Wednesday, August 8, 2012

स्वामी विवेकानन्द और हमारी सम्भावना' [14] ' समस्याओं का निराकरण '(समस्या और समाधान),

' चरित्र-निर्माण ही समस्त समस्यायों की रामबाण औषधि है ! '  
प्रत्येक समाज में समस्याएँ तो रहती ही हैं, किन्तु कई समस्याओं की शकल भी लगभग एक सी ही होती है। प्रत्येक समाज अपनी वर्तमान समस्याओं का समाधान करने का प्रयास कर रहा है, किन्तु उस प्रयास के बीच में ही कोई नई समस्या उत्पन्न हो जाती है। और इस प्रकार प्रत्येक समाज में समस्याओं का अन्त होता, कभी दीखता नहीं है।
फिर समस्यायों को हल करने के भी दो तरीके हैं- पहला तरीका है, उपचार 'Cure' करना और दूसरा तरीका है, रोगनिषेध (निरोध-Prevention,रोकथाम)हम सभी लोग उस कहावत को जानते हैं-' प्रिवेंशन इज बेटर दैन क्योर.' या " रोकथाम का तरीका इलाज से बेहतर है।" तात्पर्य यह निकला, कि रोग हो जाने के बाद उसका उपचार की अपेक्षा समस्यायों का रोकथाम या निरोध  करना ही उत्तम तरीका है। किन्तु समाज की विविध जटिलताओं से उत्पन्न समस्यायों के क्षेत्र में रोगनिषेध या रोकथाम का उपाय करना बहुत कठिन हो जाता है। इसलिये असंख्य समस्यायों द्वारा उत्पीड़ित और परेशान होकर, समाज को अक्सर रोग का उपचार करने के प्रयास में ही हर समय व्यस्त रहना पड़ता है। प्राचीनकाल से ही, प्रत्येक समाज में जितने भी सामाजिक संगठन निर्मित हुए हैं, वे सभी मूख्य रूप से समस्यायों की रोकथाम करने के उद्देश्य से ही गठित किये गये हैं। फिर भी जो समस्यायें रोकथाम रूपी सरक-फन्दों (noose) को छिन्न-भिन्न करके पुनः दिखाई देने लगती हैं, और बची रह जाती हैं; तब समाज को उनके उपचार के लिये राष्ट्र-शक्ति (सेना-पुलिस या युवा-शक्ति ?) का सहारा लेना ही पड़ता है। 
इस क्रम-संकुचित होते जाने वाली धरती में, विभिन्न कारणों से, विशेष तौर से अनुपयुक्त परिवेश में बेमेल आदर्शों के अप्रतिबन्धित प्रवेश के परिणाम-स्वरूप सभी समाजों के सामाजिक संस्थायें कमजोर हो गये हैं। सामाजिक संगठनों के सही रूप में प्रभावकारी नहीं रह सकने के कारण, जब रोकथाम के उपायों की भूमिका (प्रिवेंटिव एक्शन) अत्यन्त नगण्य रह जाती है; तब मूख्य रूप से राजनितिक उपायों के द्वारा देश में उत्पन्न समस्त समस्याओं को हल करने का प्रयास  चलने लगता है। स्वाभाविक रूप से समस्याओं को देखने का तरीका भी विभिन्न देशों में अलग अलग होता है। तथा उन देशों की राजनैतिक पृष्ठभूमि में परिवर्तन होने के साथ ही साथ वोट-बैंक के आधार पर - 'उपचारात्मक विधि 'Curative method' (जातिवाद, सम्प्रदायवाद ) या 'रोकथाम-मूलक ' (प्रिवेंटिव एक्शन-लोकपाल,आरक्षण ) की विधि में भी परिवर्तन हो जाता है
इसके अतिरिक्त इतने विशाल देश की असंख्य जटिल समस्याओं को सम्भालने के उद्देश्य से देश का नेतृत्व करना या किसी सामाजिक व्यवस्था या प्रशासनिक व्यवस्था को सुन्दर रूप में संचालित करना भी अपने-आप में बहुत आसान काम नहीं है। जिसके फलस्वरूप देश की प्रशासनिक व्यवस्था को चलाने वाले नेताओं या प्रशासकों के लिये जटिल-मुद्दों से उत्पन्न होने वाली समस्याओं की गहराई में जाने का पर्याप्त समय नहीं मिल पाता है। एक ओर जहाँ इन जटिल मानवीय समस्यायों में अंतर्लीन मूल मुद्दों को चिन्हित कर पाना अत्यन्त कठिन  है, वहीँ दूसरी ओर समस्यायें जब भड़क उठती हैं, तो आपातकाल में उस समस्या के निराकरण के लिये किसी न किसी रूप में उपचारात्मक विधि (curative method) को तत्काल (इमरजेन्सी या लाठी -डंडा ) लागू करना अत्यन्त आवश्यक हो जाता है।
