक के अतिरिक्त अन्य प्रकार का कार्य, जो पवित्र या धार्मिक (sacred) कार्य कहे जाते हैं। जो व्यक्ति केवल लौकिक जीवन के उपर ध्यान केन्द्रित रखते हैं, वे अपने लौकिक या सांसारिक जीवन को सुन्दर बनाने का ही प्रयत्न करते रहते हैं। सांसारिक जीवन या लौकिक जीवन को अच्छा बनाने के लिये जो परिश्रम करना होता है, वह अलग ही ढंग का होता है।
और जो लोग अपने को धार्मिक समझते हैं, वे धर्म करने के लिये कुछ अलग प्रकार के कार्यों- तीर्थाटन या कुम्भस्नान आदि को, चुन करके अलग रख लेते हैं। या फिर जो लोग जो धर्म में विश्वास नहीं करते (कम्यूनिस्ट होते हैं), वे भी अपने लिये कुछ अलग ढंग के कार्य (जैसे मरने के बाद बॉडी या आँखों को दान करना ) को रख लेते हैं।(वे नहीं जानते कि इससे भी पूण्य कर्म बाँधेगा) किन्तु स्वामी विवेकानन्द ही वह प्रथम व्यक्ति हैं, जिन्हों ने यह कहा कि -" कार्य तो बस एक ही है- और वह है, वैश्विक कल्याण या लोकहित करना, समाज-सेवा का कार्य करना। वैश्विक कल्याण करने के अतिरिक्त अन्य कोई कर्म, वास्तव में कर्म है ही नहीं। हमारे सभी कर्मों का एक ही उद्देश्य रहना चाहिए- और वह है वैश्विक कल्याण या लोकहित ! स्वामी विवेकानन्द ने इस सिद्धान्त को अपने मन से निकल कर, कह दिया हो वैसी बात नहीं है- यही तो हमलोगों का शाश्वत सिद्धान्त है, अविनाशी धारणा है या 'सनातन धर्म' है ! महाभारत में कहा गया है -
सर्वेषां यः सुहृनित्यं सर्वेषां च हिते रताः ।
कर्मणा मनसा वाचा स धर्म वेद जाजले ॥

-अर्थात हे जाजले ! धर्म को केवल उसने ही जाना है, कि जो कर्म से , मन से और वाणी से सबका हित (अपने-पराये का भेद देखे बिना) करने में लगा हुआ है और सभी का नित्य स्नेही-बन्धु (हिताकांक्षी)  है ।
वेदव्यास ने कहा है - 
श्रूयतां धर्म सर्वस्वं श्रुत्वा चाप्यवधार्यताम् ।
आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत् ॥
अर्थात धर्म के सार को सुनों और सुनकर हृदयंगम कर लो । वह क्या है ? वह इतना ही है कि जो अपनी आत्मा के प्रतिकूल हो , वैसा आचरण दूसरों के साथ न करें । " यही है-यूनिवर्सल रिलिजन या 'वैश्विक धर्म' या सभी मनुष्यों का धर्म ! 
