Friday, August 3, 2012

स्वामी विवेकानन्द और हमारी सम्भावना-[11] " चिन्तनीय बातें "(समस्या और समाधान),


 'नेता का कार्य: डिस्ट्रिब्यूशन ऐंड प्रापगैशन ऑफ़ थॉट कर्रेंट्स !'
आज के आम अमेरकी नागरिकों का जीवन-दर्शन इतना ही है कि " शरीर के जल कर भस्म हो जाने के बाद और बचता ही क्या है ? (अर्थात कुछ नहीं बचता ) इसीलिये जब तक जीयो सुख से जीओ। घी खाने से शरीर सुडौल बन जाता है। इस लिये रुपया न हो तो ऋण लेकर भी घी पीओ।" उपरोक्त कथन अमेरिका के एक आम नागरिक द्वारा लिखित पत्र में स्वीकारोक्ति की प्रतिध्वनि मात्र है। 
अमेरिकन बन्धु उसी पत्र में आगे लिखते हैं," केवल घी ही क्यों, इस देश में तो सभी कुछ उधार में मिल जाता है। मोटर-बंगला, बर्तन-भांडे ,फर्नीचर-गद्दा, टेलीविजन, रेफ्रिजरेटर,- यहाँ उधार में क्या क्या नहीं मिलता ? जिस शहर में मैं रहता हूँ, वहाँ ऋण से प्राप्त भोगों के आनन्द का आकण्ठ पान कर लेने के बाद, जब  उधार देने वाली कम्पनियों का कड़ा तगादा  बहुत अधिक परेशान करने लगता है;  तब ऋण लेकर पुनः एक नया  जीवन प्रारंभ करने के लिये, उस शहर को छोड़ कर किसी दूसरे शहर की ओर निकल पड़ता हूँ। वहाँ फिर से नई नौकरी, नया घर, और तो और - जीवन में नया आनन्द मनाने के लिये उधार में ही नया प्यार -भी मिल जाता है, किसी बात की कमी नहीं होती। इस पर भी, यदि मानसिक टेन्सन कभी अत्यधिक अधिक बढ़ गया, तो उसको दूर करने के लिये हर शहर में कोई नया साइकेट्रिस्ट (मनो-चिकित्सक) भी मिल जाता है, जो मेरे टेन्सन को हटाने के लिये, कोई नई गोली लिख देता है, जिसे खाकर नये सुख में सोने चला जाता हूँ। "केवल अमेरिका ही क्यों ? यूरोपीय जड़वाद के साँचे में ढली हुई सभ्यता जहाँ कहीं भी गयी है, प्रत्येक  स्थान के मनुष्यों की दशा (ग्रीस का उदहारण देखें ) ऐसी हो गयी है, या बस होने होने को है।
हमारे देश के दार्शनिकों (नई पीढ़ी को दर्शन-शास्त्र पढ़ाने वाले प्राध्यापकों) ने-'शरीर के जल कर राख हो जाने के बाद, क्या बचने वाला है ? ' के सिद्धान्त का उत्स; इस जीवन-दर्शन के श्रोत का पूरा अता-पता, इसी भारतवर्ष के इतिहास के फटे पन्नों में; बड़ी मिहनत से शोध करके ढूंढ़ निकाला है-' यावज्जीवेत सुखं जीवेद ऋणं कृत्वा घृतं पिवेत, भस्मी भूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः ॥ जिसका तात्पर्य है -- जब तक जीना चाहिये सुख से जीना चाहिये, अगर अपने पास साधन नही है, तो दूसरे से उधार लेकर मौज करना चाहिये, शमशान में शरीर के जलने के बाद शरीर को किसने वापस आते देखा है? और ऐसी सुन्दर सुन्दर सुख लेने की बातें उनको इतनी 'चारू' (Charming) लगीं कि इस दर्शन का नाम ही उन्होंने "चार्वाक-दर्शन " रख दिया। [चार्वाक-मत से स्त्री पुत्र और अपने कुटुम्बियों से मिलने और उनके द्वारा दिये जाने वाले सुख ही सुख कहलाते है। जो वचन लोकलुभावन और आम जन को प्रिय लगने वाले हों उन्हें-चारुवाक कहा जाता हैकालांतर में यही बदलकर चार्वाक हो गया ।] 
सुनता हूँ कि दुनिया का सर्वाधिक कर्जदार देश अमरीका ही है। यह भी सुनता हूँ कि अमरीका अपने नागरिकों को बेरोजगारी भत्ता देता है। शायद इसी कारण समूचे अमरीकी समाज ने उपभोक्तावाद को अपना रखा है। इसीलिए वे आज तो, ‘खाओ-पीयो-मौज करो’, को जीते हैं। ‘कल के लिए’ बचाने में विश्वास नहीं करते। उन्हें इसकी आवश्यकता अनुभव ही नहीं हुई होगी। हो भी क्यों? जब मुफ्त में सरकार ही सब कुछ देने को तैयार है! तो बचत क्यों की जाए?
आज हमारे देश में भी दैनिक से लेकर, साप्ताहिक,पाक्षिक, मासिक, वार्षिक समस्त पत्र-पत्रिकाओं में छपने वाले विज्ञापनों में या बड़े बड़े शहरों के सड़कों के किनारे लगे होर्डिंग-आदि में, सर्वत्र आकर्षक दर पर ऋण लेकर जीवन को सुख-भोग से परिपूर्ण कर लेने का आह्वान दिखाई देता है। इन धनतेरस धमाका या दीवाली -धमाका के विज्ञापनों में , कार-बंगला, जमीन-जायदाद, कृषि-उपकरण, घर के फर्नीचर या कोई भी सामान लेना चाहें, किसी भी चीज के लिये आसान किस्तों पर ऋण देने की बात कही जाती है।
उधार में लिये गये इन सामानों में से किसी किसी आवश्यक ऋण को चुकाना भी पड़ता है, किन्तु शिक्षकों का ऋण होता है, माँ-बाप का भी कोई ऋण होता है- इस प्रकार के ऋण की बातों को तो हमने सुना भी नहीं हैं। सर्वोपरि है देश का ऋण ? इसका तो सवाल ही नहीं उठता। जब देश ही अपना है, तो ऋण की बात कहाँ उठती है ? अरे, हम इस देश में रह रहे हैं, यही इस देश का सौभाग्य है ! और समाज ? यह तो मेरी भोग्य वस्तुओं को प्राप्त करने का स्थान ही है, फिर वापसी की बात कहाँ है ?-इसी प्रकार के दर्शन को हमलोग भी अपने जीवन में लगभग अपना ही चुके हैं। फिर देश के उपर ऋण भी बहुत ज्यादा बढ़ गया है? वह तो हजारों-करोड़ों डॉलर में है। 
हमलोगों के लिये भी फुट-पाथ के किनारे २० लाख से लेकर एक करोड़ तक की लॉटरी टिकटें आसानी से मिल जाती हैं। फिर टेरीकाट्न के पैन्ट पहने, माथे पर लाल टीका लगाय, बड़ी मुश्किल से घुटनों को मोड़े,  आभूषणालयों में या टी.वी. पर ज्योतिषी-महाराज भी,  किसी आसन पर बाबु की मुद्रा में बैठे मिल जाते हैं, जो तुरन्त बता देंगे कि मेरा टिकट लगने वाला है या नहीं ?