इसीलिए राजनितिक उपाय से समस्याओं को हल करने का प्रयास, समग्र समस्या रूपी हिमशैल की टिप (टिप ऑफ़ द आइसबर्ग ) सदृश्य अत्यन्त छोटे से हिस्से को स्पर्श करने जैसा कार्य बन जाता है, और मूल समस्या ज्यों की त्यों पड़ी रह जाती है। क्योंकि राजनीतक दलों को केवल अपने जन-समर्थकों (वोट बैंक) की गिनती के आधार पर अपनी सत्ता की कुर्सी को बचाए रखना आवश्यक होता है; इसीलिये उनको स्वाभाविक रूप से संख्या के उपर ही अधिक जोर देना पड़ता है, जिसके फलस्वरूप मनुष्य के चारित्रिक-गुण अपने प्राप्य गरिमा से वंचित रह जाते हैं।  कहा भी गया है- ' जम्हूरियत वह तर्जे हुकूमत है, जिसमें इन्सान को गीना करते हैं, तौला नहीं करते।' किन्तु गुणों के भीतर ही समस्या और उसके समाधान का बीज भी छूपा हुआ है। अतः उपचार और रोकथाम के उपायों के मिलने का स्थान भी यहीं हैं। क्योंकि कोई एक अवगुण यदि समस्या की उत्पत्ति का कारण हुआ,तो दूसरा कोई गुण उस समस्या का समाधान करने में सक्षम हो सकता है; तथा चारित्रिक-गुणों की बुनियाद पर मनुष्यों की गुणवत्ता में परिवर्तन लाना ही समस्या का पूर्ण रूप से उपचार की पद्धति है। 
दूसरे ढंग से विचार करने पर मूल प्रस्ताव के रूप में यही एक-मात्र रोक-थाम का उपाय भी है। जिस समाज में स्वार्थपर मनुष्य ही समस्त समस्याओं के मूल कारण हो, वहाँ समस्या का रोकथाम करने वाली औषधि (प्रिवेंटिव मेडिसिन)  होगी- "स्वार्थ-हीन मनुष्यों का निर्माण करने की चेष्टा करना।" -किन्तु यह कार्य बाहरी दबाव, कड़ा कानून बना देने या 'पार्लियामेन्ट में बिल पास करा देने' से भी संभव नहीं है। स्वामीजी ने तो बार बार कहा है, कि 'निःस्वार्थी मनुष्यों का निर्माण ' पार्लियामेन्ट से कानून पास करवा कर नहीं किया जा सकता है, और निःस्वार्थी,निष्कपट,देश-भक्त- 'चरित्रवान मनुष्यों ' का निर्माण किये बिना समाज की यथार्थ उन्नति नहीं हो सकती है। 
यहाँ, इसी विषय पर स्वामीजी के समकालीन-पाश्चात्य देश के एक अन्य मनीषी जॉर्ज बर्नार्ड शॉ के विचारों का उल्लेख करना अप्रासंगिक नहीं होगा। वैसे तो उम्र में वे स्वामीजी से बड़े थे, किन्तु उनकी विचारधारा में परिपक्वता स्वामीजी के जीवन-काल के बाद ही आ सकी थीशॉ के विषय में ए.सि. यार्ड कहते हैं- " अपने प्रारम्भिक जीवन में, किसी कट्टर साम्यवादी की तरह ही श्री शॉ भी यह विश्वास करते थे कि, "धनिकों के ऐश्वर्य को घटा कर के गरीबों को उपर उठाने का प्रयत्न करना, सभ्य समाज की प्रगति के लिये अनिवार्य है।और इसके लिये पार्लियामेन्ट में कानून पास करवाकर साम्यवाद को स्थापित करना प्राथमिक कार्य है।" हालाँकि उन्होंने आजीवन मानव समाज के कल्याण और आनन्द में वृद्धि करने के उपाय के रूप में साम्यवाद का ही प्रचार किया था, किन्तु उम्र अधिक हो जाने के बाद-जॉर्ज बर्नार्ड शॉ पार्लियामेन्ट से कानून पास करवा कर साम्यवाद स्थापित करने के उपर आस्था नहीं रख सके थे। और यथार्थ समाजवाद (मुलायमवाद ?) को स्थापित करने का उपाय क्या होना चाहिये- इस प्रश्न पर बर्नार्ड शॉ  की जो विचारधारा बाद में बनी थी, उसके अनुसार - " समाज की उन्नति के लिये प्राथमिक आवश्यकता, अच्छे कानून का निर्माण नहीं, बल्कि अच्छे मनुष्य का निर्माण करना है। ऐसे स्त्री-पुरुषों का निर्माण करना है- जो जीवन में नैतिकता को धारण करने वाले, चरित्रवान-मनुष्य हों। क्योंकि कुछ ईमानदार लोग कहीं-कहीं से अच्छे-अच्छे  कानूनों का संकलन कर के एक अच्छा संविधान तो लिख सकते हैं, किन्तु कुछ अच्छे व्यक्तियों द्वारा रचित ' अच्छे कानूनों का पोथा ' स्वतः ही किसी अच्छे समाज के निर्माण की गारन्टी नहीं दे सकता। " 
क्या बर्नार्ड शॉ के उपरोक्त विचार हूबहू स्वामी विवेकानन्द की विचारधारा की प्रतिध्वनि या Echo के जैसे प्रतीत नहीं होते हैं ? हमारे देश में -- आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक, शैक्षणिक, नीतिगत दिशा निर्देश से सम्बन्धित, सामुदायिक-विकास से सम्बन्धित, जातीय और भाषाई (Ethnic and linguistic) आदि अनगिनत  समस्याएँ हैं। किन्तु हमें पहले यह विचार करना पड़ेगा, कि समाज के भीतर इन समस्त समस्यायों की जड़ कहाँ अवस्थित है ? 