नींदमें-सपनों में, सोते-जागते, सभी अवस्थाओं में सभी कर्म-प्रयासों में,  हमलोगों का एकमात्र कर्तव्य यही है। स्वामीजी स्वयं इसी प्रकार के मनुष्य थे, और अपेक्षा करते थे कि सभी तरुण एक दिन इसी प्रकार के मनुष्य बनेंगे। यदि उनके ही जैसा आदर्श अन्य किसी महापुरुष का भी है, तो हमलोग उनको भी श्रद्धा के साथ वरण करने को प्रस्तुत रहेंगे, तथा उनके उपदेशों को कार्यान्वित करने की चेष्टा भी करेंगे। 
किन्तु, हमलोगों की दृष्टि जहाँ तक जाती है- तो देखते हैं, की स्वामी विवेकानन्द के अतिरिक्त अन्य किसी मनुष्य ने (या नवनी दा ने ?)  अपने जीवन के समस्त कर्मों को केवल एक ही उद्देश्य, केवल वैश्विक कल्याण या ' लोकहित '- को ध्यान में रख कर कभी नहीं किया है। इस प्राचीन देश भारत में हमारे पूर्वज, अपने विचारों और  दिनचर्या में ऐसे ही धर्म का पालन और चर्चा करते थे, किन्तु समय के प्रवाह में वह नष्ट हो गया था। जिसके फलस्वरूप, यहाँ पर भी,' लौकिक और परलौकिक ' कह कर दो अलग-अलग प्रकार के धर्म हो गये हैं।
इस प्रकार का दोषारोपण स्वामीजी ने किया है कि - हमारे देश में वेदान्त का जो साम्य-भाव था, (सम्पूर्ण मानव-जाती को अपना कुटुंब समझने का भाव था) वह बाद में शायद व्यक्तिगत स्वार्थ के अत्यधिक बढ़ जाने के कारण ही, अलग-अलग धर्म में परिणत हो गये हैं। हमलोगों के देश में ब्राह्मण, क्षत्रिय इत्यादि नाम से गुण के अनुसार कर्मों का जो बँटवारा किया गया था, उसमें से प्रत्येक ने दूसरों के अधिकार को कम करके अपने अपने समूह के अधिकार को प्रधानता देने का प्रयत्न किया है।
इसीलिये हमलोगों के देश में अब जो साम्य आएगा वह ' केवल पढ़े जाने वाले वेदान्त ' से नहीं, बल्कि वेदान्त के उसी प्राचीन स्वरुप (साम्य भाव ) को जीवन में धारण करने से आयेगा ! हमलोग,जितने भी संदेशों का उल्लेख-  स्वामीजी द्वारा कहे गये उपदेश -बोल कर करते हैं, वे सभी वेदान्त के ही वचन हैं। किन्तु हमलोग इस बात को भूल गये थे कि वेदान्त का ऐसा सुन्दर स्वरुप भी कभी रहा होगा, कभी वेदान्त के भीतर इस प्रकार के अद्भुत ज्ञान  की ज्योति रही होगी ! 
यहाँ तक कि विशालबुद्धि व्यासदेव ने वेदान्त के जिन समस्त सिद्धान्तों को एकत्र करके वेदान्त सूत्र की रचना की थी, वेदान्त के जो सूत्र सम्पूर्ण मानव जाति को मोहनिद्रा से जाग्रत करने में समर्थ हैं। वेदों के जो चार महावाक्य हैं, वे मनुष्य को पुनरुज्जीवित कर सकते हैं, उसे वीर बना सकते हैं,किन्तु उसके शंकर -भाष्य को भी हम लगभग भूल ही चुके थे। धरती का प्रत्येक मनुष्य, प्रत्येक दूसरे मनुष्य के लिये सहानुभूति का अनुभव करेगा, इतना ही नहीं आवश्यकता पड़ने पर दूसरों के दुःख को दूर करने के लिये अपने जीवन तक को न्योछावर कर देगा- ये सारे वेदान्ती-सिद्धान्त बाद में इसके अनेक प्रकार की भाष्यों के बाढ़ (बाहुल्य) में डूब गये थे। जिसके फलस्वरूप हमारा राष्ट्र नीचे गिर पड़ा। और इसी मौके का फायदा उठाकर विदेशियों ने भारतवर्ष पर आक्रमण करके, हमलोगों को एक हजार वर्षों के लम्बे समय तक, गुलाम बना कर रखा। समय के प्रवाह में समाज में जाती-धर्म आधारित भेदभाव (विशष्टिकरण) की उत्पत्ति हुई, हमलोग आपस में लड़ने-झगड़ने लगे, और मारा-मारी पर उतर कर अपना ही नुकसान करने लगे।
यदि हमलोग इसे बन्द करना चाहते हों, तो हमलोगों को स्वामी विवेकानन्द या श्रीरामकृष्ण के पास शिक्षा ग्रहण करने के लिये आना ही पड़ेगा। ठाकुर श्रीरामकृष्णदेव कहा करते थे- " बंधे हुए या गतिहीन जल में काई जम जाती है, किन्तु बहती हुई नदी या झरने का पानी जिसमें स्रोत है, उसमें कभी काई नहीं जमता।" हमलोगों के वर्तमान सामाजिक जीवन में प्राण का स्रोत नहीं है, इसीलिये (जाती-धर्म-भाषा के आधार पर ) इतनी दलबन्दी  हो रही है। उसमें जीवन का स्रोत, प्राण का स्रोत लाने के लिये क्या करना होगा ? बस इतना ही, कि हमलोगों को श्रीरामकृष्ण-विवेकानन्द वेदान्त परम्परा को ग्रहण करना होगा। क्योंकि उनके द्वारा वर्णित धर्म या भावधारा- हिन्दू, मुसलमान, बौद्ध, जैन, क्रिश्चियन, सिख सबों के लिये है, यहाँ तक कि जो कहते हैं, मैं धर्म को नहीं मानता-उनके लिये भी है। ऐसे अद्भुत प्राणप्रद वचन (dictum) और कहीं नहीं है। एवं वेदान्त के इन अद्भुत सिद्धान्तों को-चार महावाक्यों को  श्रीरामकृष्ण-विवेकानन्द ने अपने जीवन में, व्यवहार करके भी दिखला दिया है !
