Friday, September 10, 2010

[51] ' मनुष्य-निर्माण कारी प्रशिक्षण के प्रभाव '

" पशु तो पशु ही रह जाते हैं, किन्तु मनुष्य- ' मनुष्य ' बन सकता है ! "
( ' मनुष्य-निर्माण कारी प्रशिक्षण का प्रभाव ' के बारे में ) दो-चार घटनाओं का स्मरण जब तब हो आने से बहुत आश्चर्य भी होता है. दो व्यक्तियों के जीवन से जुड़ी घटनायें याद आती हैं. एक लड़के को कोई नौकरी य़ा रोजगार का कुछ भी अवलम्ब नहीं था. बहुत कष्ट से एक स्कूल में उसको नौकरी मिली. किन्तु जब वह नौकरी करने स्कूल में गया तो वहाँ उसको पढ़ाने के बजाय ऑफिस का कार्य दिया जाने लगा. उसको स्कूल का एकाउन्ट्स लिखने के लिये कहा जाता था.
तथा वह एकाउन्ट किस प्रकार लिखना होगा इसका निर्देश देते हुए स्कूल के व्यवस्थापक लोग बोले, कि आप जैसे एकाउन्ट लिख रहे हैं वैसे न लिख कर हमलोग जैसा कहते हैं वैसा लिखिए ताकि हमलोगों के स्कूल को उससे लाभ पहुँचे इत्यादि इत्यादि कहने लगे. अर्थात मिथ्या हिसाब लिखने के लिये उस पर दबाव देने लगे.तब वह उस नौकरी को छोड़ कर वापस लौट आया. कहता था, नहीं, यह सब तो सच्ची बात नहीं है. भविष्य के जीवन में उसने फिर कभी नौकरी नहीं किया. अपने घर में बैठ कर कुछ छात्रों को पढ़ता था, उसके बाद अपना एक छात्रावास स्थापित कर लिया. 
और एक दूसरे लड़के की बात याद आ रही है. वह भी बड़ा आश्चर्य जनक था. उस लड़के के पिताजी रामकृष्ण मिशन द्वारा संचालित एक दातव्य चिकित्सालय में कम्पाऊन्डर थे. अति सामान्य तलब मिलता था. उतने पैसों से पुत्र-पुत्रियों को पढ़ाना-लिखाना और परिवार का भरण-पोषण करना बहुत कष्टकर था. उनका लड़का पढने-लिखने में अच्छा था.अच्छे अंकों से पास करके बहुत चेष्टा करने पर भी उसको नौकरी नहीं मिली. वह दूर में रहता था किन्तु नियमित पत्राचार किया करता था. एक बार उसने सूचित किया कि एक बहुत बड़ी कम्पनी में बहुत अच्छे पद पर नियुक्ति के लिये मुम्बई जाकर परीक्षा देने का एक चिट्ठी मिली है;प्रतियोगिता परीक्षा में भाग लेने के वास्ते मुम्बई ही जाना पड़ेगा किन्तु मेरे पास तो मुम्बई जाने के लिये रूपया पैसा नहीं है, क्या करूँ ?
मैंने उसको लिखा कि तुम किसी तरह रुपये पैसों का इन्तजाम करके परीक्षा दे आओ. आश्चर्य लगता है, वह लड़का मुम्बई गया, परीक्षा में भाग लिया वह प्रतियोगिता परीक्षा सर्व भारतीय स्तर पर आयोजित हुई थी. उस परीक्षा में उत्तीर्ण होने पर एक विदेशी कम्पनी में बहुत ऊँचे पद पर नौकरी मिल सकती थी. लिखित परीक्षा में उसको प्रथम स्थान प्राप्त हुआ है, इसके बाद एक इन्टरभियु होगा. वह इन्टरभियु कलकाता में होगा, किन्तु वह लड़का तो उत्तर बंगाल में रहता था, उसके लिये मुम्बई की परीक्षा से लौटने के बाद पुनः उत्तर बंगाल से कलकाता आकर इन्टरभियु देना बहुत कठिन था. मैंने उसको फिर एक पत्र लिखा. उससमय चिट्ठी पहुँचने में आजकल जितना समय नहीं लगता था. कुछ जल्दी ही पत्र अपने गंतव्य पते तक पहुँच जाता था. ऐसी आशा रखी जा सकती थी कि एक सप्ताह के अन्दर अन्दर एक जगह से दूसरे जगह तक चिट्ठी पहुँच ही जाएगी.अभी तो सात दिनों में बहुत कम ही चिट्ठी पहुँच पाती है.