समाज बनता किस चीज से है ? क्या मैदान-पर्वत, गाँव-शहर, घर-मकान, या विभिन्न संस्थानों, क़ानूनी सभा-समितियों, पुलिस, सरकार, आदि के द्वारा समाज का निर्माण  होता है ? या फिर, जिस मानव समाज में - सबों के विकास और प्रगति को ध्यान में रखकर, पारस्परिक सहयोग के द्वारा समस्त प्रकृति तथा मनुष्यों के द्वारा निर्मित उत्पादों तथा संस्थाओं को उपयोग में लाकर, सभी मनुष्य सुख-शांति मिल-जुल कर रह सकते हों -उन मनुष्यों से निर्मित होता है ? यह बात बिलकुल स्पष्ट है कि मनुष्य ही समाज का केन्द्र-बिन्दु है, तथा सभी योजनायें उन्हीं के कल्याण को ध्यान में रख कर बनाई जाती हैं। 
वह अपने को पूर्ण विकसित करने के लिये निरन्तर संघर्ष कर रहा है, उससे भूलें भी होती हैं, अनुभव से शिक्षा भी प्राप्त कर लेता है, और फिर से अपना परिपूर्ण विकास करने के संघर्ष में जुट जाता है। इस प्रकार यह समाज मनुष्य के पूर्ण-आत्मविकास करने के उद्देश्य से संघर्ष करने का एक स्थान है- या एक व्यायाम शाला है। इस समाज में स्थापित विभिन्न चारित्रिक-मूल्यों के ताने-बाने (টানা ও পোড়েন) के अनुसार ही मनुष्यों में क्रिया और प्रतिक्रिया होती दिखाई देती हैं। और इन समस्त शक्तियों,के ताने-बाने या मूल्यों के गिरने और उठने या सन्तुलन में रखने की कुँजी भी व्यक्ति-मनुष्य के ही नियन्त्रण में रहती हैं। जबकि उपरी तौर से देखने पर ऐसा प्रतीत होता है, कि ये नैतिक-शक्तियाँ केवल विभिन्न सरकारी संस्थाओं या संगठनों के माध्यम से ही कार्यान्वित की जा सकती हैं। जिसके फलस्वरूप इस भ्रान्त धारणा की सृष्टि हो जाती है, कि समाज की नैतिक-शक्तियों को नियन्त्रण में रखने के उपर जनसाधारण के पास कोई सामर्थ्य नहीं है।
इसीलिए समाज में आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक, या अन्य किसी भी प्रकार की समस्या क्यों न दिखाई देती हो, उन समस्त समस्याओं की जड़ को उसमें वास करने वाले मनुष्यों के भीतर ही ढूँढना होगा। क्योंकि समस्या चाहे कोई भी हो, अंतिम रूप से  उसका कारण कोई न कोई मनुष्य ही होगा, और उसी में सुधार लाने या दण्ड देने के माध्यम से उस समस्या को हल करना पड़ेगा।  मनुष्य को सुधारने (उसका चरित्र-निर्माण करने ) या दण्डित करने के अतिरिक्त, सामाजिक समस्याओं के समाधान का, और कोई दूसरा पथ है ही नहीं। 
यहाँ, एक विषय पर विशेष रूप से चिन्तन करने की आवश्यकता है। ठीक है,हमने यह स्वीकार कर लिया  कि किसी भी समस्या का समाधान करने के लिये अन्ततोगत्वा किसी न किसी मनुष्य के साथ ही पेश आना पड़ेगा। किन्तु उस मनुष्य में सुधार लाने (उसे मनुष्य बनाने और चरित्र-निर्माण करने) अथवा दण्डित करने का कार्य करेगा कौन ? इसका उत्तरदायित्व किसके उपर होगा ? सरकार, सामाजिक संगठन-समूह, या वृहत्तर समाज (किसी लोकपाल) के उपर होगा ?  थोड़ी गहराई से विचार करने से  हम यह समझ जायेंगे कि इस प्रकार की कोई भी संस्था या संगठन (सरकारी,गैर सरकारी संगठन,या समाज) क्यों न हो, इन सब की पृष्ठभूमि में केवल मनुष्य की कल्पनाशक्ति (Imagination), तर्कशक्ति (Rationality), और संकल्पशक्ति (willpower) ही प्रभावी होती है। तथा थोड़ी और अधिक गहराई से चिंतन-मनन  करने पर हमलोग यह भी समझ सकेंगे, कि अंतिम रूप मनुष्य को किसी दूसरे के साथ नहीं, बल्कि मनुष्य को स्वयं के साथ ही संघर्ष (स्वयं में ही सुधार लाना होगा) करना होगा। 