स्वामीजी के विचार में या वेदान्त की भावधारा के अनुसार समाज में किसी के लिये धर्म या जाती के आधार पर विशेषाधिकार पाने का कोई अधिकार नहीं है; किन्तु विशेषाधिकार के बल पर ही ब्राह्मणों ने वेदान्त का इतना अधिक गलत-अर्थ निरूपण (Misinterpretation) कर दिया, कि उसके फलस्वरूप वेदान्त में शक्ति है, जो बलप्रद सन्देश है, उसीको हमने व्यक्तिगत जीवन और राष्ट्रिय-जीवन से बाहर निकाल दिया है। इसीलिये अपने को उन्नत करने के लिये या यथार्थ मनुष्य में रूपान्तरित करने के लिये, वेदान्त के उन सिद्धान्तों को केवल दूसरों को सुनाने से ही काम नहीं चलेगा। उसकी उचित व्याख्या करनी होगी और उन्हीं सिद्धान्तों के आधार पर अपने जीवन को गढ़ कर, उदाहरण-स्वरुप बनाकर तरुणों के समक्ष प्रस्तुत भी करना होगा।
उपनिषद युग के बाद, अभी तक के समाज के भीतर इस प्रकार का जीवन्त वेदान्त, श्रीरामकृष्ण-विवेकानन्द परमहंस परम्परा (परमहंस गुरु-शिष्य परम्परा में प्रशिक्षित) जीवन के अतिरिक्त,  अन्य किसी अवतारी-जीवन से प्राप्त नहीं होता है। इसीलिये आज के युग में ' श्रीरामकृष्ण-विवेकानन्द-माँ सारदा ' - के बेलपत्र-रूपी नव-त्रयी (triplet) को अपने हृदय में रखने की आवश्यकता है। विशेष रूप से आज हमारे व्यक्तिगत जीवन और राष्ट्रिय-जीवन में जितनी भी समस्याएं दिखाई दे रही हैं, उनको दूर करने के लिये इस त्रयी को अपने शीश पर चढ़ाने, अर्थात उनकी शिक्षाओं का अनुसरण करने के अतिरिक्त अन्य कोई उपाय नहीं है । धर्म या आध्यात्मिकता का अर्थ मन्दिर, मस्जिद, फूल-बेलपत्र ही नहीं है, - स्वामीजी ने कभी इसको धर्म नहीं कहा है। धर्म का अर्थ है, अपना और राष्ट्रिय-चरित्र का निर्माण करना - कितनी अद्भुत धर्म की परिभाषा है !        