इस प्रकार वह कलकाता आया, आकर इन्टरभियु दिया, इसमें भी फर्स्ट हुआ, और सेलेक्टेड हो गया. उसको उसी कम्पनी में Eastern Region of India - का प्रभार देकर नौकरी में रख लिया गया.पर उस नौकरी में आगे चल कर उसको जाकर कई प्रकार की समस्याओं के सम्मुखीन भी होना पड़ता था. किन्तु जिस प्रकार प्रशिक्षण और अभ्यास से वह तप कर निकला था उसके फलस्वरूप उसके शरीर में बिकुल कोई आँच नहीं लग सका.
हमलोगों का सिटी ऑफिस जिस समय अद्वैत आश्रम से चल रहा था, उसके बाद में ही तो वहाँ से शम्भूबाबू लेन में आया था. किन्तु उसी समय से बिल्कुल स्थापना के समय से ही कॉलेज स्ट्रीट ( आजकल जिसको विधान सरणी कहता है ) के ठीक मोड़ के पास एक ' मेस बाड़ी ' ( निजी छात्रावास ) में ऊपर चढ़ने पर सीधा दूसरे तल्ले पर एक बरामदे के साथ छोटा सा जगह था, एक लड़का वहाँ रहता था उसने परामर्श दिया कि आपलोग चाहें तो इस स्थान को अपने उपयोग में ला सकते हैं.
उस समय महामण्डल का कोई साइन बोर्ड नहीं था, महामण्डल का पता कहाँ दिया जायेगा यही सोंच कर महामण्डल का एक साइनबोर्ड उस ' मेस बाड़ी ' पर लगा दिया गया था.उस समय हमलोगों के ' चण्डी दा ' एक ऑफिस में नौकरी करते थे, संध्या के समय नौकरी से आने के बाद वहीं दो-तीन घन्टा रोज आकर अकेले ही बैठे रहते थे.वहाँ कोई काम नहीं होता था कोई वहाँ नहीं जाता था, किन्तु शाम के समय में  चण्डी दा पूरी निष्ठा के साथ वहाँ दो घंटे तक अवश्य उपस्थित रहते थे. उसके बाद शम्भू बाबू लेन य़ा अन्य कहीं जाकर महामण्डल का कार्य करते थे. इस प्रकार की निष्ठा के साथ कार्य हुआ था.जिस समय कार्य इतना ज्यादा बढ़ गया कि शम्भू बाबू लेन में रहना भी सम्भव नहीं हुआ तो एक हमलोगों के ' तनु दा ' (श्री तनुलाल पाल ) जो महामण्डल के मीटिंग में पहले से ही जाते थे, उन्होंने एकदिन कहा कि सियालदह स्टेशन के निकट मेरा घर है, महामण्डल को तो काम करने में बहुत असुविधा हो रहा है, यदि महामण्डल लेना चाहे तो मेरे घर के निचले तल्ले पर का दो कमरा मैं दे सकता हूँ.