अब मनुष्य का स्वयं के साथ मुकाबला करने का अर्थ क्या है ? निश्चय ही अपने शरीर के साथ नहीं, यह संघर्ष हमें अपने मन के साथ ही करना है। क्योंकि यह मानव का मन ही है, जो समस्त समस्याओं का समाधान या रोकथाम  (Prevention) करने में सक्षम उसके चारित्रिक-गुणों को उत्पन्न करने का आधार होता है। इसलिये मन का शुद्धिकरण (संयम के अभ्यास का प्रशिक्षण देकर)  इस प्रकार करना होगा,-  जिससे वह प्रशिक्षित होकर, ' संकल्प-शक्ति के प्रवाह एवं अभिव्यक्ति को फलदायी बनाने के लिए', उन्हें अपने पूर्ण-नियन्त्रण में रखने में समर्थ हो सके। इसका अर्थ यह हुआ कि समाधान करने के उद्देश्य से, मन को प्रशिक्षित करने का उपयुक्त तरीका सीखकर उसका उचित तरीके से मुकाबला करना होगा। इस प्रकार अन्ततोगत्वा निष्कर्ष यह निकला कि 'मन को वशीभूत करने की शिक्षा ' ही समाज कि समस्त  समस्याओं का मुकाबला करने का सर्वोत्तम उपाय है ! 
यदि हमलोग मन को एकाग्र करने या प्रशिक्षित करने को ही समस्त समस्याओं के निराकरण का अन्तिम उपाय ( final method) स्वीकार कर लें, तो हमलोगों को यह भी स्वीकार करना होगा कि समस्या को हल करने के लिये केवल 'रोगहर-विधि ' (Curative method या दण्डात्मक कारवाई, कड़ा-कानून ) को अपनाने से भी कोई विशेष लाभ नहीं हो सकता है। क्योंकि दण्डात्मक कार्यवाई का भय (बलत्कार-कानून या भ्रष्टाचार निरोधक कानून का भय) हमारे ' कू '-संस्कारों को थोड़ी देर के लिये दबा तो सकता है, अथवा उन समस्यायों का जो हानिकारक प्रभाव समाज के उपर पड़ा है, उसमें थोड़ी कमी तो ला सकता है, किन्तु भविष्य में पुनः वह समस्या उत्पन्न ही न होगी, उसकी कोई गारण्टी नहीं देता। 
(भविष्य में कोई पुलिस वाला या हॉस्पिटल किसी पीड़ित महिला के साथ कोई अभद्र व्यव्हार न करे, उसके रोकथाम के लिए कड़ा कानून बना देने से भी कुछ विशेष लाभ की उम्मीद नहीं की जा सकती है। ) इसलिये समस्याओं का समाधान करने का दूसरा तरीका, 'रोकथाम मूलक पद्धति (Preventive Measure) - अर्थात मनुष्य के मन को प्रशिक्षित करने वाली शिक्षा-'मनःसंयोग ' के माध्यम से समस्यायों को हल करने के उपर विस्तार से चर्चा करना आवश्यक है। 
यह प्रश्न उठ सकता है, कि क्या सभी प्रकार के मनुष्यों को मनःसंयोग (मन को प्रशिक्षित करने) वाली शिक्षा दी जा सकती है ? उत्तर है, हाँ ! लेकिन किसी मन का स्वाभाव एक बार गठित हो गया हो, तथा वे आदतें यदि उसके चित्त की गहराई तक प्रविष्ट हो चुकी हों, तो उस मन के स्वाभाव को बदलना असम्भव न होने से भी, बहुत कठिन अवश्य है।  इसीलिये व्यस्क हो जाने के बाद मन में परिवर्तन लाने की कोशिश करने की अपेक्षा किशोर मन (Young Minds) को ही गठित करने का प्रयास करना अपेक्षाकृत सरल एवं अधिक फलदायी होता है। अतः किशोर मन को गठित होने के समय से ही, इस प्रकार से प्रशिक्षित तथा गठित करना होगा,ताकि वह समस्यायों को उत्पन्न करने वाले चारित्रिक-दोषों को धारण ही नहीं कर सकें। जिससे  वे सकारात्मक चारित्रिक गुणों, व्यापकतर दृष्टिकोण, तीक्ष्णतर विवेकशक्ति, एवं परिष्कृत संकल्पशक्ति को अपने जीवन में धारण करके, समाज के भीतर बार बार उत्पन्न होने वाली समस्यायों के समाधान करने योग्य उपयुक्त और सुन्दर चरित्र के अधिकारी मनुष्य बन सकें, इसी ओर समाज को सतर्क दृष्टि रखनी होगी।
और चूँकि मनुष्य को अन्ततोगत्वा मनुष्य के साथ ही पारस्परिक क्रिया (interaction) करना पड़ता है, इसलिये आज के तरुण को ही भविष्य के व्यस्क मनुष्य के साथ interaction करना पड़ेगा। इसीलिये आज के तरुणों को यह स्पष्ट रूप से समझ लेना होगा, कि समस्याओं का मुकाबला करने के लिये तथा किसी नई समस्या को उत्पन्न होने से रोकने के लिये, उसको स्वयं को योग्य मनुष्य के रूप में गढ़ लेना प्रथम आवश्यक कार्य है।  अब यहाँ स्वाभाविक रूप से ही, तरुणों को सकारात्मक आत्म-सुधार की पद्धति को समझाने या सिखाने में समाज के अन्य लोगों की सहायता का सवाल भी उठ खड़ा होता हैक्योंकि युवाओं को सम्पूर्ण मानव में परिणत करने के लियेशिक्षा संस्थानों (डिपार्टमेंट ऑफ़ सोशल वर्क) के द्वारा केवल उसके मस्तिष्क (Head) का संवर्धन करना ही यथेष्ट नहीं है। शिक्षा-संस्थानो से बाहर किसी सामाजिक प्रयास के माध्यम से उसको हृदय का विस्तार (Heart ) और कर्मशक्ति (शारीरिक शक्ति या Hand) को भी विकसित करना अत्यंत आवश्यक है। 
जो मनुष्य केवल जैविक जरूरतों (Biological needs) को पूरा करने के भीतर ही स्वयं को सीमाबद्ध कर लेता है, जिसको ' आहार-निद्रा-भय-और प्रजनन करने ' के अतिरिक्त अन्य किसी उत्कृष्ट वस्तु पाने की आवश्यकता महसूस ही नहीं होती, जिसके जीवन का लक्ष्य केवल इन्द्रिय-विषयों (रूप-रस-गंध-शब्द-स्पर्श का सुख भोगना और अली-मृग-मीन-पतंग-गज के समान अपना जीवन नष्ट कर लेना है) का भोग करना और दूसरों को लूट कर या छीन कर भी अपना स्वार्थ पूरा कर लेना ही हो, तो वह मनुष्य का ढाँचा रहने से भी पशु के ही समान है। 
समस्त समस्यायों की जड़ यहीं पर है। केवल वास्तविक शिक्षा ही, मनुष्य को पशुत्व की दिशा में गिरने से रोक कर , मनुष्यत्व प्राप्ति की दिशा में मोड़ने का सामर्थ्य रखती है। किन्तु आज हमलोग अपनी संतानों को उपयुक्त शिक्षा देने तथा उनको सच्चा (खरा ) मनुष्य बनाने की तरफ ध्यान नहीं दे रहे हैं। फलस्वरूप वे लोग बिना-प्रयत्न के वर्धित कटीली झाड़ियों के समान व्यस्क-आयु को प्राप्त हो जाते हैं, और उनके काँटों की चुभन (भ्रष्टाचार-बलात्कार ) से समाज का आम आदमी (स्त्री-पुरुष ) क्षत-विक्षत होता रहता है।   
समय समय पर, अचानक किसी दिन सुबह में हमलोग नीन्द से उठते ही किसी मैदान (रामलीला मैदान या जन्तर-मन्तर पर) में किसी बैनर तले एकत्र होकर तेजी से सभी समस्याओं के समाधान कर देने की योजना  बना लेते हैं, एक विशाल आयोजन किया जाता है, बहुत जोर-शोर से उसका प्रचार किया जाता है। आम लोग सोचते हैं, अब तक लम्बित समस्त दरख्वास्त का फल अब बस मिलने ही वाला है। 
इसलिए अधिकांश जनता उस मसीहा के चमत्कार का समाचार सुनने के लिए सुबह के समाचार पत्र की प्रतीक्षा में बैठी रहती है। किन्तु जब उसकी समस्याओं के समाधान से जुड़ा कोई समाचार उसमें दिखाई नहीं देता, तो वह मुरझा जाती है। इसी प्रकार का धाल-मेल लम्बे समय से चला आ रहा है, और तब तक चलता रहेगा, जब तक हमलोग यह नहीं जान लेंगे कि पुनर्निर्माण के कार्य का प्रारंभ कहाँ से करना होता है ? 
कार्य का प्रारंभ हमें जड़ से ही करना होगा, उसकी जड़ों को सींचना होगा, उसकी देख-रेख करनी होगी। तभी तो जब पौधा बड़ा हो जायेगा तो हमें उसका फल प्राप्त होगा। स्वामी विवेकानन्द कहते हैं, " पुनर्निर्माण करने के लिये हमें समस्या के भीतर, उसकी जड़ तक पहुँचना होता है. इसी को मैं आमूल सुधार कहता हूँ। मेरी चिकित्सा-पद्धति यह है कि रोग को केवल दबाकर न रखा जाय, बल्कि उसे जड़ से नष्ट कर दिया जाय। तथाकथित समाज-सुधार के कार्यों में हाथ मत डालना, क्योंकि आध्यात्मिक सुधार के बिना कोई भी सुधार सम्भव नहीं है. " ( रामकृष्ण मठ नागपुर से प्रकाशित पुस्तक - 'भारत ओर उसकी समस्याएँ ' पृष्ठ ३७ ) हमलोगों को अपना सारा ध्यान तरुणों के उपर केन्द्रित रखना होगा। उसको उपयुक्त तरीके से शरीर, मन और ह्रदय को प्रशिक्षित करने की शिक्षा देकर योग्य मनुष्य के रूप में उनका निर्माण करना होगा, फिर जब वे लोग सामाजिक जीवन के सभी क्षेत्रों में प्रबन्धन और नेतृत्व की जिम्मेदारी अपने कन्धों पर लेंगे, केवल तभी हमलोगों की समस्याओं का समाधान हो सकेगा, उसके पहले नहीं। इस 'मनुष्य-निर्माणकारी आन्दोलन ' को सम्पूर्ण भारतवर्ष में फैला देने के लिए हमें आपस में बहुत एकजूट होकर (सामंजस्य बना कर) काम करना होगा, बहुत धैर्य रखने की आवश्यकता होगी। हो सकता है, यह सन्जीवनी बूटी किसी किसी को अरुचिकर, बेस्वाद, नीरस जैसा भी लगे, किन्तु स्वामीजी के अनुसार भारत की समस्त समस्यायों की रामबाण-औषधि केवल यही है !
इस मनुष्य निर्माणकारी शिक्षा को अपनी मातृभूमि के प्रत्येक संतान के पास, प्रत्येक घर में, सर्वत्र फैला देनी होगी। इस कार्य के साथ प्रत्येक तरुण को जोड़ने का प्रयास करना होगा। अभी हमें अपनी उर्जा को व्यर्थ के कानून पास करवाने का आन्दोलन, या सत्ता की कुर्सी पर बैठने के आंदोलनों में, या रामनवमी में डन्डा- भाला भाँजने जैसे धार्मिक आयोजनों,या भगवत सप्ताह के नाम पर आयोजित दिखावटी कर्मकाण्डों में, दिखावटी समाजसेवा में, या उपरी समाज सुधार करने में, अपना बहुत समय बर्बाद नहीं करना होगा। क्योंकि जब तक सच्चे मनुष्यों का, चरित्रवान मनुष्यों का- निर्माण नहीं कर लिया जाता, तब तक किसी भी परिवर्तन की आशा करना व्यर्थ है। 
अभी हमलोगों का एक मात्र लक्ष्य है-' मनुष्य बनो और मनुष्य बनाओ !' बाकी सबकुछ अपने आप ही ठीक हो जायेगा। कोई नया दल या नया कानून पार्लियामेन्ट से पास करवाने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। किन्तु जो लोग ' चिकित्सा-आधारित पद्धति ' (या क़ानूनी दण्ड ) में विश्वासी हैं, उनकी निन्दा भी मत करो। वे लोग अपने मार्ग से अथक प्रयास करें, वे भी समस्या को हल करने की चेष्टा पूरे जी-जान से करें। किन्तु तुम अपने पथ पर चलते रहो। दूसरों को भी अपने मार्ग पर लाने की चेष्टा में समय मत बर्बाद करो। यदि ' बनो और बनाओ ' पद्धति की महत्ता को तुमने स्वयं समझ लिया हो, तो कार्य में लग जाओ। एकबार स्वामी विवेकानन्द ने कहा था- " To do good and to be good -is whole of religion." - अर्थात अच्छा (मनुष्य) बनो, और अच्छे कार्य (मनुष्य बनाओ ) करो ! "- इतना ही धर्म है. क्या तुम इस धर्म को ग्रहण कर सकोगे ? यदि युवा शक्ति  इस धर्म को ग्रहण करले, तो दुनिया बदल जाएगी।
किन्तु स्वार्थी लोग इस सरल सत्य को समझना ही नहीं चाहेंगे, वे तुम्हारी हँसी उड़ायेंगे। किन्तु तुम अपने पथ को नहीं छोड़ना। स्वार्थी मनुष्य ऐसा मानते हैं कि- ' यह दुनिया उनके भोग के लिये बनी है, और दुर्बल मनुष्य तो सबल मनुष्यों के द्वारा शोषित होने के लिये ही बने हैं, और ताकत से ही न्याय होता है। (जिसके हाथ में होगी लाठी भैंस वही ले जायेगा!') किन्तु तुम्हारे लिये वैसा नहीं होगा। तुम्हारा सिद्धान्त होगा- " मैं जगत की सेवा करने के लिये आया हूँ, सबल मनुष्य दुर्बल को उपर उठायेंगे, और न्याय ही शक्ति है. " यह बाद वाला मार्ग ही श्रेय का मार्ग है। यह मार्ग ही दूसरों की सहायता करने वाला मार्ग है। इस पथ से चलने वाले पथिक ही यथार्थ शक्तिमान होते हैं, और सुंदर चरित्र ही उनका रक्षा-कवच होता है। 
इस मनुष्य-निर्माणकारी शिक्षा का प्रचार प्रसार करने के लिये, बहुत अधिक धन-बल, या बहुत बड़ा विद्यालय-भवन आदि किसी चीज की जरुरत नहीं होती है। यदि तुम अपने देश से प्यार करते हो, और अपने शरीर,मन एवं हृदय की उन्नति के द्वारा अन्य पाँच लोगों के विकास की सम्भावना में भी विश्वास करते हो, तो दूसरों को भी उन्नति करने का यह पथ दिखला दो। नाम-यश पाने के प्रलोभन के फन्दे में मत फंसो, तथा अपने संकल्प पर दृढ रहो, इतना होने से ही सब होगा। इस छात्र-जीवन में तुम्हारे लिये सर्वोत्तम त्याग होगा, अपनी प्राण-उर्जा को चरित्र-गठन के अतिरिक्त अन्य सभी चीजों से समेट लेना, उसका (यौवन शक्ति का) दुरूपयोग नहीं करना। ऐसा करने से तुम ह्रदय-वत्ता तथा कर्म-क्षमता में सम्पूर्ण रूप से गठित मनुष्य के रूप में विकसित हो सकते हो। अपने शरीर को बलवान और ओजपूर्ण बनाओ, अपनी बुद्धि को तीक्ष्ण (Penetrating) बनाओ, तथा अपने हृदय को प्रसारित करो, उसे उदार बना लो। 
जहाँ कहीं भी तरुणों का दल सम्मिलित होते हों- किसी कमरे में, बाहर किसी वृक्ष के के नीचे बने चबूतरे पर, या मैदान में -गाँवों-शहरों में, सर्वत्र तरुणों के मन को प्रशिक्षित करने वाली शिक्षा का प्रचार-प्रसार करने वाले केन्द्र खोलने का प्रयास करते रहो। उन केन्द्रों में व्यायाम के द्वारा शरीर को पूष्ट बनाया जायगा,   ' पाठचक्र और सामूहिक चर्चा (Lessons and Discussion) ' के द्वारा मन को पूष्ट बनाया जायेगा, स्वामीजी के जीवन और सन्देश की विवेचना (deliberation) एवं मनुष्य की सेवा के सम्बन्ध में उनके उपदेशों का वास्तविक जीवन में पालन करने द्वारा अपने हृदय को प्रसारित करने का प्रयास चलेगा।
मनन (अनुध्यान या deliberation) और प्रार्थना (prayer) इस विकास के दो आवश्यक अंग होंगे। ग्राम, जिला, राज्य, राष्ट्रीय हर स्तर के युवा-प्रशिक्षण शिविर में भाग लेने से बहुत लाभ होता है।  शिविर में संघबद्ध प्रयास, एकत्र वास और देश के विभिन्न राज्यों से आये हुए तरुणों के साथ मिल-जुल कर रहने के फलस्वरूप, युवाओं में परमत सहिष्णुता, सहयोगी मनोभाव (Co-operative attitude), एकात्मबोध, एवं राष्ट्रीय एकता का भाव आदि सद्गुण स्वतः उत्पन्न हो जाते हैं । और शिविर में समस्त आवश्यक प्रशिक्षण को प्राप्त करके एक ऐसा योग्य नागरिक निर्मित हो जाता है, जो कर्तव्यपरायण, देश-प्रेमी, स्वार्थहीन, त्यागी, मानवता बोध सम्पन्न, सेवा परायण एवं उदार दृष्टिकोण सम्पन्न होता है!