श्रीरामकृष्ण के सम्बन्ध में कहते समय, स्वामी विवेकानन्द कहते हैं, " मेरे गुरुदेव किसी को ढूंढने नहीं गये। उनका सिद्धान्त यह था कि मनुष्य को प्रथम चरित्रवान होना चाहिए तथा आत्मज्ञान प्रप्त करना चाहिए और उसके बाद फल स्वयं ही मिल जाता है। जब कमल खिलता है तो मधुमक्खियाँ स्वयं ही उसके पास मधु लेने के लिए आ जाति हैं। अतः प्रथम हमें चरित्रवान होना चाहिए और यही सबसे बड़ा कर्तव्य है, जो हमारे सामने है। ''7/260
"मेरे गुरुदेव का मानव जाति के लिए यह सन्देश है कि ' प्रथम स्वयं धार्मिक बनो और सत्य की उपलब्धी करो। तुम अपने भ्रातृ-स्वरुप मानव जाति के कल्याण के लिए सर्वस्व त्याग दो ! भ्रातृ-प्रेम के विषय में बातचीत बिल्कुल न करो, वरन अपने शब्दों को सिद्ध करके दिखाओ। अपने जीवन द्वारा यह दिखा दो कि धर्म का अर्थ न तो शब्द होता है, न नाम और न सम्प्रदाय, वरन इसका अर्थ होता है आध्यात्मिक अनुभूति। जिन्हें अनुभव हुआ है, वे ही इसे समझ सकते हैं। जिन्होंने धर्मलाभ कर लिया है, वे ही दूसरों में धर्मभाव संचारित कर सकते हैं, वे ही मनुष्य जाति के श्रेष्ठ आचार्य हो सकते हैं-केवल वे ही ज्योति कि शक्ति हैं।' जिस देश में ऐसे मनुष्य जितने ही अधिक पैदा होंगे, वह देश उतनी ही उन्नत अवस्था को पहुँच जायेगा और जिस देश में ऐसे मनुष्य बिल्कुल नहीं हैं, वह नष्ट हो जायेगा-वह किसी प्रकार नहीं बच सकता. " ७/२६७
श्रीरामकृष्ण का चरित्र ही एकमात्र आदर्श पूर्ण-मानव के रूप में गठित सार्वभौमिक चरित्र है, और इस युग के प्रत्येक मनुष्य का कर्तव्य है, कि वे श्रीरामकृष्ण का अनुसरण करके अपने चरित्र का निर्माण कर लेंगे. इस प्रकार के समग्र रूप से चरित्रवान मनुष्य जब देश में अधिक संख्या में निर्मित कर लिये जायेंगे, तभी देश की उन्नति हो सकती है। वैसा नहीं होने तक देश के उन्नति की कोई सम्भावना नहीं है। उन्नति का अर्थ केवल अध्यात्मिक उन्नति ही नहीं है, इसकी परिधि के अन्तर्गत-आर्थिक उन्नति, हरेक पहलु से देश की उन्नति शामिल है।
जबकि हमलोग निरन्तर अद्द्योगिक क्षेत्र में में उन्नति के आँकड़े गिनाते रहते हैं, कुछ दिनों पूर्व बंगाल से प्रकशित होने वाले समाचार-पत्र अमृत-बाजार पत्रिका में किसी अवकाशप्राप्त सेना के अधिकारी द्वारा लिखित  " Industrial Decline in West Bengal " शीर्षक एक लेख छपा था। इस लेख में लेखक ने हमलोगों के राज्य के उद्द्योग जगत की बिगड़ती हुई स्थिति के कारणों को, किसी भी दल की चापलूसी किये बिना,  स्पष्ट रूप से हमलोगों के विचारार्थ सामने रख दिया था।
 "देश को उन्नत बनाने के लिए औद्द्योगिक उत्पादन में भी वृद्धि करनी आवश्यक है, इसीलिये उद्द्योग जगत का भी अपना एक महत्व है। किन्तु बहुत से लोग ऐसा भी सोचते हैं कि केवल उद्द्योगों में विकास होने से ही देश भी विकसित हो जायेगा । फिर कुछ लोग ऐसी विचारधारा को बहुत बड़ी गलती मानते हैं। जो भी हो, देश को उन्नत बनाने के लिये अन्य कई चीजों के साथ औद्द्योगिक विकास भी आवश्यक है। लेखक विभिन्न दलगत विचारों  से उपर उठकर कहते हैं, कि भारत में उद्द्योग के क्षेत्र में पहले बंगाल जहाँ प्रथम स्थान पर था, वहीं आज वह बहुत निचले पायदान पर चला गया है। उन्हीं के शब्दों में - "बंगाल वाज द इकनोमिक एंड इंटेलेक्चुअल लीडर ऑफ़ इंडिया टिल इट डिस्कवर्ड मार्क्ससिज्म। इट डिस्कवर्ड मार्क्ससिज्म एंड लाइक पुअर रसिया (सोवियत रूस) इन १९१७, कमिटेड सुसाइड ! द इकॉनॉमिक लीड ऑफ़ बंगाल हैज वैनिस्ड एंड सो हैज द कल्चरल लीड."