 तनु दा भी महामण्डल के एक उपाध्यक्ष हैं, एवं वे स्वामी विज्ञानानन्द जी महाराज ( स्वामीजी के एक गुरुभाई ) के आश्रित हैं. उनका मठ और मिशन में बहुत पुराना सम्बन्ध है तथा अति प्राचीन सन्यासियों में से बहुतों के साथ संग किये हैं. तब उनके घर में दो कमरों को लिया गया.और महामण्डल का सिटी ऑफिस स्थानान्तरित हो कर वहीं चला आया.पता है- 6 /1 A, जस्टिस मन्मथ मुखर्जी रो, हमलोगों का सिटी ऑफिस आज भी वहीं है, ( जिसमे सोने का भी जगह नहीं है वहीं प्रमोद दा को बहुत कष्ट पूर्वक रहना पड़ता है.) उसी समय से सभी कार्य वहाँ से चलाये जा रहे हैं. इधर ये सब कार्य बढ़ते जा रहे हैं, पुस्तकों का प्रकाशन बढ़ता जा रहा है.
 ' विवेक-जीवन ' के ग्राहक बढ़ते जा रहे हैं. महामण्डल के केन्द्र इसके ग्राहक बने हैं, महामण्डल के अनेकों सदस्य इसके ग्राहक बने हैं. इसके बाद महामण्डल सदस्यों के अतिरिक्त भी कई लोग यह सब देख कर इसके ग्राहक बन रहे हैं. होते होते अन्य से तुलना करने योग्य तो कुछ भी नहीं है, फिर भी लगभग तीन हजार ग्राहक हो गये हैं.
अब भी किन्तु आठ पृष्ठों का यह द्विभाषी मासिक सम्वाद पत्रिका ' विवेक-जीवन ' के नाम से ही प्रकाशित होता है.बिहार का एक यूनिट है, वह अब झाड़खण्ड राज्य के अन्तर्गत पड़ गया है. झाड़खण्ड के कार्यकर्ताओं ने कहा कि' विवेक-जीवन ' अंग्रेजी और बंगला में तो निकलता है पर इसमें यदि हिन्दी भी रहता तो बहुत अच्छा था. हिन्दी क्षेत्रों में अधिकांश लोग तो बंगला पढ़ नहीं पाते हैं. साधारण तौर से ' विवेक- जीवन ' में एक सम्पादकीय लेख अंग्रेजी में होता है, एक बंगला में होता है. महामण्डल के विभिन्न केन्द्रों के सम्वाद आदि दिये जाते हैं. इसके अतिरक्त कुछ अन्य समसामयिक सूचनाएं, विज्ञान जगत से जुड़े नये नये समाचार आदि भी रहते हैं.
इसके अतिरिक्त विशेष रूप से कैम्प में जो प्रश्नोत्तरी का कार्यक्रम चलता है वह बहुतों को बहुत उपयोगी लगता है, तथा सभी इसे बहुत पसन्द करते हैं. जो लोग कैम्प में नहीं आ पाते हैं वे ' विवेक-जीवन ' में प्रश्नोत्तर देख सकते हैं. इस प्रकार की कई उपयोगी सामग्रियों को इसमें प्रकाशित किया जाता है. अब हिन्दी भाषी कर्मियों के आग्रह पर इसे हिन्दी में भी निकालने की अनुमति दे दी गयी. हिन्दी में किन्तु मूख्य रूप से इसी द्विभाषी
 ' विवेक-जीवन ' के अंग्रेजी बंगला में जो कुछ प्रकाशित होता है उसी ' विवेक-जीवन '  को हिन्दी में अनुवाद करके अब ' विवेक-अंजन ' नाम से महामण्डल की हिन्दी त्रैमासिक सम्वाद पत्रिका के रूप में प्रकाशित किया जाता है. आजकल यह पत्रिका भी हिन्दी अँचल में बहुतों का ध्यान आकर्षित करने लगी है.उधर पहले पहल महामण्डल की जो अवस्था थी, उस समय तो कार्य करने वाले लोग बहुत ही कम थे, नहीं के बराबर थे. इसीलिये महामण्डल के काम से कई स्थानों पर अकेले ही जाना पड़ता था. कोई आने का निमत्रण देता तब वहाँ जाना पड़ता था, य़ा कहीं जाना हमलोगों को जरुरी लगता तो भी जाना पड़ता था.
उस समय ऑफिस में नौकरी भी करनी पड़ती थी. शनिवार के दिन दो बजे दिन में छुट्टी हो जाती थी. कई बार महामण्डल के कागज पत्तर, पुस्तिकाएँ आदि साथ में लेकर निकल जाता था. कभी कभी तो ऐसा भी हुआ है कि अनजाने रास्ते पर पैदल चलते चलते माइल पर माइल जमीन पीछे छोड़ता हुआ बहुत दूर निकल आया हूँ. एक छोटी नदी आ गयी है. एकबार याद है, तारकेश्वर से ट्रेन में उतर कर कितने माइल पैदल चला होऊँगा अभी बता नहीं सकता, दामोदर नदी पार करके देखता हूँ थोड़ा जंगल जैसा आ गया है. जहाँ जाना है वहाँ का नाम किससे पूछूं ? कोई जन प्राणी दूर दूर तक दिखलाई नहीं पड़ रहा था. जंगल के बीच से पैदल चलने का जो निशान पड़ जाता है, जिसको पगडंडी कहते हैं, उसी से जाते जाते हठात एक आदमी दिखायी पड़ा, उससे मैंने पूछा- यह ग्राम किस ओर पड़ेगा? ' ओ यह ग्राम ? थोड़ा और आगे जाइये, आपको वहाँ से दो पगडण्डी अलग अलग दिशाओं में मुडती हुई दिखेगी, आप बायीं ओर वाली पगडण्डी पकड़ कर चलने से वहाँ पहुँच जाइयेगा. '
ऑफिस से मैं दो बजे निकला था, पर उस ग्राम तक पहुँचते पहुँचते शाम हो गयी. वहाँ पहुँच कर जब एक स्थान पर गया तो देखा कि एक आदमी का घर है. घर क्या छोटी सी कुटिया थी. उसीमे जाने के लिये बोला. जो लोग ग्राम कि ओर गये हैं वे जानते हैं कि ' कुटिया- नुमा ' जो घर बनाये जाते हैं उसमे वे लोग हर जगह में दरवाजा बहुत बड़ा नहीं रखते हैं. बहुत नीचा दरवाजा था. सिर को झुका कर ही उसमे प्रवेश किया जा सकता है. उस कुटिया में जाने पर वहाँ के लोगों से बहुत देर तक बातचीत हुई. वहाँ पर महामण्डल का एक केन्द्र बना. वहाँ पर जिन्हों ने महामण्डल का केन्द्र स्थापित किया था वे अभी रामकृष्ण मठ-मिशन के सन्यासी हैं.
हमलोगों ने अभी तक ठीक से गिनती करके नहीं देखा है, पर कई लोग कहते हैं कि महामण्डल के प्रायः एकसौ कर्मी मठ-मिशन के सन्यासी बन गये हैं. उनलोगों के मन में यहीं से ठाकुर कि बातें सुनते सुनते आग्रह हुआ है. इस समय उनलोगों का उम्र भी बहुत ज्यादा हो गया है, कभी कभी तो हमलोग भी पहचान नहीं पाते हैं. क्योंकि सन्यासी बनने के पहले वे किसी ग्राम में अपने पुर्वाश्रम की वेष-भूषा में ही रहते थे, अब मुख की आकृति बदल गयी है, शरीर भी कुछ कुछ बदल गया है, मुंडित मस्तक हो गये हैं; इसीलिये हो सकता है हमलोग कभी कभी पहचान नहीं पाते हैं. कोई कोई स्वयं आगे बढ़ कर परिचय देते हुए कहते हैं- ' मैं भी पहले महामण्डल में था. ' तब उनलोगों से मिल कर बहुत अच्छा लगता है, बहुत आनन्द भी होता है. यह सब किस प्रकार हो गया है ? हमे खुद नहीं मालूम.इसिलए मेरे मन में बार बार ये ख्याल आता है,..... यदि ठाकुर परमहंसदेव की ईच्छा नहीं होती तो महामण्डल कभी स्थापित भी नहीं हो सकता था. यदि इसके पीछे माँ का आशीर्वाद नहीं रहता, स्वामीजी का अदभुत तेज और उत्साह वर्धक प्रेरणा इसके साथ मिलकर एकत्रित नहीं हो जाती तो महामण्डल कभी यहाँ तक पहुँच ही नहीं सकता था. 