जब असीम साहस, जबर्दस्त आशावाद  एवं अविरत प्रयास से ऐसे कई चरित्रवान युवक तैयार हो जायेंगे जो क्रमशः सामाजिक जीवन के प्रत्येक क्षेत्र-- शिक्षासंस्थानों, अस्पतालों, कृषि-क्षेत्र, देश-रक्षा विभाग, उद्द्योग और व्यापार के क्षेत्र, सरकारी दफ्तरों, राजनैतिक दलों आदि में सर्वत्र प्रविष्ट हो जायेंगे; तब देश के सामाजिक जीवन में समस्यायों के कूड़ा-कचरा का जितना भी ढेर जमा हो गया है, वह सब उनके (चरित्रवान-युवाओं के)   आगमन के साथ ही समाप्त हो जायेंगे।
किन्तु हमारा उद्देश्य स्वयं शिक्षा-संस्थानों, अस्पतालों, अद्द्योगिक प्रतिष्ठान आदि को स्थापित करना, या कोई राजनैतिक पार्टी खड़ा करना नहीं है। क्योंकि देश में इन सब का कोई आभाव नहीं है। परन्तु इस प्रकार के समस्त प्रतिष्ठानों में ईमानदार कार्यकर्ताओं का घोर आभाव है, इस कमी को दूर करना ही महामण्डल सबसे प्राथमिक आवश्यक कार्य समझता है, और इतना कर पाने से ही वह खुश है- राजनीती के माध्यम से इन सब पर कब्जा कर लेने का उसका कोई मकसद या इरादा नहीं है।
स्वामी विवेकानन्द का युवाओं से आग्रह है- " इसलिये पहले आदमी - 'मनुष्य' उत्पन्न करो! " {वे कहते हैं, " जब आपके पास ऐसे मनुष्य होंगे, जो अपना सब कुछ देश के लिये होम कर देने के लिये तैयार हों, भीतर तक एकदम सच्चे, जब ऐसे मनुष्य उठेंगे, तो भारत प्रत्येक अर्थ में महान हो जायेगा. भारत तभी जागेगा, जब विशाल ह्रदयवाले सैकड़ों स्त्री-पुरुष भोग-विलास और सुख के सभी इच्छाओं को विसर्जित कर मन,वचन तथा कर्म से उन करोड़ों भारतियों के कल्याण हेतु सचेष्ट होंगे, जो निरन्तर निर्धनता एवं अज्ञान के अगाध सागर में डूबते जा रहे हैं. जो सच्चे हृदय से भारत के कल्याण का व्रत ले सकें तथा उसे ही अपना एकमात्र कर्तव्य समझें-ऐसे युवकों के बीच कार्य करते रहो. उन्हें जाग्रत करो, संगठित करो, तथा उनमें त्याग का मन्त्र फूँक दो. यह कार्य पूर्णतया भारतीय युवकों पर ही निर्भर है। इस समय मुझे चाहिये, जोरदार प्रचारकों (महामण्डल में प्रशिक्षित नेताओं) का एक दल. " (' भारत और उसकी समस्याएँ '-पृष्ठ ३१)यही है, उनके इस आह्वान की मूल भावना ( मर्म या Spirit)। 
किन्तु  हमलोगों ने आभी तक स्वामीजी के सत्योपदेश (exhortation) पर कोई ध्यान नहीं दिया है, अगर सुना भी है तो कभी यह समझने की चेष्टा नहीं की है कि उन्होंने " Be and Make " का आह्वान क्यों किया था ? किन्तु उनके इसी छोटे से सत्योपदेश के भीतर ही  ' क्रन्तिकारी-परिवर्तन '  का बीज निहित है !
सत्ता के नशे में चूर रहने की आदत को त्याग करके, अपने क्षुद्र स्वार्थों को विसर्जित कर के, स्वामीजी के नाम के आगे  " हिन्दू मोंक " या ' हिन्दू-सन्यासी ' का तगमा लगाकर उनको टालने की कोशिश करना छोड़कर, आइये हमलोग इसी योजना को पूरा करने के लिए युद्ध-स्तर पर कार्य को प्रारंभ कर दें, और इस " मनुष्य-निर्माणकारी आन्दोलन " को सारे देश में फैला दें !  
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