[Naipaul passed judgment that "Bengal was the economic and intellectual leader of India till it discovered Marxism. It discovered Marxism and like poor Russia in 1917, committed suicide. The economic lead of Bengal has vanished and so has the cultural lead.]
 इस लेख के अन्त में अवकाश-प्राप्त सैन्यअधिकारी कहते हैं, " हमलोगों का देश एक अध्यात्मिक देश है, यहाँ मनुष्यत्व को बहुत ऊँचा स्थान दिया जाता है, तथा हमारे ही राज्य में एक ऐसे महामानव ने जन्म ग्रहण किया था, जिन्होंने मनुष्य-निर्माणकारी शिक्षा को सम्पूर्ण देश में प्रसारित करने कि योजना बनाई थी। किन्तु हमलोग अभी तक उनकी योजना को क्रियान्वित नहीं कर सके हैं, इसीलिये आज औद्द्योगिक क्षेत्र में भी हमलोगों को ऐसी अवनति हुई है। अतः नया भारत गढ़ने के लिये हमलोगों को स्वामी विवेकानन्द के पास आना ही पड़ेगा।'
स्वामी विवेकानन्द का अर्थ स्वर्ग से उतरा कोई देवता नहीं है। स्वामी विवेकानन्द एक ऐसे मनुष्य का नाम है, जिनको यह पता ही नहीं था कि भय किस चिड़िया का नाम है ? वे एक ऐसे मनुष्य थे जो अपना सब कुछ त्याग सकते थे, दूसरों की सेवा में अपना जीवन समर्पित कर सकते थे। वे एक ऐसे हीरो  (वीरपुरुष) थे जो ब्रह्म को भी जानते थे, और 'ब्रह्म में ही अध्यस्त' इस जगत को भी जानते थे। इसलिए देश के स्कूल-कॉलेजों में, खेत-खलिहानों में, कारखानों में, आज सर्वत्र -जीवन के हर क्षेत्र में स्वामी विवेकानन्द की आवश्यकता है। 
'आज भी एक स्वामी विवेकानन्द, एक रामकृष्ण या एक नेताजी बनना सम्भव है' ---इस बात को हमें भावी पीढ़ी को, अपने युवाओं को सुनाने (और अपने जीवन के द्वारा दिखा देने) में समर्थ युवा नेता (लीडर) की आवश्यकता है। स्वामीजी एक स्थान पर कहते हैं, तुमलोग कभी-कभी पीछे मुड़ कर अपने प्राचीन-गौरवमय अतीत को भी देखो। स्वामीजी हर समय कहते हैं, आगे बढ़ो, आगे बढ़ो !  -पीछे मुड़ कर यह मत देखो कि कौन गिर पड़ा है, यही बात स्वामीजी हर समय कहा करते थे। किन्तु एक जगह पर कहते हैं, कि यात्रा का प्रारंभ करने से पहले एक बार पीछे मुड़ कर देखना भी जरुरी है।
क्योंकि तुम्हारे पीछे एक ऐसी मूल्यवान सांस्कृतिक विरासत है (पूर्वजों द्वारा आविष्कृत -चार महावाक्य हैं !), वह एक इतना महा मूल्यवान वस्तु है, जिससे यदि तुम आलोक ग्रहण नहीं करोगे, तो मार्ग पर चलते समय अपने को दुर्बल महसूस करोगे!  ठगों का गिरोह (पाँचो इन्द्रियाँ-पाँच विषय) तुम्हारे दुर्बल शरीर को लाठी से पीट कर घायल कर देंगे, तुमलोग स्वयं को विकास के पथ पर आगे नहीं ले जा सकोगे, और राष्ट्र को भी सही नेतृत्व नहीं दे सकोगे। आज हमलोगों कि ऐसी अवस्था हो गयी है, मानो हमलोगों कि बुद्धि के घर में ही ताला जड़ दिया गया हो। हमलोगों के पास भी बुद्धि है, - इतना भी हम नहीं जानते, या इस बात को स्वीकार ही नहीं करते।