इसीलिये मेरे मन में यह विचार भी उठता है कि हमलोगों का जीवन, जो भी लोग इस काम से जुड़े हैं उन सभी लोगों का जीवन इसलिए धन्य हो गया है कि , ठाकुर-माँ -स्वामीजी का कार्य जिस प्रकार हमलोगों के माध्यम से हो रहा है, यह उन्ही की ईच्छा से हो रहा है, उन्ही की आशीर्वाद से हो रहा है. हमलोगों का जीवन धन्य हो रहा है, ऐसा प्रतीत होता है.
एक और जगह में जाने बोला था, वहाँ जाकर देखता हूँ वैसा उबड़-खाबड़ अँचल है, कहीं पर बांसों का झुरमुट है तो कहीं उस पगडण्डी पर चलते चलते बीच में जंगल आ जाता है. इसी प्रकार चलते चलते उस ग्राम में जा पहुँचा. वहाँ पहुँचने पर देखता हूँ कि एक कमरे में ठाकुर-माँ-स्वामीजी का चित्र बहुत सुन्दर ढंग से सजा कर रखा हुआ है. वहाँ पर प्रतिदिन उनकी पूजा-अर्चना की जाती है. उस पूजा में उस घर के लोग भाग लेते हैं, दूसरे लोग भी आते हैं, महामण्डल के जो सदस्य लोग  हैं वे भी आते हैं, संध्या बेला में आरात्रिक होता है.
उसके बाद देखता हूँ सामने थोड़े खुला स्थान है, वहाँ पर छोटे छोटे बच्चों का एक दल बैठा हुआ है. मुझसे बोला कि आप इनलोगों को कुछ कहिये. क्या बोलूँगा ? इस प्रकार हठात कह दिया जाये तो मैं इन छोटे छोटे बच्चों को क्या बोलूं, यही सोंच रहा था. मैंने पूछा- ' क्या तुमलोग ठाकुर को जानते हो ? '
" हाँ, जानते हैं ! " तुमलोग क्या माँ को जानते हो; श्रीश्रीमाँ सारदा देवी को ? " हाँ जानते हैं, यही तो भीतर में बैठी हुई हैं, पूजा होती है. " अच्छा तुमलोग स्वामी विवेकानन्द को जानते हो ? " हाँ जानते हैं, स्वामी विवेकानन्द को भी जानते हैं. " ऐसे बच्चों को मैं और भला क्या कहता. तब मैंने उन बच्चों से एक बात कहा - " जानते हो इन लोगों को देखने से मुझे क्या महसूस होता है ? मैं तुमलोगों से अपने मन कि बात बतलाता हूँ. ठाकुर हमलोगों के पिता हैं, माँ सारदा हमलोगों की माँ हैं, और स्वामी विवेकानन्द हमलोगों के बड़े भाई हैं. तुम्हारे बड़े भैया हैं." 
यदि तुमलोग सचमुच इन लोगों को माँ, पिताजी और बड़े भैया जैसा अनुभव कर सको तो तुमलोगों का जीवन अति सुन्दर हो उठेगा. जीवन में आनन्द बना रहेगा. संसार में दुःख है, आभाव है, सबकुछ है. किन्तु मन में यदि वह आनन्द बना रहे (ठाकुर माँ स्वामीजी को बिल्कुल अपना मानने से जो आनन्द होता है - वैसा वाला देश-कालातीत आनन्द ) तो जीवन कभी व्यर्थ में ही नहीं बीत सकता है.मनुष्य योनी में जन्म लेना सार्थक हो जायेगा. अत्यन्त आनन्दित मन लेकर हमलोग इस नश्वर शरीर का त्याग करने में समर्थ बन जायेंगे. एक दिन तो यह शरीर सभी को त्याग करना ही होगा. किन्तु स्वामीजी जैसा कहते थे, वह बहुत बड़ी बात है होगी कि हम सभी मनुष्य यथार्थ मनुष्य बन कर छोटी छोटी निशानियाँ ही सही, पर कोई न कोई निशानी अपना कोई न कोई दाग य़ा एक " चिन्ह " यहाँ पर अवश्य ही छोड़ कर विदा ले सकते हैं ! तब हमारे चले जाने के बाद लोग कहेंगे-
" हाँ, एकटा रेखे गेछे किछू, एकटा जीवन रेखे गेछे ! "  
" हाँ, अमुक व्यक्ति चला तो गया है, पर कुछ चिन्ह (प्रतीक-चिन्ह Mile -Stone  रूपी एक ' जीवन ') छोड़ गया है ! " 
ऐसे ही प्रेरणा दायक जीवन गठित करना आवश्यक है. हमलोगों को अपना जीवन ऐसे ही त्रिदेवों (ठाकुर-माँ -स्वामीजी ) के साँचे में ढाल लेना है ! ( ये तीनों ही माँ, पिता और बड़े भैया के रोल मॉडल हैं) हमे यह मनुष्य शरीर प्राप्त हो गया है, मुष्य शरीर प्राप्त करके इसको ' यथार्थ मनुष्य ' के रूप में गढ़ लेना पड़ता है. अन्य पशु लोग जन्म लेते हैं और उम्र बीत जाने के बाद भी वे पशु ही रह जाते हैं. किन्तु मनुष्य शरीर प्राप्त कर लेने के बाद ' यथार्थ मनुष्य' जैसा बन जाने का पूरा दायित्व मनुष्य का ही है. उन्ही कवि राजा भर्तृहरि की एक बहुत प्रसिद्ध उक्ति है- " पशु, पशु ही रह जाता है. किन्तु मनुष्य मनुष्य हो उठता है ! " बड़े ही सुन्दर ढंग से वे कहते हैं- 
" येषां न विद्या न तपो न दानं,
                न ज्ञानं न शीलं न गुणों न धर्मः |
ते मर्त्यलोके भूरी भारभूता,
                                 मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति || "  
जिनके भीतर विद्या नहीं है, तपस्या नहीं है, ज्ञान नहीं है, धर्म नहीं है, दान नहीं है, वैसे लोग इस धरनी पर भार स्वरुप हैं. मनुष्य के रूप में मृग जैसे हैं, अर्थात पशु जैसे ही घूमते फिरते हैं. समाज के अधिकांश लोगों की तो यही दशा है. यदि हमलोग इस मनुष्य के समाज को पशुओं के समाज जैसी अवस्था में रहने देना नहीं चाहते हों, यदि हमलोग यह चाहते हों कि मनुष्य का समाज ' यथार्थ मनुष्य ' के समाज में बदल जाये तो, इस चरित्र निर्माण कारी और मनुष्य निर्माण कारी प्रशिक्षण शिविर को भारत के गाँव गाँव तक फैला देना होगा. इसके लिये हमे स्वयं चेष्टा करके पहले अपने जीवन को सुन्दर ढंग से गढ़ लेना होगा. जीवन को सुन्दर रूप से गढ़ लेने पर वह एक महामूल्यवान सम्पद में परिणत हो उठता है.            
           

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