हम लोगों का पहरावा-ओढ़ावा, हेयर स्टाईल, मूछें-गलमुच्छा, शिक्षा-दीक्षा, बात-व्यवहार का ढंग,यहाँ तक कि मातृ-भाषा का उच्चारण भी - सब कुछ तो उधार में ही लिया गया है। जरा रेडिओ-टीवी खोल कर सुनिए न, लगेगा मानो हिन्दी के उद्घोषक का पूरा जीवन विदेश में ही बीता है। और किसी प्रकार दया करके, कुछ हिन्दी शब्दों को याद रख लिये हैं। किन्तु उन्होंने पाश्चात्य भाषा का व्यवहार इतना अधिक कर लिया है, कि उनके हिन्दी बोलने का ढंग भी वैसा ही हो गया है। अंग्रेजी बोलते समय उच्चारण में थोड़ा भी इधर-उधर हो जाने से कान लाल हो जाते  हैं, ( कहना न होगा कि संस्कृत तो उनके मुख से निकलेगा ही नहीं), किन्तु हिन्दी भाषा को विकृत करने में थोड़ी भी लज्जा नहीं आती। विचार-जगत तो पूर्णतया उधार में लिया हुआ है। देश का कल्याण करने की इच्छा भी उधार ली हुई है, और उस देश-कल्याण की इच्छा को क्रियान्वित कैसे करें, उस उपाय को भी उधार में जानने के लिये हमलोग सदैव पश्चमी आकाओं का ही मुख निहारते रहते हैं।
आप क्या समझते हैं, ये सब क्या चिन्तनीय बातें नहीं हैं ? आखिर स्वाधीनता प्राप्ति के ६५ वर्षों के बाद भी हम लोग ऐसा क्यों हैं - यही तो विचारणीय प्रश्न है! किन्तु केवल मेरे-आपके सोचने से भला क्या होने वाला है ? सम्पूर्ण समाज का झुकाव (प्रवृति) जब दूसरी दिशा में हो, तो दो-चार लोगों के अन्य प्रकार से सोचने से क्या लाभ होगा ? हम लोग तो समाज का बहाव जिस ओर है, उसी दिशा में चल पड़ने को ही सुख,शान्ति, और प्रगति की पहचान मानने लगे हैं। यदि ऐसा नहीं होता, तो यह अवश्य सोचना पड़ता कि इन सब चिन्तनीय बातों को कहने से कोई लाभ नहीं है।
किन्तु दो कारणों से चिन्तनीय-बातों को कहने-सुनने का लाभ है। पहला कारण, किसी कार्य को कार्यान्वित करने वाला, या यथार्थ संपादन-कर्ता कौन है ? क्या केवल किसी संगठन के संचालक या समाचारपत्र के संचालक को ही संपादक (सचिव) कहना उचित है ? या जिसके द्वारा किसी भी कर्म का सम्पादन होता है, वह संपादक है ? इस सिद्धान्त के अनुसार तो-'मन' और उसमें उठने वाले विचार ही सबसे बड़ा कर्म-संपादक है। क्योंकि जो कुछ संपादित होता है, वह चिन्तन करने से ही होता है। जैसा विचार होता है, उसी के अनुसार कार्य का संपादन भी होता है। इसीलिये हमें सदैव विवेक-प्रयोग अर्थात आत्म-निरिक्षण करते रहना चाहिये, कि हमारे चिन्तन की दिशा सही है या नहीं ? यदि चिन्तन का पथ गलत हुआ (श्रेय न होकर प्रेय हुआ ) तो कर्म-संपादन भी गलत रास्ते में होगा। वर्तमान समाज का रुझान चाहे प्रेय की दिशा (भ्रष्टाचार की दिशा) में भी क्यों न हो, उसकी चिन्तन की दिशा और रुझान को यदि सही दिशा, श्रेय की दिशा (चरित्र-निर्माण और मनुष्य-निर्माण) में संलग्न कर दिया जाय तो, समाज भी 'श्रेय-मार्ग' पर लौट आने को बाध्य होगा।
स्वामी विवेकानन्द कहते थे - " युवाओं का एकमात्र कार्य 'डिस्ट्रिब्यूशन ऐंड प्रापगैशन ऑफ़ थॉट कर्रेंट्स' (सद्विचार-धाराओं का प्रचार-प्रसार) ही होना चाहिये ! " इस लिए विवेक-अंजन या विवेक-जीवन में छपने वाले समस्त सम्पादकीय का उद्देश्य श्रेष्ठ विचारों का निर्माण करने में सहायक होना चाहिये। समाज के उन्नति के लिये यदि विचारों का निर्माण करना  हो, तो समाज के सच्चे स्वरुप को समझना होगा। किन्तु केवल इतने से भी नहीं होगा। समाज के आदर्श को भी जानना होगा। तभी समझ में आयेगा कि वर्तमान स्थिति और आदर्श में इतना अंतर कैसे आ गया ? उसके बाद सही चिन्तन उस अंतर को दूर कर देगा। इसीलिये मुझे और आपको चिंतनीय बातें करनी होंगी। और सम्पूर्ण समाज में उस चिन्तन को फैला देना होगा। समाज इसी प्रकार चिरकाल से चलता आ रहा है। और चिरकाल तक चलता भी रहेगा। बिना विचारे जो करे सो पाछे पछताए। क्योंकि बिना बिचारे (या बिना विवेक-प्रयोग किये ) करने से कोई भी आचार, दुराचार में परिवर्तित हो जाते हैं; और समाज बे-लगाम हो जाता है, और आज के समाज अवस्था बिल्कुल ऐसी हो गयी है।
दिखिए न श्रीकृष्ण ने भी गीता सुनाते समय, सर्वप्रथम चिन्तनीय बातों - ' सांख्ययोग ' (सांख्य माने यह ज्ञान कि 'अष्टधा प्रकृति ' या शरीर अनित्य है और आत्मा नित्य है) को ही  समझाया था। उन्होंने सबसे पहले मनुष्य के सत्ता की विलक्षणता आदि को ही सुनाया था। उसके (बौद्धिक व्यायाम करवा लेने के) बाद कर्म-योग के बारे में कहा था। पहले एक युद्ध का प्रारंभ करके, उसके बाद अन्त में आराम से कहीं बैठ कर अर्जुन को तत्व-ज्ञान का उपदेश नहीं सुनाया था। युद्ध-क्षेत्र में ही गीता का उपदेश दिया था। 
किन्तु हमलोग अपने शास्त्रों या महापुरुषों से विशुद्ध तत्व-ज्ञान का ऋण लेने के इच्छुक नहीं हैं। जो कुछ भी
 तत्व-ज्ञान हमारे पास है, वह सब विदेशियों से उधार में लिया हुआ है। इसीलिये आज का प्रथम चिन्तनीय बात- यह होना चाहिये कि किस प्रकार इन उधार के विचारों को, उधार के जीवन (ऋण पर आधारित जीवन) का अवसान कर दिया जाय। और सर्वप्रथम हमलोगों को चिन्तन करने के क्षेत्र में अपने पैरों पर खड़ा होना सीखना होगा।
दूसरी बात : हमें यह समझ लेना चाहिये कि - समाज की प्रवृत्ति के बहाव की दिशा में बह जाने से कभी  सच्चा सुख नहीं मिलता, विकास भी नहीं होता है। हमलोगों ने पहले ही देखा है कि - " शरीर जल कर खाक बन जाने के बाद क्या रहता है ? " इस आदर्श से परिचालित होकर सुख के पीछे भागने से सुख किसी को नहीं मिलता। यह 'चार्वाक-दर्शन' मानव-मन के अपरिणत बौद्धिक-दिवालियेपन का ही प्रकटित रूप है।
यदि आज भी हमलोग, उसी आदिम मन्दबुद्धि का अनुकरण करते हुए किसी अन्य देश की सभ्यता का अनुकरण करने में अपना समूचा शौर्य-वीर्य खपाते रहें, तो वैसा करना हमलोगों की अत्यन्त बीमारू और विकृत मानसिकता का परिचय ही माना जायेगा। ऐसा करने से हमलोग विकास के पथ पर तो बिलकुल ही आरूढ़ नहीं हो सकेंगे, बल्कि हमलोग निश्चित रूप पतन के राह पर चल पड़ेंगे। चिन्तनीय बातों को नहीं कहा जाय और इसी पतन की दिशा में होने वाली गति को विकासशील कदम कह कर,बड़े उच्च कण्ठ से प्रचार करने जैसी मूर्खता हम लोग भी करेंगे या नहीं ?  इस बात के उपर चिन्तन करना क्या उचित नहीं है ? 
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