इसीलिये बार बार विदेश जाकर हमलोगों को बुद्धि भी उधार में लेनी पडती है ! स्वामी विवेकानन्द चाहते थे कि हमलोग इस खोये हुए आत्मविश्वास को जाग्रत करें, इस आत्मश्रद्धा को जाग्रत करने से हमलोग अच्छे डाक्टर बन सकेंगे, अच्छे इंजीनियर बन सकेंगे, नौकरी या जो कुछ भी क्यों न करें, उसमें अच्छी आमदनी अच्छी कर पाएंगे, मनुष्य कहलाने योग्य मनुष्य बन सकेंगे। और उसी के साथ देश को भी उन्नत बना सकेंगे, हमलोगों के देश की राजनीती भी परिवर्तित हो जायेगी।
अभी हमलोगों की राजनीती केवल सरकारें बदल सकती है। किन्तु इससे कोई कल्याण नहीं होने वाला है। सरकार के बदल जाने से व्यवस्था में कोई परिवर्तन नहीं होता। बन्दूक की नाल से सब कुछ प्राप्त नहीं हो सकता है, मनुष्य ही व्यवस्था को चलता है, बन्दूक की नाल भी मनुष्य ही तैयार करता है, सरकार, कानून,पार्लियामेन्ट, राजनितिक दल, उद्द्योग-वाणिज्य, सब कुछ मनुष्य ही बनाता है, दूसरा कोई नहीं करता। किन्तु अन्य कोई पदार्थ ' मनुष्य ' का निर्माण नहीं कर सकता है। देश में सामाजिक, आर्थिक, हर प्रकार का विकास होना चाहिए, किन्तु ऐसा क्यों है कि धनी और अधिक धनवान बनते जा रहे हैं, और गरीब और अधिक गरीब होते जा रहे हैं ? कारण है असाम्य ! वेदान्तिक-साम्य  का सिद्धान्त वेदान्त की  पुस्तकों (उपनिषदों ) में तो हैं, किन्तु हमने अभी तक उन्हें कार्य में नहीं उतारा है।
एक शोध में पाया गया है कि ईसामसीह के जन्म से पाँच हजार वर्ष पूर्व इस देश में जो मूल्य-सूचकांक था, उसके अनुसार, उस समय भी एक दिहाड़ी-मजदूर अपने काम के एवज में प्राप्त होने वाले मूल्य से अपने भोजन का आधा ही कमाई कर पाता था। और यदि आज के मूल्य-सूचकांक को देखें तो, आज भी ठीक वही स्थिति बनी हुई है। 
कोई दिहाड़ी-मजदूर आज भी अपनी आवश्यकता के अनुसार पूरे खादान्न को अपनी आय से नहीं खरीद सकता है । पार्थक्य केवल रूपये की संख्या में हुआ है, अन्य किसी चीज में नहीं। इसीलिये स्वामीजी को कहना पड़ा था कि " समस्त संसार में आज भी सभ्यता कहीं नहीं आ सकी है. " यही कारण है की आज भी यही स्थिति बनी हुई है। हमलोग आज भी असभ्य-बर्बर बने हुए हैं, किन्तु विभिन्न प्रकार के पोशाक पहन कर देश-विदेश में कई प्रकार से लोगों को झांसा देकर, प्रभावित करते आ रहे हैं। तो फिर सभ्यता कहाँ है? उसे  खोजने के लिये हमें अपने भीतर झाँक कर देखना होगा। मनुष्य को पुर्णतः स्वार्थहीन और प्रेमी बनना होगा। वह सभी को समान रूप से प्यार करेगा। सभी को यथार्थ मनुष्य के रूप में निर्माण करने के लिये क्या करना होगा ? इस बात को हमें मनःसंयोग की सहायता से जानना होगा, और स्वामीजी के सन्देश इन्हीं सब विचारों के पूर्ण भण्डार हैं; उनकी सहायता से अपना और देश का नव-निर्माण करना होगा।  
==========          

No comments: