Wednesday, June 15, 2011

" झुमरीतिलैया विवेकानन्द युवा महामण्डल वर्ष (२०१०-२०११) के सचिव का वार्षिक प्रतिवेदन "

आज भारत में भ्रष्टाचार की विकराल समस्या से निबटने के लिए; एक ओर जहाँ  ' सरकार और सिविल सोसायटी (सभ्य-समाज के सदस्य) ' द्वारा  " लोकपाल बिल " लाने का प्रयास किया जा रहा है, वहीँ दूसरी ओर बाबा रामदेव भी " सत्ता " में नहीं, बल्कि " व्यवस्था (System) " में परिवर्तन लाकर भ्रष्टाचार मिटाने का प्रस्ताव जनमानस के समक्ष रख रहे हैं. "
  किन्तु सिस्टम को चलाता तो ' मनुष्य ' ही है, अतः मनुष्य (के चारित्रिक गुणों) में परिवर्तन लाना हमारा सबसे पहला कर्तव्य है "- स्वामी विवेकानन्द द्वारा दिए गए इस परामर्श के ऊपर शायद बाबा रामदेव  ने विशेष ध्यान नहीं दिया; इसीलिए व्यक्ति में परिवर्तन लाने का प्राथमिक-कार्य (व्यक्ति की चारित्रिक गुणवत्ता में परिवर्तन ) करना छोड़ कर  कानून में परिवर्तन हेतु सरकार के ऊपर दबाव बनाने के लिए अनशन पर बैठ गए, जिसका परिणाम क्या हुआ- हम सभी लोगों ने उसका " लाइव टेलीकास्ट " देखा है.  वास्तव में शिक्षा का उद्देश्य अच्छा  " मनुष्य " बनाना है। लेकिन न तो कोई" मनुष्य " बनना चाहता है न कोई बनाना. इसीलिए स्वामी विवेकानन्द द्वारा प्रदत्त एक दम सरल, भारत-पुनर्निर्माण सूत्र " Be and Make "  को सुनने समझने के लिए कोई तैयार नहीं है।
 आजादी के तुरत बाद ही हमारे देश के निति-निर्धारकों को स्वामी विवेकानन्द के परामर्श- " पहले मनुष्य निर्माण करो ! " पर ध्यान देते हुए
 - " चरित्र-निर्माणकारी एवं मनुष्य-निर्माणकारी शिक्षा पद्धति "  को देश-व्यापी स्तर पर इस प्रकार लागु कराना चाहिए था ताकि, आजादी के कम से कम २० वर्षों बाद (सन १९६७ तक ) देश की व्यवस्था संचालन में सुयोग्य चरित्रवान, ईमानदार एवं   देशभक्त  नागरिकों का निर्माण करना सम्भव हो जाता. 
किन्तु पाश्चात्य शिक्षा और भौतिकवादी संस्कृति के चकाचौंध से प्रभावित होकर हमने पहले २० वर्षीय ' मनुष्य-निर्माणकारी योजना ' न बना कर, हृदय का उदारीकण न करके आर्थिक-उदारीकरण पर आधारित पंच-वर्षीय योजनाओं पर ही अपना पूरा ध्यान केन्द्रित रखा. 
इसके दुष्परिणाम को स्पष्ट करते हुए, देश के एक युवा प्रधानमंत्री स्वर्गीय राजीव गाँधी ने पार्लियामेन्ट के भीतर और बाहर भी कहा था कि इन पंच-वर्षीय योजनाओं पर जितना धन हम केंद्र से आवंटित करते हैं उसका मात्र १५% धन ही उस योजना पर खर्च हो पाता है, ८५ % धन तो रस्ते में ही पाइप-लाइन में सूख जाता है.   
 हमलोगों को यह स्मरण रखना चाहिए था कि, अपने ' क्षुद्र अहं ' की तुष्टि एवं घोर स्वार्थपरता के कारण ही ३० करोड़ की जनसंख्या के देश को मात्र ४ करोड़ की जनसँख्या वाले अंग्रेजों ने २०० वर्षों तक गुलाम बना कर रखा था. पर हमने सत्ता के नशे में चूर होकर इतिहास के इस सबक को भुला दिया. एवं बचपन से मात्र २० वर्षों तक धैर्य के साथ चरित्रवान, निःस्वार्थी मनुष्य बनने और बनाने का परिशिक्षण देकर  मौलिक रूप से व्यक्ति के चारित्रिक गुणों में बदलाव लाने के बजाय अंग्रेजों की ही पद्धति को अपनाया गया, जिनका उद्देश्य ही समाज को बांटकर राज्य करना था।
मुश्किल यह है कि - तथाकथित सिविल सोसायटी के लोग भी स्वामी विवेकानन्द दिए गए परामर्श - " पहले मनुष्य निर्माण करो ! ";  पर ध्यान न देकर, मनुष्य की चारित्रिक गुणवत्ता में बदलाव लाये बिना ही व्यवस्था में बदलाव चाहते हैं, जो कि असम्भव है.
