Sunday, August 5, 2012

स्वामी विवेकानन्द और हमारी सम्भावना [13] ' प्राण-पखेरु का पिंजरा ' (समस्या और समाधान),

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पहले रोचक-कथायें नामक पुस्तक से  ' जीवन-पंछी ' की कहानी पढ़ाई जाती थी। जब कोई राजकुमार उस पंछी को मार डालता तो उस कथा के अनुसार राक्षस का जीवन भी चला जाता था। हमारे राष्ट्र का जीवन पन्छी, भारतवर्ष का ' प्राण-पखेरू ' कहाँ वास करता है ? भारत का ' जीवन-पंछी ', गाँव की झोपड़ियों में वास करता है। किन्तु वह झोपड़ी अब उसको अपना प्रिय निवास स्थान नहीं लगती। क्योंकि उसकी झोपड़ी अब एक खास किस्म का पिंजड़ा बन चुकी है, उस झोपड़ी में अपने को वह अत्यन्त पराधीन, बहुत बंधा हुआ महसूस कर रहा है। 
कोई कोई,अब  झोपड़ी से बाहर निकल आया है, उस पिंजड़े  में नहीं है,फिर भी वह मुक्त नहीं हो सका है। क्योंकि उसकी झोपड़ी कूसंस्कारों के झंझावात, आग या बाढ़ में नष्ट हो हो गयी है। अब वह झोपड़ी से निकल कर पेंड़ के नीचे रह रहा है, फिर भी वह मुक्त नहीं है। पिंजड़े में बन्द  किसी पंछी के पंख टूट जाने या रुग्न हो जाने पर, जब उसका मालिक उस पंछी को उसके पिंजड़े से बाहर छोड़ देता है, तब भी वह पंछी उड़ नहीं पाता, कहीं पर बैठकर हांफता रहता है। क्योंकि वर्षों तक पिंजड़े में बंद रहने का कारण, उड़ने का अभ्यास नहीं रहने से अब वह उड़ना भी भूल चुका होता है। हमारे ग्रामों में बसने वाले अधिकांश ग्रामीण भाइयों की अवस्था आज ऐसी ही हो गयी है।
स्वामी विवेकानन्द का हृदय इन्हीं बेबस-लाचार ग्रामीण भाइयों के लिए रो उठा था, उनकी आँखों ने इन्हीं ग्रामीणों की दुर्दशा को देखकर बहुत अश्रु बहाये थे। उन्होंने ही सबसे पहले यह आविष्कार किया था, कि भारत का राष्ट्रिय जीवन (प्राण) गरीबों की झोपड़ियों में ही स्पन्दित हो रहा है। उनके इसी सन्देश को प्रतिध्वनित करते हुए महात्मा गाँधी ने भी कहा था- गाँवों में भारत का प्राण है,यथार्थ भारत तो गाँवों में ही बसता है ! किन्तु भारतवर्ष का वही जीवन-पन्छी (प्राण-पखेरू ) आज भी पिंजरे में कैद है।
 स्वामी विवेकानन्द ने कहा था-" सोचकर देखो बात क्या है। वे जो लोग किसान हैं, वे कोरी, जुलाहे जो भारत के नगण्य मनुष्य हैं, विजाती-विजित और स्वजाति-निन्दित छोटी छोटी जातियाँ हैं, वही लगातार चुपचाप काम करती जा रही हैं, और अपने परिश्रम का फल भी नहीं पा रही हैं. (८/१८९)
यह बड़े प्रसन्नता की बात है कि भारत सरकार इनलोगों के लिए निर्धारित न्यूनतम मजदूरी दर में वृद्धि करने के लिये कानून बनाने जा रही है। उन खेतिहर मजदूरों को, जो वंशगत रूप से अपने मालिकों की जमीनों को जोतते आ रहे हैं, उनको ही उस जमीन पर खेती करने का अधिकार देने के लिये, राज्य सरकारें बँटाई-दाऱी कानून को संशोधित करके नया कानून बनाने जा रही हैं। (अभी भूमि-अधिग्रहण कानून भी बनने वाला है.) हृदयहीन स्वार्थान्ध सूदखोर साहूकारों के कमर-तोड़ ऋण के बोझ से जर्जरित गरीबों को बचाने के लिये कानून बनाय गए हैं। विवाह में दहेज़-प्रथा बन्द करने के लिये कानून बनाये गये हैं। किन्तु सरकारी समीक्षात्मक रिपोर्टों में ही कहा गया है कि अधिकांश किसानों और खेतिहर मजदूरों को इन कानूनों के बारे में कुछ पता नहीं है।वे लोग तो यह भी नहीं जानते कि वर्तमान कानून के अनुसार खेतिहर मजदूरों से आठ घन्टे से अधिक देरी तक काम नहीं लिया जा सकता है। वे लोग आज भी बारह से तेरह घन्टे तक काम करने को बाध्य हैं। और अनेक क्षेत्रों के लिये निर्धारित न्यूनतम मजदूरी दर से आधे से भी कम दर पर इनको मजदूरी दी जाती है। इसके बावजूद इनको पूरे वर्ष भर में छौ महीने का भी काम नहीं मिलता है।
आजादी के ६५ साल बाद भी उनके पिंजड़े को क्यों नहीं टूटना चाहिए ? भूमि हीनों के लिये सरकारी गैर-मजरुआ जमीन से जमीन दिए जाने कि व्यवस्था रहने पर भी क्यों अभी तक अनेकों गरीब इससे वंचित हैं ? बैंकों के द्वारा किसानों को हल-बैल खरीदने, घर बनाने, खेती करने के लिये जितने प्रकार के ऋण देने तथा  ऋण-माफ़ी और अन्य दूसरी सुविधाओं को देने के लिये भारत सरकार ने जितने कानून बनाये हैं, उनके बारे में अधिकांश मजदूर-किसानों को क्यों कुछ पता ही नहीं है? क्योंकि उपभोक्ताओं तथा ऋण-दाताओं के बीच बहुत से स्वार्थी बिचौलिए पैदा हो गये हैं, जो उनके हक को लूट लेते हैं। भारत सरकार के कृषि-मन्त्रालय के परामर्श दाता समीति ने हाल में ही इन सब असुविधाओं के लिये भ्रष्ट प्रशासनिक अधिकारीयों तथा बेईमान सामाजिक कार्यकर्ताओं की मिलीभगत से गरीब-अनपढ़ किसानों, मजदूरों को उनका हक नहीं मिलने की बात को स्वीकार भी किया है।
हमारे कृषक भाइयों को कोई शिक्षा नहीं मिली है। उन गरीब देश-वासियों के प्रति किसी के हृदय में सच्ची सहानुभूति भी नहीं है। वे भला इन कानूनों के विषय में जानें भी तो कैसे ? भूख की ज्वाला के सामने ईमानदारी से अपना हक माँगने (fair play) की बुद्धि हार मान लेती है, इसीलिए उनको सेठ-साहूकारों के सामने हाथ पसारना ही पड़ता है। ऋण एवं भारी सूद के बोझ से किसान लोग जर्जरित हो गये हैं, ऋण नहीं लौटा पाने के कारण उनको बिना कोई मजदूरी लिये उन सूदखोरों के यहाँ बन्धुआ मजदूर बनना पड़ता है, या बेगार खटना पड़ता है। बड़े किसान अपने हक के रूप में प्राप्य मिहनाताने को थोडा बहुत कोड़ी-गण्डा करके गिन भी लेते हैं, किन्तु छोटे किसानों को दोनों शाम भोजन नहीं मिलता, उन लोगों को अक्सर भूखे पेट सोना भी पड़ता है, शिक्षा नहीं मिलती। परेशान होकर लाखों किसान आत्महत्या तक कर रहे हैं। अभी हाल में ही कैग रिपोर्ट में आया है -कर्ज की बोझ से दबे आत्महत्या करने वाले किसनों के कर्ज-माफ़ी के सात हजार कारोड़ भी बन्दर-बाँट में खा गये ? शर्म नहीं आती?
दक्षिण भारत के निलगिरी क्षेत्र में देखा गया है, अनेकों परिवार ऐसे हैं, जो वंशानुगत तरीके से बेगार खटते-खटते बड़े बड़े जमींदारों के गुलाम बन चुके हैं। उनको अपने हाथों में गुलामी की निशानी तौर पर आज भी लोहे का बाला पहनना पड़ता है। किन्तु फिर भी वे लोग कभी अपने मालिक से बेईमानी नहीं करते; वे बड़े भोलेपन से कहते हैं, पितामह का ऋण है न, इसी जीवन में परिश्रम से काम करके इसे चूका देना होगा। कितने वर्षों पूर्व स्वामीजी ने कहा था- " वे भूल गये हैं, वे यह होश ही खो चुके हैं, कि वे भी मनुष्य हैं। फल स्वरुप वे लोग आत्मश्रद्धा रहित खरीदे गये गुलाम की श्रेणी में परिणत हो गए हैं। " (1/402)
स्वामी विवेकानन्द खेद व्यक्त करते हुए कहते हैं, "हमारा सबसे बड़ा राष्ट्रिय पाप जनसमुदाय की उपेक्षा है, हम कितनी ही राजनीती बरतें, उससे उस समय तक कोई लाभ नहीं होगा, जब तक कि भारत का जनसमुदाय एक बार फिर सुशिक्षित, सुपोषित और सुपलित नहीं होता। वे हमारी शिक्षा के लिये धन देते हैं, हमारे मन्दिर बनाते हैं, और बदले में ठोकरें पाते हैं। वे व्यवहारतः हमारे दास हैं। यदि हम भारत को पुनर्जीवित करना चाहते हैं, तो हमें उनके लिये काम करना होगा। आपके सामने है जनसमुदाय को उसका अधिकार देने कि समस्या। आपके पास संसार का महानतम धर्म है और आप जनसमुदाय को सारहीन और निरर्थक बातों पर पालते हैं। आपके पास चिरन्तन बहती हुई निर्झरनी है, और आप उन्हें गन्दी नाली का पानी पिलाते हैं ? आपका मद्रास का स्नातक किसी हरिजन का स्पर्श नहीं करेगा, पर वह अपनी शिक्षा के लिये उससे रुपया खींचने को तैयार है। (४/२६०-६१)" 
अभी हाल में कोलकाता के टेंगरा नामक स्थान में आम जनता को गंदे नाले का पानी पिलाने का समाचार पेपर में भी छपा था। स्वामीजी ने कहा था- " जीवन-संग्राम में सदा लगे रहने के कारण शूद्र लोगों में अभी तक ज्ञान का विकास नहीं हुआ है। ये लोग अभी तक मानव-बुद्धि द्वारा परिचालित यन्त्र की तरह एक ही भाव से काम करते आये हैं, और बुद्धिमान चतुर व्यक्ति इनके परिश्रम तथा कार्य का सार तक निचोड़ लेते रहते हैं। उन्हें कौन प्रकाश देगा, कौन उन्हें द्वार द्वार शिक्षा देने के लिये घूमेगा ? (६/१०७)"
स्वामीजी कहते हैं, " ये ही तुम्हारे इश्वर हैं, ये ही तुम्हारे इष्ट बनें। निरन्तर इन्हीं के लिये सोचो, इन्हीं के लिये काम करो, इनकी सेवा करो।मैं उसीको महात्मा कहता हूँ, जिसका हृदय गरीबों के लिये द्रवीभूत होता है, अन्यथा वह दुरात्मा है। आओ, हमलोग अपनी इच्छा-शक्ति को एक्य भाव से उनकी भलाई के लिये निरन्तर प्रार्थना में लगायें। हम अनजान, बिना सहानुभूति के, बिना मातमपुर्सी के, बिना सफल हुए मर जायेंगे,परन्तु हमारा एक भी विचार नष्ट नहीं होगा। वह कभी न कभी फल लायेगा.जब तक करोड़ो लोग भूखे और अशिक्षित रहेंगे, तब तक मैं प्रत्येक उस आदमी को देशद्रोही समझूंगा, जो उनके खर्चे पर शिक्षित हुआ है, परन्तु जो उन पर तनिक भी ध्यान नहीं देता ! वे लोग जिन्होंने गरीबों को कुचलकर धन पैदा किया है और अब ठाट-बाट से अकड़कर चलते हैं, उन बीस करोड़ देशवासियों के लिये जो इस समय भूखे और असभ्य बने हुए हैं, कुछ नहीं करते, तो वे घृणा के पात्र हैं। " (३/३४५)
कुछ दिनों पूर्व किसी मन्त्री ने कहा था, भारतवर्ष में इस समय २० करोड़ मनुष्य गरीबी की सीमा रेखा के नीचे वास करते हैं। ऐसी अवस्था में कोई हमें भी कहीं देशद्रोही की भूमिका में नहीं रख दे, क्या हमलोगों को सतर्क हो जाना उचित न होगा ? स्वामीजी का आह्वान था- " तुम लोगों का अब काम है प्रान्त प्रान्त में, गाँव गाँव जाकर देश के लोगों को समझा देना कि अब आलस्य से बैठे रहने से काम न चलेगा। शिक्षा-विहीन, धर्म-विहीन वर्तमान अवनति की बात उन्हें समझाकर कहो- ' भाई, सब उठो, जागो, और कितने दिन सोओगे ? उसके बाद उनलोगों को स्वयं अपनी अपनी लौकिक अवस्था में उन्नति करने का उपाय बतला देना होगा। तुम सरल भाषा में उन्हें व्यापार, वाणिज्य, कृषि, आदि गृहस्थ-जीवन के अत्यावश्यक विषयों का उपदेश दो। नहीं तो तुम्हारे लिखने पढने को धिक्कार -और तुम्हारे वेद-वेदान्त पढने को भी धिक्कार."(६/१२९) 
एक मनुष्य निर्माणकारी ' केन्द्रीय प्रशिक्षण संस्थान ' (या शिक्षायतन 'Academy) स्थापित करके, साधारण लोगों के उन्नति के उपाय 'Be and Make ' का प्रचार करना होगा। तथा इस प्रशिक्षण-संस्थान (अखिल भारत विवेकानन्द युवा महामण्डल ) में प्रशिक्षित प्रचारकों को गरीबों की झोपड़ियों में जाकर उनमें लौकिक शिक्षा (मानसिक एकाग्रता ) एवं अध्यात्मिक शिक्षा (हृदय का विस्तार) का उपाय वितरण करना होगा।' पहाड़ यदि मुहम्मद के पास न आ सके, तो मुहम्मद ही पहाड़ के पास जायेगा।'
' मेरा विचार है कि भारत और भारत के बाहर मनुष्य-जाती में जिन उदार भावों का विकास हुआ है, उनकी शिक्षा गरीब से गरीब और हीन से हीन व्यक्ति को दी जाय, और फिर उन्हें स्वयं विचार करने का अवसर दिया जाय। जात-पाँत रहनी चाहिये या नहीं, महिलाओं को पूर्ण स्वतंत्रता मिलनी चाहिये या नहीं, मुझे इनसे कोई वास्ता नहीं। ' विचार और कार्य की स्वतंत्रता ही जीवन, उन्नति, और कुशल-क्षेम का एकमेव साधन है।' जीवन में मेरी एक मात्र अभिलाषा यही है कि एक ऐसे चक्र का प्रवर्तन कर दूँ, जो उच्च एवं श्रेष्ठ विचारों को सबके द्वारों तक पहुंचा दे और फिर स्त्री-पुरुष अपने भाग्य का निर्णय स्वयं कर लें।
याद रखो कि राष्ट्र झोपड़ी में बसा हुआ है; परन्तु हाय ! उन लोगों के लिये कभी किसी ने कुछ किया नहीं. क्या तुम जनसमुदाय की उन्नति कर सकते हो ? क्या तुम उनका खोया हुआ व्यक्तित्व, बिना उनकी स्वाभाविक आध्यात्मिक वृत्ति को नष्ट किये, उन्हें वापस दिला सकते हो ? क्या समता, स्वतंत्रता. कार्य-कौशल, पौरुष में तुम पाश्चात्यों के भी गुरु बन सकते हो ? यह काम करना है और हम इसे करेंगे ही. "  (२/३२०-३३८)
स्वामीजी द्वारा निर्देशित बहुत सी योजनाओं को अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्रों के जैसा भारतवर्ष में भी, सरकारी प्रयास से कार्यान्वित करने का कार्य चलाया जा रहा है। किन्तु उन योजनाओं को कार्यान्वित करने में जो मनुष्य लगे हुए हैं, उनका चरित्र-गठन नहीं हो सका है, इसलिये वे योजनायें उचित तरीके से फलदायी नहीं हो पा रही हैं। गण-चेतना जाग्रत करने का दायित्व केवल राजनितिक दलों के उपर छोड़ देने से- कभी उसका यथोचित फल नहीं पाया जा सकता है।
यह कार्य तब और भी कठिन हो जाता है, जब अगठित-चरित्र, (अपराधी-भ्रष्ट) लोग भी राजनितिक दल में सम्मिलित हो जाते हैं, और सरकारी योजनाओं को क्रियान्वित  (या बन्दर-बाँट ?) करने के कार्य में कूद पड़ते हैं। व्यक्ति-चरित्र तथा देश-प्रेमी मनुष्यों का निर्माण करने की कोई शिक्षा व्यवस्था सरकारी या सामाजिक स्तर पर नहीं रहने के कारण जो-जिस क्षेत्र में कार्यरत मनुष्य हैं, उनके लिये अपने निजी लोभ या दलगत स्वार्थ से  उपर उठकर, केवल जनकल्याण के लिये कार्य करना बहुत कठिन है। क्योंकि "লৌকিক শিক্ষা প্রাপ্ত অথচ আধ্যাত্মিক শিক্ষায় অজ্ঞ ব্যক্তিরা"  विदेशों से इकोनोमिक्स डिग्री प्राप्त, किन्तु आध्यात्मिक शिक्षा से अनभिज्ञ व्यक्ति ही हमारे देश में उच्च पदों पर आसीन होकर देश के लिये योजनायें बनाने और क्रियान्वित करने के कार्य में नियुक्त किये जाते हैं। इसीलिये प्राद्द्योगीकी या विभिन्न क्षेत्रों में डिग्री देने वाली शिक्षा-व्यवस्था से बिल्कुल भिन्न आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान को करने वाली शिक्षा प्राप्त कर के सहानुभूति, एकात्मता या ऐक्य-बोध, त्याग-क्षमता, सेवापरायणता आदि जैसे चारित्रिक गुण मनुष्य में सन्नहित हो जाते हैं, वह शिक्षा देनी होगी। ये सभी चारित्रिक गुण यदि सरकारी योजनाओं को क्रियान्वित करने में नियुक्त नेताओं,अफसरों या व्यापारियों में नहीं हों, तो चाहे कोई भी जन-कल्याण की योजना (मनरेगा-धनरेगा) क्यों न हो, वह बीच रास्ते में ही पाईप लाइन से चू जाने, या बिलकुल रुक जाने को बाध्य है। पचास करोड़ ग्रामीण मनुष्यों के लोक-कल्याण के कार्य को गैर सरकारी प्रयास (NGO) के माध्यम से कभी सम्पन्न नहीं किया जा सकता है। इतने बड़े कार्य को सरकारी मशीनरी को लगाकर ही पूरा किया जा सकता है। 
किन्तु सरकारी प्रयास में सबसे बड़ी कमी है, प्रशासनिक तन्त्र में नियोजित मनुष्यों में आध्यात्मिक शिक्षा का घोर अभाव का होना। प्रशासनिक व्यवस्था संचालन में नियुक्त व्यक्तियों के चरित्र में  'यह सबकुछ ब्रह्म ही है ' वाली -वेदान्तिक दृष्टि के अभाव में-- सहानुभूति, स्वार्थहीनता, लोभ-शून्यता, त्याग का मनोभाव, तथा सेवा-भाव आदि चारित्रिक गुणों का नितान्त आभाव रहता है। अध्यात्मिक शिक्षा का अर्थ जंगल में या पहाड़ की कन्दराओं में बैठकर तपस्या करना नहीं है; या बीच बीच में किसी धर्म-स्थान में जाकर मत्था टेकना भी नहीं है। देशवासियों के साथ अपने हृदय को जोड़े बिना, केवल धन के बल पर अंधे कर्म-काण्डों द्वारा पुण्य-संचय की चेष्टा को भी धर्म नहीं कहते हैं
अध्यात्मिक शिक्षा का अर्थ है- ' हृदय के विस्तारिता को प्राप्त करना।' उसके फलस्वरूप मनुष्य स्वार्थ-बोध के उपर उठ जाता है। व्यक्ति की सीमा से उपर उठकर परिवार और परिवार से उपर उठकर समाज के प्रति उत्तरदायी तथा सहानुभूतिशील बन जाता है। तथा यह उत्तरदायित्व और सहानुभूति के मनुष्योचित गुण ही उसको लोक-कल्याण के कार्यों में उत्साहित करते है। किन्तु यह शिक्षा-प्रणाली जब तक प्रभावी ढंग से लागु नहीं की जाएगी, तब तक देश के यथार्थ उन्नति होने की कोई सम्भावना नहीं है--यह बात हमारे नीतिनिर्धारकों को समझना बहुत आवश्यक है।
किन्तु जब तक सरकार तरफ से ऐसी- " लौकिक शिक्षा के साथ साथ आध्यात्मिक शिक्षा" (हृदय को विस्तृत करने वाली शिक्षा) लिये कोई सार्वजानिक व्यवस्था नहीं हो जाती, तब तक किसी गैर-सरकारी प्रयास (अखिल भारत विवेकानन्द युवा महामण्डल ) से जुड़ कर इसी कार्य में लगे रहना देश की सामग्रिक उन्नति के लिये सबसे महत्वपूर्ण समाज-सेवा है, एक महान कार्य है। इसीके फलस्वरूप लोक-कल्याण सर्वगत हो सकता है। और उसीके फलस्वरूप राष्ट्रीय जीवन पंछी पिंजड़े में कैद न रहकर स्वाधीन पंखों से उड़ान भरते हुए मुक्ति का स्वाद भी प्राप्त कर सकता है। इसी कार्य को  आज भारत के युवाओं का एकमात्र कार्य बनाने की आवश्यकता है।  
(यह प्रबंध १९९६ ई० में प्रकाशित हुआ था.)
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