शिक्षा का मुख्य विषय 'मनुष्य-निर्माण होना चाहिये जबकि लोग समाज का निर्माण करने की योजना बनाते हैं और उनके लिये व्यक्ति निर्माण उनके लिये गौण हो जाता है।  चाहे बाबा रामदेव हों या सिविल सोसायटी के लोग हर कोई (जबरन -आमरण अनशन की धमकी देकर ) अपना विचार लादना चाहता है पर स्वामी विवेकानन्द द्वारा प्रदत्त भारत-पुनर्निर्माण सूत्र " Be and Make "  को सुनने समझने के लिए कोई तैयार नहीं है।
 इस वस्तु स्थिति को स्पष्ट करने के लिए स्वामी विवेकानन्द ने एक कहानी कही थी,- जो इस प्रकार है :-  
" अपने मत को अक्षुण रखने में प्रत्येक मनुष्य का एक विशेष आग्रह देखा जाता है... एक समय एक छोटे राज्य को जीतने के लिये एक दूसरे राजा ने दल-बल के साथ चढ़ाई की| शत्रुओं के हाथ से बचाओ कैसे हो, इस सम्बन्ध में विचार करने के लिये उस राज्य में एक बड़ी सभा बुलायी गयी|
 सभा में इंजीनियर, बढ़ई, चमार, लोहार, वकील, पुरोहित आदि सभी उपस्थित थे |इंजीनियर ने कहा- 'शहर के चारों ओर एक बहुत बड़ी खाई खुदवाइये|' बढ़ई बोला- ' काठ की एक दीवाल खड़ी कर ड़ी जाय|' 
चमार बोला- ' चमड़े के समान मजबूत और कोई चीज नहीं है, चमड़े की ही दीवाल खड़ी की जाय|'लोहार बोला- ' इस सबकी कोई आवश्यकता नहीं है; लोहे की दीवाल सबसे अच्छी होगी; उसे भेदकर गोली य़ा गोला नहीं आ सकता|'
वकील बोले- ' कुछ भी करने की आवश्यकता नहीं है; हमारा राज्य लेने का शत्रु को कोई अधिकार नहीं है- यही एक बात शत्रु को तर्क-युक्ति द्वारा (या अश्रु गैस, लाठी चार्ज से ?)समझा दी जाय|' 
 पुरोहित बोले- ' तुम लोग तो पागल जैसे बकते हो|होम-याग करो, स्वस्त्यन करो, तुलसी दो, शत्रु कुछ भी नहीं कर सकता|'
इस प्रकार उन्होंने राज्य को बचाने का कोई उपाय निश्चित करने के बदले अपने अपने मत का पक्ष लेकर घोर तर्क-वितर्क आरम्भ कर दिया|यही है मनुष्य का स्वभाव !"
 मानव मन के एकतरफा (एकपक्षीय ) झुकाव के बारे में;स्वामी जी यह कथा सुन कर बोले, '..ऐसे लोगों को झक्की कहते हैं|
हमसभी लोगों में इस प्रकार का कोई दुराग्रह य़ा झक्कीपन हुआ करता है. हमलोगों में उसे दबा रखने की क्षमता है. पागल में वह नहीं है. हमलोगों में और पागलों में भेद केवल इतना ही है|
 रोग, शोक, अहंकार, काम, क्रोध, ईर्ष्या य़ा अन्य कोई अत्याचार अथवा अनाचार से दुर्बल होकर, मनुष्य के अपने इस संयम को खो बैठने से ही सारी गड़बड़ी उत्पन्न हो जाती है!
मन के आवेग को वह फिर संभाल नहीं पाता. हमलोग तब कहते हैं, 'यह' पागल हो गया है. बस इतना ही ! " (१०:३२७,३२८) 
 स्वामी विवेकानन्द ने कहा था, " सभी सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्थाएं (System ) मनुष्यों के भलेपन (चरित्र) पर टिकती हैं| कोई राष्ट्र इसलिए महान और अच्छा नहीं होता कि उसकी Parliament (संसद) ने यह य़ा वह (लोकपाल Bill) पास कर दिया है, वरन इसलिये होता है कि उसके नागरिक महान और अच्छे होते हैं|" (४:२३४) 
 " मनुष्य केवल मनुष्य भर चाहिये| बाकी सब कुछ अपने आप हो जायेगा| आवश्यकता है वीर्यवान, तेजस्वि, श्रद्धासमपन्न और दृढविश्वासी निष्कपट नवयुवकों की| ऐसे सौ मिल जाएँ, तो संसार का कायाकल्प हो जाय |"(५:११८)  
" सारी शिक्षा तथा समस्त प्रशिक्षण का एकमेव उद्देश्य मनुष्य का निर्माण होना चाहिये. परन्तु हम यह न कर केवल बहिरंग पर ही पानी चढाने का सदा प्रयत्न किया करते हैं.जहाँ व्यक्तित्व का ही आभाव है, वहाँ सिर्फ बहिरंग पर पानी चढाने का प्रयत्न करने से क्या लाभ? 
सारी शिक्षा का ध्येय है- मनुष्य का विकास! वह " मनुष्य " जो अपना प्रभाव सब पर डालता है, जो अपने संगियों पर जादू सा कर देता है, शक्ति का एक महान केन्द्र है, और जब वह मनुष्य तैयार हो जाता है, वह जो चाहे कर सकता है| यह व्यक्तित्व जिस वस्तु पर अपना प्रभाव डालता है, उसी वस्तु को कार्यशील बना देता है ! " (४:१७२)
"आत्मसंयम का अभ्यास करने से महान इच्छा-शक्ति का प्रादुर्भाव होता है; वह बुद्ध य़ा ईसा जैसे चरित्र का निर्माण करता है| मूर्खों को इस रहस्य का पता नहीं रहता, परन्तु फिर भी वे मनुष्य जाती पर शासन करने के इच्छुक रहते हैं!" (३:९) 
" मनुष्य के ' मन ' को प्रशिक्षित करने से ही समस्या का समाधान मिल सकता है. कोई कानून किसी व्यक्ति से वह कार्य नहीं करा सकता है, जिसे वह करना नहीं चाहता है.अगर मनुष्य अच्छा बनना चाहेगा, तभी वह अच्छा बन पायेगा.सम्पूर्ण विधान एवं विधान के पण्डित मिलकर भी उसे अच्छा नहीं बना सकते. सर्वशक्ति सम्पन्न तो कहेगा ही, ' मैं किसी की परवाह नहीं करता !' हम सब अच्छे (चरित्रवान-मनुष्य ) बनें, यही समस्या का हल है.(४:१५७)
  " ...यह तो हमें मान ही लेना चाहिये कि कानून,सरकार, राजनीति ऐसी अवस्थाएं हैं, जो किसी प्रकार अन्तिम नहीं हैं. उनसे परे एक एक ध्येय है, चरित्रवान-  मनुष्य,जिसके लिए किसी कानून की  आवश्यकता नहीं है...प्रभु ईसामसीह ने भी कहा था- ' विधि-नियम उन्नति का मूल नहीं हैं, केवल नैतिकता और पवित्रता ही शक्ति है|"(४:२३४)
आज भारत के गाँव गाँव तक, अखिल भारत विवेकाननद युवा महामण्डल के निर्देशन में संचालित 'विवेकानन्द युवा पाठचक्र' तथा 
' युवा महामण्डल ' रूपी " मनुष्य-निर्माणकारी शिक्षा केन्द्रों " को फैला देने की घोर आवश्यकता है, जहाँ स्वामी विवेकानन्द के सपनों के अनुरूप लाखों की संख्या में ऐसे युवाओं को ढाला जा सके - " जिसका विकास समन्वित रूप (3-H) से हुआ हो...ह्रदय से विशाल, मन से उच्च, कर्म में महान !"
 झुमरीतिलैया विवेकानन्द युवा महामण्डल विगत २६ वर्षों से स्वामीजी द्वारा सौंपे गए इसी कार्य को धरातल पर रूपायित करने के प्रयास में लगा हुआ है. इस धीमी-गति के मनुष्य-निर्माणकारी आन्दोलन के पहियों से अपना कन्धा लगा देने के प्रयास में इस वर्ष (२०११-१२) की निम्न-लिखित योजनाओं में स्थानीय युवाओं को सहयोग करने का आह्वान किया जा रहा है:-

आशा है, इस वर्ष हमलोग अपने सम्मिलित प्रयास से उपरोक्त समस्त योजनाओं को अवश्य क्रियान्वित कर लेंगे.
क्योंकि स्वामी विवेकानन्द हमलोगों से ऐसी ही अपेक्षा रखते हैं. वे कहते थे-   " मेरा विश्वास युवा पीढ़ी में, नयी पीढ़ी में है; मेरे कार्यकर्ता उनमे से आयेंगे|सिंहों की भाँति वे समस्त समस्या का हल निकालेंगे|...वे एक केन्द्र से दूसरे केन्द्र में उस समय तक फैलेंगे, जब तक कि हम सम्पूर्ण भारत पर नहीं छा जायेंगे !" (४:२६१) 
केवल ३९ वर्ष तक के मनुष्यों को ही ' युवा ' नहीं कहते हैं, हमारे लिए युवा आदर्श के प्रतिक पूज्य नवनीदा तथा महामण्डल के अन्य वरिष्ट भ्रातागण हैं; जो विगत ४४ वर्षों से इस आन्दोलन को आगे बढ़ाते जा रहे हैं, आज इनमें से अधिकांश की आयु 60 plus हो गयी है, फिर भी युवाओं के जैसा भरपूर उत्साह से इस आन्दोलन को दिशा निर्देश दे रहे हैं.
किसी चुनौती को सामने देख कर जो व्यक्ति उसे स्वीकार करने के लिए ठीक उसी प्रकार कटिबद्ध हो जाता हो, जिस प्रकार शिव-धनुष तोड़ने के प्रसंग में राजा-जनक की निराशा उत्पन्न करने वाली टिप्पणी को सुनकर श्री लक्ष्मणजी क्षण भर में धनुष तोड़ने को कटिबद्ध हो गए थे; वैसा ही साहस और उत्साह जिसमे है, उसको ही   युवा समझना चाहिए, चाहे उसकी उम्र जो कुछ भी हो.  किसी ३५ साल के युवा के मुख से ऐसी वाणी निकले कि, मैं भला क्या कर सकता हूँ अब तो प्रलय ही होने वाला है, उसे ३५ साल का बूढ़ा ही समझना चाहिए. 
उस प्रसंग की एक बानगी देखिये, राजा जनक निराश हो कर जब कहते हैं-

* अब जनि कोउ भाखे भट मानी। बीर बिहीन मही मैं जानी॥
तजहु आस निज निज गृह जाहू। लिखा न बिधि बैदेहि बिबाहू॥2॥
भावार्थ:-अब कोई वीरता का अभिमानी नाराज न हो। मैंने जान लिया, पृथ्वी वीरों से खाली हो गई। अब आशा छोड़कर अपने-अपने घर जाओ, ब्रह्मा ने सीता का विवाह लिखा ही नहीं॥2॥
को सुनकर लक्ष्मणजी का उत्तर देखिये-
* रघुबंसिन्ह महुँ जहँ कोउ होई। तेहिं समाज अस कहइ न कोई॥
कही जनक जसि अनुचित बानी। बिद्यमान रघुकुल मनि जानी॥1॥
भावार्थ:-रघुवंशियों में कोई भी जहाँ होता है, उस समाज में ऐसे वचन कोई नहीं कहता, जैसे अनुचित वचन रघुकुल शिरोमणि श्री रामजी को उपस्थित जानते हुए भी जनकजी ने कहे हैं॥1॥
* सुनहु भानुकुल पंकज भानू। कहउँ सुभाउ न कछु अभिमानू॥
जौं तुम्हारि अनुसासन पावौं। कंदुक इव ब्रह्मांड उठावौं॥2॥
भावार्थ:-हे सूर्य कुल रूपी कमल के सूर्य! सुनिए, मैं स्वभाव ही से कहता हूँ, कुछ अभिमान करके नहीं, यदि आपकी आज्ञा पाऊँ, तो मैं ब्रह्माण्ड को गेंद की तरह उठा लूँ॥2॥ 
*काचे घट जिमि डारौं फोरी। सकउँ मेरु मूलक जिमि तोरी॥
तव प्रताप महिमा भगवाना। को बापुरो पिनाक पुराना॥3॥
भावार्थ:-और उसे कच्चे घड़े की तरह फोड़ डालूँ। मैं सुमेरु पर्वत को मूली की तरह तोड़ सकता हूँ, हे भगवन्‌! आपके प्रताप की महिमा से यह बेचारा पुराना धनुष तो कौन चीज है॥3॥
* बिस्वामित्र समय सुभ जानी। बोले अति सनेहमय बानी॥
उठहु राम भंजहु भवचापा। मेटहु तात जनक परितापा॥3
भावार्थ:-विश्वामित्रजी शुभ समय जानकर अत्यन्त प्रेमभरी वाणी बोले- हे राम! उठो, शिवजी का धनुष तोड़ो और हे तात! जनक का संताप मिटाओ॥3॥ 
ठीक श्री लक्ष्मणजी की वाणी में चिर-युवा स्वामी विवेकानन्द भी हुँकार करते हैं- 
" ऐसा न कहो कि मनुष्य पापी है| उसे बताओ की तू ब्रह्म है| यदि कोई शैतान हो, तो भी हमारा कर्तव्य यही है कि हम ब्रह्म का ही स्मरण करें, शैतान का नहीं|...हम यही कहें - 'हम हैं ', 'ईश्वर हैं और हम ईश्वर हैं|
' शिवोहम शिवोहम कहते हुए आगे बढ़ते चलो|जड़ (शरीर) नहीं, वरन चैतन्य (आत्मा) हमारा लक्ष्य है! नाम-रूप वाले सभी पदार्थ नाम-रूप हीन सत्ता (अस्ति,भाति,प्रिय) के अधीन हैं| इसी सनातन सत्य की शिक्षा श्रुति (गीता -उपनिषद आदि) दे रही है! प्रकाश को ले आओ, अन्धकार आप ही आप नष्ट हो जायेगा|वेदान्त -केसरी गर्जना करे, सियार अपने अपने बिलों में छिप जायेंगे!..यदि कोठरी में अन्धकार है, तो सदा अन्धकार का अनुभव करते रहने और अन्धकार अन्धकार चिल्लाते रहने से तो वह दूर नहीं  होगा, बल्कि प्रकाश को भीतर ले आओ, तब वह दूर हो जायेगा|
..आत्मा की शक्ति का विकास करो और सारे भारत के विस्तृत क्षेत्र में उसे ढाल दो, और जिस स्थिति की आवश्यकता है, वह आप ही आप प्राप्त हो जाएगी|अपने आभ्यन्तरिक ब्रह्मभाव को प्रकट करो और उसके चारों ओर सब कुछ समन्वित हो कर विन्यस्त हो जायेगा|
वेदों में बताये हुए- 'इन्द्र और विरोचन ' के उदाहरण को स्मरण रखो|दोनों को ही अपने ब्रह्मत्व का बोध कराया गया था, परन्तु असुर विरोचन अपनी देह को ही ब्रह्म मान बैठा|इन्द्र तो देवता थे, वे समझ गये कि वास्तव में आत्मा ही ब्रह्म है!!
तुम तो इन्द्र की सन्तान हो! तुम देवताओं के वंशज हो! जड़ पदार्थ तुम्हारा ईश्वर कदापि नहीं हो सकता; शरीर तुम्हारा ईश्वर कभी नहीं हो सकता!
भारत का पुनरुत्थान होगा, पर वह जड़ की शक्ति से नहीं, वरन आत्मा की शक्ति द्वारा| वह उत्थान विनाश की ध्वजा लेकर नहीं, वरन शान्ति और प्रेम की ध्वजा से-...ऐसा मत कहो कि हम दुर्बल हैं, कमजोर हैं|श्री रामकृष्ण के चरणों के दैवी स्पर्श से जिनका अभ्युदय हुआ है, उन मुट्ठी भर नवयुवकों की ओर देखो !
 उन्होंने उनके उपदेशों का प्रचार आसाम से सिंध तक और हिमालय से कन्याकुमारी तक कर डाला|
..उनपर कितने ही अत्याचार किये गये, पुलिस ने उनका पीछा किया, वे जेल में डाले गये, पर अन्त में जब सरकार को उनकी निर्दोषिता का निश्चय हो गया, तब वे मुक्त कर दिये गये!
अतएव, अपने अन्तःस्थित ब्रह्म को जगाओ, जो तुम्हें क्षुधा-तृष्णा, शीत-उष्ण सहन करने में समर्थ बना देगा |..आत्मा की इस अनन्त शक्ति का प्रयोग जड़ वस्तु पर होने से भौतिक उन्नति होती है, विचार पर होने से बुद्धि का विकास होता है और अपने ही पर होने से मनुष्य भी ईश्वर-तुल्य बन जाता है!
पहले हमें ईश्वर बन लेने दो! तत्पश्चात दूसरों को ईश्वर-तुल्य-
' मनुष्य ' बनाने में सहायता देंगे| बनो और बनाओ - Be and Make !यही हमारा मूल मंत्र रहे! " (९:३७९-३८०) 
" आवश्यकता है संघठन करने की शक्ति की, मेरी बात समझे ?क्या तुममें से किसी में यह कार्य करने की बुद्धि है ?यदि है तो तुम कर सकते हो|...हमें कुछ चेले (निष्ठावान आज्ञाकारी कर्मी ) भी  चाहिये- वीर युवक, समझे ? दिमाग में तेज और हिम्मत के पूरे, यम का सामना करने वाले, तैर कर समुद्र पार करने को तैयार - समझे? हमें ऐसे सैंकड़ो चाहिए- स्त्री और पुरुष, दोनों|जी -जान से इसीके लिये प्रयत्न करो !"(३:३५४)
" हे नर-नारियों ! उठो, आत्मा के सम्बन्ध में जाग्रत होओ, सत्य में विश्वास करने का साहस करो| संसार को कोई सौ (१००) साहसी नर-नारियों की आवश्यकता है ! अपने में साहस लाओ, जो सत्य को जान सके, जो जीवन में निहित सत्य को दिखा सके, जो मृत्यु से न डरे, प्रत्युत उसका स्वागत करे, जो मनुष्य को यह ज्ञान करा दे कि वह आत्मा है, और सारे जगत में ऐसी कोई भी वस्तु नहीं जो उसका विनाश कर सके|" (२:१८) 

" अपनी बहादुरी तो दिखाओ! प्रिय भाई, मुक्ति न मिली तो न सही, दो-चार बार नरक ही जाना पड़े तो हानि ही क्या है ? क्या भर्तृहरि का यह कथन असत्य है- 
मनसि  वचसि काये पुन्यपीयूषपूर्णः 
त्रिभुवनं-उपकारश्रेनिभिः प्रीयामानः  !
परगुणपरमाणुम पर्वतीकृत्य केचित 
निजहृदि विकसन्तः सन्ति सन्तः क्रियन्तः ||   
ऐसे साधु (सज्जन पुरुष ) कितने हैं, जिनके कार्य मन तथा वाणी पुण्यरूप  अमृत से परिपूर्ण  हैं और जो विभिन्न उपकारों के द्वारा त्रिभुवन की प्रीति सम्पादन कर दूसरों के परमाणु तुल्य अर्थात अत्यन्त स्वल्प गुण को भी पर्वतप्रमाण बढ़ा कर दूसरों से कहते रहते हैं- और इस प्रकार अपने हृदयों को विशाल बनाते रहते हैं!(' विवेकानन्द - राष्ट्र को आह्वान ' पुस्तिका का पृष्ठ २७)    

हमे तो कर्म ही करना है, फल अपने आप होता रहेगा|यदि कोई सामाजिक बन्धन तुम्हारे ईश्वर-प्राप्ति के मार्ग में बाधक है, तो आत्मशक्ति के सामने अपने आप ही वह टूट जायेगा|
भविष्य मुझे दीखता नहीं और मैं उसे देखने की चिन्ता भी नहीं करता| परन्तु मैं अपने सामने वह एक सजीव दृश्य तो अवश्य देख रहा हूँ कि हमारी यह प्राचीन भारत माता पुनः एक बार जाग्रत होकर अपने सिंहासन पर नवयौवनपूर्ण और पूर्व कि अपेक्षा अधिक महा महिमान्वित होकर विराजी है| शान्ति और आशीर्वाद के वचनों के साथ सारे संसार में उसके नाम की घोषणा कर दो ! सेवा और प्रेम में सदा तुम्हारा ,
विवेकानन्द (९:३८१)
आइये वर्ष (२०११-२०१२) में स्वामीजी के इस आह्वान का हमलोग एक स्वर से प्रतिउत्तर दें !  

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